मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

भगवान परशुराम – 5


भगवान परशुराम 5
आचार्य परशुराम राय


     पिछले अंक में भगवान परशुराम का भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम के साथ विवाद और उसके परिणाम की चर्चा की गई थी। इसके अतिरिक्त उनके अमर होने की भी बात कही गई थी। इसी कारण द्वापर में भी उनके जीवन की दो घटनाएं देखने में आती है जिनकी चर्चा यहाँ की जाएगी।

     भगवान परशुराम ने क्षत्रियों को शस्त्र शिक्षा न देने की शपथ ली थी। लेकिन माँ गंगा के अनुरोध पर उनकी सन्तान मानकर पितामह भीष्म (देवव्रत) को शस्त्रास्त्रों की शिक्षा दी थी। उन दिनों पितृसत्तात्मक सत्ता होने के बावजूद मातृसत्तात्मक सोच थी। इसीलिए कृष्ण का नाम नन्दनन्दन से अधिक देवकीनन्दन नाम प्रसिद्ध है। लक्ष्मण के लिये सौमित्र शब्द का भी अधिक प्रयोग हुआ है। सम्भवत: इन्हीं कारणों से भगवान परशुराम ने देवव्रत को शिक्षा दी।

     देवव्रत ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि वे विवाह नहीं करेंगे। माँ सत्यवती से महाराज शान्तनु को दो पुत्र हुए - चित्रांगद और विचित्रवीर्य। चित्रांगद गंधर्वो के साथ युद्ध में मारे गए। अतएव भीष्म पितामह ने अपने भाई विचित्रवीर्य का राजतिलक करवाया और उनके विवाह के लिए काशिराज की तीनों कन्याओं - अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को स्वयंवर से वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को परास्त कर बलात् अपहृत कर लाए। उनमें से अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से हुआ। अम्बा ने उनसे कहा कि वह तन-मन से महाराज शाल्व से प्रेम करती है। अतएव उसे उन्होंने छोड़ दिया। लेकिन शाल्व ने अपहरण किए जाने के कारण उसे (अम्बा को) स्वीकार नहीं किया। तब वह वापस भीष्म पितामह के पास आकर बोली कि आपने मेरा अपहरण किया है, अतएव नियमानुसार आपको ही मुझसे विवाह करना पड़ेगा। भीष्म ने अपनी की हुई प्रतिज्ञा की बात बताकर विवाह करने से अस्वीकार कर दिया।

     निराश अम्बा ने भीष्म पितामह के गुरु भगवान परशुराम के पास जाकर उनसे पूरी घटना विस्तार से बतायी। भगवान परशुराम ने भीष्म के साथ उसका विवाह कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने भीष्म को बुलाया। पर, काफी समझाने-बुझाने के बाद भी भीष्म तैयार नहीं हुए। अन्त में भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि मुझसे युद्ध करो। कहा जाता है कि दोनों में घमासान युद्ध हुआ, जो देवताओं के हस्तक्षेप से बिना किसी परिणाम के समाप्त हुआ। अम्बा ने भीष्म को शाप दे दिया कि एक नपुंसक उनकी मृत्यु का कारण बनेगा और इसके बाद उसने आत्महत्या कर ली। कहा जाता है कि उसका शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म हुआ, जिसके कारण भीष्म युद्ध में धाराशयी हो गए।

     द्वापर की दूसरी घटना में भगवान परशुराम का उल्लेख मिलता है कि कुंती पुत्र कर्ण उनके पास शस्त्र विद्या सीखने गया था। उसके वंश आदि का परिचय पाने के बाद वे उसे शास्त्रस्त्र की शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए। विद्याभ्यास चलता रहा। एक दिन थकान के कारण भगवान परशुराम आराम कर रहे थे। कर्ण उनकी सेवा कर रहा था। इस बीच गुरु को नींद आ गयी और कोई कीड़ा कर्ण के पैरों के बीच घुस गया। उसके काटने से उसे काफी पीड़ा होने लगी और खून भी बहने लगा। गुरु की नींद खराब न हो, इसलिए वह बिना हिले पीड़ा सहता रहा। खून के स्पर्श से जब गुरु की नींद टूटी तो उन्हें काफी सन्ताप हुआ और उसकी गुरुभक्ति पर प्रसन्नता भी। लेकिन एक बात पर उन्हें आश्चर्य हुआ कि क्षत्रिय के अलावा इस प्रकार की पीड़ा कोई सह नहीं सकता। यह विचार आते ही गुरु का रौद्र रूप प्रकट हुआ और उन्होंने उसे शाप दे दिया कि युद्ध भूमि में आवश्यकता पड़ने पर उनके द्वारा सिखाए शस्त्रास्त्रों के प्रयोग की विधि उसे भूल जाएगी।

     द्वापर की ये दो घटनाएँ भगवान परशुराम से जुड़ी हैं। इसके अतिरिक्त श्रीविद्या की साधनागत परम्परा में उनके दर्शन होते हैं। पिछले अंक में इसका उल्लेख भी किया गया था कि इन्होंने ही श्रीविद्या की साधना का प्रवर्तन किया था। कुछ स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि इस विद्या की साधना परम्परा का प्रवर्तन महर्षि अत्रि के पुत्र चन्द्रमा और महर्षि दुर्वासा ने किया है। जो भी हो, इसमें सन्देह नहीं कि भगवान परशुराम श्रीविद्या के उपासक हैं और इस परम्परा के साधकों को आज भी आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन देते हैं। इनके द्वारा विरचित परशुराम कल्पसूत्र इस परम्परा का शीर्षस्थ ग्रंथ है।

     इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में इस ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषयों के साथ इनसे सम्बन्धित अन्य ग्रंथों पर चर्चा की जाएगी।

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8 टिप्‍पणियां:

  1. भगवान परशुराम अमर हैं, जैसे हमारे अन्दर की raw leadership अमर है।
    उसे इफेक्टिव बनाने के लिये कुछ और तत्व मिलाने जरूरी हैं। अन्यथा कर्ण को श्राप या भीष्म से अनिर्णित युद्ध की उपयोगिता समझ नहीं आती।

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  2. परशुराम वैदिक युग और ब्राह्मण युग के संधि पुरूष हैं । एक ऎसा पुरूष जो ब्रह्मतेज और क्षात्रतेज के संयोग से अवतरित हुआ । वह ब्राह्मणत्व पर तो गर्व करता है, किन्तु कर्म में सदा क्षत्रिय रहता है । क्षत्रियों के भुजबल को ब्रह्मतेज से कुंठित कर देने वाले परशुराम भले ही सहनशील हिन्दुओं के सर्वमान्य आदर्श न रहे हों, परन्तु परशुराम का लोहा कभी भी ठंडा नहीं पड़ा । एक ब्राह्मण को अन्तत: योद्धा होना चाहिए या उदासीन वानप्रस्थ, यह प्रश्न प्रथम और अन्तिम बार परशुराम ने ही खड़ा किया । 21 बार क्षत्रियों का वध करने वाले परशुराम ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था । यह किसी भी ब्राह्मण ऋषि के जीवन में घटित होने वाला अकेला प्रसंग है। इनके बारे में जानकारी को अगले पोस्ट में विस्तृत रूप में चर्चा करें ताकि उनके बारे में हम कुछ और रोचक तथ्यों से अवगत हो सकें । इस सूचनापरक पोस्ट के लिए आपको मेरी और से हार्दिक शुभकामनाएं । आपका मेरे पोस्ट " डॉ विद्यानिवास मिश्र" पर इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  3. भगवान परशुराम के जीवन से जुडी घटनाओं का वर्णन उनके चारित्रिक पहलू को उजागर करता है.. अद्भुत इनका व्यक्तित्व.. और बहुत ही रोचक है यह श्रृंखला!!

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  4. जो व्यक्ति जातिगत आधार पर शिक्षा दे,वह चाहे जितना विद्वान हो,गुरू नहीं कहला सकता। ऐसे व्यक्ति से झूठ बोलकर भी शिक्षा ग्रहण करना अनुचित नहीं है। वह तो शिष्य की भलमनसाहत है कि वह ऐसे व्यक्ति का शाप भी अहोभाव से स्वीकार कर लेता है। ऐसे व्यक्ति को भगवान कहने से भगवत्ता की परिभाषा दूषित होती है।

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  5. आपका मेरे पोस्ट " डॉ विद्यानिवास मिश्र" पर इंतजार है । आशा है आप अवश्य आने की कोशिश करेंगे । धन्यवाद ।

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  6. बहुत सुंदर अगली कड़ी के इंतजार में ,....
    मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार है

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