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मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

भगवान परशुराम-7


भगवान परशुराम-7
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में भगवान परशुराम के शिष्य आचार्य सुमेधा (हरितायन) द्वारा विरचित त्रिपुरारहस्यम् पर चर्चा की गई थी। इस अंक में स्वयं भगवान परशुराम द्वारा विरचित श्रीपरशुरामकल्पसूत्रम् की विषय-वस्तु पर चर्चा की जाएगी।
कहा जाता है कि श्रीपरशुरामकल्पसूत्र में कुल छः हजार सूत्र थे और यह पचास खण्डों में विभक्त था। यह दत्तसंहिता का संक्षिप्त रूप माना जाता है। लेकिन यह तर्कसंगत नहीं लगता। क्योंकि वैदिक संहिताओं से सम्बन्धित कल्पसूत्र उनके संक्षिप्त रूप नहीं हैं। उसी प्रकार इस ग्रंथ को दत्तसंहिता का संक्षिप्त रूप कहना उचित नहीं है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार श्रीविद्या उपासना का आधारभूत ग्रंथ दत्तसंहिता में 18000 श्लोक हैं। यह ग्रंथ उपलब्ध है अथवा नहीं कहना कठिन है। वैसे श्रीविद्या का प्रवर्तन महर्षि अत्रि परिवार से उद्भूत माना जाता है। कहा जाता है कि उनके पुत्र महर्षि दुर्वासा और चन्द्रमा ने इस महान विद्या का प्रवर्तन किया। दत्तात्रेय भी उन्हीं की संतान हैं और कुछ लोगों का मानना है कि भगवान शिव के बाद भगवान दत्तात्रेय का नाम आता है। जबकि कुछ का मानना है कि भगवान परशुराम इसके प्रवर्तक हैं। इस ऐतिहासिक विवाद पर कभी अलग से चर्चा उचित होगी। आज की चर्चा श्रीपरशुरामकल्पसूत्र तक सीमित रखी जा रही है।
वर्तमान में उपलब्ध यह ग्रंथ दो भागों में मिलता है। प्रथम भाग में दस खण्ड और दूसरे में आठ हैं। कुल 460 सूत्र उपलब्ध हैं। आचार्य रामेश्वर ने, जो भास्करराय के प्रशिष्य थे और जिनका दीक्षानाम अपराजितानन्दनाथ था, सौभाग्योदय नामक टीका लिखी है। यह टीका केवल प्रथम खण्ड पर ही मिलती है। इसके दूसरे टीकाकार श्री साकर लाल शास्त्री हैं। ये बड़ोदरा के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक थे और सवाजी राव गायकवाड़ के अनुरोध पर उन्होंने इस ग्रंथ पर टीका लिखी। इन्होंने अपनी टीका को दो खण्डों में विभक्त किया है। प्रथम भाग में दस खण्डों पर ही टीका लिखी है और आठ खण्डों को परिशिष्ट के अन्तर्गत दूसरे भाग में लिया है। बांग्ला लिपि में डॉ. परमहंस मिश्र द्वारा विरचित नीरक्षीरविवेकभाषाभाष्यसंवलित टीका का उल्लेख श्री हेमेन्द्रनाथ चक्रबर्ती ने किया है। यह टीका भी दस खण्डों पर ही है। आधुनिक काल में पं. गोपीनाथ कविराज द्वारा भी इस ग्रंथ का संमपादन किया गया है। इस आधार पर कुछ लोगों का मानना है कि मूल ग्रंथ सम्भवतः दस खण्डों में ही लिखा गया होगा। इस विवाद से हटकर अब इस ग्रंथ के उपलब्ध रूप पर चर्चा करते हैं।
प्रथम भाग के दस खण्डों में विषय की दृष्टि से दो क्रम देखने को मिलते हैं- सर्वसाधारणक्रम और ललितार्चनक्रम। सर्वसाधारणक्रम में दीक्षाविधि, होमविधि और सर्वसाधारणक्रम हैं। ललितार्चनक्रम श्रीगणनायकपद्धति, श्रीक्रम, ललिताक्रम, ललितानवावरण पूजा, श्यामाक्रम, वाराहीक्रम और पराक्रम हैं।
इन दस खण्डों को देखने पर लगता है कि इस उपासना पद्धति के सैद्धांतिक पक्ष की दृष्टि से यह ग्रंथ यहाँ पूर्ण हो जाता है। क्योंकि दसवेँ खण्ड में वर्णित सर्वसाधारणक्रम उपसंहारात्मक ही लगता है।
दूसरे भाग के आठ खण्डों में विभिन्न यंत्रों, मंत्रों आदि का निरूपण किया गया है। जैसे- ग्यारहवें खण्ड में विभिन्न यंत्रों का विधान किया गया है, बारहवें में मंत्र विधान है, तेरहवें में प्रस्तारक्रम, चौदहवें में नष्टोदिष्ट का कथन, पन्द्रहवें में कृतनष्टनिरूपण, सोलहवें में योनिलिंग यंत्र और मंत्र के रचना का विधान, सत्रहवें में अंगविज्ञान (विद्या) तथा अन्तिम खण्ड में मंत्र महत्त्व, ललितामंत्र, हल्लेखामंत्र आदि का निरूपण किया गया है।
यह ग्रंथ इतना गूढ़ है कि जनसामान्य की समझ से परे है। जबतक इस परम्परा के किसी सक्षम गुरु के सान्निध्य में साधना करने के साथ-साथ इसका अध्यवसाय न किया जाय, इसके गूढ़ रहस्य को नहीं समझा जा सकता। मैं इसे पढ़कर इतना ही कह सकता हूँ कि भगवान परशुराम की कठिनतम तपश्चर्या की अनुभूतियों का नवनीत है यह ग्रंथ। आज हम उन्हें जिस रूप में जानते हैं, वह भले ही विश्वास से परे हो। लेकिन इतनी बात तो है कि एक उपासक अपनी उपासना की उस पराकाष्ठा पर पहुँचा, जहाँ वह स्वयं उपास्य हो गया। श्रीतत्तवनिधि में उनका ध्यान निम्नलिखित रूप में दिया है-
परशूज्ज्वलहस्ताब्जो जटामण्डलमण्डितः।
ददातु चिरञ्जीवित्वं प्रसन्नात्मा भृगूद्वहः।।        
      इस शृंखला को यहीं विराम दिया जा रहा है। आभार।
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

भगवान परशुराम-6


भगवान परशुराम-6


आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में द्वापर युग मे भगवान परशुराम के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाओं का उल्लेख किया गया था। इस अंक में उनके शिष्य सुमेधा या हरितायन द्वारा विरचित त्रिपुरारहस्यम् पर चर्चा की जाएगी और अगले अंक में स्वयं भगवान परशुराम द्वारा विरचित श्रीपरशुरामकल्पसूत्रम् के विषय-वस्तु पर।
  
त्रिपुरारहस्य एक तंत्रशास्त्र का एक सर्वोत्कृष्ट वृहद् ग्रंथ है। अतएव इस ग्रंथ पर चर्चा करने के पहले तंत्रशास्त्र का एक छोटा सा परिचय आवश्यक लग रहा है। क्योंकि इस शास्त्र और इसके साधकों के विषय में सामान्य जनमानस में अनेक भ्रांतियाँ देखने को मिलती हैं। वास्तव में शब्द, ध्वनि और संकल्प द्वारा अपनी भावशक्ति से संसार की हर वस्तु पर नियंत्रण पाने की क्रिया की अधिष्ठात्री देवी को तंत्र कहा गया है। इसमें विभिन्न मातृका, वर्ण, शब्द, बिन्दु नाद आदि से युक्त मंत्रों, मंत्ररहित आभिचारिक क्रियाएँ, रहस्य-युक्त यंत्रों आदि का प्रयोग किया जाता है।  

तंत्र मानता है कि यह अखिल ब्रह्माण्ड आद्या शक्ति की अभिव्यक्ति है और उसी से अनुप्राणित है। तंत्र के अनुसार हमारी अधिकांश समस्याएँ इसलिए नहीं हैं कि हम ईश्वर को नहीं जानते, बल्कि इसलिए हैं कि हम जगत को नहीं जानते। भौतिक उपलब्धि को तंत्र आध्यात्मिक उन्नति में बाधक नहीं मानता। यह सभी भौतिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विषयों को समान महत्त्व देता है। इसकी साधना की दीक्षा तीन स्तरों पर समय के अनुकूल होती है। पहला कदम होता है मंत्र-दीक्षा, दूसरा यंत्र-दीक्षा और तीसरा चक्र-पूजा। तन्त्र तीन मुख्य मतों में विभक्त है- समयाचार, कौलाचार और मिश्राचार

समयाचार की साधना में किसी प्रकार का कर्मकाण्ड या वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। यह साधना आंतरिक ध्यान की प्रक्रियाओं पर आश्रित है और इसका अभ्यास सहस्रार चक्र पर किया जाता है, अर्थात् मानसिक साधना। इसमें शरीर को यंत्र के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें शरीर की सृष्टि क्रम के अनुसार उपासना की जाती है। इस साधना का एकमात्र उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है।

कौलाचार दो मार्गों में विभक्त है- दक्षिण मार्ग और वाम मार्ग। दक्षिण मार्ग के अनुयायी शुद्ध चीजों का उपयोग करते हैं और बाह्य उपासना पद्धति का आश्रय लेते हैं। सात्विक आचार-विचार और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इनका उद्धेश्य विभिन्न सिद्धियाँ उपलब्ध करना होता है। इस मार्ग के साधक किसी भी प्रकार सात्विकता को छोड़ने की कल्पना नहीं कर सकते। ये तन्त्र में निर्दिष्ट आवश्यकता के अनुसार विभिन्न यंत्रों को विभिन्न वस्तुओं से किसी चीज पर बनाकर प्रयोग  करते हैं।

वाममार्गी कौलाचारी साधक सात्विक और असात्विक का भेद नहीं करते। इनके लिए सृष्टि की कोई भी वस्तु अपवित्र नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि दिव्य है। इस मार्ग की विभिन्न साधनाओं में मांस, मद्य, स्त्री या पुरुष संगम आदि अनेक ऐसी चीजों का प्रयोग विहित है, जो अन्य साधनाओं में निकृष्ट और त्याज्य मानी जाती हैं। इनका भी उद्देश्य विभिन्न सिद्धियाँ उपलब्ध करना है। यह मार्ग कभी भी साधक को पथ-भ्रष्ट होने की अनुमति नहीं देता, भले ही उक्त चीजों का उपयोग होता हो। इसलिए यह साधना सबसे कठिन है। क्योंकि इसमें ऐसी चीजों का प्रयोग होता है जो साधक को सिद्धि पाने से अधिक उसे पथभ्रष्ट होने में सहायक हैं। इसमें भी उपासना की बाह्य पद्धति का सहारा लिया जाता है और यंत्र दक्षिण मार्ग की ही भाँति बनाकर प्रयोग किए जाते हैं।

मिश्राचार मत समयाचार और कौलाचार के दक्षिण मार्ग का समन्वय है।

अब त्रिपुरारहस्य की बात करते हैं।  

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, त्रिपुरारहस्य भगवान परशुराम के शिष्य सुमेधा द्वारा लिखा गया ग्रंथ हैं। इस ग्रंथ क हरितायन संहिता भी कहते हैं, क्योंकि आचार्य सुमेधा को हरितायन नाम से भी जाना जाता है। त्रिपुरारहस्य के तीन खण्ड हैं - माहातम्य खण्ड, ज्ञान खण्ड, और चर्चा खण्ड। माहातम्य खण्ड में भगवान परशुराम और उनके शिष्य आचार्य सुमेधा के संवाद का संकलन है। ज्ञानखण्ड में भगवान दत्तात्रेय और भगवान परशुराम के संवाद को संकलित किया गया है। चर्चा खण्ड इतिहास का विषय बनकर रह गया है। यह ग्रंथ फिलहाल उपलब्ध नहीं है। इस ग्रंथ के प्रारम्भ में भगवान परशुराम का उल्लेख किया गया है। जिस अवसर का वर्णन मिलता है, उस समय भगवान परशुराम का निवास मलयगिरि के तपोवन में था। एक दिन आचार्य सुमेधा उनके पास गए और आदेश पाकर श्रद्धापूर्वक प्रश्न किए कि सांसारिक कामजन्य पीड़ा से पीड़ित मानवों के लिए पर-कल्याणकारी मार्ग क्या है? हे विपेन्द्र, यदि मुझे इसके योग्य समझें तो अवश्य बताएँ। क्योंकि करुणामूर्ति गुरु अपने शिष्य को गोपनीय वस्तु का भी ज्ञान करा देते हैं। हे भार्गव, बहुत पहले मैंने आपसे यह प्रश्न किया था, तो आपने कहा था कि कालक्रम से उचित अवसर आने पर इसका रहस्य आप मुझे बताएँगें, तब से आज सोलह वर्ष बीत चुके हैं। लेकिन इस प्रश्न ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा

सुमेधा का प्रश्न सुनकर भगवान परशुराम थोड़ी देर तक मौन रहे, फिर अपने गुरु भगवान दत्तात्रेय द्वारा कभी पहले कही हुई बात का स्मरण करते हुए आचार्य सुमेधा को उपदेश दिया। गुरु-शिष्य के इस संवाद का संकलही त्रिपुरारहस्य-माहातम्य खण्ड हैं। इसमें कुल अस्सी अध्याय हैं और कुल श्लोकों की संख्या 6687 है।

     त्रिपुरारहस्य ' नम:' से प्रारम्भ होता है और 'त्रिपुरैव ह्रीं' पर अंत होता है। इसका संक्षिप्त रूप ब्रह्माण्डपुराण के उत्तराखण्ड में 'श्रीललितोपाख्यानम्' के नाम से उपलब्ध है। लक्ष्मी तंत्र में त्रिपुरारहस्य संक्षेप में पाया जाता है। इन वर्णनों में थोड़ा-बहुत अन्तर देखने को मिलता है। हो सकता है यह अन्तर सम्प्रदाय-भेद के कारण आए हों इसी प्रकार के अन्तर श्रीविद्या की साधना के विभिन्न सम्प्रदायों में भी देखने को मिलते हैं। इन्द्र, चन्द्र, कुबेर, मंत्र आदि द्वारा उपासिता श्रीविद्या की उपासना पद्धति में गुरु-शिष्य या सम्प्रदाय मतभेद से अनेकता के दर्शन होते हैं।

     त्रिपुरारहस्य का ज्ञानखण्ड भी साधना की दृष्टि से एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है। भगवान दत्रातेय ने दीक्षा देकर भगवान परशुराम से कहा कि जाकर बारह वर्ष तक इसका अभ्यास करो और इसके बाद फिर मेरे पास आना। बारह वर्ष बाद जब भगवान परशुराम वापस अपने गुरु के पास आए तो उनके मन में अनेक प्रश्न थे। उन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उन्होंने अपने गुरु से श्रद्धानत होकर निवेदन किया। भगवान दत्तात्रेय ने उनके प्रश्नों के उत्तर बड़े सुन्दर ढंग से कथाओं के उदाहरण के साथ दि हैं। इस ग्रंथ में कुल बाइस अध्याय हैं और श्लोकों की संख्या 2263 है। केवल परिचय के रूप में इस ग्रंथ का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है। कभी अवसर मिलने पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
     
इस अंक में बस इतना ही।

               

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

भगवान परशुराम – 5


भगवान परशुराम 5
आचार्य परशुराम राय


     पिछले अंक में भगवान परशुराम का भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम के साथ विवाद और उसके परिणाम की चर्चा की गई थी। इसके अतिरिक्त उनके अमर होने की भी बात कही गई थी। इसी कारण द्वापर में भी उनके जीवन की दो घटनाएं देखने में आती है जिनकी चर्चा यहाँ की जाएगी।

     भगवान परशुराम ने क्षत्रियों को शस्त्र शिक्षा न देने की शपथ ली थी। लेकिन माँ गंगा के अनुरोध पर उनकी सन्तान मानकर पितामह भीष्म (देवव्रत) को शस्त्रास्त्रों की शिक्षा दी थी। उन दिनों पितृसत्तात्मक सत्ता होने के बावजूद मातृसत्तात्मक सोच थी। इसीलिए कृष्ण का नाम नन्दनन्दन से अधिक देवकीनन्दन नाम प्रसिद्ध है। लक्ष्मण के लिये सौमित्र शब्द का भी अधिक प्रयोग हुआ है। सम्भवत: इन्हीं कारणों से भगवान परशुराम ने देवव्रत को शिक्षा दी।

     देवव्रत ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि वे विवाह नहीं करेंगे। माँ सत्यवती से महाराज शान्तनु को दो पुत्र हुए - चित्रांगद और विचित्रवीर्य। चित्रांगद गंधर्वो के साथ युद्ध में मारे गए। अतएव भीष्म पितामह ने अपने भाई विचित्रवीर्य का राजतिलक करवाया और उनके विवाह के लिए काशिराज की तीनों कन्याओं - अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को स्वयंवर से वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को परास्त कर बलात् अपहृत कर लाए। उनमें से अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से हुआ। अम्बा ने उनसे कहा कि वह तन-मन से महाराज शाल्व से प्रेम करती है। अतएव उसे उन्होंने छोड़ दिया। लेकिन शाल्व ने अपहरण किए जाने के कारण उसे (अम्बा को) स्वीकार नहीं किया। तब वह वापस भीष्म पितामह के पास आकर बोली कि आपने मेरा अपहरण किया है, अतएव नियमानुसार आपको ही मुझसे विवाह करना पड़ेगा। भीष्म ने अपनी की हुई प्रतिज्ञा की बात बताकर विवाह करने से अस्वीकार कर दिया।

     निराश अम्बा ने भीष्म पितामह के गुरु भगवान परशुराम के पास जाकर उनसे पूरी घटना विस्तार से बतायी। भगवान परशुराम ने भीष्म के साथ उसका विवाह कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने भीष्म को बुलाया। पर, काफी समझाने-बुझाने के बाद भी भीष्म तैयार नहीं हुए। अन्त में भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि मुझसे युद्ध करो। कहा जाता है कि दोनों में घमासान युद्ध हुआ, जो देवताओं के हस्तक्षेप से बिना किसी परिणाम के समाप्त हुआ। अम्बा ने भीष्म को शाप दे दिया कि एक नपुंसक उनकी मृत्यु का कारण बनेगा और इसके बाद उसने आत्महत्या कर ली। कहा जाता है कि उसका शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म हुआ, जिसके कारण भीष्म युद्ध में धाराशयी हो गए।

     द्वापर की दूसरी घटना में भगवान परशुराम का उल्लेख मिलता है कि कुंती पुत्र कर्ण उनके पास शस्त्र विद्या सीखने गया था। उसके वंश आदि का परिचय पाने के बाद वे उसे शास्त्रस्त्र की शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए। विद्याभ्यास चलता रहा। एक दिन थकान के कारण भगवान परशुराम आराम कर रहे थे। कर्ण उनकी सेवा कर रहा था। इस बीच गुरु को नींद आ गयी और कोई कीड़ा कर्ण के पैरों के बीच घुस गया। उसके काटने से उसे काफी पीड़ा होने लगी और खून भी बहने लगा। गुरु की नींद खराब न हो, इसलिए वह बिना हिले पीड़ा सहता रहा। खून के स्पर्श से जब गुरु की नींद टूटी तो उन्हें काफी सन्ताप हुआ और उसकी गुरुभक्ति पर प्रसन्नता भी। लेकिन एक बात पर उन्हें आश्चर्य हुआ कि क्षत्रिय के अलावा इस प्रकार की पीड़ा कोई सह नहीं सकता। यह विचार आते ही गुरु का रौद्र रूप प्रकट हुआ और उन्होंने उसे शाप दे दिया कि युद्ध भूमि में आवश्यकता पड़ने पर उनके द्वारा सिखाए शस्त्रास्त्रों के प्रयोग की विधि उसे भूल जाएगी।

     द्वापर की ये दो घटनाएँ भगवान परशुराम से जुड़ी हैं। इसके अतिरिक्त श्रीविद्या की साधनागत परम्परा में उनके दर्शन होते हैं। पिछले अंक में इसका उल्लेख भी किया गया था कि इन्होंने ही श्रीविद्या की साधना का प्रवर्तन किया था। कुछ स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि इस विद्या की साधना परम्परा का प्रवर्तन महर्षि अत्रि के पुत्र चन्द्रमा और महर्षि दुर्वासा ने किया है। जो भी हो, इसमें सन्देह नहीं कि भगवान परशुराम श्रीविद्या के उपासक हैं और इस परम्परा के साधकों को आज भी आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन देते हैं। इनके द्वारा विरचित परशुराम कल्पसूत्र इस परम्परा का शीर्षस्थ ग्रंथ है।

     इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में इस ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषयों के साथ इनसे सम्बन्धित अन्य ग्रंथों पर चर्चा की जाएगी।

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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

अंक-4 भगवान परशुराम


अंक-4
   भगवान परशुराम

आचार्य परशुराम राय

भगवान परशुराम के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है भगवान राम से भेंट। महर्षि वाल्मीकि कृत आर्षरामायण (वाल्कमीकि कृत रामायण) के अनुसार महाराज दशरथ अपने चारो पुत्रों-राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का विवाह करने के बाद जब बारात लेकर जनकपुर से अयोध्या वापस लौट रहे थे, रास्ते में उनका सामना भगवान परशुराम से हुआ था। उस समय के उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं-
  ददर्श   भीमसंकाशं   जटामण्डलधारिणम्। भार्गवं जामदग्न्येयं राजा राजविमर्दनम्।।
  कैलासमिव  दुर्धर्षं  कालाग्निमिव दुःसहम्। ज्वलन्तमिव तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनैः।।
  स्कन्धे चासज्ज्य परशुं धुर्विद्युद्गणोपमम्। प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपरघ्नं यथा शिवम्।।
     अर्थात् (उस समय राजा दशरथ ने) जटामण्डलवाले और क्षत्रिय राजाओं का मान-मर्दन करनेवाले भयंकर भृगुकुलनन्दन जमदग्निकुमार को देखा। वे कैलास के समान दुर्जय और कालाग्नि की तरह दुःसह प्रतीत हो रहे थे। अपने तेजोमण्डल से इतने प्रदीप्त हो रहे थे कि सामान्य लोगों के लिए उनकी ओर देखना भी कठिन था। उनके कंधे पर परशु से सुसज्जित, हाथ में विद्युद्गण के तुल्य धनुष धारण किए हुए और भयंकर बाण लिए हुए त्रिपुर-विनाशक साक्षात् शिव के समान लग रहे थे।  

     महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि भगवान परशुराम को देखकर जपहोम-परायण महर्षि वशिष्ठ आदि प्रमुख विप्र एकत्र होकर परस्पर विचार करने लगे कि ये पितृ-वध के क्रोध के वशीभूत होकर कहीं फिर क्षत्रिय संहार न कर डालें, वैसे अब प्रतिकार की भावना से ये मुक्त चुके हैं, क्षत्रियों का संहार अब इनका अभीष्ट नहीं होना चाहिए, फिर भी कुछ कहना कठिन है आदि-आदि। फिर उनलोगों ने उन्हें उचित अर्घ्यदान देकर उनसे प्रेम पूर्वक बातचीत की।

ऋषियों द्वारा प्रदत्त अर्घ्य को भगवान परशुराम स्वीकरकर राम से बोले कि हे दशरथनन्दन राम, मैंने आपके अद्भुत पराक्रम को सुन रखा है, आपके द्वारा भगवान शिव की धनुष तोड़ने का समाचार भी सुन चुका हूँ। मेरी इस वैष्णव धनुष पर बाण चढ़ाइए, ताकि आपके बल का अनुमानकर आपसे आवश्यक द्वन्द्व युद्ध कर सकूँ। उनकी इस तरह की बातें सुनकर महाराज दशरथ ने दोनों हाथ जोड़कर अनुनय-विनय करते हुए उनसे अनुरोध किया कि आप भृगुकुल में उत्पन्न महान तपस्वी और ज्ञानी हैं, क्षत्रियों पर आपका रोष अब शान्त हो चुका है, आपने इन्द्र के सामने प्रतिज्ञा करके शस्त्रों का परित्याग कर दिया है। अतएव मेरे बालक पुत्रों को अभयदान देने की कृपा करें। यदि आपका क्रोध केवल राम पर है, तो उनके मारे जाने पर भी हम सभी अपने प्राण त्याग देंगे।

भगवान परशुराम ने जिस धनुष को चढ़ाने की बात की है, उसका विवरण वाल्मीकि रामायण में मिलता है कि विश्वकर्मा ने दो श्रेष्ठ और दिव्य धनुषों का निर्माण किया था, जिनमें से एक को देवताओं ने भगवान शिव को त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिए दिया था और दूसरा धनुष भगवान विष्णु को दिया था। एक बार देवताओं ने ब्रह्मा जी से पूछा कि भगवान विष्णु और शिव दोनों में कौन अधिक शक्तिशाली है। अतएव ब्रह्मा जी को इन दोनों देवताओं में विरोध उत्पन्न करना पड़ा। परिणाम स्वरूप दोनों में भयंकर युद्ध हुआ और भगवान  विष्णु के हुंकार से भगवान शिव स्तंभित हो गए और धनुष शिथिल पड़ गया। अंत में ऋषियों और देवताओं के द्वारा शान्ति याचना के बाद दोनों शान्त हुए। क्रोधाभिभूत भगवान शिव ने अपनी धनुष विदेह देश के राजर्षि देवरात को दे दिया और भगवान विष्णु ने अपनी धनुष भृगुवंशी महर्षि ऋचीक को दे दिया। जो धनुष भगवान राम ने तोड़ी थी, वही शिव की थी और दूसरी भगवान परशुराम के पास, जिसे वे चढ़ाने के लिए राम को ललकारे।

भगवान परशुराम की ललकार को सुनने के बाद भगवान राम ने उनसे कहा कि हे भृगुनन्दन, मैंने भी आपके विषय में बहुत कुछ सुन रखा है- कैसे आपने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए क्षत्रियों का संहार किया और हमलोग भी उसका अनुमोदन करते हैं। मैं क्षत्रिय हूँ और आप ब्राह्मण हैं। इसलिए नम्रतावश मैं कुछ नहीं बोल रहा हूँ। फिर भी आप पराक्रमहीन और असमर्थ मानकर मेरा बार-बार तिरस्कार कर रहे हैं। यह कहकर उन्होंने परशुराम जी के हाथ से धनुष और बाण लेकर उसपर बाण चढ़ा दिया, और कुपित होकर वे बोले कि हे भृगुन्दन राम, ब्राह्मण होने के नाते आप मेरे पूज्य हैं और महर्षि विश्वामित्र के सम्बन्धी भी हैं, अतएव इस प्राण घातक बाण से मैं आपके ऊपर प्रहार तो नहीं कर सकता। तो अब क्यों न शीघ्रता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जानेवाली आपकी शक्ति अथवा तपोबल से प्राप्त आपके पुण्यलोकों इस बाण से नष्ट कर दूँ। क्योंकि शत्रुनगरी को ध्वस्त करनेवाला भगवान विष्णु का बाण कभी भी निष्फल नहीं हो सकता। महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि धनुष-बाण भगवान राम के हाथ में जाते ही भगवान परशुराम का वैष्णव तेज उनके शरीर से निकलकर राम के पास चला गया और परशुराम जी निस्तेज और बलहीन हो गए।

इसके बाद भगवान परशुराम ने उनसे कहा- हे रघुन्दन, सारी पृथ्वी दान करने के बाद मेरे गुरु कश्यप जी ने कहा था कि मुझे उनके राज्य से निकल जाना चाहिए। मैंनें रात में पृथ्वी पर न रहने की उनके सामने प्रतिज्ञा की थी और तभी से मैं रात में पृथ्वी पर निवास नहीं करता। इसलिए आप मेरी मन की गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की शक्ति को छोड़कर मेरे तपोबल से प्राप्त सभी पुण्यलोकों अविलम्ब नष्ट कर दें। हे रघुकुलनन्दन, मैं पूरी तरह अब आश्वस्त हो चुका हूँ कि आप मधु नामक राक्षस का बध करनेवाले साक्षात् भगवान विष्णु हैं।

अन्त में भगवान राम ने भगवान परशुराम के अर्जित सभी पुण्यलोकों को नष्ट कर  दिया और उनकी पूजा की। इसके बाद परशुराम जी भगवान राम की परिक्रमा करके तुरन्त महेन्द्र पर्वत पर चले गए।

इस घटना ने भगवान परशुराम की उपार्जित सभी आध्यात्मिक उपलब्धियों को छीन लिया। परन्तु उन्हें इसका जरा भी दुख नहीं हुआ। अत्यन्त शान्तचित्त होकर पुनः अपने तपोबल से वे उन्हें अर्जित किए और आज उनकी गणना सात अमर लोगों में होती है-
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमान्श्च विभीषणः।
कृपः  परशुरामश्च  सप्तैते    चिरजीविनः।।
अर्थात् अश्वत्थामा, महाराज बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सात चिरंजीवी (अमर) हैं।

रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी ने इस घटना का वर्णन धनुष के टूटने के तुरन्त बाद किया है और इसमें लम्बा संवाद लक्ष्मण के साथ दिखाया गया है। हनुमन्नाटकम् में परशुराम-राम संवाद का पैनापन रामचरितमानस में देखने को मिलता है। परशुराम-लक्ष्मण संवाद पीयूषवर्षी जयदेव की परिकल्पना है, जो उनके प्रसन्नराघवम् नाटक में देखने को मिलती है। लेकिन इस नाटक में इस संवाद का उतना विशद रूप देखने को नहीं मिलता, जितना रामचरितमानस में। तुलसीदास जी ने प्रसन्नराघवम् के कुछ श्लोकों का बहुत सुन्दर अनुवाद किया है। इसका उल्लेख इसी ब्लॉग पर प्रकाशित एक पोस्ट पर आ चुका है। इसलिए उनकी पुनरावृत्ति न करते हुए इस अंक को यहीं विराम दिया जा रहा है।

अगले अंक में भगवान परशुराम के जीवन के कुछ और घटनाओं के साथ उनकी आध्यात्मिक देन पर चर्चा की जाएगी। इस अंक में बस इतना ही।
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मंगलवार, 22 नवंबर 2011

भगवान परशुराम-3


भगवान परशुराम-3

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में हमने देखा कि हैहयवंशी राजा सहस्रबाहु अर्जुन का बध करने के कारण भगवान परशुराम पिता की आज्ञा के अनुसार पापमुक्त होने के लिए एक वर्ष तक तीर्थ-यात्रा करने के बाद पुनः अपने पिता के आश्रम वापस लौट आए।

इसके बाद की घटना है - कुछ दिनों बाद एक दिन पति के हवन-पूजन के लिए माता रेणुका कलश लेकर गंगा तट पर जल लेने गयीं। वहाँ गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जल विहार करते देखने में वे इतना तल्लीन हो गयीं कि उन्हें समय का ध्यान ही न रहा और कहा जाता है कि वे चित्ररथ पर थोड़ी देर के लिए तो आसक्त हो गयी थीं। जब जल लेकर वे आश्रम पहुँची तो हवन-पूजन का समय बीत चुका था। माता रेणुका के चेहरे पर व्यग्रता के भाव देखकर महर्षि जमदग्नि ने उसका कारण पूछा। समुचित उत्तर न पाकर महर्षि ने ध्यान में जाकर सबकुछ जान लिया। जब उन्हें पत्नी के मानसिक व्यभिचार का पता चला तो वे बड़े ही क्रोधित हुए और अपने चार उपस्थित पुत्रों को एक-एक कर माँ का बध करने के लिए कहा। सभी ने मना कर दिया। भगवान परशुराम उस समय आश्रम में नहीं थे। जब वे आए तो महर्षि ने उन्हें माँ और चारो भाइयों का बध करने को कहा। भगवान परशुराम ने वैसा ही किया।

इससे महर्षि जमदानि अत्यन्त प्रसन्न हुए और परशुराम से वरदान माँगने को कहा। भगवान परशुराम ने वरदान स्वरूप अपनी माँ और चारो भाइयों का जीवन और जीवित होने पर और उन्हें इस घटना की विस्मृति का वरदान माँग लिया। महर्षि जमदग्नि ने सभी को जीवित कर दिया। साथ ही उनके साथ क्या हुआ, इसका उन्हें ज्ञान भी नहीं रहा। कहा जाता है कि भगवान परशुराम को अपने पिता के तपोबल पर इतना विश्वास था। अतएव पिता की आज्ञा का पालन करने में उन्होंने थोड़ा भी विलम्ब नहीं किया और अन्त में वरदान माँगकर पुनः उन्हें जीवन-दान भी दिलवा दिया।

उक्त घटना के बाद उनके जीवन में एक ऐसी दारुण घटना घटी जिसने उनके पराक्रम को नयी दिशा दे दी और उन्हें क्षत्रियों का संहारक कहा जाने लगा। पुराणों में मिलता है कि सहस्रबाहु अर्जुन के पुत्र अपने पिता के वध का बदला लेने के अवसर की तलाश में लगे थे। एक दिन भगवान परशुराम और उनके भाई आश्रम में नहीं थे। तभी वे लोग आश्रम में घुस गए और माता रेणुका के तमाम विरोध के बाद भी उन्होंने तपोधन महर्षि जमदग्नि का यज्ञशाला में ही सिर काट डाला और उसे लेकर पलायित हो गए। दूर से माँ की करुण ध्वनि भगवान परशुराम के कानों में पड़ी। वे तुरन्त आश्रम की ओर चल पड़े। पिता का जमीन पर पड़ा सिरविहीन शरीर और आश्रम की दुर्दशा देखकर उन्हें अपार दुख हुआ, उनकी क्रोधाग्नि अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी। वे बिना किसी प्रकार का विलम्ब किए उनका पीछा करते हुए माहिष्मती नगर चल पड़े। वहीं उन्होंने सहस्रबाहु के सभी पुत्रों का निर्ममता पूर्वक वध किया तथा पिता का सिर लेकर आश्रम पहुँचे। उनके सिर को धड़ से जोड़कर यज्ञों से सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान का यजन कर उनका अन्तिम संस्कार किया। महर्षि जमदग्नि को स्मृतिरूप संकल्पमय शरीर प्राप्त हुआ और भगवान परशुराम से सम्मानित होकर सप्तर्षिमण्डल में सातवें ऋषि का स्थान मिला।

इसके बाद दुर्जन और मद में चूर क्षत्रियों के विनाश का क्रम उन्होंने ऐसा चलाया कि हैहयवंश समेत अन्य क्षत्रिय राजाओं का विनाश करते रहे। कहा जाता है कि इक्कीस बार उन्होंने ऐसा किया और अंत में अश्वमेध यज्ञकर समस्त भूमि ब्राह्मणों को दान कर दी, जिसमें पूर्व दिशा होता को, दक्षिण ब्रह्मा को, पश्चिम दिशा अध्वर्यु को, उत्तर दिशा साम उद्गाताओं को, अग्निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजों को, मध्यभूमि महर्षि कश्यप को और आर्यावर्त उपद्रष्टा को दान कर दिया। अपने परशु से समुद्र पर प्रहार कर अपने लिए थोड़ी सी जमीन ली जिसे आज केरल के नाम से जाना जाता है।

इन घटनाओं ने पुनः उनके मन में उद्वेग पैदा कर दिया। वे मानसिक रूप से अशांत हो गए और वहीं महर्षि कश्यप से उसका निदान पूछा। महर्षि कश्यप ने उन्हें भगवान दत्तात्रेय की शरण में जाकर उनके निर्देशानुसार आचरण करने की सलाह दी। इसके बाद वे भगवान दत्तात्रेय से मिलने गंधमादन पर्वत की ओर चल पड़े। वहाँ भगवान दत्तात्रेय ने उन्हे दीक्षा दी और गिरनार पर्वत पर जाकर बारह वर्ष तक साधना करने के पश्चात पुनः आकर मिलने का आदेश दिया।

गुरु की आज्ञानसार बारह वर्ष के बाद पुनः भगवान परशुराम उनसे मिलने पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने गुरु से अनेक आध्यात्मिक प्रश्न पूछे जिससे उनका मन शंकारहित हो गया। भगवान परशुराम और भगवान दत्तात्रेय का यह संवाद हरितायन कृत त्रिपुरारहस्य के ज्ञानखंड में संग्रहीत है। समय मिला तो आगे इस पर चर्चा होगी। क्योंकि आध्यात्मिक रूप से यह संवाद बहुमूल्य है। कहा जाता है कि तंत्रशास्त्र की सर्वोच्च श्रीविद्या-साधना के प्रवर्तक भगवान परशुराम ही हैं। इसपर इनका लिखा परशुरामकल्पसूत्र अत्यन्त उच्चकोटि का ग्रंथ है।

भगवान परशुराम का जीवन वृत्त विभिन्न पुराणों में भरा पड़ा है। ब्ह्मवैवर्त पुराण की एक कथा के अनुसार भगवान गणेश से इनका युद्ध हुआ था। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ, जिसमें श्री गणेश जी का एक दाँत टूट गया। तब से वे एकदंत कहे जाने लगे। इसी प्रकार इनका युद्ध शिवनन्दन कार्तिकेय से भी हुआ था और भगवान परशुराम विजयी रहे। इस महान अवतार पर एक महाशोध ग्रंथ कनखल निवासी डॉ. शर्मा ने लिखा है जिसमें लगभग एक हजार पृष्ठ हैं। मैंने प्रयास किया, पर अब तक यह ग्रंथ मुझे मिल नहीं पाया है। अगले अंक मे इनके जीवन से सम्बन्धित कुछ अन्य विवरण दिए जाने का प्रयास किया जाएगा।

इस अंक में बस इतना ही।

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

भगवान परशुराम-2


भगवान परशुराम-2

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में भगवान परशुराम के विषय में सामान्य जानकारी दी गयी थी। इस अंक में उन घटनाओं का उल्लेख किया जाएगा, जिनसे उनके जग-विश्रुत चरित्र ने अपना स्वरूप धारण किया। कहा जाता है कि भगवान विष्णु स्वयं दुष्ट क्षत्रियों के विनाश के लिए परशुराम के रूप में अवतरित हुए थे। जहाँ कहीं भी कमजोर वर्ग का दबंग लोगों द्वारा दमन होता है, वहाँ परशुराम-चेतना सक्रिय होती है। इसका माध्यम चाहे कोई हो। पुराणेतिहास में प्राप्त तथ्यों के अनुसार इन्हें सर्वप्रथम युद्ध चन्द्रवंशीय राजा सहस्रार्जुन से करना पड़ा।

भागवत महापुराण के अनुसार हैहयवंश का राजा अर्जुन बड़ा ही प्रतापी राजा था। उसने भगवान दत्तात्रेय की कृपा से एक हजार भुजाएँ और सभी यौगिक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं। इसीलिए यह सहस्रबाहु अर्जुन के नाम से जाना जाता था। इसका दिव्यास्त्रों पर भी समान अधिकार था। इसमें इतना अकूत बल था कि एक बार इसने अपनी भुजाओं से नर्मदा नदी का प्रवाह रोक दिया था जिससे पास में चल रहे रावण का शिविर नर्मदा के जल में डूबने लगा। वह क्रोध में आकर रावण को बन्दी बनाकर अपनी राजधानी माहिष्मती लेकर चला गया। अन्त में महर्षि पुलस्त्य के कहने पर उसे छोड़ दिया। सुना जाता है कि उसके दस हजार पुत्र थे।

कहा जाता है कि एक बार सहस्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ शिकार खेलने के अभियान में घोर वन से होते हुए महर्षि जमदग्नि के आश्रम में पहुँचा। महर्षि जमदग्नि ने पूरी सेना सहित राजा का स्वागत सत्कार एक राजा की तरह किया। सहस्रार्जुन को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पराश्रित आश्रम का अधिपति इतने कम समय में इस प्रकार की भव्य व्यवस्था कैसे कर सका। राजा से रहा न गया और उसने महर्षि जमदग्नि से इसका रहस्य पूछा। महर्षि ने राजा को बताया कि उनके आश्रम में कामधेनु है जिसकी सहायता से उस प्रकार की व्यवस्था करने में वे सक्षम हो सके। सहस्रार्जुन का लोभ जागा और उसने उस गाय को महर्षि जमदग्नि से उसे सौंपने को कहा। महर्षि ने राजा को समझाया कि उनकी माँग राजधर्म के विरुद्ध है। क्योंकि राजा दान देता है, लेता नहीं। साथ ही उस गाय से आश्रमवासी ऋषियों और छात्रों का हित सिद्ध होता है। अतएव उनकी माँग अनुचित है। इसके बाद राजा ने अपने सैनिकों को बलात् उस गाय को अपनी राजधानी माहिष्मती ले चलने का निर्देश दिया और राजा के सैनिक बछड़े सहित कामधेनु को लेकर अपने नगर की ओर चल पड़े। उस समय भगवान परशुराम आश्रम से कहीं बाहर गए हुए थे।

जब भगवान परशुराम आश्रम लौटे और राजा के दुराचार सुनकर बिना रुके अपने सभी शस्त्रास्त्र लेकर राजा को दण्ड देने के लिए चल दिए। सहस्रबाहु अपने नगर में प्रवेश करने ही वाला था कि उसने परशुराम जी को उधर ही बड़े बेग से आते हुए देखा। उसने सत्रह अक्षौहिणी सेना उनसे लड़ने के लिए भेजी, जिसे देखते-देखते भगवान परशुराम ने अकेले विनष्ट कर दिया। यह देखकर सहस्रबाहु क्रोधाभिभूत होकर स्वयं युद्धभूमि में उतर पड़ा और पाँच सौ धनुषों पर एक साथ वाण चढ़ाकर भगवान परशुराम छोड़ दिए। लेकिन उसके सारे अस्त्र-शस्त्र भगवान परशुराम ने व्यर्थ कर दिए। इसके बाद सहस्रबाहु पर्वतों और वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगा, किन्तु उसकी एक न चली और भगवान परशुराम ने उसकी सभी भुजाओं को सर्प के समान अपने परशु से काट डाला तथा अन्त में उसके सिर को। पिता के मरने के बाद उसके दस हजार पुत्र भाग गए।

भगवान परशुराम कामधेनु और उसके बछड़े को लेकर अपने आश्रम वापस लौट आए। युद्ध में जो कुछ घटा था उन्होंने सबकुछ अपने पिता और भाइयों को बताया। सारा विवरण सुनने के बाद महर्षि जमदग्नि ने कहा- वत्स, हमलोग ब्राह्मण है, हम लोगों की शोभा क्षमा है, यही हमें समाज में पूजनीय बनाती है। राजा का इतना बड़ा अपराध नहीं था कि उसका वध किया जाता। सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी बड़ा अपराध होता है। अतएव हे वत्स, जाओ और भगवान का स्मरण करते हुए तीर्थाटन करो, जिससे तुम पाप-मुक्त हो सको।

पिता की आज्ञा का अनुसरण करते हुए भगवान परशुराम तीर्थयात्रा पर निकल गए और एक वर्ष बाद पुनः अपने आश्रम लौटे। कुछ वर्ष यों ही बीते।

नोट - एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथी, 21870 हाथी सवार, 65610 घुड़सवार और 109350 पैदल सेना होती है।

इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में भगवान परशुराम के जीवन की कुछ अन्य घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया जाएगा।

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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

भगवान परशुराम-1

अंक-1

भगवान परशुराम

आचार्य परशुराम राय

parsuram sckechआध्यात्मिक विद्या के क्षेत्र में भगवान परशुराम एक असाधारण गुरु हैं। कभी-कभी इनकी तुलना महर्षि दुर्वासा और महर्षि विश्वामित्र से करने की इच्छा करती है। अन्तर इतना है कि जहाँ भगवान परशुराम अपराधी को दंड देने के लिए अपने शस्त्र से काम लेते हैं, वहाँ महर्षि दुर्वासा और महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणी से शाप देकर। पर ये तीनों आचार्य आध्यात्मिक जगत के अप्रतिम विभूति हैं। यहाँ आचार्य शब्द का प्रयोग जानबूझ कर किया गया है। क्योंकि भगवान परशुराम ने स्वयं को कौलाचार्य शब्द से अभिहित किया है-

परशुरामकल्पसूत्र नामक ग्रंथ के पहले से सत्रहवें खण्ड के अन्त में पुष्पिका में इन्होंने अपना परिचय देते हुए लिखा है-

रेणुकागर्भसम्भूत-दुष्टक्षत्रियकुलान्तक-श्रीभार्गवोपाध्याय-महाकौलाचार्य-श्रीमत्परशुरामकृतौ परशुरामकल्पसूत्रे ........... खण्डः।

अर्थात् रेणुका के गर्भ से उत्पन्न, दुष्ट क्षत्रिय कुल का अन्त करनेवाले, भार्गव कुल में उत्पन्न उपाध्याय (शिक्षक), महाकौलाचार्य श्रीमत् परशुराम कृत परशुरामकल्पसूत्र का ......खण्ड सम्पन्न हुआ।

लेकिन अन्तिम (अठारहवें) खण्ड की पुष्पिका में थोड़ा परिवर्तन के साथ अपना परिचय निम्नलिखित रूप में दिया है-

श्रीदुष्टक्षत्रियकुलकालान्तक-रेणुकागर्भसम्भूत-महादेवप्रधानशिष्य-जामदग्न्यपरशुरामभार्गव-महोपाध्याय-महाकुलाचार्यनिर्मित-कल्पसूत्रं सम्पूर्णम्।

अर्थात् दुष्ट क्षत्रिय कुल का अन्त करनेवाले, रेणुका के गर्भ से उत्पन्न, महादेव के प्रधान शिष्य, जमदग्नि के पुत्र, भार्गव कुल में उत्पन्न और उपाध्याय (शिक्षक), महाकौलाचार्य द्वारा विरचित कल्पसूत्र सम्पूर्ण हुआ।

महाकवि संत तुलसीदास उन्हें क्षत्रिय कुल द्रोही कहा है। पर भगवान परशुराम के उक्त कथन से ऐसा नहीं लगता। वे केवल दुष्ट क्षत्रियों, जो अपने बाहुबल के गर्व में चूर होकर निर्बल लोगों पर अत्याचार करते थे, के अन्तक थे, सभी क्षत्रियों के नहीं। क्योंकि उसी काल में महाराज जनक, महाराज दशरथ आदि अनेक राजा थे, जिनसे उनका कोई बैर नहीं था।

इसके अलावा भगवान शिव का प्रधान शिष्य के रूप में अपना परिचय दिया है। इसका तात्पर्य है कि गणेश, अर्जुन आदि के ऊपर अपनी प्रधानता मानते हैं। पाठकों को ज्ञात होगा कि अस्त्र-शस्त्र विद्या के उनके गुरु साक्षात् भगवान शिव ही हैं और अमोघ परशु शस्त्र परशुराम को भगवान शिव ने ही प्रदान किया था। इसीलिए ये राम से परशुराम बन गए। क्योंकि जमदग्नि पुत्र राम (परशुराम), दशरथ पुत्र राम और नन्द-पुत्र राम (बलराम) तीन राम हैं। हाँ, यहाँ आश्चर्य यह अवश्य होता है कि उन्होंने अपने गुरु दत्तात्रेय का नाम नहीं लिया है।

आगे बढ़ने से पहले एक दृष्टि उनकी वंश-परम्परा पर डाल लेते हैं। ब्रह्मा के नौ मानस पुत्रों में से एक महर्षि भृगु हैं। ये एक वैदिक ऋषि हैं, अर्थात् मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। ऋग्वेदादि में इनकी चर्चा हुई है। इन्हें वरुण-पुत्र भी कहा गया है। महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि ऋचीक हुए। इनके पुत्र महर्षि जमदग्नि और इनके पाँचवें और सबसे छोटे पुत्र हैं परशुराम। इनकी माता रेणुका थीं, जो राजा प्रसेनजित या राजा रेणु की कन्या थीं। कुछ ग्रंथों के अनुसार रेणु ऋषि थे। ऐसा हो सकता है कि वे तपस्या करके बाद में महर्षि विश्वामित्र की भाँति ऋषित्व को उपलब्ध हुए हों।

परशराम जी बचपन से ही निर्भय थे और शस्त्रास्त्र की शिक्षा में उनकी अभिरुचि थी। पिता महर्षि जमदग्नि ने इनपर अपनी इच्छा से इनकी शिक्षा-दीक्षा को बिना प्रभावित किए इनकी प्रवृत्ति के अनुसार इनकी शिक्षा की व्यवस्था की। थोड़ा बड़े होने पर पिता की आज्ञा लेकर ये हिमालय की ओर प्रस्थान किए और वहाँ भगवान शिव की कठोर तपस्या में लीन हो गए। कुछ समय बाद भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए। कहा जाता है कि गुरु को अपनी अप्रतिम सेवा से प्रसन्न करके इन्होंने उनसे सभी दिव्यास्त्रों को प्राप्त किया जो किसी के लिए भी अलभ्य थे। एक लम्बे समय तक उन दिव्यास्त्रों का अभ्यास अपने गुरु भगवान शिव की देखरेख में ही किया। उनकी प्रतिभा, निष्ठा और गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दिव्य परशु प्रदान किया, जो सदा के लिए उनके नाम के साथ संयुक्त होकर रह गया। कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव से शिक्षा ग्रहण करने के बाद ये महर्षि कश्यप के आश्रम में रहकर उनके सान्निध्य में इन शस्त्रास्त्रों का अभ्यास किया था। इसके बाद अनन्य तपस्य़ा और शस्त्रास्त्रों के अभ्यास से अलौकिक आभा से उद्दीप्त होकर युवक परशुराम अपने माता-पिता के पास लौट आए। कहा जाता है कि बाद में इन्होंने स्वयं भी अनेक दिव्यास्त्रों की रचना की।

भगवान परशुराम के लिए उनके जीवन में माता, पिता और गुरु से बढ़कर किसी अन्य की कोई महत्ता नहीं थी, भगवान की भी नहीं। इनके लिए ये कोई भी त्याग करने या कुछ भी कर गुजरने के लिए सदा तत्पर रहते थे। इनकी इसी प्रवृत्ति और निष्ठा ने इनके जीवन में य़श और अपयश की रेखाओं से इनके अनिर्वचनीय वृत्त का निर्माण किया। इनके द्वारा विरचित परशुरामकल्पसूत्र आगम शास्त्र में वर्णित श्रीविद्या का अद्वितीय ग्रंथ है। इनके शिष्य सुमेधा मुनि ने त्रिपुरारहस्य़ नामक आगम ग्रंथ का प्रणयन किया। इसे हरितायन-संहिता भी कहते हैं। महर्षि सुमेधा का ही दूसरा नाम हरितायन है। इसी लिए इसे इनके इसी नाम के साथ जोड़कर देखा जाता है। इस ग्रंथ के तीन खण्ड हैं- माहात्म्य खण्ड, ज्ञान खण्ड और चर्या खण्ड। फिलहाल चर्या खण्ड अनुपलब्ध ग्रंथों की सूची में है। कहा जाता है कि त्रिपुरारहस्य भगवान दत्तात्रेय और परशुराम संवाद का संकलन है, जिसे अपने परम गुरु और गुरु के आदेश से महर्षि हरितायन ने लिपिबद्ध किया।

उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि भगवान परशुराम एक अद्वितीय योद्धा, शस्त्रास्त्र विद्या और श्रीविद्या परम्परा की तंत्र-साधना के प्रमुख आचार्यों में से एक हैं। यहाँ तक इन्हें पहुँचानेवाली परिस्थितियों पर चर्चा अगले अंकों में की जाएगी। इस अंक में बस इतना ही।

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