मंगलवार, 20 दिसंबर 2011
भगवान परशुराम-7
मंगलवार, 13 दिसंबर 2011
भगवान परशुराम-6
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
भगवान परशुराम – 5
मंगलवार, 29 नवंबर 2011
अंक-4 भगवान परशुराम
मंगलवार, 22 नवंबर 2011
भगवान परशुराम-3
भगवान परशुराम-3

आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में हमने देखा कि हैहयवंशी राजा सहस्रबाहु अर्जुन का बध करने के कारण भगवान परशुराम पिता की आज्ञा के अनुसार पापमुक्त होने के लिए एक वर्ष तक तीर्थ-यात्रा करने के बाद पुनः अपने पिता के आश्रम वापस लौट आए।
इसके बाद की घटना है - कुछ दिनों बाद एक दिन पति के हवन-पूजन के लिए माता रेणुका कलश लेकर गंगा तट पर जल लेने गयीं। वहाँ गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जल विहार करते देखने में वे इतना तल्लीन हो गयीं कि उन्हें समय का ध्यान ही न रहा और कहा जाता है कि वे चित्ररथ पर थोड़ी देर के लिए तो आसक्त हो गयी थीं। जब जल लेकर वे आश्रम पहुँची तो हवन-पूजन का समय बीत चुका था। माता रेणुका के चेहरे पर व्यग्रता के भाव देखकर महर्षि जमदग्नि ने उसका कारण पूछा। समुचित उत्तर न पाकर महर्षि ने ध्यान में जाकर सबकुछ जान लिया। जब उन्हें पत्नी के मानसिक व्यभिचार का पता चला तो वे बड़े ही क्रोधित हुए और अपने चार उपस्थित पुत्रों को एक-एक कर माँ का बध करने के लिए कहा। सभी ने मना कर दिया। भगवान परशुराम उस समय आश्रम में नहीं थे। जब वे आए तो महर्षि ने उन्हें माँ और चारो भाइयों का बध करने को कहा। भगवान परशुराम ने वैसा ही किया।
इससे महर्षि जमदानि अत्यन्त प्रसन्न हुए और परशुराम से वरदान माँगने को कहा। भगवान परशुराम ने वरदान स्वरूप अपनी माँ और चारो भाइयों का जीवन और जीवित होने पर और उन्हें इस घटना की विस्मृति का वरदान माँग लिया। महर्षि जमदग्नि ने सभी को जीवित कर दिया। साथ ही उनके साथ क्या हुआ, इसका उन्हें ज्ञान भी नहीं रहा। कहा जाता है कि भगवान परशुराम को अपने पिता के तपोबल पर इतना विश्वास था। अतएव पिता की आज्ञा का पालन करने में उन्होंने थोड़ा भी विलम्ब नहीं किया और अन्त में वरदान माँगकर पुनः उन्हें जीवन-दान भी दिलवा दिया।
उक्त घटना के बाद उनके जीवन में एक ऐसी दारुण घटना घटी जिसने उनके पराक्रम को नयी दिशा दे दी और उन्हें क्षत्रियों का संहारक कहा जाने लगा। पुराणों में मिलता है कि सहस्रबाहु अर्जुन के पुत्र अपने पिता के वध का बदला लेने के अवसर की तलाश में लगे थे। एक दिन भगवान परशुराम और उनके भाई आश्रम में नहीं थे। तभी वे लोग आश्रम में घुस गए और माता रेणुका के तमाम विरोध के बाद भी उन्होंने तपोधन महर्षि जमदग्नि का यज्ञशाला में ही सिर काट डाला और उसे लेकर पलायित हो गए। दूर से माँ की करुण ध्वनि भगवान परशुराम के कानों में पड़ी। वे तुरन्त आश्रम की ओर चल पड़े। पिता का जमीन पर पड़ा सिरविहीन शरीर और आश्रम की दुर्दशा देखकर उन्हें अपार दुख हुआ, उनकी क्रोधाग्नि अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी। वे बिना किसी प्रकार का विलम्ब किए उनका पीछा करते हुए माहिष्मती नगर चल पड़े। वहीं उन्होंने सहस्रबाहु के सभी पुत्रों का निर्ममता पूर्वक वध किया तथा पिता का सिर लेकर आश्रम पहुँचे। उनके सिर को धड़ से जोड़कर यज्ञों से सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान का यजन कर उनका अन्तिम संस्कार किया। महर्षि जमदग्नि को स्मृतिरूप संकल्पमय शरीर प्राप्त हुआ और भगवान परशुराम से सम्मानित होकर सप्तर्षिमण्डल में सातवें ऋषि का स्थान मिला।
इसके बाद दुर्जन और मद में चूर क्षत्रियों के विनाश का क्रम उन्होंने ऐसा चलाया कि हैहयवंश समेत अन्य क्षत्रिय राजाओं का विनाश करते रहे। कहा जाता है कि इक्कीस बार उन्होंने ऐसा किया और अंत में अश्वमेध यज्ञकर समस्त भूमि ब्राह्मणों को दान कर दी, जिसमें पूर्व दिशा होता को, दक्षिण ब्रह्मा को, पश्चिम दिशा अध्वर्यु को, उत्तर दिशा साम उद्गाताओं को, अग्निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजों को, मध्यभूमि महर्षि कश्यप को और आर्यावर्त उपद्रष्टा को दान कर दिया। अपने परशु से समुद्र पर प्रहार कर अपने लिए थोड़ी सी जमीन ली जिसे आज केरल के नाम से जाना जाता है।
इन घटनाओं ने पुनः उनके मन में उद्वेग पैदा कर दिया। वे मानसिक रूप से अशांत हो गए और वहीं महर्षि कश्यप से उसका निदान पूछा। महर्षि कश्यप ने उन्हें भगवान दत्तात्रेय की शरण में जाकर उनके निर्देशानुसार आचरण करने की सलाह दी। इसके बाद वे भगवान दत्तात्रेय से मिलने गंधमादन पर्वत की ओर चल पड़े। वहाँ भगवान दत्तात्रेय ने उन्हे दीक्षा दी और गिरनार पर्वत पर जाकर बारह वर्ष तक साधना करने के पश्चात पुनः आकर मिलने का आदेश दिया।
गुरु की आज्ञानसार बारह वर्ष के बाद पुनः भगवान परशुराम उनसे मिलने पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने गुरु से अनेक आध्यात्मिक प्रश्न पूछे जिससे उनका मन शंकारहित हो गया। भगवान परशुराम और भगवान दत्तात्रेय का यह संवाद हरितायन कृत त्रिपुरारहस्य के ज्ञानखंड में संग्रहीत है। समय मिला तो आगे इस पर चर्चा होगी। क्योंकि आध्यात्मिक रूप से यह संवाद बहुमूल्य है। कहा जाता है कि तंत्रशास्त्र की सर्वोच्च श्रीविद्या-साधना के प्रवर्तक भगवान परशुराम ही हैं। इसपर इनका लिखा परशुरामकल्पसूत्र अत्यन्त उच्चकोटि का ग्रंथ है।
भगवान परशुराम का जीवन वृत्त विभिन्न पुराणों में भरा पड़ा है। ब्ह्मवैवर्त पुराण की एक कथा के अनुसार भगवान गणेश से इनका युद्ध हुआ था। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ, जिसमें श्री गणेश जी का एक दाँत टूट गया। तब से वे एकदंत कहे जाने लगे। इसी प्रकार इनका युद्ध शिवनन्दन कार्तिकेय से भी हुआ था और भगवान परशुराम विजयी रहे। इस महान अवतार पर एक महाशोध ग्रंथ कनखल निवासी डॉ. शर्मा ने लिखा है जिसमें लगभग एक हजार पृष्ठ हैं। मैंने प्रयास किया, पर अब तक यह ग्रंथ मुझे मिल नहीं पाया है। अगले अंक मे इनके जीवन से सम्बन्धित कुछ अन्य विवरण दिए जाने का प्रयास किया जाएगा।
इस अंक में बस इतना ही।
मंगलवार, 15 नवंबर 2011
भगवान परशुराम-2
भगवान परशुराम-2

आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में भगवान परशुराम के विषय में सामान्य जानकारी दी गयी थी। इस अंक में उन घटनाओं का उल्लेख किया जाएगा, जिनसे उनके जग-विश्रुत चरित्र ने अपना स्वरूप धारण किया। कहा जाता है कि भगवान विष्णु स्वयं दुष्ट क्षत्रियों के विनाश के लिए परशुराम के रूप में अवतरित हुए थे। जहाँ कहीं भी कमजोर वर्ग का दबंग लोगों द्वारा दमन होता है, वहाँ परशुराम-चेतना सक्रिय होती है। इसका माध्यम चाहे कोई हो। पुराणेतिहास में प्राप्त तथ्यों के अनुसार इन्हें सर्वप्रथम युद्ध चन्द्रवंशीय राजा सहस्रार्जुन से करना पड़ा।
भागवत महापुराण के अनुसार हैहयवंश का राजा अर्जुन बड़ा ही प्रतापी राजा था। उसने भगवान दत्तात्रेय की कृपा से एक हजार भुजाएँ और सभी यौगिक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं। इसीलिए यह सहस्रबाहु अर्जुन के नाम से जाना जाता था। इसका दिव्यास्त्रों पर भी समान अधिकार था। इसमें इतना अकूत बल था कि एक बार इसने अपनी भुजाओं से नर्मदा नदी का प्रवाह रोक दिया था जिससे पास में चल रहे रावण का शिविर नर्मदा के जल में डूबने लगा। वह क्रोध में आकर रावण को बन्दी बनाकर अपनी राजधानी माहिष्मती लेकर चला गया। अन्त में महर्षि पुलस्त्य के कहने पर उसे छोड़ दिया। सुना जाता है कि उसके दस हजार पुत्र थे।
कहा जाता है कि एक बार सहस्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ शिकार खेलने के अभियान में घोर वन से होते हुए महर्षि जमदग्नि के आश्रम में पहुँचा। महर्षि जमदग्नि ने पूरी सेना सहित राजा का स्वागत सत्कार एक राजा की तरह किया। सहस्रार्जुन को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पराश्रित आश्रम का अधिपति इतने कम समय में इस प्रकार की भव्य व्यवस्था कैसे कर सका। राजा से रहा न गया और उसने महर्षि जमदग्नि से इसका रहस्य पूछा। महर्षि ने राजा को बताया कि उनके आश्रम में कामधेनु है जिसकी सहायता से उस प्रकार की व्यवस्था करने में वे सक्षम हो सके। सहस्रार्जुन का लोभ जागा और उसने उस गाय को महर्षि जमदग्नि से उसे सौंपने को कहा। महर्षि ने राजा को समझाया कि उनकी माँग राजधर्म के विरुद्ध है। क्योंकि राजा दान देता है, लेता नहीं। साथ ही उस गाय से आश्रमवासी ऋषियों और छात्रों का हित सिद्ध होता है। अतएव उनकी माँग अनुचित है। इसके बाद राजा ने अपने सैनिकों को बलात् उस गाय को अपनी राजधानी माहिष्मती ले चलने का निर्देश दिया और राजा के सैनिक बछड़े सहित कामधेनु को लेकर अपने नगर की ओर चल पड़े। उस समय भगवान परशुराम आश्रम से कहीं बाहर गए हुए थे।
जब भगवान परशुराम आश्रम लौटे और राजा के दुराचार सुनकर बिना रुके अपने सभी शस्त्रास्त्र लेकर राजा को दण्ड देने के लिए चल दिए। सहस्रबाहु अपने नगर में प्रवेश करने ही वाला था कि उसने परशुराम जी को उधर ही बड़े बेग से आते हुए देखा। उसने सत्रह अक्षौहिणी सेना उनसे लड़ने के लिए भेजी, जिसे देखते-देखते भगवान परशुराम ने अकेले विनष्ट कर दिया। यह देखकर सहस्रबाहु क्रोधाभिभूत होकर स्वयं युद्धभूमि में उतर पड़ा और पाँच सौ धनुषों पर एक साथ वाण चढ़ाकर भगवान परशुराम छोड़ दिए। लेकिन उसके सारे अस्त्र-शस्त्र भगवान परशुराम ने व्यर्थ कर दिए। इसके बाद सहस्रबाहु पर्वतों और वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगा, किन्तु उसकी एक न चली और भगवान परशुराम ने उसकी सभी भुजाओं को सर्प के समान अपने परशु से काट डाला तथा अन्त में उसके सिर को। पिता के मरने के बाद उसके दस हजार पुत्र भाग गए।
भगवान परशुराम कामधेनु और उसके बछड़े को लेकर अपने आश्रम वापस लौट आए। युद्ध में जो कुछ घटा था उन्होंने सबकुछ अपने पिता और भाइयों को बताया। सारा विवरण सुनने के बाद महर्षि जमदग्नि ने कहा- वत्स, हमलोग ब्राह्मण है, हम लोगों की शोभा क्षमा है, यही हमें समाज में पूजनीय बनाती है। राजा का इतना बड़ा अपराध नहीं था कि उसका वध किया जाता। सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी बड़ा अपराध होता है। अतएव हे वत्स, जाओ और भगवान का स्मरण करते हुए तीर्थाटन करो, जिससे तुम पाप-मुक्त हो सको।
पिता की आज्ञा का अनुसरण करते हुए भगवान परशुराम तीर्थयात्रा पर निकल गए और एक वर्ष बाद पुनः अपने आश्रम लौटे। कुछ वर्ष यों ही बीते।
नोट - एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथी, 21870 हाथी सवार, 65610 घुड़सवार और 109350 पैदल सेना होती है।
इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में भगवान परशुराम के जीवन की कुछ अन्य घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया जाएगा।
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मंगलवार, 8 नवंबर 2011
भगवान परशुराम-1
अंक-1
भगवान परशुराम
आचार्य परशुराम राय
आध्यात्मिक विद्या के क्षेत्र में भगवान परशुराम एक असाधारण गुरु हैं। कभी-कभी इनकी तुलना महर्षि दुर्वासा और महर्षि विश्वामित्र से करने की इच्छा करती है। अन्तर इतना है कि जहाँ भगवान परशुराम अपराधी को दंड देने के लिए अपने शस्त्र से काम लेते हैं, वहाँ महर्षि दुर्वासा और महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणी से शाप देकर। पर ये तीनों आचार्य आध्यात्मिक जगत के अप्रतिम विभूति हैं। यहाँ आचार्य शब्द का प्रयोग जानबूझ कर किया गया है। क्योंकि भगवान परशुराम ने स्वयं को कौलाचार्य शब्द से अभिहित किया है-
परशुरामकल्पसूत्र नामक ग्रंथ के पहले से सत्रहवें खण्ड के अन्त में पुष्पिका में इन्होंने अपना परिचय देते हुए लिखा है-
रेणुकागर्भसम्भूत-दुष्टक्षत्रियकुलान्तक-श्रीभार्गवोपाध्याय-महाकौलाचार्य-श्रीमत्परशुरामकृतौ परशुरामकल्पसूत्रे ........... खण्डः।
अर्थात् रेणुका के गर्भ से उत्पन्न, दुष्ट क्षत्रिय कुल का अन्त करनेवाले, भार्गव कुल में उत्पन्न उपाध्याय (शिक्षक), महाकौलाचार्य श्रीमत् परशुराम कृत परशुरामकल्पसूत्र का ......खण्ड सम्पन्न हुआ।
लेकिन अन्तिम (अठारहवें) खण्ड की पुष्पिका में थोड़ा परिवर्तन के साथ अपना परिचय निम्नलिखित रूप में दिया है-
श्रीदुष्टक्षत्रियकुलकालान्तक-रेणुकागर्भसम्भूत-महादेवप्रधानशिष्य-जामदग्न्यपरशुरामभार्गव-महोपाध्याय-महाकुलाचार्यनिर्मित-कल्पसूत्रं सम्पूर्णम्।
अर्थात् दुष्ट क्षत्रिय कुल का अन्त करनेवाले, रेणुका के गर्भ से उत्पन्न, महादेव के प्रधान शिष्य, जमदग्नि के पुत्र, भार्गव कुल में उत्पन्न और उपाध्याय (शिक्षक), महाकौलाचार्य द्वारा विरचित कल्पसूत्र सम्पूर्ण हुआ।
महाकवि संत तुलसीदास उन्हें क्षत्रिय कुल द्रोही कहा है। पर भगवान परशुराम के उक्त कथन से ऐसा नहीं लगता। वे केवल दुष्ट क्षत्रियों, जो अपने बाहुबल के गर्व में चूर होकर निर्बल लोगों पर अत्याचार करते थे, के अन्तक थे, सभी क्षत्रियों के नहीं। क्योंकि उसी काल में महाराज जनक, महाराज दशरथ आदि अनेक राजा थे, जिनसे उनका कोई बैर नहीं था।
इसके अलावा भगवान शिव का प्रधान शिष्य के रूप में अपना परिचय दिया है। इसका तात्पर्य है कि गणेश, अर्जुन आदि के ऊपर अपनी प्रधानता मानते हैं। पाठकों को ज्ञात होगा कि अस्त्र-शस्त्र विद्या के उनके गुरु साक्षात् भगवान शिव ही हैं और अमोघ परशु शस्त्र परशुराम को भगवान शिव ने ही प्रदान किया था। इसीलिए ये राम से परशुराम बन गए। क्योंकि जमदग्नि पुत्र राम (परशुराम), दशरथ पुत्र राम और नन्द-पुत्र राम (बलराम) तीन राम हैं। हाँ, यहाँ आश्चर्य यह अवश्य होता है कि उन्होंने अपने गुरु दत्तात्रेय का नाम नहीं लिया है।
आगे बढ़ने से पहले एक दृष्टि उनकी वंश-परम्परा पर डाल लेते हैं। ब्रह्मा के नौ मानस पुत्रों में से एक महर्षि भृगु हैं। ये एक वैदिक ऋषि हैं, अर्थात् मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। ऋग्वेदादि में इनकी चर्चा हुई है। इन्हें वरुण-पुत्र भी कहा गया है। महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि ऋचीक हुए। इनके पुत्र महर्षि जमदग्नि और इनके पाँचवें और सबसे छोटे पुत्र हैं परशुराम। इनकी माता रेणुका थीं, जो राजा प्रसेनजित या राजा रेणु की कन्या थीं। कुछ ग्रंथों के अनुसार रेणु ऋषि थे। ऐसा हो सकता है कि वे तपस्या करके बाद में महर्षि विश्वामित्र की भाँति ऋषित्व को उपलब्ध हुए हों।
परशराम जी बचपन से ही निर्भय थे और शस्त्रास्त्र की शिक्षा में उनकी अभिरुचि थी। पिता महर्षि जमदग्नि ने इनपर अपनी इच्छा से इनकी शिक्षा-दीक्षा को बिना प्रभावित किए इनकी प्रवृत्ति के अनुसार इनकी शिक्षा की व्यवस्था की। थोड़ा बड़े होने पर पिता की आज्ञा लेकर ये हिमालय की ओर प्रस्थान किए और वहाँ भगवान शिव की कठोर तपस्या में लीन हो गए। कुछ समय बाद भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए। कहा जाता है कि गुरु को अपनी अप्रतिम सेवा से प्रसन्न करके इन्होंने उनसे सभी दिव्यास्त्रों को प्राप्त किया जो किसी के लिए भी अलभ्य थे। एक लम्बे समय तक उन दिव्यास्त्रों का अभ्यास अपने गुरु भगवान शिव की देखरेख में ही किया। उनकी प्रतिभा, निष्ठा और गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दिव्य परशु प्रदान किया, जो सदा के लिए उनके नाम के साथ संयुक्त होकर रह गया। कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव से शिक्षा ग्रहण करने के बाद ये महर्षि कश्यप के आश्रम में रहकर उनके सान्निध्य में इन शस्त्रास्त्रों का अभ्यास किया था। इसके बाद अनन्य तपस्य़ा और शस्त्रास्त्रों के अभ्यास से अलौकिक आभा से उद्दीप्त होकर युवक परशुराम अपने माता-पिता के पास लौट आए। कहा जाता है कि बाद में इन्होंने स्वयं भी अनेक दिव्यास्त्रों की रचना की।
भगवान परशुराम के लिए उनके जीवन में माता, पिता और गुरु से बढ़कर किसी अन्य की कोई महत्ता नहीं थी, भगवान की भी नहीं। इनके लिए ये कोई भी त्याग करने या कुछ भी कर गुजरने के लिए सदा तत्पर रहते थे। इनकी इसी प्रवृत्ति और निष्ठा ने इनके जीवन में य़श और अपयश की रेखाओं से इनके अनिर्वचनीय वृत्त का निर्माण किया। इनके द्वारा विरचित परशुरामकल्पसूत्र आगम शास्त्र में वर्णित श्रीविद्या का अद्वितीय ग्रंथ है। इनके शिष्य सुमेधा मुनि ने त्रिपुरारहस्य़ नामक आगम ग्रंथ का प्रणयन किया। इसे हरितायन-संहिता भी कहते हैं। महर्षि सुमेधा का ही दूसरा नाम हरितायन है। इसी लिए इसे इनके इसी नाम के साथ जोड़कर देखा जाता है। इस ग्रंथ के तीन खण्ड हैं- माहात्म्य खण्ड, ज्ञान खण्ड और चर्या खण्ड। फिलहाल चर्या खण्ड अनुपलब्ध ग्रंथों की सूची में है। कहा जाता है कि त्रिपुरारहस्य भगवान दत्तात्रेय और परशुराम संवाद का संकलन है, जिसे अपने परम गुरु और गुरु के आदेश से महर्षि हरितायन ने लिपिबद्ध किया।
उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि भगवान परशुराम एक अद्वितीय योद्धा, शस्त्रास्त्र विद्या और श्रीविद्या परम्परा की तंत्र-साधना के प्रमुख आचार्यों में से एक हैं। यहाँ तक इन्हें पहुँचानेवाली परिस्थितियों पर चर्चा अगले अंकों में की जाएगी। इस अंक में बस इतना ही।
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