रविवार, 4 दिसंबर 2011


भारतीय काव्यशास्त्र – 93
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में अभवन्मत योग, अनभिहितवाच्यता और अस्थानपदत्व वाक्य दोषों पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में अस्थानसमासता (अस्थानस्थ समास), सङ्कीर्ण, गर्भितत्व और प्रसिद्धिहत वाक्यदोषों पर चर्चा की जाएगी।
अस्थानसमासता (अस्थानस्थ समास) वाक्य दोष वहाँ होता जहाँ आवश्यकता के अनुसार समास न कर, गलत स्थान पर समास कर दिया जाय। इसके लिए निम्नलिखित श्लोक उदाहरण के लिए लिया जा रहा है।
 चन्द्रमा को कामदेव का सेनापति कहा जाता है और जब यह उदय होता है, उसका रंग लाल होता है। इसमें चन्द्रमा को उदित होने पर कुमुदों में बन्द भौंरे पंक्तिबद्ध होकर निकलते हैं। इसी प्राकृतिक दृश्य का इस श्लोक में वर्णन किया गया है। इस श्लोक का पूर्वार्द्ध चन्द्रमा की उक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उत्तरार्द्ध में उत्प्रेक्षा के रूप में कवि की उक्ति है- 
अद्यापि   स्तनशैलदुर्गविषमे  सीमन्तिनीनां  हृदि
स्थातुं वाञ्छति मान एष धिगिति क्रोधादिवालोहितः।
प्रोद्यद्दूरतरप्रसारितकरः   कर्षत्यसौ     तत्क्षणात्
फुल्लत्कैरवकोशनिःसरदलिश्रेणीकृपाणं        शशी।।
अर्थात् मेरे (कामदेव के सेनापति चन्द्रमा के) आने के (उदय होने के) बाद भी स्त्रियों के स्तन रूपी पर्वतों के दुर्ग (किले) में स्थित हृदय में यह मान (क्रोध) रहना चाहता है, यह धिक्कार की बात है। मानो इसीलिए क्रोध से लाल होकर चन्द्रमा दूर तक अपने किरण रूपी हाथों को फैलाकर कुमुदों के कोष रूपी म्यान से पंक्तिबद्ध भ्रमर रूपी कृपाण खींच रहा है।
यहाँ श्लोक का पूर्वार्द्ध क्रोधित चन्द्रमा की उक्ति है, अतएव उसमें लम्बा समास कठोरता का भाव देता, लेकिन कवि ने वैसा न कर, उत्तरार्द्ध में अपनी उक्ति में लम्बे समास का प्रयोग किया है। इस प्रकार समास का उचित स्थान पर न होने से अस्थानसमासता वाक्य दोष है।
जिस कविता में एक वाक्य का पद दूसरे वाक्य में प्रयुक्त कर दिया जाय तो उसमें सङ्कीर्ण वाक्य दोष माना जाएगा। निम्नलिखित श्लोक इसका उदाहरण है। यह किसी मानिनी स्त्री के प्रति उसकी सहेली का कथन है, जिसका पति उसे मनाने के लिए उसके पैर पड़ रहा है-
किमिति न पश्यसि कोपं पादगतं बहुगुणं गृहाणेमम्।
ननु   मुञ्च   हृदयनाथं  कण्ठे  मनसस्तमोरूपम्।।
अर्थात् पैरों पर पड़े अत्यन्त गुणवान अपने प्राणनाथ को तुम क्यों नहीं देखती हो, तात्पर्य कि देखो। मन के इस तमोरूप (क्रोध) को छोड़ो इन्हें उठाकर गले लगाओ।
इस श्लोक में तीन वाक्य हैं- पादगतं बहुगुणं हृदयनाथं किम् इति न पश्यसि, इमं कण्ठे गृहाण और मनस्तमोरूपं कोपं मुञ्च। यहाँ पहले वाक्य का हृदयनाथम् पद तीसरे वाक्य में चला गया है, दूसरे वाक्य का कण्ठे पद तीसरे वाक्य मे आ गया है और तीसरे वाक्य का कोपम् पद पहले वाक्य में प्रयोग हुआ है। अतएव इस श्लोक में संकीर्ण दोष है।       
गर्भितत्व दोष वहाँ होता है जहाँ कविता में एक वाक्य दूसरे वाक्य में प्रविष्ट हो जाए। जैसे-
परापकारनिरतैर्दुर्जनैः   सह   सङ्गतिः।
वदामि भवतस्तत्त्वं न विधेया कदाचन।।
अर्थात् मैं आपको तत्त्व की बात बताता हूँ कि दूसरों के अपकार में रत दुष्ट पुरुषों की संगति कभी नहीं करनी चाहिए। 
यहाँ दो वाक्य हैं- वदामि भवतस्तत्त्वम् (आपसे तत्त्व की बात बताता हूँ) और परापकारनिरतैर्दुर्जनैः सह सङ्गतिः न विधेया कदाचन (दूसरों के अपकार में रत दुष्टो के साथ मित्रता कभी नहीं करनी चाहिए) वदामि भवतस्तत्त्वम् वाक्य तीसरे चरण में आने से इसका दूसरे वाक्य में प्रवेश हो गया है। अतएव यहाँ गर्भितत्व वाक्य दोष है।
कवियों के यहाँ कुछ विशेष शब्दों तथा अर्थों का विशेष रूप में ही वर्णन करने की परम्परा या नियम है, जिसे कवि-समय या कविप्रसिद्धि कहा जाता है। इसके लिए आचार्य मम्मट ने निम्नलिखित कारिका उद्धृत की है जिसमें कुछ ऐसे कवि-समय के उदाहरण दिए गए हैं-
मञ्जीरादिषु रणितप्रायं पक्षिषु च कूजितप्रभृति।
      स्तनितमणितादि सुरते मेधादिषु गर्जितप्रमुखम्।।
अर्थात् मंजीर आदि में ऱणित आदि, पक्षियों के शब्द को कूजित आदि, सुरत में स्तनित, मणित आदि, बादल आदि के लिए गर्जन आदि का प्रयोग करना चाहिए।
 काव्य में इसका अर्थात कविसमय का उल्लंघन होने पर प्रसिद्धिहत या प्रसिद्धिविरुद्धता दोष होता है। जैसे-
महाप्रलयमारुतक्षुभितपुष्करावर्त्तकप्रचन्डघनगर्जितप्रतिरुतानुकारी     मुहुः।
रवः श्रवणभैरवः स्थगितरोदसीकन्दरः कृतोSद्य समरोदधेरयमभूतपूर्वः पुरः।।
अर्थात् महाप्रलय की वायु से क्षुब्ध पुष्करावर्त्तक आदि (चौदह प्रकार के) भयंकर मेघों के गर्जन की प्रतिध्वनि के समान सुनने में भयंकर लगने वाला समर-सागर से उत्पन्न अभूतपूर्व आकाश और पृथ्वी को एक करता हुआ यह शब्द सामने किधर से आ  रहा है।
यहाँ प्रयुक्त रव शब्द विशिष्ट सिंहनाद के अर्थ में किया गया है, जबकि यह शब्द (संस्कृत में) मेढक आदि के शब्द के रूप में प्रसिद्ध है। अतएव यहाँ प्रसिद्धिहत या प्रसिद्धिविरुद्धता दोष है।
निम्नलिखित दोहे में भी यह दोष देखा जा सकता है-
नाच रहे तरु पर हरे, लहि शुभ दच्छिन पौन।
गावत कोकिल रंग भरे, छावत छवि ऋतुरौन।।
इसमें कोकिलों का नाचना-गाना कविसमय या कविसम्प्रदाय के विरुद्ध है। (यहाँ ऋतुरौन का अर्थ ऋतुरमण या वसन्त है)
इस अंक में बस इतना ही।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति | मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वगत है । कृपया निमंत्रण स्वीकार करें । धन्यवाद ।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति |मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वगत है । कृपया निमंत्रण स्वीकार करें । धन्यवाद ।

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