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गुरुवार, 21 जून 2012

आँच – 114 – सोनागाछी (कहानी)


आँच – 114 – सोनागाछी (कहानी)

हरीश प्रकाश गुप्त


विभिन्न ब्लागों पर की गईं उनकी टिप्पणियों से ही अब तक कौशलेन्द्र जी से मेरा परिचय था। अभी तक उनके ब्लाग पर जाना हुआ नहीं था, सो उनके रचनात्मक लेखन के बारे में भी अधिक जानकारी नहीं थी। पिछले सप्ताह श्री मनोज कुमार जी ने उनकी एक कहानी का लिंक दिया था। कहानी पढ़ी तो इसकी शैली और इसके भाषिक स्तर के माध्यम से लेखकीय प्रस्तुति ने बहुत प्रभावित किया। आँच स्तम्भ पर लगातार हो रही कविताओं पर चर्चा की एकरसता को भंग करने के इरादे से तथा एक उत्तम कृति को अधिकाधिक पाठकों के समीप पहुँचाने के प्रयास के क्रम में आज की आँच में कौशलेन्द्र जी की कहानी सोनागाछी को लिया जा रहा है। यह कहानी उनके ब्लाग बस्तर की अभिव्यक्ति जैसे कोई झरना पर पिछले सप्ताह दो अंकों में प्रकाशित हुई थी।

सोनागाछी विषय नया नहीं है। बहुत से रचनाकारों ने इस विषय पर अपनी  कलम चलाई है और अनेक कहानियाँ और उपन्यास इस विषय पर आ चुके हैं। कुछ में एकरूपता और एकरसता है, तो कुछ सोनागाछी को एक नई दिशा में परिभाषित करते हैं, नवीन प्रश्न उठाते हैं, सोचने को विवश करते हैं तथा समाधान प्रस्तुत करते हैं। यह लेखक की अभिनव दृष्टि है। अतिसामान्य हो गए विषय को लेखक का नवीन दृष्टि से देखना और अपने कौशल से सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करना ही पाठक को आकर्षित करता है। 

शायद ही ऐसा कोई हो जिसने सोनागाछी के विषय में न सुना हो। बंगाल का सोनागाछी पूर्वी भारत में देह व्यापार के लिए प्रसिद्ध है। सतही तौर पर देखने पर सोनागाछी ऐसे ही रूप में सामने आता है जो न केवल घृणित और गंदे व्यवसाय का पर्याय है बल्कि सभ्य समाज पर एक धब्बे की तरह है, वर्ज्य है, त्याज्य है। यह सोनागाछी, जिन्हें हम सभ्य समाज के लोग कहते हैं, उनके ही भोग-विलास का साधन है और उनके ही महत्वपूर्ण कार्यों-कार्यक्रमों की सफलता का अनिवार्य उपक्रम सा है। तथापि अपने पास आने वालों को शारीरिक और आत्मिक सुख देने वाले सोनागाछी की पीड़ा अनभिव्यक्त रह जाती है। कम ही लोगों ने इस सोनागाछी के अन्तस में झाँकने की कोशिश की है, इसके इतर पहलू को समझा है। यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि लोग सोनागाछी को क्या समझते हैं बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि सोनागाछियों की अनुभूति क्या है, उनकी पीड़ा क्या है, उनकी मजबूरी क्या है। क्या उनके भीतर भी सुख-दुख की सह-अनुभूति है, सम्वेदना है, क्या वे इस बेड़ी से मुक्त होना चाहती हैं और मुक्त होकर वे क्या पाना चाहती हैं। प्रस्तुत कहानी में लेखक ने सोनागाछी के इसी अनभिव्यक्त पहलू को विस्तार से तथा बहुत ही मार्मिक ढंग से उद्घाटित किया है।

देश का विभाजन, बांगलादेश का निर्माण, विस्थापन, गरीबी, रोजगार की तलाश, शोषण और मजबूरी आदि ऐतिहासिक संदर्भ में अनेक ऐसे प्रामाणिक तथ्य मौजूद हैं जो सोनागाछी के निर्माण और उसके अस्तित्व को तार्किक पुष्टि देते हैं। लेखक ने इस कहानी में इन सभी अंगों पर सजगता से दृष्टिपात किया है।  

कहानी का प्रारम्भ विभाजन-जनित मर्मान्तक पीड़ा को पुष्ट करती पृष्ठभूमि से हुआ है। फिर लेखक ने बड़ी चतुराई से भ्रम उत्पन्न कर टर्न दिया है और कहानी कुशलता से पाठकों को दूसरी पृष्ठभूमि की ओर ले जाती है। यह प्रस्तुति पाठक के मस्तिष्क में सोनागाछी के स्वरूप और उसकी विवशता का सजीव चित्र खींचती है, जिसमें पाठक मंत्रमुग्ध सा कहानी में खो जाता है। कहानी में सोनागाछियों के स्वप्नों की मूक अभिव्यक्ति भी है जिसे भाषिक सौन्दर्य के साथ प्रस्तुत किया गया है।

लेखक की लेखनी निसन्देह समर्थ और निरपवाद है। पूरी कहानी में शब्दों का सम्मोहन है। कथोपकथन उपयुक्त और प्रभावशाली हैं। एकाधिक स्थानों पर उक्तियाँ अति दर्शनीय बन गईं हैं। वर्णन में लेखक की क्षमता पर प्रश्न नहीं। तथापि यही वर्णन कुछएक स्थानों पर कहानीपन पर भारी प्रतीत होता है। वहाँ कहानी स्वयमेव कथानक की अनुगामी नहीं बन सकी है बल्कि इसने कुछ-कुछ लेखकीय सम्बोधन/सम्भाषण का रूप ले लिया है। इसका यह भी एक कारण हो सकता है कि कहानी में कथाकार स्वयं वाचक की भूमिका में आ गया है जो कहानी की श्रेष्ठता को कमतर करता है। जबकि कथाकार को स्वयं पक्ष बनने से बचना चाहिए और अपनी ही उक्ति, विचारों को व्यक्त करने के लिए किसी चरित्र को गढ़ना चाहिए, उसका आश्रय लेना चाहिए, तब शायद यह अधिक संगत होता। प्रायः स्वयं को आदर्श चरित्र के रूप में प्रस्तुत करने की लेखक की मनोवृत्ति कहीं सीमा तक खुद को श्रेष्ठ रूप में प्रस्तुत करने की होती है और सजग पाठक को यह संदेश ग्रहण करने में अधिक कठिनाई नहीं होती। रचनाकार तो निरपेक्ष होता है अतः जब वह घटनाक्रम से स्वयं को अलग रखकर परिदृश्य को देखता और दिखलाता है तो यह आदर्श स्थिति होती है।

एक और छोटी सी बात, जिससे सम्भवतः लेखक भी सहमत होंगे, लेखक ने कहानी में एक से अधिक स्थानों पर नेत्रों या नेत्रों से झरना बहने जैसे प्रयोग किए हैं। नेत्र बहुत ही रूक्ष और कर्कश शब्द है जिससे आँसू बहना सुसंगत नहीं लगता। नीर तो नयनों से ही बहता हुआ ही अधिक संगत है और नेत्रों से ज्वाला। कुछ अशुद्धियाँ भी हैं जिन्हें लेखक स्वयं यदि कहानी का निरपेक्ष रूप से पाठ करेंगे तो उन्हें दूर कर देंगे। कथानक की भावभूमि के प्रभाव में सूक्ष्म अशुद्धियाँ दृष्टि से प्रायः ओझल हो जाती हैं। इसके बावजूद कौशलेन्द्र की यह कहानी वर्णन की शैलीगत विशिष्टता और इसमें उनकी सामर्थ्य की छाप छोड़ती है। यह समाज की विसंगति को उजागर करती हुई तमाम प्रश्न उठाती है जो पाठक के मन-मस्तिष्क में कौंधते हैं। यही कहानी की सफलता है। यह कहानी सोनगाछियों की नारीगत विवशता, उनकी मर्माहत कर देने वाली पीड़ा और इसके बावजूद उनके अंदर पल रहे सपनों के पूरे होने की आकांक्षा की सफल प्रस्तुति है। इस कहानी पर पाठकों को एक बार दृष्टिपात कर लेना चाहिए।

गुरुवार, 14 जून 2012

आँच – 113 – दफ़्तर के अंध महासागर में


आँच – 113 – दफ़्तर के अंध महासागर में
हरीश प्रकाश गुप्त

नवगीत लेखन में पं. श्याम नारायण मिश्र एक सशक्त हस्ताक्षर है। उनके गीतों में शब्दजाल का मोहक तिलिस्म होता है जो आद्योपांत टूटता नहीं बल्कि पाठक को पूरी तन्मयता के साथ जोड़े रखता है और उसे काव्यरस के सागर से उबरने नहीं देता। मिश्र जी की विशेषता है कि वे सदा बिम्बों के साथ नित नवीन प्रयोग करते रहते हैं। उनके बिम्ब शब्द-योजना में इस तरह पिरोए रहते  हैं कि उससे पृथक कल्पना आसान नहीं होती। उनके बिम्ब बड़े ही स्वाभाविक ढंग से पाठक के समक्ष होते हैं। वे इस विधा में इतने समर्थ हैं कि यही उनकी विशिष्टि बन जाती है।
     मिश्र जी की रचनाएँ इस ब्लाग पर नियमित प्रकाशित हो रही हैं और पाठकों को रसलाभ करने का निरंतर अवसर मिल रहा है। मिश्र जी नवगीत में इतने सिद्धहस्त हैं कि उन पर कलम उठाने का साहस करना मुझ जैसे व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होना चाहिए। फिर भी, आप सबकी अनुमति से और तटस्थ रह कर रचना धर्म का पालन करते हुए अत्यंत विनीत भाव से उनके एक नवगीत दफ्तर के अंधमहासागर में को आज की आँच में लेने का प्रयास है। यह नवगीत आज से ठीक एक माह पूर्व इसी ब्लाग पर प्रकाशित हुआ था।
     दफ्तर के अंध महासागर में नवगीत परम्परा का एक छोटा सा गीत है जिसमें कवि ने आम जन की पीड़ा और अभिलाषा को बहुत ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है। आम आदमी का जीवन संघर्ष सहज नहीं होता। उसके पास साधन नहीं, आशा की किरण भी नहीं, फिर भी वह अंधकार में उम्मीद लिए प्रकाश की किरण की तलाश करता है। अपने आत्मीय जनों से प्रेम और उनके सुख की खातिर दिन भर खटने के बावजूद शरीर से वह थकता नहीं। जहाँ प्रेम हो और चाहत हो वहां शरीर परिश्रांत नहीं होता बल्कि प्रफुल्लित होता है। मन से वह थकना चाहता नहीं। उसका लक्ष्य होता है थोड़ा सा सुख जिसे वह अपने लिए, पत्नी और बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए जुटा सके। यहीं से शुरू होते हैं उसके द्वन्द्व। उसे एक साथ एक नहीं, कई-कई मोर्चों पर संघर्ष करना होता है। ये शारीरिक भी हैं और मानसिक भी। शीरीरिक संघर्ष भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हैं तो सीमित साधनों और अनेकानेक सीमाओं के चलते आशाओं, अपेक्षाओं और अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए मानसिक। दिन में अथक परिश्रम करते हुए, आशा की किरण न दिखने पर भी नित नए व सुखद सपने संजोना उसकी चाहत है और यही उसकी नियति भी होती है। जब वह अपने सपनीले संसार में होता है तब ही वह सबके चहरे पर खुशियाँ देख पाता है और जब आँख खुलती है, वह वापस यथार्थ के धरातल पर पहुँचता है तब वह स्वयं को निरुपाय और निराशा से घिरा पाता है। यही वास्तविकता है। व्यक्ति सदा वही सपने देखता जो वह पाना चाहता है या जो वह बनना चाहता है और जब वह यह सब नहीं कर पाता तो वह निराश होता है, टूटता है। परिस्थितियों पर उसका नियंत्रण नहीं। लेकिन मिश्र जी की दृष्टि पूर्णतया आशावादी है। वे उसे निराशा की तली में जाने से रोकते हैं और अंतिम पद तक पहुँचते-पहुँचते वह परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने और उन पर विजय की राह दिखा जाते हैं ताकि वह सब कुछ कर पाए जो वह सबके चेहरे पर खुशी लाने के लिए करना चाहता है।
जैसे कि मिश्र जी के गीतों में प्रायः देखने को मिलता है, उनके बिम्ब गूढ़ नहीं हैं बल्कि नितांत देशज परिवेश से आते हैं, इस नवगीत में भी हम वही देख सकते हैं। कुंकुम, देहरी, चाँदनी, डोंगियाँ, झील, गला हुआ लोहा, कागज के घोड़े, जवाकुसुम इत्यादि सभी हमारे आसपास के ही हैं। सभी दिनचर्या में कितने आसान से प्रयोग में आने वाले शब्द हैं। लेकिन जब मिश्र जी अपनी आकर्षक शब्द योजना में उनमें गूढ़ भाव भरते हैं तो वे बहुत ही संतुलित अर्थ में व्यापक बन जाते हैं और अपने से लगने लगते हैं। मिश्र जी गीत लिखते नहीं हैं बल्कि वे एक कुशल कारीगर की भाँति उसे गढ़ते हैं। एक-एक शब्द पर किया गया उनका परिश्रम स्पष्ट दृष्टिगत होता है -
पश्चिम में
     फैल गया
संध्या का कुंकुम।
देहरी पर
     मन होगा
           खिड़की पर तुम।
या
रोज नए सपनों की
     डोंगियाँ फिराता हूँ
           दफ्तर के अंध महासागर में।
प्रहर गए
     रात लौट आता हूँ
           बस खाली हाथ लिए
                अलसाए घर में।
या
घर आऊँ
     देखूँ तब
           ओठों पर खिला
                हुआ जावा कुसुम।
गीत की सरलता और उसका सौन्दर्य पहले पद से ही मुखरित होता है। गीत में शिल्पगत सौन्दर्य की आभा है, संतुलन है, प्रांजलता है, भाव हैं और संवेदना है। मिश्र जी शब्द चयन के प्रति बेहद सजग रहते हैं। उपयुक्त पदों के आगम से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने एक-एक शब्द पर गहन विमर्श किया है। तथापि बिलकुल अंतिम पंक्ति में प्रयुक्त हुआ यहाँ अनावश्यक ही लगता है। और यदि यह पद प्रयोग करने का आग्रह ही हो तो यह खिला के साथ आता - खिला हुआ, तो यह अधिक उपयुक्त होता क्योंकि इसकी तर्क संगति वहीं है। जावाकुसुम में टंकण त्रुटि लगती है क्योंकि पुष्प का नाम जवाकुसुम है।

गुरुवार, 7 जून 2012

आँच – 112- हन्टर बरसाते दिन मई और जून के


आँच – 112-  हन्टर बरसाते दिन मई और जून के
हरीश प्रकाश गुप्त
हिन्दी ब्लाग लेखन में नवगीत विधा में श्री जयकृष्ण तुषार एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे नियमित लिखने वाले रचनाकारों में से एक हैं। उनके नवगीत बहुत प्रभावित करते हैं। उनकी संवेदनशीलता, उनकी अनुभूति एवं उनकी अभिव्यक्ति निसंदेह मर्मशपर्शी है। उनकी दृष्टि बहुत पैनी है जिससे विषय तक उनकी पहुँच सहज और आसान हो जाती है। जब वे अपनी अनुभूति को अभिव्यक्ति में रूपान्तरित करते हैं तो भाषा पर उनका अधिकार रचना को आकर्षक और सम्प्रेषणीय बना देता है।
वैसे तो श्री तुषार राज्य विधि सेवा में अधिकारी हैं, जो पेशा न केवल नीरस माना जाता है बल्कि उनके पेशे को भावनाशून्य और संवेदनाशून्य की संज्ञा भी दी जाती है। ऐसे परिवेश में भी श्री तुषार की सशक्त लेखनी का उदय परिवेश के निविड़ अन्धकार में प्रकाश विन्दु की तरह चमकता दिखाई देता है। उनका संबन्ध प्रदेश की साहित्यिक सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद से है जहाँ से संबन्ध रखने वाले हिन्दी के अनेक विद्वानों, लेखकों और कवियों ने साहित्याकाश में जगमग प्रकाशित किया है। इस परम्परा को प्रतिष्ठित करने में श्री तुषार का योगदान कमतर प्रतीत नहीं होता है।
आँच के इस स्तम्भ में श्री तुषार की रचनाओं पर पहले भी चर्चा होती रही है। आज के अंक में उनकी एक और रचना “हन्टर बरसाते दिन मई और जून के” को लिया जा रहा है। उनका यह नवगीत अभी पिछले माह ही उनके ब्लाग छान्दसिक नवगायन पर प्रकाशित हुआ था। यह नवगीत वर्तमान परिवेश में आम आदमी की आवश्यकता, उसे पूरा करने की जद्दोजहद, खोखली व्यवस्था की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार तथा अन्ततोगत्वा आम आदमी के हाथ लगने वाले निराशाजनक परिणाम का बहुत ही स्वाभाविक सा चित्रण है।   
आज यदि हम आम आदमी की स्थिति को देखें तो यह आर्थिक, सामाजिक और आधिकारिक – सभी मोर्चों पर अत्यन्त दयनीय हो चुकी है। व्यवस्था उसका कोई हित नही कर पा रही है। या यो कहें कि उसमें उसकी हितसिद्धि के प्रति कोई आस्था नहीं हैं तो भी गलत नहीं होगा। एक व्यवस्था जाती है और दूसरी व्यवस्था आती है। व्यवस्थाओं के इस परिवर्तन को बेचारी जनता मूकदर्शक बनी देखती रहती है और स्वयं को ठगा सा महसूस करती है क्योंकि उसे जो बदलाव चाहिए या उसके लिए जो अपेक्षित है, वह तो हासिल होता नहीं। बस चेहरे मात्र बदल जाते हैं। शीर्ष पर बैठे न्यूनाधिक सभी लोगों के आचरण और संस्कार एक समान हैं अर्थात सत्ता का सुख भोगने के लिए सत्ता का प्रियपात्र बनना और इसमें वे सफल भी रहते हैं। उनके इस उपक्रम में आम जनता उपेक्षित तथा परित्यक्त सी रह जाती है और उसके सुख तिरोहित हो जाते हैं। यह स्थिति अत्यंत त्रासदपूर्ण है। आज भ्रष्टाचार और अनैतिकता, दोनों इतने मुखर और व्यापित हो चुके हैं जिससे यह आकलन करना कठिन है कि शुचिता कहाँ है और अनैतिकता कहाँ। जिन्हें जिस कार्य का उत्तरदायित्व दिया गया है वही उसको खोखला करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे और आदर्शों का झूठा आवरण ओढ़े मजे लूट रहे हैं। अतः उन पर विश्वास करना कठिन है।
आम आदमी को दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। बावजूद इसके, उसे अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना है, चाहे जैसे करे। हँसना उसकी नियति से तो रूठ ही गया है। जिसके पास शक्ति है, ताकत है वही उसका नियंता है। ताकत के भयवश उसका निर्णय, उसका आदेश मजबूरन शिरोधार्य होता है, चाहे सही हो या गलत। इस क्रम में कभी-कभी उसे अपने जीवन की आहुति भी देनी पड़ती है। जब उसके नियंताओं का चरित्र ही इतना कलुषित है तो वह किससे उम्मीद की आस लगाए। कभी वह भविष्य में आशाओं का बिम्ब देखता है तो कभी यथार्थ उसकी आशाएँ छीन उसे चिन्तित कर देता है। उसकी स्थिति परेशानियों से उबर पाने की नहीं बल्कि उन्हीं में और डूबते उतराते रहने की है और यही उसकी नियति है।  
श्री तुषार का यह नवगीत बहुत हृदयस्पर्शी है जो आम आदमी की पीड़ा को मौलिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है।गीत की शब्दयोजना विषयानुकूल है। प्रांजलता इसकी विशिष्टता है। यदि एक-दो स्थानों को छोड़ दें तो यह आद्योपांत सुन्दर बन गई है। उन्होंने इस नवगीत को नवीन बिम्बों में पिरोया है जो न केवल पद में स्वाभाविक अर्थ भरते हैं बल्कि उसे मार्मिक भी बनाते हैं। जब वह व्यवस्था के भ्रष्ट होने और उसके आदर्श का अवलम्ब लेने की बात कहते हैं तो बात सहजता और सरलता से सम्प्रेषित हो जाती है, देखें –
मूर्ति के
उपासक ही
मूरत के चोर हुए
बापू के
चित्र टाँग
दफ्तर घूसखोर हुए
इसी प्रकार, साधन विहीन होने के बावजूद उत्तरदायित्वों के निर्वाह के प्रति प्रतिबद्धता कवि की सामर्थ्य को दर्शाती है –
हाँफ रही
गौरय्या
चोंच नहीं दाना है,
इस पर भी
मौसम का
गीत इसे गाना है
भविष्य की आशाओं और वर्तमान की चिन्ताओं का चित्रण –
जेठ की
दुपहरी में
सोचते आषाढ़ की,
सूखे की चिंता में
कभी रहे बाढ़ की
व्यवस्था परिवर्तन के बावजूद कुछ भी न बदलने, सब कुछ वैसा ही रहने की पीड़ा शब्दों की सीमा में अभिव्यक्त हुई है –
आचरण
नही बदले
बस हुए तबादले
जनता के
उत्पीड़क
राजा के लाडले
आम आदमी का परेशानियों से निजात न पाना, बल्कि दूसरों द्वारा उन परेशानियों के और गहराए जाने की वेदना मर्माहत करने वाली है -
खुजलाती
पीठं पर
कब्जे नाखून के।
कवि ने जनता के उपेक्षित और त्याज्य होने के अर्थ में जो बिम्ब कटे हुए/बाल हुए/ हम सब सैलून के प्रयोग किया है वह न केवल अभिनव है बल्कि पूरे अर्थ को उद्घाटित करता है। हालाकि इसमें हुए की पुनरावृत्ति कुछ भ्रमित करती है। यहाँ यदि इस पुनरावृत्ति से बचा जाता तो पंक्ति उत्तम हो सकती थी। इसी प्रकार, दूसरे पद में सूखे की/ चिंता में/ कभी रहें बाढ़ की में रहें अर्थ के प्रवाह और उसकी दिशा में बाधक है। तीसरे पद में दौरे हैं रोज/ हनीमून के  में पंक्ति विभाजन दौरे हैं के पश्चात होता तो उपयुक्त होता - दौरे हैं/ रोज हनीमून के। इसी प्रकार चौथे पद में अन्त्यानुप्रास की परवाह किए बिना यदि नहीं बदले के स्थान पर बदले नहीं करते हैं तो इससे बदले पर जो बलाघात आता है वह अर्थ को द्विगुणित करता है। पूरे नवगीत में एक बिम्ब बिलकुल अलग-थलग प्रतीत होता – भिक्षुक को आते हैं सपने परचून के। यह गीत की भावभूमि से संगतता पाने में असमर्थ है। बावजूद इसके यह नवगीत बहुत आकर्षक है।
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गुरुवार, 31 मई 2012

आँच – 111 पर – बन जाना


आँच – 111
आँच – 111 पर – बन जाना
हरीश प्रकाश गुप्त

     रमाकांत सिंह छत्तीसगढ़ के अकलतरा से हैं। पेशे से शिक्षक हैं। उनका एक ब्लाग है जरूरत, जिसमें वह नियमित रूप से अपनी कविताएँ पोस्ट करते रहते हैं। उनकी समस्त कविताओं में सम्वेदना है। भावनाएँ भी हैं, आशा भी है और पीड़ा की अनुभूति भी है जिसे यथार्थ के धरातल पर परखा जा सकता है। अभी हाल ही में, पिछले माह, इस ब्लाग पर उनकी एक कविता प्रकाशित हुई थी बन जाना। जीवन की कठिन राह में आशा और स्फूर्ति का संचार करती और संघर्षों पर विजय पाती यह कविता प्रेरक है। उनके अनुसार उन्होंने यह कविता अपनी बहन को उसके जन्मदिन पर समर्पित की थी। सोद्देश्य लिखी गई यह कविता वैसे तो वैयक्तिक है परंतु यह व्यक्तिनिष्ठता की परिधि से बाहर भी व्यापक अर्थ रखती है और यहाँ इसके प्रभाव को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। उनकी यह छोटी सी कविता आज की आँच का विषय है।

     जीवन की डगर बहुत लम्बी है और कठिन भी है और इन्हीं कठिन रास्तों से होकर सभी को जाना है। बड़े लक्ष्यों को हासिल करने के रास्ते कभी आसान नहीं हुआ करते। ये कठिन रास्ते पग-पग पर हमारे लिए मुश्किलें खड़ी करते है, चुनौतियाँ देते हैं और हमारी परीक्षा लेते हैं। कभी-कभी ये इतने दुष्कर और दुरूह होते हैं और हमको इतना विचलित कर देते हैं कि लक्ष्य से भटकाव की स्थिति आ जाती है। लक्ष्यों के प्रति जीवन का यह संघर्ष हमारी नियति है क्योंकि हम इनसे मुँह नहीं मोड़ सकते। तब हमारी मनःस्थिति ही हमारा मार्गदर्शन करती है। लक्ष्य के प्रति निष्ठा और समर्पण तथा मानसिक दृढ़ता (धैर्य) ही हमारा सम्बल होती है। यदि हमारे लक्ष्य स्पष्ट हैं तो कोई भी बाधा क्यों न आए हमें लक्ष्य से कोई डिगा नहीं सकता, सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। बस हमें स्वयं को इतना मजबूत और दृढ़प्रतिज्ञ बनाने की आवश्यकता है। इस भावभूमि पर रचित रमाकांत की यह कविता बन जाना प्रेरक संदेश से परिपूर्ण है।

     यदि कविता के शिल्प पर दृष्टिपात करें तो कुछ-एक प्रयोगों को छोड़कर यह हमें बहुत आकर्षित नहीं करती। कविता में आठ-छह-दो, कुल सोलह पंक्तियाँ हैं। हो सकता है कि कवि ने इन्हें आठ-आठ के संयोजन में लिखा हो और टंकण त्रुटि से आठ-छह-दो में विभक्त हो गईं हों। पूरी कविता में असमान मात्राएँ - बीस से लेकर छब्बीस तक हैं। इसीलिए अधिकाँश स्थानों पर न लय बन पाई है और न ही प्रवाह और यह पद्यांश गीत तथा कविता के बीच भटक सा गया है। कहीं पर उद्देश्य का भी लोप है जो अर्थान्वेषण में बाधक बनता है जैसे - तू भी बन जाना, हाथों को थाम के,  तू भी बन जाना, हर सुबह शाम से और तू भी बन जाना, कर्मों को बांध के और हम फिर सदा मिलेंगे, पर चेहरे अनजान से आदि। यदि यहाँ प्रश्न करें कि क्या?” तो उत्तर में न कोई बिम्ब है और न ही कोई प्रतीक जो अर्थ को संगति प्रदान करे। इन्हीं पंक्तियों में मात्राओं की सबसे अधिक कमी है, अर्थात 20-21 ही हैं जो स्वयमेव अपनी आवश्यकता को पुष्ट करती हैं। यहाँ कवि स्वयं दिग्भ्रमित सा लगता है। डगर स्त्रीवाची  है जबकि कविता में पुल्लिंग प्रयोग हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि के मानस में तो इसकी स्पष्ट प्रतीति है लेकिन शब्दों में यह अभिव्यक्त नहीं हो सकी है। अतः पाठक के स्तर पर अस्पष्टता है।

     जीवन में सफलता के संदेश का भाव समेटे रमाकांत की इस छोटी सी कविता के भाव में सहजता है और व्यापकता है साथ ही यह संवेदित भी करती है तथापि इसे शिल्प की कसौटी पर और कसे जाने की आवश्यकता है।

गुरुवार, 17 मई 2012

आँच- 109 – नेह भर सींचो


आँच- 109
 नेह भर सींचो कि मैं अविराम जीवन-राग दूँगा
-    हरीश प्रकाश गुप्त

प्रतिभा सक्सेना जी कैलीफोर्निया में रहती हैं। अध्ययन में रुचि रखती हैं, अध्यापन उनका व्यवसाय है और लेखन उनका संस्कार है। उनका एक ब्लाग है शिप्रा की लहरें जिसमें वह नियमित रूप से अपनी कविताएं प्रकाशित करती रहती हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने अपने ब्लाग पर एक गीत नेह भर सींचो पोस्ट किया था। यह गीत एक प्रकार से प्रकृति, पर्यावरण को समर्पित है जिसमें एक वृक्ष को प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर उसकी अन्तरात्मा को अभिव्यक्ति प्रदान की है। सुन्दर शब्द योजना में पिरोया उनका यह गीत आज की आँच की चर्चा की विषयवस्तु है।
       वृक्ष का जीवन सर्वस्व त्याग और तपस्या का पूरक है। उसका सम्पूर्ण जीवन परोपकार हेतु समर्पित है। वह स्वयं तो अनेकानेक कठिनाईयों का सामना करता है, भिन्न-भिन्न मौसमों में शीत और ताप बर्दाश्त करता है, प्राकृतिक आपदाओं को सहता है, फिर भी वह अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होता है। परहित उसका धर्म है। दूसरों के सुख के लिए उनके हिस्से के कष्ट अंगीकार कर लेना उसका व्रत है, जिसका वह आजन्म पालन करता है, भले ही इस हेतु उसके अपने प्राणों को संकट ही क्यों न उत्पन्न हो जाए। वृक्ष केवल पशु-पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के ही शरणस्थल मात्र नहीं हैं बल्कि मनुष्यों के भी नीड़-निर्माण के अपरिहार्य तत्व हैं। एक तरफ बड़े आकार और स्थूल प्रकार के वृक्ष हैं जो अपनी विशालता से अचम्भित करते हैं तो वहीं छोटे-छोटे विविध प्रकार के पौधे और बलखाती तन्वी लताएँ आकर्षित करते हैं। अपने नाना प्रकार के रंगबिरंगे रूपों में प्रकट होकर वे न केवल प्रकृति पटल पर सुन्दर दृश्य उपस्थित करते हैं बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उन्होंने इस भू-लोक को समस्त रंगों से सराबोर किया है। पक्षियों के कलरव और पवन के साथ मिलकर उनका रचा संगीत जीवन की नीरसता को भंगकर उसे सरस और आनन्दमय बनाता है। पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीवों को फल-फूल-अन्न के रूप में भोजनादि के साथ-साथ प्राणवायु और अमूल्य औषधियाँ प्रदानकर उनके जीवन का आधार बने हैं। इसी प्रकार वे स्वयं की पूर्णाहुति भी देते रहते है।
     इस गीत में जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वह है मूक वृक्ष का मानवीकरण और उसकी संवेदना जिसे कवयित्री ने बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी है। वृक्ष की आकांक्षा मानवजाति के जीवन को सुखद तथा शान्ति से परिपूर्ण अर्थात स्वर्ग बनाने की है और वह इसके लिए प्राणपण से प्रतिबद्ध भी है - स्वर्ग सम वसुधा बने, सुख-शान्ति-श्री से पूर दूँगा। इस हेतु उसकी चाहत मानवजाति से प्रेम पाने की है। जब वह कहता है कि - नेह भर सींचो कि मैं अविराम जीवन-राग दूँगा या स्वयं गरल पीकर प्राणवायु देने को उद्दत होने में त्याग का उत्कर्ष - मैं प्रदूषण का गरल पी, स्वच्छ कर वातावरण को / कलुष पी पल्लवकरों से प्राण वायु बिखेर दूँगा या शिथिल पड़ रहे जीवन बन्धनों या अवरोधों को रोक लेने की अटूट आस्था  - मूल के दृढ़ बाँधनों में खंडनों को कर विफल इन टूट गिरते पर्वतों को रोक कर फिर जोड़ लूँगा या जीवन को सुगम बनाने के लिए बाधाओं को दूर करने का अटल विश्वास - पास आते मरुथलों को और दूर सकेल दूँगा - तो उसकी प्रतिबद्धता में विश्वास भी प्रकट होता है और आश्वस्त करने का भाव भी और इसकी गूँज पंक्ति-दर-पंक्ति पूरे गीत में ध्वनित होती है। गीत का यह उदात्त भाव मोहक है और अत्यंत हदयस्पर्शी भी है। वृक्ष के माध्यम से कवयित्री द्वारा अभिव्यक्त असीम विश्वास के साथ प्रतिबद्धता और स्पृहा बहुत ही प्रेरणास्पद है। 
     मनोहारी भावभूमि पर प्रतिभा जी द्वारा रचित इस गीत का भाव पक्ष बहुत सशक्त है और प्रतिभा जी ने इसे अपनी समर्थ कलम-तूलिका से शब्द रूप देने का भरसक प्रयास किया है। उनका शब्दकोश इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। अधिकांश स्थानों पर उनकी शब्द-योजना बहुत ही आकर्षक बन गई है और वहाँ निर्दोष प्रांजलता ने गीत के सौन्दर्य में वृद्धि की है या इसे यों कहें कि यह सम्मोहक बन गई है तो अतिशयोक्ति न होगा। जैसे - 
रूप नटवर धार करते कुंज-वन में वेणु-वादन  
जल प्रलय वट- पत्र पर विश्राम रत हो सृष्टि-शिशु बन
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हरित-वसना धरा को कर, पुष्प फल मधुपर्क धर कर
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लताओं को बाहुओँ में साधकर गलहार डाले,
पुष्पिता रोमांचिता तनु देह जतनों से सँभाले,
रंग  दीर्घाएँ करूँ जीवंत  अंकित कूँचियाँ  भर,
स्वर्ग सम वसुधा बने, सुख-शान्ति-श्री से पूर दूँगा
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तंतु के शत कर पसारे, उर्वरा के कण सँवारे,
 नेह भीगे  बाहुओं से थाम कर तृणमूल सारे
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            स्वाभाविक सौन्दर्य से परिपूर्ण इस गीत की रचना निसन्देह है तथापि एकाधिक स्थानों पर प्रवाह में अवरोध उत्पन्न हुए हैं। जलद-मालायें खिंचें, आ मंद्र मेघ-मल्हार गायें में खिंचे से स्वतंत्र प्रवाह में रुकावट आती है, बदलते इन मौसमों का शीत-ताप स्वयं वहन कर में बदलते का ते अवरोधक है, “ वृक्ष हूँ मैं व्रती, पर-हित देह भी अर्पण करूँगा में भी नाहक है,  “प्राण के पन से भरूँगा जो कि माटी से लिया ऋण  में जो कि से,  मैं कृती हूँ, नेह से भर,  सदा आशिर्वाद दूँगा! में आशिर्वाद  की वर्तनी भी दोषपूर्ण है और इससे प्रवाह में बाधा भी उत्पन्न हुई है। यदि यह पंक्ति कुछ इस तरह - कृती हूँ, निज नेह से भर  मैं सदा आशीष दूँगा ! - होती तो बेहतर विकल्प हो सकता था। इसी प्रकार अन्य स्थानों पर भी संशोधन की आवश्यकता है। गीत में कई स्थानों पर सर्वनाम प्रयोग में आए हैं। गीत में अव्ययों की भी अधिकता है। कि’, जो’, ‘भी’, ‘जोकि’, का’, ‘को’, ‘में, मैं’, ‘तुम्हारा आदि का प्रयोग गीत की पहली ही पंक्ति से है। श्रेष्ठ काव्य में अव्ययों और सर्वनाम के प्रयोग से प्रायः बचा जाना चाहिए। इनसे उत्पन्न रिक्त स्थानों पर सार्थक पदों का प्रयोग उत्तम काव्य की रचना में सहायक होता है। गीत में प्रयुक्त सकेल शब्द की उपयुक्तता पर काफी चर्चा हुई है। ढकेल का भी सुझाव आया है। जहाँ तक सकेल के प्रयोग की बात है तो यह कोमल और श्रुति-मधुर अवश्य है परन्तु यह नितांत देशज शब्द शेष गीत की शब्द-योजना में सुसंगत नहीं बैठता। इसी तरह ढकेल अधिक कर्णकटु है। धकेल में शक्ति का आगम भी है और ढकेल की अपेक्षा कम कर्णकटु, अतः यहाँ धकेल की तुलना में अधिक उपयुक्त हो सकता था। वैसे भी, इस गीत में रेफ, ण, भ, ध व घ आदि वर्ण कई बार प्रयोग में आए हैं जो कठोर ध्वनियाँ मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त गीत की तीसरी, 8वीं, 16वीं, 17वीं, 18वीं, और 25वीं पंक्ति में मात्राएँ असमान अर्थात क्रमशः 29, 30, 26, 30, 29, तथा 29 हैं जबकि शेष गीत में 28-28 बराबर मात्राएँ हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये वही पंक्तियाँ हैं जिनमें प्रांजलता में दोष उत्पन्न हुआ है। यदि चौथी पंक्ति में पंक्षियों की कर दिया जाए तो मात्रा दोष भी समाप्त हो जाता है और प्रवाह भी उत्तम बन जाता है। आठवीं पंक्ति में का दो बार प्रयोग हुआ है। यह टंकण त्रुटि है। इस गीत में ये दोष कवयित्री की शिल्प के प्रति शिथिलता को दर्शाते हैं। अतः स्पष्ट है कि कवयित्री द्वारा यदि यहाँ सजगता बरती जाती तो यह गीत पूर्णतया निर्दोष हो सकता था। यहाँ प्रस्तुत सुझाव मेरे मात्र निजी विचार हैं, अतएव प्रत्येक पाठक का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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