सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-3
10.4
फ़ना और बक़ा की अवस्था
फ़ना और बक़ा की स्थिति को लेकर सूफ़ी एकमत नहीं है। कुछ लोग ‘फ़ना’ को साधक की अंतिम मंजिल मानते है। बहुत से हैं जो ‘बक़ा’ को चरम लक्ष्य मानते हैं। फ़ना की अवस्था
में साधक सांसारिक प्रपंचों से दूर होकर अपने अस्तित्व को ईश्वर में लय कर लेता
है। फ़ना की व्याख्या करते हुए प्रसिद्ध प्राच्यविद् रेनॉलड ए. निकोल्सन ने कहा है कि “फ़ना आत्मा की वह उर्ध्वगति है, जब उसकी सारी आकांक्षाएँ, सभी स्वार्थ, सांसारिक मोह-माया नष्ट हो जाता है। और इस
प्रकार जब वह स्व-चिन्तन से विरत हो जाता है, तब वह स्वयं परम प्रियतम की चिन्ता का विषय
बन जाता है। प्रेम और प्रेमाराध्य के बीच ऐक्य स्थापित हो जाता है।” अहं को मिटा कर फ़ना की प्राप्ति होती है। इसके बाद
बक़ा का आरम्भ होता है जिसके बाद आत्मा परमात्मा से एकमेक हो जाता है। तो हम कह
सकते हैं कि वास्तविक अस्तित्व का आरंभ फ़ना के बाद होता है।
प्रसिद्ध सूफी संत हजरत अली हुज्वेरी (दाता गंज बख्श) ने अपनी प्रसिद्ध फारसी पुस्तक कश्फ अल-महजुब में
'फना' (अस्तित्व का मिटना) और 'बका' (दिव्य रूप में बने रहना) को भौतिकवादी सोच
से हटकर तौहीद (ईश्वर की एकता) के संदर्भ में परिभाषित किया है। सूफ़ी साधक हज़रत हुज्वेरी का मानना है
कि “जो मानते हैं
कि
फ़ना का अर्थ सत्ता
और इस मनुष्य शरीर का नष्ट होना है, वे भूल करते हैं। उसी प्रकार से यह समझना
ग़लत है कि बक़ा की स्थिति में परमात्मा मनुष्य में निवास करने लगता है। फ़ना का वास्तविक
मतलब यह है कि त्रुटियों के प्रति मनुष्य सचेतन हो जाता है, और उसकी चाहना से विरत हो जाता है। वह
परमात्मा की नित्य इच्छा का अंग बन जाता है। यह बिल्कुल नामुमकिन है कि परमात्मा
के गुण मनुष्य के गुण बन जायें अथवा परमात्मा के गुण मनुष्य में आ जाए।” हुज्वेरी
स्पष्ट करते हैं कि फ़ना का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मानव शरीर या जीवात्मा का
नाश हो जाता है, या परमात्मा के गुण मनुष्य के गुण बन जाते
हैं। इसका अर्थ अपनी इच्छाओं,
अहंकार (नफ्स) और 'दूसरों की याद' (यानी दुनिया व खुद के अस्तित्व के घमंड) का पूरी तरह समाप्त हो जाना
है। इसका वास्तविक अर्थ इंसान का अपनी गलतियों को समझना और खुद को अपनी स्वार्थी
इच्छाओं से दूर करना है। यह साधक के अहंकार और व्यक्तिगत स्व के त्याग की वह
अवस्था है जहाँ वह पूरी तरह ईश्वरीय चेतना व चिंतन से जुड़ता है। फना की अवस्था
में साधक यह जान लेता है कि वह पूरी तरह अल्लाह के अधीन और असहाय है। हज़रत अली
हुज्वेरी (दाता गंज बख्श) के अनुसार, फ़ना
और बक़ा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब साधक की अपनी इच्छाएं और अहंकार नष्ट
(फ़ना) हो जाते हैं, तब वह ईश्वरीय गुणों और इच्छाओं के साथ
जीवित (बक़ा) रहता है। इसका अर्थ अपने 'स्व' (Self) को मिटाकर ईश्वर के अस्तित्व में खुद को
हमेशा के लिए स्थापित कर लेना है। इस अवस्था में साधक के सभी कर्म विशुद्ध रूप से
ईश्वर की इच्छा के अधीन हो जाते हैं। बका का वास्तविक अर्थ ईश्वर की उपस्थिति में
हमेशा बने रहना और 'अल्लाह की याद' का साधक के भीतर हमेशा जीवित रहना है। बका का मतलब यह नहीं कि इंसान
का भौतिक शरीर खत्म हो जाए,
बल्कि इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने
मानवीय गुणों के अहंकार को मारकर ईश्वर की मर्जी के सामने पूरी तरह समर्पित (रजा)
हो जाता है। हजरत हुज्वेरी ने स्पष्ट किया कि जो लोग यह मानते हैं कि फना में
इंसान का मूल अस्तित्व सचमुच नष्ट हो जाता है या वह ईश्वर के साथ भौतिक रूप से एक
(अभेद) हो जाता है, वे गलतफहमी में हैं। वास्तविक फना और बका
केवल ईश्वर के आदेशों के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी सत्ता को सच्चे दिल से
स्वीकार करने का नाम है। इमाम जुनैद बगदादी जैसे महान सूफी संतों के अनुसार, यात्रा 'फ़ना' पर समाप्त नहीं होती; 'फ़ना' सीढ़ी है और 'बक़ा' वास्तविक दिव्यता में स्थिति है।
सूफ़ी साधक जब आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए सारे कलुष
और इच्छाओं से परे हो जाता है, उसका आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है, इसे ही फ़ना कहते हैं। इस समय अहं की चेतना नहीं रह
जाती। अपने-पराये का भाव मिट जाता है। उसे न सुख की चिंता रहती है, न दुःख की। सारी वासनाओं, सारी आकांक्षाओं का अवसान हो जाता है। वह मस्तमौला हो
जाता है। इन्द्रियगत विषयों से वह परे हो जाता है। वह सर्वव्यापक सता में विलीन
होकर उसका अंग बन जाता है। फ़ना की अवस्था में न प्रेम के लिए स्थान है, न घृणा के लिए। स्वात्म-ज्ञान का तिरोहित होना फ़ना
कहलाता है। इस समय सभी वासनाएं मन से मिट जाती हैं। समस्त चैतन्य शक्ति निष्क्रिय
हो जाती है। फ़ना की अंतिम अवस्था में फ़ना की प्राप्ति का ज्ञान भी चला जाता है। इस
अवस्था को ‘फ़ना अल-फ़ना’ कहते हैं। जब साधक अपने अहंकार और अस्तित्व के
विसर्जन (फ़ना) के अहसास से भी मुक्त हो जाता है। उसकी जिह्वा पर केवल परमात्मा का नाम रहता
है और वह विनम्र और दीन हो जाता है। यह अद्वैत और दिव्यता में
निरंतरता या स्थिरता की अगली अवस्था यानी 'बक़ा' का मार्ग प्रशस्त करती है।
बक़ा
की अवस्था इसके बाद
शुरू होती है। इस अवस्था में आत्मा परमात्मा में वास करने लगती है। उसके साथ एकमेक
होकर रहती है। इसमें न संयोग का ज्ञान रहता है न वियोग का। यह परमात्मा के स्मरण
में की स्थिति है। जिसकी इच्छाओं का सम्पूर्ण निरसन हो जाता है, वह परमात्मा की इच्छाओं से परिचालित होता है। यह वर्षा
की बूँद के सामान है, जो समुद्र गिर जाता है, तो वह विनिष्ट नहीं होता, लेकिन उसका अस्तित्व नहीं रह जाता। साधक के ह्रदय में
परमात्मा नहीं प्रवेश करता बल्कि परमात्मा के प्रति साधक का विश्वास, परमात्मा के एकत्व के प्रति उसकी आस्था और परमात्मा के
स्मरण के प्रति उसकी श्रद्धा का ही उसके ह्रदय में प्रवेश होता है। इसीलिए सूफ़ी ‘हुलूल’ (अवतरण, परमात्मा की सत्ता {ज़ात} द्वारा साधक
में किसी प्रकार का परिवर्तन लाना) और ‘इत्तेहाद’ (सायुज्ज, मनुष्य के और परमात्मा के
स्वभाव में सादृश्य हो जाना) में विश्वास नहीं रखते। मुख्यधारा और प्रमाणिक सूफी इमामों (जैसे
अल-कुशैरी, इमाम गजाली और अब्दुल कादिर जीलानी) के
अनुसार, 'हुलूल' (ईश्वर का किसी वस्तु या शरीर में
समाना/अवतार) और 'इत्तेहाद' (मानव का ईश्वर के साथ पूरी तरह एक हो जाना
या विलीन होना) को
गलत और भ्रामक विश्वास माना गया है। उनका मानना है कि यह इस्लाम के ख़िलाफ़ है। इसलिए यह समझना ग़लत होगा कि फ़ना
का मतलब सत्ता और इस मनुष्य शरीर का नष्ट होना है। यह भी समझना ग़लत होगा कि बक़ा की
स्थिति में परमात्मा मनुष्य में वास करने लगता है। अल-गजाली की या
अब्दुल कादिर जीलानी की रचनाओं में इन भ्रामक विचारों का कोई स्थान नहीं है। मंसूर
अल-हल्लाज जैसे कुछ आरंभिक रहस्यवादियों के वचनों ("अनल हक") को
अल-इत्तेहाद या हुलूल से जोड़कर देखा गया, लेकिन अधिकांश पारंपरिक सूफी संतों ने ऐसी भाषा और विचारों को
अस्वीकार किया। बाद के काल में इब्न अरबी द्वारा प्रतिपादित 'वहदत अल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) को भी कई बार बाहरी लोगों ने हुलूल समझ लिया, हालांकि सूफी विद्वान इसमें अंतर करते हैं।
फ़ना
का वास्तविक मतलब यह है कि
अपनी गलतियों के प्रति मनुष्य सचेतन हो जाता है। जब कोई अपनी इच्छा से परे हो जाता
है, तो वह परमात्मा की नित्य इच्छा का अंग बन जाता है।
परमात्मा के गुण मनुष्य के गुण बन जाएं या परमात्मा के गुण मनुष्य में आ जाएं यह
बिलकुल नामुमकिन है। परमात्मा की ज़ात (सत्ता) और सिफ़त (गुण) भिन्न
होते हैं। साधक का अपने गुणों से परे होकर परमात्मा के गुणों में प्रविष्ट होने का
मतलब यह है कि मनुष्य अपनी इच्छा-शक्ति से परे होकर परमात्मा की इच्छा-शक्ति में
प्रविष्ट होता है। साधक जानता है कि परमात्मा ही उसकी इच्छा-शक्ति का कारण है।
साधक के ह्रदय में परमात्मा नहीं प्रवेश करता, बल्कि परमात्मा के प्रति साधक का विश्वास, परमात्मा के एकत्व के प्रति उसकी आस्था और परमात्मा के
स्मरण के प्रति उसकी श्रद्धा का ही उसके ह्रदय में प्रवेश होता है। अधिकांश स्थापित सूफी यह मानते हैं कि केवल
फना में खो जाना अधूरा है;
असली पूर्णता 'बक़ा' में है जहाँ साधक होश में रहकर ईश्वर की इच्छा को दुनिया में पूरा
करता है।
10.5
परमात्मा के साथ एकत्व प्राप्त करना
सूफ़ियों के लिए परमात्मा के साथ एकत्व प्राप्त करना ही
साधक का लक्ष्य होता है। हज़रत जामी ने इस एकत्व प्राप्ति की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य अपने हृदय
को इतना पवित्र बना ले कि उसे परमात्मा के सिवा किसी अन्य का ध्यान न रहे, यही एकत्व की स्थिति है। और इस एकत्व को प्राप्त करने
के लिए सालिक (साधक) को मारिफ़ (परमात्मा का ज्ञान) प्राप्त करना
होता है जिसके लिए उसे अनेक मंजिलों से गुजरना पड़ता है। प्रायः सूफ़ी साधक सात मंजिलों
को पार करने की बात करते हैं, जो निम्न लिखित हैं –
उबुदियत : इस अवस्था में साधक अपने हृदय को पवित्र करता है। 'उबुदियत' का अर्थ ईश्वर के प्रति पूर्ण दासता, विनम्रता और सच्ची बंदगी (भक्ति) है। यह साधना की वह अवस्था है जहाँ
साधक (बंदा) स्वर्ग के लालच या नरक के डर के बिना, केवल अपने अहंकार को मिटाकर खुद को पूरी तरह अल्लाह की इच्छा के प्रति
समर्पित कर देता है।
इश्क़ : इस अवस्था में परमात्मा का प्रेम साधक के हृदय में
जाग्रत हो जाता है। सूफीमत
में 'इश्क़' केवल कोई साधारण भावना नहीं है, बल्कि यह वह दिव्य प्रेम है जिसके जरिए इंसान अपनी आत्मा को परमात्मा
(अल्लाह) से जोड़ता है। यह अहंकार को मिटाकर प्रेमी (आशिक) और प्रियतम (माशूक) के
बीच की दूरी को खत्म करने वाला परम साधन है।
ज़ुहद : इस अवस्था में साधक के मन से सांसारिक इच्छाओं का अवसान
हो जाता है। अपने
भीतर के लोभ, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ को हराना और नफ्स (अहंप्रवृत्ति) पर काबू पाना है
है।
मारिफ़त : सूफ़ीमत
में मारिफ़त का अर्थ ईश्वर का आंतरिक और अनुभवात्मक ज्ञान है। इसमें साधक परमात्मा के गुण, स्वभाव, कर्म आदि का ध्यान करता है। यह केवल किताबों से मिलने वाली जानकारी
नहीं है, बल्कि दिल से महसूस किया गया वह दिव्य सत्य
है, जहाँ साधक परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को
पहचान लेता है। यह
तर्क या बुद्धि से परे हृदय की सीधी अनुभूति है।
वज्द : सूफीमत में 'वज्द' ईश्वर के प्रेम में डूबी वह आत्मिक और
भावाविष्टावस्था (परमानंद) है,
जो साधक के हृदय पर अचानक प्रगट
होती है। इस स्थिति में व्यक्ति को दिव्य ज्ञान या परमात्मा की उपस्थिति का ऐसा
तीव्र अनुभव होता है कि वह बाहरी दुनिया और खुद की सुध-बुध खो बैठता है।
हक़ीक़त : सूफीमत में 'हक़ीक़त' का अर्थ परम सत्य या अंतिम वास्तविकता
(ईश्वर) है। इसमें साधक को
परमात्मा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाता है और वह पूर्ण रूप से परमात्मा पर निर्भर
हो जाता है। यह सूफी साधना का वह सर्वोच्च आंतरिक चरण है जहाँ साधक
बाहरी कर्मकांडों और मानसिक भ्रमों से ऊपर उठकर सीधे दिव्य सार और ईश्वर के स्वरूप
का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करता है।
वस्ल : सूफीमत में 'वस्ल' का शाब्दिक और अध्यात्मिक अर्थ परमात्मा (माशूक) के साथ जीवात्मा
(आशिक) का मिलन है। इसमें साधक परमात्मा का साक्षात्कार करता है। फ़ना और बक़ा से पहले की यही मंजिल
है। यह सूफी साधना की वह परम अवस्था है जहाँ साधक अपने इष्ट या खुदा
की दिव्यता का प्रत्यक्ष अनुभव करता है।
इन सब में परमात्मा को पाने की सबसे बड़ी सीढी परमात्मा
से प्रेम (इश्क़) है। इसीलिए सूफ़ी साधकों ने प्रेम को बहुत महत्त्वपूर्ण
माना है। प्रेम कब और कैसे सम्भव है इसे हज़रत रूमी ने एक मसनवी में बहुत
खूबसूरती से बयान किया है। एक बार परमात्मा के दरवाज़े पर साधक ने दस्तक दी। भीतर
से आवाज़ आई “कौन है?” उस साधक ने जवाब
दिया “मैं हूँ।” भीतर से फिर आवाज़ आई “इस घर में तेरे और मेरे, दोनों के लिए
स्थान नहीं है।” साधक चला गया
उसने एकान्त सेवा की, प्रार्थना की
और वापस आकर दरवाज़ा खटखटाया। भीतर से आवाज़ आई कौन है? साधक रूपी
प्रेमी ने उत्तर दिया “तू है।” तब दरवाज़ा खुल गया अर्थात जब तक “मैं” और “तू” का भेद बना है, तब तक प्रेम
सम्भव नहीं है। इसलिए हज़रत
अल–कुरेशी का कहना है कि “सच्चे प्रेम
का मतलब है कि तुम जिस परम प्रियतम से प्रेम करते हो, उसे सब कुछ, जो तुम्हारे पास है, दे दो; जिससे कि तुम्हारा अपना कहने को कुछ भी न
रह जाए।” प्रेम का यह
एकत्व हज़रत जामी की कविताओं में भी देखने को मिलता है – “मैं वही हूँ जिसे मैं प्यार करता हूँ और जिससे
मैं प्रेम करता हूँ वह मैं ही हूँ। एक ही शरीर में वास करने वाले हम दो प्राण है
अगर तुम मुझे देखते हो, तो तुम उसे देखते हो और अगर तुम उसे देखते
हो तो तुम हम दोनों को देख रहे हो।”
एक तरह से यह भारत का एकेश्वरवाद/अद्वैतवाद ही है। हज़रत
इब्ने-अरबी का विचार है कि ब्रह्मांड की संरचना के पहले सिर्फ़ ईश्वर का
अस्तित्व था। उन्होंने ही ब्रह्मांड की संरचना की। सूफ़ियों की एक कहावत है – यह संसार ईश्वर
है, हालांकि ईश्वर संसार नहीं है। संसार ईश्वर है, इस अर्थ में कि संसार में जो
कुछ भी वास्तविक अस्तित्व या सौंदर्य दिखाई देता है, वह असल में
ईश्वर के गुणों की ही झलक या प्रकटीकरण है। ईश्वर से अलग इस जगत का कोई स्वतंत्र
और परम अस्तित्व नहीं है। ईश्वर संसार नहीं है, इस अर्थ में कि ईश्वर अपनी
असीमित, अनन्त और पवित्र सार-सत्ता में इस नश्वर, सीमित और रूप
बदलने वाले संसार से कहीं बढ़कर है। संसार उसका पूरा सार या संपूर्णता नहीं है, बल्कि वह संसार
से परे भी है।
वह सत्य तो है, लेकिन वही
एकमात्र सत्य नहीं है। उनका विचार है
कि ईश्वर को न केवल तन्जीह (सबके परे) और न सिर्फ़ तशबीह (सबके
अन्दर) माना जा सकता है। वह दोनों ही है। वह सबसे पहला और सबसे आख़िर है। उसके समान
कोई चीज़ नहीं है और वही सर्व-व्यापी भी है। इसलिए परम सत्य का बयान केवल ऐसे ही
शब्दों में किया जा सकता है जो आपस में विरोधी हों। लेकिन परम सत्य सम्पूर्ण है इसलिए उसका
नियत रूप भी है। ब्रह्मांड का विकास इसी नियत रूप से संबंध रखता है। विश्व का क्रम
निरंतर है। उसमें भी मूल अस्तित्व ईश्वर है। शेष समस्त ब्रह्मांड तअय्युनात
(आयाम) है। मात्र ईश्वर आयाम से परे है। मनुष्य अथवा यह संसार परमात्मा के मस्तिष्क से
उत्पन्न हुआ है। मनुष्य उसके
ज्ञान से उत्पन्न होकर इस संसार में आता है और यहाँ के अनुभव प्राप्त कर फिर उसी
में लौट जाता है। हज़रत अरबी ने
कहा है, “अना अना वा
अन्ता अन्ता (मैं, मैं ही हूँ, और तू, तू ही है)। इसके ज़रिए यह समझाया गया है कि परम सत्य (अल्लाह)
और सृजन (इंसान) अपनी-अपनी असलियत में भिन्न हैं और अद्वैत में भी व्यक्तित्व की
सीमा बनी रहती है। वह अभिव्यक्त होता है, लेकिन वही पदार्थों की ज़ात (सत्ता) नहीं
है। वह शै
(पदार्थ) नहीं है। वह वही है। परमेश्वर विधाता है और इंसान उसका दास है। यह वाक्य
यह याद दिलाता है कि भले ही ईश्वरीय प्रेम कितना भी गहरा हो, निर्माता और
रचना का अंतर कभी समाप्त नहीं होता। सूफी साधना में इंसान (अक्सर 'नफ़्स' या अहंकार) जब
अपनी सीमाओं को समझता है, तब उसे ज्ञान होता है कि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र
सत्ता भगवान से अलग नहीं है, फिर भी "तू, तू है और मैं, मैं हूँ"
कहकर वह अपने विनम्र दास होने को स्वीकार करता है। अद्वैत या एकाकार की स्थिति में
पहुँचकर भी यह गफलत न हो कि इंसान खुद खुदा बन गया है, इसलिए इस भेद
को बनाए रखना ज़रूरी माना गया है।
सृष्टि के विकास क्रम की चर्चा करते हुए वे
कहते हैं कि इसके विकास की पांच अवस्थाएं हैं –
1. पहली अवस्था
को वहदत
(पूर्ण ऐक्य या अद्वैत) कहते हैं। इसमें वाह्य जगत और अंतर्जगत एकाकार होते हैं। इसके
अनुसार ब्रह्मांड और ईश्वर अलग नहीं हैं, बल्कि यह
पूरी दुनिया उसी एक परम सत्य (ईश्वर) की अभिव्यक्ति या उसका रूप है।
2. दूसरी अवस्था
को वहिदियत
कहते हैं। सूफीमत में वहिदियत का अर्थ 'एकता' या 'द्वैत से परे एकात्मकता' का वह स्तर
है जहाँ परम सत्य (ईश्वर) अपनी अनगिनत विशेषताओं और रूपों के साथ प्रकट होता है। इसमें
वह एकत्व टूट जाता है और अंतर्जगत (बुतून) और एकत्व का सामना होता है।
3. तीसरी अवस्था
अहदियत की
होती है। यह अवस्था अनेकत्व में एकत्व की अवस्था होती है। इस अवस्था के अंतर्गत
गुणों (सिफ़ात) में तत्व और तत्व में गुण प्रकट हो जाते हैं। यह ईश्वर की परम
शुद्ध एकता की अवस्था है। यहाँ ईश्वर के अलावा कुछ भी अस्तित्व में नहीं है—न
कोई गुण, न नाम, न कोई सृष्टि।
4. चौथी अवस्था एयान (विचार नाम) की
है। सूफी दर्शन में एयान का अर्थ ईश्वर के ज्ञान में निहित वस्तुओं या
आत्माओं के नियत और स्थिर स्वरूप से है। यह वह अवस्था है जब सृष्टि के
प्रकट होने से पहले ईश्वरीय चेतना में विचारों और संभावनाओं का रूप तय होता है। विचार
नाम सृजन की वह अवस्था है जहाँ रूप या पदार्थ पैदा होने से पहले मानसिक व
वैचारिक सत्य रूप में चीज़ें निर्धारित होती हैं। और
5. पांचवीं
अवस्था अजसाम
(रूप) की अवस्था है। सूफीमत (तसव्वुफ) में अज्साम, 'जिस्म' (शरीर) का बहुवचन है, जिसका अर्थ भौतिक शरीर, स्थूल रूप, आकार या संरचनाएं होता है। ब्रह्मांडीय और आध्यात्मिक सोपान
(तनज्जुलात) में यह वह भौतिक जगत (आलम-ए-अज्साम) है जहाँ दृश्यमान वस्तुएं, जीव और स्थूल पदार्थ आकार लेते हैं।
हज़रत इब्न-उल-अरबी रह. का मानना था कि मनुष्यों, वस्तुओं और जगत
के इस बहुत्व के पीछे एक ही सत्य है। `फुसूस-उल-हिकम’ में बाहरी जगत के
स्वभाव के बारे में बताते हुए वे कहते हैं कि मनुष्य और ख़ुदा का संबंध वस्तु
(पदार्थ/बिंब) और उसकी परछाई का सा है ,
तथा संपूर्ण मानव जीवन एक स्वप्न के
समान मायावी व वास्तविक सत्य से ढँका हुआ है।
हज़रत इब्न अरबी के अनुसार, परम सत्य या मूल
वास्तविकता केवल अल्लाह (ईश्वर) का अस्तित्व है। संपूर्ण ब्रह्मांड और मनुष्य
ईश्वर के नामों और गुणों की एक परछाई या प्रतिबिंब मात्र हैं। जिस प्रकार परछाई का अपना कोई स्वतंत्र
वजूद नहीं होता और वह केवल मूल वस्तु (जिसकी वह परछाई है) के होने से ही दिखती है, उसी प्रकार जीवों और मनुष्यों का अस्तित्व
भी ईश्वर पर ही पूरी तरह निर्भर है। इब्न अरबी यह बार-बार कहते हैं कि यह भौतिक
संसार वैसा नहीं है जैसा ऊपर से दिखता है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि जिस तरह
कोई व्यक्ति सोते समय सपने में सब कुछ वास्तविक अनुभव करता है लेकिन जागने पर उसे
उस सपने की असलियत समझ आती है,
वैसे ही यह जाग्रत दुनिया भी एक 'स्वप्न' जैसी है। उनके अनुसार,
मनुष्य जिस दुनिया को ठोस और
वास्तविक मानता है, वह वास्तव में दिव्य कल्पना (अल-खयाल) का एक स्तर है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि
अल्लाह ने नींद और सपनों को इस दुनिया में इसलिए रखा है ताकि मनुष्य यह समझ सके कि
इस भौतिक जगत के पीछे एक और उच्चतर लोक (आध्यात्मिक यथार्थ) मौजूद है।
हज़रत इब्न-उल-अरबी रह. के मत को
उद्धृत करते हुए एम.एम. शरीफ (हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम फिलासफ़ी) कहते हैं- “वह एक ही अपने
को अनके रूपों में अभिव्यक्त करता है। उसी प्रकार जैसे कोई वस्तु विभिन्न दर्पणों
में अभिव्यक्त होती है। प्रत्येक दर्पण अपनी प्रकृति और क्षमता के अनुसार उस
पदार्थ को प्रतिबिम्ब रूप में अभिव्यक्त करता है। वह एक प्रकाश पुंज की भांति है
जिससे असंख्य प्रकाश की किरणें फूटती हैं अथवा वह उस शक्तिमान समुद्र के समान है
जिसकी सतह पर असंख्य उर्मियां प्रकट और लीन हुआ करती हैं।” सृष्टि ईश्वर
की छाया या दर्पण की तरह है, जिसमें उसके गुण प्रकट होते हैं। इसका अर्थ यह नहीं
कि संसार और ईश्वर एक ही हैं, बल्कि संसार का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, यह दिव्यता पर
ही आधारित है।
हज़रत इब्न-उल-अरबी रह. का कहना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है। सब में
उसी की झलक है। उससे कुछ भी अलग नहीं है। सभी मनुष्य समान हैं। परमात्मा यानी
ईश्वर एवं जीवात्मा दोनों एक हैं। सम्पूर्ण सृष्टि का उद्गम एक ही है और वह उसी की
ओर पलटने वाली है। क़ुरआन के आयत में भी उद्धृत है “हम सब
अल्लाह के ही हैं और हमें उसी की ओर पलटना है” (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन, क़ुरआन, अल-बक़र)।”
कहा गया है कि वह ग़ैब (अदृश्य,
तिरोहण) है। परम सत्य मानवीय इन्द्रियों और साधारण बुद्धि की पहुँच से परे है। इस
ग़ैब को कहीं वाह्य रूप में खोजने की ज़रूरत नहीं है। वह तो सबकी आत्मा में ही मौज़ूद है। इसके चार आयाम
बताए गए हैं –
1.
ईमान-बिल-ग़ैब – अदृश्य पर
विश्वास, सूफीमत और इस्लामी दर्शन के अनुसार ईमान-बिल-ग़ैब का अर्थ
है—"अदृश्य पर विश्वास" या बिना देखे उस परम सत्य (ईश्वर, फरिश्तों और
परलोक) पर अटूट निष्ठा रखना, जो हमारी सामान्य शारीरिक आँखों और इंद्रियों की
पहुँच से बाहर है।
2. तलाशे-ग़ैब – अदृश्य की
खोज, सूफीमत में 'तलाशे-ग़ैब' का अर्थ 'अदृष्य या
गुप्त रहस्य की तलाश' है। 'ग़ैब' वह संसार या सत्य है जो सामान्य आँखों से दिखाई नहीं
देता (अगोचर या पारलौकिक), और 'तलाश' का अर्थ खोज है। सूफी संत इस शब्द का प्रयोग उस परम
सत्य, यानी अल्लाह या दिव्य वास्तविकता की खोज के लिए करते हैं जो भौतिक दुनिया
की आड़ में छिपा हुआ है।
3. इल्म-उल-ग़ैब – अदृश्य का
ज्ञान, सूफीमत (तसव्वुफ़) के अनुसार इल्म-उल-ग़ैब (अदृश्य का
ज्ञान) वह दिव्य और गुप्त ज्ञान है जो सामान्य मानवीय इंद्रियों, बुद्धि या
अनुभवों से परे है। इसका पूर्ण और मौलिक अधिकार केवल ईश्वर (अल्लाह) के पास है, लेकिन सूफी
साधना और आध्यात्मिक मार्ग में इसे विशेष संदर्भों में देखा जाता है। और
4. तहक़ीक़ुल ग़ैब – अदृश्य का शोध।
सूफी मत (तसव्वुफ) में तहकीक उल ग़ैब का अर्थ 'अदृश्य या
परोक्ष रहस्यों की सत्यता की खोज' है। यह वह आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें साधक अपनी
आंतरिक चेतना, मुराक़बा (ध्यान) और ईश्वरीय कृपा के माध्यम से उन सच्चाइयों
का प्रत्यक्ष ज्ञान या अनुभव प्राप्त करता है जो सामान्य आँखों से छिपी होती हैं।
यही वह मंतव्य है जिसके आधार पर सभी
प्राणी अपने मूल स्रोत (ईश्वर) में समागम की आकांक्षा रखते हैं।
*** *** ***
मनोज
कुमार
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