सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
9. सूफ़ीवाद के विकास का तृतीय चरण-3
9.5 हज़रत जलाल-उद-दीन रूमी रह. (30 सितंबर 1207 – 17 दिसंबर 1273)
हज़रत जलाल अल-दीन रूमी इस्लाम के सबसे
महान फारसी कवि, सूफी संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। वह दिव्य प्रेम और आंतरिक
जागृति की कविताओं के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। हज़रत रूमी की विशिष्टता इस
तथ्य में निहित है कि उनमें तर्क एक व्यापक और गहरे धार्मिक अनुभव से जुड़ा है। उनके लिए ईश्वर एक वास्तविकता है
जिसे अनुभव किया जा सकता है। मनुष्य ईश्वर को अपने स्वयं के अस्तित्व की गहराई में
महसूस कर सकता है, वह परमात्मा के साथ तालमेल बिठा सकता है। उन्हें मानवता के संदेश के लिए पूरी दुनिया में याद किया जाता है।
उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को बल्ख (वर्तमान अफगानिस्तान) में हुआ
था। उनके पिता बहाउद्दीन वलाद एक सम्मानित
विद्वान और उपदेशक थे। बहाउद्दीन अपनी शिक्षा और धर्मपरायणता के लिए
प्रसिद्ध थे। मंगोल आक्रमणों से बचकर उनका परिवार
अनाटोलिया (तुर्की के कोन्या शहर) में बस गया था, जहाँ उन्होंने अपने अधिकांश जीवन का
अध्यापन किया। आरंभिक वर्षों में रूमी ने अपने पिता
और उनके साथी महान विद्वानों से बहुत कुछ सीखा। पच्चीस साल की उम्र में ज्ञान की तलाश
में उन्होंने दमिश्क और हलाब (अलेप्पो) जैसे महान केंद्रों की यात्रा की। रूमी ने
क़ुरआन पर भाष्य, हदीस, न्यायशास्त्र और अरबी भाषा और साहित्य की शिक्षा हासिल की। उनके
द्वारा रचित मसनवी ग्रन्थ इस बात का प्रमाण है कि उनका रहस्यवाद केवल भावनात्मक
नहीं है। मसनवी छह खंडों में लिखा गया उनका आध्यात्मिक महाकाव्य है, जिसे फारसी का कुरान भी कहा जाता है।
रूमी की महान कृति 'मसनवी' की शुरुआत बांसुरी
(नेह) की कहानी से होती है। बाँसुरी जब बजती है, तो वह एक दर्द भरी आवाज़ निकालती है।
रूमी कहते हैं कि बाँसुरी इसलिए रोती है क्योंकि उसे उसके बांस के जंगल (जड़) से
काट कर अलग कर दिया गया है। इसी तरह, इंसान की रूह भी परमात्मा से अलग होकर तड़प रही है और उसका अंतिम
लक्ष्य वापस उसी परमात्मा में विलीन हो जाना है। रूमी ने अपना सारा जीवन लोगों को
धर्मशास्त्र सिखाने और उपदेश देने में लगा दिया। उस समय तक उन्होंने संगीत से
परहेज़ किया था।
उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब
आया जब उनकी मुलाक़ात शम्स
तबरेज़ से हुई। साल 1244 में कोन्या के एक बाज़ार में दोनों की मुलाक़ात हुई। उस समय रूमी
किताबों के ढेर के साथ बैठे थे। शम्स ने पूछा, "यह क्या है?" रूमी ने जवाब दिया, "यह वो ज्ञान है जिसे तुम नहीं
जानते।" शम्स ने उन किताबों को पानी में फेंक दिया। जब रूमी दुखी हुए, तो शम्स ने उन्हें पानी से बाहर
निकाला—किताबें पूरी तरह सूखी थीं। शम्स ने कहा, "यह वो रहस्य (इल्म) है जिसे
तुम नहीं जानते।" इस घटना के बाद रूमी ने बाहरी किताबों को छोड़कर आंतरिक
ज्ञान और दिव्य प्रेम (इश्क़
हक़ीक़ी) की राह चुन ली। दोनों महीनों तक एक कमरे में बंद रहते थे। वे
बिना खाए-पिए लगातार आध्यात्मिक चर्चा और ईश्वर की इबादत में डूबे रहते थे। रूमी
शम्स को कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि अपने भीतर के ईश्वर का आईना मानते थे। उन्होंने लिखा कि शम्स
में उन्हें साक्षात् खुदा का नूर दिखाई देता था। रूमी के शिष्य और परिवार के लोग
शम्स से जलने लगे थे। उन्हें लगता था कि शम्स ने उनके गुरु को उनसे छीन लिया है। इस
ईर्ष्या के कारण शम्स एक बार कोन्या छोड़कर चले गए। रूमी के मनाने पर वे लौटे, लेकिन 1248 में वे दोबारा हमेशा के लिए गायब हो
गए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि रूमी के छोटे बेटे की शह पर शम्स की हत्या कर
दी गई थी। शम्स के जाने से रूमी गहरे सदमे और विरह (हिज्र) में डूब गए। इसी
दर्द से उनके भीतर का कवि जागा। वे रोते हुए गोल-गोल घूमने लगते थे, जिसे आज 'व्हर्लिंग दरवेश' का डांस कहा जाता है। शम्स तबरेज़ से मिलने से पहले रूमी एक पारंपरिक
धार्मिक विद्वान और उस्ताद थे। शम्स ने उन्हें सिखाया कि सिर्फ किताबों को रटने से
खुदा नहीं मिलता, बल्कि खुद के भीतर झांकने और अहंकार को मिटाने से मिलता है। सूफी
दर्शन में इसे 'फ़ना' (अहंकार का मिट जाना) और 'बका' (ईश्वर के साथ अमर हो जाना) कहा जाता है। हज़रत रूमी ने शिक्षण और उपदेश
देना छोड़ दिया और शम्स की संगति में दिन-रात बिताने लगे। शम्स ने हज़रत रूमी को एक
अकादमिक धर्मशास्त्री और पारंपरिक उपदेशक से एक परमानंद रहस्यवादी में बदल दिया। नीरस
हज़रत रूमी रातोंरात एक उत्साही गीतकार में बदल गए, और अब सत्य की अभिव्यक्ति के वाहन के
रूप में कविता और संगीत उन्हें दर्शन और धर्मशास्त्र से बेहतर लगने लगा। रूमी ने
अपने सबसे बड़े दीवान (प्रेम गीतों के संग्रह) का नाम अपने नाम पर रखने के
बजाय 'दीवान-ए-शम्स-ए तबरेज़ी' रखा। उन्होंने अपनी कविताओं के आखिर
में अपना नाम हटाकर शम्स का नाम लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि वे खुद को शम्स में पूरी तरह
फना (विलीन) मान चुके थे।
रूमी ने 'शमा' यानी घूमकर किए जाने वाले रूहानी नृत्य 'व्हर्लिंग दरवेश' (Whirling Dervishes, नर्तक, साधुओं की घूम-घूमकर इबादत करने की अनूठी पद्धति) वाले मेवलेवी
संप्रदाय की नींव रखी थी। यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि एक ध्यान (Meditation) है। इसमें दरवेश गोल-गोल घूमते हैं, जो ब्रह्मांड के ग्रहों की गति को
दर्शाता है। उनका एक हाथ आसमान की तरफ (ईश्वर से कृपा पाने के लिए) और दूसरा हाथ
जमीन की तरफ (उस कृपा को दुनिया में बांटने के लिए) होता है। यह नृत्य अहंकार को
भूलकर पूरी तरह ईश्वर के प्रेम में डूब जाने का प्रतीक है।
हज़रत रूमी का न तो कोई नया संप्रदाय
स्थापित करने का और न ही एक नया धार्मिक आंदोलन शुरू करने का कोई इरादा था। लेकिन उनके भक्तों और शिष्यों ने
उनकी मृत्यु के बाद एक विशिष्ट समूह बनाया। उन्होंने कुछ बाहरी अनुष्ठानों को क़ायम
किया। समूह को नाचने वाले दरवेशों के समुदाय के रूप में मान्यता मिली। वे बिना सिलाई
वाली टोपी पहनते थे। सर के चारों ओर पगड़ी बांधते थे। कई तहों की भारी पतलून पहनते
थे। ये वेश-भूषा इस समूह की मानक पोशाक बन गई। लेकिन वे हज़रत रूमी के विचार की
गहराई या उसके धार्मिक अनुभव की भावना को समझने में असमर्थ थे। हज़रत रूमी, जो धार्मिक जीवन में नक़ल और अंध
अनुरूपता के सख्त ख़िलाफ़ थे, भाग्य की उस विडंबना का शिकार बन गए, जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने लगातार लड़ाई
लड़ी थी। हज़रत रूमी के लिए उत्साहपूर्ण नृत्य के साथ-साथ स्वतः-स्फूर्त गीत एक
गहरी उत्तेजित आत्मा की एक अनैच्छिक अभिव्यक्ति थी। जबकि नक़ल करने वालों ने यह
विश्वास करते हुए कि किसी भावना की शारीरिक अभिव्यक्ति को स्वैच्छिक रूप से अपनाने
से भावना ही पैदा होती है, इसे धार्मिक भावनाओं को प्रेरित करने के एक नियमित
अभ्यास के रूप में अपनाया।
परमानंद चाहने वाला समूह एक वृत्ताकार
समूह में बैठता है, जबकि उनमें से एक नृत्य करने के लिए खड़ा होता है, जिसका एक हाथ छाती
पर और दूसरा हाथ फैला हुआ होता है। नृत्य में कोई आगे या पीछे की गति नहीं होती है, बल्कि बढ़ती गति के साथ चक्कर लगाने
की होती है। संगीत के साथ, केवल बांसुरी और ड्रम का उपयोग किया जाता है।
समूह की सदस्यता के लिए एक उम्मीदवार के योग्य होने
से पहले दूसरों की सेवा के अनुशासन से गुज़रने की एक प्रक्रिया से गुज़रनी होती है।
यह चालीस दिनों के लिए जानवरों की सेवा के साथ शुरू होता है, इस विचार के साथ कि यदि कोई व्यक्ति
प्रेम और सम्मान के साथ जानवरों की सेवा कर सकता है, तो वह अपने साथी की सेवा और
भी बेहतर करेगा। इसके बाद वह ग़रीब भक्तों के आवास के फर्श की सफाई करते हैं। इसके
दौरान कुएं से पानी खींचते हैं और ईंधन के लिए लकड़ी आदि इकट्ठा करते हैं। यह सत्ता
के प्रति मनुष्य के प्रेम और वर्ग और जाति के विशेषाधिकार के लिए एक इलाज माना
जाता है। अंत में उसे स्नान कराया जाता है, जो निचली वासना से छुटकारा का प्रतीक
है। फिर वह सभी निषिद्ध कार्यों से पूर्ण परहेज़ करने का संकल्प लेता है और तब
जाकर उसे संप्रदाय की पोशाक पहनने की अनुमति दी जाती है।
हज़रत रूमी अस्तित्व की प्रकृति
के बारे में एक निश्चित दृष्टिकोण रखते थे। वास्तविकता और आभास की एकता के बारे में उनका विश्वास बहुत गहरा है। वे
मानते हैं कि समस्त अस्तित्व का आधार आध्यात्मिक है। उनके लिए अस्तित्व का आधार
वैसा ही है जैसा हम अपने आप में आत्मा या अहंकार के रूप में महसूस करते हैं।
ब्रह्मांडीय अहंकार से निकलने वाले अहं की अनंत संख्या अस्तित्व की समग्रता का
निर्माण करती है। इस
दृष्टि से हर तत्त्व आध्यात्मिक है। दैवीय रूह
के अतिप्रवाह से सभी प्राणी ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं, लेकिन प्रत्येक प्राणी अपने मूल में
लौटने की इच्छा से प्रेरित होता है। हज़रत रूमी के अनुसार यह इच्छा ईश्वर के प्रति प्रेम है। यही समस्त अस्तित्व का
विकास वादी सिद्धांत है। जीवन तत्त्व
से विकसित हुआ है, लेकिन हज़रत रूमी के लिए पदार्थ शुरू से ही अनिवार्य रूप से
आध्यात्मिक था। मानव
आत्मा के लिए चेतना और वास्तविकता के इस ग़ैर-आयामी आयाम में प्रवेश करना संभव है।
ऐसा अनुभव आश्चर्य की चेतना है।
हज़रत जलाल-उद-दीन रूमी का सूफी दर्शन मुख्य रूप से ईश्वरीय प्रेम (इश्क हकीकी), आत्मा के मिलन और अहंकार के त्याग पर आधारित है। उनका मानना था कि ईश्वर तक
पहुँचने का एकमात्र जरिया रस्म-ओ-रिवाज़ नहीं, बल्कि दिल का सच्चा प्रेम है। रूमी
के दर्शन के केंद्र में 'प्रेम' है। उनके अनुसार, यह पूरी सृष्टि प्रेम की शक्ति से ही चल रही है। इंसान के भीतर जो
तड़प है, वह असल में अपनी रूह के मूल (ईश्वर) से दोबारा जुड़ने की तड़प है।
उनका एक प्रसिद्ध विचार है: "ईश्वर का रास्ता दिमाग से नहीं, दिल से होकर जाता है। अपने दिल को
साफ करो, ईश्वर वहीं मिलेगा।"
हज़रत रूमी
का मानना था, बिना प्रेम के जीवन का कोई मूल्य
नहीं है। प्रेम आध्यात्मिक जीवन का पानी है और जो इसे चख लेता है, उसकी आत्मा कभी नहीं मरती। हज़रत रूमी
ने प्रेम के अर्थ को विस्तार दिया और इसे धार्मिक तथा नैतिक जीवन का आधार बनाया। इसे
सभी प्राणियों और अस्तित्व के सभी स्तरों में एक रचनात्मक, सुधारात्मक और विकासवादी आग्रह के
रूप में एक वैश्विक महत्व दिया। उनके अनुसार दिव्य प्रेम (इश्क हक़ीक़ी) ही वह
एकमात्र मार्ग है जो मनुष्य की आत्मा को सीधे परमात्मा से जोड़ता है। प्रेम ईश्वर में उत्पन्न होता है और ईश्वर की ओर बढ़ता है जो
अनिवार्य रूप से एक निर्माता है, इसलिए, प्रेम जैसे-जैसे सृष्टि की ऊपर की ओर गति में चरण-दर-चरण आगे बढ़ता
है, हर क़दम पर अस्तित्व के नए रूपों को लाता है। आत्मसात करने की प्रक्रिया प्रेम की
अभिव्यक्ति है। सभी चीज़ें शाश्वत सौंदर्य की ओर बढ़ रही हैं और किसी चीज़ का मूल्य
उस सुंदरता के आत्मसात के अनुपात में होता है। यह आत्म-साक्षात्कार का आग्रह है।
जैसे उनका स्रोत ईश्वर है, वैसे ही उनका लक्ष्य भी ईश्वर है, और इस लक्ष्य की ओर बढ़ने की
प्रक्रिया हर स्तर पर नई सिद्धियों का निर्माण करती है। हर जगह जीवन है और जीवन अनिवार्य रूप
से एक लक्ष्य-प्राप्ति गतिविधि है। निचला उच्चतर में विलीन हो जाता है; यह प्रगतिशील विनाश की प्रक्रिया
नहीं बल्कि आत्मसात करने की प्रक्रिया है। यदि ब्रह्मांडीय प्रेम नहीं होता, तो सारा अस्तित्व जड़ हो जाता और
शून्य में सिमट जाता। उनका
धर्म किसी एक विशेष धार्मिक समुदाय का पंथ नहीं है बल्कि ब्रह्मांड का धर्म है, एक सार्वभौमिक धर्म है। हज़रत रूमी
के अनुसार ब्रह्मांड प्रेम का क्षेत्र है। ब्रह्मांड एक ही धागे से बुना हुआ है।
किसी दूसरे इंसान से नफरत करना असल में खुद से और ईश्वर से नफरत करने के बराबर है।
हज़रत जलाल-उद-दीन रूमी रह. ने हाल या वज्द (भावाविष्टावस्था) को सूफ़ी-साधना की
महत्वपूर्ण पद्धति के रूप में प्रकाशित किया। जाफ़र रज़ा कहते हैं – “मौलाना जलालुद्दीन रूमी के अनुसार ‘अनलहक़’ विनम्रता की अंतिम सीढ़ी है। जिस तरह
शहद में डूबी हुई मक्खी हिल-डुल नहीं सकती, उसी तरह ‘इस्तग़राक़’ (तल्लीनता) में कोई सूफ़ी ‘अनल अबद’ (मैं बंदा हूं) नहीं कह सकता,
क्योंकि ‘अनल अबद’ में ‘दुई’ (द्वैतवास) है – एक अल्लाह और एक बंदा। यह दंभ ही है कि अल्लाह के अस्तित्व के सामने
कोई अपने अस्तित्व का एलान करे। लेकिन यह कहने का अधिकार सिर्फ़ अहले-बातिन
(अंतर्ज्ञानी) को है। अहले-ज़ाहिर (कर्मकांडी) को नहीं है। क्योंकि इसका परिणाम मौत
है, जिसे अहले-बातिन जश्ने-उरूसी (विवाहोत्सव) समझते हैं और अहले-ज़ाहिर सज़ा कहते
हैं।” हज़रत रूमी का संदेश था कि इंसान जिस सुकून और खुदा को बाहर ढूंढता है, वह असल में उसके अपने दिल के भीतर ही
निवास करता है। रूमी का सूफीवाद किसी एक मजहब की सीमाओं में नहीं बंधा है। वे सभी
इंसानों को एक ही ईश्वर की संतान मानते थे, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। रूमी कहते हैं, हम ईश्वर को जिस रूप में देखते हैं, वह असल में हमारे अपने आंतरिक चरित्र
का आईना होता है। अगर हम ईश्वर के नाम पर केवल डर और दोष देखते हैं, तो इसका मतलब है कि हमारे भीतर डर और
नफरत भरी है। अगर हम ईश्वर को प्रेम और करुणा के रूप में देखते हैं, तो हम खुद भी वैसे ही बन जाते हैं। सूफी मार्ग में ज्ञान इकट्ठा करना लक्ष्य
नहीं है, बल्कि अपने अहंकार (Ego) को पूरी तरह मिटा देना
लक्ष्य है, ताकि भीतर का खालीपन ईश्वर के नूर से भर सके।
रूमी
अपनी मसनवी में लिखते हैं कि कुछ लोग एक अंधेरे कमरे में एक हाथी को लेकर
आए। उस शहर के लोगों ने पहले कभी हाथी नहीं देखा था। चूंकि कमरे में अंधेरा था, इसलिए लोग छूकर यह जानने की कोशिश करने लगे
कि हाथी कैसा दिखता है। पहले व्यक्ति ने हाथी की सूंड छूई और कहा, "हाथी तो एक मोटे पाइप या पानी के
सांप जैसा है। दूसरे व्यक्ति ने हाथी का कान छुआ और कहा, "नहीं, हाथी
तो एक बड़े पंखे जैसा है।" तीसरे व्यक्ति ने हाथी का पैर छुआ और दावा किया, "तुम सब गलत हो, हाथी एक मजबूत खंभे जैसा है।" चौथे
व्यक्ति ने हाथी की पीठ पर हाथ फेरा और कहा,
"हाथी तो एक ऊंचे सिंहासन या चबूतरे
जैसा होता है।" रूमी समझाते हैं कि वे सभी लोग अपनी जगह सही थे, क्योंकि उन्होंने हाथी के एक हिस्से
को अनुभव किया था। लेकिन वे सब पूरी सच्चाई को नहीं देख पा रहे थे। रूमी कहते हैं
कि इंसानी इंद्रियां और दिमाग उस अंधे आदमी के हाथ की तरह हैं, जो पूरी सच्चाई को एक बार में नहीं
समझ सकते। लोग ईश्वर और धर्म को भी अपने-अपने सीमित नजरिए से देखते हैं और आपस में
लड़ते हैं। अगर सबके हाथ में 'ज्ञान और रूहानियत की मोमबत्ती' आ जाए, तो सारा मतभेद खत्म हो जाएगा और पूरी सच्चाई साफ दिखने लगेगी।
रूमी
अपनी मसनवी में लिखते हैं कि एक बार एक घमंडी व्याकरण शास्त्री (किताबी
विद्वान) एक नाव में सवार हुआ। यात्रा के दौरान उसने अपनी विद्वता का दिखावा करने
के लिए नाविक से पूछा, "क्या तुमने कभी व्याकरण या
साहित्य पढ़ा है?" नाविक ने बड़ी सादगी से जवाब
दिया, "नहीं, मैंने कभी स्कूल जाकर यह सब नहीं
सीखा।" विद्वान ने हंसते हुए कहा,
"ओह!
तब तो तुमने अपनी आधी जिंदगी बर्बाद कर दी!" नाविक को बहुत दुख हुआ, लेकिन वह चुप रहा। कुछ देर बाद नदी में एक
भयानक तूफान आ गया और नाव डूबने लगी। अब नाविक ने विद्वान से पूछा, "जनाब, क्या आपको तैरना आता है?" विद्वान घबराकर रोते हुए बोला, "नहीं, मुझे तैरना नहीं आता!" नाविक ने मुसकुराते
हुए कहा, "फिर तो आपने अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी! क्योंकि यह नाव अब डूबने वाली है और किताबों
का ज्ञान आपको डूबने से नहीं बचा सकता।" यहाँ रूमी समझाते हैं कि किताबी
ज्ञान, नियम, और बौद्धिक अहंकार (किताबी व्याकरण) आपको
संसार के दुखों और मृत्यु के तूफान से पार नहीं लगा सकते। सूफी मार्ग में खुद को
मिटाना यानी 'फ़ना' होना (तैरना सीखना) जरूरी है। जब
तक इंसान अपने 'मैं' (अहंकार) को नहीं डुबोता, तब तक वह ईश्वर के प्रेम के सागर में तैर
नहीं सकता।
उनका निधन 17 दिसंबर 1273 को कोन्या (तुर्की) में हुआ। उनकी
मजार (ग्रीन टॉम्ब) पर मेवलाना संग्रहालय स्थित है, जहाँ आज भी विभिन्न धर्मों के लोग
श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं।
9.6. चतुर्थ चरण- में सूफ़ियों का
सिलसिला
चतुर्थ चरण- में
सूफ़ी उलमा के विरोध एवं शासक वर्ग की नाराज़गी के बावज़ूद सूफ़ियों का प्रभाव बढ़ता गया। तेरहवीं शताब्दी तक सूफ़ियों की अनेक ख़ानक़ाहें
(आश्रम) स्थापित हो चुकी थीं। विचारों और साधना-पद्धति में भिन्नता
के कारण सूफ़ी मतावलंबियों की कई शाखाएं विकसित हुईं जिन्हें सिलसिला कहा जाता है। सूफ़ियों
के सिलसिलों की संख्या निश्चित करना कठिन है, पर उनमें से कई सिलसिले भारत में भी पाए
जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं – चिश्ती, सुहरावर्दी, क़ादिरी, शत्तारी, नक्शबंदी, फिरदौसी, आदि। अकबर के ज़माने का मशहूर विद्वान
अबुल फजल ने “आइन-ए-अकबरी” में चौदह सूफ़ी सिलसिलों का ज़िक्र किया, जो
हैं – चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी, शत्तारी, हबीबी, तफूरी, जुनैदी, करबी, सकती, इयादी,
तूसी, दुबरी, अधमी और फिरदौसी।
सूफीमत में इस्लामी कानून यानी शरिया के पालन के
आधार पर सूफी सिलसिलों (परंपराओं) के दो मुख्य वर्गीकरण हैं – “बा-शरअ” और “बे-शरअ”। “बा-शरअ” पंथी इस्लामी क़ानून के पालन पर बल
देते थे और ख़ानक़ाहों में रहते थे। ये सूफी संत कुरान और पैगंबर के नियमों को मानते
हैं। ये नमाज, रोजा और अन्य इस्लामी कर्तव्यों का
पूरा पालन करते हैं। इनका मानना था कि आंतरिक प्रेम और रहस्यवाद के साथ-साथ बाहरी
धार्मिक व कानूनी अनुशासन का पालन करना भी जरूरी है। भारत में प्रसिद्ध चिश्ती
और सुहरावर्दी सिलसिले इसी श्रेणी में आते हैं।
जबकि कुछ सूफ़ियों पर जज़्ब की कैफ़ियत तारी रहती थी और वे
अक्सर घूमते ही रहते थे। आम लोग उन्हें बे-शरअ कहते थे क्योंकि वे उन्हें नमाज़-रोज़ा
करते नहीं देखते थे। हक़ीक़त यह होती थी कि वे अपने होशो हवास में ही नहीं होते थे
और शरीअत की पाबंदी के लिए होशो हवास क़ायम होना ज़रूरी है। इस्लामी उलमा ने कहा है कि न तो ऐसे लोगों को बुरा कहो और न
ही उनका अनुसरण करो। इन्हें मस्त, कलंदर
या मदारी भी कहा जाता है। ये इस्लामी कर्मकांडों और बाहरी नियमों को उतना महत्व
नहीं देते। इनका पूरा ध्यान केवल ईश्वर के प्रेम और आंतरिक रहस्यवाद पर होता है। ये
ईश्वर के साथ सीधे और गहन आंतरिक प्रेम पर इतना अधिक ध्यान केंद्रित करते थे कि कई
बार सामाजिक और पारंपरिक धार्मिक कर्मकांडों की उपेक्षा कर देते थे। हालांकि ये
शरिया के पाबंद नहीं थे, फिर भी
इनका मूल उद्देश्य भी आध्यात्मिक ज्ञान, आंतरिक शुद्धि और ईश्वर (अल्लाह) से
मिलन ही
था।
9.7 सूफ़ीमत पर विभिन्न सम्प्रदायों का प्रभाव
कुछ विद्वानों का मानना है कि सूफ़ियों के मत और सिद्धान्त
तथा उनकी साधना पद्धति का आधार क़ुरआन और हदीस है। हालांकि समय के साथ इसमें आंतरिक
और रहस्यवादी व्याख्याओं को प्रधानता दी गई। सूफी संत क़ुरआन की आयतों का शाब्दिक
अर्थ लेने के साथ-साथ उनका गूढ़, आध्यात्मिक
और भावनात्मक अर्थ निकालते हैं। हदीस में वर्णित 'इह्सान'
(ईश्वर की इस प्रकार इबादत करना
जैसे कि तुम उसे देख रहे हो) को सूफी साधना का शीर्ष माना जाता है। मन के विकारों
को दूर करने और आत्मशुद्धि (तज़्किया) पर जोर देने वाले विचार सीधे तौर पर
क़ुरआन और पैगंबर की चर्या से प्रेरित हैं। ईश्वर के नामों का निरंतर स्मरण करना (ज़िक्र)
क़ुरआन के आदेश "अल्लाह को अधिक याद करो" पर आधारित है। सूफी साधना के
शुरुआती चरण में इस्लामिक कानून (शरीयत) का पालन अनिवार्य माना गया है, जिसके बाद आध्यात्मिक मार्ग (तरीकत)
आता है। हालांकि मूल ढाँचा इस्लामिक है, लेकिन कुछ साधना पद्धतियों और दर्शन पर बाद में स्थानीय संस्कृतियों
और दर्शनों का भी हल्का प्रभाव पड़ा।
कुछ विद्वानों के अनुसार इस्लाम धर्म के अनुयायियों में भी
रहस्यवादी प्रवृत्ति देखने को मिलती है। ‘सूफ़ीमत साधना और साहित्य’ में रामपूजन
तिवारी कहते हैं, सूफ़ियों के प्रेम सम्बन्धी कुछ मत भी
क़ुरआन में मिल जाते हैं - “यदि परमात्मा से तुमको प्रेम है, तो मेरा अनुसरण करो और तब परमात्मा तुमसे
प्रेम करेगा और तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा, क्योंकि वह क्षमाशील और दयालु है।” सूफीमत में अल्लाह से डरने के बजाय
उससे अगाध प्रेम करने और उसकी इबादत में पूरी तरह लीन हो जाने को सर्वोपरि माना
गया है। इस्लाम में आत्मशुद्धि के लिए पंचकर्तव्यों, तौहीद (एक ईश्वर पर
विश्वास), सलात (प्रार्थना), रोज़ा (उपवास), ज़कात (दान) और हज (काबे की यात्रा),
का विधान है। लेकिन सूफ़ियों ने इनसे प्रेरणा लेते हुए भी इसे हूबहू नहीं अपनाया है।
सभी विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। इस मार्ग के अनुयायी आत्म-ज्ञान और आंतरिक साधना (इरफ़ान
और मारिफ़त) के माध्यम से परम सत्य को पाने की कोशिश करते हैं।
निकोल्सन (R. A. Nicholson) तथा ब्राउन (E. G. Browne) ने नास्तिक मत, यूनानी मत तथा नव-अफ़लातूनी (Neoplatonism) दर्शन के प्रभाव को स्वीकार किया है।
इन विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि पश्चिमी एशिया और ईरान के संपर्क में आने से
यूनानी एवं हेलेनिस्टिक दार्शनिक विचार सूफियों तक पहुँचे। निकोल्सन ने माना है कि
सूफी चिंतन में व्याप्त रहस्यवाद, आत्मा
के परमात्मा से मिलन और इल्हाम के सिद्धांत पर नव-अफ़लातूनी दर्शन का गहरा प्रभाव
है। नव-अफ़लातूनी दर्शन, तर्क और
बुद्धि द्वारा चरम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं मानते थे, बल्कि उनका मानना था कि हृदय द्वारा वहाँ
पहुँचा जा सकता है,
उनकी मान्यता के अनुसार वही परमात्मा
सभी चीज़ों का केन्द्र है। यह संसार उसकी प्रतिच्छाया है। लेकिन सूफ़ियों से इस साम्य
के बावज़ूद, सूफ़ियों की तरह परमात्मा के साथ रागात्मक
संबन्ध स्थापित किया जा सकता है, इस बात
से वे सहमत नहीं थे। नास्तिक मत को मानने वाले आध्यात्मिक जगत को बुद्धि से परे तथा
आत्म प्रकाश और रहस्यानुभूति की बात मानते थे। सूफ़ियों में जो संन्यास-व्रत की बात
कही गई है उस पर नास्तिक मत का भी ज़ोर है ताकि इस दुनिया की बुराइयों को दूर कर आध्यात्मिक
जगत को पाया जा सके।
निकोल्सन ने ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म के प्रभाव
को भी स्वीकार किया है। ब्राउन ने भी सूफीमत पर बौद्ध, जैन तथा वेदांत दर्शन के प्रभावों को
भी रेखांकित किया है,
जिसके तहत सूफी साधकों ने
सादगी और प्रेम मार्ग को अपनाया। बौद्धों के निर्वाण के साथ फ़ना के सिद्धान्त में बहुत
समानता है। सूफ़ियों का चरम लक्ष्य फ़ना होना है। सूफ़ियों के फ़ना के मार्ग में ध्यानावस्था
(मुराकबा) की
मंजिल आती है, जो बौद्धों के निर्वाण के पहले के ‘ध्यान’
अथवा ‘समाधि’ की अवस्था जैसी है।
ब्राउन इस बात से सहमत नहीं है कि सूफ़ीमत पर
भारतीय दर्शन का प्रभाव है, लेकिन अन्य
कई विद्वान जैसे वानक्रेमर और गोल्डजिहर इस बात से सहमत है कि भावाविष्ट
अवस्था, योग प्राणायाम आदि भारतीय दर्शन की देन
है। सूफ़ीमत और अद्वैतवाद में काफी समानता है। उपवास, जप, तप का विधान, गुरु के प्रति आत्मसमर्पण, आत्मा तथा परमात्मा में एकत्व, दोनों ही मत में समान है। प्रसिद्ध सूफ़ी
साधक हज़रत मंसूर ह्लल्लाज के ‘अन–हल-हक़’
में अद्वैत की ही गूँज है। सृष्टि के सम्बन्ध में सूफ़ीमत की तथा उपनिषदों में प्रकट
किए गए विचारों में समानता है , विशेषकर
परमात्मा की इच्छा से सृष्टि के विस्तार और 'अद्वैत' या 'एकत्व' के सिद्धांत में। दोनों ही परंपराएं
मानती हैं कि एक ही परम सत्य से यह संपूर्ण संसार प्रकट हुआ है। परमात्मा जब एक है
तो अनेक कैसे हो गया?
इसके लिए सूफ़ी एक हदीस का प्रमाण
देते हैं जिसका अर्थ है मैं एक छिपा हुआ खज़ाना था, फिर मैंने इच्छा की कि लोग मुझे जाने।
इसलिए उसने सृष्टि रची। इसी बात को ‘तैतिरियोपनिषद’ में इस
प्रकार कहा गया है – ‘सोअकामयत
बहुस्यां प्रजायेयेति’ अर्थात परमेश्वर ने इच्छा की मैं एक से बहुत हो जाऊँ। लेकिन
सूफ़ीमत अवतारवाद और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता। सूफियों का 'वहदतुल वजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत
उपनिषदों के अद्वैत वेदांत (सब कुछ ब्रह्म है) से बहुत हद तक मिलता-जुलता है, जहाँ संपूर्ण सृष्टि उसी एक परमात्मा
का रूप मानी जाती है। दोनों ही मार्ग बाहरी कर्मकांडों के बजाय आंतरिक शुद्धि, प्रेम, भक्ति और ईश्वर के साथ सीधे
आध्यात्मिक मिलन पर जोर देते हैं।
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मनोज
कुमार
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