महात्मा
गांधी हत्या केस-13
विष्णु रामकृष्ण करकरे
विष्णु रामकृष्ण करकरे (1910 - 6 अप्रैल 1974)
एक चितपावन या करहाड़े
ब्राह्मण परिवार से था और उस का बचपन और यौवन अस्त व्यस्त था। शैशवावस्था में ही माता-पिता
की मृत्यु हो जाने के कारण उसकी परवरिश नॉर्थकोट अनाथालय बंबई में हुई थी। उसने
मामूली शिक्षा ग्रहण की थी। अनाथालय में रहने के कारण वह स्कूली शिक्षा पूरी नहीं
कर पाया। बाद में उसने स्वयं ही हिंदी और मराठी लिखना-पढ़ना सीखा।
दस वर्ष की अवस्था में वह अनाथालय से भाग
गया और बॉम्बे की एक चाय की दुकान में बर्तन मांजने और मजदूरी का काम करने लगा।
यहां भी वह अधिक दिनों तक नहीं टिका और एक दिन पूना भाग गया। वह यात्रा करने वाले अभिनेताओं
की एक मंडली में शामिल हो गया। वहां वह पन्द्रह वर्षों तक रहा।
पच्चीस वर्ष की उम्र में वह अहमदनगर आ गया।
यहाँ, मोटर स्टैंड के पास एक बंद पड़े गौशाला में
उसने अपनी चाय की दुकान शुरू की। चाय के साथ वह खाने में सिर्फ़ पूरियाँ और मिर्च
का एक खास मिश्रण परोसता था, जिसे वह 'खून साफ़ करने वाली चटनी' कहता था। उसका व्यापार चल निकला। अहमदनगर आकर
उसने आर्थिक रूप से खुद को स्थापित किया और अहमदनगर के कपड़ा बाज़ार में 'दक्कन गेस्ट हाउस' (Deccan Guest House) नाम से अपना एक छोटा होटल (लोजिंग एंड बोर्डिंग)
शुरू किया। इस तरह वह एक होटल का मालिक बन गया। उस होटल में रहने की सुविधा भी थी।
अब वह एक अनाथ से सेठ करकरे बन चुका था। उसने शादी की और अपने होटल में काम करने
के लिए नौकरों को नियुक्त किया।
उसने कुछ समाज सेवा के काम भी करने शुरू कर
दिए थे। स्वयं अशिक्षित होने के कारण, उसने सोचा कि वह छात्रों को रियायती दरों पर या कभी-कभी
अपने होटल में मुफ्त कमरे देकर शिक्षा के क्षेत्र में मदद करेगा।
उसने एक शौकिया नाटकीय कंपनी बनाई और हिंदू
महासभा के काम में भी गहरी दिलचस्पी लेने लगा। अहमदनगर में हिन्दू महासभा की शाखा
भी उसने खोल ली थी। मनोहर मलगोनकर की ऐतिहासिक पुस्तक 'The Men Who
Killed Gandhi' के विवरण के अनुसार, वर्ष 1938 में जब विनायक दामोदर
सावरकर अपनी पार्टी के
काम के सिलसिले में अहमदनगर आए थे, तब विष्णु रामकृष्ण
करकरे ने उनके सम्मान
में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया था। करकरे ने उन्हें अपने थिएटर समूह के एक
विशेष प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करने का फैसला किया। वीर सावरकर अत्यधिक व्यस्त थे, लेकिन अंत में
पंद्रह मिनट के लिए आने को तैयार हो गये। वह पूरे शो में तीन घंटे तक बैठे रहे।
1939 महासभा की एक बैठक में आप्टे, करकरे से मिला, तब तक
करकरे हिंदू महासभा का जिला सचिव बन चुका था। तीन साल बाद, अहमदनगर के
नगरपालिका के चुनाव में करकरे ने नामांकन भरा और निर्विरोध चुना गया। इस प्रकार
बत्तीस वर्ष की आयु में विष्णु करकरे डेक्कन गेस्ट हाउस, कपडा बाज़ार, अहमदनगर का मालिक
होने के साथ-साथ नगरपालिका पार्षद भी था। मुसलिम विरोधी उसकी गतिविधियां बढ़ती गईं।
निज़ाम के विरुद्ध आंदोलन में उसने भी योगदान दिया। विष्णु करकरे ने अहमदनगर में
शरणार्थियों के लिए भोजन और रहने की जगह का इंतज़ाम करने के लिए दिन-रात काम किया।
इन्हीं दिनों
मुसलिम लीग के सीधी कार्रवाई के आह्वान पर बंगाल के नोआखाली और अन्य क्षेत्रों में
भीषण दंगे हुए थे। अनगिनत हिन्दुओं के घर तबाह हुए, हज़ारों मार दिए गए, स्त्रियों
की आबरू लूट ली गई। इसकी सूचना पूरे देश में आग की तरह फैल गई। गांधीजी शांति मिशन
पर नोआखाली पहुंच गए थे। दंगा ग्रसित क्षेत्रों का वह पैदल दौरा करने लगे। वे दंगा
पीड़ित हिन्दुओं के हृदय में बल संचार कार्य कर रहे थे। जिनका धर्म परिवर्तन कर
दिया गया था उसके पुनः धर्म वापसी की कोशिश कर रहे थे। जिन स्त्रियों का अपहरण कर
लिया गया था, उनकी रिहाई करा रहे थे।
जब नोआखली का
नरसंहार शुरू हुआ तो करकरे ने अपने एक दोस्त से कहा, 'मैं कुछ करना
चाहता हूँ। उन लोगों को हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए जिन्हें
जबरन धर्मांतरित किया गया था, कुछ महिलाओं को
मुक्त कराने के लिए जिनका अपहरण कर लिया गया था - कुछ भी। मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है
मैं क्या कर सकता हूँ। मैं पहले वहां पहुंचूंगा और देखूंगा कि क्या करने की जरूरत
है।'
उसे पता था कि
अकेले वह कुछ नहीं कर सकता। उसे साथ चलने के
लिए दूसरों की ज़रूरत थी। इसके लिए उसके पास काफ़ी पैसे नहीं थे। इसलिए 'भाई-दूज' के दिन - जब भाई
अपनी बहनों को तोहफ़े देते हैं – उसने अहमदनगर के लोगों से अपनी दुकान पर आने और
नोआखाली में अपनी 'बहनों' के लिए जो भी हो
सके, दान करने को कहा। दिन के अंत तक उसने 3000 रुपये से
ज़्यादा जमा कर लिए थे। 1946 में हिंसा के पीड़ितों को सहायता प्रदान करने के लिए वह
एक राहत दल के रूप में छह महासभा कार्यकर्ता के साथ नोआखाली गया।
वह तीन महीने तक
वहां रहा और हिंदू महिलाओं के अपहरण और बलात्कार को देखा। उसके दिलो-दिमाग पर
मुसलमानों से बदला लेने की धुन सवार हो गई। बंगाल के एक मुस्लिम एमएलए गुलाम सरवर
को जब 10,000/- रुपये का भुगतान किया गया, तो उसने कहा था, यह एक शातिर
अपराधी को पुरस्कृत करने के लिए दी गयी राशि है, क्योंकि गुलाम
सरवर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के कई कृत्यों के लिए जिम्मेदार था।
करकरे गुस्से से भरा हुआ था और नोआखाली में देखी गई भयानक
चीज़ों के बारे में दुनिया को बताने के लिए बेताब था। उसने पूना में
अपने उन दो दोस्तों से मिलने के लिए समय निकाला जो पार्टी का अख़बार चलाते थे। वह पूना स्थित आप्टे और गोडसे से मिला। उसने नोआखाली के
अपने तरीक़े से बयान किए गए किस्से को उनके अख़बार में छापने के लिए कहा। आप्टे और
नाथूराम, भले ही उन्होंने खुद वे अत्याचार नहीं देखे थे, फिर भी वे भी उतने
ही गुस्से में थे जितने कि करकरे खुद था। करकरे ने बदला लेने की बात भी कही। इस
तरह से बदले की योजना की नींव पड़ी।
करकरे नाथूराम
गोडसे का गहरा मित्र था और दोनों मिलकर 'हिन्दू राष्ट्र' (अथवा दैनिक
अग्रणी) नामक पत्रिका का संपादन व संचालन करते थे। आप्टे-गोडसे गैंग को उसने वित्तीय सहायता देने की बात भी
कही। 1947 की गर्मियों से, करकरे टीम के लिए संदेश पहुँचाने और संपर्क करने वाले
व्यक्ति बन गया; उसका काम विस्फोटक, हथियार और अक्सर
नकद पैसे देने वालों का पता लगाना था। इन गुप्त गतिविधियों के सिलसिले में, उसे लगातार
अहमदनगर और पूना के बीच आना-जाना पड़ता था और बहुत कम समय की सूचना पर बॉम्बे और
दूसरी जगहों की यात्राएँ करनी पड़ती थीं।
1947 की शुरुआत
में, जब उनका अखबार अच्छा चल रहा था, आप्टे और नाथूराम
ने सहायक संपादक के तौर पर एक और व्यक्ति को रखने का फैसला किया - बी.डी. खेर, जो करकरे का करीबी
दोस्त था। जब भी करकरे आप्टे से मिलने पूना आता था, तो वह खेर के साथ
ही ठहरता था। जिस घर में खेर रहता था, वह कभी शहर के बड़े लोगों की हवेलियों में
से एक हुआ करता था। खेर के घर से सटा एक बड़ा फ्लैट एक सीनियर पुलिस अधिकारी, डिप्टी
सुपरिटेंडेंट एन.वाई. देउलकर के पास था। देउलकर वही अधिकारी थे जो 1944 की
गर्मियों में पंचगनी में ड्यूटी पर थे, जब आप्टे ने एक
जनसभा में गांधीजी को टोका-टाकी की थी। वह नाथूराम और आप्टे दोनों को शक्ल से
पहचानते थे - गर्म मिजाज वाले संगठनवादी जो गांधीजी को भारत का दुश्मन मानते थे। इसके
अलावा, देउलकर उस व्यक्ति को भी शक्ल से पहचानने लगे थे जो
अहमदनगर से आता था और अक्सर खेर के साथ ठहरता था - यानी करकरे। इस तरह सीक्रेट
पुलिस के एक सीनियर और बहुत काबिल अफ़सर, गांधी हत्याकांड
की साज़िश के तीन मुख्य साज़िशकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से जानते थे: आप्टे और
नाथूराम, जिनसे उनका सामना तब हुआ था जब उन्होंने पंचगनी में
गांधीजी को परेशान किया था, और करकरे, जो उनके पड़ोसी
खेर के यहाँ अक्सर आते-जाते थे।
इन्हीं दिनों करकरे
का सम्पर्क पूना के एक शस्त्र व्यापारी दिगम्बर बाडगे से हुआ। जब भी वह पूना जाता बाडगे से अधिकृत या अनधिकृत
अस्त्र-शस्त्र ख़रीदकर जमा करता।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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