सोमवार, 17 अगस्त 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-10

 

महात्मा गांधी हत्या केस-10


विनायक दामोदर सावरकर-1

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के निकट भागुर गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह एक महान क्रांतिकारी होने के साथ-साथ साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, कवि, वकील, इतिहासकार और समाज सुधारक भी थे। उन्हें प्रायः स्वातंत्र्यवीर, वीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। उन्होंने आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की 'हिंदुत्व' विचारधारा की नींव रखी और उसे विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय भी उन्हीं को जाता है।  उनकी माता का नाम राधाबाई तथा पिता जी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गणेश दामोदर सावरकर (जिन्हें बाबाराव सावरकर भी कहते हैं)  नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन मैनाबाई (जिन्हें नैनाबाई भी कहा जाता है) थीं। गणेश दामोदर सावरकर (बाबाराव) एक महान क्रांतिकारी तथा लेखक थे। जब विनायक केवल नौ वर्ष के थे तभी हैजे की महामारी में उनकी माता जी का देहान्त हो गया। इसके सात वर्ष बाद सन् 1899 में प्लेग की महामारी में उनके पिताजी भी स्वर्ग सिधारे। इसके बाद विनायक के बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला।

वे एक विलक्षण प्रतिभा के धनी थे और पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज़ थे।  विनायक की पढ़ाई की शुरुआत भागुर शहर में हुई, जहाँ उनकी ज़बरदस्त बुद्धि जल्द ही सबसे अलग दिखने लगी। उनकी काबिलियत को पहचानते हुए, उनका परिवार उन्हें बेहतर शिक्षा के मौके देने के लिए नासिक चला गया। शिवाजी हाईस्कूल नासिक से 1901 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। कविता और गद्य दोनों तरह के लेखन में उनकी विलक्षणता थी। यौवन के दिनों में ही उन्हें अंग्रेज़ों के विरुद्ध ज़ारी क्रांतिकारी आंदोलन ने बहुत प्रभावित किया। चापेकर बन्धुओं (दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव) द्वारा 22 जून 1897 को क्रूर ब्रिटिश अधिकारी पुणे के प्लेग कमिश्नर वाल्टर चार्ल्स रैंड की हत्या ने पंद्रह वर्षीय सावरकर को बहुत प्रभावित किया था। अंग्रेज़ों ने चापेकर बंधु को गिरफ़्तार किया और फांसी की सज़ा दी। इस घटना से प्रेरित होकर युवा सावरकर ने अपने घर में अष्टभुजा देवी (दुर्गा) के सामने देश को स्वतंत्र कराने और चापेकर बन्धुओं के अधूरे कार्यों को पूरा करने की शपथ ली थी। चापेकर बन्धुओं को दी गई फांसी और उनके साहस के समाचारों ने सावरकर के मन में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की नींव रखी।

सन् 1901 में रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ उनका विवाह हुआ। विनायक नासिक से पुणे आ गए जो उनकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ था। उनके ससुर जी ने उनकी विश्वविद्यालय की शिक्षा का भार उठाया। 1902 में मैट्रिक की पढाई पूरी करके उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कालेज में दाखिला लिया। इनके पुत्र विश्वास सावरकर एवं पुत्री प्रभात चिपलूनकर थी। तिलक के क्रांतिकारी भाषणों से वे काफी प्रभावित हुए थे। बाद में उन्होंने कई विद्यार्थी आंदोलनों को आयोजित किया। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपने भाई गणेश सावरकर के साथ मिलकर 1903 में 'मित्र मेला' नामक संगठन बनाया, जो 1904-1906 में गुप्त क्रांतिकारी संगठन 'अभिनव भारत सोसाइटी' के रूप में विकसित हुआ।  इसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से देश को आजाद कराना था। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद उन्होंने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। फर्ग्युसन कॉलेजपुणे में भी वे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण देते थे। अपने राजनीतिक विचारों के लिए सावरकर पुणे के फरग्यूसन कालेज से निष्कासित कर दिए गए।

वर्ष 1906 में लोकमान्य तिलक ने श्यामजी कृष्ण वर्मा से सावरकर को छात्रवृत्ति देने की सिफ़ारिश की थी। फलस्वरूप सावरकर शिवाजी छात्रवृत्तिप्राप्त कर जुलाई 03, 1906 को बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैण्ड चले गए। यहाँ सावरकर का निवास इंडिया हाउस में था, जिसे श्यामजी कृष्ण वर्मा संचालन करते थे। लंदन में ये कई क्रांतिकारी युवकों के संपर्क में आए। उन्होंने एक फ़्री इंडिया सोसायटी भी गठित की, जिसकी सप्ताह में एक बार बैठक होती थी। ये ऐसे लोगों का दल था जो क्रांतिकारी गतिविधियों में विश्वास रखता था और जिससे सावरकर  अपने साथी भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता के लिए लड़ने को प्रेरित करते थे। केवल भारत के क्रान्तिकारी ही नहीं अपितु मिस्र, तुर्की, आयरलैंड, रूस आदि के क्रांतिकारी भी इंडिया हाउस की सभाओं और बैठकों में शामिल होते थे।  यह दल समान विचारधारा वाले अन्य देशों के संगठनों से भी संपर्क बनाए रखता था। उनसे इन्होंने बम बनाने की विधि की जानकारी भी हासिल की। रविवार को फ्री इंडिया की सीक्रेट मीटिंग होती थी और वहां भारत से आए हरनाम सिंह, मदनलाल ढींगरा, सेनापति बापट, वी.वी.एस. अय्यर, लाला हरदयाल, सरदार सिंह राणा जैसे कई लोगों ने देश की आज़ादी के लिए लड़ने और सही समय पर अपनी जान कुर्बान करने की तैयारी के साथ वीर सावरकर के क्रांतिकारी काम में हिस्सा लिया।

वे नियमित रूप से पेरिस से मैडम भीकाजी कामा द्वारा निकाली जाने वाली क्रांतिकारी पत्रिका 'तलवार' के लिए लिखा करते थे। उन्होंने 1857 की क्रांति पर भी लिखा। कुछ अनुवाद भी किए। सावरकर रूसी क्रान्तिकारियों से ज्यादा प्रभावित थे। 10 मई1907 को इन्होंने इंडिया हाउसलन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857) की स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस अवसर पर विनायक सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को गदर नहीं अपितु भारत के स्वातन्त्र्य का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। जून, 1908 में इनकी पुस्तक ‘द इण्डियन वार ऑफ इण्डिपेण्डेंस : 1857  तैयार हो गयी परन्तु इसके मुद्रण की समस्या आयी। इसके लिये लन्दन से लेकर पेरिस और जर्मनी तक प्रयास किये गये किन्तु वे सभी प्रयास असफल रहे। ब्रिटिश सरकार ने छपने से पहले ही इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में यह पुस्तक किसी प्रकार गुप्त रूप से हॉलैंड से प्रकाशित हुई और इसकी प्रतियाँ फ्रांस पहुँचायी गयीं। इस पुस्तक में सावरकर ने 1857 के सिपाही विद्रोह को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतन्त्रता की पहली लड़ाई बताया और कहा कि किस तरह अंग्रेजों को जड़ से उखाड़ा जा सकता है। मई 1909 में इन्होंने लन्दन से बार एट ला (वकालत) की परीक्षा उत्तीर्ण की परन्तु उन्हें वहाँ वकालत करने की अनुमति नहीं मिली।

जब लंदन में रहने वाले युवा क्रातिकारियों से गांधीजी का संपर्क हुआ, तो इसने उनके मन पर सबसे अधिक चुनौती भरा प्रभाव डाला। गांधीजी ने उन्हें अपने दृष्टिकोण से अवगत कराया। क्रांतिकारी नेता गांधीजी की अहिंसावादी नीति की आलोचना करते थेऔर यह मानने को कतई तैयार नहीं थे कि बिना हिंसा का सहारा लिए भारत कभी स्वतंत्र हो सकता है। रविवार 24 अक्टूबर 1909 को लंदन में भारतीयों ने इंडिया हाउस में विजयादशमी (दशहरा) मनाया। दशहरा का पर्व दुष्ट राजा रावण पर वीर-देव राम की विजय का उत्सव है। बेज़वाटर स्थित नजीमुद्दीन भारतीय रेस्तरां में एक सदस्यता रात्रिभोज का आयोजन किया गया। उस वर्षपहली बारलंदन में भारतीयों ने इस अवसर को एक भोज के साथ मनाने का फैसला किया गया थाऔर उन्होंने गांधीजी को इसकी अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने इस शर्त पर स्वीकार किया कि भाषणों में कोई राजनीतिक संकेत नहीं होना चाहिए। वीर सावरकर को भी बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। गांधी जी उस समय दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे और ब्रिटिश सरकार से बातचीत करने लंदन आए थे। सावरकर वहां 'इंडिया हाउस' में रहकर भारतीय छात्रों और क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे थे।

लगभग सत्तर अतिथि उपस्थित थेजिनमें कुछ अंग्रेज मित्र भी थे। राजनीतिक भाषण न देने के वादे के बावजूदगांधीजी और सावरकर दोनों अपने श्रोताओं तक अपने राजनीतिक विचार पहुँचाने में सफल रहे। राम के महत्व पर गांधीजी ने एक जोशीला भाषण दियाजिनके प्रति उनकी विशेष श्रद्धा थी। भाषण में उनका जोर उन नैतिक मूल्यों पर थाजिन पर रामलक्ष्मण और सीता का आचरण आधारित था। वीर विजेता राम को भगवान माना जाता है। उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। एक बार फिर भारतीयों को राम के बैनर तले दुष्ट राजा रावण को हराने के लिए बुलाया गया है। उन्हें भावी विजेता कहां मिलेंगेकेवल वे ही जो राम के साथियों की तरह ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते हों और पूर्ण सदाचार का जीवन जीते हों। गांधीजी ने कहा कि ब्रिटिश राज का विरोध करने के लिए खुद को राम के जैसा बनाना और उनके शांतिपूर्ण साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पणउनकी शिष्टता और शांतचित्त का अनुकरण करना आवश्यक है। उनके आदर्शों को अपनाकर ही भारतीय अपने देश को स्वतंत्र कर सकते थे। यही एकमात्र तरीका था जिससे सत्य की असत्य पर विजय हो सकती थी। बैठक में उपस्थित वी.डी. सावरकर का परिचय देते हुए उन्होंने कहा, "मुझे सावरकर के बगल में बैठने का सम्मान पाकर बहुत गर्व है।" उन्होंने आशा व्यक्त की कि "भारत सावरकर की देशभक्ति का फल प्राप्त करेगा" और कहा "श्री सावरकरशाम के मुख्य वक्ताअब अपना वक्तव्य देंगे और मैं आपके और उनके बीच और समय नहीं लेना चाहता।" सावरकर ने गांधीजी के साथ इस विश्वास को साझा किया कि मुसलमानों और हिंदुओं के लिए शांतिपूर्वक एक साथ रहना पूरी तरह से संभव है। उन्होंने घोषणा की, "हिंदू हिंदुस्तान का दिल हैंफिर भीजिस तरह इंद्रधनुष की सुंदरता उसके विभिन्न रंगों से खराब नहीं होती बल्कि बढ़ती हैउसी तरह हिंदुस्तान भी मुस्लिमपारसीयहूदी और अन्य सभ्यताओं की सभी बेहतरीन चीजों को आत्मसात करके भविष्य के आसमान में और भी खूबसूरत दिखाई देगा।" सावरकर के भाषण का मुख्य बिंदु देवी दुर्गा द्वारा प्रदर्शित शक्ति की प्रधानता थी। सावरकर ने दस भुजाओं वाली देवी दुर्गा पर ध्यान आकर्षित करते हुए अपने श्रोताओं को याद दिलाया कि वे जो उत्सव मना रहे थे उस में यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्सव से पहले के नौ दिन दुर्गा के लिए पवित्र थे। उन दिनों हिंदू उपवास करते थे और दस भुजाओं वाली देवी से प्रार्थना करते थे। उनके अनुसाररामअत्याचार और अन्याय के प्रतीक रावण का नाश करने के बाद ही अपना आदर्श राज्य स्थापित कर सके थे।

सावरकर की पुस्तकों की भारत में बिक्री पर अंग्रेज़ों ने प्रतिबंध लगा दिया। उनके घर पर छापा मारा गया और उनके परिवार के सदस्यों को तंग किया गया। छापेमारी में विनायक के बड़े भाई बाबुराव के कमरे से कुछ नियमावली ज़ब्त की गई। सावरकर को फंसाने के लिए अंग्रेज़ अधिकारियों ने आरोप लगाया कि इस घर में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ साज़िश रची जा रही है। बाबुराव को `Transportation of Life’ की सज़ा सुनाई गई। इस सज़ा के तहत बाक़ी का जीवन अभियुक्त को रंगून के मंडाले जेल, या पोर्ट ब्लेयर के सेल्यूलर जेल (कालापानी) में बितानी होती थी।

लन्दन में रहते हुये उनकी मुलाकात लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों इण्डिया हाउस की देखरेख करते थे। 1909 में लंदन में सावरकर के फ़्री इंडिया सोसायटी के एक सदस्य मदनलाल ढिंगरा ने सर कर्ज़न वायली, जिसने खुदीराम बोस को फांसी की सज़ा दिलाने में अधिवक्ता के रूप में काम किया था, की हत्या कर दी। 1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा द्वारा भारतीय मामलों के मंत्री के सहयोगी विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने के बाद उन्होंने लन्दन टाइम्स में एक लेख भी लिखा था। सावरकर ने धींगरा को बचाने के लिए धन एकत्रित किया। बड़े बड़े वकील खड़े कर दिए। ब्रिटिश सरकार विली की हत्या में सावरकर की भूमिका को तो सिद्ध नहीं कर पाई लेकिन उसे ये अंदाज़ा ज़रूर हो गया कि मदनलाल और सावरकर में गहरी दोस्ती है और सावरकर ने ही ढींगरा के बेगुनाह होने की याचिका तैयार की थीजब मजिस्ट्रेट की अदालत में ढींगरा को उनका बयान नहीं पढ़ने दिया गया तो सावरकर ने ही उसे एक ब्रिटिश पत्रकार की मदद से लंदन के एक अख़बार में प्रकाशित करवाया थामदनलाल ढींगरा पर मुक़दमा चला और डेढ़ महीने के अंदर ही उन्हें 17 अगस्त, 1909 को फाँसी दे दी गई

उन दिनों भारत में क्रांतिकारी आंदोलनों का दौर था। अहमदाबाद में लॉर्ड मिंटो के ऊपर बम फेंका गया था। यह जानते हुए कि अंग्रेजों से लड़ने के लिए सोच और काम को हथियारों के साथ मिलाना ज़रूरी है, वीर सावरकर ने दूसरे देशों से बम बनाने की टेक्नोलॉजी उधार ली थी। उन्होंने उस टेक्नोलॉजी और किताबों को छिपाकर चतुर्भुज अमीन के ज़रिए 22 ब्राउनिंग पिस्तौलें भारत भेजीं। उनमें से एक पिस्तौल का इस्तेमाल करके अनंत लक्ष्मण कन्हेरे नाम के एक नौजवान ने नासिक के क्रूर जिला मजिस्ट्रेट ए.एम.टी. जैक्सन को मार डाला। इस मामले में अनंत कन्हेरे, कृष्णजी कर्वे और विनायक देशपांडे को फांसी दी गई और वामन जोशी को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। जब यह पता चला कि भारत आई पिस्तौलें सावरकर ने भेजी थीं, साल 1910 में सावरकर को नासिक के कलेक्टर की हत्या में संलिप्त होने के आरोप में लंदन में गिरफ़्तार करने का आदेश ज़ारी कर दिया गया था।

सावरकर को लगा कि उनकी गिरफ़्तारी हो सकती है, अपने मित्रों की मदद से वे पेरिस चले आए। कुछ दिनों वहां पर अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां चलाने के बाद वे एक मित्र से मिलने लंदन आए। विक्टोरिया स्टेशन पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्हें ब्रिक्सटन जेल में रखा गया। जब वे ब्रिक्सटन जेल में थे, तो वहां उनके साथी उनसे मिलने आते थे (सावरकर ने इसी जेल से 'माई ऑबिचुअरी' जैसे दिल को छू लेने वाले खत और कविताएं लिखीं)। शुरू में अंग्रेज़ों ने इस बात पर विचार किया कि क्या सावरकर पर लंदन में मुक़दमा चलाया जाए या भारत में? मुद्दा ये था कि अपराध नासिक में किया गया था जबकि सावरकर उस समय इंग्लैंड में रह रहे थेउन पर ज़्यादा से ज़्यादा हत्या में मदद करने का मुक़दमा चलाया जा सकता था अगर उन पर अपराध सिद्ध भी हो जाता तो अधिक से अधिक उनको दो या तीन साल की सज़ा होतीतय यह हुआ कि उन पर इग्लैंड में मुक़दमा न चलाकर भारत में मुक़दमा चलाया जाएगा उन्हें फ़्यूजिटिव ऑफ़ेंडर्स एक्ट 1881 के तहत भारत भेजने का फ़ैसला किया गया

कड़ी सुरक्षा में 'एसएस मौर्य' नाम के पानी के जहाज से उन्हें भारत लाया जा रहा था। एक जुलाई, 1910 को इंग्लैंड के टिलबरी बंदरगाह से जहाज़ रवाना हुआ जिसमें सावरकर के साथ दो अंग्रेज़ अफ़सर सीजे पावर और स्कॉटलैंड यार्ड के एडवर्ड पार्कर के अलावा दो भारतीय हेड कांस्टेबल मोहम्मद सिद्दीक़ और अमर सिंह भी सवार थेपावर और पार्कर को ज़िम्मेदारी दी गई कि उनमें से एक लगातार सावरकर को अपनी नज़र में रखेगा उनको चार बर्थ का एक केबिन दिया गया था रात को वो केबिन में अंदर से ताला लगा देते थेपार्कर और सावरकर निचली बर्थ पर लेटते थे जबकि पावर को सावरकर के ऊपर वाली बर्थ दी गई थी सावरकर के सिर के ऊपर लगी बत्ती को रात भर जलाकर रखा जाता था सावरकर को फ़्रांस पहुंचने तक हथकड़ियाँ नहीं पहनाई गई थीं उनको पहनने के लिए शॉर्ट्स और एक स्वेटर दिया गया थाइन अफ़सरों को केबिन का अटेंडेंट सुबह सात बजे जगा देता था इसके बाद पावर और पार्कर तैयार होना शुरू करते थे जब इनमें से किसी को नहाना होता था तो वो सावरकर को दूसरे साथी के पास छोड़ कर जाते थे ताकि वो हमेशा उनकी नज़रों के सामने रहेक़रीब आठ बजे विनायक सावरकर को शौचालय इस्तेमाल करना होता था तो दोनों अफ़सर उन्हें भारतीय पुलिस वालों के हवाले कर देते थे जो केबिन के बाहर उनका इंतज़ार कर रहे होते थेये सावरकर को शौचालय तक लेकर जाते थे इनको निर्देश थे कि वो सावरकर को कभी अंदर से शौचालय का दरवाज़ा न बंद करने दें और शौचालय के दरवाज़े को थोड़ा खुला रखा जाए शौचालय जाते समय सावरकर अक्सर ड्रेसिंग गाउन पहन लेते थे

सावरकर जानते थे कि भारत पहुंचने पर उन्हें फांसी या कड़ी सजा मिलना तय है। इसलिए उन्होंने रास्ते में ही भागने की गुप्त योजना बनाई। उन्हें उम्मीद थी कि यदि वे किसी तरह फ्रांसीसी धरती पर कदम रख देते हैं, तो फ्रांस के कानून के तहत उन्हें राजनीतिक शरण मिल सकती है। जिब्राल्टर में कुछ समय रुकने के बाद सात जुलाई को सुबह जहाज़ फ़्रांस के बंदरगाह मार्सेयेज़ पहुंचा। जहाज फ्रांस के मार्से बंदरगाह पर 'एंकर' हुआ। आठ जुलाई को सावरकर सुबह छह बजे ही उठ गए पंद्रह मिनट बाद उन्होंने अब भी नींद से भरे पार्कर से कहा कि क्या वो शौचालय जा सकते हैं? अनुमति मिल गई।

पार्कर उन्हें अकेले नहीं जाने देना चाहता था, इसलिए उसने केबिन का ताला खोला और सावरकर को शौचालय की दिशा में लेकर गया उसने दोनों भारतीय कांस्टेबलों सिद्दीक़ और अमर सिंह से उसके पीछे आने और सावरकर पर नज़र रखने के लिए कहा और अपने केबिन की तरफ़ लौट आया अंदर जाकर उन्होंने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। सावरकर ने जानबूझकर कर अपना नाइट गाउन पहन रखा था। शौचालय में शीशे लगे हुए थे ताकि अंदर गए क़ैदी पर नज़र रखी जा सके। सावरकर ने अपना गाउन उतार कर उससे शीशे को ढंक दिया। उन्होंने जहाज के शौचालय की गोल खिड़की (Porthole) के कांच को हटाया। खिड़की बहुत छोटी थी, लेकिन सावरकर ने अपने शरीर को सिकोड़कर बड़ी मुश्किल से खुद को बाहर निकाला। वे सीधे समुद्र के ठंडे पानी में कूद गए।

अमर सिंह ने शौचालय में झाँककर देखा दरवाज़े के नीचे की तरफ़ भी एक छेद था जहाँ से उसे चप्पलें दिखाई दे रही थीं, मानों उन चप्पलों को पहनने वाला कमोड पर बैठा हो पूरी तरह से निश्चिंत होने के लिए अमर सिंह ने शौचालय के अंदर का नज़ारा देखने की कोशिश की वहाँ उसने जो देखा उसे देखकर उसके होश उड़ गए सावरकर एक छोटे छेद से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे और उनका आधा शरीर बाहर भी निकल चुका था अमर सिंह चिल्लाया और शौचालय का दरवाज़ा खोलने के लिए दौड़ा तब तक सावरकर छेद से सरक कर समुद्र के पानी में कूद चुके थे। उन्होंने पहले से ही शौचालय के 'पोर्ट होल' को नाँप लिया था और उन्हें अंदाज़ा था कि वो उसके ज़रिए बाहर निकल सकते हैं। उनकी नासिक की तैरने की ट्रेनिंग काम आई और वो तट की तरफ़ तैरते हुए बढ़ने लगे। दोनों कांस्टेबल शोर मचाते हुए बाहर की तरफ़ दौड़े

डेक पर मौजूद एक गार्ड ने एक शख़्स को पानी में कूदते हुए देखा उसने उस शख़्स पर दो गोलियाँ भी चलाईं लेकिन सावरकर उन गोलियों से बच निकलने में कामयाब रहे। बंदूक की आवाजों और प्रहरियों के चिल्लाने से जहाज पर हड़कंप मच गया। तैरने के दौरान सावरकर को चोट लगी और उससे ख़ून बहने लगा। सुरक्षाकर्मी भी समुद्र में कूद गए और तैर कर उनका पीछा करने लगे। इसकी कई अलग-अलग वर्णन हैं कि जहाज़ से बंदरगाह से कितनी दूरी पर लंगर डाल रखा था? कुछ स्रोतों में ये दूरी एक किलोमीटर बताई गई है तो कुछ स्रोतों में इसे 30 मीटर तक बताया गया है

समुद्र में कूदने के बाद, सावरकर ने तैरना शुरू किया। वह करीब 15 मिनट तैर कर तट पर पहुंच गए। तट रपटीला था। पहली बार तो वो फिसले लेकिन दूसरे प्रयास में वो ज़मीन पर पहुंच गए। वो तेज़ी से दौड़ने लगे और एक मिनट में उन्होंने करीब 450 मीटर का फ़ासला तय किया। उनके दोनों तरफ़ ट्रामें और कारें दौड़ रही थीं। सावरकर क़रीब क़रीब नंगे थे। कांस्टेबल सावरकर के पीछे चोर! चोर! पकड़ो! पकड़ो! चिल्लाते हुए दौड़ रहे थे उनके साथ जहाज़ के कुछ कर्मचारी भी दौड़ रहे थे सावरकर की साँस बुरी तरह फूल रही थी वो टैक्सी रोकने के लिए चिल्ला रहे थे लेकिन तभी उन्हें महसूस हुआ कि उनके पास एक भी पैसा नहीं हैये भी दुर्भाग्य रहा कि उस इलाके में मौजूद अय्यर, मदाम कामा और वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय सावरकर की मदद के लिए समय पर नहीं पहुंच पाए जब स्टीमर लन्दन से चलने वाला था तो उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर को सुझाव दिया। 'भारत के रास्ते में नाव मार्सिले के बंदरगाहों पर रुकेगी।' .... और तदनुसार, 8 जुलाई 1910 को सावरकर, कड़े पहरे को चकमा देकर, मार्सिले तट के पास समुद्र में कूद गए। वह तैरकर फ्रांसीसी तट पर पहुँच गए। सावरकर के विचार कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के अनुसार अंग्रेज फ्रांसीसी धरती पर कुछ नहीं कर पाएंगे, चकनाचूर हो गए। उन्हें फिर से पकड़ लिया गया।

इस बीच फ़्रांस के सैनिक अफ़सर ब्रिगेडियर पेस्की भी सावरकर का पीछा करने वालों में शामिल हो चुके थे थोड़ी देर बाद वो सावरकर को पकड़ने में कामयाब हो गए सावरकर ने बहुत प्रतिरोध किया, लेकिन कई लोगों ने मिल कर उन्हें पकड़ ही लिया गया और वे गिरफ़्तार कर लिए गए।

सावरकर ने पकड़े जाने पर फ़्रेंच अफ़सर को संबोधित करते हुए कहा, 'तुम मुझे गिरफ़्तार करो मुझे मजिस्ट्रेट के सामने ले चलो' सावरकर का मानना था कि चूंकि अब वो फ़्रांस की भूमि पर हैं इसलिए अगर उन पर मुक़दमा चलता है तो वो फ़्रांस के कानूनों के अनुसार होगा क्योंकि फ़्रांस की धरती पर ब्रिटिश क़ानून लागू नहीं होंगे राजनीतिक क़ैदी के तौर पर वो फ़्रांस में राजनीतिक शरण पाने के हक़दार थे लेकिन ब्रिगेडयर पेस्की को एक शब्द भी अंग्रेज़ी नहीं आती थी और वो समझ ही नहीं सके कि सावरकर क्या कह रहे हैं

इसी बीच, जहाज के ब्रिटिश रक्षक और कप्तान भी दौड़ते हुए वहां पहुंच गए। उन्होंने फ्रांसीसी पुलिसकर्मी को झूठ बोला कि सावरकर एक आम चोर हैं जो जहाज से भागा है।  पेस्की ने सावरकर को भारतीय पुलिस वालों के हवाले कर दिया वो उनको खींचते हुए फिर से उनके केबिन में ले आए वहाँ सावरकर के साथ बहुत ख़राब व्यवहार किया गया और उन्हें हथकड़ियाँ पहना दी गईं

इस घटना के बाद उन्हें केबिन से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई शौचालय जाते समय एक पुलिस वाला हमेशा उनके साथ अंदर जाता सावरकर के बच निकलने के इस प्रयास ने पहले ही पावर और पार्कर का करियर तबाह कर दिया था अब उनकी पूरी कोशिश थी कि ऐसी घटना दोबारा न हो पाए मार्सेयेज़ में दो दिन रहने के बाद नौ जुलाई को जहाज़ 'एसएस मोरिया' आगे के लिए रवाना हुआ 17 जुलाई को जहाज़ अदन पहुंचा जहाँ सावरकर और उनकी निगरानी कर रहे लोग दूसरे जहाज़ 'सेलसेटे' पर सवार हुए 22 जुलाई को इस जहाज़ के बंबई पहुंचने तक सावरकर को दिन-रात हथकड़ियों में रखा गया उनको बंबई के पुलिस अधिकारी कैनेडी के हवाले किया गया उन्हें उसी दोपहर एक टैक्सी में विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन ले जाया गया और नासिक जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया गया नासिक पहुंचने पर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया विभागीय जाँच में इस घटना के लिए पावर को ज़िम्मेदार ठहराया गया उसका पद घटा दिया गया और उनके वेतन में 100 रुपये प्रति माह की कटौती कर दी गई

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, कोई भी विदेशी पुलिस किसी दूसरे संप्रभु देश (जैसे फ्रांस) की धरती पर किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती थी। फ्रांसीसी पुलिसकर्मी ने सावरकर को सौंपकर कानून तोड़ा था। अंग्रेजों ने इस खबर को दबाने की कोशिश की। लेकिन सावरकर के साथी काम पर लगे हुए थे। जब सावरकर के पेरिस में रहने वाले क्रांतिकारी मित्रों (जैसे मैडम भीखाजी कामा और श्यामजी कृष्ण वर्मा) को इसकी भड़काऊ खबर मिली, तो उन्होंने फ्रांस सरकार के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह खबर पूरी दुनिया में फैल गई। फ्रांस के अखबारों ने अपनी ही सरकार की आलोचना की। फ़्रांस की प्रेस ने ब्रिगेडियर पेस्की की कार्रवाई की 'राष्ट्रीय स्कैंडल' कह कर आलोचना की उनका कहना था कि जिस तरह एक राजनीतिक कैदी को ब्रिटेन के अधिकारियों को फ़्रांस की धरती पर फिर से गिरफ़्तार करने दिया गया, ये फ़्रांस की प्रभुसत्ता का उल्लंघन है फ़्रांस के तकरीबन हर अख़बार ने चाहे वो 'ले मोंड' हो या 'ले माटिन' या 'ले टेंप्स' सबने सावरकर को फ़्रांस में दोबारा गिरफ़्तार किए जाने की आलोचना कीकुछ दिनों बाद ब्रिटेन में फ़्रांस के राजदूत पियरे कौमबौन ने सावरकर के फ़्रांस प्रत्यर्पण की माँग की जहाँ से अंग्रेज़ों ने उन्हें फ़्रांस की सरकार की अनुमति के बग़ैर गिरफ़्तार किया था। मामला इतना बढ़ गया कि फ्रांस की ज़मीन पर हुई इस गिरफ़्तारी को  लेकर फ्रांस और ब्रिटेन के बीच राजनयिक विवाद पैदा हो गया। मामले को नीदरलैंड के हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में भेजा गया जहां ब्रिटेन के पक्ष में निर्णय हुआ। ब्रिटिश सरकार के भारी राजनीतिक दबाव के कारण, फरवरी 1911 में अदालत ने फैसला सुनाया कि गिरफ्तारी अवैध थी, लेकिन सावरकर को वापस फ्रांस को सौंपने की कोई जरूरत नहीं है। इस तरह सावरकर की कुछ मिनटों की आज़ादी ख़त्म हो गई और अगले 25 सालों तक वो किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों के क़ैदी रहे।

इस साहसिक घटना ने सावरकर को रातों-रात अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी बना दिया और ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता को दुनिया के सामने उजागर किया। सावरकर के समर्थन में यूरोप के कई दल सामने आए थे। कार्ल मार्क्स के पौत्र जीन लोंगयट (Jean Longuet) ने खुलकर सावरकर का समर्थन किया था। इटली का वाम-दल इटालियन रिपब्लिकन कान्ग्रेस (IPR) ने भी सावरकर के समर्थन में प्रदर्शन किया था।

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

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