महात्मा गांधी हत्या केस-9
नाथूराम विनायक गोडसे
पिछले चौदह वर्षों से गांधीजी को मारने की साज़िश रची जा रही थी। इसके कई
प्रयास भी हुए। उनमें से अधिकांश में पूना निवासी नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे
की संलिप्तता पाई गई। नारायण आप्टे इस दल का नेता हुआ करता था। नाथूराम गोडसे इस
दल का एक समर्पित सदस्य था। उसकी आप्टे के साथ घनिष्ठता थी।
गोडसे एक मध्यम वर्गीय चितपावन ब्राह्मण
परिवार से आता था। गांधीजी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले और लोकमान्य तिलक भी चितपावन
ब्राह्मण थे। चितपावन का मतलब होता है, "शुद्ध मन या पवित्र चेतना वाले"। गोडसे परिवार पश्चिम महाराष्ट्र के
उकसान गांव का रहने वाला था। उकसान बम्बई-पूना रेलमार्ग पर पड़ने वाला स्टेशन
कामशेट के निकट है। नाथूराम के पिता विनायक वामनराव गोडसे भारतीय डाक सेवा में एक
साधारण कर्मचारी थे।
परिवार में जो लड़के पैदा होते थे उनकी मौत
हो जाती थी। तीन बेटों की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी, जबकि केवल एक बेटी जीवित बची थी। किसी ने कहा कि यह परिवार को शाप है और इसको दूर करने के लिए लड़के को
लड़की की तरह पालना होगा। 19 मई 1910 को जिस
पुत्र का जन्म हुआ उसका नाम रामचन्द्र रखा गया। जब राम पैदा हुआ तो उसे लड़की की तरह पाला गया। उसकी नाक में छेद
कर दिया गया और नथ पहनाई गई। इस नथ के कारण उसे नथूराम ही कहा जाता रहा,
राम जो नथ पहनता हो। लेकिन आगे चलकर अंग्रेज़ी में लिखी गई स्पेलिंग के कारण
नथूराम .... नाथूराम हो गया और फिर उसका यही नाम प्रचलित हो गया। जब घर में एक और
बेटे (गोपाल गोडसे) का जन्म हुआ और वह सुरक्षित रहा, तब
जाकर माता-पिता का डर दूर हुआ। इसके बाद नाथूराम को नथ पहनना बंद कराया गया और उसे
लड़कों की तरह पाला जाने लगा।
परिवार में पहले से एक लड़की तो थी ही, नाथूराम के बाद दत्तात्रेय,
गोपाल और गोविंद के रूप में पुत्र और एक लड़की भी पैदा हुए। विनायक पत्नी लक्ष्मीबाई
गोडसे,
चार लड़कों और दो लड़कियों का पालन-पोषण बड़ी
मुश्किल से कर पाते थे। पिता के अकसर होने वाले तबादलों के कारण नाथूराम को अपने
जीवन के शुरुआती दिनों में अकेले ही जीवन यापन करना पड़ा। लड़कियों की तरह के उसके
रूप को देखकर लोग उसका मज़ाक़ उड़ाया करते थे। इससे वह लोगों से कतराने भी लगा और
एकांत में रहना पसंद करता। महिलाओं में उसकी कोई रुचि नहीं थी, वह शादी भी नहीं
करना चाहता था। धीरे-धीरे उसमें धार्मिक रुचि जगी। बचपन में नाथूराम अपनी मां के बहुत करीब था।
वह बेहद धार्मिक माहौल में पला-बढा और बचपन में उस पर पारंपरिक हिंदू ग्रंथों का
गहरा प्रभाव था। वह पढ़ाई में बहुत होनहार छात्र नहीं था। उसने गांव के स्कूल में ही मराठी माध्यम
से आरंभिक शिक्षा ग्रहण की। मैट्रिक की पढ़ाई के लिए वह पूना आ गया। अंग्रेज़ी में
कमज़ोर होने के कारण वह मैट्रिक नहीं पास कर पाया। अंग्रेजी शिक्षा में असफल होने
के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी।
पिता का रिटायरमेंट नज़दीक आ रहा था। अपने
परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए नाथूराम ने बढ़ई का काम शुरू किया। पर वह
उसे जमा नहीं। उसने टेलरिंग की डिप्लोमा कोर्स की। पूना में उसने कुछ दिनों तक
दर्ज़ी का काम भी किया। उसने फल बेचने का काम भी किया।
22 साल की उम्र में वह 1932 में सांगली (महाराष्ट्र) में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल हो गया
- एक ऐसा संगठन जिसका उद्देश्य हिंदू संस्कृति और एकजुटता की रक्षा करना था। वह एक
बेहद अनुशासित कार्यकर्ता था। जल्द ही उसने सांगली में संघ के कार्यों का विस्तार
किया और बौद्धिक बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगा।
कुछ साल बाद वह पूना चला गया, और हिंदू महासभा की स्थानीय शाखा का सचिव बना।
उसने हैदराबाद में निज़ाम के खिलाफ सविनय
अवज्ञा आंदोलन (1938-1939) में
भाग लिया, जहां हिंदू निजाम की मुस्लिम सरकार द्वारा
अपने अधिकारों से वंचित होने की शिकायत कर रहे थे। निज़ाम शासन द्वारा हिंदुओं पर
लगाए गए नागरिक और धार्मिक प्रतिबंधों के विरोध में हिंदू महासभा ने एक बड़ा
सत्याग्रह शुरू किया था। गोडसे ने पुणे से हिंदू महासभा के एक जत्थे (समूह) का
नेतृत्व किया और हैदराबाद रियासत में प्रवेश किया। इस विरोध प्रदर्शन के कारण नाथूराम को निज़ाम की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और कारावास
की सजा सुनाई गई। उसे कुछ समय के लिए जेल में डाल दिया। इस घटना से उनका कद संगठन
में काफी बढ़ गया।
अब तक वह हिंदू राजनीति में गहराई से
शामिल हो चुका था और इतिहास और समाजशास्त्र की व्यापक रूप से पढाई कर चुका था। गोडसे
ने भगवद् गीता का अध्ययन कर रखा था और उसके अधिकांश श्लोक उसे कंठस्थ थे। वह अपने हिंसा
के कृत्यों को सही ठहराने के लिए उन्हें उद्धृत करना पसंद करता था। वह एक उग्र
स्वभाव का व्यक्ति था जिसे वह आमतौर पर एक शांत और शांत बाहरी आवरण से छिपाने का
प्रयास करता था।
इस बीच उसके पिता का तबादला रत्नागिरी हो
गया। उन दिनों रत्नागिरी वीर सावरकर के कारावास
का स्थान बन गया था। 1937
में उसकी मुलाक़ात वीर सावरकर से हुई , जो उस समय रत्नागिरी में नजरबंद थे। उसने वीर
सावरकर के निजी सचिव के रूप में उनके साथ ग्रामीण इलाक़ों का दौरा भी किया था। उसने
वैवाहिक बंधन से मुक्त रहने का फैसला किया ताकि अपनी सारी ऊर्जा उस लक्ष्य के लिए समर्पित
करे जो उसने अपने सामने रखे थे। पूना में उसकी मुलाकात आप्टे से हुई, जो उस समय एक स्कूल शिक्षक के रूप में कार्यरत
था।
अपने विचारों को जनता तक पहुंचाने के लिए
गोडसे ने पत्रकारिता को माध्यम बनाया। 1944 में उसने अपने करीबी सहयोगी नारायण आप्टे के साथ मिलकर पुणे से 'अग्रणी' नामक एक मराठी दैनिक समाचार पत्र की शुरुआत
की। ब्रिटिश सरकार की सेंसरशिप और प्रतिबंधों के कारण ‘अग्रणी’ के बन्द हो जाने पर उसने ‘हिन्दू
राष्ट्र’ का सम्पादन शुरू किया। अपने लेखों के जरिए वह हिंदू राष्ट्रवाद का प्रचार
करता था। 1940 के दशक में जैसे-जैसे भारत की स्वतंत्रता और
विभाजन की रूपरेखा तैयार होने लगी, गोडसे का कांग्रेस और महात्मा गांधी की नीतियों के प्रति
विरोध अत्यधिक उग्र हो गया। वह कांग्रेस पर मुस्लिमों के प्रति तुष्टिकरण की नीति
अपनाने और भारत के विभाजन को स्वीकार करने का आरोप लगाता था। वह गांधीजी के
राजनीतिक नेतृत्व और अहिंसा के आंदोलन को नफ़रत और निराशा की गहरी भावना से देखता था। उसका मानना था कि गांधी जी की नीतियां
हिंदुओं के हितों के विपरीत और तुष्टीकरण को बढ़ावा देने वाली थीं। यही राजनीतिक और वैचारिक असंतोष अंततः 1948 में गांधीजी की हत्या का मुख्य कारण बना।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
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