महात्मा गांधी हत्या केस-7
क्या विभाजन के कारण गांधीजी की हत्या हुई?
भारत के विभाजन के बीज
औपनिवेशिक काल की 'फूट डालो और राज करो' की नीति, 1905 के धार्मिक आधार पर बंगाल विभाजन, 1909 के पृथक निर्वाचन मंडल (Separate
Electorates) और बाद में उभरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation
Theory) के राजनीतिक घटनाक्रम में तलाशे जा सकते हैं। ब्रिटिश राज द्वारा 19वीं सदी के उत्तरार्ध से शुरू की गई जनगणना ने
पारंपरिक और मिली-जुली भारतीय पहचानो को सख्त धार्मिक खानों में बांट दिया। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने हिंदुओं और
मुसलमानों के बीच राजनीतिक और सामाजिक दूरियां बढ़ाने की सोची-समझी नीति अपनाई। वायसराय
लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक सुधार का ढोंग कर बंगाल को भाषाई और धार्मिक आधार पर
विभाजित किया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रवादी एकता को तोड़ना था।
मार्ले-मिंटो सुधारों के तहत अलग मतदाता सूची बनाई गई, जिसने धर्म को राजनीतिक पहचान का मुख्य आधार
बना दिया। साम्प्रदायिक राजनीति को संस्थागत रूप देने के लिए ढाका में इसकी नींव
रखी गई। मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वारा यह प्रचारित किया गया कि हिंदू
और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं जो एक साथ नहीं रह सकते। डायरेक्ट एक्शन डे और
उसके बाद हुए भीषण दंगों ने राजनीतिक वार्ताओं के सारे रास्ते बंद कर दिए और अंततः
विभाजन अपरिहार्य हो गया।
गांधीजी के विरोध के बावजूद
विभाजन को स्वीकार कर लिया गया। पंजाब में बड़े पैमाने
पर दंगे तो अगस्त के पहले से ही चल रहे थे, और अगस्त 1947 तक 5,000 लोग मारे गए थे।
अप्रैल से जून तक घटनाएं इतनी तेज़ी से घटित हो रही थीं कि देश के नेता सांप्रदायिक
विस्फोट के नतीज़ों का आकलन करने में असमर्थ थे। उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा
नहीं था कि नक्शे पर लकीर खींचने का यह फैसला करोड़ों लोगों के जीवन को इतने भीषण
रक्तपात और विस्थापन में झोंक देगा। ब्रिटिश योजना और लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा
प्रक्रिया को बहुत जल्दबाजी में पूरा किया गया, जिससे किसी को तैयारी
का समय नहीं मिला। नेताओं को लगा कि कुछ तनाव होगा, लेकिन उन्होंने मानव
इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन और नरसंहार की कल्पना नहीं की थी। सरकारें और
सुरक्षा तंत्र रातों-रात पैदा हुई शरणार्थी समस्या और सीमा पार की हिंसा को
संभालने के लिए तैयार नहीं थीं। तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व ने गृह युद्ध को टालने
के लिए एक छोटे संघर्ष (बंटवारे) को बेहतर मान लिया था।
यह झूठी आशा ही साबित
हुई कि एक बार अंग्रेज़ चले जाएंगे तो भारतीय अपने मतभेद सुलझा लेंगे।
सांप्रदायिकता को तो एक ऐसे ज़िद्दी नेता ने हवा दी थी, जो किसी भी क़ीमत पर अपना
अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध था। उन दिनों गांधीजी कहा करते थे, “यदि लोगों ने विभाजन
स्वीकार नहीं किया, तो पाकिस्तान ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं सकता।” कुछ लोगों ने तो यह
तक आशा लगा रखी थी कि विभाजन शांतिपूर्ण होगा। उन्हें ऐसा लगता था कि जब पाकिस्तान
की मांग मंज़ूर कर ली जाएगी, तो फिर लड़ने के लिए क्या रह जाएगा? कुछ लोग कहते थे कि
यह जो नासूर है, यदि विभाजन के रूप में उसका ऑपरेशन हो जाता है तो सारा
साम्प्रदायिक उन्माद का पागलपन हवा हो जाएगा। लेकिन स्वतंत्रता के बाद सीमा के
दोनों ओर से जो नरसंहार शुरू हुआ वह सर्वनाशी युद्ध के सामने कुछ भी नहीं था।
कभी-कभी तो पूरी की पूरी रेलगाड़ी लाशों से भरी आती थी। एक अनुमान के अनुसार 1,80,000 लोग मारे गए थे।
इनमें से 60,000 लोग पश्चिम के थे और 1,20,000 लोग पूर्व के थे।
मार्च 1948 तक 60 लाख मुसलमान और 45 लाख हिंदू शरणार्थी बन चुके थे।
हमने ऊपर देखा है कि सन् 1934 से गांधीजी की हत्या के प्रयास किए जा रहे
थे। अत: विभाजन को गांधीजी की हत्या का कारण मानने का दवा सही नहीं
ठहरता। गांधीजी ख़ुद को सनातनी हिन्दू
कहा करते थे। गांधीजी हिन्दू थे परन्तु वे सब धमों को मानते
थे।
वे मानते थे कि सभी
धमों का मूल तत्त्व मानवता है। गांधीजी सहिष्णु हिन्दू थे। गांधीजी मुस्लिमों का तुष्टिकरण नहीं करते थे, बल्कि इसलाम, क्रिश्चियन आदि सभी धमों का आदर करते थे। वे सर्व-धर्म समभावी थे। गांधीजी का विश्वास था कि समन्वय, शान्ति, परस्पर विश्वास, एक-दूसरे के प्रति आदर की भावना से हम एक राष्ट्र होकर रह सकेंगे। गांधीजी कहा करते थे धर्म के आधार पर द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त स्वीकार करने पर
धार्मिंक दंगों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। गांधीजी हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते रहे।
गांधीजी ने एक लीगी नेता से कहा था, “मैं अपने प्राण देकर भी इसका सामना करना
चाहता हूं। मैं मुसलमानों को भारत की सड़कों पर रेंगने नहीं दूंगा। वे आत्मसम्मान
के साथ चलेंगे।” नेहरू की अंतरिम सरकार इस बढ़ते हुए साम्प्रदायिक
नरसंहार को असहाय होकर देखती रही। बिहार और नोआखाली के बिगड़ते हालात देखकर गांधीजी
की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। गांधीजी ने कहा भी था, “इतने दिनों से दिल्ली में रहकर मैंने ‘कुछ
भी उपयोगी सिद्ध नहीं’ किया। मुझे मानसिक वेदना हो रही है। देश में भाई-भाई का ख़ून
करने वाली छाया सर्वत्र छायी है।”
जुलाई के अंतिम सप्ताह में विभाजन परिषद ने
पंजाब के विभाजन क्षेत्रों में पचास हज़ार अफसरों और सैनिकों की एक सीमा सेना तैनात
कर दी। इसके बावजूद देश के अन्य भागों में सांप्रदायिक आग की लपटें थम नहीं रही
थी। गांधीजी को लगा, “ऐसी परिस्थिति में मेरा सच्चा स्थान राजधानी में नहीं
है। मुझे लोगों के साथ रहना चाहिए।” कश्मीर से लौटते हुए वे दिल्ली न जाकर लाहौर पहुंचे। 3 अगस्त को श्रीनगर से वह जम्मू गए फिर
रावलपिंडी। वहाँ के शरणार्थी कैम्पों में आश्रितों का हालचाल लिया। रावलपिंडी और
उसके आसपास के क्षेत्रों के क़रीब 9,000 शरणार्थियों ने वहां शरण ले रखी थी। उनकी अवस्था
बहुत ही भयानक थी। वहां के शरणार्थी चाहते थे कि गांधीजी उनके साथ कम से कम 15
अगस्त तक रहें, लेकिन ज़रूरी व्यस्तताओं के कारण उन्हें लौटना ही था। उन्होंने कहा,
मैं अपनी जगह डॉ. सुशीला नय्यर को छोड़े जा रहा हूं। यह आपकी हर तरह से देखभाल
करेगी। लौटते वक़्त वे पंजा साहेब गुरुद्वारा भी गए। इस पर मुसलिम भीड़ द्वारा दो
बार आक्रमण हुआ था। वहां से वे सीधे ट्रेन पकड़ने के लिए लाहौर स्टेशन पहुंचे जहां
से पटना होते हुए कलकत्ता होकर नोआखाली जाते। जो गांधीजी का विचार था, उसके कारण 15
अगस्त के स्वाधीनता-दिवस के अवसर पर सरकारी उत्सव में दिल्ली में गांधीजी का कोई
स्थान नहीं था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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