महात्मा
गांधी हत्या केस-12
नारायण दत्तात्रय आप्टे
1911 में जन्मे नारायण दत्तात्रय आप्टे (1911 – 15 नवंबर 1949) पूना के रहने वाले एक संभ्रांत मध्यम वर्ग के शिक्षित ब्राह्मण
परिवार से था। वह बहुत तेज़ तर्रार और आकर्षक व्यक्तित्व का शख्स था, जिसकी रुचि अच्छा
खाना, महिला और मदिरा में बहुत ही
अधिक थी। वह शानदार वस्त्रों के पहनने का शौकीन था। हमेशा अच्छे और महंगे कपड़े
पहनता था (अक्सर सूट और टाई या अपनी सैन्य वर्दी)। उसके पिता दत्तात्रेय आप्टे संस्कृत के विद्वान और एक
प्रख्यात इतिहासकार थे। तीन बहनों और चार भाइयों में वह सबसे बड़ा था। उसने मैट्रिक
की पढ़ाई पूना से और विज्ञान में स्नातक (बीएससी) की पढ़ाई बंबई विश्वविद्यालय से 1932
में पूरी की थी। पुणे के एक प्रभावशाली परिवार की पुत्री चम्पा फडतारे से उसकी
शादी हुई थी।
तीन वर्षों की
बेरोज़गारी के बाद अहमदनगर के अमेरिकन मिशन हाई स्कूल में उसे नौकरी मिली। उसने
शिक्षक के रूप में अपना कैरियर आगे बढ़ाने के लिए बी.एड. भी कर लिया। राजनीतिक रूप
से वह वीर सावरकर की विचारधारा से प्रभावित था। जब वह अहमदनगर में था उसने एक
राइफल क्लब की स्थापना की थी, जिसे बाद में व्यापक
प्रचार-प्रसार मिला। इसी बीच चंपा ने पुत्र को जन्म दिया। लेकिन दुर्भाग्य से
बच्चे का सामान्य मानसिक विकास नहीं हो रहा था। करकरे और आप्टे ने मिलकर हैदराबाद
के निज़ाम के ख़िलाफ़ (रज़ाकारों से) आक्रमण का कई अभियान चलाया।
द्वितीय
विश्वयुद्ध छिड़ जाने के बाद महासभा ने अंग्रेज़ों का साथ देने की नीति अपनाई थी। निर्णय
यह लिया गया था कि वे ब्रिटिशों को सहयोग प्रदान करें और सेना में भर्ती हों। आप्टे
ने रॉयल इंडियन एअर फोर्स में बतौर वॉर टाइम रिक्रूटर (भर्ती अधिकारी) की नौकरी शुरू कर दी। उसकी फ्लाइट लेफ्टिनेंट के अस्थाई
पद पर पूना में पोस्टिंग हुई। अब वह यूनिफॉर्म पहने का अधिकारी हो गया था। वह
अहमदनगर छोड़कर पूना आ गया। बाद में उसे स्थाई रूप से कमीशंड ऑफिसर का पद ऑफर किया
गया, लेकिन व्यक्तिगत कारणों से उसने इसे स्वीकार नहीं किया।
कांग्रेस ने देश
के लोगों से आह्वान कर रखा था कि लोग ब्रिटिश सेना में भर्ती न हों, इसलिए आप्टे
के पास कोई खास काम होता नहीं था। उसका अधिकांश समय ख़ाली ही बीतता था। इसलिए अब वह
अधिक से अधिक समय महासभा की गतिविधियों में लगाया करता था। 1942 में हिन्दू राष्ट्र दल नामक संस्था
का गठन किया गया, जिसके अधिकांश सदस्य महासभा से थे। नाथूराम और आप्टे ने दल की
सदस्यता ले ली। 1940 के दशक के शुरुआती वर्षों में पुणे में हिन्दू महासभा की गतिविधियों और
राष्ट्रवादी विचारधारा के माध्यम से आप्टे की मुलाकात नाथूराम गोडसे से हुई और
दोनों की दोस्ती हो गई। इसके सदस्यों को मार्शल ट्रेनिंग दी गई। उन्हें असहिष्णुता
और कट्टरता में अटूट विश्वास था। ये कांग्रेस की बैठकों को बाधित करते थे, उनके
नेताओं को परेशान करते थे और गांधीजी को आघात पहुंचाने का इरादा रखते थे। यह वह
समय था जब गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो’ का आंदोलन का अह्वान किया था। ये लोग गांधीजी और
कांग्रेस पर मुसलिम समर्थक होने का आरोप लगाते थे और कहते थे कि यदि हिन्दू
राष्ट्र की स्थापना करनी है, तो गांधीजी और कांग्रेस छुटकारा पाना होगा। 1934 से
ही गांधीजी पर कई जानलेवा हमले होना शुरू हो गए थे, जिनका कहीं न कहीं तार पूना,
आप्टे और नाथूराम गोडसे से जुड़ा होता था।
1943 में वह शाही भारतीय वायु सेना (Royal Indian Air Force) में शामिल हुआ और उसे किंग्स कमीशन (फ्लाइट लेफ्टिनेंट के रूप में राजपत्रित) से सम्मानित किया गया। चार महीने बाद उसने
इस्तीफा दे दिया क्योंकि उसके छोटे भाई की मृत्यु के कारण परिवार के मामलों को
देखने के लिए उसे घर लौटना पड़ा।
नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे का
संबंध बेहद गहरा, अटूट और एक-दूसरे के पूरक व्यक्तित्वों का
मेल था। वैचारिक रूप से वे एक ही सिक्के के दो पहलू थे, लेकिन निजी जीवन में दोनों एक-दूसरे से
पूरी तरह विपरीत थे। दोनों 'हिंदू राष्ट्र' की विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। नाथूराम
गोडसे बेहद गंभीर, बेहद सीधा, ब्रह्मचारी, सादा
खादी का कुर्ता-पायजामा पहनने वाला और महिलाओं से दूरी बनाकर रखने वाला व्यक्ति था।
संन्यासी जैसी जीवनशैली जीने वाला गोडसे अक्सर अंतर्मुखी रहता था। वहीं नारायण
आप्टे इसके बिल्कुल विपरीत था। आप्टे को आधुनिक जीवनशैली पसंद थी। आप्टे काफी बातूनी, आत्मविश्वासी और सामाजिक रूप से बहुत
सक्रिय था। वह अच्छा सूट पहनता था, अंग्रेजी में पारंगत था, सिगरेट-शराब का सेवन करता था और महिलाओं
के बीच काफी लोकप्रिय था। गोडसे को आप्टे की दुनियादारी, प्रबंधन क्षमता और अंग्रेजी पर पकड़ की जरूरत थी, जबकि आप्टे को गोडसे के वैचारिक जुनून और
लेखन क्षमता पर भरोसा था।
1944 में नाथूराम ने आप्टे के समक्ष एक अख़बार
निकालने का प्रस्ताव रखा। आप्टे ने नाथूराम के साथ इस ‘अग्रणी’
नामक समाचार पत्र से प्रकाशक के रूप में जुड़ जाने की सहमति दे दी। गुडी पड़वा, महाराष्ट्र के नव वर्ष के
उपलक्ष्य में अग्रणी का पहला अंक निकला। नाथूराम इसका संपादक था और आप्टे प्रकाशक।
वीर सावरकर ने इस अख़बार को निकालने के लिए 15,000 रुपयों की वित्तीय सहायता (ऋण
के रूप में) दी थी। समाचार पत्र की भाषा और विषय-वस्तु अत्यंत उग्र
थी। इसे अनेकों बार नोटिस मिला और जब यह स्थिति उत्पन्न हो गई कि इसे बंद करना
पड़ता, इसका नाम बदल कर ‘हिन्दू राष्ट्र’ कर दिया गया। इसमें आप्टे प्रबंधक
(Manager) के रूप में कार्य करता था। गोडसे के साथ उसके घनिष्ठ संबंध ने उसे यह
विश्वास दिला दिया कि राजनीतिक क्षेत्र में शांतिपूर्ण तरीकों से कुछ भी हासिल नहीं
किया जा सकता है।
1944 में जब
गांधीजी आगा ख़ां महल की क़ैद से स्वास्थ्य के आधार पर रिहा हुए, तो उन्होंने
स्वास्थ्य लाभ के लिए कुछ महीने पूने के निकट एक पर्वतीय स्थल पंचगनी में गुज़ारी।
यहां पर आप्टे और नाथूराम ने हिन्दू राष्ट्र दल की तरफ़ से लगभग एक सप्ताह तक
गांधीजी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा था। गांधीजी के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी और अन्य अशोभनीय
कार्यों के चलाने के कारण आप्टे को गिरफ़्तार कर लिया गया। पुलिस अधिकारी एन.वाई.
देउलकर ने मज़ाक़ में कहा, “गांधीजी का विरोध
कर गिरफ़्तार हुए हो, तो तुम लोग भी देशप्रेमी और शहीद कहलाए जाओगे।” उस युवक ने जवाब
दिया, “नहीं, अभी नहीं। गांधी की
हत्या कर देंगे, तब शहीद बन जाएंगे।” पुलिस ने फिर
मज़ाक़ में कहा, “यह सब अपने नेताओं पर क्यों
नहीं छोड़ देते? वे इस काम को कर डालें।” उस युवक ने जवाब
दिया, “इतने बड़े सम्मान के लायक़ गांधी
नहीं हैं। उनको समाप्त करने के लिए हमारा यह जमादार ही काफ़ी है।” जिस साथी को वह
जमादार कह रहा था, छूरा रखने वाला वह शख्स नाथूराम विनायक गोडसे था। साढ़े तीन साल
बाद उसकी यह बात सच हो गई।
द्वितीय विश्व युद्ध की
समाप्ति के बाद आप्टे और गोडसे अख़बार के प्रसार में लग गए। देश में साम्प्रदायिक
महौल भी बिगड़ता जा रहा था। अख़बार के भड़काऊ लेखों वाले रवैये के कारण उसके विरुद्ध
सख्त कार्रवाई की जा रही थी। तब प्रांत में कांग्रेस की सरकार थी। आप्टे और गोडसे
को लगा कि सरकार उसके ख़िलाफ़ बदले की भावना से प्रेरित होकर कार्रवाई कर रही है। वे
हिन्दू महासभा के कामों में सक्रियता से लग गए। 1939 में ही आप्टे ने हिन्दू महासभा की अहमदनगर शाखा ज्वायन
कर लिया था, जिसका प्रमुख विष्णु आर. करकरे हुआ करता था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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