गुरुवार, 7 जून 2012

आँच – 112- हन्टर बरसाते दिन मई और जून के


आँच – 112-  हन्टर बरसाते दिन मई और जून के
हरीश प्रकाश गुप्त
हिन्दी ब्लाग लेखन में नवगीत विधा में श्री जयकृष्ण तुषार एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे नियमित लिखने वाले रचनाकारों में से एक हैं। उनके नवगीत बहुत प्रभावित करते हैं। उनकी संवेदनशीलता, उनकी अनुभूति एवं उनकी अभिव्यक्ति निसंदेह मर्मशपर्शी है। उनकी दृष्टि बहुत पैनी है जिससे विषय तक उनकी पहुँच सहज और आसान हो जाती है। जब वे अपनी अनुभूति को अभिव्यक्ति में रूपान्तरित करते हैं तो भाषा पर उनका अधिकार रचना को आकर्षक और सम्प्रेषणीय बना देता है।
वैसे तो श्री तुषार राज्य विधि सेवा में अधिकारी हैं, जो पेशा न केवल नीरस माना जाता है बल्कि उनके पेशे को भावनाशून्य और संवेदनाशून्य की संज्ञा भी दी जाती है। ऐसे परिवेश में भी श्री तुषार की सशक्त लेखनी का उदय परिवेश के निविड़ अन्धकार में प्रकाश विन्दु की तरह चमकता दिखाई देता है। उनका संबन्ध प्रदेश की साहित्यिक सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद से है जहाँ से संबन्ध रखने वाले हिन्दी के अनेक विद्वानों, लेखकों और कवियों ने साहित्याकाश में जगमग प्रकाशित किया है। इस परम्परा को प्रतिष्ठित करने में श्री तुषार का योगदान कमतर प्रतीत नहीं होता है।
आँच के इस स्तम्भ में श्री तुषार की रचनाओं पर पहले भी चर्चा होती रही है। आज के अंक में उनकी एक और रचना “हन्टर बरसाते दिन मई और जून के” को लिया जा रहा है। उनका यह नवगीत अभी पिछले माह ही उनके ब्लाग छान्दसिक नवगायन पर प्रकाशित हुआ था। यह नवगीत वर्तमान परिवेश में आम आदमी की आवश्यकता, उसे पूरा करने की जद्दोजहद, खोखली व्यवस्था की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार तथा अन्ततोगत्वा आम आदमी के हाथ लगने वाले निराशाजनक परिणाम का बहुत ही स्वाभाविक सा चित्रण है।   
आज यदि हम आम आदमी की स्थिति को देखें तो यह आर्थिक, सामाजिक और आधिकारिक – सभी मोर्चों पर अत्यन्त दयनीय हो चुकी है। व्यवस्था उसका कोई हित नही कर पा रही है। या यो कहें कि उसमें उसकी हितसिद्धि के प्रति कोई आस्था नहीं हैं तो भी गलत नहीं होगा। एक व्यवस्था जाती है और दूसरी व्यवस्था आती है। व्यवस्थाओं के इस परिवर्तन को बेचारी जनता मूकदर्शक बनी देखती रहती है और स्वयं को ठगा सा महसूस करती है क्योंकि उसे जो बदलाव चाहिए या उसके लिए जो अपेक्षित है, वह तो हासिल होता नहीं। बस चेहरे मात्र बदल जाते हैं। शीर्ष पर बैठे न्यूनाधिक सभी लोगों के आचरण और संस्कार एक समान हैं अर्थात सत्ता का सुख भोगने के लिए सत्ता का प्रियपात्र बनना और इसमें वे सफल भी रहते हैं। उनके इस उपक्रम में आम जनता उपेक्षित तथा परित्यक्त सी रह जाती है और उसके सुख तिरोहित हो जाते हैं। यह स्थिति अत्यंत त्रासदपूर्ण है। आज भ्रष्टाचार और अनैतिकता, दोनों इतने मुखर और व्यापित हो चुके हैं जिससे यह आकलन करना कठिन है कि शुचिता कहाँ है और अनैतिकता कहाँ। जिन्हें जिस कार्य का उत्तरदायित्व दिया गया है वही उसको खोखला करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे और आदर्शों का झूठा आवरण ओढ़े मजे लूट रहे हैं। अतः उन पर विश्वास करना कठिन है।
आम आदमी को दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। बावजूद इसके, उसे अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना है, चाहे जैसे करे। हँसना उसकी नियति से तो रूठ ही गया है। जिसके पास शक्ति है, ताकत है वही उसका नियंता है। ताकत के भयवश उसका निर्णय, उसका आदेश मजबूरन शिरोधार्य होता है, चाहे सही हो या गलत। इस क्रम में कभी-कभी उसे अपने जीवन की आहुति भी देनी पड़ती है। जब उसके नियंताओं का चरित्र ही इतना कलुषित है तो वह किससे उम्मीद की आस लगाए। कभी वह भविष्य में आशाओं का बिम्ब देखता है तो कभी यथार्थ उसकी आशाएँ छीन उसे चिन्तित कर देता है। उसकी स्थिति परेशानियों से उबर पाने की नहीं बल्कि उन्हीं में और डूबते उतराते रहने की है और यही उसकी नियति है।  
श्री तुषार का यह नवगीत बहुत हृदयस्पर्शी है जो आम आदमी की पीड़ा को मौलिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है।गीत की शब्दयोजना विषयानुकूल है। प्रांजलता इसकी विशिष्टता है। यदि एक-दो स्थानों को छोड़ दें तो यह आद्योपांत सुन्दर बन गई है। उन्होंने इस नवगीत को नवीन बिम्बों में पिरोया है जो न केवल पद में स्वाभाविक अर्थ भरते हैं बल्कि उसे मार्मिक भी बनाते हैं। जब वह व्यवस्था के भ्रष्ट होने और उसके आदर्श का अवलम्ब लेने की बात कहते हैं तो बात सहजता और सरलता से सम्प्रेषित हो जाती है, देखें –
मूर्ति के
उपासक ही
मूरत के चोर हुए
बापू के
चित्र टाँग
दफ्तर घूसखोर हुए
इसी प्रकार, साधन विहीन होने के बावजूद उत्तरदायित्वों के निर्वाह के प्रति प्रतिबद्धता कवि की सामर्थ्य को दर्शाती है –
हाँफ रही
गौरय्या
चोंच नहीं दाना है,
इस पर भी
मौसम का
गीत इसे गाना है
भविष्य की आशाओं और वर्तमान की चिन्ताओं का चित्रण –
जेठ की
दुपहरी में
सोचते आषाढ़ की,
सूखे की चिंता में
कभी रहे बाढ़ की
व्यवस्था परिवर्तन के बावजूद कुछ भी न बदलने, सब कुछ वैसा ही रहने की पीड़ा शब्दों की सीमा में अभिव्यक्त हुई है –
आचरण
नही बदले
बस हुए तबादले
जनता के
उत्पीड़क
राजा के लाडले
आम आदमी का परेशानियों से निजात न पाना, बल्कि दूसरों द्वारा उन परेशानियों के और गहराए जाने की वेदना मर्माहत करने वाली है -
खुजलाती
पीठं पर
कब्जे नाखून के।
कवि ने जनता के उपेक्षित और त्याज्य होने के अर्थ में जो बिम्ब कटे हुए/बाल हुए/ हम सब सैलून के प्रयोग किया है वह न केवल अभिनव है बल्कि पूरे अर्थ को उद्घाटित करता है। हालाकि इसमें हुए की पुनरावृत्ति कुछ भ्रमित करती है। यहाँ यदि इस पुनरावृत्ति से बचा जाता तो पंक्ति उत्तम हो सकती थी। इसी प्रकार, दूसरे पद में सूखे की/ चिंता में/ कभी रहें बाढ़ की में रहें अर्थ के प्रवाह और उसकी दिशा में बाधक है। तीसरे पद में दौरे हैं रोज/ हनीमून के  में पंक्ति विभाजन दौरे हैं के पश्चात होता तो उपयुक्त होता - दौरे हैं/ रोज हनीमून के। इसी प्रकार चौथे पद में अन्त्यानुप्रास की परवाह किए बिना यदि नहीं बदले के स्थान पर बदले नहीं करते हैं तो इससे बदले पर जो बलाघात आता है वह अर्थ को द्विगुणित करता है। पूरे नवगीत में एक बिम्ब बिलकुल अलग-थलग प्रतीत होता – भिक्षुक को आते हैं सपने परचून के। यह गीत की भावभूमि से संगतता पाने में असमर्थ है। बावजूद इसके यह नवगीत बहुत आकर्षक है।
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12 टिप्‍पणियां:

  1. मन मोहक जयकृष्ण तुषार जी की की रचनाओं की सुंदर समीक्षा,,,,,

    MY RESENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: स्वागत गीत,,,,,

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  2. Tusharji waqayee bahut badhiya likhte hain! Bahut sundar aalekh!

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  3. बढ़िया समीक्षा.. जयकृष्ण तुषार जी के नवगीतों का आनंद उठाते रहते हैं अक्सर..

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  4. आंच को फिर से नियमित करने के लिए हार्दिक शुभकामना. तुषार जी का नियमित पाठक हूं मैं. समीक्षा गुप्त जी की प्रतिष्ठा के अनुरूप है. आंच पर अगली समीक्षा की प्रतीक्षा ...

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  5. तुषार जी को नियमित पढ़ती रही हूँ. आपने उनकी रचनाओं की सुन्दर समीक्षा की है.

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  6. bahut hee acchi sameeksha..is tarah ke prayso se pathko ke sath sath ham jaise likhne walo ko bhee margdarshan milta hai..sadar badhayee ke sath

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  7. खुबसूरत विश्लेषण और समालोचना

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  8. तुषार जी के नवगीत मुझे हमेशा प्रभावित करते रहे हैं। आमजन की पीड़ा को वे जिस सहजता से अभिव्यक्त कर ले जाते हैं वह अनुकरणीय है।

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  9. सुंदर समीक्षा...सामयिक कविता...गहन विवेचन...

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