मंगलवार, 5 जून 2012

“विश्व पर्यावरण दिवस पर ”


विश्व पर्यावरण दिवस पर ”

मनोज कुमार

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। हमारा नारा है, कि “हम कल के लिए आज विश्व को संरक्षित करें!” बढ़ती आबादी, आधुनिकीकरण, शहरीकरण और औद्योगीकरण की हमारी लालसा ने हमारे ऊपर ही संकट उत्पन्न कर दिया है। औद्योगिक विकास के कारण पृथ्वी के जीवन पर दबाव पड़ रहा है। जीवन खतरे में पड़ गया है। सौर प्रणाली में ढ़ेर सारे भौतिक और रासायनिक बदलाव आ रहे हैं। जीवनोपयोगी प्रणालियों में भी परिवर्तन आ रहा है। जीवन की न सिर्फ़ गुणवत्ता नष्ट हो रही है बल्कि जीवन की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं। फसलों की पैदावार घट रही है। जल-संकट गहराता जा रहा है। आज पृथ्वी की पर्यावरण चिन्ता सर्वाधिक महत्वपूर्ण सरोकार और गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि आज हम खुद को बचाने के उपाय ढ़ूंढ़ रहे हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल बीस लाख से भी अधिक लोग जल प्रदूषाण से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।
  • दुनिया के चालीस प्रतिशत से भी अधिक लोग जल-संकट का शिकार हैं।
  • भारत के 114 से भी अधिक शहरों में सीवेज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
  • गंगा नदी के 100 मिली जल में 60,000 मिली बैक्टेरिया पाए जाते हैं। यह नहाने के जल से 120 गुना प्रदूषित है।
  • संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल शहरी प्रदूषण से सात लाख से भी अधिक लोग वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।
  • पिछली एक सदी में पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में 0.80 सेल्सियस की बढोत्तरी हुई है।
  • पृथ्वी पर ज्ञात 5,487 स्तनधारी प्रजातियों में से 1,141 पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

वर्षों पूर्व गांधी जी ने आने वाले संकट को भांप लिया था। एक रोचक दृष्टांत से बात को आगे बढ़ाते हैं। गीता के तीसरे अध्याय का चौदहवां श्लोक है –
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४॥
अर्थात्‌ सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा से यज्ञ होती है। यज्ञ कर्म से होता है। 

इस श्लोक की व्याख्या करते हुए गांधी जी ने 15 अक्तूबर 1925 के ‘यंग इंडिया’ के अंक में लिखा था “अन्न जो समस्त प्राणि जगत के जीवन का आधार है वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से अर्थात्‌ शारीरिक श्रम से होती है। यह भली-भांति स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है जहां वन के वृक्षों को को काटकर धरती को नंगा कर दिया गया वहां वर्षा बंद हो गई और जहां वृक्ष लगाए गए वहां वर्षा होने लगी। वर्षा से वनस्पतियों की वृद्धि होती है और धरती की जलग्रहण क्षमता बढ़ती है।” आज से लगभग आठ दशक पूर्व गीता की व्याख्या को पर्यावरण की चिन्ता से जोड़कर प्रस्तुत करना निश्चय ही एक असाधारण विचार था।

अपने स्वार्थ और स्पर्धा के नंगे नाच में मनुष्य अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु अपनी आत्मा को खो बैठा है। विकास और औद्योगीकरण का कितना भयावह परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं यह जग ज़ाहिर है। पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए गांधी जी कहते थे कि शहरी औद्योगिक सभ्यता का विकल्प ग्राम्यकरण है। उनका मानना था कि गांवों का समाज मनुष्य और प्रकृति के सामंजस्य पर आधारित होता है। मनुष्य और प्रकृति में सामंजस्य बिठाना यह चिंतन सिर्फ़ हमारे देश के लिए ही लागू नहीं होता, यह सारे संसार के लिए प्रासंगिक है।

इसका यह कदापि मतलब नहीं है कि गांधी जी आधुनिक मशीनों के ख़िलाफ़ थे। वे अमानवीय मशीन के खिलाफ़ थे। वे तो चाहते थे कि ऐसी तकनीक और ऐसी मशीनों का प्रयोग हो जो गांव वालों की पहुंच में हो। इसका मतलब यह था कि यदि अत्याधुनिक और महंगी तकनीक का इस्तेमाल खुले आम होने लगा तो सिर्फ़ विकसित और आर्थिक रूप से सक्षम गांव ही उसका लाभ उठा सकते थे। गांधी जी शहर द्वारा गांवों के दोहन और शोषण का विरोध करते थे। वे लघु उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने के पक्ष में थे। वे अंधाधुंध शहरीकरण और उद्योगीकरण के खिलाफ़ थे। प्रकृति के बेहिसाब दोहन के खिलाफ़ थे। वे गावों की आत्मनिर्भरता की पैरवी आजीवन करते रहे। वह मानते थे कि शहरों की स्फीत धमनियों में बहता हुआ रक्त दरअसल गांव की संकुचित होती धमनियों से बेरहमी से निचोड़ा गया रक्त है। विश्व के समृद्ध समाज की भूख पल-पल विकराल होती जा रही है। उस पर नियंत्रण बहुत ज़रूरी है। बिना इसके पर्यावरण की रक्षा की बात बेमानी है।

गांधी जी का विश्वास अहिंसा की नीति में था। वे एक अहिंसक समाज की स्थापना के पक्षधर थे। एक ऐसा समाज जहां किसी भी व्यक्ति का शोषण न हो। इस तरह से स्वदेशी की भावना का भी विकास होता। यह भावना विदेशी चीज़ों के इस्तेमाल से लोगों को रोकती। ग्रामीण लोगों को रोज़गार के पर्याप्त अवसर मिलते। अंततोगत्वा वे न्यासीकरण के सिद्धांत को अमल में लाना चाहते थे। यानी भूमि का स्वामित्व सामूहिक होता। लोग मित्रवत रहते क्योंकि यह समाज अहिंसक समाज होता। ऐसा समाज आधुनिक अवधारणा और तौर तरीकों के रूप में नहीं था।

वे चाहते थे कि धरती के संसाधनों का समूची मानवता के लिए भगवान का उपहार मानकर मौज़ूदा और आने वाली पीढियों को ध्यान में रखकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लोभ-लालच के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। इससे जैविक ह्रास होता है। फलतः पारिस्थिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है और यह तबाही का कारण बनता है। आज पर्यावरणविद्‌ भी गांधी जी के इस विचार से सहमत हैं कि औद्योगिक समाज ही मुख्यरूप से जिम्मेदार है इस विनाश का। गांधी जी ने भौतिकवादी होने के वजाय नैतिक मूल्यों को तरजीह दी। वे साधारण और किफ़ायती जीवन के हिमायती थे। उनका मानना था कि यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो विज्ञान और प्रद्योगिकी का सुनियोजित और संतुलित विकास होना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का व्यवहार किया जाना चाहिए।

इस तरह से हम देखते हैं कि गांधी जी के विचार समय से बहुत आगे के थे। पर्यावरण की चिंता उनकी प्राथमिकता थी। वे आश्रम में रहते थे। वहां एक खुला ग्रामीण परिवेश होता था। चाहे वह दक्षिण अफ़्रीका में फिनिक्स का हो, या साबरमती का या वर्धा का, यहां मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित था। गांधी जी प्रकृति के साथ प्रेम के बारे में केवल बोलते नहीं थे, बल्कि अपने आश्रमों के माध्यम से अनुभव भी करते थे। आज उनके विचार बहुत प्रासंगिक हो गए हैं। आज आर्थिक-सामाजिक, पर्यावरणीय मोर्चे पर गंभीरता से गांधीवादी दृष्टिकोण से पुनर्विचार बहुत ज़रूरी हो गया है। गांधी जी का सारा जीवन और उनके सारे काम पर्यावरण के संरक्षण का उदाहरण है। उनका पूरा जीवन ही संदेश है। उनका मानना था कि “यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।”

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज के दिन हमें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। हम विकासशील और विकसित बनने की होड़ में इतना असंतुलन पैदा कर चुके हैं कि सारा समाज ही अस्तव्यस्त हो गया है। नई वैश्विक ज़रूरतों ने एक अलग किस्म की नीतियों का मार्ग प्रशस्त किया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मुनाफ़ा कमाने की होड़ से उत्पन्न आर्थिक गतिविधियों के कारण सारे संसार में पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो रही है, हो चुकी है। ग्रीन हाउस, ओज़ोन परत में छेद, आदि इसके कुपरिणाम हैं। हम जागरूक होने की जगह इस अंधी दौड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं, अगर तुरत न संभले तो इतनी देर हो चुकी होगी कि स्थिति संभाल के बाहर चली जाएगी और संकट के बादल हमारे सर पर तो मंडरा ही रहे हैं। हमें उपभोक्तावादी संस्कृति से बाहर आना होगा। आम लोगों के जीवन के स्तर में यदि हम सुधार लाना चाहते हैं तो परंपरागत क्षेत्रों में हमें इसके हल तलाशने होंगे। पर्यावरण हमारे लिए एक साझा संसाधन है। इस संसाधन का उचित इस्तेमाल हो, दोहन नहीं, यह सबकी जिम्मेदारी है।
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14 टिप्‍पणियां:

  1. सहमत हूँ आपसे ... इस संसाधन का उचित इस्तेमाल हो, दोहन नहीं ... यह सबकी जिम्मेदारी है।

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  2. पर्यावरण से प्यार करो,इससे न खिलवाड करो,
    यही हमारा प्राण रक्षक, इसको न विषाक्त करो

    MY RESENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: स्वागत गीत,,,,,

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  3. इस संसाधन का उचित इस्तेमाल हो, दोहन नहीं, यह सबकी जिम्मेदारी है।

    .....बिलकुल सच कहा है...बहुत सारगर्भित आलेख..

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  4. “यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।”

    sarthak sandesh ...
    uttam vichar ...!!

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  5. पर्यावरण प्रदुषण के आंकड़े खतरनाक स्थिति तक पहुँच गए हैं... स्थिति बिगड़ती ही जायेगी अगर अब न जागे....
    सचेत करता विचारोत्प्रेरक आलेख सर....
    सादर.

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  6. संसाधनों पर नहीं, वरन इनके साथ रहना हो।

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  7. सही कहा है ..प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण के प्रति ईमानदारी से बस अपनी जिम्मेवारी को ही निभाने लगे तो सबका कल्याण अवश्य होगा.. अति सुन्दर लिखा है..

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  8. आत्म निरीक्षण तो कमोबेश हर क्षण की मांग है ! अपने पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को निभा पाने में हम असफल रहे हैं , यह भी सत्य है किन्तु एक सत्य और भी है कि इस गुनाह में हमारा ( विकास शील देशों का ) हिस्सा उतना नहीं है जितना कि पश्चिमी देशों ( विकसित देशों का ) का !

    आपका आलेख सार्थक और तथ्यपरक है ! अस्तु सहमत !

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  9. 'शान्तिरन्तरिक्षं, शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः. शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः ''
    -सर्वत्र शान्ति की जो कामना हमारे मनीषियों ने की थी वह इसीलिये कि जड़-चेतन का जीवन स्वस्थ और स्वस्तिपूर्ण हो सके .शान्ति तभी संभव है जब सभी तत्त्वों में सामंजस्य रखा जाये,जो आज समाप्त होता जा रहा है ..

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  10. पर्यावरण सुरक्षा और गांधी जी की पर्यावरण के प्रति सामयिक दृष्टि को समेटे एक उपयोगी आलेख। यह भविष्य के प्रति हमें सचेत करता है और जीवन में पर्यावरण की सुरक्षा के महत्त्व को रेखांकित करता है। सुंदर और मेहनत से तैयार किया गया सराहनीय प्रयास।

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  11. सच कहा है आपने न सिर्फ बचाना होगा बल्कि प्राकृति के करीब जाना होगा ... उसे समझना होगा ... उसके व्यवहार अनुसार चलना होगा ...

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  12. सहमत. अब बारी हमारी है कि प्रकृति के साथ रहकर उसके अनुसार व्यवहार करें.

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  13. बहुत ही बढ़िया सारगर्भित एवं विचारणीय आलेख प्रकृति के साथ चलना ही सीख जाएँ लोग तो ही कुछ विकास सभव है वरना तो प्रकृति दिखा ही रही है अपना भयवाह रूप सहमति है आपकी लिखी हर एक बात से यदि हम अब भी नहीं संभाले तो आगे भी प्रकृति हमें संभालने नहीं देगी।

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