रविवार, 17 जून 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 116


भारतीय काव्यशास्त्र – 116

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में चर्चा की गई थी कि सुरत के आरम्भ में बातचीत के दौरान द्वयर्थक पदों के प्रयोग से व्रीडाजनित अश्लीलता दोष नहीं होता, बल्कि गुण हो जाता है। इस अंक में जुगुप्सा और अमंगल जनित अश्लीलता एवं अन्य दोषों के परिहार की स्थितियों पर चर्चा अभीष्ट है। 

वैराग्य पर चर्चा के दौरान जुगुप्सा को व्यंजित करनेवाले पद अश्लील दोष काव्यदोष न होकर गुण हो जाते हैं। जैसे-
उत्तानोच्छूनमण्डूकपाटितोदरसन्निभे।
क्लेदिनि स्त्रीव्रणे सक्तिरकृमेः कस्य जायते।।

अर्थात् उतान लेटी हुई फूले मेढक के फटे पेट के समान बहते मवाद (मदनजल युक्त) वाले स्त्री की योनि में कीड़ों के अलावा किसका अनुराग हो सकता है, अर्थात किसी का नहीं।

     यहाँ घृणा-व्यंजक पद वैराग्य की चर्चा होने के कारण काव्यदोष न होकर गुणाधायक हो गए हैं।

     इसी प्रकार श्लेषालंकार द्वारा अमंगल सूचक पद अमंगल जनित अश्लीलत्व दोष न होकर काव्य के गुण हो जाते हैं। निम्नलिखित श्लोक वेणीसंहार नाटक से लिया गया है। इसमें पाण्डवों की विजय तथा कौरवों के भावी अमंगल का वर्णन किया गया है-   
निर्वाणवैरदहनाः  प्रशमादरीणां  नन्दन्तु  पाण्डुतनयाः  सह  माधवेन।
रक्तप्रसाधितभुवः क्षतविग्रहाश्च स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्याः।।

अर्थात् शत्रुओं का विनाश हो जाने के कारण जिनके वैर की अग्नि शान्त हो चुकी है, वे पाण्डव कृष्ण के साथ आनन्द करें। पूरी पृथ्वी पर शासन करनेवाले (अपने रक्त से  पृथ्वी को सींचनेवाले) क्षत-विक्षत अंगवाले कौरव युद्ध के शान्त हो जानेपर अपने चाहनेवले परिजनों (नौकर-चाकर) के साथ स्वस्थ हों (स्वर्ग में निवास करें)।

     यहाँ दोनों पक्षों की मंगल-भावना व्यक्त की गयी है। परन्तु श्लेष के द्वारा रक्तप्रसाधितभुवः (अपने रक्त से भूमि को रंग देनेवाले), क्षतविग्रहाः (घायल शरीरवाले) कौरव स्वस्थ हो। स्वस्थ का यहाँ दूसरा अर्थ स्वर्ग में निवास करे, अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हों, यह भावी अमंगल-सूचक अर्थ इस श्लोक में अमंगल-सूचक अश्लीलत्व दोष न होकर गुणवाचक हो गया है।

     वाच्य के प्रभाव से व्याजस्तुति अलंकार में पर्यवसित होने से नियत अर्थ की प्रतीति होनेपर कहीं-कहीं संदिग्धत्व दोष भी काव्य का गुण हो जाता है। निम्नलिखित श्लोक एक निर्धन कवि की उक्ति है जिसमें एक राजा स्तुति की गयी है-
पृथुकार्तस्वरपात्रं   भूषितनिःशेषपरिजनं   देव।
विलसत्करेणुगहनं सम्प्रति समवायवोः सदनम्।।

अर्थात् हे राजन, इस समय हम दोनों का घर एक जैसा है। आपका भवन बड़े-बड़े सोने के पात्रों से युक्त है (पृथुकार्तस्वरपात्र) मेरा घर रोते बच्चों का स्थान है, आपके भवन में नौकर-चाकर आभूषणों से अलंकृत हैं (भूषितनिःशेषपरिजन) किन्तु मेरे घर में परिवार के सारे लोग जमीन पर पड़े रहते हैं और आपके भवन झूमती हुई हाथियों से भरा है  (विलसत्करेणुगहन), जबकि मेरा घर चूहों के बिलों की धूल से भरा हुआ है।

इस श्लोक में पृथुकार्तस्वरपात्र (1.पृथूनि कार्तस्वरस्य पात्राणि यस्मिन्, 2.पृथुकानां आर्तस्वरस्य  पात्रं यस्मिन), भूषितनिःशेषपरिजन (1. भूषिताः सर्वे परिजनाः यस्मिन्, 2. भुवि उषिताः सर्वे परिजनाः यस्मिन्) और विलसत्करेणुगहन (1. विलसन्तीभिः करेणुभिः गहनम्, 2. विलान् निर्गता धूलिः तया पूर्णम्) पदों में समास-विग्रह करके दो-दो अर्थ किए गए हैं, जिनमें से एक राजा के ऊपर लागू होता है और दूसरा निर्धन कवि पर। यहाँ कौन सा अर्थ लिया जाय, यह संदिग्ध है। परन्तु दो भिन्न नियत स्थितियों की अभिव्यक्ति होने के कारण स्तुति के बहाने राजा की निन्दा की गयी है- कि तुम्हारे राज्य प्रजा की कैसी दुर्दशा है। अतएव यहाँ संदिग्धत्व दोष काव्य का गुण बन गया है।

            इस अंक में इतना ही। अगले अंक में काव्यदोषों के परिहार संबन्धी कुछ अन्य परिस्थितियों पर चर्चा होगी।
*****

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन सार्थक जानकारी देती प्रस्तुति,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  3. आचार्य जी,
    सादर नमन.
    आज के पाठ में कई जगह व्याकरणिक त्रुटियाँ हो गई हैं, एक बार पुनः पढ़कर संपादित करें.
    क्योंकि आपके सभी पाठ संग्रहणीय होते हैं इससे भविष्य में विद्यार्थियों को कोई संशय नहीं रहेगा.

    आचार्य जी, कविता के छात्रों को 'काव्यशास्त्र' में ऎसी चर्चाएँ बहुत दुर्लभ होती हैं... आपकी उपस्थिति ब्लॉगजगत के लिये गौरव की बात है.
    'आलेख' पठन के उपरान्त प्रतिक्रियावश मन में उठते खुरापाती प्रश्नों को जब्त करना बहुत कठिन होता है... पर मैं ऐसा करना सीख रहा हूँ.
    कहीं भूलवश भी कोई अशिष्टता न हो जाये' इस कारण से.

    एक अन्य प्रश्न तो कर ही लेता हूँ -
    - कुछ वरिष्ठ ब्लोगर 'चीन्हना' शब्द को सही ठहराते हैं, पर मुझे लगता है 'चीह्नना' सही है. कौन-सा सही है?

    चीन्हना (हिन्दी देशज) चिह्न (तत्सम), चिह्नित करना
    - क्या तत्सम से तद्भव बनाते समय 'मात्राओं के दीर्घीकरण' के अलावा हलंत वाले वर्ण भी अपना स्थान बदल लेते हैं?

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    1. आचार्य जी से प्रश्न किया गया है, तो जवाब देना तो उन्हें ही बनता है। फिर भी ...

      मुझे लगता है, चिह्न और उससे बना चिह्नित (ऐसा निशान जिससे कोई चीज़ पहचानी जा सके) और चीन्हना (पहचानना) अलग-अलग शब्द हैं। और दोनों सही है। बाक़ी शास्त्र की दृष्टि से आचार्यवर ही प्रकाश डालेंगे।

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  4. काव्य दोष की बड़ी सटीक व्याख्या लिए है यह पोस्ट .

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  5. काव्य दोष की बड़ी सटीक व्याख्या लिए है यह पोस्ट .

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  6. प्रतुल जी,
    सादर नमस्ते,
    आपने सही कहा। सीधे टाइप कर बिना पढ़े पोस्ट लग गयी। कुछ अशुद्धियाँ रह गयी हैं। त्रुटियों की ओर ध्यानाकर्षण के लिए हार्दिक धन्यवाद। कल तक शुद्ध पाठ लग जाएगा। रहा आपका प्रश्न, तो मुझे लगता है कि यदि आप अपने प्रश्नवाचक शब्द को हटा दें तो आपको सही उत्तर मिल जाएगा। अर्थात् चीन्ह शब्द चिह्न का ही अपभ्रंश है। पूर्वांचल में चीन्ह शब्द को चीन्हा संज्ञा के रूप में यादगार (स्मृति चिह्न) के अर्थ में प्रयोग होता है, जैसे अपना कोई चीन्हा दे दीजिए। वही चीन्ह शब्द से चीन्हना क्रिया बन गया है। ह्रस्व का दीर्घ और दीर्घ का ह्रस्व प्रायः अपभ्रंश पदों में देखने को मिलता है। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी ने हिन्दी व्याकरण की अपनी पुस्तक हिन्दी शब्दानुशासन में काफी विस्तार से इस विषय पर चर्चा की है। यदि मिल जाय, तो अवश्य पढ़ें।

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    1. युक्तियुक्त उत्तरों से मुझे सदैव संतुष्टि मिलती है.
      उत्तर की वक्रोक्ति शैली मुझे बहुत भाती है.... और आपके उत्तर वैसे होते हैं... एकदम प्रसाद तुल्य.
      आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की पुस्तक 'शब्दानुशासन' कहीं-न-कहीं से ढूँढकर अवश्य पढूँगा.
      मार्गदर्शन के लिये आभार.

      पाठकों से :
      'विद्यार्थी बने रहने का आनंद ही कुछ ओर है.' 'इतना अधिक लाभ होता है कि बता नहीं सकते.'
      'प्रश्नों के द्वारा सीखने में बहुत सुख है और साथ ही सहज भी.'

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  7. प्रत्युत्तर भी समझने का प्रयास किया |
    सादर नमन |

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  8. अपनी बुद्धी से ऊपर की बात ।

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