शनिवार, 16 जून 2012

फ़ुरसत में ... 105 : ज़िन्दगी के दोराहे पर!


फ़ुरसत में ... 105
ज़िन्दगी के दोराहे पर!


मनोज कुमार
कभी-कभी हम ज़िन्दगी के ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैं, जहां एक ओर हमें सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान रखना पड़ता है, तो दूसरी ओर अपने कर्तव्यों का भी निर्वाह करना पड़ता है। दिल और दिमाग़ की रस्साकसी में भले ही ख़ुद हमारा दम घुट रहा हो, लेकिन ऐसे में भी हमें अपने विवेक का सहारा लेकर किसी उचित निष्कर्ष तक पहुंचना पड़ता है, जो अपने आप में  एक तनी रस्सी पर चलने से कम नहीं होता जहाँ एक तरफ़ गहरी खाई होती है, तो दूसरी तरफ गहरा कुंआ।

तब मेरी पहली नौकरी लगी थी और सपरिवार एक नए शहर में हमने डेरा डंडा जमाया था। दो छोटे बच्चों को संभालना और घर की और ज़रूरतों को पूरा करने में श्रीमती जी सुबह से शाम तक चकरघिन्नी की तरह एक पैर पर नाचती रहती थीं। नए माहौल में किसी परिचित के अपनापन को तरसते मन के रेगिस्तान में, उस दिन सुबह-सुबह दफ़्तर में उसका आना कोई सावन की फुहार से कम नहीं था। आने का कारण भी उसने यह बताया कि हम उसके राज्य के रहने वाले हैं, इसलिए उसने सोचा कि चलकर दुआ-सलाम कर ही आए। हम तो अभिभूत हो गए, हमें उसका आना बड़ा आत्मीय लगा। वह इलेक्ट्रोनिक फ़िटर था और दो साल पहले उसकी नौकरी पक्की हुई थी, उसके पहले वह ट्रेनिंग एप्रेन्टिस था।

बातचीत आगे बढ़ी तो सम्बन्ध की नजदीकियां भी आगे बढ़ चलीं, उसने बताया कि वह भी उसी ज़िले से सम्बन्ध रखता है जिसका मैं रहने वाला हूं। मन से वह और करीबी मालूम पड़ने लगा। फिर तो दो-चार बार के आने-जाने से यह भी रहस्य खुला कि वह तो उसी गांव का है जिस गांव में मेरी बहन ब्याही गई है। फिर तो वह ऐसे उछला जैसे उसे किसी बिच्छू ने काट लिया हो। संजोग से मेरा भांजा उसका बचपन का दोस्त निकला और इस रिश्ते को पुनर्स्थापित करने के लिए वह मेरे घर आ धमका। मेरी श्रीमती जी को मामी सुनना अच्छा ही लगा होगा और बच्चों को तो मानों इस नए भाई में चंदा मामा मिल गए हों।

फिर तो उसका आना-जाना लगा रहा और कुछ ही दिनों में वह हमारे घर का सदस्य बन गया। हाथ में उसके हुनर तो था ही। रेडियों-टीवी आदि के बिगड़ने पर वह अपने हाथ का हुनर भी दिखा ही दिया करता था, जिसके कारण हमारे घर में उसकी अहमियत काफ़ी बढ गई थी। मेरे भांजे भी इस बीच हमारे पास आये और यह तसदीक कर गए कि वह अपने परिवार की तरह काफ़ी अच्छा, और परोपकारी है।

एक दिन अचानक वह मेरे दफ़्तर में आकर मुझसे बोला कि कई महीनो से वह स्थापना के बड़ा बाबू को कह रहा है कि उसके सर्विस-बुक में इंटर पास करने की प्रविष्टि कर दे पर, वे कर नहीं रहे हैं। उसने बहुत सकुचाते हुए इस काम में मेरी मदद मांगी। मैंने कहा कि इसमें समस्या क्या है? वह बोला कि ज्वायन करने के समय उसने इस बात की घोषणा नहीं की थी, इसलिए वे नहीं कर रहे। मैंने पूछा कि इसमें तुम्हारा फ़ायदा क्या है, तो वह बोला कि अब वह बी.ए. की पढ़ाई कर रहा है। इंटर की प्रविष्टि सेवा पंजी में रहेगी तो उसे बी.ए. की क्वालिफिकेशन दर्ज करने में सुविधा होगी। मुझे उसकी बातें सही लगी, सो मैंने कहा कि अपने काग़ज़ात रख दो मैं बोल दूंगा। वह रख कर चला गया।

कई दिनों तक वह क़ाग़ज़ मेरे टेबुल पर पड़ा ही रहा। एक दिन सेक्शन का क्लर्क मेरे दफ़्तर में आया तो मैंने कहा कि आप इसका एंट्री क्यों नहीं कर देते? क्लर्क ने कहा कि यह ज़िरोक्स है, उससे कहिए कि ओरिजिनल देगा तो  कर देंगे। अगली बार मैंने उसे ओरिजिनल देने को कहा तो वह बोला कि यही एक मात्र अटेस्टेड कॉपी है उसके पास। कई दिनों तक वे काग़ज़ात टेबुल पर ही पड़े रहे। फिर एक दिन वह मुझे याद दिलाने आया तो मैंने उससे कहा कि कर दूंगा। अपनी भूलने की बीमारी और कुछ लापरवाही से उसका काम मैं न कर पाया था। एक दिन टेबुल की साफ सफाई कर रहा था, तो उन काग़ज़ातों को उठाकर मैंने आलमारी के भीतर रख दिया। अब जब वे कागज़ात नज़र से उतर गए थे, तो वह काम मेरे मन से भी उतर गया था।

कई सप्ताह के बाद उसने फिर इसकी चर्चा छेड़ी तो मैंने भूल जाने की आदत वाली दलील उसके सामने रख दी। फिर तो बड़े भावुक स्वर में उसने कहा कि आपके घर का कोई काम मैं नहीं भूलता और आप बड़े आदमी हैं फिर भी मेरा यह छोटा सा काम नहीं करवा पा रहे हैं। उसकी बातों में न जाने ऐसा क्या था कि उसकी बात मुझे चुभ गई। उसके चले जाने के बाद भी बहुत देर तक उसकी कही बात मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह बजती रही। मेरे मन में लगातार यह हलचल मची रही कि आखिर वह इस तरह से मेरे पीछे क्यों पड़ा हुआ है? आखिर बात क्या हो सकती है? मैंने सोचा कि एंट्री करवाने के पहले इस अंक-पत्र को वेरिफाई ही क्यों न करवा लिया जाए। मैंने उसकी एक छायाप्रति इंटरमीडिएट काउंसिल को सत्यापन के लिए भिजवा दी। कुछ सप्ताह के बाद इंटरमीडिएट काउंसिल का जवाब आया कि इस रॉल नम्बर का छात्र दो विषयों में फेल था।

यह मेरे लिए बड़ा आघात था। मैंने आलमारी से उसके क़ाग़ज़ात निकाले तो देखा कि उसने बड़ी होशियारी से कुछ अंकों के साथ छेड़-छाड़ कर रखी थी। अब तो मेरे प्रशासनिक दिमाग ने कहा कि लगे हाथों ज़रा इसके मैट्रिक के दस्तावेज़ों की भी छान-बीन करा ही ली जाए। कुछ दिनों के बाद वहां से जवाब आया कि इस नम्बर का तो कोई सर्टिफ़िकेट ही नहीं जारी किया गया है। मैंने उसे अपने दफ़्तर में बुलवाया और उसकी इस जालसाज़ी की घोषणा की। वह बोला क्या बकवास कर रहे हैं आप। इसी सर्टिफ़िकेट के बूते पर मैंने नौकरी पाई है और पुलिस भी इसका वेरिफ़िकेशन कर गई थी। मैंने कहा कि अभी भी सच-सच बता दे वरना पुलिस को रिपोर्ट करते देर नहीं लगेगी। वह मन ही मन भुनभुनाता हुआ और कुछ-कुछ बकता हुआ मेरे दफ़्तर से चला गया।

शाम को जब मैं घर पहुंचा तो वह पहले से ही मेरे घर में पर विराजमान था।

उसने कहा, “आप मेरे जीवन के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। मुझे मत फंसाइए। मैं तीन साल की ट्रेनिंग और दो साल की नौकरी कर चुका हूं”।

मैंने कहा, “तुम जैसे धोखेबाज़ को मैं अब तो कार्यालय में पैर भी नहीं रखने दूंगा।”

वह धमकी भरे स्वर में बोला, “इसका अंजाम बहुत बुरा होगा।“

वह चला गया। अगली सुबह एक महिला अपनी दो छोटी-छोटी बच्चियों के साथ मेरे घर में थी। बताने की आवश्यकता नहीं कि वह उसकी बीवी थी, और वे उसकी बेटियां। महिला ने बताया कि वह सारी रात घर पर हंगामा करता रहा। कह रहा था कि जान दे देगा। अब आप ही रक्षा कीजिए। इन बच्चियों के सर से बाप का साया उठ गया तो इन्हें कौन देखेगा। अगर पुलिस केस हुआ तो गाँव-समाज में बदनामी होगी और फिर इन बच्चियों का भविष्य क्या होगा? हम पैर पड़ते हैं, आप हमारी रक्षा कीजिए।”

किसी तरह उस महिला से पीछा छुड़ाया और दफ़्तर पहुंचा। कुछ देर के बाद मेरी बहन का फोन आया। वे भी उसकी मेरे द्वारा की गई दुर्दशा से चिंतित थीं। मैंने किसी तरह समझा-बुझा कर बहन को शांत किया। मेरे सामने धर्म-संकट की स्थिति थी। क्या करूं? रह-रह कर बच्चियों का चेहरा मेरे सामने आ रहा था। शाम को घर पहुंचा। चाय अभी खतम की थी कि फिर वो धमक गया। अबकी बार मुझे कहने लगा कि आपने अगर पुलिस केस कर दिया तो यहीं आपके घर में सुसाइड कर लूंगा। मुझे ज़ोर का गुस्सा आया। मैंने कहा, “रस्सी दूं या किरासन तेल। मुझे धमकी मत देना।

अब वह रोने लगा और नीचे बैठ गया। मैंने कहा, “देख मुझे तेरे प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। बस रह-रह कर मुझे तेरी बच्चियों का ख्याल आ रहा है। दफ़्तर में तो तुझे घुसने नहीं दूंगा। लेकिन तुझे एक बात पर अमल करना होगा। तेरे हाथ में हुनर तो है ही। तू भूखों नहीं मरेगा। तू कल ही शहर छोड़ कर चला जा। फिर दफ़्तर न आना। कुछेक महीने बाद तेरे खिलाफ़ अनऔथराइज़्ड एबसेन्स की अनुशानात्मक कार्रवाई कर तुझे नौकरी से डीसमिस कर दूंगा। तू अपना जीवन चला लेगा मुझे भरोसा है। और हाँ, ये भरोसा कभी मत तोडना!”

दूसरे दिन से वह उस शहर में नहीं दिखा। कुछ महीनों बाद मेरा भी तबादला एक दूसरे राज्य में हो गया। उसकी नौकरी जाती रही और एक नए शहर में मैं अपनी दीन दुनिया में रम गया।

उस वाकये के क़रीब चार साल बाद एक दिन मेरे टेबुल पर एक पत्र पड़ा था। यह उसी का पत्र था।

आदरणीय भाई साहब,
चरण स्पर्श!
आज यह पत्र लिखने में मुझे बहुत शर्म महसूस हो रही है, लेकिन यह पत्र लिखना भी ज़रूरी है, नहीं तो मेरी अंतरात्मा मुझे कभी चैन से जीने नहीं देगी। उस दिन आपने मुझे दुत्कार कर निकाल दिया और मुझे बख्श दिया। आपने मेरी ज़िंदगी बख्शी ही नहीं, बना भी दी। आपने कहा था कि हो सके तो मेरा भरोसा कभी नहीं तोड़ना। आपके शहर से निकले तो बाबा विश्वनाथ के नगर बनारस में शरण मिली। कहते हैं उन्हीं के त्रिशूल पर बसा है शहर। हाथ का हुनर, आपके धिक्कार के शब्द और और आपके भरोसा के त्रिशूल पर अपना काम शुरू किया मैंने। कहते हैं गंगा मैया सब पाप धो देती है। हमारे पश्चाताप के आंसू की गंगा में हमारा पुराना पाप धुल गया और धीरे-धीरे काम जमता चला गया। आज बनारस में अपनी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के रिपेयरिंग की दुकान है और बाबा की कृपा तथा आपके आशीर्वाद से तीस-चालीस हज़ार रुपये महीने के कमा लेता हूँ। इतना तो उस सरकारी नौकरी में भी नहीं कमा पाता। और फिर इस पैसे में पसीने की गंध और ईमानदारी की खुशबू भी है।

आपकी दोनों बेटियाँ अच्छे स्कूल में पढ़ रही हैं। मैंने उन्हें सदा मिहनत और ईमानदारी से शिक्षा हासिल करने की सीख दी है। आपके आशीर्वाद से एक दिन दोनों बेटियाँ अपने बाप की तरह नकली नहीं असली डिग्रियां लेकर आपकी तरह सरकारी अफसर बनेंगी। मेरी पत्नी और बच्चियों के लिए तो असली भोलेनाथ आप ही हैं।

हमारा प्रणाम स्वीकार कीजिए और हो सके तो माफ करने का कोशिश कीजियेगा ताकि अंतिम समय हमारे कलेजा पर कोई बोझ न रहे!
आपका
.............

उस रोज वह पत्र पढ़ने के बाद मैंने सोचा कि किसी अपराधी को फाँसी की सज़ा दी जाए, तो उसके साथ उसपर निर्भर परिवार के सभी सदस्यों को फांसी लग जाती है। किसी एक के अपराध की सज़ा कई निरपराध भोगते हैं।

उस रात मुझे बड़ी चैन की नीद आई, पिछले चार सालों से वो औरत और उसकी दो छोटी बच्चियां मेरी नींद में मेरे सामने आकर खडी हो जाती थीं और मुझसे कहती थीं कि मुझे मेरे पापा लौटा दो, मुझे मेरा पति वापस दे दो!!

मुझे यह भी संतोष था कि मेरा ज़मीर सरकार के प्रति, मेरी नौकरी के प्रति, मेरी जिम्मेदारी के प्रति, सामाजिक रिश्तों के प्रति और समाज के प्रति बिलकुल साफ़ था! 

36 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी बड़ी बातें कहना आसान होता है , पर करने में सब खुद को समेट लेते हैं ... आपने वह कर दिया . उन दुआओं के साथ एक मेरी दुआ भी आपके लिए ...
    संयम से काम लिया जाए तभी परिवर्तन होता है ...

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  2. इंसानियत और कर्तव्यों की राह में हमेशा पारिवारिक सम्बन्ध एक चुनौती पेश करते है . ऐसी विषम परिस्थिति से कर्तव्य पर अड़े रहना और मानवता की कसौटी पर खरा उतरना एक विषद चुनौती है . फुर्सत में आप कमल करते है यादो के झरोखे से जीवन के विभिन्न रंगों पर नजर डालते है

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  3. veerubhai ने आपकी पोस्ट " दोहावली --- भाग - 16 / संत कबीर " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    भाई साहब ज़िन्दगी के दोराहे पर टिपण्णी खुली नहीं .एक ऐसी आप बीती सत्य कथा आपने पढवा दी जो अन्दर के द्वंद्व को रूपायित करती है .कर्तव्य बोध को मुखर करती है और ज़मीर को नै दिशा .आदमी सदैव ही अपनी गलतियां सुधार सकता है ,अपना कल भी .बढ़िया कसावदार कथा के लिए बधाई .

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  4. एक धोखेबाज को आपने न केवल सुधार दिया बल्कि उसे सच्चाई की राह पर चलना भी सिखा दिया। सज्जन व्यक्ति अपने स्वभाव के कारण अनजाने ही ऐसे दो राहे में फंस जाता है लेकिन हकीकत मालूम होने पर वह क्या निर्णय लेता है यह महत्वपूर्ण है। एहसान तो उस क्लर्क का भी मानना चाहिए जिसने मात्र आपके कहने पर इंट्री नहीं किया, ओरिजनल सर्टिफिकेट की मांग की। अधिकारी नाराज भी हो सकता था लेकिन उसने इसकी परवाह नहीं की।

    वह बनारस में है, मैं उससे मिल सकता हूँ। लेकिन जाने दीजिए, जख्मों को कुरेदने से क्या लाभ? अब सुधर चुका है तो जहाँ रहे खुश रहे।

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  5. You took the right decision. He suffered for some time but finally everything is in place.

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  6. all that ends well is well
    but there is a question in my mind

    had you not known the person would you still have taken the same desicion

    we always give "benefit of doubt " to our known people and try and save them in any and every way possible

    but the moment the person is not known to us we simple change our rules

    i look forward to your answer

    if the person was unknown to u what would u have done , would u still be moved by the tears of his wife and children or would u have simple rejected the application and handed over the case to the police

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    1. रचना जी,
      एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर मुझे जो करना था, अंततोगत्वा, वह तो मैंने किया ही। अनुशासनात्मक कार्रवाई और नौकरी से बर्ख़ास्त।
      पुलिस ने जो शुरू में करना चाहिए था, (वेरिफ़िकेशन के वक़्त, नहीं किया, तो क्या गारंटी की बाद में कर ही देती।)
      उससे जानपहचान होने से दवाब तो और अधिक था उसके ख़िलाफ़ कुछ न करने का।
      कई ऐसे क़िस्से हैं, जो मैंने अपने सिद्धांत के तौर पर आजमाया है अपने सर्विस लाइफ़ में। यह तो एक है। दारू पीकर आने वाले को मेडिकल करो, सस्पेंड करो और नौकरी ले लो, कोई कर सकता है, लेकिन बीस-बाईस साल की उसकी लत छुड़वाना, बीवी को पीटने वाले को सही राह पर लाना, बहुत से ऐसे किस्से हैं। कभी मन बना तो इसी स्तंभ के अंतर्गत शेयर करूंगा। ये तो कल ही किसी को किसी संदर्भ में सुना रहा था, तो याद आ गया और शेयर कर लिया।

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    2. ऐसी ही बाते पढ़ कर तो मन में प्रशन उठते हैं और लेखक से जवाब माँगने की इच्छा हो जाती हैं जो ब्लॉग के माध्यम से संभव हैं
      थैंक्स

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  7. वो कहते हैं न बार बार का झूठ भी कभी जीवन नहीं बना पाता और एक बार का सच बना देता है... आपके इस संस्मरण से बहुत प्रेरित हुआ और उन महाशय की बातों से भी... वैसे भी काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता... वो खुश है सफल है और हमेशा रहेगा.... नहीं तो हमेशा मन में यही दर बना रहता की किसी और को पता चल गया तो.... सार्थक संस्मरण.... :)

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  8. ...इस घटना की खास बात यह रही कि आप ने बीच का रास्ता निकालकर सही काम किया था.भ्रष्टाचार और बेईमानी किसी एक के रोकने से तो रुकने से रही पर अगर आंशिक नज़रंदाजी से किसी का नुकसान नहीं होता और दूसरे का परिवार संभल जाता है तो यह कदाचरण नहीं है !

    ...आपने बिलकुल ठीक किया और यह भी अच्छा हुआ कि उसे इस तरह गलती का अहसास हो गया .

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  9. ईमानदारी और सहृदयता दोनों का निर्वाह किया आपने उसका उसके परिवार का हित सधा और आपकी भी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये- बढ़िया रहा !

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  10. अगर हम सच्चे और ईमानदार हैं तो हमारी बातों का असर दूसरों पर जरूर होगा और आपके साथ भी ऐसा इसीलिये हुआ क्योंकि आप कर्तव्यविमुख नही हुये और वक्त रहते सही निर्णय लिया जिससे उसका जीवन सुधर गया ना केवल उसका बल्कि आने वाली पीढियों का भी।

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  11. मन बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल कर सही राह पकड़ी ...बहुत सही निर्णय...
    सार्थक पोस्ट.

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  12. सही समय पर सही फैसला... सार्थक संस्मरण....

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  13. जान पहचान का नाजायज़ फायदा लोग उठाते हैं और पहचान की वजह से लोग गलत काम में साथ भी देते हैं ....आपने ऐसी परिस्थिति में संयम और विवेक से काम लिया ... ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं ... प्रेरक लेख

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  14. मनोज जी,,,,,आपने जो फैसला लिया वह सही था,,,,उसका पत्र आपके सही फैसले का गवाह है,,,,

    RECENT POST ,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  15. आपने समयानुकूल उचित निर्णय लिया ,इश्वर ने आपका और उस भले मानस का साथ दिया ,वरना आज कल लोगों को
    श्रेय कम मिलाता है बदनामी ज्यादा , हम भले तो जग भला ,आपने चरितार्थ किया लेकिन उसे पूर्णता उसके पत्र ने दी .
    उसने याद कर आपको बतलाया तभी आपको नीद आई ये पोस्ट मिला . फिर भी हमें नेक और लोकहित में ही कामकरना चाहिए ....
    बाकि सब उपरवाल जाने ....

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  16. आपने ठीक ही किया, ईश्वर ने कुछ और सोच रखा था उसके लिये।

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  17. कहते हैं सजा पाप को दो पापी को नहीं.और आपने वही किया.एक सच्चे इंसान का ही नहीं एक अच्छे नागरिक और अच्छे अधिकारी का भी फ़र्ज़ निभाया.माय सेल्यूट टू यू .

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  18. फ़ुरसत में आपने जीवन के जिस अनुभव को बांटा है वह बहुत ही प्रेरक है।

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  19. यह तो वाकई प्रेरक प्रसंग है मनोज जी... अपने जीवन में आपकी वजह से एक भी व्यक्ति का जीवन संवरा तो आपका जीवन सफल हो जाता है..

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    बेहतरीन रचना


    दंतैल हाथी से मुड़भेड़
    सरगुजा के वनों की रोमांचक कथा



    ♥ आपके ब्लॉग़ की चर्चा ब्लॉग4वार्ता पर ! ♥

    ♥ पढिए पेसल फ़ुरसती वार्ता,"ये तो बड़ा टोईंग है !!" ♥


    ♥सप्ताहांत की शुभकामनाएं♥

    ब्लॉ.ललित शर्मा
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  21. अपने जमीर के प्रति जागरूक होकर निर्णय लिया था आपने,
    फुरसत में अच्छा संस्मरण बाँटने का आभार !

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  22. bahut hi prashansniya kadam .....jaruri aur sachhi sikh .. badhai ho,,

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  23. सही समय पर सही निर्णय लेना और सच्चाई से उस पर डटे रहना अच्छे परिणाम ही देता है.

    सुंदर प्रेरणादायी संस्मरण.

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  24. shuruaat me hee mujhe laga tha kee ye aadmi fraud hoga,,jo bahut jaldi dil me jagah banae kee koshish karta hai kai baar man me sandeh utpanna kar deta hai...lekin aapne kasoor kee saja bhee dee aaur kasoorwar ka uddhhar bhee kar diya...ek prashnik adhikari ke roop me aapka yah nirnay bahut accha laga...jahan tak lekh kee baat hai to hamesh kee tarah main bahta hee chala gaya...sadar pranaam ke sath

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  25. सही समय पर सही फैसला... सार्थक संस्मरण !

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  26. आपके पून्य प्रताप ने उन्हें भी जैसे सही दिशा दे दी...!
    प्रेरक संस्मरण!

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  27. मैंने देखा है,प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग करने ही नहीं,करवाने में सक्षम व्यक्ति भी बड़ा दंभी होता है। वह इसी गुरूर में अनेक बीमारियों का शिकार होता जाता है कि औरों की नौकरी उसके बूते ही चल रही है और मौक़ा पाने पर वह न जाने क्या कर लेगा। लोगबाग भी,ऐसे कर्मचारियों-अधिकारियों से हाथ मिलाने को आतुर रहते हैं।
    सही डीलिंग हैंड अथवा अधिकारी वही है,जो नियमों की व्याख्या इस तरह करे कि उससे कर्मचारी का फ़ायदा हो। मैं समझता हूं कि बर्खास्तगी के फ़ैसले से भी,फिटर को फ़ायदा ही हुआ। कैसी करंट-सी दौड़ पड़ी ज़िंदगी!

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  28. apni jaan-pahchaan walo ke khas taur par sakhtayi baratna asal me bahut tedhi kheer hai. iske liye apne siddhanto par tatasth rahna aur saiyyam banaye rakhna bahut aham hai jo aapne kiya aur ant me uska parinaam laabh-prad raha. ye to acchha hai ki parinaam acchha raha warna koi badi baat nahi thi ki agar parinaam dushkar nikalta to tamaam umr aapko kosta rahta....halanki haath k hunar wale bhookhe nahi marte...lekin jab niyat me khot aa jaye to bhagwan hi malik hai.aur us par ye ki dosh doosron ko dena....aisi sthiti me aisa nirnay lena bahut mushkil hota hai aur khas taur se aisi dishviheen samaaj me jab sab jagah bhrishtTa ka bol-bala hai.
    aap jaise hi aur bhi nagrik apne kartavvyon ka theek se palan karen to desh sudhar jaye.

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  29. यह एक पथ-प्रदर्शक संस्मरण है. नेपथ्य से इस घटनाक्रम की कई कड़ियों का साक्षी होने के कारण उन दिनों की स्मृति एकबार फिर प्रबल हो गई.

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  30. बहुत सलीके से निपटाया आपने मामले को

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  31. एक कुतुबनुमा की तरह है आपका यह संस्मरण सर...
    सादर आभार स्वीकारें।

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  32. मनोजजी बहुत ही विचारणीय पहलू है। आज हुनरबन्‍द लोग शिक्षा के कारण अपना हुनर त्‍याग कर नौकर बन गए हैं। देश में नौकरों की बाढ़ आ गयी है और मालिक कम होते जा रहे है। समाज को शिक्षा से अधिक हुनर के बारे में सोचना चाहिए।

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।