सोमवार, 22 अप्रैल 2013

प्रलय के काले मेघ उठे


प्रलय  के काले मेघ उठे
श्यामनारायण मिश्र
फूस  नहीं  चढ़  पाया नंगी मिट्टी की दीवारें
लगता  रूठा  देव  प्रलय  के काले मेघ उठे।

एक खेत था  बाक़ी वह भी पिछले साल बिका
कौड़ी-कौड़ी  वैद  खा  गये  बेटा  नहीं  टिका
किसी तरह झमिया छमिया के हाथ लगी हल्दी
रमिया शादी जोग हो  गई कैसे इतनी जल्दी
पहले लगन तिलक पचहड़ से शादी होती थी
अब तो  नये  नये  न जाने कितने नेग उठे

ख़ूब  याद  है  साथ  पड़ी वो ईद और होली
रंग खेलने घर आया था  असगरख़ां हमजोली
सदा बांधती रही राखियां  असलम को  बिन्दू
थे वे सच्चे मुसलमान और हम सच्चे  हिन्दू
दुराभाव  की  बात  सोचना दोजख़  जैसे था
आज अचानक  इस  हाथों  में कैसे तेग उठे

रामदीन  के  पैसा  था तो बनवा दिया कुआं
बहू-बेटियां  उठवाता  है  उसका  ही  रमुआ
जोत रहे हैं मंदिर में  दी  दान  भूमियों को
चढ़ता नहीं बुखार तलक  मक्कार सूमियों को
दया धरम उठ गये जगत से प्रेम भाव खोया
इन्सानों के मन में पशुओं  से  आवेग  उठे

15 टिप्‍पणियां:

  1. दया धरम उठ गये जगत से प्रेम भाव खोया
    इन्सानों के मन में पशुओं से आवेग उठे

    मन उद्वेलित करती ...बहुत सुन्दर रचना ...!!
    आभार श्यामनारायण मिश्र जी एवं मनोज जी ...!!

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  2. बहुत उम्दा सुंदर रचना,,,श्यामनारायण मिश्र जी की साझा करने के आभार ,,,मनोज जी,,,

    RECENT POST : प्यार में दर्द है,

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  3. बहुत गहन रचना ..आभार मनोज जी .

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  4. बहुत ही कमाल का शब्द संयोजन ... उम्दा रचना ...

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल २३ /४/१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है ।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
    --
    शस्य श्यामला धरा बनाओ।
    भूमि में पौधे उपजाओ!
    अपनी प्यारी धरा बचाओ!
    --
    पृथ्वी दिवस की बधाई हो...!

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  7. दया धरम उठ गये जगत से प्रेम भाव खोया
    इन्सानों के मन में पशुओं से आवेग उठे

    Bahut sateek aur samayik kawita.

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  8. बहुत दिन बाद पढ़ने का अवसर मिला मिश्र जी को.. और रचना दिल को छू गयी!!

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  9. दया धरम जीवित रह जाये,
    जैसे दिन थे, वैसे आये।

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  10. बहुत बढ़िया...
    बेहद सार्थक
    सादर
    अनु

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  11. दया धरम उठ गये जगत से प्रेम भाव खोया
    इन्सानों के मन में पशुओं से आवेग उठे.

    बहुत सुंदर और सार्थक विचार.

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  12. क्या से क्या हो गया -कैसा लगता है पढ़ कर !

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