सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया

पुण्य तिथि पर

image

धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया

सुदामा पाण्डेय धूमिल के प्रथम काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ की ‘कविता’ शीर्षक रचना से लिया गए काव्यांश से बात की शुरुआत करते हैं ..

उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे

कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं

और हत्या अब लोगों की रूचि नहीं

आदत बन चुकी है

वह किसी गँवार आदमी की ऊब से

पैदा हुई थी और

एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ

शहर में चली गयी

अपेक्षाकृत धूमिल की यह छोटी कविता है। यह ‘कविता’ उनके नये अंदाज़, कविता के प्रति उनकी गहरी सोच को अभिव्यक्त करती है। इस कविता में कवि संवेदना और अभिव्यंजना के संकटों की पहचान करता है। शब्दों की खोती हुई ताकत के कारण कविता रचने का काम कठिन होता जा रहा है। भाषा और मनोभाव की जिस पवित्र आत्मीयता से कविता रची जाती है, वे संबंध-सूत्र जीवन से लगातार टूट रहे हैं। कवि की दृष्टि में कविता की उत्पत्ति जिस मनः स्थिति में हुई थी और जिस सार्थक उद्देश्य से उसका सरोकार था, वह पूरी तरह उससे कट गई है।

भाषा और अर्थ का आपसी संबंध सामाजिक जीवन की आधारशिला पर टिका होता है। सामाजिक जीवन में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है, इसलिए कविता भी संक्षिप्त एकालाप बनकर रह गई है। उसमें बौखलाए हुए आदमी का आक्रोश है लेकिन एक प्रकार की विवशता से वह ग्रस्त है। वास्तव में साठोत्तरी कविता नवीन काव्याभिरुचि, नवीन सौन्दर्यबोध तथा नये संवेदन की कविता है। वह मुख्यतः साधारण आदमी की पहचान और उस पहचान की तलाश की कविता है। जब कवि यह कहता है - उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे / कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं / और हत्या अब लोगों की रूचि नहीं – / आदत बन चुकी है तो कविता की वर्तमान दशा पर स्वयं कविता की यह सोच कितना भेदक है। आज जिस तरह असलियत को शब्दों की ओट में दिखाया जाता है, उससे स्पष्ट है कि कविता की चिन्ता जनकल्याण न होकर उन चेहरों को छिपाना हो गया है, जिन्हें नंगा किया जाना चाहिए। पोल खोलने के नंगेपन को धूमिल वर्तमान वस्तु-स्थिति में अनिवार्य मानते हैं। इसी से कविता की हत्या हो रही है। अब हत्या करना रुचि नहीं आदत बन गई है। कविता का यह दुरुपयोग खुद कविता को ही खलता है। स्पष्ट है कि धूमिल समकालीन कविता के अपने मूल उद्देश्य आदमी होने की पहल से भटकने को लेकर चिन्तित हैं। दुराव आदमी के चरित्र का सबसे घातक पहलु है और कविता आज उसी शगल में फंस गई है।

धूमिल कविता के उद्भव के आदि स्रोत के रूप में ‘गंवार की ऊब’ को मानते हैं। वे कविता को उसके मूल सरोकार से जोड़कर देखते हैं, केवल मनोरंजन से नहीं। आदिम श्रम से ऊबे लोगों ने कविता को अपनी ऊब के लिए खोजा था, ताकि ऊब को सक्रियता दी जा सके। उसे जीवन-संघर्ष में अग्रसर करने का मनोबल दे। पढ़े-लिखे और शहरी संस्कृति में पलने वाले लोगों की करामात से ही कविता यथार्थ परिदृश्य को ओझल कर दुराव के तहत अपनी जड़ से कट चुकी है।

धूमिल की कविता को गहराई तक समझने के लिए उनके कविता संबंधी दृष्टिकोण को जानना निहायत ज़रूरी है। उनकी सृजन प्रक्रिया के संबंध में काशीनाथ सिंह के शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा जा सकता है कि वे कविता करते नहीं थे, बनाते थे। पहले उनके दिमाग में समस्या आती थी और वे उसकी पूर्ति ऊपर की तीन या सात पंक्तियों से करते थे। उनके दिमाग में जुमले आते थे और ये जुमले कभी तो उनके उपजाऊ दिमाग की उपज होते थे और कभी उन्हें लोगों की बातचीत से हासिल होते थे। इस प्रकार का जुमले ‘कविता’ में भी देखा जा सकता है, जैसे – अब उसे मालूम है कि कविता / घेराव में / किसी बौखलाये हुए आदमी का / संक्षिप्त एकालाप है।

साठोत्तरी दशक में धूमिल पहला ऐसा कवि हैं, जिन्होंने सबसे अधिक कविताएं ‘कविता’ के बारे में लिखी है। वे इस बात का प्रमाण हैं कि धूमिल कविता के भविष्य, कविता की सार्थकता को लेकर कितने चिंतित थे। उन्होंने हिंदी कविता को एक नयी भाषा दी है। उन्होंने अनुभव किया कि कवि का पहला काम कविता को भाषाहीन करना है। साथ ही वे मानते थे कि अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से उसे मुक्त करना है। इसके कारण कविता की स्थिति उस औरत जैसी हास्यास्पद हो जाती है, जिसके आगे एक बच्चा हो, गोद में एक बच्चा हो और एक बच्चा पेट में हो। प्रतीक, बिम्ब जहां सूक्ष्म सांकेतिकता और सहज सम्प्रेषणीयता में सहायक होते हैं वहीं अपनी अधिकता से कविता को ग्राफिक बना देते हैं। आज महत्व शिल्प का नहीं कथ्य का है। सवाल यह नहीं कि आपने किस तरह कहा है, सवाल यह है कि आपने क्या कहा है? इससे स्पष्ट है कि धूमिल पच्चीकारी और अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से कविता को मुक्त करना चाहते थे। स्पष्ट है ऐसी भाषा कविता और पाठक के बीच दीवार बनकर खड़ी होती है, धूमिल कविता को भाषाहीन करके इसी दीवार को तोड़ते नज़र आते हैं।

इस काव्ययात्रा की शुरुआत धूमिल के आत्मसंघर्ष से होती है। आदमी होने का उनका अपना अनुभव जो कुछ रहा, उसे उन्होंने कविता में अभिव्यक्त किया है। धूमिल वैयक्तिक अनुभवों को निर्वैयक्ति बनाकर पेश करते हैं। उनका काव्य-सरोकार आत्मकेन्द्रित न होकर सर्वात्म केन्द्रित है। उनकी कविता आदमी की आज़ादी के संघर्ष की कविता है, उसे किसी विशिष्ट काव्य मानदण्ड पर तौलना उसका अपमान होगा। इसलिए उनकी कविता निर्वैयक्तिक कही जाएगी क्योंकि उसमें उनका आत्मविसर्जन तो नहीं हुआ है, पर वह आत्म आम आदमी के आत्म का पर्याय अवश्य बन गया है। वे आत्मसंवेदना को विचार से जोड़कर ही उसे रचनात्मकता का दर्ज़ा देते हैं।

धूमिल जब कहते हैं कि कविता हर तीसरे पाठ के बाद धर्मशाला जो जाती है, तो उनका आशय स्पष्ट है कि पाठ-प्रक्रिया के दुहराव के बाद उसमें नये अर्थसंधान का आकर्षण समाप्त हो जाता है। उन्हें दुख यह भी है कि शब्दों के पीछे / कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं / आदत बन चुकी है। -

“इस लिए गँवार आदमी की ऊब से पैदा हुई कविता एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ / शहर में चली गई।” क्योंकि गाँव में रहकर संघर्ष करना पढ़े-लिखे नफ़ासत जीवन जीने के लोलुप आदमी के लिए आसान नहीं है। इस तरह शहरीकरण पर कविता के माध्यम से की गई यह टिप्पणी उन लोगों पर गहरा व्यंग्य है, जो सुविधाभोग के स्वार्थ में अपनी ज़मीन को ही भूल जाते हैं। ऐसे लोग ही उस कविता को भी अपनी ज़मीन से उखाड़कर शहर में स्थापित करने की चेष्टा करते हैं। उनकी कविता पर धूमिल का व्यंग्य उल्लेखनीय है - नहीं – अब वहाँ कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है / पेशेवर भाषा के तस्कर – संकेतों / और बैलमुत्ती इबारतों में / अर्थ खोजना व्यर्थ है ये तस्कर संकेत उन प्रतीकों और उपमानों की ओर संकेत हैं, जिन्होंने गोल-गोल शब्दावली में वास्तविक अनुभव को दरकिनार कर दिया है। तभी धूमिल नए कवि को सलाह देते हैं हाँ, हो सके तो बगल से गुज़रते हुए आदमी से कहो – / लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा, / यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

कविता को आदमी को उसकी पहचान देना है, जो सामयिक भीड़ में कहीं खो गया है। धूमिल की आदमी से यह सम्बद्धता इसलिए आ पायी है कि वे उसी की तरह ज़िन्दगी के संघर्ष में उसके हिस्सेदार हैं। भाषा में आदमी होने की तमीज़ से उनका आशय नगरीय-बोध से जुड़ी सभ्यता नहीं, वह आदिम संस्कार है जो उसकी अपनी पहचान है। वे आदमी को सांचे में ढालने की अपेक्षा उसकी वैयक्तिक स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, जिसके तहत वह अपने ढंग से जीवन संघर्ष करने में सफल हो सकता है। इसके अभाव में वह भीड़ का एक हिस्सा बनकर रह जायेगा।

धूमिल की कविताएं अपनी अंतर्वस्तु और शिल्पगत बनावट-बुनावट की ताज़गी और सादगी के कारण हिंदी पाठकों और आलोचकों का ध्यान एक दम से अपनी ओर आकृष्ट करती है। धूमिल की कविताओं में आक्रोश है और उस आक्रोश के मूल में सभी शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध मानवीय मुक्ति का पक्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। भाषा और शैली की दृष्टि से धूमिल ने अपनी एक नयी पहचान बनायी है। हिंदी काव्य की परम्परागत रूपक योजना, मिथक रचना-प्रतीक-विधान का परित्याग कर इन्होंने भाषा एवं शैली – दोनों ही दृष्टियों से सपाट बयानी को अपनी कविता के लिए श्रेयष्कर समझा है। सामान्य बोल चाल की चालू भाषा और बिना लाग-लपेट के कहने का कौशल धूमिल की कव्य-शैली का प्रमुख आकर्षण है। धूमिल ने अकविता और श्मशानी भूखी-क्रुद्ध पीढ़ी के दौर में एक सार्थक विद्रोह भाव ही नहीं, एक नया काव्य-शिल्प भी हिंदी की आगे आने वाली पीढ़ी को दिया। भाव, भाषा और शिल्प – सभी दृष्टियों से धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया है। धूमिल ने विभिन्न काव्यान्दलोनों को चुनौती देकर अपना अलग व्यक्तित्व बनाये रखा।

*********

10 टिप्‍पणियां:

  1. कविता के बारे में जाना एक सर्वथा नया परिप्रेक्ष्य..

    उत्तर देंहटाएं
  2. शानदार पोस्ट के लिए आभार आपका। सच कहूँ तो धूमिल को कई बार पढ़ा हूँ लेकिन आज आपके साथ पढ़ना अधिक अच्छा लगा, कुछ और समझ पाया।..आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  3. देवेन्द्र जी की बात से सहमत हूँ! शायद बनारस (और आसपास) की मिट्टी में बसी है यह अभिव्यक्ति, एक स्पष्टवादिता जो कई लोगों को एम्बैरेस करती है तो कई लोगों को चकित करती है! यह तुलना अवश्य बेढंगी मालूम पड़ेगी, लेकिन मैंने धूमिल और काशीनाथ सिंह जी की शब्दावलि अपनी अम्मा की ज़ुबान में भी पाई है.
    आज धूमिल जी का परिचय आपके माध्यम से पाकर इस रचनाकार के प्रति मन और श्रद्धा से भर गया! नमन!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सही बात है। बनारस की मिट्टी में कुछ खास बात है जो मेरे जैसे हिंदी के कमजोर विद्यार्थी को भी हिंदी का कवि बना देता है! मुझे बार-बार ऐसा लगता है कि कबीर, कबीर न हुए होते यदि बनारस में न होते, तुलसी, तुलसी न हुए होते अगर बनारस की मिट्टी का साथ न मिलता, रैदास, रैदास......कितनो का नाम लूँ..! दो चार हों तो लिखूँ..।

      हटाएं
  4. और जो चरित्रहीन है
    उसकी रसोई में पकने वाला चावल
    कितना महीन है...

    ये हैं धूमिल...महान कवि की पुण्यतिथि पर...उनके कृतित्व पर प्रकाश डालने के लिये...धन्यवाद...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (11-02-2014) को "साथी व्यस्त हैं तो क्या हुआ?" (चर्चा मंच-1520) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    बसंतपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस प्रस्तुति को आज की कड़ियाँ और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  7. ज़मीनी सच को पूरे तीखेपन से उजागर करने के लिए जिस खरी भाषा का प्रयोग धूमिल ने किया वह उन जैसे रचनवाकार के ही बस की बात थी .उनकी अनगढ़ सहजता जो प्रभाव छोड़ती है उसके आगे रची हुई अभिव्यक्तियाँ बगलें झाँकने लगती हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  8. पूरी सच्चाई से कहा गया सच प्रभावित करता है और दूर तक अपना असर छोडता है ।

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।