रविवार, 9 फ़रवरी 2014

टॉल्सटॉय फार्म, कालेनबाक और सांपों का उपद्रव

गांधी और गांधीवाद-154

1909

टॉल्सटॉय फार्म, कालेनबाक और सांपों का उपद्रव

कालेनबेक

गांधी जी के संसर्ग में आकर न जाने कितने लोगों के जीवन में परिवर्तन आया। कालेनबेक भी उनमें से एक थे। वे बड़े रईस का जीवन जीते थे। उन्होंने कभी भी दुनिया की सर्दी-गर्मी नहीं सही थी। न कोई तकलीफ़ उठाई थी न कोई अड़चन सहा था। असंयम उनका धर्म हो गया था। संसार का हर सुख भोगना उनकी आदत थी। स्वच्छंद जीवन जीते थे। पैसे से जो चीज़ मिल सकती थी उसे हासिल करने के लिए उन्होंने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। ऐसा आदमी टॉल्स्टॉय फार्म में रहता था, सोता-बैठता, खाता-पीता थ। फार्मवासियों के जीवन के साथ अपने जीवन को उन्होंने पूरी तरह से मिला दिया था। भारतवासीयों को उनके इस रहन-सहन पर न सिर्फ़ आश्चर्य बल्कि आनंद भी हो रहा था, लेकिन कुछ गोरों ने तो कालेनबेक को मूर्ख और पागल मान लिया था। लेकिन कालेनबेक ने अपने त्याग को कभी भी दुखस्वरूप न माना। उनके इस त्याग-शक्ति के कारण कई लोगों के दिल में उनके प्रति आदर भाव भी बढ़ गया था। जितना आनंद उन्होंने सुखों के भोग में पाया था उससे अधिक उन्हें त्याग में मिल रहा था। छोटे-बड़े सबों के साथ वे हिल-मिल कर रहते।

टॉल्सटॉय फार्म पर रहते हुए गांधी जी और कालेनबाक के बीच काफ़ी घनिष्ठ संबंध हो गया था। कालेनबाक क्प फलवाले बड़े पेड़ों का बहुत शौक था। इसलिए टॉल्सटॉय फार्म के माली का काम वे स्वयं करते थे। हां रोज़ सवेरे बच्चों और बड़ों से भी इनके काट-छांट और सींचने काम काम करवाते। हंसमुख स्वभाव के कालेनबेक मेहनत के सभी काम हंसते-हंसते करते और दूसरे लोगों को उनके साथ काम करने में बड़ा आनंद आता। वक़्त पड़ने पर रात के दो बजे उठकर टॉल्स्टॉय फार्म से जोहान्सबर्ग जाने वाली टोली के साथ पैदल निकल पड़ते।

गांधी जी के इस सिद्धांत में उन्हें विश्वास था कि ‘बुद्धि जिस वस्तु को स्वीकार कर ले उसका आचरण करना उचित और धर्म है’। गांधी जी के इस विचार से कि सांप आदि अन्य जानवर को मारना वे पाप है, शुरू में तो कालेनबाक को आघात पहुंचा पर अंत में तात्विक दृष्टि से उन्होंने इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। कालेनबाक सांप को मारने के पक्ष में रहते थे। गांधी जी इससे सहमत नहीं थे।

फार्म में सांपों का उपद्रव

हालांकि अहिंसा के प्रति पूर्ण वचनबद्धत के बावजूद भी सांपों के मारने पर बिल्कुल न मारने की पाबंदी नहीं थी। फार्म में सांपों का उपद्रव काफ़ी था। इस फार्म की स्थापना के पहले यह स्थान निर्जन था। गांधी जी यहां सांपों के बीच रहे। उनको तसल्ली थी कि एक सांप भी उन्होंने नहीं मारा। एक दिन कालेनबाक के कमरे में अचानक ऐसी जगह एक सांप दिखाई दिया, जहां से उसे भगाना या पकड़ना लगभग असंभव था। फार्म के एक विद्यार्थी ने उसे देखा। उसने गांधी जी को बुलाया और पूछा – “क्या करना चाहिए? यदि आप आज्ञा दें तो इसे मार दूं?” उस सांप को मार देने की इजाज़त देना गांधी जी ने अपना धर्म समझा। उन्होंने आज्ञा दे दी। सांप को मारने की आज्ञा देने में गांधी जी को धर्म दिखाई दिया। गांधी जी कहते हैं, “सांप को हाथ से पकड़ लेने या फार्मवासियों को और किसी तरह भयमुक्त कर देने की मुझमें शक्ति न थी और आज भी उसे उत्पन्न नहीं कर सकता।”

इसी क्रम में कालेनबेक ने सांपों की विभिन्न प्रजातियों को पहचानने के लिए कई पुस्तकों का अध्ययन किया। उन्होंने जाना कि सभी सांप ज़हरीले नहीं होते। कई तो खेतों और फसलों की रक्षा भी करते हैं। गांधी जी की सहायता से उन्होंने सर्पों को पहचानना भी सीख लिया।

एक विशाल अजगर जो फार्म में मिला था, उसे कालेनबेक ने पाल लिया था। उसको सदा अपने हाथ से खाना देते। उसे पिंजड़े में उन्होंने रखा था। यह देखकर गांधी जी ने कहा, “हालांकि आपका भाव शुद्ध है, फिर भी अजगर तो उसे पहचानने से रहा। आपकी प्रीति के साथ भय मिला हुआ है। उसको खुला रखकर उसके साथ खेलने की हिम्मत आपकी नहीं है। इसलिए इस सांप को पालने में मैं सद्भाव तो देखता हूं, पर उसमें अहिंसा नहीं देखता। इस सांप के तौर-तरीक़े, इसकी आदतें जानने के लिए आपने उसे क़ैद कर रखा है। यह एक प्रकार की विलासिता हुई। दोस्ती में किसी को बन्दी नहीं बनाया जाता।‘’

हालांकि कालेनबेक को गांधी जी की यह दलील जंची, फिर भी उसे तुरंत छोड़ देने की उनकी इच्छा नहीं हुई। पर इस सांप ने क़ैद से निकलने का रस्ता खुद निकाल लिया। शायद पिंजड़े का दरवाजा खुला रह गया हो। एक सुबह कालेनबेक उसे देखने गए तो देखा कि पिंजड़ा खाली है। वह ख़ुश हुए।

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9 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी-छोटी बातें, लेकिन उनके गहरे और दूरगामी प्रभाव बापू के जीवन में बिखरे पड़े हैं!!

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  2. बापू का साँप को मारने का आदेश उन लोगों के लिये सन्देश है जो उनके सिद्धान्तों को अव्यावहारिक मानते हैं । वास्तव में उनको पूरी तरह जान लेने पर ही लोग वास्तविकता से परिचित हो सकते हैं । बापू कि ऐसे अनछुए प्रसंगों को यहाँ देने के लिये आपका आभार

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (10-02-2014) को "चलो एक काम से तो पीछा छूटा... " (चर्चा मंच-1519) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    बसंतपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अलविदा मारुति - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. प्रकृति के अनुसार सबको रहने दिया जाये, सबके लिये पर्याप्त स्थान है यहाँ।

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  6. प्रेरक प्रसंग और सुन्दर प्रस्तुति!

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  7. अहिंसा का वास्तविक अर्थ और उदाहरण
    है इस लेख में !

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