सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
3. प्रवेश
“संपूर्ण स्तुति ईश्वर के लिए है जो असंख्य जगतों का पालनहार है।” (क़ुरआन : 1/1)
सूफ़ीमत की साधना के मूल तत्त्व को समझने के लिए इस्लाम धर्म
के साथ उसके संबंध को समझना बहुत ज़रूरी है। उसके साथ ही इस्लाम धर्म के आविर्भाव के समय अरब देशों के उस समय की राजनीतिक
और सामाजिक परिस्थितियों को भी समझना ज़रूरी है। सूफ़ीमत जब भारत
पहुंचा तो यहाँ के लोगो ने उसका ह्रदय से स्वागत किया। धार्मिक सहिष्णुता
और उदारता आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता रही है। मध्यकालीन भारत
में मुसलमानों के आगमन से और विशेषतः दिल्ली सल्तनत (1206 से 1526 तक ) की स्थापना के
साथ-साथ हिन्दू और इस्लाम धर्म के बीच गहन संपर्क हुआ। इस दीर्घकालिक संपर्क से
दोनों धर्मों के अनुयायी न केवल एक दूसरे से प्रभावित हुए, बल्कि उनके बीच
धारणाओं, धार्मिक विचारों और प्रथाओं का पारस्परिक आदान-प्रदान भी हुआ। इसके
फलस्वरूप भक्ति और प्रेम की भावना पर आधारित एक दार्शनिक अवधारणा ने इस्लाम धर्म
में लोकप्रियता प्राप्त की जिसे सूफ़ीमत कहते हैं। इस अवधारणा के लिए
अंग्रेज़ी में सूफ़िज़्म (SUFISM) और अरबी
में तसव्वुफ़ शब्द का प्रयोग होता है। तसव्वुफ़ शब्द की निष्पत्ति अरबी अक्षरों – सुआद, वाव और फ़ा, - से हुई है, जिसका तात्पर्य है स्वयं को सूफ़ी जीवन शैली के
प्रति समर्पित कर देना।
सूफ़ी संप्रदाय का उदय प्रायः इस्लाम के साथ ही हुआ, किन्तु
एक आन्दोलन के रूप में इस्लाम के नीतिगत ढांचे के तहत इसे मध्य काल में अत्यंत
लोकप्रियता प्राप्त हुई। इस्लामी धर्म-उत्थान आंदोलन की दृष्टि से भी सूफ़ीमत का
विश्लेषण किया गया है। प्रो.निजामी के अनुसार सूफ़ीवाद उच्च स्तर के स्वतंत्र
विचारों का स्वरूप है। मूलतः अध्यात्म मनुष्य का नैसर्गिक स्वभाव है। विवेक हर व्यक्ति के अंतर्मन
में निहित होता है। ऐसे में जिसका विवेक जागृत हो गया, वह आध्यात्मिकता की राह पर ब्रह्मज्ञान की खोज
में निकल पड़ता है। हज़रत मारूफ
अल करखी के अनुसार परमात्मा संबंधी सत्य को
जानना तथा मानवीय वस्तुओं का त्याग ही सूफ़ी धर्म है। ऐसे धर्मनिष्ठ लोगों के लिए आध्यात्मिकता सत्य
की उपलब्धि का साधन है और सूफ़ी चिंतन वस्तुतः उसी सत्य का उद्घाटन है जिसमें जीवात्मा और परमात्मा के अनेक
अंतरंग रहस्य छिपे हुए हैं। प्रेम और उदारता सूफ़ी के मूल भाव हैं। इसकी रहस्यवादी भावना
संयुक्त रूप से व्यक्ति और समाज की वर्ग, धर्म, धन, शक्ति और पद के अवरोधों से ऊपर उठाकर उनकी नैतिक उन्नति
में योगदान देती है। विशर अलहाफी के अनुसार, "परमात्मा के सहारे
अपने हृदय को पवित्र रखना ही सूफ़ी धर्म है।" जून्नून मिस्री की दृष्टि में वचन और कर्म में सामंजस्य रखना तथा सामाजिक बंधनों
से अलग रहना ही सूफ़ीवाद है। सूफ़ी साधक के लिये बाहरी तथा आन्तरिक शुद्धि और पवित्रता बनाये रखना जरूरी
है। उसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपनी समस्त इच्छाओं, वासनाओं को मिटाकर
परमात्मा की इच्छा पर अपने आपको छोड़ दे।
हज़रत अबुल हुसैन अननूरी का कहना है, “सूफ़ी को संसार से घृणा होती है और परमात्मा से
प्रेम। नफ़्स (वासनामय
ह्रदय) के सभी आनंदों का परित्याग सूफ़ी का धर्म है”। सूफ़ियों ने अपने सारे भौतिक सुखों का परित्याग
कर निर्धनता का जीवन जीना शुरू किया और ‘अलफ़क़रू फ़ख़्री’ (निर्धनता पर गर्व) को अपने चिंतन का आदर्श बनाया और जगत में सूफ़ी
फ़क़ीर के रूप में जाने गए। उन्होंने न सिर्फ़ ईश वंदना के माध्यम से आध्यात्मिकता के
उच्च शिखर को प्राप्त किया, बल्कि अपने
प्रयासों से खंडन-मंडन के स्थान पर दोनों संस्कृतियों का सुन्दर सामंजस्य प्रस्तुत
किया। कुजविनी के अनुसार सुन्दर
व्यवहार ही सूफ़ीवाद
है। सूफ़ी साहित्य के अध्ययन से
हम पाते हैं कि सूफ़ियों ने अपने
प्रेमाख्यानों द्वारा हिन्दू-मुस्लिम हृदय के बीच की खाई को मनोवैज्ञानिक ढंग से
पाटने का प्रयास किया। अबू सईद फजुलल्ला के अनुसार एकाग्रचित्त से परमात्मा में
ध्यान लगाना ही सूफ़ी
मत है।
प्रो. आरबेरी ने सूफ़ीमत को एक मुसलमान व्यक्ति द्वारा अल्लाह की जीवंत उपस्थिति को
अपने व्यक्तिगत अनुभव में पाने का प्रयास (the attempt of individual Muslims to realize in their personal experience
the living presence of Allah) बताया है।
डॉ. ताराचन्द ने इसे एक “जटिल घटना” कहा है। यह उस नदी की तरह है, जिसमें विभिन्न दिशाओं से कई सहायक नदियां आकर
मिलती हैं। इसका मुख्य स्रोत पवित्र ग्रंथ क़ुरआन शरीफ़ और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद
साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ का जीवन-चरित है। उनके अनुसार "सूफ़ीवाद प्रगाढ़ भक्ति
का धर्म है, इसका भाव प्रेम है, कविता, संगीत तथा नृत्य
इसकी आराधना के साधन हैं तथा इसका आदर्श परमात्मा में विलीन हो जाना है।" डेविस के अनुसार यह बिना किसी धार्मिक पंथ या मताग्रह के प्यार का धर्म है तथा
के.डी. भार्गव के शब्दों में “सूफ़ीमत सर्वोच्च सुंदरता के प्रति प्यार है।” डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "सूफ़ी साधकों का मूल लक्ष्य न केवल ईश्वर के साथ बौद्धिक तथा भावुक तथा
बौद्धिक संबंधों की स्थापना बल्कि मानवता की सेवा करना है।'' ‘अरब साहित्य का इतिहास’ में आर. ए. निकोल्सन ने कहा है हज़रत मारूफ अल करखी के अनुसार “परमात्मा सम्बन्धी सत्य
को जानना और मानवीय वस्तु का त्याग ही सूफ़ी का धर्म है''. प्रमुख सूफ़ी साधक हज़रत जुन्नैद का मानना है कि तसव्वुफ का मतलब यह है कि परमात्मा तुम्हें अपने स्वार्थ के लिए जीवन न धारण करने दे, और कुछ ऐसा कर दे कि तुम उसी के लिए जिओ। हज़रत अबू अली कुजवीनी के अनुसार सूफ़ीमत सुन्दर व्यवहार है। हज़रत अबूसह्र सालूफी के अनुसार विधि निषेधों से बचना ही सूफ़ीमत है। हज़रत बिशार अल्हाफी ने कहा कि सूफ़ी वह है जो परमात्मा के सहारे अपने ह्रदय को पवित्र रखता है। हज़रत अबू सईद फजलुल्ला ने कहा कि एकाग्र चित्त से परमात्मा में ध्यान लगाना ही सूफ़ीमत है। हज़रत जुन्नून मिस्री ने सूफ़ी की विशेषता बताते हुए कहा है कि “सूफ़ी वह है जो वचन और कर्म में सामंजस्य बनाए रखता है और उसका मौन ही उस अवस्था का परिचय देता है और जो सांसारिक बन्धनों को दूर कर देता है”। हज़रत अल गजाली भी उसी को सूफ़ी मानते हैं “जो शान्ति से रहते हुए ईश्वर में अविराम लीन रहे।” हज़रत अबु बक्र शिवली का मानना है कि ईश्वर के अतिरिक्त अखिल विश्व का त्याग ही तसव्वुफ़ है। इस तरह से हम विभिन्न विद्वानों द्वारा सूफ़ीमत के विभिन्न परिभाषाओं से
परिचित होते हैं।
शुरू
में सूफ़ी साधकों ने वैराग्य भावना और तपोमय जीवन की ओर अधिक ध्यान दिया। वे
ध्यान, सुमिरन
और नाम जप के द्वारा अपने ‘अहं’ को
मिटाने का प्रयास करते थे। धीरे-धीरे उनमें प्रेम-भक्ति
की और झुकाव होने लगा। मनुष्य में जो कमियाँ हैं उसको प्रेम भाव से ही
भरा जा सकता है। सूफ़ी अपने सिद्धांतों और क्रियाओं की परीक्षा क़ुरआन
और हदीस को दृष्टि में रखकर करते हैं। अधिकाँश सूफ़ी पैग़म्बर और
इस्लाम धर्म के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करते हैं। वे
इस्लाम के नियम कानूनों की पाबंदी स्वीकार करते हैं। सूफ़ी वाह्याचार
से अधिक आतंरिक शुद्धि पर ज़ोर देते हैं। अतः सूफ़ीमत का अध्ययन इस्लाम
धर्म को छोड़कर नहीं किया जा सकता।
सूफ़ीवाद इस्लाम के भीतर ही एक रहस्यवादी आंदोलन
के रूप में शुरू हुआ था। प्रारंभिक सूफ़ियों ने ईश्वर और व्यक्ति के बीच प्रेम
संबंध पर बहुत अधिक बल दिया। प्रसिद्ध सूफ़ी संत मुल्ला नूरुद्दीन
अब्दुर्रहमान जामी ने कहा था, “मैं वही
हूँ, जिसे
मैं प्यार करता हूँ और जिसे मैं प्यार करता हूँ वह मैं ही है। एक ही
शरीर में निवास करने वाले हम दो प्राण हैं। अगर
तुम मुझे देखते हो, तो तुम उसे देखते हो और अगर तुम उसे देखते हो, तो तुम
हम दोनों को देख रहे हो।” यह ईश्वर के साथ अभेद संबंध
को बताता है। सूफ़ियों का विश्वास है कि परमात्मा प्रेम स्वरुप
है। परमात्मा
के प्रति उसके ह्रदय में प्रेम रहता है, जिससे परमात्मा स्वयं प्रेम
करता है। उन्होंने ईश्वर को पाने के लिए धर्म की
वास्तविकता यानी मुहब्बत पर ध्यान केन्द्रित किया और उस एकमेव मार्ग को अपनाया जो
सीधे ईश्वर से जा मिलता है। उन्होंने अपनी बातें, अपने आचरण, पवित्रता, सादगी, व्यक्तित्व
और प्रेम से, दुनिया को समझाई। दुनिया की चाहत को अपने पास फटकने नहीं दिया और
सांसारिकता से बचना उचित समझा। सूफ़ीमत के शुरुआती दिनों से ही कुछ साधकों में
रहस्यवादी प्रवृत्तियाँ दिखने लगीं। अधिकाँश साधक एकान्तिक और फ़क़ीरी
जीवन जीने लगे। कष्टसाध्य और त्यागमय जीवन जीना उनका आदर्श था। उनका
मानना था कि कष्ट सहने से और सांसारिक प्रलोभनों से अपने को दूर रखकर ईश्वर
प्राप्ति मार्ग सुगम हो जाता है।
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मनोज
कुमार
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