शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम-1

 सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम-1

अपनी ओर से



हे मनुष्यों! हमने तुम्हें पैदा किया एक नर तथा नारी से तथा बना दी हैं तुम्हारी जातियाँ तथा प्रजातियाँ, ताकि एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में, तुममें अल्लाह के समीप सबसे अधिक आदरणीय वही है, जो तुममें अल्लाह से सबसे अधिक डरता हो। वास्तव में अल्लाह सब जानने वाला है, सबसे सूचित है।  (क़ुरआन : 49/13)

विश्व-प्रेम हमारे देश की पहचान है। वसुधैव कुटुम्बकम हमारा सदियों से उद्घोष वाक्य रहा है। जीवात्मा-परमात्मा का अंश है, वह हर एक के अंतःकरण में विराजमान है। जब एक ही ज्योति- एक ही धारा हर जीव में है, तो यह प्रत्यक्ष है कि प्रत्येक जीव एक ही प्रकाश-ज्योति से प्रकाशित है, जो ईशतत्व है। हमारे अंदर वही, आपके व हर मानव के अंदर वही- तो हुई न सब में एकात्मता। इस एकात्म भाव को यदि मानव समझ ले तो चरितार्थ होगी ये उक्ति- 'उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्' (उदार हृदय वाले लोगों की तो यह सम्पूर्ण धरती ही परिवार है।) एकमात्र विश्व-प्रेम ही संसार में शक्ति का संचार है। क़ुरआन में मुसलमानों को उन बुराइयों से बचने की ताकीद की गई है जो सामाजिक जीवन में बिगाड़ पैदा करती हैं और जिनके कारण आपस के सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं। इसमें जातीय और वंशगत भेदभाव पर भी चोट की गई है जो संसार में व्यापक बिगाड़ के कारण बनते हैं। समस्त मानव एक ही मूल से पैदा हुए हैं और जातियों और क़बीलों में इनका विभक्त होना परिचय के लिए है न कि आपस में गर्व के लिए। और एक मनुष्य पर दूसरे मनुष्य की श्रेष्ठता के लिए नैतिक श्रेष्ठता के सिवा और कोई वैध आधार नहीं। क़ुरआन की आयत 49/13 में सभी मनुष्यों को संबोधित कर के यह बताया गया है कि सब जातियों और क़बीलों के मूल माँ-बाप एक ही हैं। इस लिये वर्ग, वर्ण तथा जाति और देश पर गर्व और भेद भाव करना उचित नहीं। इससे आपस में घृणा पैदा होती है। इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था में कोई भेद भाव नहीं है और न ऊँच नीच का कोई विचार है और न जात पात का तथा न कोई छुआ छूत है। नमाज़ में सब एक साथ खड़े होते हैं। विवाह में भी कोई वर्ग वर्ण और जाति का भेद भाव नहीं। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़ुरैशी जाति की स्त्री ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) का विवाह अपने मुक्त किये हुये दास ज़ैद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से किया था। और जब उन्होंने उसे तलाक दे दी तो उन्होंने (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ज़ैनब से विवाह कर लिया। इसलिये कोई अपने को सय्यद कहते हुये अपनी पुत्री का विवाह किसी व्यक्ति से इस लिये न करे कि वह सय्यद नहीं है तो यह जाहिली युग का विचार समझा जायेगा। जिससे इस्लाम का कोई संबन्ध नहीं है। बल्कि इस्लाम ने इसका खण्डन किया है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के युग में अफ्रीका के एक आदमी बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) तथा रोम के एक आदमी सुहैब (रज़ियल्लाहु अन्हु) बिना रंग और देश के भेद भाव के एक साथ रहते थे। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा, अल्लाह ने मुझे उपदेश भेजा है कि आपस में झुक कर रहो। और कोई किसी पर गर्व न करे। और न कोई किसी पर अत्याचार करे। सभी आदम की संतान हैं। यदि आज भी इस्लाम की इस व्यवस्था और विचार को मान लिया जाये तो पूरे विश्व में शान्ति तथा मानवता का राज्य हो जायेगा। सूफ़ी संप्रदाय जिसका उदय इस्लाम के साथ ही हुआ था, के अनुयायियों, जिन्हें सूफ़ी कहा जाता है, ने भी सदा इस मत का प्रचार-प्रसार किया कि ईश्वर तो कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर को सब प्राणियों के अंदर समभाव से देखते हुए हम सबसे प्रेम करें, किसी से द्वेष-भाव न रखें। एकात्मकता का भाव प्रेम व शांति स्थापना का सर्वश्रेष्ठ साधन है। हम हृदय से स्वीकार करें कि हम सब जीवों में एक ही आत्म तत्व अर्थात् परमात्म-तत्व विद्यमान है। 

आज सामाजिक कर्त्तव्य और सामाजिक दायित्व बोध जैसे शब्द शब्दकोशों में सिमटकर रह गए हैं। मनुष्य घोर आत्मकेन्द्रीत होता जा रहा है। अभी ज़रूरत है मनुष्य को अधिकाधिक मानवीय होना। तभी मनुष्यता बची रह सकती है। ऐसे में मनुष्यता को संजीवनी प्रदान करने वाला सूफ़ीमत की अभी ज़रूरत है। ऐसा मुझे लगता है। और इसी को मूल में रखकर मैं सूफ़ीमत की ओर मुड़ा और सहज सरल भाव से जो मैं समझ सका, उसी का सुपरिणाम है यह पुस्तक।

सूफ़ीमत पर लिखने का ख़्याल क्योंकर मेरे मन में आया कह नहीं सकता। हां, बचपन से दरगाहों में जाकर अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करने की आदत रही है। इसी आदत ने सूफ़ीमत के अध्ययन को प्रेरित किया। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने अपने ब्लॉग पर एक छोटा सा आलेख लिखासूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया। पाठकों की प्रतिक्रिया ने मुझे इसे विस्तार देने को प्रेरित किया। लेखन के दौरान कई मित्र ऐसे मिले जिन्होंने मुझे हर प्रकार से मार्गदर्शन दिया। मैं खासकर डॉ. अनवर जमाल साहब का नाम लेना चाहूंगा, जिन्होंने मुझे प्रेरित किया कि मैं इस आलेख को पुस्तक स्वरूप दूं। उनके प्रोत्साहन व प्रेरणा से मैं लिखता गया और इसका परिणाम इस पुस्तक के रूप में आपके सामने है।

मेरा विनम्र प्रयास है कि प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से सूफ़ीमत के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया जाए, जो इस मत के बारे में कम जानकारी रखने वाले के लिए उपयोगी सिद्ध हो सके। समझने और अध्ययन में सुविधा के दृष्टिकोण से सरलतम भाषा का प्रयोग किया गया है। मेरे न चाहने के बावज़ूद कुछेक स्थानों पर पहले प्रस्तुत तथ्यों की पुनरावृत्ति हो गई है। ऐसा अपरिहार्य हो गया था। प्रबुद्ध पाठक गण इसे सहन करने का कष्ट करेंगे।

इस पुस्तक के लिखने के क्रम में मैंने कई पुस्तकों से जानकारियां प्राप्त की। उन सभी पुस्तकों का नाम इस पुस्तक के अंत में संदर्भ ग्रंथों के तहत दिया गया है। उन सभी पुस्तकों के लेखकों के प्रति मैं विनम्र आभार प्रकट करता हूं। कई साथियों ने भी समय-समय पर मेरा मार्गदर्शन किया। मैं उन सभी का आभार प्रकट करता हूं।

यदि सूफ़ीमत के विभिन्न आयामों को समझने-समझाने में यह पुस्तक सहायक और उपयोगी होती है, तो मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर

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