सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
4. सूफ़ी शब्द का अर्थ
रहमान के (प्रिय) बन्दे वही हैं जो
धरती पर नम्रता पूर्वक चलते हैं (घमंड से अकड़ कर नहीं चलते) और जाहिल उनके मुंह आये तो कह देते हैं तुमको सलाम (उन से उलझते नहीं)! (क़ुरआन: सूरा 25/आयत 63)
जब हम
सूफ़ियों की बात करते हैं तो हमारे सामने सफ़ेद चोग़ा पहने और हवा में हाथ उठाये
फ़क़ीरों की छवि उभर कर आती है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि सूफ़ी सिर्फ़ यही नहीं
हैं। सूफ़ी नाम के स्रोत को लेकर अनेक मत है। सूफ़ी शब्द का अर्थ
जितना विस्तृत है, उतना ही रहस्यमय भी। सूफ़ी शब्द का प्रयोग ज्ञानियों के उस विशेष
वर्ग के लिए किया गया, जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक सांसारिक सुख-सुविधाओं से मुंह
मोड़कर अपने लिए अध्यात्म-साधना का दुर्गम पथ निर्धारित किया। सच्चा साधक
केवल इबादत ही नहीं करता, बल्कि आचरण में भी उत्तम होता है। सूफ़ी साधक को
ब्रह्मज्ञानी और अध्यात्मवादी माना जाता रहा है। “सूफ़ी” वही कहलाता है, जो
तसव्वुफ़ का अनुयायी और सारे मतानुयायियों से प्रेम करने वाला हो। उन्होंने सादे
जीवन और निश्छल ईश्वरीय प्रेम पर ज़ोर दिया। ये लोग अहंकार से मुक्त होते हैं और
उनका व्यवहार शांत और शालीन होता है।
सूफ़ी शब्द की उत्पत्ति
को लेकर विद्वानों में काफ़ी मतभेद रहा है। विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से
सूफ़ी शब्द को व्युत्पन्न करने का प्रयास किया है। जब इस विचारधारा का पंथ अस्तित्व
में आया तब सूफ़ी लोग अरब में रहते थे। काफ़ी समय तक उनकी पहचान उनके ऊनी
लिबासों से की जाती रही, क्योंकि कई सूफ़ी दरवेश ऊन का चोंगा पहनते थे। "सूफीवाद के खजाने
का रक्षक" हज़रत अबू नसर अल सिराज (मृत्यु 378 हिजरी/988 ईस्वी) का कथन है
कि, 'सूफ़ी' शब्द अरबी भाषा के 'सूफ' शब्द से निकला है
जिसका अर्थ है ऊन। सूफ़ी का मूल “सूफ़” का अर्थ "एक जो ऊन पहनता है”, है, इसीलिए वे संत जो
ऊनी वस्त्र पहनते थे, सूफ़ी कहलाए। ऊनी कपड़े पारंपरिक रूप से तपस्वियों और मनीषियों से
जुड़े थे। सादा जीवन व्यतीत करने वाले सूफ़ी ऊनी चोंगा पहना करते थे या कंबल ओढ़े
रहते थे, अतः उन्हें सूफ़पोश कहा जाता था। अनेक हदीसों में भी कहा गया है कि
इस्लामी पैग़म्बर ऊनी कपड़े पहनते थे। हज़रत मुहम्मद साहब के बाद अरब देश में जो सन्त
ऊनी कम्बल ओढ़कर घूमते थे तथा अपने मत का प्रचार करते थे, वे सूफ़ी कहलाये।
पाश्चात्य विद्वान ब्राउन ने इस मत को स्वीकार करते हुए लिखा है कि परसिया (ईरान) में
इन रहस्यवादी साधकों को ‘पश्मीना पूश’ (ऊन पहनने वाला)
कहा जाता था। ईरान में ये सन्त ऊनी वस्त्र को जीवन की सादगी तथा विलासिता से
दूर रहने का प्रतीक मानकर एकान्त जीवन व्यतीत करने पर बल
देते थे। अधिकांश विद्वानों का कहना है कि इस धर्म का नाम 'सूफ़ी' इसलिए पड़ा क्योंकि
इस धर्म के अनुयायी बहुत निर्धनता की दशा में रहते थे। सूफ़ी सन्त मोटा वस्त्र धारण
करते थे, जमीन पर सोते थे। पैगम्बर की बनवाई गई मस्जिद में रहते थे तथा
वाद-विवाद करते थे। डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार, "सूफ़ी उन मुसलमान संतों को
कहते हैं जो दीनता का जीवन बिताने के उद्देश्य से ऊन के मामूली कपड़े पहनते हैं
तथा जो क़ुरआन के शाब्दिक अर्थ को प्रधानता न देकर उसमें निहित रहस्य को विशेष
महत्त्व देते हैं।"
कुछ विद्वानों का मत है कि यह शब्द “सफ़-ए-अव्वल” से निकला है, जिसका अर्थ सबसे आगे की पंक्ति या प्रथम
पंक्ति है। सूफ़ी अपने साहस, धैर्य और अपने उच्च चरित्र के कारण ख़ुदा के सामने प्रथम पंक्ति में होता है, इसलिए वह सूफ़ी कहलाया। आगे की पंक्ति या प्रथम
श्रेणी में रखने से अभिप्राय है कि उसे क़यामत के दिन ईश्वर के समक्ष प्रथम पंक्ति
में खड़ा किया जाएगा क्योंकि उसने जीवन भर ईश्वर स्मरण ही किया है।
कुछ दूसरे लोग इस शब्द को “सुफ़्फा” से बना हुआ मानते हैं, जिसका अर्थ होता है “चबूतरा”। इस मत के अनुयायियों का मानना है कि अरब की पवित्र नगरी मदीना में, पैग़म्बर
हज़रत मुहम्मद साहब (स.अ.व.) के जीवन-काल में उनके द्वारा बनवाई गई मस्जिद के
चबूतरे पर एकत्र होकर भक्ति करते, चिन्तन-मनन करते, ईश्वर के गुणगान करते और ज्ञानोपार्जन में लगे
रहते लोग “अहले-सुफ़्फ़ा” अर्थात “चबूतरे पर बैठे लोग” कहे जाते थे। कालांतर में यही लोग सूफ़ी कहलाए।
एक अन्य मत के अनुसार अरबी भाषा में चटाई को सूफ़ी कहते हैं। सूफ़ी संत
चटाई पर कतार में बैठ कर ईश्वर की उपासना किया करते थे, और इसलिए वे सूफ़ी कहलाए।
एक और शब्द सोफ़ता है, जिसकी चर्चा विद्वानों ने की है। इसका संबंध एक अरब क़बीले से था, जो बनी-सोफ़्ता कहे जाते थे।
सोफ़ानता से भी ‘सूफ़ी’ की व्युत्पत्ति की झलक मिलती है, जो एक प्रकार की तरकारी है और संतों को काफ़ी
प्रिय थी।
एक व्युत्पत्ति सफ़वत-अलक़ज़ा से मानी गई है जिसका अर्थ गद्दी पर बालों का
गुच्छा होता है। तर्क यह है कि इस्लामी पैग़म्बर केश रखते थे।
एक शब्द है “सोफिया” जिसका अर्थ है - ज्ञान। इस ज्ञान का
वैशिष्ट्य उसकी निर्मलता में निहित है। अतः निर्मल प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ही
सूफ़ी कहलाए।
कुछ विद्वान इसे यूनानी शब्द “सोफोस” (Sophos, ज्ञान) से निकला हुआ मानते हैं
जिसका अर्थ होता है – ज्ञान मार्ग। जो लोग उस
ज्ञान या आध्यात्मिक ज्ञान के मार्ग पर चलते हैं, सूफ़ी कहलाते हैं। इस मूल से फिलोसफ़ी, थियोसफ़ी इत्यादि शब्द निकले हैं।
एक अन्य व्युत्पत्ति “सूफ़ाह” शब्द है जिसका अभिप्राय सांसारिकता से विरत हो, ख़ुदा की सेवा में निरत रहने
वालों से है। जाहिलिया काल में अरबों की एक ऐसी जाति थी जो सांसारिक व्यापारों से
अलग होकर मक्का के देवालय की सेवा में नियुक्त हो गए, सूफ़ाह कहलाए। इसी तरह कुछ
लोग “बनू सूफ़ा” नाम की एक घुमक्कड़ जाति के ‘सूफ़ा’ शब्द से निकलना मानते हैं।
इसके अलावा कई और शब्दों, जैसे सफ़ो (प्रतिष्ठित व्यक्ति), सफ़ी (अभिन्न मित्र) और मुस्तफ़ा
(चयनित व्यक्ति, इस्लामी पैग़म्बर का
प्रसिद्ध नाम) आदि से भी सूफ़ी शब्द की व्युत्पत्ति का उल्लेख मिलता है।
कुछ विद्वानों का मत है कि सूफ़ी शब्द की उत्पत्ति “सफ़ा” से हुई है जिसका अर्थ होता है विशुद्धता, पवित्रता या चित्त की शुद्धता। हज़रत हुजवीरी ने भी “सफ़ा” शब्द से ही ‘सूफ़ी’ का बनना माना है। इस मत के अनुसार सूफ़ी वह
होता है जो सात्विक आचरण द्वारा धार्मिक या आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करता है। वह
सांसारिकता से दूर रहता है और जिसका हृदय सांसारिक वासनाओं की ओर से पवित्र होता
है। वह ईश्वर के प्रति समर्पित होकर प्रेम भाव से ईश्वर की प्रेमोपासना करता है।
इन विभिन्न मतों में चाहे जितनी भी सच्चाई हो, सूफ़ी सम्प्रदाय की प्रवृत्तियों
को देखने से प्रतीत होता है कि अंतिम व्याख्या इनके नाम के लिए सर्वाधिक उपयुक्त
है। वह व्यक्ति जो प्रेम के वास्ते मुसफ़्फ़ा (साफ किया हुआ, शुद्ध) होता है, साफ़ी है और जो व्यक्ति ईश्वर
के प्रेम में डूबा हो, वही सूफ़ी है। ऐसे व्यक्ति वैभवशाली जीवन की वर्जना करने वाले थे। सूफ़ी
वह है जो न किसी वस्तु का अधिकारी है और न वह स्वयं किसी के अधिकार में है। उनकी
विशेषता यह है कि उनका ह्रदय पवित्र है और उनके कर्तव्य भी पवित्र हैं। सच्चा सूफ़ी
वही है जो अपवित्रता को पीछे छोड़ आया है। बाहर और भीतर की शुद्धि और पवित्रता बनाए
रखना सूफ़ी साधक का कर्तव्य है। वह अपनी समस्त इच्छाओं और समस्त वासनाओं को मिटाकर
परमात्मा की इच्छा पर अपने को छोड़ देता है। सूफ़ी लफ़्ज़ कहीं से भी आया हो, लेकिन सूफ़ी उस
शख़्स को कहा जाता था जिसका ताल्लुक़ तमाम दुनियावी हसरतों और ख्वाहिशों से दूर
सिर्फ़ अल्लाह से होता था। वो सभी अपनी
ज़िंदगी का मक़सद क़ुरानी आयातों में बताए गए अर्थों में समझते थे।
सूफ़ी शब्द का प्रयोग कब से शुरू हुआ इसके बारे में ठीक से पता नहीं चलता।
लेकिन यह तो तय है कि नवीं शताब्दी में इसका प्रयोग शुरू हो चुका था। बहुत से लोग
इस शब्द और मत को हज़रत मुहम्मद पैगम्बर से जोड़ते हैं। सूफ़ी मानते हैं कि सांसारिक
प्रलोभनों से दूर रहकर अपने अंतःकरण को शुद्ध करके साधक प्रेम द्वारा परमात्मा से
एकत्व को प्राप्त कर सकता है। अतः सूफ़ीमत का मूल स्रोत क़ुरआन में खोजना चाहिए। सूरा
3, 31, में कहा गया है, “यदि परमात्मा से तुमको
प्रेम है, तो मेरा अनुसरण करो
और तब परमात्मा तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा, क्योंकि वह
क्षमाशील और दयालु है।” इस आयत में यह संकेत है कि जो अल्लाह से प्रेम का
दावा करता हो, और मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का
अनुसरण न करता हो, तो वह अल्लाह का प्रेमी नहीं हो सकता। इसमें अल्लाह और पैग़म्बर को मानने के लिए कहा
गया है। यह आयत स्पष्ट करती है कि यदि आप अल्लाह से प्रेम करते हैं, तो रसूल की आज्ञा का पालन करें, जिसके बदले अल्लाह प्रेम, क्षमा और दया प्रदान करेगा। अल्लाह का सच्चा
प्रेम चाहने वालों को पैगंबर मुहम्मद के पदचिह्नों पर चलना चाहिए।
इसी तरह पवित्र क़ुरआन के सूरा 2 की आयत 129 में कहा गया है–
“पालनहार, इनके बीच अपना एक रसूल भेज, जो इनके सम्मुख तेरे कथन का वर्णन करे, उन्हें ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दे और उनकी
आत्माओं को शुद्ध करे।” (क़ुरआन 2/129)
इसका यदि ठीक से विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि एक अध्यात्मिक नेतृत्व
(धर्म गुरु) की आवश्यकता अपरिहार्य है। एक रसूल से अभिप्रेत मुह़म्मद
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। क्योंकि इस्माईल अलैहिस्सलाम की संतान में उनके सिवा कोई दूसरा रसूल नहीं हुआ। ऐसे में सर्वश्रेष्ठ अध्यात्मिक नेतृत्व पैग़म्बर
के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है, जिसे ईश्वर ने स्वयं अपना दूत बनाकर भेजा है। इस
तरह देखें तो सबसे पहले सूफ़ी इस्लामी पैग़म्बर ख़ुद हुए।
सूफ़ियों के मतानुसार पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ को ईश्वर से दो प्रकार की वाणियां प्राप्त हुई
थीं – “इल्म-ए-सकीनां” (ग्रन्थ ग्रंथित ज्ञान), जो पवित्र ग्रंथ क़ुरआन शरीफ़ में संगृहीत है। दूसरी “इल्म-ए-सिना”, जो हृदय में निहित थी। सूफ़ियों ने दूसरी प्रकार की वाणी को अपनाया। वह वाह्य
आडंबरों के स्थान पर भीतरी तत्वों पर बल देता है। वह साधनारत होते हुए भी लोक की
अनदेखी नहीं करता। उसके मन में परमात्मा के साथ-साथ प्राणी जगत के प्रति उत्कट अनुराग भरा होता
है। उनके अन्दर गहरा मानवीय मूल्य-बोध होता है, जो संप्रदाय और साधना की
सीमाओं में नहीं अटता। वैचारिक उदारता उनके चरित्र का वैशिष्ट्य है। वे प्रेम को
जीवन के मूल तत्व के रूप में पहचानते हैं, पर ज्ञान के प्रति द्वन्द्वात्मक भाव नहीं रखते।
यह सच है कि “साधक” के लिए ”सूफ़ी” शब्द का प्रयोग ईसा की नवीं शताब्दी से प्रचलित
होने का प्रमाण मिलता है। ये सूफ़िया सूफ़ीमनिश अर्थात किसी भी धर्म या
व्यक्ति से बैर न रखने वाले होते थे।
सूफ़ीवाद सदाचरण का नाम है। यह सदाचरण पहले तो ईश्वर के साथ सदाचरण है, यानी उसके आदेशों का पालन करना। दूसरा संसार के
सभी जीवों के साथ सदाचरण है, अर्थात् अपने देश, समाज के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना और तीसरा ख़ुद के प्रति सदाचरण, यानी बुरी इच्छाओं से मुक्ति। इसके लिए व्यक्ति
में निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए –
1.
सख़ावत – अर्थात् दानशीलता, जिनके आदर्श पैग़म्बर इब्राहीम अलैहिस्सलाम हैं। उन्होंने अपने प्राणों की आहूति से लेकर
पुत्र तक का ईश्वर के मार्ग में बलिदान देने में संकोच न किया।
2.
रिज़ा – अर्थात् सहमति, इसके आदर्श पैग़म्बर इस्माइल अलैहिस्सलाम हैं। उन्होंने ईश-सहमति को पूरा करने के लिए स्वयं बलि होना स्वीकार किया।
3.
सब्र – सब्र अर्थात् धैर्य। इसके आदर्श हैं पैग़म्बर
अय्यूब अलैहिस्सलाम हैं। उन्होंने अपने घर-बार
और परिवार के नष्ट हो जाने के बाद भी, प्रताड़ित होने और शरीर में कीड़े पड़ जाने पर भी धैर्य नहीं खोया।
4.
इशारत – अर्थात् संकेत। इसके आदर्श पैग़म्बर ज़कारिया अलैहिस्सलाम हैं। उन्होंने ईश्वरीय आदेश के अनुपालन स्वरूप अनेक दिनों तक मौन धारण किया
और संकेतों से बातें करते रहे। आदरणीय ज़करिय्या (अलैहिस्सलाम) याक़ूब
(अलैहिस्सलाम) के वंश में थे। उनके पुत्र का नाम आदरणीय यह़्या (अलैहिस्सलाम) था।
5.
ग़ुरबत – अर्थात् उत्प्रवासन या मुसाफ़िरी। इसके आदर्श पैग़म्बर याह्या अलैहिस्सलाम हैं। वे ईश्वर की कृपा-प्राप्ति के लिए अपने ही देश में प्रवासी बन कर रहे।
6.
सौफ़ – अर्थात् ऊनी वस्त्र। इसके आदर्श पैग़म्बर मूसा अलैहिस्सलाम हैं। वे हमेशा ऊनी वस्त्र ही धारण करते थे।
7.
सयाहत – अर्थात् यात्रा। इसके आदर्श पैग़म्बर ईसा अलैहिस्सलाम हैं। वे ईश्वर के मार्ग पर एक प्याला और एक कंघी लेकर चले थे। पर जब एक
व्यक्ति को उन्होंने चुल्लू से पानी पीते देखा, तो प्याला फेंक दिया। फिर जब एक व्यक्ति को अपने
बालों में उंगलियां फिराते देखा, तो कंघी भी फेंक दी।
8.
फ़ुक्र – निर्धनता। इसके आदर्श पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद हैं। उन्हें ईश्वर ने सारे
संसार के कोष का अधिकारी बनाया। लेकिन उन्होंने निर्धनता पर गर्व किया। उन्होंने प्रार्थना
की, “हे पालनहार! मुझे
निर्धनता की स्थिति में रख, निर्धनता की स्थिति में मृत्यु प्रदान कर और निर्धनों की श्रेणी में मेरा
लेखा-जोखा कर।”
सूफ़ी सन्त मन की पवित्रता में विश्वास करते थे।
उनका विश्वास था कि मुक्ति (निजात) प्राप्त करने के लिए
मनुष्य का मन बड़ा पवित्र होना चाहिए, क्योंकि ईश्वर शुद्ध
मन में ही निवास करता है। वे ईश्वर-प्राप्ति के अंह को मिटाना आवश्यक समझते थे, क्योंकि अहं रहते व्यक्ति ईश्वर के दर्शन के योग्य नहीं होता। व्यापक अर्थ में सूफ़ी मुस्लिम विचारकों और
चिंतकों का वह सम्प्रदाय था जो सांसारिक भोग-विलास से दूर रहकर सीधा-सादा, संयमित, धर्मनिष्ठ और पवित्र जीवन व्यतीत करता था। उनके
जीवन का लक्ष्य परोपकार था। उनकी मंजिल समाज और दीन-दुखियों की सेवा, आत्म-त्याग, आत्म-नियंत्रण और तपस्या के जीवन द्वारा अपनी
आत्मा को पवित्र करके उसको ईश्वर में विलय कर देना थी। सूफ़ी संत अपने नैतिक जीवन
और उच्च चरित्र के कारण काफ़ी लोकप्रिय थे। भारत में हिंदू और मुसलमान दोनों ही
सम्प्रदाय के लोग उनका सम्मान करते थे। व्यापक रूप में देखें तो, सूफ़ीमत का आधार बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय है।
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मनोज
कुमार
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