राष्ट्रीय आन्दोलन
477. विभाजन के सवाल पर गांधीजी की उपेक्षा
1947
उधर शिमला और दिल्ली में
भारत को स्वतंत्र करने की योजना में यह
प्रावधान था कि भारतीय संघ को ब्रिटिश सत्ता का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाएगा
और जो घटक उससे अलग होने का आग्रह करेगा उन्हें अलग होनेवाला घटक माना जाएगा। बहुत सी चौंकाने वाली घटनाएं
घट रहीं थीं। 10 मई को शिमला में वायसराय
ने कांग्रेसी, लीगी और सिक्ख नेताओं का एक सम्मेलन बुलाया था। 17 मई को राजधानी दिल्ली में होने वाले सम्मेलन की तिथि बदल दी गई थी, अब ये सम्मेलन
2 जून को होता। लंदन में योजना के मसौदे में कुछ संशोधन कर दिए गए थे। इसपर कांग्रेस
को आपत्ति थी। कांग्रेस का रुख था कि सिर्फ़ वे भाग जो भारतीय संघ के भीतर न रहना चाहें,
वे अलग हो सकते हैं। इसलिए उसने मांग की कि भारतीय संघ को ब्रिटिश सत्ता का स्वाभाविक
उत्तराधिकारी माना जाए और जो घटक उससे अलग होने का आग्रह करें उन्हें अलग होनेवाला
घटक माना जाए। लेकिन संशोधित योजना के अनुसार ब्रिटिश सत्ता के ख़त्म होने के बाद केन्द्रीय
सत्ता बिल्कुल लुप्त हो जाएगी। ब्रिटिश भारत स्वायत्त घटकों का एक जमघट मात्र रह जाएगा।
हर घटक को अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार रहेगा। छह सौ से अधिक देशी राज्य अपने
आप सर्व सत्ताधारी बन जाएंगे। जब 10 मई को यह योजना नेहरू को दिखाई गई, तो उन्होंने कहा, “यह पूर्ण विश्वासघात है।
इसका अर्थ है बालकन प्रदेश की तरह भारत का बंटवारा करना। हम इसे कभी स्वीकार नहीं कर
सकते।” रिफॉर्म्स कमिश्नर वी.पी. मेनन ने योजना का नया मसौदा बनाया। इस मसौदे पर नेहरू
ने अपनी प्रतिक्रिया अनुकूल बताई लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि वे यह नहीं कह सकते
कि कार्यसमिति उसे किस रूप में लेगी। सरदार पटेल उस समय दिल्ली में थे। उनसे बातचीत
की गई। उन्होंने जिम्मेदारी ली, “यह सब मैं देख लूंगा।” वायसराय को यह समझ में
आ गया कि अब से तमाम नाज़ुक वार्ताओं में नेहरू के साथ सरदार को भी रखना चाहिए। संशोधित
मसौदे जो महत्त्वपूर्ण बात थी कि अब कोई प्रांत अपने भविष्य का निर्णय करने के लिए
स्वतंत्र नहीं था। यानी पहले के मसौदे के अनुसार यदि सीमाप्रांत चाहता तो भारत और पाकिस्तान
दोनों से बाहर अपना स्वतंत्र अस्तित्व रख सकता था। अब ऐसी स्वतंत्रता उसे नहीं थी।
इस बीच लंदन में सरकार
ने उस मूल मसौदे को स्वीकार कर लिया था। तार भेजकर इस्मे और एबेल को कहा गया कि वे
वहीं ठहरें, संशोधित प्रस्ताव भेजा जा रहा है। ब्रिटिश पार्लियामेंट ने सलाह-मशविरे
के लिए वायसराय को तुरंत लंदन आने के लिए कहा। 18 मई को उसके लंदन जाने का कार्यक्रम बना। इधर नेहरू ने पत्र लिखकर गांधीजी को मसूरी
में मिलने का निवेदन किया। गांधीजी ने मना कर दिया। हां 25 मई या उसके बाद दिल्ली जाने की बात ज़रूर कही।
गांधीजी फिर दिल्ली में
25 मई को, नेहरू के बुलावे पर गांधी फिर से नई दिल्ली लौट आए। इंजिन में ख़राबी के कारण गाड़ी
देर से दिल्ली पहुंची। नेहरू और पटेल मसूरी से नहीं लौटे थे। माउंटबेटन, अपना मन पक्का करके, लंदन चला गया था। राजाजी गांधीजी से मिलने आए। गांधीजी
ने उनसे कहा, “मेरे सामने जो भारत बन रहा है, उसमें मुझे लगता है मेरा कोई स्थान नहीं है। भारत
ने हिंसा का मार्ग अपना लिया है। चरखे को लगभग भुला दिया है। लोग अब बड़े-बड़े कारख़ानों
की दृष्टि से सोचने लगे हैं। मैंने 125 साल जीने की उम्मीद छोड़ दी है। शायद मैं
एक-दो साल और जी लूँ। यह एक अलग बात है। लेकिन अगर भारत हिंसा की बाढ़ में डूबने
वाला है—जैसा कि अभी लग रहा है—तो मेरी जीने की कोई इच्छा नहीं है।” यह सप्ताह गांधीजी के लिए हृदय-मंथन का समय था। कहीं-न-कहीं उन्हें आंतरिक कष्ट
हो रहा था और वह यातना से भरा हुआ था। उन्होंने एक मिलने आए हुए सज्जन से कहा, ”मेरे चारों ओर आग धधक रही
है। वह मुझे भस्म नहीं कर देती, यह ईश्वर की दया है या केवल ईश्वर की विडम्बना ही?” मिलने आए कुछ समाजवादी
मित्रों से उन्होंने कहा, “हालांकि विभाजन के विचार
मात्र से मुझे घृणा है, फिर भी आपस की सहमति से होने वाले विभाजन की कल्पना मैं कर
सकता हूं। परन्तु अंग्रेज़ के हस्तक्षेप या उसकी छत्रछाया में, दो भाइयों के झगड़े के
कारण, विभाजन होना इतना ख़तरनाक है कि मैं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता।”
दिल्ली की अपनी पिछली
यात्रा के दौरान गांधीजी को अक्सर अपनी सार्वजनिक प्रार्थनाएँ रोकनी पड़ती थीं, क्योंकि कुछ लोग कुरान की आयतों के पाठ पर ज़ोरदार आपत्ति उठाते थे। इस बार भी एक महिला ने शाम की प्रार्थना सभा में क़ुरान की आयतें
पढ़ने पर आपत्ति उठाई, तो गांधीजी ने कहा, “आप सब काली झंडियां ही
नहीं बल्कि लाठियां लेकर भी आएं, तो भी मैं प्रार्थना सभा करूंगा और आपके प्रहार को
बर्दाश्त करते हुए भी अंत तक ईश्वर का नाम लेता रहूंगा और आपके विरुद्ध मन में कोई
दुर्भावना नहीं रखूंगा।”
माउंटबेटन का लंदन दौरा
ब्रिटिश पार्लियामेंट ने
सलाह-मशविरे के लिए वायसराय को लंदन आने के लिए कहा। 18 मई को माउंटबेटन चला गया और 28 मई को अपनी अन्तिम योजना के साथ
दिल्ली लौट आया।
माउंटबेटन योजना में न
केवल भारत, बल्कि बंगाल, पंजाब और असम के
विभाजन का भी प्रावधान था—बशर्ते वहाँ के लोग ऐसा चाहें। बंगाल और पंजाब के मामले
में, हाल ही में चुनी गई प्रांतीय विधानसभाएँ इस पर निर्णय
लेतीं। यदि बंगाल अपने विभाजन के पक्ष में मतदान करता, तो असम के मुस्लिम-बहुल ज़िले सिलहट के लोग एक जनमत-संग्रह के माध्यम से यह तय
करते कि उन्हें बंगाल के मुस्लिम हिस्से में शामिल होना है या नहीं। और न ही इस
योजना में ऐसा कुछ था, जो एक संयुक्त भारत के लिए समुदायों के बीच बातचीत को
रोके। यह योजना स्वैच्छिक थी और इसमें ब्रिटेन की ओर से कोई कानूनी बाध्यता नहीं
थी। बंगाल और पंजाब एक साथ रहने के लिए मतदान कर सकते थे; ऐसी स्थिति में, न तो कोई विभाजन होता और न ही कोई पाकिस्तान बनता।
लेकिन, यदि पाकिस्तान अस्तित्व में आ भी जाता, तो भी वह और शेष भारत बाद में फिर से एक हो सकते थे।
कांग्रेस ने यह रुख
अपनाया कि उसने लीग द्वारा भारत के विभाजन के लिए दावा किए गए अधिकार को कभी
स्वीकार नहीं किया था। ज़बरदस्ती न करने के सिद्धांत का सख्ती से पालन करते हुए, उसने केवल उन हिस्सों को अलग होने की आज़ादी दी थी जो भारतीय संघ में नहीं
रहना चाहते थे, क्योंकि वह शुरू से ही किसी भी अनिच्छुक हिस्से को
ज़बरदस्ती संघ में रखने के खिलाफ थी। इसलिए, उसने मांग की कि
भारतीय संघ को ब्रिटिश सत्ता का स्वाभाविक उत्तराधिकारी और वारिस माना जाए, और जो इकाइयाँ अलग होने पर ज़ोर दें, उन्हें अलग होने वाली
इकाइयाँ माना जाए। लेकिन संशोधित योजना में, भारतीय संघ और संविधान
सभा के निरंतर अस्तित्व वाली इस अवधारणा को बनाए रखा गया नहीं लगता था। ब्रिटिश
सत्ता के समाप्त होने पर केंद्रीय सत्ता पूरी तरह से खत्म हो जाएगी; ब्रिटिश भारत स्वायत्त इकाइयों—"उत्तराधिकारी सरकारों"—के एक समूह
में बदल जाएगा, जिसमें हर इकाई को आम तौर पर अपना भविष्य तय करने का
अधिकार होगा। सर्वोच्च सत्ता (Paramountcy) के हस्तांतरण न होने
के संदर्भ में, लगभग छह सौ भारतीय रियासतें अपने आप संप्रभु बन
जाएँगी, और हर रियासत को शांति या युद्ध करने, या किसी भी बाहरी शक्ति के साथ स्वतंत्र संधियाँ करने की आज़ादी होगी। दूसरे
शब्दों में, अब तक जो भारत था, उसका पूरी तरह से
विघटन हो जाएगा।
इंग्लैंड छोड़ने से
पहले, माउंटबेटन चर्चिल से मिला, जिसने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इस योजना का समर्थन करने का वादा किया। 2 जून, 1947 को, योजना की घोषणा की
पूर्व संध्या पर, हर्बर्ट एल. मैथ्यूज
ने 'न्यूयॉर्क टाइम्स' को तार भेजते हुए कहा, "मिस्टर गांधी एक बहुत
बड़ी चिंता का विषय हैं, क्योंकि यदि वे 'आमरण अनशन' पर बैठने का निर्णय
लेते हैं, तो इससे पूरी योजना ही
चौपट हो सकती है।" अगले दिन, प्रधानमंत्री एटली ने
हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इस योजना की घोषणा की और माउंटबेटन ने नई दिल्ली रेडियो पर
इसका खुलासा किया। अपने प्रसारण में, अंतिम वायसराय ने
साफ़-साफ़ कहा, 'बेशक, मैं प्रांतों के
बँटवारे के उतना ही ख़िलाफ़ हूँ, जितना कि मैं ख़ुद
भारत के बँटवारे के ख़िलाफ़ हूँ।' वह जानता था कि यह
योजना अधूरी थी, खासकर पंजाब के पाँच मिलियन लड़ाकू सिखों पर पड़ने
वाले इसके असर की वजह से। उस प्रांत से गुज़रने वाली कोई भी संभावित रेखा कुछ
सिखों को उनकी इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान में छोड़ देती।
जिन्ना की चाल
जिन्ना अपनी बात पर अडा
हुआ था कि मुसलमान एक संप्रभु राष्ट्र से कम किसी भी चीज़ पर राज़ी नहीं होंगे। माउंटबेटन खुद को जिन्ना को उसके इस रुख से डिगाने में असमर्थ पा रहा था: 'ऐसा लगता था कि वह सुन ही नहीं रहा है। उससे बहस करना नामुमकिन था... चाहे कुछ
भी कहा जाए, वह तो बस अपने पाकिस्तान पर ही अड़ा हुआ था।' जिन्ना ने एक और मांग पेश कर दी। उसे हज़ार मील का एक कॉरिडोर चाहिए था जो पश्चिम
बंगाल को पूर्व पाकिस्तान से जोड़ता। सरदार पटेल ने कहा, यह अनर्गल प्रलाप है, इसे गंभीरता
से नहीं लिया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि
इस मांग से, इसे उठाने वाले का पाकिस्तान योजना में विश्वास की
कमी ज़ाहिर होती है।
गांधीजी की उपेक्षा
नेहरू, पटेल और कार्यसमिति ने इस योजना को मंज़ूरी दे दी थी; उनकी यह मंज़ूरी तब औपचारिक हो गई, जब 15 जून को नई
दिल्ली में बैठी अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस योजना के पक्ष में 153 और विरोध
में 29 वोट दिए, जबकि कुछ सदस्यों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
गांधीजी को आभास तो था
कि उनकी पीठ पीछे कुछ हुआ है, क्योंकि अब सरदार, जवाहर और मौलाना तीनों का व्यवहार कुछ बदल गया है। कोई उनसे खुलकर कुछ नहीं बताता।
साम्राज्यवाद की किलाबंदी पूरी हो चुकी थी और यहां गांधीजी की ज़रूरत किसी को नहीं थी।
जिन्ना की मांगों का कोई अंत नहीं था। इसलिए विभाजन के विरुद्ध कांग्रेस का रुख़ सख़्त
होता जा रहा था। इसलिए गांधीजी को पाकिस्तान बनने के पहले शांति-स्थापना की मांग को
साथियों और सरकार को समझाने का मौक़ा मिला और उन्होंने एक अंतिम प्रयास शुरू कर दिया।
उन्होंने जिन्ना से निवेदन
किया, पहले शांति-स्थापित हो जाए फिर पाकिस्तान बने। वायसराय को समझाया, यह ब्रिटिश
तंत्र की तौहीन है कि वह ऐसी अराजकता में देश को डाल दे। इस पागलपन के दिनों में देश
पर पाकिस्तान लादना हद दर्ज़े का गुनाह है। जिन्ना ने तो गांधीजी की किसी सलाह को सुनने
से ही इंकार कर दिया। वायसराय ने अपनी असहायता ज़ाहिर कर दी। कांग्रेस हाइकमान फिर से
आन्दोलन का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं था। दोनों पक्ष मात्र विभाजन पर ही एक मत हो
पा रहे थे। गांधीजी की अपील का जिन्ना पर कोई असर नहीं हो रहा था। माउन्टबेटन को यह
शिकायत थी कि वह बहुत देर से भारत पहुंचा, जब कि विभाजन के सिवा और किसी आधार पर कोई
हल दोनों पक्षों को स्वीकार नहीं हो सकता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कोई साहस करने को
तैयार नहीं थे। अब गांधीजी के सामने
विभाजन को रोकने का कोई विकल्प नहीं था।
29 मई को सुबह सैर के समय किसी ने गांधीजी से कहा, “जो निर्णय आज लिए जा रहे
हैं, इस निर्णय में आपके उसूल का क्या हुआ?” गांधीजी ने कहा, “आज मेरी सुनता कौन है?” उस पर उसने कहा, “नेता आपके साथ भले न हों,
जनता तो आपके साथ है।” उत्तर में गांधीजी ने
कहा, “जनता भी मेरे साथ नहीं है। पंजाब में लोग मुझे हिमालय जाकर संन्यास लेने की बात
कह रहे हैं। सब लोग मेरी तस्वीर पर माला अर्पण करने को तत्पर हैं।” उसने फिर कहा, “आज न चलें, परन्तु बहुत
जल्दी ही उन्हें चलना पड़ेगा।” गांधीजी ने जवाब दिया,
“उससे क्या फ़ायदा? स्वाधीनता के द्वार पर पहुंच कर हममें उतनी ही फूट पैदा हो गई
है, जितनी स्वतंत्रता की लड़ाई के समय हममें एकता थी। सत्ता की आशा ने हमारा नैतिक पतन
कर दिया है।”
हताश गांधीजी ने बादशाह
ख़ान से कहा, “शायद मेरा जीवन-कार्य समाप्त हो चुका है। भगवान अब और अपकर्ष और मानहानि से बचा
ले तो कृपा हो जाए। लाखों लोगों के स्थानांतरण से अराजकता फैलेगी। शांति-स्थापना के
पहले विभाजन देश को खत्म कर देगा। इन सब विपत्तियों को देखने के लिए शायद मैं तो जीवित
नहीं होऊंगा, लेकिन कोई यह दोष न दे कि मैंने विभाजन का समर्थन किया था। आज लोग आज़ादी
के लिए अधीर हैं, कोई उपाय नहीं है।”
कांग्रेस और मुस्लिम लीग
के बीच बंटवारे की सहमति बन चुकी थी, जिसपर कांग्रेस की ओर से मौलाना, लीग की ओर से जिन्ना और अंग्रेजों की ओर से माउंटबेटन ने साइन किया था। इसके बावजूद
गांधी विभाजन को रोकने की कोशिश में हार नहीं मानते। गांधी माउंटबेटन से मुलाकात कर
कहते हैं कि आप लोगों ने जो भी तय किया है वह ठीक है, लेकिन मेरा सिर्फ इतना निवेदन है कि आप इस काम में जल्दबाजी न करें। माउंटबेटन
गांधी को जवाब देते हैं कि मैं किसी जल्दबाजी में नहीं हूं, मुझे एक कैलेंडर दिया गया है, जिसके भीतर मुझे काम करना
है। इसके बाद गांधीजी जिन्ना से मिलते हैं और कहते हैं कि तुम किस बात के लिए परेशान
हो रहे हो, तुम पाकिस्तान चाहते हो, वह तुम्हें मिल जाएगा। लेकिन पहले इन अंग्रेजों को बाहर जाने दो। इन्हें बीच में
मत डालो। जिन्ना का जवाब होता है कि अंग्रेज हैं तभी तो मेरे पाकिस्तान की गारंटी है।
वे चले गए तो पता नहीं आप लोग क्या करेंगे।
फिर गांधीजी पटेल और नेहरू
से मिलते हैं और उनसे कहते हैं कि विभाजन रोकने का एक अच्छा विचार मेरे पास है कि आप
लोग जाकर माउंटबेटन से कहें कि आप भारत की आजादी का ऐलान कीजिए और देश की बागडोर जिन्ना
को दे दीजिए। आप दोनों जिन्ना से कहें कि आप पीएम बन जाइए, हम आपका समर्थन करेंगे। इस पर सरदार गांधीजी से कहते हैं - बापू आप कह रहे हैं
तो हम आपकी बात नहीं काटेंगे। लेकिन यह बात देश को आपको बतानी होगी। उसके बाद देश में
जो विद्रोह होगा, उसका मुकाबला हम नहीं कर
पाएंगे। यह काम आपको खुद करना होगा।
अंत में गांधीजी अपने उन
समाजवादी शिष्यों राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की ओर देखते हैं, जो कांग्रेसी विचारधारा के विरोधी होने के बावजूद आजादी की इस लड़ाई के चलते उनके
करीब आए थे। गांधीजी उनसे कहते हैं कि अगर आप लोग मेरा साथ दें तो मैं जान की बाजी
लगा सकता हूं, लेकिन वहां से भी उन्हें
कोई सहयोग नहीं मिलता। अब गांधीजी के सामने विभाजन को रोकने का कोई विकल्प नहीं था।
भारत और पाकिस्तान के
दो उत्तराधिकारी राज्यों में ब्रिटिश सत्ता का बंटवारा करने की अंतिम घोषणा किए
जाने के दो दिन पहले 28 मई को गांधीजी समय से पहले जग गए। वे बिस्तर पर ही लेटे रहे
और स्पष्ट शब्दों में बुदबुदा रहे थे, “आज मैं ख़ुद को पूरी तरह
अकेला पाता हूं। यहां तक कि सरदार और जवाहरलाल भी सोचते हैं कि मेरा निदान ग़लत है और
अगर विभाजन पर रज़ामंदी हो गई तो शांति निश्चित ही बहाल होगी। उन्हें मेरा वायसराय से
यह कहना अच्छा नहीं लगा कि अगर विभाजन होना ही है तो ब्रिटिश हस्तक्षेप से या ब्रिटिश
शासन के तहत न हो। उन्हें हैरानी है कि कहीं मैं उम्र के साथ सनक तो नहीं गया हूं।
... फिर भी अगर मुझे कांग्रेस और ब्रिटिश जनता का सच्चा और वफादार दोस्त साबित
होना है, जिसका मैं दावा करता हूँ, तो मैं जो कुछ महसूस करता हूँ वह मुझे कहना ही होगा। मैं साफ देख रहा हूं कि हम
यह काम गलत ढंग से कर रहे हैं। हो सकता है हम इसके प्रभाव को फौरन महसूस न करें,
लेकिन मैं साफ देख रहा हूं कि इस क़ीमत पर मिली आज़ादी का भविष्य अंधकारमय होगा। ..”
कुछ समय बाद वह आगे बोले, “पर हो सकता है वे सब
सही हों और एक मैं ही अकेला अँधेरे में ठोकरें खा रहा हूँ। मैं इसे देखने के
लिए शायद ज़िंदा न रहूँ, मगर जिस बुराई की
मुझे चिंता है, अगर वही भारत को ग्रस
ले और उसकी आज़ादी खतरे में पद जाए तो आने वाली पीढियां जानें तो सही कि इसके बारे
में सोचते हुए इस बूढ़े ने क्या-क्या तकलीफें झेलीं हैं। यह न कहा जाए कि गांधी
भारत के टुकडे होने में शरीक था। लेकिन हर कोई भारत की आज़ादी के बारे में बेचैन है।
इसलिए कहीं कोई उम्मीद नहीं है।”
अगला दिन सोमवार था। माउंटबेटन बेचैनी से इधर उधर टहल रहा था। वह गांधीजी का इंतज़ार कर रहा था।
उसे यह आशंका सता रही थी की अबूझ गांधीजी कौन सी चाल चलेंगे। गांधीजी ने देश के
विभाजन के प्रति अपने विरोध को किसी से छुपाकर नहीं रखा था। महत्वपूर्ण यह था की माउन्टबेटन
की योजना को असफल बनाने के लिए वह किस हद तक जाएंगे। मीटिंग स्थल पर पहुँचने के
बाद उन्होंने पुराने लिफ़ाफ़े के पीछे लिखा, ‘आज मेरा साप्ताहिक मौन व्रत का दिन है।’ वायसराय अपनी राहत की भावना को छुपा
नहीं सका। गांधीजी ने कागज़ के टुकडे पर लिखा, ‘क्या मैंने कभी अपने भाषणों में
आपके खिलाफ एक शब्द भी कहा है?’ माउंटबेटन न नहीं कह
सका। जब वह मुलाक़ात समाप्त हुई तो माउंटबेटन ने कागज़ के विभिन्न टुकडों को उठा
लिया और बोला, ‘यह मेरे लिए सबसे
अधिक ऐतिहासिक महत्व वाली चीज़ हैं। गांधीजी की इस निराली कार्य पद्धति के पीछे
राजनीतिक संन्यास का, आत्म निषेध का और आत्म-नियंत्रण का एक महान कृत्य छिपा हुआ
है।’
गांधीजी ने कहा था, “मैं विभाजन के बाद खून की नदियाँ बहते साफ़ देख रहा हूँ।” यह सुनकर एक मुलाकाती
ने उनसे पूछा था, “फिर आपने लड़ाई क्यों
नहीं की, जैसी आपने इससे छोटी अनेक बुराइयों के खिलाफ लड़ी थीं?” दुखी और दबे हुए आवेश
से कांपती आवाज़ में गांधीजी ने जवाब दिया था, “काश की मेरे पास समय होता, तो क्या मैं ऐसा नहीं
करता? लेकिन मैं मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व को तब तक चुनौती नहीं दे सकता और उसमें
जनता की आस्था को तब तक समाप्त नहीं कर सकता जब तक की मैं यह कहने की स्थिति में न
होऊं कि यह है एक वैकल्पिक नेतृत्व! ऐसा कोई विकल्प तैयार करने का समय मेरे पास
नहीं है। इन हालात में मौजूदा नेतृत्व को कमजोर करना गलत होगा, और इसलिए मुझे यह
कड़वा घूँट पीना ही होगा।”
कांग्रेस के सामने हालत यह हो गई थी कि या तो विभाजन स्वीकार करें या देश को अराजकता के भँवर में फाँस जाने दें। कांग्रेसी नेताओं ने देश के तीन-चौथाई भाग को अंधाघुंधी की गिरफ्त से बचाने के लिए विभाजन को आज़ादी से पहले ही मंजूर कर लेना ठीक समझा।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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