सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
5. सूफ़ीमत का उदय-1
“वह ईश्वर ऐसा है
कि जिसके अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। वह सम्राट अत्यंत
पवित्र, सर्व गुण-संपन्न, दोष-रहित, क्षमादानी, पर्यवेक्षक,
प्रतिष्ठित, विराट स्वामी, सर्वथा
शान्ति प्रदान करने वाला, रक्षक, प्रभावशाली, शक्तिशाली बल पूर्वक आदेश लागू करने
वाला, बड़ाई
वाला है।। वह उन सभी बातों से पवित्र और पावन
है जिसे धर्मभ्रष्ट किया करते हैं।” (क़ुरआन : 59/23)
5.1 विद्वानों में मतभेद
निकोलसन के अनुसार आधुनिक शोध ने यह साबित कर दिया है
कि सूफ़ीवाद की उत्पत्ति का पता एक निश्चित कारण से नहीं लगाया जा सकता है। हां यह
तय है कि सूफ़ीमत का उद्भव तत्कालीन धार्मिक और राजनीतिक वातावरण की प्रतिक्रिया के
फलस्वरूप हुआ, लेकिन सूफ़ीमत के आविर्भाव के संबंध में विद्वानों में बहुत
मतभेद है। डॉ. यूसुफ हुसैन के अनुसार सूफ़ीवाद की उत्पत्ति इस्लाम धर्म से हुई है। मूल रूप से, सूफ़ीवाद इस्लाम में निहित है, जो इसका स्रोत और मूल है। सूफ़ीवाद का मूल स्रोत क़ुरआन और मुहम्मद साहब सल्ल. का
जीवन है। क़ुरआन की मक्की सुरा में भक्ति भावना हैं और उनमें से एक में अल्लाह के
नाम के लिए ‘अल वदूद’ शब्द आया है जिसका अर्थ है मुहब्बत करने वाला, जो प्यार के रिश्ते का सुझाव देते हैं। सूफ़ियों
की कई आध्यात्मिक शब्दावली क़ुरआन से ली गई है, जैसे भगवान की पवित्रता के लिए आग
जैसे भावों में, 'पक्षी' के रूप में मानव आत्मा के पुनरुत्थान या अमरता
का प्रतीक, मनुष्य के भाग्य और व्यवसाय
का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक के रूप में 'पेड़', या अभिवादन, शराब और प्याले की आकर्षक
कल्पना जिसका सूफ़ी आदेशों में दीक्षा के लिए उपयोग किया जाता है।
क़ुरआन से सूफ़ीवाद में कई सूफ़ी
क्रियाएं और सूफ़ी अवधारणाएं ली गयी हैं, जैसे मानव क्रिया की दैवीय प्रेरणा, दैवीय
न्याय (अदल) की अवधारणा, संतोष (रिदा), अहवाल (रूहानी अनुभूति, अध्यात्म की मनःस्थितियां), अहदियत (ईश्वरीय एकता), तौबा (प्रायश्चित, अनुताप, अपने पाप पर लज्जित होना फिर
उसे न करने का संकल्प लेना), अक़ल (बुद्धि) और क़ल्ब (दिमाग, हृदय) के बीच अंतर के बारे में, आरिफ़ (ज्ञानी) और मोमिन (ईमानवाला, आस्तिक) का अंतर आदि। सूफ़ी अभ्यास धिकर (दरवेशों की एक सभा जिसमें परमानंद की स्थिति उत्पन्न करने
के लिए भगवान के नाम वाले एक वाक्यांश का लयबद्ध रूप से उच्चारण किया जाता है),
किरा (क़ुरआन का शुद्ध उच्चारण) से व्युत्पन्न है।
भारतीय सूफ़ी परंपरा ने गुप्त जप (ज़िक्र-ए-खफ़ी) को पैगंबर के साथियों के अभ्यास के रूप में माना। बुलंद आवाज़ में नाम लेना ‘ज़िक्र ए जाली या जहरी’ कहलाता है।
इस्लाम की मान्यता है कि ईश्वर ही एकमात्र शासक है और उसका कोई भागीदार नहीं
है। समस्त ब्रह्मांड पर उसी का राज है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ उसके रसूल हैं, जो उसके
आदेशों को क्रियान्वित करते हैं। यहां तक तो सब ठीक है, किंतु इस्लाम धर्म के बीच
एक “विशिष्ट विद्या” या धारा के रूप में प्रचलित सूफ़ीमत के उदय को लेकर विद्वानों में
मतभेद है। आइये इन मतों को देखें:
डॉ. युसुफ़ हुसैन के अनुसार सूफ़ीमत का उदय इस्लाम के मध्य ही हुआ, और इस पर विदेशी धारणाओं और
प्रथाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव यह मत स्वीकार न
करते हुए कहते हैं कि सूफ़ीमत पर हिंदू सोच, मान्यताओं और प्रथाओं का गहरा असर है।
उनका यह भी मानना है कि सूफ़ीमत में मौज़ूद आत्मा और परमात्मा के संबंध, ईश्वर के
प्रति प्रेम, अहिंसा, शांति-प्रियता, उपवास, त्याग, आदि प्रथाएं हिंदू, बौद्ध और
जैन धर्म से मिलती-जुलती हैं। निकोल्सन के अनुसार सूफ़ीमत के आविर्भाव में यूनानी प्रभाव का प्रमुख स्थान है। हालाकि प्रो. के.ए. निज़ामी मानते हैं कि
सूफ़ियों के चिश्ती संप्रदाय ने भारत में इसके विकास के प्रारंभिक दौर में हिन्दुओं
की कई प्रथाओं को अपनाया था, जैसे शेख़ के सामने झुकना, आगन्तुकों को पानी देना,
सिर मुंड़वाना आदि, लेकिन सूफ़ीमत के आविर्भाव पर
अन्य धर्मों के प्रभावों को अस्वीकार करते हुए उनका स्पष्ट मानना है कि सूफ़ीमत का मूल स्रोत क़ुरआन तथा पैगम्बर की जीवनी है। एडलबर्ट मार्क्स के अनुसार सूफ़ीमत का आविर्भाव यूनानी दर्शन से हुआ है। ब्राउन के अनुसार इस प्रभाव के कारण इस्लाम के संन्यासी जीवन में रहस्यवादी प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ। ब्राउन ने सूफ़ीमत पर बौद्ध तथा जैन धर्म के प्रभाव को भी स्वीकार किया है। सूफ़ीमत संबंधी शांति तथा अहिंसा पूर्णरूप से जैन तथा बौद्ध धर्म से संबंधित है। अनेक बौद्ध भिक्षु धर्म के प्रचार के लिये
पश्चिम एशिया के देशों में गये अत: सूफ़ी साधकों के ऊपर प्रभाव पड़ना स्वभाविक था।
सूफ़ीमत पर ईसाई धर्म का भी प्रभाव पड़ा। ईसाई विचारधारा से प्रभावित होकर सूफ़ी साधक को व्यक्तिगत स्वार्थ में कोई रुचि नहीं थी। उनके हृदय में मानव सेवा का
भाव ईसाई धर्म के प्रभाव की ही देन है। ईश्वर पर पूर्ण रूप से आश्रित, भौतिक पदार्थों के
प्रति अरुचि भी ईसाई धर्म के प्रभाव के कारण ही है। अबू अब्दुल्ला अल मुहासिबी नामक सूफ़ी सन्त ने अपने संदेश में बाइबिल के कुछ विषयों का उल्लेख किया है। सूफ़ियों की यौगिक क्रियाओं में हिन्दू संन्यासियों के क्रियाकलापों
को ढूँढा जा सकता है।
राईट्स का मत है कि सूफ़ियों में भावाविष्टावस्था को
उत्पन्न करने वाली कुछ क्रियाएं तथा प्राणायाम जैसी विधियाँ हिन्दू धर्म की ही देन
हैं। अधिकांश विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि सूफ़ी मत के विकास में भारतीय
विचारधारा का प्रभाव पड़ा है। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "सूफ़ी
साधकों का चिल्ला-ए-माकुस अर्थात् शरीर को यातना देना, खानक़ाह के प्रधान के समक्ष नतमस्तक होना, नवागन्तुकों को जल देना, सिर मुंडाना, संकीर्तन
का आयोजन आदि बातें पूर्ण रूप से हिन्दू प्रमाणों को स्पष्ट करती हैं।" डॉ.
चौबे तथा श्रीवास्तव के कथनानुसार, "इस प्रकार सूफ़ी
धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों की श्रेणी में ही नहीं है, बल्कि अनेक धर्मों के प्रभावों की उपज है।"
डॉ. ताराचन्द के अनुसार सूफ़ीमत एक ऐसा स्रोत है जिसमें अनेक देश की
नदियों का समावेश है। क़ुरआन तथा पैगम्बर मुहम्मद का जीवन इसके मुख्य स्रोत हैं।
ईसाई धर्म तथा नव अफलातून दर्शन के प्रभाव से इसका विकास हुआ। हिन्दू तथा बौद्ध
सिद्धान्तों तथा नास्तिकों ने इसे अधिक प्रभावित किया। अतः हम निःसन्देह कह सकते
हैं कि सूफ़ी मत के आविर्भाव में इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन, नास्तिक मत, वेदान्त
तथा हिन्दू आदि धर्मों का योगदान है। परन्तु यह प्रभाव नकल के रूप में नहीं रहा।
बल्कि सूफ़ी साधकों एवं चिन्तकों ने उन बाहरी विचारधाराओं को अपने ढंग से अपनाया
तथा सूफ़ीमत का विकास इस्लाम धर्म के अनुसार ही हुआ है।
इन विचारधाराओं को ध्यान में रखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि
आध्यात्मिक इस्लामी पुनरुत्थान आन्दोलन के रूप में प्रचलित सूफ़ीमत का बीजारोपण
मुसलिम मानस में हुआ और वह वाह्य आडंबरों के विरुद्ध एक प्रचंड टंकार थी। जाफ़र
रज़ा ने ठीक ही कहा है कि ‘इस्लाम ने टुकड़ों में बंटी अरब-राष्ट्रीयता को मिटाकर व्यापक आध्यात्मिकता का
विकास किया था।’ आरंभ में सूफ़ियों का कोई
सम्प्रदाय नहीं था। इस्लाम के शुरू के दिनों (609-661 ई.) में ईश्वर से निकटता की वृत्ति मुसलमानों
में जग चुकी थी। अरब में रहने वाले धर्मनिष्ठ और पवित्र व्यक्तियों के इस वर्ग ने
स्वेच्छा से सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग किया और सादी वेशभूषा एवं सदाचार से
अपनी अलग पहचान स्थापित की। हालाकि इसका नाम उस युग में सूफ़ीवाद तो नहीं ही था, फिर-भी प्रसिद्ध सूफ़ी संत ख़्वाजा सय्यद अलहजवेरी ‘रहमतुल्लाह अलैह’ का मानना था कि उस युग में भले ही उसका कोई नाम नहीं था, लेकिन तथ्य के रूप में सूफ़ीवाद अस्तित्व में आ
चुका था। हज़रत जामी का कहना है कि सूफ़ी शब्द का सबसे पहला प्रयोग सन् 800 से पहले हज़रत अबू हाहशम के लिए हुआ था।
5.2 तत्कालीन अरब समाज और इस्लाम का जन्म
सूफ़ीमत के उदय और
विकास को जानने-समझने के लिए उस समय के अरब देशों के राजनीतिक, सामाजिक और
धार्मिक व्यवस्था को समझना बहुत ज़रूरी है। अरब प्रायद्वीप एशिया एवं अफ्रीका की संधि पर है। यह
मुख्यतः रेगिस्तान है। प्रायद्वीप के तट, पश्चिम छोर पर लाल सागर एवं अकाबा की खाडी़, दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर (हिंद
महासागर का भाग), उत्तर-पश्चिम में ओमान की खाडी़ एवं
हॉर्मज़ जलडमरुमध्य तथा फारस की खाडी़ हैं। अरबी
प्रायद्वीप में सबसे पहली मानवीय संस्कृति 2500 ईसा पूर्व के आसपास की उम्म अन-नार
संस्कृति थी जो उत्तरी संयुक्त अरब अमीरात और ओमान के इलाक़े में लगभग
500 सालों तक चली। इसके बाद यहाँ कई राज्य उभरे। अरब प्रायद्वीप
काफी हद तक शुष्क और ज्वालामुखीय था।
इस्लाम का जन्म अरब
में हुआ, और भी सटीक कहा जाए तो मक्का में। ‘अल-रब अल ख़ाली’ नाम से
प्रसिद्ध अरब के विशाल रेगिस्तान में मक्का एक मुख्य शहर था। अरब में दो भिन्न
संस्कृति के लोग पाए जाते हैं। इस भिन्नता का मुख्य कारण भौगोलिक है। उत्तर और
दक्षिण अरब के बीच एक विशाल मरुभूमि है। उत्तरी अरब का यह रेगिस्तान बेहद निर्मम
था यहां की ज़िन्दगी कठोरताओं से भरी थी। इलाक़ा एक तरफ से समुद्र से घिरा था। इस
रेगिस्तान में बद्दू नाम का एक घुमक्कड़ (खानाबदोश) क़बीला रहता था। यह क्षेत्र कृषि
उत्पादन से पूरी तरह अज्ञात था। यहाँ कोई स्थाई चरागाहें भी नहीं थीं, बारिश भी बहुत कम
होती थी। पारंपरिक रूप से ऊंट, भेड़ और बकरियां पालना इनका मुख्य पेशा था। अपने
ऊंटों के लिए वे नए-नए चारागाह की खोज में घूमते रहते थे। कठिन से कठिन
परिस्थितियों से जूझना और घोर कष्टों को सहना उनकी आदतों में शुमार था। घोर
अनुशासन और सत्ता के प्रति आदर रखना उनका गुण था। वे बेहद सादी ज़िन्दगी बिताते थे, एक कमरबंद वाला
लंबा वस्त्र पहनते थे जिसे सौब कहा जाता था। वदन के ऊपरी भाग में वे एक
ढीला-ढाला वस्त्र अबा पहनते थे। सर एक शाल कूफ़िया से ढंका रहता था
जो एक डोरी इक़ल से बंधी रहती थी। उनका भोजन भी सादा होता था, जिसमें खजूर
और आटे की बनी कोई चीज़ या भुनी मकई की बाली शामिल होती थी। इसे वे पानी, ऊँट या बकरी के
दूध के साथ खा लिया करते थे। वे अपनी बकरियों और ऊंटों के साथ किसी नए चारागाह की
तलाश में या दुश्मनों से रक्षा के लिए लगातार चलते रहा करते थे। वे दुश्मन क़बीले
के ऊपर छापे (गज्बा) भी मारा करते थे।
क़बीले की संरचना
उसके गण्यमान्य व्यक्तियों द्वारा संचालित एक लोकतंत्रात्मक संस्था थी जो कुलीन
वंश के उत्तम चरित्र वाले लोग होते थे। क़बीले की रक्षा करना उनका प्रमुख धर्म होता
था। बद्दुओं का कोई मज़हब नहीं था। वे किसी देवी-देवता की पूजा-प्रार्थना नहीं करते
थे। वे क़िस्मत को मानते थे और क़बीलाई सामूहिकता का पालन करते थे। एक क़बीलाई
समाज में व्यक्तिवाद का कोई मूल्य नहीं होता और सामूहिकता का राज होता है। अभी तक
इन समाजों में व्यक्तिगत संपत्ति का जन्म नहीं हुआ था। उनकी अपनी नैतिकता और मूल्य
थे। उनका मज़हब मानववाद था। वे जीवन का अर्थ मनुष्य के उत्कृष्ट गुणों को व्यक्त
करना मानते थे। बद्दुओं की दरियादिली भी काफी मशहूर थी। असग़र अली इंजीनियर अपनी पुस्तक इस्लाम
का जन्म और विकास में लिखते हैं, “औद्योगिक समाज की तरह घुमक्कड़ समाज भी अपनी ख़ुद की संस्थाओं, आदतों और संस्कृति का विकास करता है। बद्दू सख़्त लोग होते हैं, जूझने और सहने की क्षमता उन का प्रमुख गुण है, जब कि अनुशासन तथा सत्ता के प्रति आदर-भाव का अभाव उनका प्रमुख दुर्गुण है।”
अरबों की एक भारी संख्या व्यापार और अपने देवी-देवताओं
की पूजा के लिए भी मक्का आती रहती थी। और इस तरह मक्का में धीरे – धीरे व्यक्तीकरण
की प्रक्रिया शुरू होने लगी थी। क़बीलाई एकजुटता का महत्व कम हो रहा था। समय के
साथ-साथ उनकी दरियादिली का रिवाज़ मक्का में कमज़ोर पड़ने लगा। बद्दुओं के बीच कबीलाई समाज का घुमक्कड़ी रस्मो-रिवाज़
व्याप्त था, जबकि मक्का में व्यापारिक समाज का रस्मो-रिवाज़। बद्दू अपनी जीवन शैली को बेहद मामूली ज़रूरतों तक
केन्द्रीत रखते थे जबकि मक्का जैसे शहरों के रहने वालों का सरोकार उनके हालात और
रस्मो-रिवाज़ की सहूलतों और खुशियों से था।
उस समय दक्षिणी अरब प्राचीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण
केन्द्र था। दक्षिणी अरब के निवासी धनी
और समृद्धिशाली थे। वे कुशल व्यापारी और
धर्म में आस्था रखने वाले थे। मक्का
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था और मूर्तिपूजक अरबों का एक धार्मिक केंद्र
भी। अरबों की एक भारी
संख्या व्यापार और अपने देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी मक्का आती रहती थी। वे सोना, मसाले और बहुमूल्य पत्थरों का व्यवसाय करते थे। इस्लाम के आविर्भाव के पहले दक्षिणी अरब या तो
अवीसिनिया या फारस (ईरान) के बादशाहों के अधीन रहा। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. नगरवासी थे। रेगिस्तान की आज़ाद ज़िन्दगी के आदी ये बद्दू पैग़म्बर के
द्वारा दिए गए अनुशासन को मानने को राज़ी नहीं हुए थे। दक्षिणी अरब की सभ्यता कृषि पर आधारित थी और सामंतवाद
का नामो-निशान नहीं था। मदीना एक बड़ा समृद्ध
कृषि व्यवसाय से जुडा शहर था जबकि मक्का कई आसपास के
जनजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय केंद्र था। उत्तर के अरबियों को रेगिस्तानी
स्थितियों में अस्तित्व के लिए सदैव संघर्षरत रहना पड़ता था। कठोर पर्यावरण और कष्ट पूर्ण जीवनशैली इन जनजातियों को
जुझारू बनाए रखता था। सामाजिक एकजुटता का एक महत्वपूर्ण स्रोत था जनजातीय संबंध। वे
लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर यात्रा करते थे और अपने क़बीले के लिए पानी और
चरागाह मांगते थे। बाद में उन्होंने व्यापार और कृषि पर भी ध्यान केंद्रित किया।
नए संपत्ति-सम्बन्धों के विकास के साथ वंश,
छोटी पारिवारिक इकाइयों में टूट रहे थे
अर्थात अब किसी की सम्पति में उन के बच्चों को छोड़ घनिष्ठ सम्बन्धियों का कोई भाग
नहीं होता था जब कि एक क़बीलाई समाज में संपत्ति का स्वामित्व सामूहिक होता था। इस
नए आर्थिक सम्बन्धों से समाज में एक असंतोष और तनाव पैदा हो रहा था।
दक्षिण अरब वासी अनेक देवी देवताओं की पूजा किया करते थे। अस्तर के रूप में शुक्र गृह की और अलमका
के रूप में चंद्रदेव की पूजा की जाती थी। शम्स देवी के रूप में सूरज की पूजा करते थे। मंदिर पत्थर के बने होते थे। मक्का में काबा मंदिर में जनजातीय संरक्षक देवताओं की 360 मूर्तियां
थीं। दक्षिणी अरब और यमन प्राचीन काल से अपने धन-दौलत की
प्रचुरता के लिए मशहूर रहा है।
मक्का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक केंद्र था। मूर्तिपूजक अरबों के लिए यह एक धार्मिक केंद्र भी था। इस तरह यह भारी आमदनी का एक स्रोत था। यह इलाक़ा बेहद उपजाऊ था। इसका मुख्य कारण मआरिब का बाँध था। इस्लाम के उदय के पहले यह बाँध किसी काम का नहीं रह गया
था। इससे फलों की पैदावार पर भारी असर पड़ा। बैजन्तीनी और फारसी साम्राज्यों के बीच आए दिन होने
वाले टकरावों के कारण व्यापारिक मार्ग पर अवरोध उत्पन्न होने लगे थे। राजनीतिक दुश्मनियों का दौर बढ़ा और अराजकता फैलने लगी। हाँ, दक्षिणी अरब से उत्तर अरब की ओर जाने वाले मसाला
मार्ग पर मक्का का उदय ज़रूर हुआ। इस
नगर में रहने वाले लोग मूलतः बद्दू नस्ल के थे। मंगोलों की तरह ही बद्दू भी हमले करते रहते थे।
छठी शताब्दी का दूसरा भाग अरब में राजनीतिक विकार की
अवधि थी और संचार मार्ग अब सुरक्षित नहीं थे। तत्कालीन अरब समाज में
आतंक व्याप्त था। लूटपाट, चोरी-डकैती, हत्या, स्त्रियों का अपहरण
बड़ा आम था। धार्मिक विभाजन संकट का एक महत्वपूर्ण कारण था। यहूदी धर्म यमन में प्रमुख
धर्म बन गया, जबकि ईसाई धर्म ने फारस खाड़ी क्षेत्र में जड़ जमा ली थी। इस क्षेत्र
में बहुसंख्यक संप्रदायों में धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति दिलचस्पी में कमी
होती जा रही थी। इतिहास गवाह है कि धर्म तभी और वहीं प्रकट होता है, जब और जहां
उसकी ज़रूरत होती है। अरबी देशों की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक अवस्था
इस्लाम के उदय और तेज़ी से विकसित होने का कारण बनी। अरब में उस समय अय्याश लोगों
का बोलबाला था, भोगवादियों का ज़माना था। जुआ, शराबखोरी, वेश्यागमन आम बात थी।
विधवा, अनाथ और कमज़ोर लोगों को बहुत सी मुश्किलों का समाना करना पड़ रहा था। शादी
जैसी संस्था का क्षरण हो रहा था। स्त्रियों का समाज में न आदर था और न ही अधिकार
या जायदाद में कोई हिस्सा। अंधविश्वास, कुरीतियां और दुराचार ने सारे अरब पर अपना
अधिकार जमाया हुआ था। विलासिता और भोगाचार अपनी हदें पार कर रहा था। शराब की
महफ़िलों में गाने-बजाने के लिए महिलाएं होती थीं, जिनको ‘क़ीनात’ कहा जाता था। शराब
में डूबे लोगों को महिलाएं सुलभ थीं। अरब क़बीलों के जीवन में युद्ध, लूटमार, वध कर
देना, आम बात थी। अरब के बाहर भी, रोमन साम्राज्य और ईरान में स्थिति बेहाल थी। इन
दोनों साम्राज्य के बीच लड़ाइयां चलती रहती थीं, जिससे लोगों का बहुत ही बुरा हाल
था। जो तत्कालीन धर्म थे, वे भी राजाओं के सहायक बन गए थे। उस समय अरब लोग घोर
मूर्ति-पूजक थे। जाफ़र रज़ा ने अपनी पुस्तक “इस्लाम के धार्मिक
अयाम” में बताया है – “मूर्तिपूजा का
प्रारम्भ इस प्रकार हुआ कि अरब जन व्यापार के संबंध में अन्य देशों में भी जाते थे
तो काबा का कोई पत्थर महानता और पवित्रता के प्रतीक के रूप में अपने साथ ले जाते
थे। जहां रहते उस पत्थर के चारों ओर परिक्रमा करते, मानो काबा का तवाफ़ कर रहे हैं।
फिर स्थिति यह हुई कि जहां सुंदर पत्थर देखते, उसकी पूजा करने लगते। एक व्यक्ति
उमरू-बिन-लही व्यापार के संबंध में एक बार सीरिया गया। वहां उसने मूर्ति पूजा
देखी। लोगों ने उसे बताया कि यह मूर्ति अत्यंत सहायक होती हैं। उन्हीं से मांगकर
एक मूर्ति मक्का लाया। इस मूर्ति को उसने काबा में स्थापित कर दिया। यही वह मूर्ति
थी, जिसे “हुबल” कहा जाता है।”
अरब के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी
प्रान्तों के विपरीत मरुभूमि वाले हिस्से में रहने वाले अरब अपने आप में मस्त थे।
वे स्वतंत्र थे और उन्हें इस बात की बिलकुल ही चिंता नहीं थी कि बाहर क्या चल रहा
है। वे निश्चिंतता के साथ घुमक्कड़ी जीवन बिता रहे थे। उनके आपस की प्रतिस्पर्धा, लूट-मार चलते रहते
थे। इस पृष्ठभूमि में मक्का में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म होता
है। मुहम्मद साहब के जीवन के प्रारंभिक वर्षों के दौरान, कुरैशी जनजाति पश्चिमी
अरब में एक प्रमुख शक्ति बन गई थी। हज़रत मुहम्मद साहब के जन्म के क़रीब सौ वर्ष
पहले से ही काबा क़ुरैशियों के संरक्षण में था। मक्का भी उन्हीं के अधीन था।
*** *** ***
मनोज
कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।