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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

आंच पर गदर की चिनगारियाँ

आंच-87

गदर की चिनगारियाँ

मनोज कुमार

My Photoइधर जब से एलेक्ट्रॉनिक मीडिया की क्रांति आई है पुस्तक लेखन और पठन का चलन कम हो गया है। साहित्य की एक-दो विधा को छोड़कर सारी विधाएं उपेक्षित पड़ी हुई हैं। इन उपेक्षित विधाओं में नाटक-एकांकी जैसी जीवन्त विधा को भी देखा जा सकता है। भारतेन्दु काल से आधुनिक नाटक विधा का आरंभ माना जा सकता है लेकिन 21वीं सदी तक आते-आते नाटक लेखन विधा-सरिता सूख-सी गई है। ऐसी अकाल बेला में डॉ. सुश्री शरद सिंह द्वारा रचित कृति “गदर की चिनगारियाँ” पहला पानी की तरह हमारे तप्त मनोभूमि पर शीतलता प्रदान करती है और यह आश्वास्त भी करता है कि नाटक लेखन फिर से नेपथ्य से उठकर मंच पर आ रहा है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद इतिहास और साहित्य का सुंदर अंतरावलंबन देखने को नहीं मिलता है। डॉ. सुश्री शरद सिंह “गदर की चिनगारियाँ” नाटक लेकर उपस्थित हुई हैं जिसमें दबी-कुचली नारी का स्वर नहीं, वरन्‌ वीरांगनाएं, जिन्हें भुला दिया गया था, उन्हें वे अपनी रचना के माध्यम से सच्ची श्रद्धांजलि देती नज़र आती हैं।

scan0067हम लोग कभी पढ़ते थे, ‘इति’ माने ‘बीती’, ‘हास’ माने ‘कहानी’। यानी इतिहास बीती कहानियों का नाम होता है। किन्तु ऐसा कहना उचित प्रतीत नहीं होता। इतिहास सिर्फ़ घटनाओं को गिनती तारीख़ों का नाम नहीं होता। यह तो ज़िन्दगी की छानबीन और ज़िन्दगी को समझने का ज़रिया भी होता है। डॉ. सुश्री शरद सिंह ने बहुत ही मेहनत से 1857 की क्रांति के इतिहास को खंगालते हुए उस क्रांति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली तेरह वीरांगनाओं के संघर्षों को एकांकी रूप में “गदर की चिनगारियाँ” नाम से प्रस्तुत किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि इनमें से कई ऐसी वीरांगनाएं हैं जिनका नाम आप पहली बार सुन रहे होंगे। इन एकांकियों में इतिहास के अप्रतिम रूपायन डॉ. शरद की परिपक्व दृष्टि और कौशल की परिणति है। इस शोधपरक रचनात्मक लेखन में इतिहास की सटीक संदर्भों के साथ नाटकीय अभिव्यक्ति के लिए शरद जी को साधुवाद। जिस तरह से तथ्यों के आधार पर इन्होंने कथानक को गढ़ा है वह इनकी शोधपरक रचनात्मक लेखन का नायाब नमूना है।

scan0068परंपरागत ढंग से ब्रितानी शासन का विरोध करने की परिणति 1857 के विद्रोह में हुई। इसमें किसानों, कारीगरों, सैनिकों, स्त्रियों-पुरुषों आदि सभी ने लाखों की संख्या में भाग लिया। यह विद्रोह ब्रितानी शासक की जड़ें हिलाने के लिए काफ़ी था। मेरठ से शुरु हुआ गदर बाद में उत्तर में पंजाब, दक्षिण में नर्मदा, पश्चिम में राजपुताना और पूर्व में बिहार तक बढ़ता गया। आज के उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों, कारीगरों और आम आदमी ने उस आंदोलन में व्यापक पैमाने पर हिस्सा लिया और विद्रोह को वास्तविक शक्ति प्रदान की। एक अनुमान के मुताबिक अंग्रेज़ों से लड़ते हुए अवध में डेढ़ लाख और बिहार में एक लाख नागरिक शहीद हुए थे। इस पुस्तक को ‘उन सभी ज्ञात-अज्ञात स्त्रियों को जिन्होंने सन्‌ 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सशक्त भूमिका निभाई’ समर्पित करते हुए शरद जी कहती हैं,

नारी को न समझो अबला, है वो शक्ति का दूजा रूप

उसने सदा दिया है हंसकर, अपना सूरज, अपनी धूप।

बुंदेलखंड की राबिया बेगम, अवध की बेगम हज़रत महल, दिल्ली की बेगम ज़ीनत महल, रामगढ़ राज्य की रानी अवंतीबाई लोधी, गढ़ा मंगला की रानी फूलकुंवर, ग्राम भोजला की झलकारी बाई, झांसी की लक्ष्मीबाई, लखनऊ की ऊदा देवी पासी, कानपुर की अजीजनबाई, झांसी नैमिषारण्य की महारानी तपस्विनी, सिसौली, मुज़फ़्फ़रनगर की मामकौर बीवी, धार मालवा की रानी द्रौपदीबाई और कानपुर की मैनाबाई वे नाम हैं जो इस आन्दोलन में शरीक हुए। इनमें से कई न किसी रियासत से जुड़ी थीं, और न ही रानी थीं। पर उनके मन में अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ आक्रोश था। बस ज़रूरत थी एक चिनगारी की। मिली और वह भड़क उठी। ऐसे लोगों द्वारा अंग्रेज़ों की क्रूरता का साहसपूर्वक विरोध बेमिसाल है और स्वर्णाक्षरों में दर्ज़ किया जाना चाहिए। उन्होंने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए कि आज भी उनके योगदान के बारे में पढ़कर मन आंदोलित हो उठता है। इस नाटक संग्रह में इनके आत्मबलिदान को बहुत ही गंभीरता से रेखांकित किया गया है। कहीं-कहीं उन्होंने किवदंतियों का सहारा लिया है, वह भी तब जब प्रमाणिक जानकारी कम उपलब्ध थीं, अन्यथा काफ़ी शोध के उपरान्त लिखे गए इस नाटक संग्रह में इतिहास और साहित्यिक रचनात्मकता का ऐसा सुंदर और सजीव चित्रण शरद जी ने किया है कि ये हमारे मानस-पटल पर दीर्घावधि के लिए अंकित हो जाते हैं।

आज के साहित्य में इतिहास लेखन वैसे ही हाशिए पर है। उस पर से नाटक लेखन तो बहुत ही कम हो रहा है। यह बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि शरद जी ने उस महान क्रांति में अपनी आहुति देनेवाली वीरांगनाओं के बलिदान को इतिहास के अंधेरे से परिश्रम से निकाल कर उसे प्रकाश में लाया है।

वास्तविक घटनाओं को केन्द्र में रखकर, ठीक उन्हीं चरित्रों को पात्र बनाते हुए कथानक बुना गया है। उस पर से डेढ़ सदी से भी अधिक पुरानी, स्मृति विलुप्त घटना का वृत्तांत! यह सचमुच गहरे कौतुक का विषय बनता है। शरद जी का “गदर की चिनगारियाँ” एक विलक्षण कौतुक की बानगी है। यह एक अत्यंत सफल कृति है। विषय-निर्वाचन, कथा-वस्तु, क्रम-विकास, संवाद, ध्वनि, मितव्ययिता आदि दृष्टियों से यह एक अद्भुत कला-कृति है। तेरहों नाटक में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का स्पंदन गागर में सागर की तरह छलक उठता है। यह कृति लेखिका के अत्यंत मौलिक प्रयोग की तरह है, जिसमें स्वतंत्रता के संघर्ष का क्रांतिकारी स्वरूप, अग्रेज़ी हुक़ूमत के प्राति विद्रोह की भावना, उद्वेलित होकर साकार हो उठती है। यह एक अद्भुत साफ़-सुथरी संतुलित कला-कृति है। सुश्री डॉ. शरद सिंह इस उत्कृष्ट नाट्य-कृति के लिए हार्दिक बधाई की पात्र हैं और आशा की जा सकती है कि भविषय में भी वे इसी प्रकार अपनी विशिष्ट देन से हिन्दी-साहित्य के इस उपेक्षित अंग को शक्ति और गौरव प्रदान करती रहेंगी।

 

पुस्‍तक का नाम – गदर की चिनगारियाँ

रचनाकार – डॉ. शरद सिंह

सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन

पहला संस्‍करण : 2011

सस्ता साहित्य मंडल

एन-77, पहली मंज़िल,

कनॉट सर्कस,

नई दिल्‍ली-110 001, द्वारा प्रकाशित

मूल्‍य : 150 रु.