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सोमवार, 10 अगस्त 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-8

 

महात्मा गांधी हत्या केस-8


सातवां जानलेवा हमला ...

... और वे अंतिम तीस दिन

... और साज़िशकर्ता

 

छठा जानलेवा हमला

गांधीजी पर छठी बार जानलेवा हमला 20 जनवरी 1948 को हुआ जब उनकी सभा में बम फोड़ा गया। विस्तार से इसकी चर्चा आगे है

सातवां जानलेवा हमला ...

... और वे अंतिम तीस दिन और साज़िशकर्ता

हर साल जनवरी का महीना नये साल की शुभकामनाओं, आशा, उल्लास, बधाइयां आदि से शुरु होता है, पर जाते-जाते दे जाता है एक दुख, उदासी, उस महापुरुष की अनुपस्थिति का अहसास जिनके बारे में बापू के प्रति’ कविता में महा कवि पंत ने कहा था

तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेषतुम अस्थिहीऩ,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !

तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,

आधार अमरहोगी जिस परभावी संस्कृति समासीन।

कवि बापू की दुबली-पतली काया का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे मांस और रक्त से रहित, केवल अस्थि-शेष (हड्डियों का ढांचा) जैसे लगते हैं। लेकिन असल में वे सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध और बुद्ध (ज्ञानयुक्त) आत्मा हैं। बापू प्राचीन भारतीय संस्कृति के सनातन मूल्यों के प्रतीक भी हैं और आधुनिक युग को नई दिशा देने वाले नवीन चेतना के दूत भी। कवि का विश्वास है कि बापू का सत्य और अहिंसा का अमर आधार ही आने वाले समय की संपूर्ण मानव संस्कृति की नींव बनेगा।

1 जनवरी, 1948

1948 का जब जनवरी महीना शुरू हुआ तो गांधीजी बहुत एकाकी और उदास थे। मित्रों ने उनका तात्त्विक साथ छोड़ दिया था। कल तक जो उनकी सराहना किया करते थे, आज उनके सिद्धांतों से अलग सत्ता में मशगूल थे। उनके एकमात्र राजनीतिक साथी जो अहिंसा के सिद्धांत के प्रति अपनी निष्ठा पर अडिग रहे, वे खान अब्दुल गफ्फार खान थे, और उन्हें कांग्रेस के बंटवारे को स्वीकार करने के फैसले ने पाकिस्तान का नागरिक बना दिया था। बादशाह ख़ान को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था, "मैं इस आलीशान इमारत (बिड़ला भवन) में प्यार करने वाले दोस्तों से घिरा हुआ हूँ, लेकिन मेरे अंदर कोई शांति नहीं है... सब कुछ दिल्ली पर निर्भर करता है। मैं उस बुराई को दूर करने की कोशिश कर रहा हूँ जो हममें आ गई है। मेरी इस कोशिश में अपनी विफलता देखने की कोई इच्छा नहीं है। मैंने 125 साल तक जीने की इच्छा भी छोड़ दी है।"

उस समय की स्थिति से क्षुब्ध गांधीजी ने राजाजी को पत्र लिखकर अपनी मनः स्थिति इन शब्दों में प्रकट की थी – अब मेरे इर्द-गिर्द शांति नहीं रही, अब तो आंधियां ही आंधियां हैं।

1948 के नववर्ष के दिन उन्होंने एक पत्र अपने सचिव प्यारेलाल को लिखा था, यह नगर पुलिस के भय से शांत है। लेकिन लोगों के दिल में क्रोध की आग मौज़ूद है। मैं या तो इस आग में जल मरूंगा या इसे बुझाऊंगा। अभी मेरे सामने कोई तीसरा रास्ता नहीं है। गांधीजी को नए साल की बधाई देने वालों में सियाम से आए एक व्यक्ति भी शामिल थे। उन्होंने गांधीजी की मेहनत से भारत को मिली आज़ादी के लिए उनकी तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि इससे सभी देशों में आज़ादी की चाहत और बढ़ गई है। तारीफ़ को नकारते हुए गांधीजी ने जवाब दिया कि मेरी नज़र में भारत को जो मिला है, वह असल में आज़ादी है ही नहीं। आज राजधानी में हर कोई आज़ादी से घूम-फिर नहीं सकता। एक भारतीय दूसरे भारतीय से डरता है। क्या यही आज़ादी है?

कांग्रेसी नेताओं में आपसी मनमुटाव, द्वेष और ओछी स्पर्धा बढ़ चुकी थी। नेहरू और पटेल के मतभेद अब जग-ज़ाहिर हो रहे थे। सरदारजी को नेहरूजी के लिए व्यक्तिगत आदर तो बहुत था, लेकिन उन्हें यह शिकायत रहती थी कि नेहरूजी ने बुरे सलाहकारों को अपने आसपास जमा कर रखा है। नेहरूजी मुझ पर विश्वास नहीं रखते। वे कल्पनाओं और सिद्धांतों में फंस गए हैं, इसलिए उनके नेक इरादे विफल हो रहे हैं। उधर नेहरूजी को पटेलजी के किसी प्रश्न को हल करने के ढंग से असंतोष था। वे सरदार की कार्य-दक्षता, प्रशासनिक प्रतिभा और योद्धा जैसे गुणों के कायल थे, लेकिन पटेल की लौह संकल्पों के साथ कार्य सम्पन्न करने की कार्यशैली से वे असमंजस की स्थिति में फंस जाते। दोनों के बीच में मतभेद गहराता जा रहा था

यह सब गांधीजी को विचलित करता था। लेकिन इस घोर निराशा के वातावरण में भी उन्होंने अपने आपको सहज, शांत और प्रसन्न-चित्त रखने का प्रयास सतत ज़ारी रखा। दिल्ली और देश के दूसरे भागों में विभाजन की विभीषिका अभी भी ख़त्म नहीं हुई थी। एक तरफ़ बंटवारे के बाद भी देश के विभिन्न भागों में चार करोड़ मुसलमान थे। दूसरी तरफ़ हिंदू राष्ट्र की स्थापना और ‘मुस्लिम भारत छोड़ो’ जैसे नारे लगाए जा रहे थे। एक वर्ग था जो पाकिस्तान का बदला लेना चाहता था। गांधीजी अपनी जान पर खेलकर इस बदले की आग से देशवासियों और मुसलमानों को बचाना चाहते थे। अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए गांधीजी ने यह भी सुझाव दिया कि शहीद सुहरावर्दी को अपनी जान जोखिम में डालकर दिल्ली के किसी हिंदू इलाके में जाकर रहना चाहिए—जैसा कि उन्होंने कलकत्ता में साथ मिलकर किया था—और हिंदू व मुस्लिम शरणार्थियों की निस्वार्थ सेवा करके सभी का भरोसा जीतने की कोशिश करनी चाहिए। सुहरावर्दी ने सब कुछ करने का वादा तो किया, लेकिन हमेशा की तरह असल काम करने के मामले में पीछे हट गए।

बंटवारे के बाद इंडियन यूनियन में लगभग 4 करोड़ मुसलमान रह गए थे। उनमें से ज़्यादातर लोगों ने मुस्लिम लीग के प्रचार के असर में आकर भारत के बंटवारे का सक्रिय या निष्क्रिय समर्थन किया था। मुस्लिम लीग के बड़े नेता पाकिस्तान चले गए थे, और अपने धर्म के आम लोगों को एक मुश्किल स्थिति में छोड़ गए थे—एक ऐसी भीड़ जो उलझन में थी, जिसका मनोबल टूट चुका था, जिसका कोई नेता नहीं था और जिसकी कोई साफ़ नीति या लक्ष्य नहीं था। उनकी भावनात्मक वफ़ादारी अभी भी लीग के साथ थी। जिन्ना ने दो मुस्लिम लीग की स्थापना की थी। एक पाकिस्तान की लीग, जिसमें कोई हिन्दू सदस्य नहीं बन सकता था। दूसरी लीग भारतवासियों के लिए। गांधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, भारत में मुस्लिम लीग एक धार्मिक संस्था के रूप में कार्य कर सकती है, लेकिन उसकी राजनीतिक हस्ती बिलकुल नहीं होनी चाहिए। सरदार पटेल ने तो मुस्लिम लीग को दबाकर रखा था। इस सबके बीच कई मुसलमान अफसर पाकिस्तान छोड़कर भारत सरकार में आना चाह रहे थे। उन अफसरों को लगा कि भारत सरकार उन्हें वापस स्वीकार नहीं कर रही। गांधीजी ने उनसे कहा था कि बीते दिनों की वारदातों के कारण अगर लोग उन पर भरोसा नहीं कर रहे तो उन्हें कुछ दिन धीरज से सब कुछ सह लेना चाहिए। अगर वे वास्तव में ईमानदार और वफ़ादार हैं, तो समाज उन्हें अपने आप स्थान दे देगा।

1 जनवरी, 1948 को नए साल के दिन अपने भाषण में, गांधीजी ने प्रार्थना सभा में लोगों की बड़ी संख्या पर खुशी जताई, लेकिन इस बात पर अफ़सोस भी जताया कि महिलाओं के बैठने की व्यवस्था करने में सात मिनट बर्बाद हो गए। सभा में एक मिनट भी बर्बाद होने का मतलब है देश के कई मिनटों का नुकसान। पुरुषों को महिलाओं को जगह देना सीखना चाहिए; और जिस समाज या देश में महिलाओं का सम्मान नहीं होता, उसे सभ्य नहीं माना जा सकता। आज़ादी मिलने के बाद, हम सभी को अब से एक आज़ाद और गौरवशाली देश के नागरिकों की तरह व्यवहार करना चाहिए।

2 जनवरी, 1948

दिल्ली में हिंदू और सिख शरणार्थी काफी गुस्से में थे। वे दिल्ली में अपने लिए जगह बनाना और रोज़गार पाना चाहते थे। उनकी आंखें मुसलमानों द्वारा छोड़े हुए मकानों पर लगी थीं। पाकिस्तान में छोड़ी हुई अपनी जायदाद के एवज़ में मुसलमानों का भारत में स्थित जायदाद को पाना वे अपना हक़ समझते थे। गांधीजी ने ऐसे लोगों को सब कुछ भूल जाने और क्षमा कर देने की सलाह दी थी। उन लोगों को गांधीजी के इस तरह की बातें अच्छी नहीं लगती थी। बंटवारे के लिए वे गांधीजी को जिम्मेदार मानते थे। उनका कहना था गांधीजी की अहिंसा के कारण ही पाकिस्तानियों का मनोबल इतना बढ़ा था।

उन्होंने राजकोट जाने की बात कही और कुछ दिनों बाद बिड़ला हाउस छोड़कर दिल्ली के बाहरी इलाके में किसी मुस्लिम परिवार के घर में रहने का विचार रखा। वहां न तो कोई सेक्रेटरी होता, न कोई इंटरव्यू और न ही कोई प्रार्थना सभा।

प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा, "लोग मुझसे बहुत उम्मीदें रखते हैं, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि सरकार मैं नहीं चला रहा हूँ।" जो लोग सत्ता में थे, वे गांधीजी के दोस्त थे, लेकिन उन्होंने आगे कहा मैं नहीं चाहता कि कोई सिर्फ़ दोस्ती या मेरे प्रति सम्मान के कारण मेरी सलाह माने। उन्हें ऐसा तभी करना चाहिए जब उन्हें बात समझ में आए। अगर मंत्री, उनके सचिव और पुलिस समेत निचले स्तर के कर्मचारी मेरी बात सुनते, तो हालात बहुत अलग होते। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मंत्रियों को अंग्रेज़ शासकों से पुराना सिस्टम विरासत में मिला था और वे उसी का बेहतर इस्तेमाल कर रहे थे।

3 जनवरी, 1948

कुछ शरणार्थी हिंदू सिखों ने मुसलमानों के ख़ाली घरों पर क़ब्ज़ा कर लिया। गांधीजी को यह बहुत बुरा लगा। 3 जनवरी, 1948 को शरणार्थियों के एक समूह ने मुसलमानों के कुछ खाली घरों में ज़बरदस्ती घुसने की कोशिश की। पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए उन्होंने महिलाओं और बच्चों को आगे कर दिया। गांधीजी ने इसे "औरत की गरिमा का अपमान" बताया। अधिकारियों द्वारा वैकल्पिक आवास की पेशकश के बावजूद मुसलमानों के घरों पर कब्ज़ा करने की उनकी ज़िद से साफ़ पता चलता था कि उन्हें ऐसा करने के लिए ज़रूरत ने नहीं, बल्कि दिल्ली से मुसलमानों को हटाने की इच्छा ने प्रेरित किया था। अगर आम राय यही थी, तो मुसलमानों को ऐसे टेढ़े-मेढ़े तरीकों से भगाने के बजाय उनसे चले जाने के लिए कहना कहीं बेहतर होता।

इन दिनों सरदार पटेल और नेहरूजी के बीच मतभेद उभर आया था। सरदार पटेल मुसलमान अपराधियों को सख़्त सज़ा देना चाहते थे। लेकिन नेहरू का रूख नरमपंथी ही था। कश्मीर समस्या पर भी पटेल और गांधीजी नेहरू के इस मत से सहमत नहीं थे कि यह मामला युनाइटेड नेशंस में ले जाया जाए। जवाहर लाल नेहरू ने पटेल के बजाय माउंटबेटन की सलाह को अहमियत देकर पाकिस्तान की युनाइटेड नेशंस में शिकायत कर दी थी। आर एस एस के बारे में पटेल का रूख नरम था। वे आर एस एस को हिन्दू संगठन तो मानते थे लेकिन वे उसके राष्ट्र हित के काम की तारीफ भी करते थे। इस विचार मतभेद का असर शासन में भी दिखने लगा था। गांधीजी को आशंका थी कि कहीं इस विचार मतभेद का दुरुपयोग पाकिस्तान न कर डाले। इस मतभेद की सूचना कुछ लोगों ने माउंटबेटन को दे डाली। गांधीजी ने इस पर आपत्ति जताई और कहा, अपने घर की अंदरूनी बातें पराए लोगों से करना ग़लत है।

गांधीजी का विषाद कम होने की जगह गहराता ही जा रहा था। इस सब माथा-पच्ची के कारण गांधीजी का पत्र-व्यवहार पिछड़ा जा रहा था। उन्होंने अपनी दिनचर्या में परिवर्तन कर डाला। सुबह की प्रार्थना के बाद वे आधे घंटे की नींद लेते थे, जिसे उन्होंने बंद कर दिया, ताकि पत्रों का जवाब दिया जा सके। इससे उनकी मानसिक शांति और भंग हो रही थी। कोई उनसे कुछ पूछता तो कहते, मैं तो चिता पर चढ़ा मुर्दा हूं। अब मुझसे कुछ न पूछो।

4 जनवरी, 1948

दिल्ली के मौलाना लोग गांधीजी से मिलने आए। उन्होंने गांधीजी से कहा, हम भयंकर स्थिति में हैं। हमें आपके सिवा किसी का सहारा नहीं रह गया है। हम अब पुलिस पर भी भरोसा नहीं रख सकते। पुलिस भ्रष्ट हो गई है। उधर पाकिस्तान युद्ध की धमकियां दे रहा है। गांधीजी ने उनके प्रति गहरी सहानुभूति जताई। पुलिस भ्रष्ट हो गई थी। यह बहुत दुखद बात थी। लेकिन उन्होंने आने वालों से कहा कि जब वे उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं, तो राष्ट्रवादी मुसलमानों को भी अपना फर्ज़ निभाना होगा। अगर वे अपने असर का इस्तेमाल करके भारतीय मुसलमानों की बड़ी आबादी को उकसावे के बावजूद सही रास्ते पर बनाए रखें, तो हिंदू और सिख भी समय के साथ मान ही जाएंगे। फिर, पाकिस्तान भारत पर युद्ध की धमकी दे रहा था। उन्हें अच्छी तरह सोचना था कि उस संकट के समय में उनका क्या फर्ज़ बनता है। अगर उन्हें लगता था कि पाकिस्तान जो कर रहा है वह सही है, तो फिर कुछ कहने को नहीं बचता था। लेकिन अगर पाकिस्तान गलत था, तो उन्हें खुलकर और साफ शब्दों में अपनी असहमति ज़ाहिर करनी चाहिए थी।

उसी दिन मीरा बहन ने गांधीजी से पूछा, क्या आप ऋषिकेष जाकर मेरे मवेशी केन्द्र का उद्घाटन करेंगे? झुंझलाकर गांधीजी ने जवाब दिया, एक लाश पर भरोसा करने से क्या फायदा?

5 जनवरी, 1948

वर्तमान परिस्थिति में गांधीजी ख़ुद को असहाय पा रहे थे। असहायता की भावना ने उन्हें चिड़चिड़ा बना दिया था। उनके सचिव प्यारेलाल ने कहा था, आजकल आप बहुत झुंझलाने लगें हैं और चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। गांधीजी ने कहा, हां, इसे काबू में करने के लिए मुझे संघर्ष करना पड़ता है, ... और शायद मैं सफल नहीं हो पाता हूं।

दिल्ली के कुछ मौलाना गांधीजी से मिलने आए। वे राष्ट्रवादी मुसलमान थे और उन्होंने भारत छोड़कर जाने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वे इसे गर्व से अपनी मातृभूमि मानते थे। उन्होंने बहुत हिम्मत और दृढ़ता के साथ सबसे बुरे समय में भी दिल्ली में रहना जारी रखा था। लेकिन उन्होंने गांधीजी से शिकायत की कि अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। उनमें से एक ने उनसे कहा: "आप कब तक उम्मीद करते हैं कि मुसलमान ये छोटी-मोटी परेशानियां और अपमान सहते रहेंगे? अगर कांग्रेस उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती, तो उसे साफ-साफ कह देना चाहिए। तब मुसलमान चले जाएंगे और कम से कम रोज़ के अपमान और संभावित शारीरिक हिंसा से तो बच जाएंगे। हम खुद पाकिस्तान नहीं जा सकते, क्योंकि राष्ट्रवादी मुसलमान होने के नाते हम उसके बनने के ही खिलाफ थे। दूसरी ओर, हिंदू हमें राजधानी में रहने नहीं देंगे। इसलिए, हम भारतीय संघ में भी नहीं रह सकते। अगर आप यहां हमारी सुरक्षा और सम्मान की गारंटी नहीं दे सकते, तो हमारे लिए इंग्लैंड जाने का इंतज़ाम क्यों नहीं कर देते?"

"आप खुद को राष्ट्रवादी मुसलमान कहते हैं और ऐसी बातें करते हैं?" गांधीजी ने नाराज़गी भरे लहजे में कहा। लेकिन उस तीखी बात ने उनके दिल पर गहरी चोट की। यह बर्दाश्त से बाहर की बात थी। उन्होंने एक दोस्त से कहा, "दिल्ली पर हमारी पकड़ लगातार कमज़ोर होती जा रही है। अगर दिल्ली हाथ से निकल गई, तो भारत भी हाथ से निकल जाएगा और उसके साथ ही दुनिया में शांति की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो जाएगी।"

6 जनवरी, 1948

विभाजन के समय सरकारी ख़जाने में तीन सौ पचहत्तर करोड़ रुपए थे। जो द्विपक्षीय संधि हुई उसके अनुसार पाकिस्तान को कुल 75 करोड़ रुपए देने थे। यह निश्चय किया गया कि जिस दिन (14 अगस्त) पाकिस्तान अस्तित्व में आएगा उस दिन पाकिस्तान आरंभ करने के लिए उसमें से बीस करोड़ दे दिया जाएगापाकिस्तान आरंभ करने के लिए उसमें से बीस करोड़ दिए गए थे। अतः 20 करोड़ दे देने के बाद 55 करोड़ रुपयों का बकाया था। बाद में यह तय हुआ था कि बाद के दिनों में जब पाकिस्तान यह मांग करेगा, उसे यह बकाया रकम दे दिया जाएगा। इस संधि के हस्ताक्षरकर्ताओं में पटेल और नेहरू भी थे। लेकिन संघीय मंत्रिमंडल ने फैसला किया था कि जब तक पाकिस्तान कश्मीर पर हमला करना नहीं बंद करेगा और अपनी सेना नहीं हटाएगा, तब तक यह रुपए नहीं दिए जाएंगे। पाकिस्तानियों ने इस पर सहमति तो दी थी, लेकिन इस बाबत कोई लिखित करार नहीं हुआ था। इसलिए अब पाकिस्तानियों ने बड़े ज़ोर-शोर से पचपन करोड़ की मांग शुरू कर दी। बाद में कांग्रेस के नेताओं ने जन-साधारण को बताया कि शेष राशि का भुगतान तब किया जाएगा जब भारत और पाकिस्तान के बीच सभी अनसुलझे मुद्दों को सुलझा लिया जाएगा। न तो इस शर्त को मुसलिम लीग ने कभी माना और न ही यह संधि की शर्तों में यह शामिल थी। मंत्रिमंडल के इस फैसले की क़ानूनी वैधता चाहे जो हो, गांधीजी को नैतिक रूप से यह उचित नहीं लगता था। बात गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंट बेटन तक पहुंची।  तकनीकी रूप से वह सरकार का मुखिया था और सरकार के किसी निर्णय की जिम्मेदारी उसकी बनती थी। गांधीजी ने निजी तौर पर लॉर्ड माउंटबेटन से पूछा था, आप इस बारे में क्या सोचते हैं? उसने कहा, रुपया न देना भारत सरकार का प्रथम अकीर्तिकर कार्य हो जाएगा। गांधीजी का मानना था, इससे नैतिक स्तर पर सरकार की बदनामी होनी थी। अगर कठिनाई में नैतिकता छूट जाए तो उस नैतिकता का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए भारत सरकार इस नैतिक जिम्मेदारी का पालन करे। अंतरराष्ट्रीय करार के तहत जो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने थे, उसको पूरा किया जाए।

7 जनवरी, 1948

बै. पुरुषोत्तम त्रिकमदास गांधीजी से मिलने आए गांधीजी ने उनसे कहा, “सरदार स्वयं को मेरा शिष्य समझते हैं। जवारलाल अपने आपको मेरा बेटा मानते हैं। दोनों मुझे पागल समझ रहे हैं। मेरी कोई सुनता नहीं है। मैं अकेला पड़ गया हूँ

प्रार्थना सभा में उन्होंने पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के कई प्रतिनिधियों से हुई मुलाक़ात का ज़िक्र किया। उन्होंने उनसे पूछा कि वे उनकी शिकायतों को दूर करने में ज़्यादा दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहे थे। उन्हें शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि वे इसी मक़सद से दिल्ली आए थे। लेकिन आज वे उतने असरदार नहीं थे, जितने भारत की आज़ादी से पहले हुआ करते थे। पहले, वे अहिंसक विद्रोहियों के नेता थे। हालाँकि हर कोई उनकी सलाह नहीं मानता था, फिर भी बड़ी संख्या में लोग ऐसा करते थे। आज, उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। अगर मंत्री, उनके सेक्रेटरी और पुलिस समेत निचले स्तर के कर्मचारी उनकी बात सुनते, तो हालात बहुत अलग होते। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मंत्रियों को ब्रिटिश शासकों से पुरानी व्यवस्था विरासत में मिली थी और वे उसका ही बेहतर इस्तेमाल कर रहे थे।

8 जनवरी, 1948

गांधीजी अपने ही देश से लड़ रहे थे और हारा हुआ महसूस कर रहे थे भारत के बड़े हिस्से के हिन्दू उनसे अधिक निराश हो चुके थे उनके लिए गांधीजी गैर ज़रूरी हो गए थे प्रार्थना शुरू होने से पहले, सुनने वालों में से कई लोगों ने गांधीजी को पर्चियां भेजीं। उनमें से एक ने पूछा था कि वे पाकिस्तान क्यों नहीं गए। उन्होंने जवाब दिया कि वे पहले ही बता चुके हैं कि जब तक इंडियन यूनियन में हालात पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, वे ऐसा नहीं कर सकते। एक और सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उन्हें पाकिस्तान भेजने का काम लोगों के ही हाथ में है। वे वहां तभी जाना चाहेंगे जब दिल्ली में हालात पूरी तरह सामान्य हो जाएं। उसी व्यक्ति ने यह भी कहा था कि अगर सत्याग्रह सभी समस्याओं का कारगर इलाज है, तो इसे पाकिस्तान में क्यों नहीं आजमाया जाना चाहिए। वक्ता ने माना कि अगर पाकिस्तान में हिंदू और सिख सत्याग्रह का सहारा ले सकें, तो यह वहां उनकी सभी परेशानियों के लिए असरदार साबित होगा। लेकिन आज वह सत्याग्रह कहां था? उन्हें भारत में कहीं भी बड़े पैमाने पर सत्याग्रह होता नहीं दिखा। हर जगह लोग अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस और सेना चाहते थे। ऐसा लगता था कि हमने ईश्वर को हटाकर सेना को प्राथमिकता दी है।

9 जनवरी, 1948

9 जनवरी को, उन्होंने दिल्ली, पंजाब और दूसरी जगहों पर हुए नरसंहार के लिए अपनी ज़िम्मेदारी के बारे में बात की। उन्होंने कहा, "इन सबके लिए मैं ज़िम्मेदार हूँ।" उन्होंने आगे कहा कि शायद भगवान ने जान-बूझकर उन्हें अंधा बना दिया था, लेकिन अब ज़िंदगी के बिल्कुल आखिर में भगवान ने उन्हें उनकी गलती का एहसास कराया है। "मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि मैं बहादुरी से मरूँ। अगर मैं ऐसा कर पाया, तो यह मेरी जीत होगी।" ऐसा लग रहा था कि वह किसी आखिरी और न बदले जा सकने वाले काम के बारे में सोच रहे थे।

स्थिति तेज़ी से बदल रही थी। काल का क्रूर चक्र तेज़ी से घूम रहा था। एक तरफ पाकिस्तान से पचास करोड़ रुपयों के भुगता का दबाव था तो दूसरी तरफ गांधीजी का यह कहना की नैतिकता का तकाजा है कि सरकार पाकिस्तान को बकाया राशि का भुगतान करे। सरकार दुविधा में पड़ गई। उसे जब लगा कि निर्णय ग़लत है, तो इसे वापस लेना पड़ा और पाकिस्तान को बकाया रकम देने की घोषणा करनी पड़ी। इस घोषणा को इस तरह पेश किया गया कि सरकार ने गांधीजी के उपवास के कारण अपना निर्णय बदला है। हिन्दू महासभा ने इस बात को ख़ूब हवा दी। कैबिनेट ने अपना निर्णय गांधीजी के उपवास के पहले दिन ही ले लिया था, जबकि उसके बाद भी पांच दिनों तक गांधीजी का उपवास चला। कुछ अतिवादियों के मन में गांधीजी के प्रति नफ़रत भर गया। गांधीजी जब एक ओर देश के साम्प्रदायिक सौहार्द्र के लिए प्राणों की बाज़ी लगाकर ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहे थे, उस समय दूसरी तरफ़ हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले लोगों को लग रहा था कि उनके और उनके सपने के हिन्दुत्व के बीच एक व्यक्ति दीवार बनकर खड़ा है – वह है गांधी! उन्होंने उनको मिटा देने का प्रण लिया। जिसने यह प्रण लिया था – वह था नाथूराम गोडसे!

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मनोज कुमार

 

 

 

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संदर्भ : यहाँ पर