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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1

धर्मनिष्ठ पुरुष एवं धर्मनिष्ठ महिलाएं आपस में एक-दूसरे के विश्वासपात्र और सहयोगी हैं। वे  सब एक-दूसरे को अच्छाइयों का उपदेश देते हैं, तथा बुराई से रोकते हैं। नमाज़ की स्थापना करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह तथा उसके रसूल की आज्ञा का पालन करते हैं। (क़ुरआन : 9/71)

11.1 चौथा सिद्धांत ईश्वर के नाम का प्रेम संस्मरण

सूफ़ी दर्शन के अनुसार चौथा सिद्धांत यह है कि ईश्वर के नाम का प्रेम संस्मरण करने और ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाने में मनुष्यत्व का सार है।

सूफ़ी दर्शन के अनुसार ईश्वर के नाम का प्रेमपूर्वक संस्मरण (ज़िक्र) करने और उनकी भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाने (फ़ना) में ही मनुष्यत्व का वास्तविक सार है। सूफ़ी मत के मुताबिक, मानव जीवन का परम लक्ष्य अपने अहंकार को मिटाकर ईश्वर के साथ एकाकार होना है। सूफ़ी संतों का मानना है कि बार-बार ईश्वर के नाम का जाप करने से मनुष्य का हृदय सांसारिक विकारों से मुक्त और पवित्र होता है। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम और तड़प को प्रकट करने का माध्यम है। सूफ़ी मार्ग में ईश्वर को 'महबूब' (प्रियतम) और आत्मा को 'आशिक' (प्रेमी) माना गया है।

सूफ़ी साधक जब साधना के मार्ग पर चल पड़ते हैं, तो उन्हें निर्देश दिया जाता है कि वे अपने हर दैनिक कार्य को नियमित रूप से करते रहें और इसके साथ ही एक क्षण के अंश के लिए भी ईश्वर के अलावा अन्य किसी भी विचार को अपने दिमाग में प्रवेश न करने दें। सामान्य जीवन में किसके लिए यह संभव है, सिवाय एक प्रेमी के। प्रेमी अपने दैनिक जीवन की सभी गतिविधियों के बावजूद अपने प्यार को शायद ही कभी भूल पाता है; बल्कि, वह अंततः अपने प्रिय के लिए सब कुछ करता है। इसी तरह सूफ़ी सब कुछ अपने प्रिय ईश्वर के लिए करते हैं। एक साधारण प्रेमी के मामले को समझना आसान है क्योंकि जैसा कि हम सभी जानते हैं, हमारे भीतर बहुत कुछ है जो बिना प्यार के अभिव्यक्ति नहीं पा सकता है। जिस व्यक्ति से कोई प्रेम करता है, वह प्रेमी के व्यक्तित्व की अनेक समस्याओं का जीवंत उत्तर प्रस्तुत करता है। ऐसे व्यक्ति से प्रेम किए बिना प्रेमी स्वयं अधूरा रह जाता है। सच्चे प्रेमी-प्रिय संबंध का अर्थ है प्रेमी द्वारा एक ऐसा जीवन जीना जो, प्रेमी के कोमल विचारों से गहरे रंग में रंगा हो। प्रेमी-प्रेमिका का ऐसा हृदय सूफ़ी-ईश्वर संबंध मिलता है।

सूफ़ी सन्तों की साधना में 'प्रेम' का अत्यधिक महत्त्व है। मनुष्य के हृदय का स्वभाव ही ऐसा है कि वह प्रेम चाहता है। एक आदमी की इच्छा होती है कि उसका ईश्वर भी उससे प्रेम करे। सूफ़ी साधना वास्तव में प्रेम-साधना है। यह प्रेम केवल प्रेम के लिए होता है। सूफ़ी साधकों का मूल आधार ईश्वर को प्रेम द्वारा पाना है। प्रेमी की एकमात्र कामना होती है कि वह प्रियतम को अपने सामने देखता रहे, उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होता रहे। दूसरे शब्दों में कहें तो सूफ़ी साधक का लक्ष्य ईश्वर है और ज़रिया प्रेम। सूफ़ियों के मतानुसार प्रेम के द्वारा ही ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है। अधिकांश सूफ़ी सिलसिलों में ईश्वर की कल्पना प्रियतम के रूप में हुई है और उनकी धार्मिकता का आधार प्रेम है। सूफ़ीमत में ईश्वर साकार सौन्दर्य और साधक साकार प्रेम है। सौन्दर्य से प्रेम और प्रेम से मुक्ति यह सूफ़ीमत के सिद्धांत का सार है। हज़रत अबू तालिब का कथन है कि प्रेम से परमात्मा संबंधी रहस्यों का भेदन होता है तथा उसका ज्ञान प्राप्त होता है। सूफी दर्शन में 'सौंदर्य', 'प्रेम' और 'मुक्ति' के बहुत गहरे आध्यात्मिक मायने हैं। सूफी संतों का मानना है कि संसार की हर सुंदर वस्तु या इंसान में ईश्वर (अल्लाह) के ही सौंदर्य (हुस्न) की झलक है।

एक सूफ़ी ईश्वर के प्यार में कैसे पड़ जाता है, सूफ़ीवाद के सबसे महान रहस्यों में से एक है। हालांकि, कोई भी सुरक्षित रूप से अनुमान लगा सकता है कि जब तक कोई गुरु न हो, यह असंभव होगा। गुरु अपने शिष्य को ईश्वर की बौद्धिक स्वीकृति को भावनात्मक स्वीकृति में बदलकर सबसे पहले ईश्वर के साथ प्यार में पड़ने में मदद करता है। एक बार जब शिष्य ने इस चरण में सफलता हासिल की, यानी अपने रचयिता की अपनी बौद्धिक स्वीकृति को भावनात्मक स्वीकृति में परिवर्तित करने में सफल रहा, तो वह अगले चरण के लिए तैयार हो जाता है। यह भावनात्मक स्वीकृति का प्रभाव इतना ज़बरदस्त होता है कि साधक की ज़िन्दगी की दूसरी वास्तविकता, सामाजिक, जैविक, आदि पूरी तरह से गौण हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, प्रेम एक उत्प्रेरक शक्ति है जो साधकों को आध्यात्मिक मार्ग की ओर लगाती है। प्रेम एक ऐसी वासना है जो समस्त वासनाओं को हृदय से दूर करती है। प्रियतम के साथ मिलन ही उसकी सबसे काम्य वस्तु है।

11.2 इश्क़ शब्द की उत्पत्ति

इश्क़ एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ प्रेम, मुहब्बत, आशिक़ी, गहरी चाहत, अनुराग, किसी को बहुत चाहना, किसी को मित्र बनाना, किसी चीज़ में चिपक जाना है। प्रेम एक प्रकार का उन्माद है जो सौंदर्य को देखने से उत्पन्न हो, होता है। कुछ विद्वान इश्क़ की उत्पत्ति इश्क़ा से मानते हैं, जो एक प्रकार की बेल होती है भारत में इसे आमतौर पर अमरबेल कहा जाता है। इस बेल की विशेषता है कि जिससे यह लिपट जाती है, उसे सुखा कर ही छोड़ती है। इश्क़ का भी तो यही गुण है, जिससे वो लिपटा उसको समाप्त करके ही दम लेता है। विशेष अर्थ में देखें तो लिपटना मिलन का भाव दर्शाता है। इश्क़ मिलन ही तो है। सूफ़ी साधक ईश्वर से मिलन चाहता है।

इश्क़ क़ुरआन का शब्द नहीं है। क़ुरआन में हुब (प्रेम), मुहिब (प्रेमी), ‘मुहब्बत (प्रेम), मुअद्दत  (प्रेम) आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस दृष्टिकोण से देखें तो कह सकते हैं कि इश्क़ का चिंतन क़ुरआन में प्रयुक्त शब्दों से अलग अर्थ रखता है। कुछ धर्मशास्त्रियों ने इस आधार पर इश्क़ शब्द के प्रयोग को इस्लामी शरीअत के आदेशों की अवहेलना माना। इसलिए उन्होंने सूफ़ियों को धर्म विरोधी कहना शुरू कर दिया।

11.3 इश्क़-सिद्धांत की विवेचना

सूफ़ियों का विश्वास है कि परमात्मा प्रेम-स्वरुप है। जिसने अपने ह्रदय के समस्त कलुष को धो डाला है वही इस प्रेम का अधिकारी हो सकता है। जिसने सांसारिक प्रलोभनों का त्याग नहीं किया है वह इस प्रेम पाने का अधिकारी नहीं हो सकता। जो ईश्वर से प्रेम करते हैं उससे ईश्वर भी प्रेम करता है। सूफ़ी साधना की शुरुआत में भी प्रेम रहता है और उसके अंत में भी प्रेम ही रहता है। हज़रत बायजीद बिस्तामी ने कहा है, मैं समझाता था कि मैं परमात्मा से प्रेम करता हूँ, लेकिन गौर करने पर मैंने देखा कि मेरे प्रेम करने के पहले से ही वह मुझसे प्रेम करता है इस प्रेम को पाकर प्रेमी और प्रियतम दोनों संतुष्ट होते हैं।

एक परमात्मा प्रेमी सूफ़ी साधक ने लोगों के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, मैं प्रियतम के पास से आ रहा हूँ, और प्रियतम के पास जा भी रहा हूँ। प्रियतम के साथ मिलन मेरी सबसे बड़ी कामना है। प्रियतम का स्मरण मेरा आहार है। उसको पाने की उत्कट अभिलाषा को पीकर मैं जीता हूँ। प्रियतम का पर्दा (हिजाब) ही मेरा परिधान है। प्रियतम के विरह के कारण मेरा चेहरा पीला पडा हुआ है। जब तक उससे मेरा मिलन नहीं हो जाता मैं प्रियतम-प्रियतम की रट लगाता रहूँगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सूफ़ी साधकों के लिए उस परम प्रियतम का प्रेम ही सब कुछ है। यह प्रेम निष्काम है। इस प्रेम में प्रियतम के सिवाय किसी और की कामना नहीं है। प्रेम के द्वारा जब प्रेमी के सारे अंतरद्वंद्वों, सभी वासनाओं का अंत हो जाता है, तब वह आगे बढ़ता है, उसे परमात्मा के दर्शन होते हैं।

सूफ़ीमत के अनुसार जबतक परमात्मा की कृपा नहीं होती साधक के ह्रदय में प्रेम नहीं होता। समय-समय पर विभिन्न सूफ़ी चिंतकों ने इश्क़-सिद्धांत की विवेचना की और प्रेम का पवित्र और पावन सिद्धांत प्रस्तुत किया। कई सूफ़ी चिंतकों की व्याख्या के कारण इश्क़-सिद्धांत सूफ़ियों में आत्मज्ञान का माध्यम बना। उन्होंने समझाया कि इश्क़ के द्वारा शाश्वत और पवित्रतम अस्तित्व, ईश्वर की प्राप्ति की प्रेरणा एक इंसान के भीतर जगती है। इस व्याख्या से इश्क़ को इस सृष्टि में काफ़ी ऊपर का दर्ज़ा हासिल हुआ। अल्लामा इक़बाल फ़रमाते हैं,

इश्क़ दमे-जिब्राईल, इश्क़ दिले-मुस्तफ़ा।

इश्क़ ख़ुदा का रसूल, इश्क़ ख़ुदा का कलाम।

इश्क़ से नूरे-हयात, इश्क़ से तारे-हयात।

'इश्क़' सूफ़ी मत में आत्मज्ञान और ईश्वरीय मिलन का मुख्य स्तंभ है। इसके मुख्य सूत्रधार कई महान सूफी साधक थे। हज़रत राबिया अल-बसरी (8वीं सदी) ने सबसे पहले ईश्वर के प्रति बिना किसी लालच या डर के 'शुद्ध और निःस्वार्थ प्रेम' (हुब्ब) की नींव रखी। हज़रत मंसूर अल-हल्लाज (मृ. 922 ई.) ने ईश्वर के प्रति दीवानगी और 'इश्क़' को अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचाया, जिसके कारण उन्होंने 'अनल-हक़' (मैं ही सत्य/ईश्वर हूँ) का नारा दिया। प्रसिद्ध विचारक इमाम ग़ज़ाली के भाई हज़रत अहमद ग़ज़ाली (मृ. 1126 ई.) ने अपनी पुस्तक 'सवानिह' में पहली बार 'इश्क़' को एक संपूर्ण आध्यात्मिक दर्शन के रूप में स्थापित किया। उन्होंने बताया कि कैसे इश्क ही आत्मा और परमात्मा को जोड़ता है। हज़रत इब्न अरबी ने 'वहदत-उल-वजूद' (सृष्टि में ईश्वर की एकता) का सिद्धांत दिया। उनके अनुसार, यह पूरा ब्रह्मांड ईश्वर के प्रेम और सौंदर्य की ही अभिव्यक्ति है।

इश्क़ को सूफ़ियों की रूह बनाने में फ़ारसी सूफ़ी कवियों जैसे फ़रीदुद्दीन अत्तार, जलालुद्दीन रूमी (मृ. 1273 ई.) और हाफ़िज़ शिराज़ी का सबसे बड़ा योगदान रहा। रूमी ने अक्ल (बुद्धि) के मुकाबले 'इश्क़' (दिव्य प्रेम) को आत्मज्ञान का सबसे तीव्र और सच्चा माध्यम घोषित किया।

अलजाहिज़ (मृ. 869) ने अपनी पुस्तक रिसाला-फ़िल-इश्क़ में लिखा है इश्क़ किसी प्रिय वस्तु को पाने की दुराग्रह  रहित मनोकामना है। उस प्रिय वस्तु को माशूक़ (प्रेमिका) कहते हैं। उसको पाने की इच्छा को शौक़ (अभिलाषा) कहा जाता है। इस अभिलाषा रखने वाले को आशिक़ (प्रेमी, अनुरक्त) कहा जाता है। आशिक़ अपने अस्तित्व में किसी कमी या त्रुटि की अनुभूति से व्याकुल रहता है। वह इस कमी के ख़िलाफ़ सफलता पाने के लिए सभी प्रकार से संघर्ष करता है। वह प्रायश्चित करता है। यह प्रायश्चित, यह तौबा दिल से होती है, दिखावटी नहीं। यह शेख़ साहब का वह तौबा नहीं, जिसके लिये कहा है –

शब को मय खूब सी पी, सुबह को तौबा कर ली,

रिन्द के रिन्द रहे हाथ से ज़न्नत न गयी!

यह कमी अध्यात्मिक या शारीरिक दोनों प्रकार की हो सकती है। जो साधना के मार्ग पर है उसके लिए यह कमी आध्यात्मिक होती है और जो वासना के जाल से नहीं उबरा है उसके लिए यह कमी शारीरिक ही रह जाती है। इस आधार पर इश्क़ भी उच्च या निम्न, दो प्रकार का हो सकता है। लेकिन इश्क़ चाहे जिस प्रकार का हो, दोनों ही प्रकार में आशिक़ के मन, बुद्धि, विवेक पर छाया उद्देश्य एक सा ही होता है जिसे अलहुस्न (सौंदर्य) की तूक़ान(उच्चतम मनोकामना) कहते हैं। ऐसी मनोकामना बेक़ाबू होती है, इसको क़ाबू में करने का कोई उपाय नहीं है। अरबी भाषा में 'तौक़' या 'तौक़ान' का अर्थ होता है—तीव्र इच्छा, तड़प या किसी चीज़ के लिए व्याकुल हो जाना। सूफ़ी मानते हैं कि 'अल-हुस्न' (सच्चा सौन्दर्य) की यह प्रकृति है कि वह प्रेम (इश्क़) को अपनी ओर खींचती है। ईश्वर ने जब इंसानी रूह (आत्मा) को बनाया, तो उसके भीतर अपने सौंदर्य की एक झलक छोड़ दी। रूह अपने मूल घर (ईश्वर) से अलग हो चुकी है। इसलिए, जब भी वह संसार में किसी सुंदर वस्तु को देखती है, तो उसके भीतर उस "परम सौंदर्य" (अल्लाह) से दोबारा मिलने की एक अदम्य तड़प पैदा होती है। अल-हुस्न की यही 'तौक़ान' (तड़प) इंसान को सूफ़ियत के रास्ते पर ले जाती है और अंततः उसे ईश्वर से मिलाती है। मशहूर सूफ़ी विचारक रोज़बिहान बक़ली और अन्य संतों ने पैगंबर मुहम्मद सल्ल. की एक प्रसिद्ध हदीस को अल-हुस्न का मूल आधार माना है:

"इन्नल्लाहा जमीलुन युहिब्बुल जमाल"

अर्थात बेशक अल्लाह खूबसूरत है और वह खूबसूरती/सौंदर्य को पसंद करता है। इसलिए सूफ़ियों के लिए अल-हुस्न (चाहे वह चरित्र का नैतिक सौंदर्य हो या सृष्टि का भौतिक सौंदर्य) वास्तव में ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सीधा और तीव्र माध्यम है, जो इंसान के भीतर ईश्वरीय प्रेम की आग को भड़काता है।

सौंदर्य बोध आंख और कान इंद्रियों से होता है। इन इंद्रियों से मनुष्य सौंदर्य, दृश्य और मधुर ध्वनियों को ग्रहण करता है। इसी को सूफ़ी शब्दावली में ख़ैर (पुण्य) और हक़ (सत्य) कहते हैं।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर