आंच-71
डॉ. रमेश मोहन झा
“कविता स्वतः स्फूर्त अंतःप्रवाह है” कविता की इस परिभाषा की पुष्टि में कवयित्री संगीता स्वरूप “गीत” की सद्यः प्रकाशित “उजला आसमाँ” काव्य-कृति रखी जा सकती है।
उक्त संग्रह की कविताओं को पढ़ने और गुनने के बाद मुझे लगा कि इनकी सबसे अंतरंग सखी कविता ही रही है। कविता के साथ इनका अतिशय भावनात्मक लगाव और रागत्मक संबंध इनको बचाए रखता है। श्रीकांत वर्मा के शब्दों को उधार लूँ तो “जो रचेगा नहीं, वह बचेगा क्या? अर्थात् अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इन्होंने कविता का सहारा लिया है और कविता इनकी शरणस्थली बन जाती है। कविता-लेखन इनका ऐसा बंकर है, जो आज के विध्वंस (बाहर और भीतर) और आत्महीनता से इनको बचाता है। वे लिखती है-
“मन के
अशांत सागर में
भावना की लहरें
उद्वेग में आकर
उठा देती है
............
आशा किरण
चारों और फैलकर ए
क उजला-सा
आसमॉं दें …
संकलन में छोटी-बड़ी 72 कविताएं है। इनमें कोई विभाजन रेखा नहीं खींची गई है। अर्थात् इसे कविता की प्रकृति के अनुसार खंडों में नहीं बांटा गया है। सारी कविताएं एक साथ परोस दी गई हैं। खंडो में बांटकर उसके दायरे को छोटा करने का मन नहीं हुआ होगा शायद। यूँ भी कविता की व्याख्या या संकेत देना कवि का अभिष्ट नहीं होता। अच्छी कविता को पाठक अपने-अपने ढंग से हृदयंगम करते हैं।
नारी-मुक्ति के इस दौर में गांधारी के पौराणिक मिथक का सहारा लेकर नारी सशक्तिकरण की चेतना से उर्ज्वसित कविता “सच बताना गांधारी” को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया है। इसकी कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य है –
“आक्रोशित मन के उद्वेलन को
तुमने चुपचाप सहा था।
आजीवन दृष्टि विहीन रहने में
मुझको तुम्हारा आक्रोश दिखा है।
मर्मस्पर्शी भावों के साथ-साथ सुचिन्तित विचारों का भी गुंजन कविता में हुआ है। हालांकि वैचारिक पक्ष थोड़ा कमजोर है, क्योंकि बदलते परिवेश और घटनाओं को अपने सोच के केंद्र में रखकर जो कविताएं लिखी गई है, वे वकृत्य बन कर कर रह गई हैं। काव्यत्मकता उसमें आ नहीं पाई है। तथापि तन्मय होकर कविता लिखने से कविता हमें भावुक जरूर बना देती हैं। वृद्धाश्रम, विडम्बना, आदि इसी श्रेणी की कविताएं है। इन कविताओं को चंद पंक्तियाँ देखें
“ ये मंजर उस जगह का
जहां बहुते से बूढ़े लोग
पथरायी सी नजर से
आस लगाये जीते हैं
जिसे हम जैसे लोग
बड़े सलीके से
वृद्धाश्रम कहते हैं।”
नारी की संघर्ष यात्रा के बदले स्वरूप पर तीखी और तल्ख कविता- “है चेतावनी.....” पुरूष वर्चस्व को चुनौती देती हुई प्रतीत होती है। पुरूष की मानसिकता पुरूषत्व के वर्चस्व से उत्पन्न स्थितियाँ नारी के स्वप्न-संभावनाओं को किस प्रकार लील जाती है इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है ..
“पूजनीय कह नारी को
महिमा-मंडित करते हो
….
वन्दनीय कह कर उसके
सारे अधिकारों को छीन लिया।”
कवयित्री निरंतर आशा और विश्वास का दामन थामे रहती है। उसके मन में आस्था की लौ स्थिर है। “जीवन-फूल और नारी का” कविता में वे लिखती है-
“फूलों की तरह मुकुराती है
लोगों में हर दिन
जीने का उत्साह जगाती है।
संगीता स्वरूप जी की सभी कविताएँ भावपूर्ण प्रांजल और मर्मस्पर्शी हैं। आश्वासित और आस्था जगाने का प्रयास करती हैं। बावजूद इसके इनमें कुछ कविताएं तो मन के पोले गुबार की तरह प्रकट हुई है। हालाकि कहीं-कहीं भावों की पुनरावृति तथा उपदेशात्मकता का समावेश है, और कुछेक कविताएं कच्ची हैं, इसे पुष्ट और पकने में थोड़ा और समय लगेगा फिर भी आद्यांत कविताएं हमें अपने से जोड़े रखती हैं। सादगी, सहजता, अभिव्यक्ति की स्पष्टता इसकी मुख्य विशेषता है। संवेदना से लबरेज इनकी कविताएं पढ़ी जरूर जाएंगी, भले ही याद न रखी जाएं।
पुस्तक का नाम – उजला आसमाँ
रचनाकार – संगीता स्वरूप ‘गीत’
पहला संस्करण : 2011
शिवना प्रकाशन
पी.सी. लैब,
सम्राट कम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर –466001 (म.प्र.)
द्वारा प्रकाशित
मूल्य : 125 रु.
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