-- करण समस्तीपुरी
अजब लटारम है दुनियाँ में। पछिला कुछ हफ़्ता से ऐसन-ऐसन बदलाव देखे कि गीता-ग्यान याद आ गया, “परिवर्तन ही संसार का नियम है।” एक से दो हुए…. और एक से एक फ़करा भी सीखे ई बार रेवाखंड में। बियाह के उदेश्य से गये रहे गाँव। असली लौकिकता तो विध-व्यवहार में ही दिखता है न।
जाकी रही भावना जैसी…. हम तो जैसेही गंडकीपुर के देसी टीसन पर उतरे ऐसन-ऐसन देसिल बयना से भेंट हुआ कि साल भर और आपलोगों को किस्सा सुनायेंगे। हरि बोल। ई दफ़े फ़ागुन में लगन जोर नहीं पकड़ा था सो बैसाख-जेठ का लगन एकदम गहागही था। किसी तरह एक के दो भारा देकर टीसन से घर पहुंचे। अपना बियाह में हमही देर से पहुँचे थे बाकिये घर भर में पाहुन-कुटुम्ब का खूब गहमागहमी था।
लगन के घर में तो बुझले बात… सवा साल से इंतिजाम-बात करते रहिये फिर भी कुछ-न-कुछ घट्टी रहिये जाता है। दो दिन पहिले तो हम आये ही थे। एक दिन पहिले पता चला कि थोड़े कपड़ा लता और लावा-भुजाई का कुछ सामान चाहिये। खैर ई गुरमिंट में रस्ता-पैड़ा चकाचक बना दिया है। एगो संगी को साथ किये और फट से फटफटिया जोत दिये।
मिनिटे में पहुँच गये बजार। लेकिन का बताएं…. गाँव से बजार का रस्ता तो चकाचक मगर बजार में मौगत। बाप रे बाप मरवाड़ी बाजार और गुदरी का हालत तो और बेकार था। इधर पाँच साल में दोकान-दौरी तो ढेरेक बढ़ गया है मगर जगहवा तो ओतने है। दोकान तो दोकान…. सड़क के दोनो साइड ठेला और फ़ेरीवाला का भीड़ और बीच में कचरा का ढेर। लगन के ऐसन भीड़ कि उपर टहाटही धूप और नीचे कचरापारा…. और वही में लोगो रेला चलता था। का मरद का औरत…. सब धन बाइस पसेरी। टीसन चौक से लेकर गोबिन अगरवाल के दोकान तक एहि दिरिस था। हम भी किसी तरह झोला-झपटा को कंधा में टांगे एक हाथ से इंगलिस पैंट को एक बित्ता भर उठाए और दूसरे हाथ से नाक-मूंदकर कूद पड़े।
ई भीड़-भार में पबलिक के नाक में दम हो जता है मगर एकाध गो उचक्का सब को खूब हरियरी सूझता है। हमलोग बसंत मार्किट से निकल रहे थे। टीसन तरफ़ से मरद-जनानी का एक हांज भीड़-भार और गंदा-कचरा से बचते हुए साइडे-साइड जा रहा था। अपोजिट साइड से दु-चार लड़िका लोग आते दिखा। ससुरा सब चाले-ढाल से लुक्कर लग रहा था। उ में भी एगो खूब पहलवान जैसे डिल-डौल वाला लड़िका जो था उ किनार वाला मरद के लाइन से नहीं निकलकर बीच वाल औरतिया लाइन पकड़ लिया और दु-चार जर-जनानी को धकियाते हुए निकल गया। बेचारी जनानी सब अपना कपड़ा-लत्ता संभारते हुए कोढ़िया-मुँहझौंसा कह के रह गयी मगर कौनो मरदुआ का चौआ नहीं अलगा। हम थोड़ा अगियाये तो हमरा साथी हाथ पकड़ के पाछे खींच लिहिस…. “आहा… भैय्या… ई कौन खतरा को न्योता दे रहे हैं…. ई सब बौका गुरुप का आदमी है।” हमभी मन-मसोसकर रह गये।
हमरा मन तो भरिया गया था मगर कुछ नौजवान ऐसेभी थे जिनका जी लपलपाता हुआ स्पष्ट दिख रहा था। हमलोग वही रस्ता से बढ़्कर लड्डुलाल के दोकान पर चाट खा रहे थे। फिर वही दिरिस। मगर ई बार का जुआन सिकिया पहलवान था। ससुरा पाछे से आया और सामने से टर्न लेकर फिर वही गुरुप के में से एगो जनानी को धक्का मारते हुए बढ़ने लगा। जर-जनानी फिर कोढ़िया-सरधुआ की तो ई बार मरद-मानुस का भी पौरुष जगा। शायद सिकिया पहलवान का कमजोर देह-दशा देखकर। धोबिया-पछाड़ मार-मार के बढ़िया से धो दिया उ लुचबा को….।
उ तो सामने गया परसाद गुड़ वाले को दया आ गयी। बेचारे बीच में आकर छुड़ा दिये। मगर उ लुचबा भी भारी थेथर। एतना मार-पिटाई के बादो पहिल धक्का का जिकिर कर रहा है और अगर-बगर बोल रहा है। लोग तो एक बार फिर उमताया मगर रमेश जायसवाल उका हाथ पकड़ कर खींच लिये और डपटे, “मार ससुरा….. देह में दम नहीं और बाजार में धक्का लेने चला है। अरे उ तो देह-दशा से भी पहलवान है और उके पीछे पूरा बदमशहा गुरुप भी है। तू उका देकसी करने चला है…. तब हुआ न धुलाई सरफ़ इकसेल से। अभियो चेत जाओ नहीं तो जौन गत भी बचा हुआ है उ सब भी हो जायेगा। अपना औकात से बाहर काम नहीं करना चाहिये। देह में दम हो तभी बाजार में धक्का लेना चाहिये…. चल हट अब इहां से और अपना रस्ता नापो चुपचाप।
जयसवालजी के भाषण के बाद पूरे बाजार में सन्नाटा था मगर हमरे दिमाग में अजब झन्नाटा लगा था। तभी से हम सोच रहे थे कि उ पहलवान जैसा आदमी वही करम कर के सीना ताने चलता चला गया और ई सिकिया पहलवान बेचारा पिटा गया आखिर काहे… ? अगर पहले की गलती नहीं थी तो इसने क्या गलत किया….? आखिर जयसवाल सेठ की बातों में जवाब मिल गया, “देह में दम नहीं बजार में धक्का।”
पहिले उचक्का के देह में दम था तो उ बजार में धक्का लेके भी बच गया। ई सिकिया पहलवान के देह में दम था नहीं लेकिन चला सरे-बाजार धक्का लेने तो हो गया ठोकाई। मतलब बात तो सही है। औकात-सामर्थ्य से बाहर जौन कोई काम करेगा उको तो भरना भी पड़ेगा। आखिर रहीम बाबा भी तो कहे हैं, “पैड़ ओतने पसारना चाहिये जेतना लंबा चादर हो।”