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बुधवार, 19 सितंबर 2012

स्मृति शिखर से – 24 : डढ़िया वाली


 - करण समस्तीपुरी

उसका नाम मुझे नहीं मालूम लेकिन पूरा गाँव नहीं तो कम से कम दो-चार टोले में वह इसी नाम से प्रसिद्ध थी। हमारे टोले के सभी घरों में उसका आना-जाना था। जमींदारों के दरबार भी जाती रहती थी। मैंने उसे जब से देखा वह वृद्धा ही थी। लंबा कद था, सफ़ेद बाल, गेहुआँ रंग। गले और और बाजुओं में गोदना। वह एक करुणामयी, कर्मठ और अनुशासित महिला थी। थोड़ा ऊँचा सुनती थी मगर कोई बहिरी कह दे और उसने सुन लिया तो जुबान खींच लेने को आतुर।

मेरी दादी कहती थी किसी जमाने में उसका परिवार बड़ा समृद्ध था। डढ़िया वाली के देह पर गोदने की जगह स्वर्णाभूषण लदे होते थे। पति की बीमारी और फिर मृत्यु ने उसके शृंगार के साथ-साथ समृद्धि भी छीन लिया था। निश्छल महिला क्या जाने इस जग की रीति! बची-खुची संपत्ति सहानुभुति देने वाले लेते गए। एक पुत्र था जिसे बड़ा होने पर महज एक पक्का घर और कुछ कट्ठे जमीन विरासत में मिली किन्तु माँ की करुणा और संघर्ष का मोल तो दूर सम्मान भी न कर सका। न तो वह माँ को कोई कष्ट देता ना ही माँ को उससे कोई कष्ट था फिर भी बीच में एक भाजक रेखा थी जिससे माँ की ममता और और संतान का कर्तव्य दो पाटों में बँट जाता था। बेटा पहले रिक्शा चलाता था। गाँव में ही। माँ को खुशी थी। प्रातः-सायं मेहनतकश बेटे को देख छाती शीतल हो जाती थी। इधर जिस गति से परिवार बढ़ रहा था उसी गति से संसाधन घट रहे थे। बेचारा दिल्ली चला गया।

पृष्ठभूमि कोई हो, कुछ परंपराएँ, कुछ रुढियाँ, कुछ किंवदन्ति भारत के हर घर की सच्चाई है। शायद ‘सास-बहू’ संबंध भी इनमें से एक है। डढ़ियावाली का घर भी इसका अपवाद नहीं था। जब आत्मज ने नहीं समझा तो...! कभी-कभी आँखें नम हो जाती थीं किन्तु जर-शरीर से भी ममता का वही सोता कल-कल बहता था जो अमूमन किसी भी माँ में होता था। बेटे के बाद पोते-पोतियाँ को खाने-पीने का दुख न हो, इसलिए वह टोले के कुछ घरों में काम करने लगी थी। हमारा घर भी उनमें से एक था।

वह उस समय से हमारे घरों में आने लगी थी जब गाँव में जल की आपूर्ति कुएँ और तालाबों से होती थी। सुबह-सुबह कुएँ से पाँच-सात घरों में घड़ा भर-भर पानी पहुँचाने के बाद कुछ घरों में घर-आँगन भी बुहार आती। चौका-बरतन का काम उसके बाद होता था। बाद में घर-आँगन में चापा-कल हो जाने से बूढ़ी को भी कुछ आराम हुआ था। वैसे अवस्था बढ़ने के साथ-साथ शरीर का बल भी जाता रहा था।

बाद के दिनों में वह कुछेक घरों में ही जाती-आती रही थी। मेरी दादी और माँ से उसे कुछ अतिरिक्त स्नेह था। फलस्वरूप मुझ तीनों भाईयों से भी। थी वह दादी की उमर की ही मगर दादी को चाची बोलती थी। कभी-कभी लड़ भी लेती थी। अनुचित बात कभी भी किसी की भी नहीं सहती थी। काम-काज के बाद जब माँ उन्हें ‘खाना’ देने लगती तो वह रसोईघर में जा बर्तनों से ढक्कन हटाकर देख लेती थी कि उसमें हम तीनों भाइयों के दोहराने के लिए पर्याप्त भोजन बजा हुआ है या नहीं। यदि कम लगता तो अपने हिस्से से निकलवा देती और कभी-कभार तो बिल्कुल भी नहीं लेती थी, माँ के लाख जिद के बावजूद।

दरबार के जमींदार के घर भी जाती थी। संपन्नता से विपन्नता का विषरस पी रही वृद्धा का ईमान जाँचने की गरज से उन्होंने घर में कुछ आभूषण और नगदी बिखरे छोड़ दिए थे। डढ़ियावाली सारे घरों की झार-बुहार करने के बाद उन आभूषणों और नगदी गृहस्वामीनी को देते हुए बिफ़र पड़ी, “हूँ....! सब समझती हूँ मैं। आप जमींदारों के बटुए में भी एक टुक सुपारी न मिले और गहने-पैसे बिछौना पर बिखरे रहेंगे...? सब समझती हूँ...। आप मेरा ईमान जाँच रहे थे। अरे जब भगवान का दिया अपना सर से पैर तक का गहना नहीं रहा तो किसी के घर चोरी किए क्या रहेगा....!” बुढ़िया पैर पटकती हुई चली आई थी। लाख बुलावे के बाद भी उनके द्वारे कभी पैर नहीं दिया फिर।

डढ़िया, उसका मायके था। मेरे गाँव के पास ही पड़ता है। रेवाड़ी ढ़ाला चौक के उस पार। बूढ़ी जब भी नैहर जाती तो मेरी माँ से जरूर मिल कह जाती कि ज्यादा दिन नहीं रहेगी वहाँ। दादी के पैर छू जाती। वापसी में पैदल आये तो आये मगर जो भी पैसे हों उनमे से अपने पोते-पोतियों के लिए एक और हम तीनों भाइयों के लिए पाँवरोटी का तीन डब्बा जरूर लाती थी।

एक बार सन्नीपात के संक्रमण से मैं बहुत अधिक बीमार पड़ गया था। चालिस-पैंतालिस दिनों तक तेज ज्वर रहा। डढ़ियावाली सबका काम-धाम छोड़ हमारे घर ही बैठी देवी-देवताओं को गोहराती रही थी। कई ओझा और भगतीन के घरों के चक्कर भी लगा आई थी। बड़ी स्नेह-वत्सल थी। हमारे उपनयन में अतिथियों की भीड़ थी। संभालने के लिए उसकी भतीजी को भी बुला लिया था माँ ने। बुढ़िया गुस्सा गई। “ऐं...! हमरा बौआ सबके जनेऊ है और हम इतना भी काम नहीं कर सकते हैं?” सारा काम भाग-भाग कर करती रही थी। माँ की दी हुई नई साड़ी पहन कर बड़ी खुश हुई थी।

बेटे-बहू, पोते-पोतियाँ सब दिल्ली चले गए थे। डढ़िया वाली नहीं गई। जिंदगी के चौदह आने जिस मिट्टी में कट गए, जो अपने सभी सुख-दुःख का गवाह रहा उसे छोड़ कहाँ जाएँ! जीए यहाँ, मरने के लिए दिल्ली जाएँ!!” उसके अपने तर्क थे। गाँव में तो नहीं, अपने घर में अकेली रह गई। जब तक शरीर चला निर्वाह हुआ। जब अशक्त हो गई तो लादकर ले गए। बेचारी एक साल भी न रह सकी दिल्ली में। सर्दी ऐसी पड़ी कि लकवा मार गया। बेटा लाकर गाँव में छोड़ गया। बहू रह गई थी “सेवा” करने के लिए।


साल में तीन बार हमारे यहाँ घरी पावनि हुआ करता है। कुल-देवता को खीर-पूरी चढ़ाया जाता है। इतने दिनों में उसे तीनों घरी की तिथि याद हो गई थी। चँद्र टरै, सूरज टरै मगर बुढ़िया उस रात खाना नहीं खाती तब तक जब तक हमारे घर से कोई उसके लिए खीर-पूरी लेकर न जाए। डढ़िया वाली का इंतजार और उसकी बहू के व्यंग्य-वाण साथ-साथ चलते रहते थे...! जब माँ खाने में कुछ विशेष पकाती तो हमारे हाथों डढ़ियावाली के लिए भिजवा देती थी। मैं ज्यादातर जाने से कतराता था। मुझे उसे देखकर बड़ा दुख होता था। एक तो बुढ़िया रोने लगती थी और दूसरी उसकी दुरावस्था। बेचारी निर्धनता में भी साफ़-सफ़ाई का बड़ा ख्याल रखती थी और उस अवस्था में वह... मल-मूत्र के साथ घंटो खाट पर पड़ी रहती।

हर रविवार की भाँति पिताजी देखने गए थे। इस बार बहू की चिक-चिक नहीं दहारें गूँज रही थी। डेढ़ साल खाट पकड़ने के बाद बुढ़िया परलोक सिधार गई थी। मैंने बहुत दिनों बाद उसे देखा था। उसे नहीं उसके मृत शरीर को। बाहर पड़ी थी। शायद बाहर आकर ही मरी थी। बहू अलाप में रो-रो कर बता रही थी, रात के अंतिम पहर बुढ़िया उससे झगड़ा कर लकवाग्रस्त शरीर को बाहर घसीट लाई थी। आगे प्राण-पखेरू साथ न दिए।

बुधवार, 22 अगस्त 2012

स्मृति शिखर से–21 : हौ राजा, चढ़ाई है!


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-- करण समस्तीपुरी
“हौ राजा...! चढ़ाई है।” यदि कभी रेवाखंड जाने का अवसर मिले तो यह पंक्ति बोलिएगा। विश्वास कीजिये आप वहाँ अजनबी नहीं रह जाएंगे वरण आपके स्वागत में एक निर्मल हास बिखर जाएगा। जाति, धर्म, धन, वर्ग, उम्र सभी सीमाओं से विलग यह जुमला रेवाखंड के दैनिक जीवन का अविभाज्य अंग है। वे इसे सुनकर श्रद्धावनत होते हैं। वे इसे सुनकर क्रोधित भी होते हैं। इसे बोलकर हँसते हैं और युवाओं में तो यह कई क्रियाओं के लिए ‘सांकेतिक वाक्य’ भी हो चुका है।
उनका नाम क्या है पता नहीं। हमारे गाँव में वे हर परिवार के मुखिया का नाम जानते हैं लेकिन सब को राजा कह कर ही संबोधित करते हैं। लोग भी उन्हे अब ‘राजा’ के नाम से ही जानते हैं परन्तु पेशे से भिखारी हैं। सांवला रंग, नाटा कद, भरा हुआ शरीर, कलेजे तक लटकती घनी सफ़ेद दाढ़ी, गेरुआ वस्त्र और हौ राजा...! चढ़ाई है। यही है उनकी पहचान। आस-पास के गाँव में जा भीक्षाटन करते हैं। मेरे गाँव में उनकी बारी प्रायः रविवार को होती है। उस दिन पिताजी का भी साप्ताहिक अवकाश होता है। पहले मेरे पिताजी का नाम लेकर उनके दरबार की जयजयकार करते हैं। फिर कुछ देर बैठते हैं, कुशलक्षेम का आदान-प्रदान होता है और तब फिर, “हौ राजा...! चढ़ाई है।” पिताजी एकाध रुपये देने से पहले कभी-कभी उन्हे चाय भी पिला देते हैं।
बाद के वर्षों में उनकी भिक्षाटन शैली में बड़ा बदलाव आया था। अब वे अन्नदान नहीं स्वीकारते हैं। केवल नकद रुपये। एक, दो, पाँच, दस या बीस। पक्के घर वाले अगर एक रुपये दें तो उन्हें क्रोध भी आ जाता था। लोग उनकी सच्चाई जानते हैं। उन्हें अब यह सब छोड़ देने की सलाह भी देते हैं। कई लोग दुत्कार भी देते हैं। फिर भी उनका संसार यथावत चल रहा है। वे इसे अपना कुल धर्म मानते हैं। कहते हैं कि कभी उनके पूर्वज शैव-सन्यासी थे। भिक्षाटन उनका धर्म है।
अब आइए आपको बताते हैं, उनके “हौ राजा ! चढ़ाई है” का राज़। वैसे हर भिखारी के पास वास्तविक या कृत्रिम आवश्यकता होती है। वह उसके अनुसार वेश और भाषा का उपयोग कर भिक्षाटन करता है। किन्तु ‘राजा’ जी के पास भी ऐसी ही कुछ आवश्यकता थी यह कहा नहीं जा सकता। इसीलिए उनका वेश और उनकी भाषा बहुधा एक सी ही रहती है। “हौ राजा चढ़ाई है।”
चढ़ाई का अर्थ यात्रा से है। बाबाजी कभी गंगाजी की चढ़ाई करते हैं। कभी बैजनाथधाम, कभी अयोध्या, काशी, मथुरा बद्री और केदारनाथ। आश्चर्य यह है कि यात्रा कितनी भी लंबी हो वे लौट आते हैं अगले सात दिनों में ही। रविवार को उनकी चढ़ाई हमारे गाँव में ही होती थी। जब कोई पिछली यात्रा के बारे में पूछ देता था तो वे कभी हँस कर और कभी सकोप टाल जाते थे। कभी-कभी तो श्राप का भय भी दिखा देते थे।
अगहन का महीना था। सर्दी की शुरुआत हो गई थी। एक सोमवार की सुबह पिताजी बाहर धूप में बैठे डाक-खाने का हिसाब-किताब मिला रहे थे। कुछ परेशान दिख रहे थे। अगहन की गुलाबी ठंड में भी उनके माथे पर श्वेद-कण साफ़ देखे जा सकते थे। घबराये हुए से कुछ खोज रहे थे। सब जगह खोजा। हार-थक कर बताया कि कोई सात हज़ार रुपये कम पड़ रहे थे। हमारे सर्वोत्तम प्रयासों के बाद भी वो रुपये नहीं मिले। पिताजी का मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था। एक अल्पायी डाक-कर्मी के लिए सात हज़ार रुपये भरना एक साल भर की बचत से भी अधिक थी। अनेक लोगों के आश-भरोस दिलाने के बाद कोई ग्यारह बजे पिताजी थके हारे से घर से निकले ही थे कि पीछे से ‘हौ राजा’... हौ राजा ! की आवाज़ आई।
पिताजी पहले से ही चिढ़े थे उनपर भी भरास निकल गई। पुनश्च वे पास आये और मुट्ठी में बँधे सौ रुपये के नोटों की गड्डी आगे कर दिया। पिताजी का सर चकराने लगा। फिर बाबाजी ने याद दिलाई कि वे नोट उसी कुर्ते में रह गए थे जो पिताजी ने कल उन्हे दिया था। पिताजी का मस्तक श्रद्धा से नत हो गया। मेरे गाँव में लोग उनके ईमान का लोहा मानते हैं। कहते हैं कि वर्षों से वे आते रहे हैं। लोगों से सविनय या लड़कर भीख लिया होगा परन्तु किसी के फ़ेंके हुए सोने पर दृष्टि भी नहीं डाली होगी।
बड़े दिल वाले थे वे। वास्तविक अर्थों में राजा। ग्रीष्म का प्रथम चरण पधार चुका था किन्तु क्रिकेट का नशा हमारी युवक-मंडली के सर चढ़ कर बोल ही रही थी। अंतर यही आया था कि अब हम दोपहर के बदले सुबह में ही खेल लेते थे। किसी दूसरे गाँव से क्रिकेट का मैच खेलकर हम वापस आ रहे थे। साइकिल से। धूप की तीखी रेखा हमारे सर के ठीक ऊपर प्रहार करती चुभ सी जा रही थी। पहले खेल की थकान और फिर धूप, आँखों से जो जैसे अंगारे निकल रहे थे और मारे प्यास के गला सूखा जा रहा था।
एक बड़े से हवेलीनुमा के घर के सामने चापाकल देखकर हम सभी रुके। बारी-बारी से हाथ-मुँह धोकर अंजुरी में भर-भर पानी पीने लगे। आहा...! तृप्ति की अनुभूति! तभी एक पहचानी सी आवाज हमारी पिपासा-समन में बाधक बन गई। “हौ राजा...!”
हमें लगा कि बाबाजी वहाँ भी अपने कर्मपथ पर हैं किन्तु नहीं तभी वे विश्राम में थे। सुखद आश्चर्य यह कि वह घर उन्हीं का था। उन्होंने हमें पानी नहीं पीने दिया। बलात खींच ले गये दालान में। पहले नीबू के सर्बत से हमारा गला तर करवाया। फिर ‘चूरा-दही’। संकोच करते देख बोल पड़े, “राजा...! यह सब तुम्हारा ही है। हमारा कुछ है? अपने भाव से विवश कर उन्होंने खाने के बाद ही आने दिया।
उस दिन उनकी आँखों की चमक देखते ही बनती थी। वो चमक जो एक याचक की आँखों में नहीं आती। कई बार अपनी बहू और घर का काम करने वाले लड़के को डाँट भी दिया था। हर्षातुर हो हर आने-जाने वाले को बोल रहे थे, “सौभाग्य है हमारा। आज हमारा राजा सब हमरे द्वार पर आया है।” फिर हमें देख बोल पड़ते थे, “राजा... ऐसा सौभाग्य फिर आयेगा...?” स्वयं के द्वार पर भी उनकी आँखों में याचना आ गई थी।
उसी दिन मालूम पड़ा कि उनके सबसे बड़े पुत्र बिहार पुलिस में दारोगा हैं। एक पुत्र रेलवे में चल टिकट निरीक्षक हैं। एक भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के दिल्ली स्थित मुख्यालय में वरिष्ठ सहायक हैं। सबसे छोटा संघ लोक सेवा आयोग की तैय्यारी में है। फिर भी वो इतने सहज हो याचना करते हैं। लोगों की दुत्कार भी सह लेते हैं। कोई उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति का हवाला दे भिक्षाटन छोड़ने की सलाह देता है तो सविनय कहते हैं, “राजा....! ई कैसे छोड़ देंगे ? जड़ तो यही है। आखिर यही कर के इतना सब कुछ किए...। जड़े काट देंगे तो पेड़ सुखिए जाएगा न राजा...! वैसे भी बेटा-बहू कुछ भी हो जाए...हम तो वही हैं राजा...! हौ राजा ! अब निकालो एक-आध रुपैय्या...! फ़लाँ तीर्थ का चढ़ाई है।”










बुधवार, 25 मई 2011

देसिल बयना-82: देह में दम नहीं, बाज़ार में धक्का !

 

-- करण समस्तीपुरी

 

अजब लटारम है दुनियाँ में। पछिला कुछ हफ़्ता से ऐसन-ऐसन बदलाव देखे कि गीता-ग्यान याद आ गया, “परिवर्तन ही संसार का नियम है।” एक से दो हुए…. और एक से एक फ़करा भी सीखे ई बार रेवाखंड में। बियाह के उदेश्य से गये रहे गाँव। असली लौकिकता तो विध-व्यवहार में ही दिखता है न।

जाकी रही भावना जैसी…. हम तो जैसेही गंडकीपुर के देसी टीसन पर उतरे ऐसन-ऐसन देसिल बयना से भेंट हुआ कि साल भर और आपलोगों को किस्सा सुनायेंगे। हरि बोल। ई दफ़े फ़ागुन में लगन जोर नहीं पकड़ा था सो बैसाख-जेठ का लगन एकदम गहागही था। किसी तरह एक के दो भारा देकर टीसन से घर पहुंचे। अपना बियाह में हमही देर से पहुँचे थे बाकिये घर भर में पाहुन-कुटुम्ब का खूब गहमागहमी था।

लगन के घर में तो बुझले बात… सवा साल से इंतिजाम-बात करते रहिये फिर भी कुछ-न-कुछ घट्टी रहिये जाता है। दो दिन पहिले तो हम आये ही थे। एक दिन पहिले पता चला कि थोड़े कपड़ा लता और लावा-भुजाई का कुछ सामान चाहिये। खैर ई गुरमिंट में रस्ता-पैड़ा चकाचक बना दिया है। एगो संगी को साथ किये और फट से फटफटिया जोत दिये।

मिनिटे में पहुँच गये बजार। लेकिन का बताएं…. गाँव से बजार का रस्ता तो चकाचक मगर बजार में मौगत। बाप रे बाप मरवाड़ी बाजार और गुदरी का हालत तो और बेकार था। इधर पाँच साल में दोकान-दौरी तो ढेरेक बढ़ गया है मगर जगहवा तो ओतने है। दोकान तो दोकान…. सड़क के दोनो साइड ठेला और फ़ेरीवाला का भीड़ और बीच में कचरा का ढेर। लगन के ऐसन भीड़ कि उपर टहाटही धूप और नीचे कचरापारा…. और वही में लोगो रेला चलता था। का मरद का औरत…. सब धन बाइस पसेरी। टीसन चौक से लेकर गोबिन अगरवाल के दोकान तक एहि दिरिस था। हम भी किसी तरह झोला-झपटा को कंधा में टांगे एक हाथ से इंगलिस पैंट को एक बित्ता भर उठाए और दूसरे हाथ से नाक-मूंदकर कूद पड़े।

ई भीड़-भार में पबलिक के नाक में दम हो जता है मगर एकाध गो उचक्का सब को खूब हरियरी सूझता है। हमलोग बसंत मार्किट से निकल रहे थे। टीसन तरफ़ से मरद-जनानी का एक हांज भीड़-भार और गंदा-कचरा से बचते हुए साइडे-साइड जा रहा था। अपोजिट साइड से दु-चार लड़िका लोग आते दिखा। ससुरा सब चाले-ढाल से लुक्कर लग रहा था। उ में भी एगो खूब पहलवान जैसे डिल-डौल वाला लड़िका जो था उ किनार वाला मरद के लाइन से नहीं निकलकर बीच वाल औरतिया लाइन पकड़ लिया और दु-चार जर-जनानी को धकियाते हुए निकल गया। बेचारी जनानी सब अपना कपड़ा-लत्ता संभारते हुए कोढ़िया-मुँहझौंसा कह के रह गयी मगर कौनो मरदुआ का चौआ नहीं अलगा। हम थोड़ा अगियाये तो हमरा साथी हाथ पकड़ के पाछे खींच लिहिस…. “आहा… भैय्या… ई कौन खतरा को न्योता दे रहे हैं…. ई सब बौका गुरुप का आदमी है।” हमभी मन-मसोसकर रह गये।

हमरा मन तो भरिया गया था मगर कुछ नौजवान ऐसेभी थे जिनका जी लपलपाता हुआ स्पष्ट दिख रहा था। हमलोग वही रस्ता से बढ़्कर लड्डुलाल के दोकान पर चाट खा रहे थे। फिर वही दिरिस। मगर ई बार का जुआन सिकिया पहलवान था। ससुरा पाछे से आया और सामने से टर्न लेकर फिर वही गुरुप के में से एगो जनानी को धक्का मारते हुए बढ़ने लगा। जर-जनानी फिर कोढ़िया-सरधुआ की तो ई बार मरद-मानुस का भी पौरुष जगा। शायद सिकिया पहलवान का कमजोर देह-दशा देखकर। धोबिया-पछाड़ मार-मार के बढ़िया से धो दिया उ लुचबा को….।

उ तो सामने गया परसाद गुड़ वाले को दया आ गयी। बेचारे बीच में आकर छुड़ा दिये। मगर उ लुचबा भी भारी थेथर। एतना मार-पिटाई के बादो पहिल धक्का का जिकिर कर रहा है और अगर-बगर बोल रहा है। लोग तो एक बार फिर उमताया मगर रमेश जायसवाल उका हाथ पकड़ कर खींच लिये और डपटे, “मार ससुरा….. देह में दम नहीं और बाजार में धक्का लेने चला है। अरे उ तो देह-दशा से भी पहलवान है और उके पीछे पूरा बदमशहा गुरुप भी है। तू उका देकसी करने चला है…. तब हुआ न धुलाई सरफ़ इकसेल से। अभियो चेत जाओ नहीं तो जौन गत भी बचा हुआ है उ सब भी हो जायेगा। अपना औकात से बाहर काम नहीं करना चाहिये। देह में दम हो तभी बाजार में धक्का लेना चाहिये…. चल हट अब इहां से और अपना रस्ता नापो चुपचाप।

जयसवालजी के भाषण के बाद पूरे बाजार में सन्नाटा था मगर हमरे दिमाग में अजब झन्नाटा लगा था। तभी से हम सोच रहे थे कि उ पहलवान जैसा आदमी वही करम कर के सीना ताने चलता चला गया और ई सिकिया पहलवान  बेचारा पिटा गया आखिर काहे… ? अगर पहले की गलती नहीं थी तो इसने क्या गलत किया….? आखिर जयसवाल सेठ की बातों में जवाब मिल गया, “देह में दम नहीं बजार में धक्का।”

पहिले उचक्का के देह में दम था तो उ बजार में धक्का लेके भी बच गया। ई सिकिया पहलवान के देह में दम था नहीं लेकिन चला सरे-बाजार धक्का लेने तो हो गया ठोकाई। मतलब बात तो सही है। औकात-सामर्थ्य से बाहर जौन कोई काम करेगा उको तो भरना भी पड़ेगा। आखिर रहीम बाबा भी तो कहे हैं, “पैड़ ओतने पसारना चाहिये जेतना लंबा चादर हो।”