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बुधवार, 19 सितंबर 2012

स्मृति शिखर से – 24 : डढ़िया वाली


 - करण समस्तीपुरी

उसका नाम मुझे नहीं मालूम लेकिन पूरा गाँव नहीं तो कम से कम दो-चार टोले में वह इसी नाम से प्रसिद्ध थी। हमारे टोले के सभी घरों में उसका आना-जाना था। जमींदारों के दरबार भी जाती रहती थी। मैंने उसे जब से देखा वह वृद्धा ही थी। लंबा कद था, सफ़ेद बाल, गेहुआँ रंग। गले और और बाजुओं में गोदना। वह एक करुणामयी, कर्मठ और अनुशासित महिला थी। थोड़ा ऊँचा सुनती थी मगर कोई बहिरी कह दे और उसने सुन लिया तो जुबान खींच लेने को आतुर।

मेरी दादी कहती थी किसी जमाने में उसका परिवार बड़ा समृद्ध था। डढ़िया वाली के देह पर गोदने की जगह स्वर्णाभूषण लदे होते थे। पति की बीमारी और फिर मृत्यु ने उसके शृंगार के साथ-साथ समृद्धि भी छीन लिया था। निश्छल महिला क्या जाने इस जग की रीति! बची-खुची संपत्ति सहानुभुति देने वाले लेते गए। एक पुत्र था जिसे बड़ा होने पर महज एक पक्का घर और कुछ कट्ठे जमीन विरासत में मिली किन्तु माँ की करुणा और संघर्ष का मोल तो दूर सम्मान भी न कर सका। न तो वह माँ को कोई कष्ट देता ना ही माँ को उससे कोई कष्ट था फिर भी बीच में एक भाजक रेखा थी जिससे माँ की ममता और और संतान का कर्तव्य दो पाटों में बँट जाता था। बेटा पहले रिक्शा चलाता था। गाँव में ही। माँ को खुशी थी। प्रातः-सायं मेहनतकश बेटे को देख छाती शीतल हो जाती थी। इधर जिस गति से परिवार बढ़ रहा था उसी गति से संसाधन घट रहे थे। बेचारा दिल्ली चला गया।

पृष्ठभूमि कोई हो, कुछ परंपराएँ, कुछ रुढियाँ, कुछ किंवदन्ति भारत के हर घर की सच्चाई है। शायद ‘सास-बहू’ संबंध भी इनमें से एक है। डढ़ियावाली का घर भी इसका अपवाद नहीं था। जब आत्मज ने नहीं समझा तो...! कभी-कभी आँखें नम हो जाती थीं किन्तु जर-शरीर से भी ममता का वही सोता कल-कल बहता था जो अमूमन किसी भी माँ में होता था। बेटे के बाद पोते-पोतियाँ को खाने-पीने का दुख न हो, इसलिए वह टोले के कुछ घरों में काम करने लगी थी। हमारा घर भी उनमें से एक था।

वह उस समय से हमारे घरों में आने लगी थी जब गाँव में जल की आपूर्ति कुएँ और तालाबों से होती थी। सुबह-सुबह कुएँ से पाँच-सात घरों में घड़ा भर-भर पानी पहुँचाने के बाद कुछ घरों में घर-आँगन भी बुहार आती। चौका-बरतन का काम उसके बाद होता था। बाद में घर-आँगन में चापा-कल हो जाने से बूढ़ी को भी कुछ आराम हुआ था। वैसे अवस्था बढ़ने के साथ-साथ शरीर का बल भी जाता रहा था।

बाद के दिनों में वह कुछेक घरों में ही जाती-आती रही थी। मेरी दादी और माँ से उसे कुछ अतिरिक्त स्नेह था। फलस्वरूप मुझ तीनों भाईयों से भी। थी वह दादी की उमर की ही मगर दादी को चाची बोलती थी। कभी-कभी लड़ भी लेती थी। अनुचित बात कभी भी किसी की भी नहीं सहती थी। काम-काज के बाद जब माँ उन्हें ‘खाना’ देने लगती तो वह रसोईघर में जा बर्तनों से ढक्कन हटाकर देख लेती थी कि उसमें हम तीनों भाइयों के दोहराने के लिए पर्याप्त भोजन बजा हुआ है या नहीं। यदि कम लगता तो अपने हिस्से से निकलवा देती और कभी-कभार तो बिल्कुल भी नहीं लेती थी, माँ के लाख जिद के बावजूद।

दरबार के जमींदार के घर भी जाती थी। संपन्नता से विपन्नता का विषरस पी रही वृद्धा का ईमान जाँचने की गरज से उन्होंने घर में कुछ आभूषण और नगदी बिखरे छोड़ दिए थे। डढ़ियावाली सारे घरों की झार-बुहार करने के बाद उन आभूषणों और नगदी गृहस्वामीनी को देते हुए बिफ़र पड़ी, “हूँ....! सब समझती हूँ मैं। आप जमींदारों के बटुए में भी एक टुक सुपारी न मिले और गहने-पैसे बिछौना पर बिखरे रहेंगे...? सब समझती हूँ...। आप मेरा ईमान जाँच रहे थे। अरे जब भगवान का दिया अपना सर से पैर तक का गहना नहीं रहा तो किसी के घर चोरी किए क्या रहेगा....!” बुढ़िया पैर पटकती हुई चली आई थी। लाख बुलावे के बाद भी उनके द्वारे कभी पैर नहीं दिया फिर।

डढ़िया, उसका मायके था। मेरे गाँव के पास ही पड़ता है। रेवाड़ी ढ़ाला चौक के उस पार। बूढ़ी जब भी नैहर जाती तो मेरी माँ से जरूर मिल कह जाती कि ज्यादा दिन नहीं रहेगी वहाँ। दादी के पैर छू जाती। वापसी में पैदल आये तो आये मगर जो भी पैसे हों उनमे से अपने पोते-पोतियों के लिए एक और हम तीनों भाइयों के लिए पाँवरोटी का तीन डब्बा जरूर लाती थी।

एक बार सन्नीपात के संक्रमण से मैं बहुत अधिक बीमार पड़ गया था। चालिस-पैंतालिस दिनों तक तेज ज्वर रहा। डढ़ियावाली सबका काम-धाम छोड़ हमारे घर ही बैठी देवी-देवताओं को गोहराती रही थी। कई ओझा और भगतीन के घरों के चक्कर भी लगा आई थी। बड़ी स्नेह-वत्सल थी। हमारे उपनयन में अतिथियों की भीड़ थी। संभालने के लिए उसकी भतीजी को भी बुला लिया था माँ ने। बुढ़िया गुस्सा गई। “ऐं...! हमरा बौआ सबके जनेऊ है और हम इतना भी काम नहीं कर सकते हैं?” सारा काम भाग-भाग कर करती रही थी। माँ की दी हुई नई साड़ी पहन कर बड़ी खुश हुई थी।

बेटे-बहू, पोते-पोतियाँ सब दिल्ली चले गए थे। डढ़िया वाली नहीं गई। जिंदगी के चौदह आने जिस मिट्टी में कट गए, जो अपने सभी सुख-दुःख का गवाह रहा उसे छोड़ कहाँ जाएँ! जीए यहाँ, मरने के लिए दिल्ली जाएँ!!” उसके अपने तर्क थे। गाँव में तो नहीं, अपने घर में अकेली रह गई। जब तक शरीर चला निर्वाह हुआ। जब अशक्त हो गई तो लादकर ले गए। बेचारी एक साल भी न रह सकी दिल्ली में। सर्दी ऐसी पड़ी कि लकवा मार गया। बेटा लाकर गाँव में छोड़ गया। बहू रह गई थी “सेवा” करने के लिए।


साल में तीन बार हमारे यहाँ घरी पावनि हुआ करता है। कुल-देवता को खीर-पूरी चढ़ाया जाता है। इतने दिनों में उसे तीनों घरी की तिथि याद हो गई थी। चँद्र टरै, सूरज टरै मगर बुढ़िया उस रात खाना नहीं खाती तब तक जब तक हमारे घर से कोई उसके लिए खीर-पूरी लेकर न जाए। डढ़िया वाली का इंतजार और उसकी बहू के व्यंग्य-वाण साथ-साथ चलते रहते थे...! जब माँ खाने में कुछ विशेष पकाती तो हमारे हाथों डढ़ियावाली के लिए भिजवा देती थी। मैं ज्यादातर जाने से कतराता था। मुझे उसे देखकर बड़ा दुख होता था। एक तो बुढ़िया रोने लगती थी और दूसरी उसकी दुरावस्था। बेचारी निर्धनता में भी साफ़-सफ़ाई का बड़ा ख्याल रखती थी और उस अवस्था में वह... मल-मूत्र के साथ घंटो खाट पर पड़ी रहती।

हर रविवार की भाँति पिताजी देखने गए थे। इस बार बहू की चिक-चिक नहीं दहारें गूँज रही थी। डेढ़ साल खाट पकड़ने के बाद बुढ़िया परलोक सिधार गई थी। मैंने बहुत दिनों बाद उसे देखा था। उसे नहीं उसके मृत शरीर को। बाहर पड़ी थी। शायद बाहर आकर ही मरी थी। बहू अलाप में रो-रो कर बता रही थी, रात के अंतिम पहर बुढ़िया उससे झगड़ा कर लकवाग्रस्त शरीर को बाहर घसीट लाई थी। आगे प्राण-पखेरू साथ न दिए।

बुधवार, 12 सितंबर 2012

स्मृति शिखर से - 23 : मेरे जीवन का एक दिन


- करण समस्तीपुरी
अपने देश में सितंबर मास की एक विशेषता यह है कि राष्ट्रीय संस्कृति जीवंत हो उठती है। पहले शिक्षक-दिवस फिर हिन्दी-दिवस। दोनों का मेरे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। मेरे सभी शिक्षकों का मेरे जीवन और चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। माता-पिता के उपरांत अध्यापकों का ऋण ही है जिससे कभी उॠण नहीं हुआ जा सकता। मैं अपने सभी गुरुओं को सादर नमन करते हुए हिन्दी देवी को स्मरण करता हूँ।

हमारे गाँव के विद्यालयों में शिक्षा हिन्दी-माध्यम से होती है। किन्तु मुझे हिन्दी में सुलेख और शुद्ध-लेखन की महिमा का ज्ञान प्राप्त हुआ एक विज्ञान-शिक्षक से। अंसारी बाबू। नाम तो पढ़ा ही होगा पिछले अंक में। बड़े ही सुहृद शिक्षक थे। तदोत्तर माध्यमिक कक्षाओं में श्री गणेश बाबू और ठाकुर जी जैसे शिष्य-वत्सल अध्यापकों का सानिध्य मिल गया। ठाकुरजी उस वित्तरहित उच्च विद्यालय के प्रधानाचार्य थे और गणेश बाबू हिन्दी के अध्यापक।
उपर्युक्त अध्यापक-द्वेय की अध्यापन शैली बड़ी रोचक है। श्रीवर ठाकुरजी ज्ञान के अक्षय-कोष हैं। रेवाखंड में उनकी प्रतिष्ठा एक ऐसे लोकप्रिय संपूर्ण शिक्षक की है जिन्हें कला एवं साहित्य विषयक सभी संकायों में निपुणता प्राप्त है। उनके पाठन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता थी उसकी जीवंतता। वे सिर्फ़ विषयगत ज्ञान तक ही सीमित नहीं रहते थे। विषयानुसार वे वेद, उपनिषद, स्मृति, शे’र-ओ-शायरी, ग़जल, लोकगीत, लोक-संस्कृति यहाँ तक कि फिल्मी गानों तक के पुट देते रहते।

गणेश बाबू का शिक्षण-शिल्प अभिनयात्मक था। वे किसी पाठ के वाक्यों को नाटकों के संवाद की तरह बोलते थे। रचना और रचनाकार की पृष्ठभूमि, एक-एक अंश के शाब्दिक अर्थ, भावार्थ, काव्य-तत्व, साहित्यिक मर्म तक का परिचय करवा देते थे। विशेषतः भक्तिकालीन कवियों को पढ़ाते हुए उन्होंने मेरे अंदर हिन्दी साहित्य के लिए जो अनुराग उत्पन्न कराया कि फिर मैं उससे अलग कभी नहीं हो पाया। महाविद्यालय में विज्ञान के मोह ने घेरा अवश्य था किन्तु साहित्य के आवेग ने शीघ्र ही मुक्ति दिला दी।

स्नातक-स्नातकोत्तर कक्षाओं में भाषा, साहित्य, साहित्यिक विधा, साहित्यकार, रस-अलंकार, आलोचना, समीक्षा, भाषा- विज्ञान यही सब होता रहा। मैं आरंभ से ही कुछ कल्पनाजीवी रहा हूँ। वास्तविक संसार से अलग भी मेरा एक संसार है, जिसमें मैं सांसारिक दायित्वों से विलग उन्मुक्त विचरण करता रहता हूँ। कभी-कभी उसी कल्पनालोक से फूट पड़ती है कोई काव्य-किरण या कथाधारा। कभी कोई हास्य। तीस बसंत पार करने के बावजूद मेरा कल्पनालोक बालावस्था की तरह चंचल है। इसमें अक्सर निरर्थक और उटपटांग विचार भी आते रहते हैं।
पाँच-सात वर्षों तक साहित्य-साहित्यकारों को घोंट-घोंट कर पीता रहा किन्तु एक लालसा कल्पनालोक में ही पूरी हो पाती थी। लालसा यह जानने की कि साहित्यकार भला अपने वास्तविक जीवन में होते कैसे हैं? क्या उनमें कोई परामान्विक शक्ति होती है? या वे भी हमारी तरह हमारे ही समाज के सामान्य प्राणी हैं? पुस्तकों में इतनी अच्छी-अच्छी बातें लिखने वाले क्या बोलते भी वैसे ही हैं? क्या किताबों के वही आदर्श उनके व्यावहारिक जीवन में भी होते हैं? आदि-आदि। ये सभी प्रश्न या तो अनुत्तरित रह जाते अथवा मेरी कल्पना ही उसका कुछ मनपसंद उत्तर गढ़ लेती।

धीरे-धीरे कविता-कहानी लिखने की प्रक्रिया बढ़ी तो कुछ परिचितों ने हास्य के लिए, कुछ ने उपहास के लिए और कुछ ने उत्साह के लिए मुझे भी ‘साहित्यकार’ कहना शुरु कर दिया। मैं बड़ी दुविधा में पड़ जाता। एक बात और रही है कि मैं अपने आचरण के प्रति बड़ा सजग रहता हूँ। मैं अभी तक स्वयं को हिन्दी साहित्य का महज एक विद्यार्थी ही समझता हूँ किन्तु तभी बड़ी कठिनाई हो जाती थी। मैं सोचता चलो कहने वालों का मान रखने के लिए ही सही किन्तु साहित्यकार सुलभ आचरण तो कर लूँ। लेकिन मुश्किल ये कि मैं ने किसी साहित्यकार को देखा ही नहीं था। उनका आचरण भला क्या जानता! जीवन अपने रास्ते बढ़ता गया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद कुछ ऐसे लोगों से भेंट अवश्य हुई जिनमें साहित्य के लिए अनुरक्ति थी और कुछ ऐसे लोग भी मिले जो स्वनाम पर एकाध पुस्तकों का ‘जुगाड़’ लगा स्वयं पर साहित्यकार का लेबल चस्पा कर पब्लिसीटी पाने का कोई अवसर नहीं गँवाना चाहते थे। शायद उस क्षेत्र में रहता तो किसी सच्चे साहित्यकार से भी भेंट हो ही जाती। किन्तु नैतिक विवशता नें पत्रकारिता से मोहभंग करवा दिया और व्यवसायिक एवं पारिवारिक दायित्वों ने उस ‘लालसा’ को निद्रासन दे दिया।

सन 2009 में चाचाजी (मनोज कुमार) हिन्दी का ब्लाग आरंभ कर मेरी लेखनी में भी स्याही भरने लगे। जीवन एक बार फिर व्यवसायिक राजपथ के समांतर उन्ही पुरानी पगडंडियों पर भागने को मचलने लगा। काव्य-प्रसून, कथांजलि, देसिल-बयना, आँच, फ़ुर्सत में, काव्यशास्त्र...! वह लालसा फिर जग गयी। साहित्यकार को देखने की लालसा। साहित्यकार से मिलने की लालसा। उन्हें स्पर्श कर यह निश्चित कर लेने की लालसा कि वे भी इसी समाज के स्थूल प्राणी ही हैं। किन्तु ये प्राणी मिलेंगे कहाँ? यह प्रजाति या तो तेजी से विलुप्त होती जा रही है या कुकुरमुत्ते की तरह ऐसे उग रही है कि भ्रम चहुँ दिश। जो नामचीन हैं वहाँ तक पहुँचना दुर्लभ और जिनका नाम नहीं है उनकी पहचान कठिन।
कुछ मेरी भी बात ...
मित्रों!
जब ब्लॉगिंग में पहला कदम रखा था, तो कल्पना भी नहीं की थी कि यह सफर एक हज़ारवीं पोस्ट तक पहुँच जाएगा। पर आज यह सपना सच हुआ। आपके प्रोत्साहन की ऊर्जा हमें मिलती रही और हम निरंतर आगे बढ़ते रहे। लगभग तीन साल पहले इसी महीने में इस ब्लॉग पर पहली पोस्ट प्रकाशित की गई थी और आज हम हाज़िर हैं हज़ारवीं पोस्ट के साथ। हमें इस बात का संतोष है कि हमने एक भी ऐसी पोस्ट नहीं प्रकाशित की जिससे ब्लॉग जगत की मर्यादा को सामान्यतः और किसी ब्लॉगर को विशेषतः क्षति पहुंचती हो।
इस ब्लॉग की कई रचनाओं को विभिन्न मंच, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त हुआ। ... और आज हज़ारवीं पोस्ट तक आते-आते इस ब्लॉग की रचनाओं को जो सम्मान मिला है उसने हमारा मनोबल काफ़ी बढ़ाया है और हमें आत्मसंतुष्टि प्रदान की है। ऐसे में इसी ब्लॉग पर स्व. आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री से हमारी भेंट-वार्ता की पांच अंकों की श्रृंखला का “अलोचना” जैसी प्रतिष्ठित सहित्यिक पत्रिका, जिसके प्रधान संपादक डॉ. नामवर सिंह हैं, के ताज़े अंक (पैंतालीस) में स्थान मिलना एक बड़ी उपलब्धि है।
जहाँ यह अवसर हमारे लिए गर्व और उत्साह का है वहीं एक उत्तरदायित्व के बोध का भी है. अतःहम और अधिक जिम्मेदारी के साथ इस ब्लॉग जगत में अपनी भूमिका निभाते रहें, इस प्रण के हम अपनी पूरी टीम के सदस्य सर्व श्री परशुराम राय, हरीश गुप्त करण समस्तीपुरी और सलिल वर्मा के साथ आपके स्नेह और प्रोत्साहन की आकांक्षा रखते हैं! - मनोज कुमार


उन्हीं दिनों प्रादेशिक समाचार पत्र के अंतर्जालीय प्रारूप में एक दो-चार पंक्तियों की खबर पढ़ी। दर्जन भर पशु-पक्षियों के पालन-पोसन हेतु हिन्दी के प्रख्यात कवि आचार्य जानकीबल्लभ शास्त्री को अपने घर के जमीन का एक हिस्सा ‘फिर’ बेचना पड़ा। उनकी कविता पढ़ी थी नवम या दशम कक्षा में। ‘किसने वह बाँसुरी बजाई’। मन बरबस उस बाँसुरी के स्वर को ढुँढने लगा। यूँ तो आचार्य जी रहते हमारे पास के शहर मुजफ़्फ़रपुर में ही थे किन्तु उनसे मिलने की योजना सुदूर दक्षिण भारतीय शहर बंगलोर में आने के बाद बनी। छठ-पूजा में घर जाना निश्चित हुआ। चाचाजी (इस ब्लाग के व्यवस्थापक) से बात हुई तो उन्होंने तत्क्षण अनुमति, सहमति और साहचर्य का भरोसा दे दिया।

नवंबर 2010, हम सभी लोग गए मुजफ़्फ़रपुर। चाचाजी का आरंभिक जीवन उसी शहरclip_image001 में बीता था किन्तु कथित विकास के बयार ने अपने शहर को भी अजनबी कर दिया था। एक छोटे से संघर्ष के बाद ब्रह्मपुरा रेलवे कालोनी के अपने उस निवास को ढ़ूंढ पाए जिनमें उनका बचपन, तरुनाई और छात्र जीवन बीता था। भावुक हो गए थे। भावनात्मक स्मृतियों का एक युग साथ आई चाचीजी के आँखों से भी गुजर गया था। दुल्हन बन कर पहली बार उसी घर में जो आई थीं।

चाचाजी हम सभी को बताने लगे कि तब जहाँ और जिस चौकी पर हम बैठे थे वहीं और उसी तरह की एक चौकी पर बैठ उन्होंने प्राथमिक से स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई और फिर सिविल-सेवा की तैय्यारी भी आरंभ किया था। भावनाओं के आवेग ने कंठ तो अवरुद्ध कर ही दिया था चाचाजी की पनियाई आँखें भी कुछ खोज रही थी, शायद चौकी से लगा रहने वाला वह मेज जिस पर उनकी किताबें और केरोसिन से जलने वाली लालटेन रहा करते थे।
उसी शहर में आचार्य जानकीबल्लभ शास्त्री भी रहते थे। ‘चतुर्भुज-स्थान’ के पास। उस स्थान की विसंगति देखिए कि भगवान विष्णु के नाम पर बसा मुहल्ला उत्तर बिहार के सबसे बड़े ‘रेड-लाइट’ एरिया के रूप में जाना जाता है। रामबाग रोड से होकर जाना पड़ता है। रामबाग...! चाचाजी की आँखों में यादों का एक दौर उमर आया था। इसी रास्ते पर तो जिला स्कूल हुआ करता था... उनकी माध्यमिक शिक्षा का मंदिर।

प्रगति की तेज गति ने शहर के यातायात की गति को अत्यंत ही मंद कर दिया। उस पर से तुर्रा यह कि हवाई-पुलों ने आने और जाने वाली सड़कों को भी बाँट दिया था। बड़े संघर्ष के बाद हम आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी का घर खोज पाए। ‘निराला-निकेतन’। एक बड़े से नीले काष्ठ-फ़लक पर सफ़ेद अक्षरों में अंकित था। सिर किसी तीर्थ सी श्रद्धा से नत हो गया। मुख्य-द्वार से कोई बीस मीटर की दूरी पर बने दो-मंजिला भवन के देहरी में बिछी चौकी पर आचार्य जानकीबल्लभ शास्त्री विराजमान थे। कृषकाया पर आधे बाँह की बनियान और कमर से नीचे धोती लपेटे। शरीर का निम्नार्ध पक्षाघात से शून्य हो चुका था।

प्रांगण में अनेक गाएँ और बैल बँधे थे। उनमें से कुछ खा और कुछ पगुरा रहे थे। clip_image001[5]कुत्ते-बिल्लियों की निर्भय अठखेलियाँ चल रही थी। कुत्ते-बिल्लियों के बच्चे साधिकार आचार्यजी की गोद में, काँधे पर, सिर पर, विछावन पर खेल रहे थे। शास्त्रीजी कभी उन्हे सस्नेह सहलाते और कभी सामने पड़े बिस्किट के डब्बे से बिस्किट तो कभी कटोरे में भर-भर कर दूध पिलाते थे। मानवेत्तर प्राणियों के लिए एक महामानव के हृदय में इतनी सदय संवेदना देखकर मन श्रद्धावनत हो गया।

सच में वह निराला-निकेतन था। आचार्यजी के अनुसार निराला-निकेतन के दरबाजे सबके लिए खुले थे। चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी या कोई। जो चाहे, आए, रहे। वे किसी को भगाएँगे नहीं, जाने को नहीं कहेंगे। उस परिसर के अंदर जो भी आए उसका भोजन और आश्रय देना शास्त्रीजी के कर्तव्यों में सबसे ऊपर था।

उम्र नब्बे के पार हो चली थी लेकिन वाणी में वही ओज था। शुद्ध हिन्दी बोलते थे किन्तु क्लिष्ट नहीं। बीच-बीच में कई बात भूल जाते। उन्हें दुहराते थे। स्मृति की कड़ियाँ टूट रही थी मगर छूट नहीं पाती थी। बड़ी ही आनंद-दायक सुदीर्घ वार्ता हुई। उनके जीवन की अंतिम बड़ी भेंटवार्ता। बड़े ही अपनेपन से बतियाए थे। हमारे अबोध, नादान, तार्किक सभी प्रश्नों के उत्तर दिए। अपने निराले जीवन की हरेक परत खोलते गए। उनके समय, उनका साहित्य और उनका व्यक्तित्व से संबंधित हमारी सभी जिज्ञासाओं का शमन अपने स्नेहिल वाणी में सयंत उत्तरों से करते रहे।

आचार्यजी का व्यकित्व उद्दात था। जिजीविषा उद्दाम थी। उनके आदर्श उनके व्यवहारों में निरुपित थे। पितृदेवो भवः! उन्होंने अपने आवास में ही एक मंदिर बनवाकर पिता clip_image001[19]की मुर्ति स्थापित करवा दी थी और नित्य प्रति उन्हीं की पूजा करते थे। जीव मात्र के लिए स्नेह! दर्जनों पालतू और यायावर पशु उनकी संवेदना में समादृत थे। कर्म ही पूजा है! शिक्षण और साहित्य-साधना ही उनके तीर्थ-व्रत थे। जहाँ पर दिन में बैठने में भी हमें मच्छरों से महाभारत करना पड़ रहा था वहीं शास्त्री जी रात-रात भर जग कर कई प्रबंध काव्य रचे। जन भावना का गायक! सिर्फ़ उपलब्धि पूछने पर यह कहते हुए पद्मश्री सम्मान ठुकरा देना कि जब मेरी उपलब्धि ही पता नहीं है तो सम्मान क्यों दे रहे हैं किन्तु मेरे आग्रह पर छियानबे वर्ष की उम्र में भी राग केदार के अलाप के साथ प्रसिद्धि और लोकप्रियता का पर्याय गीत ‘किसने यह बाँसुरी बजाई’ गाकर सुनाते हैं। औदात्त प्रणय...! उस समय भी ‘राधा’ नामक प्रबंध काव्य में छपी अर्धांगिनी के चित्र को देख उनकी आँखों ने जैसे प्रणय की मूक परिभाषा कह दिया हो। अतिथि देवो भवः! बीमार पत्नी को भी हमारे आगमन की सूचना देने की व्याकुलता। दोनों प्राणी की शारीरिक अशक्तता के बावजूद भोजन करके जाने का आग्रह और विदा लेते समय पुनः आने का अनुरोध...! उनके कहे एक-एक वाक्य सूक्ति से लगते हैं। जैसे “मैं भाग्यशाली हूँ इस अर्थ में कि मुझे कोई जानता ही नहीं है।” “प्रेम करना एक बात है और प्रेम पर भाषण करना एक और बात।” “अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं। बीमार नहीं रहेंगे तो या तो पियक्कड़ हो जाएँगे या पागल।” जीवन के तिक्त अनुभवों ने उनकी सूक्तियों में चमत्कारिक व्यंग्यार्थ भर दिये हैं।

शास्त्रीजी से हुई भेंट को दो साल हो गए। उनकी भी इच्छा थी और हमने भी सोच रखा था कि अब जब कभी गाँव जाएँगे उनसे मिलकर आयेंगे। किन्तु अगली बार हमारी गाँव-यात्रा से पहले ही आचार्यजी गोलोक-प्रस्थान कर गए। ‘निराला-निकेतन’ में बीते एक-एक पल को हमने ब्लाग पर पहले से ही संजोए रखा है। सत्य कहूँ तो मेरे जीवन से यदि वह एक दिन निकाल दें तो बाकी हिस्सा अत्यंत हल्का हो जाएगा। वह एक दिन मेरी पूरी जिन्दगी है। किन्तु आज उन्हें स्मृति के शिखर पर लाने का श्रेय मैं श्री सचिन पूरी जी को देना चाहूँगा।

सचिन पूरी जी (+91-9860224624) महाराष्ट्र के अहमदपुर शहर में अध्यापन कार्य करते हैं। आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री के कृतित्व पर शोध-कार्य कर रहे हैं। पिछले दिनों सचल दूरभाष यंत्र की घंटी बजी। उधर से एक अनजान पुरुष आवाज आई। वे किसी पत्रिका में मेरा ‘इंटरव्यू’ छपने पर बधाई दे रहे थे। रातो-रात सेलिब्रिटी होने के भाव को छिपाते हुए मैंने साश्चर्य कहा कि आजतक किसी पत्र-पत्रिका को इंटरव्यू दिया ही नहीं मैं ने तो छपा कैसे ? तब उन्होंने बताया कि मेरा नहीं (वही तो...! मैं कब से इतना बड़ा सेलिब्रिटी हो गया?) बल्कि आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी का वह इंटरव्यू छपा है जो हमने किया था। पत्रिका है “आलोचना”। वहीं से मेरा नंबर भी उन्हें मिला। यही सज्जन हैं सचिन पूरी। तभी तो मैंने उन महानुभाव को धन्यवाद कह दिया किन्तु विश्वास अब हो रहा है जब ‘आलोचना’ का वह अंक हाथ में है। मैं नहीं जानता किन्तु यदि यह उपलब्धि है तो मैं इसे आज इस ब्लाग के हजारवें प्रविष्टी के साथ आपसे शेयर करता हूँ। इसके वास्तविक अधिकारी आप ही हैं।

बुधवार, 5 सितंबर 2012

स्मृति शिखर से – 22 : तस्मै श्री गुरुवे नमः !

 

-- करण समस्तीपुरी

हमारे मिथिलांचल में एक कहावत प्रचलित है, “नहि वो देवी आ नहिये वो कराह !” वही बात सब जगह है। अपने संस्कृति प्रधान देश में कितनी ऐसी सुप्रथा थीं जिस पर सहज गर्व हो। किन्तु पछुआ पवन के तेज झोंके में ये सब लुप्त होते जा रहे हैं। ऐसी ही स्तुत्य प्रथा में से एक थी "आदर्श गुरु-शिष्य परम्परा"। किसी समय में "गुरुर्ब्रहम्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ! गुरुः साक्षात परब्रहम्म तस्मै श्री गुरुवे नमः !" जैसे आर्ष मंत्र भारत-भूमि पर सहज ही व्यवहारिक थे। राम, कृष्ण, आरुणि, उपमन्यु, कौत्स, एकलव्य और विवेकानंद जैसे गुरुभक्त इस महान श्रृंखला के चिरपरिचित कड़ी हुए हैं। किन्तु आज ये सभी चरित्र पुस्तकों में ही जीवित हैं।

विभिन्न नव आयाम, शाखा, प्रशाखा, उप-शाखाओं के साथ शिक्षा का विस्तार चरम पर है। किन्तु नहीं है तो वह आदर्श परम्परा...! आज तो जहाँ तक दृष्टि जाए गुरु की गर्दन काटने वाले दृष्टद्युम्न और शिष्य का अंगूठा लेने वाले द्रोणाचार्य मिल जाएँगे। दोष किसे देंगे? सब कुछ बदल गया है। सर्वत्र नयी चुनौतियाँ हैं। संक्रमण के इस समय में संबंधों ने भी व्यावसायिक चोला पहन रखा है। इसीलिए "नहि वो देवी आ नहिये वो कराह !"

और जो भी हो मगर प्रति वर्ष सितम्बर मास के प्रथम सप्ताह में अपने देश में गुरुभक्ति की बयार जरूर बह जाती है। साल मे एक ही दिन सही लेकिन पाँच सितम्बर को फिर से "गुरुर्ब्रहम्मा गुरुर्विष्णु" हो जाते हैं। चलिए इसी बहाने मैं भी स्मृति-शिखर पर बसे ‘गुरुर्देवो महेश्वरः’ का पुण्य स्मरण कर लूँ।

मेरा आद्योपांत शैक्षिक जीवन रेवाखंड में ही व्यतीत हुआ। मैं स्वयं को इस अर्थ में बडभागी समझता हूँ कि विद्यालय हो या महाविद्यालय या विश्वविद्यालय... गुरुजनों का विशेष अनुग्रह मुझे सदैव मिलता रहा। विद्यालय में तो इस विशेष अनुग्रह का दो कारण मुझे परिलक्षित होता है। प्रथम यह कि मेरे पितामह (बाबा) गाँव के आदर्श मध्य विद्यालय के प्रतिष्ठित प्रधानाध्यापक रह चुके थे और दूसरा अपने मुँह से कहते तो नहीं बनता है मगर बात यह कि मैं भी पढाई-लिखाई में जरा सचेष्ट सचेष्ट था। बाबा के जमाने से संबंध होने के कारण गाँव के मध्य विद्यालय से कुछ अधिक ही लगाव था। बाद में क्रिकेट के मैदान होने के कारण वह लगाव और बढ़ता गया।

उसी मध्य विद्यालय में अध्यापक थे अंसारी बाबू। नाटा कद, गौर वर्ण, सुगठित शरीर पर कमीज और खूब चौड़ी मोहरी वाला पजामा पहने अंसारी बाबू के मुंह से गमकौआ जर्दा का सुवाष हमेशा निकलता था। कोई चार मील दूर से डायनावो वाली पुरानी साइकिल पर पान चबाते, खानखानाते चले आते अंसारी बाबू को देखते ही स्कूल के उद्दंड छात्रों की सकपकी बँध जाती थी। जब मैं विद्यालयी छात्र था तब तक विद्यार्थियों में आज्ञाकारिता और शिष्टाचार का स्थान उदंडता लेने लगा था। शिक्षकों का भी भरसक यही प्रयास रहता था कि किसी तरह वे इस उद्दंडता के शिकार न हों। किन्तु इस संक्रमण काल में भी अंसारी बाबूक शिक्षक के रूप में एक विशिष्ट स्थान रखते थे।

बड़े-बड़े आक्रामक तेवर वाले शिक्षकों को भी लड़के धत्ता बता देते थे मगर क्या मजाल जो अंसारी बाबू के सामने अनुशासनहीनता दिखाएँ...! एक बात और थी अंसारी बाबू छड़ी को भी छूते थे छठे-छमासे।

मैं तभी छठे दर्जे में था। एक दिन हमारे वर्गसाथियों ने मध्यकालोपरांत खाली घंटी के सदुपयोग की योजना बनाई। निश्चित हुआ कि स्कूल के पीछे वाले सुगबा बेर से लदे कँटीले पेड़ पर अक्रमण किया जाए। इस योजना में बाधक बस एक मात्र अंसारी बाबू का भय ही था। इसीलिए सब की अलग-अलग ड्यूटी लगी। मेरे साथ-साथ एक और लड़के को चौकीदारी दिया गया कि अंसारीजी को इस दिशा में आते देखकर जोर से कू करना...!

कुछ पेड़ पर चढ़े। कुछ पेड़ के नीचे बेर चुनने लगे और हम रखवाली करने लगे। बेर-तोड़ो अभियान प्रगति पर था। मेरा साथी चौकीदार लघुशंका के लिए चला गया था और मैं एक अज्ञात भय और पहली बार चोरी के बेर खाने के रोमांच के द्वंद में फँसा हुआ था। एक सज्जन मंद कदमों से चलते हुए कब मेरे पास पहुँच गए मुझे भान नहीं रहा। सहसा बेर चुनने वाले लड़कों से एक ने चीखते हुअ कहा, “भाग रे... मास्साएब..!” कुछ पेड़ से धमाधम कूद भागे, कुछ पकड़ाए और कुछ अभी भी दम साधे पेड़ के कंटीली डालियों पर ही आश्रय लिए रहे। पकड़ाए चोर में मैं भी था।

अपराध तो सबका समान ही था मगर बैक-रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए सबको सजा सुनाई गई। यह हमारा पहला स्कूली अपराध था अतः पारिवारिक गरिमा और विद्यालय आने का निहित उद्देश्य समझा कर बाइज्जत बरी कर दिया गया। तभी ज्ञात हुआ कि यह सारा इन्साफ अन्सारी बाबू की कचहरी में ही हो रहा था। ये था हमारे आदार्श अध्यापक से हमारा प्रथम साक्षात्कार! तदोपरांत अंसारी बाबू के प्रति जो असीम श्रद्धा उत्पन्न हुई कि आदर्श शिक्षक की बात होते ही हठात वही स्मरण आते हैं। हालांकि छठे वर्ग में अंसारी बाबू की कोई घंटी नहीं थी सो उनकी शिक्षण पद्धति और क्षमता से दो-चार तो नहीं हो सका मगर जब-तब व्यक्तिगत सहायता के लिए उनके पास पहँच जाता था और वे भी वात्सल्यपूर्वक हमारी समस्याओं का निदान करते थे।

इस प्रकार मैं वर्ग-प्रोन्नति परीक्षा में उत्तीर्ण हो सप्तम कक्षा में पहुँच गया किन्तु मन में अवसाद था। मेरी के प्रतिद्वंदी सहपाठी वर्ग में प्रथम आयी थी और मुझे दूसरा स्थान मिला था। विगत पाँच वर्षों से प्रथम स्थान का अधिकारी बालमन बालिका-सहपाठी के आगे झुकने के लिए तैय्यार नहीं था। विद्यालय से यह वितृष्णा होने लगी कि इन लोगों ने जान-बूझ कर ऐसा किया है। पुनश्च यह अंसारी बाबू का ही सरल सानिध्य और उत्साहवर्धन था कि हम एक पुनः दुगुगा हिम्मत से जुट गए। एकटा विशेष बात यह थी कि सातंवी कक्षा के वर्ग-शिक्षक वही थे। पहली घंटी मे गणित और तीसरी मे विज्ञान की कक्षा लेते थे। फिर तो मेरी जिज्ञासा को पंख लगते चले गए। यह मुझे अब समझ में आ रहा है कि यह आशीर्वाद अंसारी बाबू का ही था जो मैं अंतरस्नातक तक स्वतःस्फूर्त विज्ञान और गणित की पढाई करता चला गया।

इसी कक्षा की एक घटना ने मुझे हिन्दी के तरफ़ अनुरक्त किया। अनसारी बाबू हमारा गृहकार्य चेक कर रहे थे। एक सचेष्ट विज्ञान-शिक्षक की मुश्तैद नजर से बरतनी और व्याकरण सम्बन्धी दोष का बचना भी असंभव था। फिर मेरी सफाई कि ‘विज्ञान में इतना चलता है’ के जवाब में अंसारी बाबू कहते हैं, "नहीं...! यह गलती है और गलती कहीं नहीं चलती है। क्या विज्ञान अथवा गणित के किताब में हिज्जे और वाक्य रचना ग़लत रहते हैं?” मैं निरुत्तर था। बाद में निश्चय किया कि यथासंभव शुद्ध और सही लिखूँगा। इसी प्रयास में हिन्दी में जो अनुरक्ति हुई उसीकी परिणति है कि आज आपके सामने उपस्थित हूँ।

एक शिक्षकक रूप मे अंसारी बाबू की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी, सुंदर लिखाबट। फ़ाउन्टेन-पेन से जब वे कागज़ पर लिखते थे तो लगता था सफ़ेद प्लेट मे काले मोती सजे हों। सुलेख के प्रति वो हमेशा छात्रों को सजग रखते। उनके निर्देश और सराहना के बल से मेरी लेखनी भी सुघर होने लगी। आज मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में मेरे प्राप्तांक के पाँच प्रतिशत मेरी लिखावट के हैं। समय पंख लगाकर उड़ रहा था। मध्य-विद्यालय के दोनों वर्ष मैं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो आगे की शिक्षा के लिए गाँव के ही उच्च विद्यालय में दाखिल हो गया।

कार्तिक महीना था। दिवाली की तैय्यारी जोर पर थी। हमारे घर के पास ही रामार्चा पूजा हो रही थी। मैं प्रसाद लिए चला आ रहा था कि एक छोटे से लड़के ने वज्रपात किया, "भइया जानय छहक, अंसारी जी मर गेलखिन !" प्रसाद का गिलास हाथ से छूट गया...! मैं सज्ञाशून्य..! बाद में पता चला कि वो विगत मास से निलंबित चल रहे थे और इसकी सूचना उन्हें नहीं थी। जब वेतनप्राप्ति नहीं हुई तो कारण जान एक बड़े-से परिवार के मुखिया और कन्यादान के बोझ से दबे पिता परिस्थिति से मुंह चुरा रेल के नीचे आकर इस निर्दयी दुनिया को अलविदा कह गए। कोई कहता था कि उन्होंने छुट्टी की अर्जी दे रखी थी मगर प्रधानाध्यापक ने नहीं देखा। कोई कहता था कि जिस सहकर्मी के हाथों उन्होंने अर्जी उन्होंने ही दबा रखा तो कुछ लोग कहते थे कि वे खुद ही लापरवाह थे। बात कुछ भी हो मगर मुझे एक ही बात अब तक कचोटती है कि उन्होंने ‘यह’ क्यों किया? बाद में तो सारा रोष और परिताप निरर्थक ही था। विद्यालय प्रांगन मे विशाल शोक सभा हुई। दोषी के प्रति कठोर कार्रवाई, विद्यालय परिसर मे अंसारी बाबू की विशाल प्रतिमा और अश्रितों को पूर्ण सहायता के संकल्प लिए गए। अंसारी बाबू के परिवारक की दशा ता नहीं पता, दोषी के प्रति कार्रवाई और प्रतिमा कागजी संकल्प मात्र ही रह गए। उनकी प्रतिमा कहीं लगे या न लगे, मेरे स्मृति शिखर पर वे सदैव अमर हैं। शिक्षक दिवस पर, "तस्मै श्री गुरुवे नमः!"

बुधवार, 22 अगस्त 2012

स्मृति शिखर से–21 : हौ राजा, चढ़ाई है!


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-- करण समस्तीपुरी
“हौ राजा...! चढ़ाई है।” यदि कभी रेवाखंड जाने का अवसर मिले तो यह पंक्ति बोलिएगा। विश्वास कीजिये आप वहाँ अजनबी नहीं रह जाएंगे वरण आपके स्वागत में एक निर्मल हास बिखर जाएगा। जाति, धर्म, धन, वर्ग, उम्र सभी सीमाओं से विलग यह जुमला रेवाखंड के दैनिक जीवन का अविभाज्य अंग है। वे इसे सुनकर श्रद्धावनत होते हैं। वे इसे सुनकर क्रोधित भी होते हैं। इसे बोलकर हँसते हैं और युवाओं में तो यह कई क्रियाओं के लिए ‘सांकेतिक वाक्य’ भी हो चुका है।
उनका नाम क्या है पता नहीं। हमारे गाँव में वे हर परिवार के मुखिया का नाम जानते हैं लेकिन सब को राजा कह कर ही संबोधित करते हैं। लोग भी उन्हे अब ‘राजा’ के नाम से ही जानते हैं परन्तु पेशे से भिखारी हैं। सांवला रंग, नाटा कद, भरा हुआ शरीर, कलेजे तक लटकती घनी सफ़ेद दाढ़ी, गेरुआ वस्त्र और हौ राजा...! चढ़ाई है। यही है उनकी पहचान। आस-पास के गाँव में जा भीक्षाटन करते हैं। मेरे गाँव में उनकी बारी प्रायः रविवार को होती है। उस दिन पिताजी का भी साप्ताहिक अवकाश होता है। पहले मेरे पिताजी का नाम लेकर उनके दरबार की जयजयकार करते हैं। फिर कुछ देर बैठते हैं, कुशलक्षेम का आदान-प्रदान होता है और तब फिर, “हौ राजा...! चढ़ाई है।” पिताजी एकाध रुपये देने से पहले कभी-कभी उन्हे चाय भी पिला देते हैं।
बाद के वर्षों में उनकी भिक्षाटन शैली में बड़ा बदलाव आया था। अब वे अन्नदान नहीं स्वीकारते हैं। केवल नकद रुपये। एक, दो, पाँच, दस या बीस। पक्के घर वाले अगर एक रुपये दें तो उन्हें क्रोध भी आ जाता था। लोग उनकी सच्चाई जानते हैं। उन्हें अब यह सब छोड़ देने की सलाह भी देते हैं। कई लोग दुत्कार भी देते हैं। फिर भी उनका संसार यथावत चल रहा है। वे इसे अपना कुल धर्म मानते हैं। कहते हैं कि कभी उनके पूर्वज शैव-सन्यासी थे। भिक्षाटन उनका धर्म है।
अब आइए आपको बताते हैं, उनके “हौ राजा ! चढ़ाई है” का राज़। वैसे हर भिखारी के पास वास्तविक या कृत्रिम आवश्यकता होती है। वह उसके अनुसार वेश और भाषा का उपयोग कर भिक्षाटन करता है। किन्तु ‘राजा’ जी के पास भी ऐसी ही कुछ आवश्यकता थी यह कहा नहीं जा सकता। इसीलिए उनका वेश और उनकी भाषा बहुधा एक सी ही रहती है। “हौ राजा चढ़ाई है।”
चढ़ाई का अर्थ यात्रा से है। बाबाजी कभी गंगाजी की चढ़ाई करते हैं। कभी बैजनाथधाम, कभी अयोध्या, काशी, मथुरा बद्री और केदारनाथ। आश्चर्य यह है कि यात्रा कितनी भी लंबी हो वे लौट आते हैं अगले सात दिनों में ही। रविवार को उनकी चढ़ाई हमारे गाँव में ही होती थी। जब कोई पिछली यात्रा के बारे में पूछ देता था तो वे कभी हँस कर और कभी सकोप टाल जाते थे। कभी-कभी तो श्राप का भय भी दिखा देते थे।
अगहन का महीना था। सर्दी की शुरुआत हो गई थी। एक सोमवार की सुबह पिताजी बाहर धूप में बैठे डाक-खाने का हिसाब-किताब मिला रहे थे। कुछ परेशान दिख रहे थे। अगहन की गुलाबी ठंड में भी उनके माथे पर श्वेद-कण साफ़ देखे जा सकते थे। घबराये हुए से कुछ खोज रहे थे। सब जगह खोजा। हार-थक कर बताया कि कोई सात हज़ार रुपये कम पड़ रहे थे। हमारे सर्वोत्तम प्रयासों के बाद भी वो रुपये नहीं मिले। पिताजी का मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था। एक अल्पायी डाक-कर्मी के लिए सात हज़ार रुपये भरना एक साल भर की बचत से भी अधिक थी। अनेक लोगों के आश-भरोस दिलाने के बाद कोई ग्यारह बजे पिताजी थके हारे से घर से निकले ही थे कि पीछे से ‘हौ राजा’... हौ राजा ! की आवाज़ आई।
पिताजी पहले से ही चिढ़े थे उनपर भी भरास निकल गई। पुनश्च वे पास आये और मुट्ठी में बँधे सौ रुपये के नोटों की गड्डी आगे कर दिया। पिताजी का सर चकराने लगा। फिर बाबाजी ने याद दिलाई कि वे नोट उसी कुर्ते में रह गए थे जो पिताजी ने कल उन्हे दिया था। पिताजी का मस्तक श्रद्धा से नत हो गया। मेरे गाँव में लोग उनके ईमान का लोहा मानते हैं। कहते हैं कि वर्षों से वे आते रहे हैं। लोगों से सविनय या लड़कर भीख लिया होगा परन्तु किसी के फ़ेंके हुए सोने पर दृष्टि भी नहीं डाली होगी।
बड़े दिल वाले थे वे। वास्तविक अर्थों में राजा। ग्रीष्म का प्रथम चरण पधार चुका था किन्तु क्रिकेट का नशा हमारी युवक-मंडली के सर चढ़ कर बोल ही रही थी। अंतर यही आया था कि अब हम दोपहर के बदले सुबह में ही खेल लेते थे। किसी दूसरे गाँव से क्रिकेट का मैच खेलकर हम वापस आ रहे थे। साइकिल से। धूप की तीखी रेखा हमारे सर के ठीक ऊपर प्रहार करती चुभ सी जा रही थी। पहले खेल की थकान और फिर धूप, आँखों से जो जैसे अंगारे निकल रहे थे और मारे प्यास के गला सूखा जा रहा था।
एक बड़े से हवेलीनुमा के घर के सामने चापाकल देखकर हम सभी रुके। बारी-बारी से हाथ-मुँह धोकर अंजुरी में भर-भर पानी पीने लगे। आहा...! तृप्ति की अनुभूति! तभी एक पहचानी सी आवाज हमारी पिपासा-समन में बाधक बन गई। “हौ राजा...!”
हमें लगा कि बाबाजी वहाँ भी अपने कर्मपथ पर हैं किन्तु नहीं तभी वे विश्राम में थे। सुखद आश्चर्य यह कि वह घर उन्हीं का था। उन्होंने हमें पानी नहीं पीने दिया। बलात खींच ले गये दालान में। पहले नीबू के सर्बत से हमारा गला तर करवाया। फिर ‘चूरा-दही’। संकोच करते देख बोल पड़े, “राजा...! यह सब तुम्हारा ही है। हमारा कुछ है? अपने भाव से विवश कर उन्होंने खाने के बाद ही आने दिया।
उस दिन उनकी आँखों की चमक देखते ही बनती थी। वो चमक जो एक याचक की आँखों में नहीं आती। कई बार अपनी बहू और घर का काम करने वाले लड़के को डाँट भी दिया था। हर्षातुर हो हर आने-जाने वाले को बोल रहे थे, “सौभाग्य है हमारा। आज हमारा राजा सब हमरे द्वार पर आया है।” फिर हमें देख बोल पड़ते थे, “राजा... ऐसा सौभाग्य फिर आयेगा...?” स्वयं के द्वार पर भी उनकी आँखों में याचना आ गई थी।
उसी दिन मालूम पड़ा कि उनके सबसे बड़े पुत्र बिहार पुलिस में दारोगा हैं। एक पुत्र रेलवे में चल टिकट निरीक्षक हैं। एक भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के दिल्ली स्थित मुख्यालय में वरिष्ठ सहायक हैं। सबसे छोटा संघ लोक सेवा आयोग की तैय्यारी में है। फिर भी वो इतने सहज हो याचना करते हैं। लोगों की दुत्कार भी सह लेते हैं। कोई उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति का हवाला दे भिक्षाटन छोड़ने की सलाह देता है तो सविनय कहते हैं, “राजा....! ई कैसे छोड़ देंगे ? जड़ तो यही है। आखिर यही कर के इतना सब कुछ किए...। जड़े काट देंगे तो पेड़ सुखिए जाएगा न राजा...! वैसे भी बेटा-बहू कुछ भी हो जाए...हम तो वही हैं राजा...! हौ राजा ! अब निकालो एक-आध रुपैय्या...! फ़लाँ तीर्थ का चढ़ाई है।”










बुधवार, 8 अगस्त 2012

स्मृति शिखर से – 20 : वह कौन था ?


 
 -- करण समस्तीपुरी

जीवन की कुछ घटनाएँ अविस्मरणीय तो होती ही है अविश्वसनीय भी हो जाती है। बाद में अपने साथ हुई घटना भी भ्रम जैसी लगती है। हम खुद को चिकोटी काटकर विश्वास दिलाते हैं कि हम होश में हैं, सपने नहीं देख रहे और वह सच में हमारे साथ हुआ था। मेरे ख्याल से ऐसा सभी के साथ होता होगा। उन्हें याद भी जरूर होगा। मेरे साथ भी ऐसी कुछ यादें जुड़ी हुई है। उन यादों का नायक मैं नहीं मेरे कोई जान-पहचान वाला भी नहीं बल्कि एक अजनबी है।

मेरी छोटी सी जीवन यात्रा में ईश्वर ने जो परिवर्तनधर्मी विषम परिस्थियों का उपहार दिया है, उस से यह घटना-प्रधान हो गई है। रेवाखंड से बंगलोर तक मैं अपने जीवन की कड़ियाँ जोड़ कर देखता हूँ तो मुझे भी सुखद आश्चर्य होता है। इस यात्रा में कुछ चित्र मेरे मानस पर ऐसे छपे जो कभी धुँधले नहीं हो सकते। आज उनमें से तीन चित्र मैं आपकी नजर कर रहा हूँ। जब भी मैं ‘उन्हें’ याद करता हूँ, एक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है, ‘वह कौन था?’ उत्तर तो कई हो सकते हैं। उनमें से एक अति सामान्य ‘ईश्वर का रूप’।

वर्ष उन्नीस सौ निन्यानवे। मेरे एक चाचाजी देवघर में रहते थे, अभी भी रहते हैं। उन्हे विभागीय प्रशिक्षण हेतु कलकत्ता जाना था, कोई पंद्रह दिनों के लिए। अँग्रेजी महीने के अनुसार यह अगस्त था वैसे सावन। देवघर का श्रावणी मेला कितना प्रसिद्ध है यह तो विश्वविदित है। उस भीड़ भरे महीने में दो छोटे बच्चों को लेकर रहना चाचीजी के लिए थोड़ा कठिन था, अतः मुझे बुलावा भेजा गया था। मैं उस समय स्नातक प्रथम वर्ष की परीक्षा देकर परिणाम की प्रतीक्षा में था। टिकट आरक्षण का तो प्रश्न ही नहीं था। कुछ आवश्यक इंतिजाम के बाद एक सुबह चल पड़ा मैं। मुज़फ़्फ़रपुर से सियालदह सवारी गाड़ी चलती थी वाया समस्तीपुर-बरौनी-जसीडीह।

यह बिना किसी अभिभावक के समस्तीपुर-दरभंगा-पटना के अलावा मेरी पहली यात्रा थी। सुकून यही था कि हमारे गाँव से कई लोग उसी दिन कलकत्ता जा रहे थे। मुझे तो आजादी बड़ी अच्छी लग रही थी मगर मेरे माता-पिता को उन्हीं का भरोसा था। समस्तीपुर स्टेशन पहुँच टिकट लेकर नियत प्लेटफ़ार्म पर प्रतीक्षा करने लगा। सहसा मुझे याद आया...! अरे..! चाचाजी के घर का पता तो लिया नहीं। उस समय बिहार में दूरभाष सुविधा इतनी सुलभ नहीं थी। दो विकल्प थे – यात्रा रद्द करें या देवघर पहुँच कर चाचाजी का आवास खोजें। दो बातें थी जिसने मुझमें यात्रा करने का साहस भरा। एक तो चाचाजी बाटा में काम करते हैं जो मैंने पिछली यात्राओं में कई बार देख-सुन रखा था। दूसरी, चाचाजी पिछली बार आये थे तो बता रहे थे कि रामकृष्ण मिशन की तरफ़ घर शिफ़्ट कर लिया है। गृहस्वामी का नाम है, देवव्रत झा। मैंने चलने का निश्चय किया।

सावन मास। दिन का पहर। देवघर के रास्ते कलकत्ता जाने वाली पैसेंजर गाड़ी। तिल रखने की भी जगह नहीं। मैं बड़ी मुश्किल से एक कोने में अटका रहा। आठ घंटे की यात्रा में लग गए सोलह घंटे। रात के साढ़े बारह बजे पहुँच सका जसीडीह और फिर वहाँ से देवघर को दस मिनट में। बाबा-नगरी गुलजार थी। रात जैसा तो कुछ लग ही नहीं रहा था। चहुँ ओर बिजली की छटा। दुकाने खुली थीं, फेरी वाले भी घूम रहे थे, काँवरियों के झुँड भी इत-उत फिर रहे थे। मगर बाटा की ‘सरकारी’ दुकान बंद हो चुकी थी। पहला विकल्प खत्म। वहीं एक दुकानवाले से रामकृष्ण मिशन जाने वाली पथ का पता कर चल पड़ा।

अचानक बिजली गुल हो गई। रामकृष्ण मिशन देवघर के मुख्य नगर से थोड़ा हटकर पड़ता है। अँधेरे के कारण उस रास्ते पर चहल-पहल कम हो रही थी मगर काँवरियों का दर्शनिया धर्मशाला मिशन के प्रांगण में ही होने के कारण सन्नाटा नहीं था। एक जगह पहुँचकर मेरी अंत: प्रज्ञा ने कहा कि यही चाचाजी का आवास है। हाँ, सही तो। चाचाजी ने जो रूप-रेखा बताई थी उसके हिसाब से एकदम सही बैठता था। और कुछ मुझे मालूम नहीं था। मैंने चांस लेने का निर्णय लिया। 

उस अहाते में घुस तो गया। एक कमरे से गाने-बजाने की आवाज आ रही थी। मैं डर कर भाग आया। नहीं मेरे चाचाजी यहाँ तो नहीं रह सकते हैं। फिर मुख्य सड़क पर आकर आगे चलने लगा। थक कर चूर मगर कदम नहीं रुके। शायद काँवरियों जैसा उत्साह मेरे अंदर भी भर रहा था। बीच-बीच में कई लोगों से चाचाजी के मकान-मालिक का पता भी पूछा मगर निरर्थक। सावन में अधिकांश दुकानदार भी सामयिक और बाहरी होते हैं। चलते-चलते रामकृष्ण मिशन आ गया।

दर्शनिया धर्मशाला में अपार भीड़। इस से आगे तो नहीं हो सकता है। अब किससे पता पूछूँ? मैं थक-हार कर निराश काँवरियों के लिए बनी एक चौकी पर बैठ गया। अब अगले दिन जब तक बाटा की दुकान खुल नहीं जाती मेरे लिए ऐसी ही किसी जगह पर प्रतीक्षा करने के सिवा कोई चारा नहीं था। थकावट के मारे निद्रा-रानी गोद में लेने लगी। सहसा एक पंडानुमा व्यक्ति ने झकझोर कर जगा दिया। उसने डाँटते हुए कहा, “दिख नहीं रहा... यह बेंच काँवरियों के लिए है। तुम यहाँ क्या कर रहे हो? उठो निकलो यहाँ से...! मैं हरबराकर याचक की भाँति उनके सामने कातर मुद्रा में खड़ा हो गया। मैंने उनसे भी अपने चाचाजी के घर का जो पता मुझे मालूम था वो पूछा मगर वे बताएँगे क्या मेरी बेवकूफ़ी पर हँसे और मुझे वहाँ से निकल जाने का इशारा कर आगे बढ़ गए।

मैं बाहर आकर सड़क किनारे पड़े एक पत्थड़ पर बैठ गया। मच्छड़ बहुत काट रहे थे। थोड़ी देर में एक दुर्बल व्यक्ति आया और मेरी बगल में बैठकर मच्छड़ मारने लगा। उसका हुलिया एकदम बेवकूफ़ जैसा था। जैसे कोई आधा पागल आदमी हो। घुटने से ऊपर गंदी सी धोती थी और कमर से ऊपर बनियान। एक लाल रंग का गमछा था उसके काँधे पर जिससे वह कभी-कभी मेरे उपर आने वाले मच्छरों को भी भगा देता था। बगल में उसके बैठने से मुझे कोफ़्त हो रही थी। बातचीत का सिलसिला भी उसी ने शुरु किया। गँवार जैसी तुतली आवाज़ उसकी बेवकूफ़ी का जैसे प्रमाण दे रहे थे। मैंने उससे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

थोड़ी देर की एकतरफ़ा वार्तालाप के बाद उसने पूछा तुम तो काँवरिया नहीं हो... अपनी जगह क्यों नहीं चले जाते? मैं कुछ नहीं बोला। वह व्यक्ति बोलता रहा, “किसी का पता पूछना है तो मैं बता देता हूँ। मेरा घर यहीं है। मुझे यहाँ के बारे में सबकुछ पता है। मैंने चिढ़कर कहा, “मेरे चाचा का घर कहाँ है, आप जानते हैं?” उसने कहा, “हाँ, हाँ ! बस अपने चाचा का नाम बताओ। मैंने कहा मेरे चाचा का नाम तो अमुक है मगर वे किराये पर रहते हैं श्री देवव्रत झा जी के घर में। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उसने अंगिका मिश्रित हिन्दी में कहा, “अच्छा...! अपना देवव्रत...! ये तो यहीं मानसिंघ के पास रहता है।

मैंने कहा लो...! हो गया। एक तो पूरे देवघर में देवव्रत को एक यही महाशय जानते हैं ऊपर से ये भी कह रहे हैं कि मानसिंघ के पास। एक देवव्रत को खोजना तो मुश्किल था अब मानसिंघ को कहाँ से खोजें? उन्होंने थोड़ा हँसते हुए कहा, “अरे मानसिंघ घाट... बस यहाँ से कोई आधा किलोमीटर है दायें हाथ पे आएगा बड़ा सा तालाब। उसी के सामने देवव्रत का मकान है दो-महला।

मैं उसके निर्देशानुसार पहुँच गया। लेकिन यह क्या ? यह तो वही मकान था जिसके अहाते में घुसकर मैं निकल चुका था। अब के मैंने निचले तल्ले के दरबाजे को खटखटाकर अपना उद्देश्य प्रकट किया। हाँ, देवव्रत झा जी का घर यही है और करनजी (मेरे चाचा) यहीं दूसरे तल्ले पर रहते हैं। उस अपरिचित के प्रति मन श्रद्धा से नत हो गया। उस लघु प्रवास और बाद की देवघर यात्राओं में आँखें उन्हें ढूँढती रही मगर यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि वह कौन था।

वर्ष दो हजार सात। मार्च का महीना, नगर बंगलोर। नया शहर, नयी नौकरी, नया दफ़्तर, नये-नये लोग। एक दिन मैं अपना बटुआ घर पर ही भूल कर अखबार के दफ़्तर पहुँच गया। बस-पास होने से आने में तो कठिनाई नहीं हुई लेकिन मध्याह्न में भूख लगने पर तारे दिखने लगे। नया होने के कारण किसी से सहायता माँगने में भी झिझक थी। पैसे नहीं होने से क्षुधादेवी मेरी सहनशीलता की जमकर परीक्षा लेने लगी।

अपराह्न के दो बजे होंगे। भूख के मारे ललाट पर पसीने की बूँदे चुहचुहा आई थी। मैं अपने डेस्क से उठकर संपादक महोदय के कक्ष तक गया और फिर मारे संकोच के उल्टे पाँव वापस आ गया। हार-थक कर हाथ-मुँह धोया और एक ग्लास पानी से गला तरकर अपने स्थान पर वापस आ बैठा। सहसा एक व्यक्ति बिना अनुमति के मेरे डेस्क पर आकर दक्कनी हिंदी में पूछने लगा, “खाना खाएगा क्या साहब?” वह व्यक्ति मेरे दफ़्तर के ऊपर तीन माले में चल रहे महिला छात्रावास में खाना पहुँचाता था। उसे कई बार मैंने उस बिल्डिंग में आते-जाते देखा था। इस से अधिक कोई परिचय नहीं था मेरा उस से। मैंने कहा, “नहीं अभी भूख नहीं है।” मैं बगले झाँकने लगा और उसने मेरी चोरी पकड़ते हुए कहा, “क्या साहब भूख नक्को...? टू’ओ क्लाक हुआ ना...! फ़ेस सूखता और आप झूठ बोलना...! खाना तो बोलो मैं देता...! अच्छा खाना...!”

भूख तो सच में लग रही थी। सामने खाने की उपलब्धता देख और तीव्रतर होती जा रही थी। मैंने उस समव्यस्क युवक से पूछा, “कितने पैसे लोगे, एक खाने का?” उसने मुझे धिक्कारते हुए कहा, “हे... पैसा नक्को साहब...! खाना है तो बोलो...!” मैं संकोचवश चुप ही रहा। वह गया और महज दो मिनट के अंदर एक प्लेट में रोटी, दाल, सब्जी, पकौड़े, सलाद आदि लाकर मेरे सामने रख दिया। मैं साश्चर्य उसे देखता रहा। उसी ने मेरी तंद्रा भंग की, “साब...! जल्दी खाना... प्लेट मैंने उपर को देना... वो लड़कियाँ ना...!” खाना तो उसका था मगर प्लेटे उसने उपर रहने वाली किसी लड़की से लाकर दिया था। भूख अब असह्य थी। मैंने झटपट में खाना खाया। प्लेट धोकर उसे सधन्यवाद दे दिया। पैसे मेरे पास थे तो नहीं मगर फिर भी मैंने दुबारा पूछा। इस बार भी वह मुझे झिड़कता और धकियाता निकल गया। इस घटना के बाद भी उसे कई बार देखा। मुझे सलाम करता था। मगर एक प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया कि वह कौन था?

वर्ष दो हजार सात। अक्तूबर, बंगलोर। नये (वर्तमान) कार्यालय में मेरा पहला दिन। रिपोर्टिंग टाइम सार्प 11’ओ क्लाक। मैं अपने घर से ससमय चला। निकटवर्ती बस अड्डे पर पहुँच प्रतीक्षा करने लगा। कोई आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद पता चला कि आगे के रास्ते में कहीं दुर्घटना हो गई है। कोई भी सवाड़ी-गाड़ी इधर से नहीं जाएगी। मैंने अपने भाई-साहब को फोन किया। वे अपने कार्यालय जा चुके थे जहाँ से उन्हें आने में कम-से-कम आधे घंटे लगते। अगर आप बंगलोर की यातायात व्यवस्था से परिचित हैं तो कहना नहीं होगा कि अब मेरा रिपोर्टिंग टाइम पर कार्यालय पहुँचना भगवान भरोसे ही था।

मैं सड़क किनारे खड़े हो भाई-साहब का इंतिजार बेसब्री से करने लगा। बार-बार नजरें कलाई घड़ी की ओर मुड़ जाती थी। सहसा एक मोटर-साइकिल सवार मेरे बगल में आकर रुका और बिहारी हिंदी में पूछा, “बन्नरघट्टा रोड जाइएगा न... बैठ जाइए!” मेरी प्रतिक्रिया से पहले ही उसने पीछे बैठने का इशारा करते हुए अपना वाक्य खत्म किया। मैं भगवान का धन्यवाद कह मोटरसाइकिल की पीछली सीट पर बैठ गया। भैय्या को एसएमएस कर दिया था। दुर्घटना के कारण वैकल्पिक रास्ते पर भी भारी ट्रैफिक हो गई थी मगर चालक की चालाकी से मैं समयपूर्व कार्यालय पहुँच गया। नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करने के बाद फिर वही प्रश्न, “वह कौन था?” वैसे अगले चार सालों तक उसी रास्ते से और उसी समय पर आना-जाना रहा मगर वह मोटर-साइकिल सवार फिर कभी नहीं दिखा। एक प्रश्न अब भी अनुत्तरित, “वह कौन था?”  

बुधवार, 6 जून 2012

स्मृति शिखर से – 16 : बदरा


स्मृति शिखर से 16 :  बदरा

करण समस्तीपुरी

उसकी उम्र कोई अधिक नहीं रही होगी जब वो पहली बार हमारे घर आया था। कृषकाय, एक कान थोड़ा कटा हुआ, कातर दृष्टि, एकवर्ण भूरा शरीर। उस समय बाबा दोपहर का भोजन करने बैठे थे। स्वाभावानुसार उन्होंने अपना भोजन उसे दे दिया। उस पहले दिन से शुरु हुआ सिलसिला उसके जीवन के अंतिम दिन तक चलता रहा। मृत्युपूर्व कोई दो दिनों तक गायब रहा था। बहुत कोशिश की ढूंढने की...। हर आने-जाने वाले से पूछा। हाट-बाजार में भी खोजा गया। नहीं मिला। भादों की दोपहरी थी। भारी गर्मी और उमस। बदरी के भीतर से झाँक रही धूप त्वचा-भेद देने वाली थी। छत पर सूख रहे अन्न को समेटने में मैं माँ की मदद कर रहा था। सहसा दृष्टि गई सड़क पे। वह दौड़ता आ रहा था... बेतहाशा दौड़ता हुआ...। उसके पीछे मेरे चचेरे भाई बहनों और टोले के अन्य छोटे बच्चों की टोली समवेत घोषणा करते हुए दौर रहे थे, “बदरा आ गया...! बदरा आ गया...! बड़की माँ, बदरा आ गया...!!” बदरा दलान के किनारे पहुँचा। शायद उसकी सारी शक्ति जवाब दे गई थी। जीभ एक-एक हाथ बाहर आ रहा था। शायद बोलना भी चाह रहा था। मगर सिर्फ़ खाँस सका। दो तीन तेज खाँसी के बाद वह ढेर हो गया। चेतना शून्य। प्राण शून्य।

बदरा अनाथ श्वान था। एक बार बाबा के भोजन के समय क्या आ गया उसके आने का सिलसिला चल ही पड़ा था। फिर उसे पिताजी के भोजन का समय भी ज्ञात हो गया। अब वह बाबा और पिताजी के भोजन के समय नियमित आने लगा। दोपहर और रात को। पहले हम उसे भगा भी देते थे किन्तु मेरे मझले भाई का कुछ अतिरिक्त स्नेह था उस पर। उसी ने उसका नामकरण किया था, “बदरा। धीरे-धीरे हम लोग भी उसे खाना-पानी देने लगे। वह भी व्यर्थ भ्रमण को छोड़ हमारे परिवार में घुल-मिल गया या यूँ कहें कि उसे परिवार की अघोषित सदस्यता मिल गई। वह द्वार पर कभी नहीं चढ़ता था। अमूमन वहीं सीढियों के नीचे बैठा या सोया रहता। घर का दरबाजा खुला हो या घर सूना हो वह कभी दरवाजे की सीढ़ी पर पैर तक नहीं रखता। जब तक कोई खाद्य-पदार्थ उसके आगे न डाला जाए, वह निस्पृह बना रहता। बदरा के रहने से अन्य कुत्ते-बिल्लियाँ भी घर के अंदर नहीं घुस पाते थे।

गाँव में प्रायः बिजली नहीं होती है। शुक्ल पक्ष की धवल चंद्रिका में तो सब-कुछ बड़ा सुहावना लगता है मगर कृष्ण-पक्ष की रात घुप्प अँधेरी। बदरा सीढ़ी के नीचे पड़ा रहता था। अँधेरे में कई बार हम सब ने उसके उपर पैर तक रख दिया था। काटने की बात तो दूर भौंकता भी नहीं था। बच्चे रहे तो चुप-चाप खिसक जाता और यदि वजन उसकी सह्य-क्षमता से अधिक हुआ तोकुँउँउँ…’ करके छिटक पड़ता।

वह भी एक कृष्ण-निशा थी। कृष्ण-निशा का प्रथम प्रहर। पिताजी प्रातः कार्यालय की जल्दबाजी में समाचार पत्र नहीं पढ़ पाए थे। सो दालान में पड़ी चौकी पर लालटेन की मद्धिम लौ में अपनी समाचार-पिपासा का समन कर रहे थे। माँ अंदर रसोई में थी और हम तीनों भाई यत्र-तत्र। हमेशा चुप रहने वाला बदरा अचानक भौंकने लगा। पिताजी समाचार पत्र में डूबे रहे। बदरा का भौंकना बढ़ता जा रहा था। पिताजी का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने बदरा को पुचकार कर शांत करने लगे। मगर बदरा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वह दौड़ कर सीढ़ियों तक आता। अपने अगले चंगुलों को दलान पर पटकता और फिर दौड़कर अहाते के दूसरी ओर भागता। वह बहुत तेज भौंक रहा था। पिताजी को लगा कि कुत्ता पागल हो गया है। वहीं चौकी पर बैठे सबको सावधान करने लगे।

बदरा सच में पगला रहा था। दौड़कर इधरदौड़कर उधर…! किसी की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। बदरा का दौड़ना अब रुक गया था। वह सीढियों के सामने अड़ा गुर्राने लगा। अब पिताजी को उसके पागल होने पर कोई शक नहीं था। न कोई दूसरा कुत्ता है और न ही कोई आदमी आखिर यह गुर्रा किस पर रहा है? पिताजी भय के मारे चौकी पर खड़े हो कर टार्च का मुँह बदरा की तरफ़ कर स्वीच पर दबाब बढ़ाने लगे। अब जो उन्होंने देखा तो उनके होश गुम हो गए। घिग्घी बँध गई।

एक विशालकाय सर्पाधिपति गेहुँअन महाराज फन ताने बदरा के सामने डटे हुए थे। ओहतो बदरा तभी से इसीलिए भौंक रहा था और दौड़-दौड़ कर उस दिशा में यही दिखाना चाह रहा था। कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं पा वह स्वयं उस विषधर के मार्ग में अड़ गया। बदरा की गुर्राहट उसे आगे नहीं बढ़ने दे रही थी..। पिताजी की घिग्घी सुन लोग दौड़े आए थे। कुछ लोगों ने हिम्मत कर के बर्छी और लाठी के बल पर गेहुँअन जी का स्वर्गारोहन करवा चुके थे। बदरा पहली और एक मात्र बार दालान पर चढ़कर पिताजी के पैर के पास बैठ जीभ निकाल कर दूम हिलाने लगा।

हमने उसे पालतू का दर्जा नहीं दिया मगर वह कई मौके पर अपनी स्वामीभक्ति दिखा चुका था। बाबा के देहावसान के बाद पार्थीव शरीर को परिजनों के दर्शनार्थ रात भर रखना पड़ा था। हमलोग वहीं बैठे रहे। गाँव के भी कई लोग थे। बदरा भी सायं से वहीं बैठा रहा। सांझ से सुबह तक। दिन में बाबा द्वारा दी गई दूध-रोटी वहीं किनारे पड़ा हुआ था।  उसने कुछ भी खाया नहीं। कहीं भी गया नहीं। एक मिनट के लिए भी हिला नहीं। गरचे उसकी आँखें भी कई बार सजल देखी गई। बेचारा मूक प्राणी। जब बाबा की अर्थी बस पर रखकर अंतिम संस्कार के लिए सिमरिया ले जाया जाने लगा तो बदरा की बेचैनी फिर बढ़ गई। वह ताबरतोड़ बस की चारों ओर ऐसे परिक्रमा कर रहा था गोया बस को जाने नहीं देगा। बस के पीछे बहुत दूर तक दौड़ता रहा था।

कोई दो-तीन महीने गुजरे होंगे। बरसात का मौसम आ गया था। बदरा का जी उन दिनों कुछ अच्छा नहीं रहता था, शायद। दिन-दिन भर गायब रहने लगा। रात को पिताजी के खाने के समय जरूर आ जाता। एक रात उस वक्त भी नहीं आया। अगले दिन भी नहीं। अगली रात हम सभी नेबदरा-बदराकहकर जोर-जोर से पुकार लगाई। किन्तु कोई लाभ नहीं। हमें लगा कि वह कहीं और चला गया है या। रात हम में से जो भी बाहर आया उसे बदरा की कमी महसूस हो रही थी। हमसब को बदरा की कमी महसूस हो रही थीपता नहीं कहाँ गया ?

अगली दोपहर दौड़ता हुआ आ गया था। शायद उसमें सिर्फ़ उतनी ही ऊर्जा शेष रह गई थी। आया और निढ़ाल हो गया। जीभ ऐंठ कर बाहर आ गया था। बदरा नहीं रहा। लोग कह रहे थे कि इस घर से जरूर इसका कोई न कोई संबंध रहा होगा। कैसे मरने समय भाग कर यहाँ आ गया…!

गाँव में मृत पशुओं को फ़ेंकने के लिए एक खास समुदाय की जरूरत पड़ती थी। उन्हें बुलाबा भेजा गया। आकाश में घनघोर-घटा छाई थी। अब बरसे कि तब। बदरा को ले जाने वाले का पता नहीं। हम भाइयों ने निश्चय किया कि बदरा को मिट्टी हमारे ही हाथों नसीब हो। घर से थोड़ा हटके उसे बाइज्जत सुपुर्दे-खाक किया गया।

पिछले हफ़्ते अचानक बदरा आ गया स्मृति शिखर पर। मैंने कहा था न कि लाइफ़ बहुत सेटल हो गई है। कोई क्रिएटिव एक्सीडेंट होना चाहिए। पता नहीं यह उसी श्रेणी में है या नहीं मगर कुछ हुआ तो जरूर जिसने बदरा को मेरी स्मृति-शिखर पर लाकर एक रुके हुए सिलसिले को जारी कर दिया।

यूँ तो मैं चाय-काफ़ी का आदी नहीं हूँ किन्तु उस दिन दो घंटे की अरुचिकर बैठक के बाद सहकर्मी-मित्रों के विशेष आग्रह पर चाय पीने बगल की दूकान पर चला गया। चाय का छोटा ग्लास हाथ में लेकर जैसे ही मैं बढ़ने लगा वहाँ बैठे स्वान-दल के सेनापति को मेरी यह गुस्ताखी नागवार गुजर गई। महोदय जीभ से पानी टपकाते हुए मेरे लेग-पीस पर टूट पड़े। भला हो मोटे पतलून का। एक दाँत ही चुभ पाया।

दाँत एक चुभे या चार…! इससे चिकित्सक महोदय को क्या फ़र्क! उन्होंने तो पाँच टीके लगवाने का फ़रमान सुना दिया। तीन टीके लग चुके हैं। दो शेष रहे। घाव का नामो-निशाँ नहीं है। बस बदरा की यादें है। एक हमारा बदरा थाऔर एक। हाहाहाहा….! 

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

स्मृति शिखर से – 15 : वे लोग, भाग – 5


स्मृति शिखर से 15

वे लोग, भाग 5

करण समस्तीपुरी

कहावतें मेरी स्मृति के अभिन्न अंग रहे हैं। लोकोक्तियाँ मेरी जीवनचर्या में समायी रही हैं। बल्कि यूँ कहें कि मेरी परवरिश ही कहावतों के बीच हुई तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मेरी दादीजी आंचलिक कहावतों की इनसायक्लोपिडिया थी। हर अवसर और हर चरित्र के लिए उनके पास एक जीवंत कहावत हुआ करती थी।

कहावतों की विरासत उनके सभी बच्चों को मिली। हमें कभी कहावतों में प्रशंसा और कभी निंदा मिलती रही। पिताजी के शब्दों में तो छोटे भाई का स्टेटस अपडेट था, “रमता जोगी बहता पानी...!” उसकी यायावरी प्रवृति का को अभिव्यक्त करने के लिए इस से अच्छा क्या हो सकता है। घर में तो वह सोने और खाने के अलावे एक पल के लिए भी नहीं रहता था, अन्यत्र भी ढूँढ़ना सरल नहीं था। अभी यहाँ, ... अगले क्षण खादी भंडार पर। जब भी कोई उसके संबंध में पूछता पिताजी कभी सामान्य और कभी खीझ कर बोलते थे, “रमता जोगी और बहता पानी... का कौन ठिकाना...! कब कहाँ।”
यह कहावत कितनी बार सुनी होगी। अभी भी सुनता हूँ गाँव जाने पर। जब भी सुनता हूँ मन में एक तस्वीर उभरती है। औसताधिक लंबाई, कृषकाय, गौर-वर्ण, बड़ी-बड़ी आँखें, लंबा चेहरा, छूरी की तरह खड़ी नाक, गले तक लटकती दाढ़ी, बड़े-बड़े बाल, घुटने तक लटकता लंबा कुर्ता...! नहीं ये कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का शब्द-चित्र नहीं है।

मैंने तो उन्हें गाँव में ही देखा था। नहीं-नहीं...! वे मेरे गाँव के नहीं थे। लाल-चाचा और कन्हैय्या चाचा को समस्तीपुर में मिले थे। समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर। विराटनगर (नेपाल) जाने का मार्ग और साधन पूछ रहे थे। फ़ारबीसगंज उतरकर जाना होगा। छोटी लाइन की गाड़ी जाती है। फ़िर वो इनलोगों से बातें करने लगे। सज्जन विराटनगर में आहूत किसी संगीत-समारोह में भाग लेने जा रहे थे। सूरज अस्ताचल पर बढ़ चला था। गाड़ी आई। चली गई। चाचाओं ने याद दिलाई। उन्होंने कहा, “मुसाफ़िर हूँ यारों... न घर है न ठिकाना...! मुझे कोई विराटनगर नहीं जाना...! वो तो आप लोगों से बात करने की गरज से मैंने झूठ बोल दिया था।”

वे अपरिचित थे। अज्ञात । “अज्ञात कुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित!” उन्होंने झूठ बोला था। तथापि चाचा जी को उनकी भंगिमा और वचन भरोसे योग्य लगे थे। पूछा, “मेरे गाँव चलेंगे?” वे सहर्ष तैय्यार हो गए। 12 किलोमीटर साइकिल पर दोहरी सवारी कर वे लोग गाँव पहुँच गए। रेवाखंड में रात्रि का सन्नाटा पसर चुका था। शहर में तो कभी-कभी अपना भोजन भी नहीं बनता मगर गाँव में अभी भी रात को एकाध लोगों के अतिरिक्त भोजन पकाने की परंपरा है। भोजनोपरांत पूछा, “हारमोनियम है?” “हाँ।” “ले आओ..!” चाचा जी ने हरमोनियम रख दिया।

मुक्ताकाश देहरी में बाबा के तख्त पर बैठ अपरिचित महाशय शुरु हो गए। शीत-निशा की निरवता में राग-रागिनी की छटा बिखरने लगी। उनकी आवाज बहुत मीठी नहीं मगर सुरीली थी। सम्मोहन था उनमें। हरमोनियम पर अंगुलियाँ बिजली की तरह थिड़कती थी। स्वर में अतिसूक्ष्म शाहिद कपूर दोष था। को उच्चारण करते थे। “कागा जा... वे... जा...! मोवे पिया के संदेशवा ला... वे... ला... !” प्रताप सिंह नाम था उनका। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के रहने वाले थे। उन्होंने बताया था।

प्रातः हमारे पड़ोस में एक ग्रामीण गायक अभ्यास कर रहे थे। प्रताप सिंह की नींद खुल गई। चाचा जी को जगा दिया, “अरे ये कौन .... स्वर लगा रहा है....?” स्वर की दिशा में चलकर उनके घर और अभ्यास तक पहुँच गए। कुछ बातें हुई। चुनौती भी मिली... रामायण गाने की। उन्हीं के हारमोनियम पर शुरु हो गए। दो घंटे तक...! अविराम गाते रहे। उन्हें तुलसीदास की रामचरित मानस, दोहावली, कवितावली, सूरसागर और मीरा के अधिकांश पद कंठस्थ थे। पड़ोसी गायक ने प्रशंसित भाव से सिर नवा दिया था।

गायन के अतिरिक्त, तबला, ढोलक, बाँसुरी, सारंगी, सितार आदि पारंपरिक भारतीय वाद्य-यंत्रों के बादन में भी वे सिद्धहस्त थे। संगीत सिखाने की भी अद्भुत कला थी उनमें। किन्तु कोई गलत सुर लगाये ये बरदाश्त नहीं था। बहुत तेज डाँट देते थे। फिर प्यार से सिखाने लगते थे। गाँव और आस-पड़ोस में उनकी प्रसिद्धी फ़ैलने लगी थी। गाँव में होने वाले कीर्तन-भजन, सांगितिक-सांस्कृतिक कार्य-क्रमों में वे अवश्य बुलाए जाते थे। अस्थाई निवास मेरे या कन्हैय्या चाचा के घर पर होता था।

मेरे बाबा को उन्हें भोजन देने में कोई कठिनाई नहीं थी किन्तु आवास देने से डरते थे। “अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कश्यचित!” इसका कोई पता-ठिकाना नहीं है। अजनबी। कहीं मेरे पोते (मुझे) को उठा ले गया तो? बाबा मुझे उनके पास भी नहीं फ़टकने देते थे। मुझे उनके पास जाना अच्छा लगता था। मुझे भी वो बहुत प्यार करते थे। मैं उस समय सातवीं कक्षा में पहुँच गया था। कभी-कभी वे मुझे रासायन और जीव विज्ञान और अँगरेजी पढ़ा दिया करते थे। बड़ा अच्छा पढ़ाते थे। अँगरेजी पाठ के संवाद तो वे नाटकों की तरह ही बोलते थे। पढ़ाते-पढ़ाते संगीत की बारीकियाँ भी समझाने लगते थे। यह उनके स्वभाव में शामिल था। बाबा के अतिरिक्त घर के सभी लोगों का विश्वास उन पर जम गया था।

अब वे गाँव में अजनबी नहीं रहे थे। घुल-मिल गए थे। तीज-त्योहार, भोज-भात में उन्हें भी निमंत्रण मिलता था। अनेक लोगों को उन्होंने कुछ न कुछ गाना-बजाना सिखा दिया। काश...! बाबा मुझे भी उनका सामिप्य दे देते! गाँव के एक संपन्न गृहस्थ परिवार ने उन्हें अपना लिया था। वे उनके एकलौते पुत्र को संगीत की शिक्षा देते थे और परिवार उन्हें रोटी-कपड़ा और मकान! वे यायावर थे अधिक दिनों तक टिक नहीं सके। किन्तु कुछ ही दिनों में अपने शिष्य के संगीत की जड़ इतनी मजबूत कर चुके थे कि आज वह इसी कला की बदौलत अपनी जीविका सगर्व चला रहा है। आज वह युवक लोकगायन में प्रसिद्धि के मार्ग पर है।

वहाँ से उड़ कर समस्तीपुर शहर में अपना नीड़ बनाया था। वहाँ भी कन्हैया चाचा, लक्षमण जी भैय्या का सहयोग रहा। कुछेक संगीतालयों में शिक्षण कार्य मिल गया और कुछेक घरों में सामान्य ट्युशन। एक कमरे के किराए का घर संगीत के स्वरों से गुलजार होने लगा था। एक साइकिल खरीद ली थी। गाँव आते-जाते रहते थे। शनिवार को निश्चित आते थे। सांझ के कीर्तन में भाग लेते। रविवार गाँव में बिताकर सोमवार प्रातः कार्य-स्थल को चल पड़ते थे।

इधर कुछ सप्ताह से गाँव नहीं आए थे। शायद अस्वस्थ्य होंगे। लेकिन पिछली बार तो इतनी खाँसी और हल्के बुखार के बावजूद गाँव आए थे। मुझे अच्छा नहीं लगा था। और कई लोग भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ दिनों बाद लोग उनसे मिलने पहुँचे। उनके किराये की कोठरी पर। बंद पड़ी थी। अनियमित कई दिनों तक मिलने का प्रयास जारी रहा। वे नहीं मिले। अगले महीने का किराया नहीं मिला तो मकान-मालिक ने लक्षमण जी से शिकायत किया। कहीं बाहर गये होंगे...! आएंगे तो दे देंगे।

अगले महीने मकान मालिक ने उनके परिचितों की उपस्थिति में दरवाजे का ताला तोड़ दिया। सारा सामान पड़ा ही हुआ था। उनके कपड़े भी। साइकिल भी। बस हारमोनियम नहीं था। हाँ...! एक भावुक कर देने वाला पत्र था। उन्होंने हमारे गाँव के सभी लोगों का आभार व्यक्त किया था। मेरा भी नाम लिखा था। लिखा था कि वे योगी हैं। संगीत उनकी साधना है। वे ब्रह्मांड के हर कण में संगीत की ही खोज करते हैं। समय और भूगोल की सीमा उनके योग को बांध नहीं सकता। एक स्थान पर अधिक दिन ठहरने से उनका अन्वेषण ठहर जाएगा। उन्हें तलाश है नए आकाश की, नई जमीन की, नए सुरों के, नए साज के, नए लोगों की, नई संस्कृति की...! इस गाँव में उन्हें जो मिला वो तब तक की यात्रा में सर्वश्रेष्ठ था। यदि संयोग दुबारा आता है तो वे भी इस गाँव में आना पसंद करेंगे।

एक संयोग दुबारा नहीं आता। वे भी नहीं आए। उनके पत्र का आशय सुना था। उस संयोग की प्रतीक्षा करता रहा। काश वे अब जाएँ तो मैं भी हारमोनियम बजाऊंगा...! गाऊंगा...! नहीं तो तबला ही सीख लूँगा...! वे नहीं आए। जैसे आए थे वैसे चले गए। बहुत कुछ अर्जित किया था। कुछ लेकर नहीं गए। अपितु जो ले सका उसे कुछ न कुछ देकर ही गए थे। कहाँ से आए थे... कहाँ गए... किसी को नहीं मालूम!

“बहती हवा सा था वो... उड़ती पतंग सा था वो....! कहाँ गया उसे ढूँढ़ो...!” थ्री इडियट्स का यह गाना और पिताजी की वह कहावत सुनता हूँ तो उनकी छवि आँखों में उतर आती है। मेरे स्मृति शिखर पर वे हमेशा गाते रहते हैं, “झनन...ननन..नन... बाजे घुँघरवा...! ऐ...री...! सखी कैसे जाउँ मैं घरवा....! झनन... ननन... नन.... बाजे घुँघरवा...!” पहली बार जो उन्होंने गाया था।