बुधवार, 19 सितंबर 2012

स्मृति शिखर से – 24 : डढ़िया वाली


 - करण समस्तीपुरी

उसका नाम मुझे नहीं मालूम लेकिन पूरा गाँव नहीं तो कम से कम दो-चार टोले में वह इसी नाम से प्रसिद्ध थी। हमारे टोले के सभी घरों में उसका आना-जाना था। जमींदारों के दरबार भी जाती रहती थी। मैंने उसे जब से देखा वह वृद्धा ही थी। लंबा कद था, सफ़ेद बाल, गेहुआँ रंग। गले और और बाजुओं में गोदना। वह एक करुणामयी, कर्मठ और अनुशासित महिला थी। थोड़ा ऊँचा सुनती थी मगर कोई बहिरी कह दे और उसने सुन लिया तो जुबान खींच लेने को आतुर।

मेरी दादी कहती थी किसी जमाने में उसका परिवार बड़ा समृद्ध था। डढ़िया वाली के देह पर गोदने की जगह स्वर्णाभूषण लदे होते थे। पति की बीमारी और फिर मृत्यु ने उसके शृंगार के साथ-साथ समृद्धि भी छीन लिया था। निश्छल महिला क्या जाने इस जग की रीति! बची-खुची संपत्ति सहानुभुति देने वाले लेते गए। एक पुत्र था जिसे बड़ा होने पर महज एक पक्का घर और कुछ कट्ठे जमीन विरासत में मिली किन्तु माँ की करुणा और संघर्ष का मोल तो दूर सम्मान भी न कर सका। न तो वह माँ को कोई कष्ट देता ना ही माँ को उससे कोई कष्ट था फिर भी बीच में एक भाजक रेखा थी जिससे माँ की ममता और और संतान का कर्तव्य दो पाटों में बँट जाता था। बेटा पहले रिक्शा चलाता था। गाँव में ही। माँ को खुशी थी। प्रातः-सायं मेहनतकश बेटे को देख छाती शीतल हो जाती थी। इधर जिस गति से परिवार बढ़ रहा था उसी गति से संसाधन घट रहे थे। बेचारा दिल्ली चला गया।

पृष्ठभूमि कोई हो, कुछ परंपराएँ, कुछ रुढियाँ, कुछ किंवदन्ति भारत के हर घर की सच्चाई है। शायद ‘सास-बहू’ संबंध भी इनमें से एक है। डढ़ियावाली का घर भी इसका अपवाद नहीं था। जब आत्मज ने नहीं समझा तो...! कभी-कभी आँखें नम हो जाती थीं किन्तु जर-शरीर से भी ममता का वही सोता कल-कल बहता था जो अमूमन किसी भी माँ में होता था। बेटे के बाद पोते-पोतियाँ को खाने-पीने का दुख न हो, इसलिए वह टोले के कुछ घरों में काम करने लगी थी। हमारा घर भी उनमें से एक था।

वह उस समय से हमारे घरों में आने लगी थी जब गाँव में जल की आपूर्ति कुएँ और तालाबों से होती थी। सुबह-सुबह कुएँ से पाँच-सात घरों में घड़ा भर-भर पानी पहुँचाने के बाद कुछ घरों में घर-आँगन भी बुहार आती। चौका-बरतन का काम उसके बाद होता था। बाद में घर-आँगन में चापा-कल हो जाने से बूढ़ी को भी कुछ आराम हुआ था। वैसे अवस्था बढ़ने के साथ-साथ शरीर का बल भी जाता रहा था।

बाद के दिनों में वह कुछेक घरों में ही जाती-आती रही थी। मेरी दादी और माँ से उसे कुछ अतिरिक्त स्नेह था। फलस्वरूप मुझ तीनों भाईयों से भी। थी वह दादी की उमर की ही मगर दादी को चाची बोलती थी। कभी-कभी लड़ भी लेती थी। अनुचित बात कभी भी किसी की भी नहीं सहती थी। काम-काज के बाद जब माँ उन्हें ‘खाना’ देने लगती तो वह रसोईघर में जा बर्तनों से ढक्कन हटाकर देख लेती थी कि उसमें हम तीनों भाइयों के दोहराने के लिए पर्याप्त भोजन बजा हुआ है या नहीं। यदि कम लगता तो अपने हिस्से से निकलवा देती और कभी-कभार तो बिल्कुल भी नहीं लेती थी, माँ के लाख जिद के बावजूद।

दरबार के जमींदार के घर भी जाती थी। संपन्नता से विपन्नता का विषरस पी रही वृद्धा का ईमान जाँचने की गरज से उन्होंने घर में कुछ आभूषण और नगदी बिखरे छोड़ दिए थे। डढ़ियावाली सारे घरों की झार-बुहार करने के बाद उन आभूषणों और नगदी गृहस्वामीनी को देते हुए बिफ़र पड़ी, “हूँ....! सब समझती हूँ मैं। आप जमींदारों के बटुए में भी एक टुक सुपारी न मिले और गहने-पैसे बिछौना पर बिखरे रहेंगे...? सब समझती हूँ...। आप मेरा ईमान जाँच रहे थे। अरे जब भगवान का दिया अपना सर से पैर तक का गहना नहीं रहा तो किसी के घर चोरी किए क्या रहेगा....!” बुढ़िया पैर पटकती हुई चली आई थी। लाख बुलावे के बाद भी उनके द्वारे कभी पैर नहीं दिया फिर।

डढ़िया, उसका मायके था। मेरे गाँव के पास ही पड़ता है। रेवाड़ी ढ़ाला चौक के उस पार। बूढ़ी जब भी नैहर जाती तो मेरी माँ से जरूर मिल कह जाती कि ज्यादा दिन नहीं रहेगी वहाँ। दादी के पैर छू जाती। वापसी में पैदल आये तो आये मगर जो भी पैसे हों उनमे से अपने पोते-पोतियों के लिए एक और हम तीनों भाइयों के लिए पाँवरोटी का तीन डब्बा जरूर लाती थी।

एक बार सन्नीपात के संक्रमण से मैं बहुत अधिक बीमार पड़ गया था। चालिस-पैंतालिस दिनों तक तेज ज्वर रहा। डढ़ियावाली सबका काम-धाम छोड़ हमारे घर ही बैठी देवी-देवताओं को गोहराती रही थी। कई ओझा और भगतीन के घरों के चक्कर भी लगा आई थी। बड़ी स्नेह-वत्सल थी। हमारे उपनयन में अतिथियों की भीड़ थी। संभालने के लिए उसकी भतीजी को भी बुला लिया था माँ ने। बुढ़िया गुस्सा गई। “ऐं...! हमरा बौआ सबके जनेऊ है और हम इतना भी काम नहीं कर सकते हैं?” सारा काम भाग-भाग कर करती रही थी। माँ की दी हुई नई साड़ी पहन कर बड़ी खुश हुई थी।

बेटे-बहू, पोते-पोतियाँ सब दिल्ली चले गए थे। डढ़िया वाली नहीं गई। जिंदगी के चौदह आने जिस मिट्टी में कट गए, जो अपने सभी सुख-दुःख का गवाह रहा उसे छोड़ कहाँ जाएँ! जीए यहाँ, मरने के लिए दिल्ली जाएँ!!” उसके अपने तर्क थे। गाँव में तो नहीं, अपने घर में अकेली रह गई। जब तक शरीर चला निर्वाह हुआ। जब अशक्त हो गई तो लादकर ले गए। बेचारी एक साल भी न रह सकी दिल्ली में। सर्दी ऐसी पड़ी कि लकवा मार गया। बेटा लाकर गाँव में छोड़ गया। बहू रह गई थी “सेवा” करने के लिए।


साल में तीन बार हमारे यहाँ घरी पावनि हुआ करता है। कुल-देवता को खीर-पूरी चढ़ाया जाता है। इतने दिनों में उसे तीनों घरी की तिथि याद हो गई थी। चँद्र टरै, सूरज टरै मगर बुढ़िया उस रात खाना नहीं खाती तब तक जब तक हमारे घर से कोई उसके लिए खीर-पूरी लेकर न जाए। डढ़िया वाली का इंतजार और उसकी बहू के व्यंग्य-वाण साथ-साथ चलते रहते थे...! जब माँ खाने में कुछ विशेष पकाती तो हमारे हाथों डढ़ियावाली के लिए भिजवा देती थी। मैं ज्यादातर जाने से कतराता था। मुझे उसे देखकर बड़ा दुख होता था। एक तो बुढ़िया रोने लगती थी और दूसरी उसकी दुरावस्था। बेचारी निर्धनता में भी साफ़-सफ़ाई का बड़ा ख्याल रखती थी और उस अवस्था में वह... मल-मूत्र के साथ घंटो खाट पर पड़ी रहती।

हर रविवार की भाँति पिताजी देखने गए थे। इस बार बहू की चिक-चिक नहीं दहारें गूँज रही थी। डेढ़ साल खाट पकड़ने के बाद बुढ़िया परलोक सिधार गई थी। मैंने बहुत दिनों बाद उसे देखा था। उसे नहीं उसके मृत शरीर को। बाहर पड़ी थी। शायद बाहर आकर ही मरी थी। बहू अलाप में रो-रो कर बता रही थी, रात के अंतिम पहर बुढ़िया उससे झगड़ा कर लकवाग्रस्त शरीर को बाहर घसीट लाई थी। आगे प्राण-पखेरू साथ न दिए।

13 टिप्‍पणियां:

  1. पति की बिमारी(बीमारी ) और फिर मृत्यु ने उसके शृंगार के साथ-साथ समृद्धि भी छीन लिया था। निश्छल महिला क्या जाने इस जग की

    रीति! बची-खुची संपत्ति सहानुभुति देने वाले लेते गए। एक पुत्र था जिसे बड़ा होने पर महज एक पक्का घर और

    डढ़िया वाली का इंतिजार(इंतज़ार ) और उसकी बहू के व्यंग्य-वाण साथ-साथ चलते रहते थे...!


    हर रविवार की भाँति पिताजी देखने गए थे। इस बार बहू की चिक-चिक नहीं दहारें गुँज(गूँज ) रही थी।

    ड-ढ-इया aवाली चली गई ....जीवंत चरित्र हमेशा याद रहतें हैं .कहीं नहीं गई वह ....

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  2. ऐसे व्यक्तित्वों से समाज के गुण स्थिर रहते है, नहीं तो समाज शीघ्र ही व्यग्र हो जायेगा।

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  3. जीवन की परिस्थितियां, कैसी पटकथाएं रच देती हैं.

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  4. हमेशा की तरह भावनाओं, संवेदनाओं से भरपूर स्नेह पगा मार्मिक स्मृति चित्र...

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  5. ये त्रासदी लगभग सभी जगह सभी वर्ग ,जाति, समुदाय में बन गई हम खुद झेलेंगे यह जानते हुए भी अपने से बड़ों को सम्मान नहीं दे पाते . ऐसा क्यों विचारणीय ? आपकी कहानी प्रखर सन्देश देती

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  6. ऐसे चरित्रों की भी कमी नहीं है हमारे समाज है. मार्मिक चित्रण.

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  7. एकदम बुढ़िया दाई वाली कहानी... वही किरदार.. हमारे घर में ही रहती थीं.. वृद्धावस्था में आकर काम भी नहीं करती थीं.. बस एक सदस्य की तरह हम सब बच्चों को एकत्र कर उन्हें किस्से कहानियाँ सुनाती थीं.. जब गर्मी की छुट्टियों में इलाहाबाद जाते हम, तो वो भी हमारे साथ महीने भर इलाहाबाद रहतीं..
    आज की इस स्मृति ने बुढ़िया दाई (पता नहीं हम लोग क्यों इस नाम से बुलाते थे उन्हें.. कई दाई थीं शायद इसीलिये उन्हें बुढ़िया दाई कहते होंगे) की याद ताज़ा कर दी..
    करण जी आपके विवरण का चमत्कार दृश्य को सजीव कर देता है और घटनाओं को जीवंत. पाठक मत्रमुग्ध सा पढ़ता चला जाता है!! चमत्कृत करती है आपकी लेखन शैली!!

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  8. हमारी टिप्पणी का कोई तारणहार है क्या.. स्पैमासुर से बचाओ प्रभु!!!!

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  9. hriday vidarak katha ...!!
    apne aise likha hai jaise aankhon ke samne ghatit ho raha ho ...!!

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  10. बहुत अपनी सी लगी कहानी। इस चरित्र से परिचय है, इसलिए स्मृति के गलियारे से हम भी हो आए। ऐसे पात्रों के जीवन में इतनी कठिन परीक्षाएं क्यों होती हैं, आज तक समझ नहीं पाया।

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  11. यही होता है - ऐसे चरित्रों की कथा,अपने देखे किसी पात्र की बरबस याद दिला जाती है .

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