गांधी और गांधीवाद
464. गांधीजी बिहार में-1
1947
दो महीने तक रोज़ नंगे पांव नोआखाली में गांव-गांव
पद-यात्रा करने के बाद 5 मार्च, 1947 को गांधीजी बिहार पहुंच
गए। नोआखाली से जब वे बिहार और बाद में दिल्ली गए, तब वे सांप्रदायिक एकता पुनः स्थापित
करने के अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए अपने सारे पुराने साथियों को नोआखाली में छोड़
गए थे। बिहार में नोआखाली से स्थिति उलटी थी।
यहां शर्मिंदा मुसलमानों को होना पड़ा था। यहां हिन्दू किसानों ने पूर्वी बंगाल में
मुसलमान बहुसंख्यकों द्वारा किए गए अत्याचारों का भयंकर बदला लिया था। गांधीजी ने कलकत्ता
से चलते समय बिहार के नाम संदेश देते हुए कहा था, “मेरे स्वप्नों के बिहार ने मुझे झूठा साबित कर दिया
है। ऐसा न हो कि जिस बिहार ने कांग्रेस की प्रतिष्ठा बढ़ाने में इतना काम किया है, वही
सबसे पहले उसकी क़ब्र खोदने वाला बन जाए।”
प्लेटफ़ॉर्म पर गांधीजी को लेने डॉ. सैयद महमूद
और प्रांतीय कांग्रेस समिति के मुस्लिम अध्यक्ष प्रो. अब्दुल बारी आए थे। जैसे ही गांधीजी
डॉ. महमूद के घर पहुँचे, बिहार मंत्रिमंडल और प्रांतीय कांग्रेस समिति
के सदस्यों के साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद उनसे मिलने आ गए। बादशाहख़ान के सहयोगियों ने आकर गांधीजी को रिपोर्ट दी। वह बहुत ही निराशाजनक
थी। उसके बाद सी.पी.एन. सिन्हा मिलने आए। वे उस समय पटना विश्वविद्यालय के उप-कुलपति
थे। उन्होंने बताया, “कांग्रेस के कार्यकर्ताओं
ने सब जगह दंगों को रोका नहीं, जैसा उन्हें करना चाहिए था।” राजेन्द्र प्रसाद ने बताया, “मुस्लिम लीग और उसके नेशनल गार्ड लड़ाई की तैयारियां
कर रहे हैं। अलीगढ़ से ढेर सारे हथियार प्रान्त में लाए जा रहे हैं। मुसलमानों का आर्थिक
बहिष्कार किया जा रहा है। हिन्दुओं के विवाह में मुसलमान चूड़ियां देते थे। नाई हज़ामत
करते थे। लोगों में सच्चे पश्चाताप की कमी थी। पूजा-पाठ के लिए फूल भी वही उपलब्ध
कराते थे। जब इन दोनों का जीवन इतनी गहराई से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था, तब उन्हें अलग करना, किसी जीवित व्यक्ति के अंगों को चीरकर अलग करने
जैसा था।”
मुस्लिम
लीग के नेताओं से मिले
बिहार पहुंचने पर गांधीजी मुस्लिम लीग के पूर्व अध्यक्ष नवाब
इस्माइल और लीग के नेता सैयद अब्दुल अजीज से मिले। दोनों ही नेता अस्वस्थ थे। लीग के
ये नेता गांधीजी को मुसलमानों का दुश्मन नम्बर एक मानते थे। गांधीजी के दंगों के दौरान
बिहार न पहुंचने की वे कड़ी आलोचना किया करते थे। गांधीजी के बारे में सैयद अब्दुल अजीज
की पुस्तक 'रिफ्लेक्शंस ऑन द
बिहार ट्रेजेडी' (Reflections on the Bihar Tragedy) में की गई टिप्पणियाँ, एक कड़वाहट भरे मन द्वारा लगाए गए सरासर
अन्यायपूर्ण आरोप थे। गांधीजी ने उनके साथ एक घंटा बिताया। मानवीय
संवेदना का एक स्पर्श पूरी दुनिया को अपना बना लेता है। गांधीजी ने उनसे उनके विचार
सुने। गांधीजी ने सैयद अब्दुल अज़ीज़ के साथ एक घंटा बिताया, उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली और
उन्हें प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) से इलाज करवाने के लिए राज़ी किया। बाद
में, उन्होंने कलकत्ता
से एक प्राकृतिक चिकित्सक को बुलवाया ताकि वह सैयद अब्दुल अज़ीज़ की देखभाल कर
सकें। गांधीजी के
व्यक्तित्व के अत्यंत मानवीय पहलू ने अपने विरोधियों पर किस हद तक विजय प्राप्त की, यह अब्दुल अज़ीज़ द्वारा गांधीजी को लिखे एक
पत्र से स्पष्ट होता है: "आपको पटना पहुँचने के ही दिन मुझसे मिलने की
कृपा किए हुए पूरे डेढ़ महीना बीत चुका है। यदि मेरे लिए ऐसा करना संभव होता—भले
ही बैसाखियों के सहारे ही क्यों न होता—तो मुझे आपसे मिलने वापस आने में अत्यंत
प्रसन्नता होती।"
बिहार के
मंत्रियों के साथ बैठक
उसके बाद वे बिहार के मंत्रियों के साथ लंबी बैठक
किए। कांग्रेसी नेताओं को अपना रोष प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे बिहार से ऐसी आशा नहीं थी। आप सत्ता पाकर सुस्त
पड़ गए।” उन्होंने कांग्रेस से सार्वजनिक रूप से अपनी ग़लती
स्वीकार करने को कहा और तुरंत जांच आयोग बैठाने को कहा। गांधीजी का कहना था, “जिन कांग्रेसियों ने दंगा में हिस्सा लिया था, उन्हें
अपने आपको थाने में समर्पित कर देना चाहिए। जिनके पास मुसलमान लड़कियां हैं, उन्हें
वापस कर देना चाहिए।” बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा ने कहा, “लीग इससे राजनीतिक लाभ उठाएगी।” गांधीजी ने कहा, “ऐसा होना असंभव नहीं
है। लेकिन न्याय यह विचार कभी नहीं करता कि उसका दुरुपयोग किया जाएगा। नोआखाली की मेरी
तीन मास की तपस्या से मुझे यही पाठ मिला है। मैं तो अंधेरे में टटोल रहा था, परन्तु
मैंने वही बात कही जो मुझे सत्य प्रतीत हुई। जो लोग मुझे अपना शत्रु समझते थे, वे उसका
दुरुपयोग कर सकते थे। परन्तु मेरा विश्वास था कि जल्द ही वे अपनी भूल समझ लेंगे। मेरी
एकमात्र शक्ति अहिंसा में है। यही बात आप पर भी लागू होती है। आप उसे समझ लें तो आपका
डर दूर हो जाएगा। उस स्थिति में आप बाहरी विचारों से विचलित न होकर न्याय ही करेंगे।”
नरसंहार
जालियांवाला बाग नरसंहार जैसा
मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने कभी भी उन
अत्याचारों को "कम करके दिखाने" की कोशिश नहीं की थी। गांधीजी ने कहा, "जो कुछ मैं
सुन रहा हूँ, उससे मुझे ऐसा
लगता है कि बिहार का नरसंहार जलियाँवाला बाग नरसंहार जैसा ही था।" डॉ.
राजेंद्र प्रसाद ने कहा कई बिहारियों को लगता था कि उन्होंने जो किया, वह अच्छा ही किया। गांधीजी ने जवाब दिया कि
उन्हें उसी पाप से बचाने के लिए वे वहाँ आए थे। उन्होंने नवाब इस्माइल से कहा था
कि वे बिहार में "करेंगे या मरेंगे"। डॉ. राजेंद्र प्रसाद: "मुझे
पूरा विश्वास है कि हम सफल होंगे। आप हमें आदेश दें।" गांधीजी बोले "चंपारण
में किसी ने किसी को आदेश नहीं दिया था। वह एक सहज निष्ठा थी। आपने वह चमत्कार
देखा ही था। यदि यहाँ भी वैसा ही हुआ, तो हम 'लीग' को भी जीत लेंगे।"
बिहार को
संदेश
पटना की प्रार्थना सभा में बिहार को भी गांधीजी
ने वही संदेश दिया, जो पूर्वी बंगाल को दिया था। बहुसंख्यकों को कृत्यों
के लिए पश्चाताप कर, अपनी भूल सुधार कर, क्षति की पूर्ति करनी
चाहिए, और अल्पसंख्यकों को
क्षमा-दान द्वारा नया जीवन शुरू करना चाहिए। दुर्घटनाओं के लिए वह कोई भी बहाना सुनने
को तैयार न थे। लेकिन उन्होंने उन लोगों को फटकारा, जो बिहार में हुए दंगे
का इस आधार पर समर्थन करते थे, कि वे पूर्वी बंगाल की घटनाओं की प्रतिक्रिया थे।
दूसरे चाहे जो भी करें, सभ्य व्यवहार हर व्यक्ति और समुदाय का अपना कर्तव्य
है। गांधीजी सत्य की खोज कर रहे थे। वे मंत्रियों और लीग के नेताओं से मिले। मुस्लिम पीड़ित
उनके पास आए और अपनी दुख-भरी दास्तान उन्हें सुनाई। 'फ्रेंड्स सर्विस यूनिट' ने उन्हें अपनी रिपोर्ट सौंपी। अधिकारियों की
सुस्ती, उचित राहत संगठन
का अभाव और सक्रिय हिंदू नेतृत्व की कमी के कारण काम में रुकावट आ रही थी।
गांधीजी
का प्रयत्न
दूसरे दिन 6 मार्च को गांधीजी ने राजेन्द्र प्रसाद से कहा, “मैं कुछ शर्तों पर मुसलमानों को एक जगह एकत्र होने
दूंगा, परन्तु न तो उन्हें हथियार दूंगा और न मुस्लिम पुलिस और सेना दूंगा। इसके बजाए
मैं उन्हें सफल संरक्षण दूंगा।” राजेन्द्र प्रसाद सहमत हुए। शाम की प्रार्थना सभा बांकीपुर मैदान में हुई। गांधीजी
ने बिहार के मुसलमानों से कहा, “आपको मनुष्य का डर छोड़कर ईश्वर में ही विश्वास रखना
चाहिए।” और हिन्दुओं से कहा, “अपने मुसलमान भाइयों का भय मिटाना आपका काम है।” गांधीजी ने अपना प्रयत्न ज़ारी रखा। वे पीड़ितों
के दुख-दर्द सुनते। यह देखने की कोशिश करते कि दोनों क़ौमों की एकता में जो भंग हो गया
है उसे कैसे ठीक किया जाए। अगले ही दिन होली—रंगों के त्योहार पड़ने वाला था।
गांधीजी को उम्मीद थी कि होली का त्योहार उनके बीच पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों के
पुनरुद्धार का प्रतीक बनेगा। समाजवादी पार्टी नेता जयप्रकाश नारायण भी गांधीजी से आकर
मिले। उन्होंने ठोस सबूत गांधीजी के सामने रखे, जो सरकार के ख़िलाफ़ थे। उनका आरोप था
कि कांग्रेस के बहुत ऊंचे पदाधिकारियों ने भी दंगों में भाग लिया था।
चार
आने का दान
एक गरीब, अंधा हिंदू भिखारी उनका इंतज़ार कर रहा था ताकि
जब वे अपनी सुबह की सैर से लौटें, तो वह उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद ले सके; क्योंकि वह उन्हें देख नहीं सकता था। उसने उनके
पैरों के पास चार आने के छोटे सिक्के रखे—जो ज़ाहिर तौर पर उसने भीख माँगकर जमा
किए थे—और उन्हें मुस्लिम पीड़ितों की मदद के लिए बने उस फंड में अपनी विनम्र भेंट
के तौर पर दिया, जिसे गांधीजी ने
बिहार आने के बाद शुरू किया था। गांधीजी का दिल खुशी से भर गया। उन्होंने कहा, "चार आने का यह दान मेरे लिए चार करोड़ रुपए से
भी ज़्यादा कीमती है। क्योंकि इस गरीब आदमी ने वह सब कुछ दे दिया जो उसके पास
था।" उन्होंने प्यार से
उस अंधे आदमी की पीठ थपथपाई और उससे कहा कि वह तुरंत भीख माँगना छोड़ दे। उन्होंने
अपने साथ आए लोगों में से एक से यह भी कहा कि अगर वह सूत कातना सीखना चाहे, तो उसे एक तकली दी जाए। इसके अलावा, उन्होंने निर्देश दिया कि प्रांतीय कांग्रेस का
मुख्यालय, सदाकत आश्रम, उसे कोई ऐसा काम दे जिससे वह अपनी रोज़ी-रोटी
कमा सके।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर