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रविवार, 19 सितंबर 2010

काव्यशास्त्र (भाग-2) काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन)

काव्यशास्त्र (भाग-2)

काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन)


मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

काव्य प्रयोजन के उपरान्त काव्य रचना के कारणों (कारकों) पर विचार करना आवश्यक है। क्योंकि आजकल के रचनाकारों की रचनाओं के पर्यालोचन से ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें से अधिकांश लोगों में शिक्षा और अध्यवसाय का अभाव है, विशेषकर जो मंचों पर दिखायी पड़ते हैं। अथवा अन्य समर्थ रचनाकारों के बिम्बों और अर्थों का आहरण कर लेते हैं। ऐसे रचनाकारों के प्रति महाकवि विल्हण ने काव्यार्थचोर शब्द का प्रयोग किया है-

साहित्यपाथोनिधिमन्थनोत्प्यं कर्णामृतं रक्षत हे कवीन्द्राः।

यदस्य दैत्या इव लुण्ठनाय काव्यार्थचौराः प्रगुणीभवन्ति।।

अर्थात् हे कवीन्द्रगण साहित्यरूपी समुद्र के मंथन से उत्पन्न कर्णामृत (कानों को अमृत तुल्य सुख प्रदान करने वाला पदार्थ शब्दार्थ) की रक्षा करें, क्योंकि उसे लूटने के लिए काव्यार्थ के चोरों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हो रही है।

इसलिये जो सुधी-जन काव्यसृजन में प्रवृत्त होना चाहते हैं, उनके लिए प्राचीन आचार्यों ने काव्य-रचना के कारकों की चर्चा की है। उसी का यहाँ उल्लेख किया जा रहा हैं।

आचार्य वामन ने लोक, विद्या और प्रकीर्ण-ये तीन काव्य के अंग अर्थात् काव्य रचना की क्षमता की प्राप्ति के साधन माने हैं-

लोको विद्या प्रकीर्णञ्च काव्यङ्गानि।

‘लोक’ शब्द को परिभाषित करते हुए आचार्य वामन लिखते हैं- ‘लोकवृत्तं लोकः’ अर्थात् स्थावर, जंगम आदि संसार का व्यवहार। व्याकरण, स्मृतियाँ , शब्द कोश, छन्द, विभिन्न कलाएँ, कामशास्त्र, दण्डनीति आदि विद्या की परिधि में रखी गयी हैं-

शब्दस्मृत्यभिधानकोश-छन्दोविचिती-कला-कामशास्त्र-दण्डनीतिपूर्वा विद्याः।

लक्ष्यज्ञता-अभियोग-लगन, निष्ठा, वृद्धसेवावेक्षण विभिन्न शास्त्रों के मर्मज्ञों की सेवा कर उनमें निहित विद्याओं और काव्य शिक्षा का अभ्यास, प्रतिभान-प्रतिभा और अवधान अर्थात सजगता को प्रकीर्ण कहा है-

लक्ष्यज्ञत्वमभियोगो वृद्धसेवावेक्षणं प्रतिभानमवधानञ्च प्रकीर्णम्।

कुछ इसी प्रकार काव्यरचना के कारकों का उल्लेख आचार्य वामन के पूर्ववर्ती आचार्य भामह ने भी किया हैः-

शब्दछन्दोऽभिधानार्था इतिहासाश्रयाः कथाः।

लोको युक्तिः कलाश्चेति मन्तव्या काव्यगैरमी।।

शब्दाभिधेये विज्ञाय कृत्वातद्विदुपासनाम्।

विलोक्यान्यनिबन्धांश्च कार्यः काव्यक्रियादरः।।

आचार्य मम्मट उक्त सभी करकों को मिलाकर समष्टि रूप से केवल एक हेतु, कारक अथवा कारण मानते हैं। उन्होंने यह सब एक ही कारिका में कह डाला हैः-

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्यद्यवेक्षणात्।

काव्यज्ञशिक्षाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे।।

अर्थात् शक्ति-कवि में अन्तर्निहित उसकी स्वाभाविक प्रतिभा, लोकव्यवहार, शास्त्र तथा काव्य आदि के अध्ययन से उत्पन्न निपुणता और काव्य के मर्मज्ञों की शिक्षा के अनुसार काव्य-रचना का अभ्यास, ये तीनों समष्ठि रूप से काव्य रचना के कारण हैं।

उक्त कारिका की व्याख्या करते हुए आचार्य मम्मट स्वयं लिखते हैः-

शक्तिः कवित्वबीजरूपः संस्कारविशेषः यांविना काव्यं न प्रसरेत्, प्रसृतं वा उपहसनीयं स्यात्। लोकस्य स्थावरजङ्गमात्मकस्य लोकवृत्तस्य, शास्त्राणां छन्दोव्याकरणभिधान कोशकलाचतुर्वर्गगजतुरगखङ्गादिलक्षणग्रन्थानाम्, काव्यानां च महाकविसम्बन्धिनाम्,

आदिग्रहणादितिहासादीनां च विमर्शनाद् व्युत्पत्तिः। काव्यं कर्तुं विचारयितुं च ये जानन्ति तदुपदेशेन करणे योजने च यौनः पुन्येन प्रवृन्तिरिति त्रयः समुदिताः, न तु व्यस्ताः, तस्य काव्यस्योद्भवे निर्माणे समुल्लासे च हेतुर्न तु हेतवः।

अर्थात् 1. कवित्व का बीजभूत संस्कार विशेष (प्रतिभा) शक्ति है, जिसके बिना काव्य रचना सम्भव नहीं और यदि काव्य रचना होती भी है, तो उपहास के योग्य होती है। 2. लोक अर्थात् स्थावर-जंगम आदि रूपी संसार के व्यवहार, शास्त्र-छन्द, व्याकरण, संज्ञाशब्दों के कोश, कला (भरत, कोहल आदि आचार्यों द्वारा विरचित नृत्य-गीत आदि चौसठ कलाओं का निरूपण करने वाले लक्षण ग्रंथ) चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतिपादक ग्रंथ), हाथी-घोड़े आदि के लक्षणों की विवेचना करने वाले ग्रंथ, अस्त्र-शस्त्र आदि के प्रतिपादक लक्षण-ग्रंथ और महाकवियों के काव्य तथा इतिहास आदि के अध्ययन से प्राप्त ज्ञान तथा 3. काव्य के रचनाकारों और विवेचकों के उपदेश के अनुसार काव्य का अध्ययन और रचना का बार-बार अभ्यास, ये तीनों मिलकर (उत्तम) काव्य रचना का एक कारण है, तीन अलग-अलग नहीं।

यदि संक्षेप में कहा जाय तो शक्ति अर्थात् प्रतिभा, लोकव्यवहार, विभिन्न शास्त्रों एवं काव्य आदि के आलोड़न-विलोड़न से उत्पन्न ज्ञान तथा काव्य की रचना-शैली,

उसके गुण व दोणों के ज्ञाता के पास रहकर उनकी शिक्षा के अनुसार काव्य रचना का अभ्यास की समष्टि को काव्य-रचना की योग्यता का कारण बताया गया है।