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शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-5

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-5

22.2.5 नूरी पंथ – सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में नूरी पंथ (या नूरिया सिलसिला) प्रारंभिक सूफ़ी इतिहास के सबसे पवित्र, त्यागी और प्रेम-प्रधान संप्रदायों में से एक है। इस पंथ की स्थापना 9वीं शताब्दी के बगदाद के एक महान सूफ़ी संत हज़रत अबू अल-हुसैन अहमद बिन मोहम्मद अल-नूरी ख़रक़ानी रह. (840–908 ईस्वी) ने की थी। वे हज़रत सिर्री सक़ती रह. के शिष्य (मुरीद) और हज़रत जुनैद बगदादी रह. के बेहद करीबी साथी और समकालीन थे। सूफ़ी विद्वान उन्हें 'अमीरुल कुलूब' (दिलों के अमीर) और 'क़मरुस सूफ़ी' (सूफ़ियों का चाँद) भी कहते हैं। महान सूफ़ी विद्वान हज़रत अली हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी कालजयी पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में नूरी पंथ की विचारधारा और सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन किया है।

ख़्वाजा हसन नूरी के अनुसार दूसरों के अधिकार और लाभ पर अपना अधिकार और लाभ न्यौछावर कर देना चाहिए। साधु-संतों को एकांतवास में नहीं सत्संग में रहना चाहिए। नूरी पंथ का सबसे बुनियादी और क्रांतिकारी सिद्धांत 'ईसार' है। ईसार का अर्थ होता है, अपने भाइयों, समाज और दूसरों के कल्याण के लिए अपनी सबसे प्रिय चीज़, यहाँ तक कि अपनी जान की भी परवाह न करना। हज़रत नूरी रह. फ़रमाते थे: "मेरा पूरा तरीक़त (मार्ग) ईसार पर टिका है।" उनका मानना था कि केवल नमाज़ और रोज़े से कोई सूफ़ी नहीं बनता, बल्कि दूसरों के सुख के लिए अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग करना ही सच्ची रूहानियत है।

जहाँ जुनैदी पंथ होश (सह्ब) और विवेक पर ज़ोर देता था, वहीं नूरी पंथ अल्लाह की बेपनाह 'मोहब्बत' को सर्वोपरि मानता था। हज़रत नूरी इतिहास के उन पहले सूफ़ियों में से थे जिन्होंने खुलेआम यह घोषणा की: "मैं अल्लाह से मोहब्बत करता हूँ और अल्लाह मुझसे मोहब्बत करता है"। उनका मानना था कि सच्चा सूफ़ी वह है जो ईश्वर के प्रेम में इस कदर जुड़ जाए कि दुनिया की हर दूसरी चीज़ से उसका नाता टूट जाए। नूरी संप्रदाय में सांसारिक धन-दौलत और वैभव को रूहानियत का सबसे बड़ा दुश्मन माना गया है। उन्होंने 'फक्र' (अल्लाह के सामने अपनी फकीरी और लाचारी को स्वीकार करना) को अमीरी पर हमेशा तरजीह दी। वे स्वयं बेहद सादगी का जीवन जीते थे और जो कुछ भी उनके पास होता था, उसे गरीबों में बांट देते थे।

नूरी पंथ के संतों के त्याग को समझने के लिए इतिहास का एक वाकया बहुत मशहूर है। सन 878 ईस्वी में बगदाद के रूढ़िवादी उलेमाओं ने हज़रत नूरी और उनके सूफ़ी साथियों पर कुफ्र (नास्तिकता) का आरोप लगाकर मौत की सज़ा मुक़र्रर करवा दी थी। जब जल्लाद सज़ा तामील करने आया, तो हज़रत नूरी मुसकुराते हुए अपने साथियों से पहले आगे कूद गए और कहा, "पहले मेरी गर्दन काटो!" जल्लाद ने हैरान होकर पूछा कि आप मौत के लिए इतनी जल्दी में क्यों हैं? हज़रत नूरी ने जवाब दिया, "मैं अपने भाइयों को दुनिया में कुछ सांसें और ज़्यादा जीने देना चाहता हूँ, उनकी जान के बदले अपनी जान देना मेरे सूफीमत का मूल है"। इस बेमिसाल ईसार और मोहब्बत को देखकर न्यायाधीश (क़ाज़ी) रो पड़ा और उसने उन्हें बाइज्ज़त बरी कर दिया।

हज़रत अबू अल-हुसैन नूरी ने 'मक़ामात अल-क़ुलूब' (Stations of the Hearts) नामक एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी। इस किताब में उन्होंने दिल के अलग-अलग आध्यात्मिक पड़ावों और खुदा की मोहब्बत को हासिल करने के रास्तों को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया है। इस प्रकार यह सही है कि सूफ़ीवाद का नूरी पंथ ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम (इश्क़) और मानवता के प्रति परम आत्म-बलिदान (ईसार) का एक आदर्श उदाहरण है।

22.2.6 सुहैली पंथ – इस्लाम के स्वर्ण युग के एक महान सूफ़ी संत, धर्मशास्त्री और मुफ़स्सिर (क़ुरआन के व्याख्याकार) ख़्वाजा सुहैल-बिन-अब्दुल्लाह तस्तरी रह. (मृ. 896 ई.) इस पंथ के प्रवर्तक थे। उनका जन्म लगभग 818 ईस्वी में ईरान के शुश्तर (तस्तर) शहर में हुआ था और वफ़ात 282 हिजरी (यानी लगभग 896 ईस्वी) में बसरा (इराक़) में हुई। हज़रत सहल अल-तस्तरी बचपन से ही बेहद इबादतगुज़ार और परहेज़गार थे। कहा जाता है कि मात्र 6-7 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पवित्र क़ुरआन को कंठस्थ (हिफ़्ज़) कर लिया था। जब वे बहुत छोटे थे, तो उनके मामा (मुहम्मद इब्न सुवार) ने उन्हें सोते समय बिना ज़ुबान हिलाए, दिल में तीन वाक्य दोहराने की सीख दी थी, "अल्लाह मेरे साथ है, अल्लाह मुझे देख रहा है, अल्लाह मेरा गवाह है।" इस निरंतर आंतरिक स्मरण (ज़िक्र) ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया और उनमें गहरे 'तक़वा' (ईश्वर-भय) और रूहानियत का संचार किया। उन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध सूफ़ी बुज़ुर्ग हज़रत ज़ुन्नून अल-मिस्री रह. से मुलाक़ात की और उनसे आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। इतिहास के सबसे प्रसिद्ध और चर्चित सूफ़ी रहस्यवादियों में से एक, हज़रत मंसूर अल-हल्लाज, प्रारंभिक दिनों में हज़रत सहल अल-तस्तरी के ही शिष्यों में शामिल थे।

वे ईश्वर के सान्निध्य के लिए आत्म साधना और योग को अनिवार्य मानते थे। इस पंथ की मान्यता थी कि मनोकामना के विरुद्ध साधना करनी चाहिए। कामनाओं और इच्छाओं का दमन करना चाहिए। अल-तस्तरी ने अहंकार और आत्म-इच्छाओं (नफ़्स) के दमन पर बहुत ज़ोर दिया। उनका मानना था कि वास्तविक दिव्य ज्ञान (मारिफ़त) आत्म-त्याग और दुनिया की बेरुख़ी से ही हासिल हो सकता है। वह अल्लाह पर पूर्ण भरोसे को ही सूफ़ी मार्ग का असली आधार मानते थे। वह कहते थे कि "अल्लाह पर भरोसा नबी का हाल है, और कमा कर खाना उनकी सुन्नत है"। उनके शब्दों में, "सूफ़ी वह है जो इंसानी दुनिया से कटकर ख़ुदा से जुड़ जाए और जिसके लिए सोना और मिट्टी दोनों बराबर हो जाएँ"।

उनके द्वारा की गई क़ुरआन की व्याख्या को 'तफ़्सीर अल-तस्तरी' या 'तफ़्सीर अल-क़ुरआन अल-अज़ीम' कहा जाता है। यह सूफ़ी दृष्टिकोण (तसव्वुफ़) से लिखी गई क़ुरआन की सबसे शुरुआती और प्राचीनतम जीवित व्याख्याओं (तफसीर) में से एक मानी जाती है। उन्हें उनके समकालीन विद्वानों और परवर्ती सूफ़ियों द्वारा अत्यंत आदर के साथ याद किया जाता है। सूफ़ियाना इतिहास में उन्हें 'शेख़-उल-आरिफ़ीन' (ज्ञानियों के गुरु) के नाम से भी जाना जाता है।

22.2.7 हकीमी पंथ – सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में हकीमी पंथ शुरुआती दौर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दार्शनिक संप्रदाय है। इसकी स्थापना 9वीं शताब्दी के अंत में ख़ुरासान (वर्तमान उज़्बेकिस्तान/ईरान का क्षेत्र) के प्रसिद्ध शहर तिरमिज़ में महान सूफ़ी संत और विचारक हज़रत अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अली अल-हकीम अल-तिर्मिज़ी रह. (मृत्यु 932 ईस्वी) ने की थी। हज़रत अल-हकीम तिर्मिज़ी केवल एक सूफ़ी ही नहीं बल्कि एक उच्च कोटि के हदीस विद्वान और दार्शनिक भी थे। महान सूफ़ी विद्वान हज़रत अली हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में प्रारंभिक सूफियों के जिन प्रमुख 10 संप्रदायों का उल्लेख किया है, उनमें 'हकीमी पंथ' का स्थान बहुत ऊंचा है।

हकीमी पंथ का सबसे बुनियादी और क्रांतिकारी सिद्धांत 'विलायत' का दर्शन है। हज़रत हकीम तिर्मिज़ी सूफी इतिहास के पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने 'वली' (Saint/अल्लाह के मित्र) की अवधारणा का एक व्यवस्थित और दार्शनिक ढांचा तैयार किया। इस पंथ के प्रवर्तक ख़्वाजा अब्दुल्लाह मुहम्मद-बिन-अली हकीम तिरमज़ी रह. का मानना था कि वली हर युग में होता है। वह सभी प्राणियों से श्रेष्ठ होता है। चूंकि उसकी आत्मा ईश्वरीय आदेशों के अधीन होती है, इसलिए उसे सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है। वह चमत्कार तो दिखा सकता है लेकिन नबी के समकक्ष नहीं हो सकता। जैसे पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) नबूवत (पैगंबरी) के सिलसिले की आखिरी कड़ी (ख़ातम-अन-नबीयीन) हैं, ठीक उसी तरह हकीमी दर्शन के अनुसार वलियों (संतों) के पदानुक्रम में भी एक ऐसा सर्वोच्च वली होगा जो 'ख़त्म-अल-वली' (वलियों की आखिरी कड़ी) कहलाएगा। इस विचार ने बाद में हज़रत इब्न अरबी जैसे महान सूफ़ी चिंतकों को गहराई से प्रभावित किया।

इस पंथ का नाम इसके संस्थापक के लकब 'हकीम' पर पड़ा है, जिसका अर्थ होता है "बुद्धिमान या तत्वदर्शी। हकीमी पंथ का मानना है कि शरीयत (धार्मिक नियमों) के जितने भी आदेश या पाबंदियां हैं, उनके पीछे अल्लाह की कोई न कोई गहरी हिकमत (Hidden Wisdom) और रहस्य छुपा होता है। इस पंथ के साधकों का मुख्य उद्देश्य केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि साधना के जरिए उन नियमों के पीछे छिपी दिव्य बुद्धिमत्ता को पहचानना होता था।

हकीम तिर्मिज़ी ने मन के मनोविज्ञान पर बहुत विस्तार से लिखा। हकीमी संप्रदाय के अनुसार, मनुष्य का 'नफ़्स' (अहंकार/वासना) रूहानी तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने अपनी किताबों में इंसान के दिल और नफ़्स के बीच चलने वाले आंतरिक संघर्ष का गहरा विश्लेषण किया और सिखाया कि जब तक नफ़्स की इच्छाओं को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक दिल में 'नूर' (ईश्वरीय प्रकाश) प्रवेश नहीं कर सकता।

हकीमी संप्रदाय की पूरी विचारधारा मुख्य रूप से हज़रत हकीम तिर्मिज़ी की पुस्तकों पर आधारित थी, जिनमें दो किताबें इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती हैं। ख़त्मुल औलिया में उन्होंने विलायत (Sainthood) के अर्थ, वलियों के दर्जे और उनके रूहानी अधिकारों की विस्तृत व्याख्या की है। नवादिरुल उसूल हदीस और सूफी रहस्यों का एक अनूठा संग्रह है, जो उनके गहरे आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शाता है।

चूंकि हकीम तिर्मिज़ी ने 'विलायत' और सूफी सिद्धांतों को समझाने के लिए दार्शनिक और तर्कसंगत शब्दावली का इस्तेमाल किया था, इसलिए उनके दौर के कुछ पारंपरिक उलेमा (धर्मशास्त्री) उनके विचारों से सहमत नहीं हुए। उन पर कुछ फतवे भी लगे और उन्हें कुछ समय के लिए तिरमिज़ शहर छोड़ना पड़ा। हालांकि, बाद के सूफी संतों (जैसे शेख फरीदुद्दीन अत्तार और इब्न अरबी) ने हकीमी पंथ के विचारों को सूफीवाद की रीढ़ की हड्डी माना। हकीमी पंथ सूफ़ीवाद की वह दार्शनिक और ज्ञानी शाखा है जिसने 'विलायत' (संतत्व) के गूढ़ रहस्यों को सुलझाया और ईश्वर की इबादत को केवल अंधानुकरण न मानकर उसके पीछे छिपी दिव्य बुद्धिमत्ता (हिकमत) को खोजने पर ज़ोर दिया।

22.2.8 ख़र्राज़ी पंथ – सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में ख़र्राज़ी पंथ (ख़र्राज़िया सिलसिला) प्रारंभिक सूफ़ी इतिहास के सबसे सूक्ष्म और गूढ़ दार्शनिक संप्रदायों में से एक है। इस पंथ की स्थापना 9वीं शताब्दी के बगदाद के एक महान सूफ़ी संत और सिद्धांतकार हज़रत अबू सईद अहमद बिन ईसा अल-ख़र्राज़ रह. (मृत्यु 899 ईस्वी) ने की थी। हज़रत अबू सईद अल-ख़र्राज़ अपने दौर के बहुत बड़े फ़क़ीह (कानूनविद) थे और हज़रत जुनैद बगदादी रह. के बेहद करीबी मित्रों में से थे। महान सूफ़ी विद्वान हज़रत अली हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में प्रारंभिक सूफ़ियों के जिन प्रमुख 10 संप्रदायों का वर्णन किया है, उनमें ख़र्राज़ी पंथ का उल्लेख बहुत आदर के साथ किया गया है।

ख़र्राज़ी पंथ की सबसे बड़ी ऐतिहासिक देन 'फ़ना' (Annihilation) और 'बक़ा' (Subsistence) के सिद्धांतों को एक व्यवस्थित और स्पष्ट परिभाषा देना है। हज़रत अल-ख़र्राज़ सूफ़ी इतिहास के पहले ऐसे विचारक माने जाते हैं जिन्होंने इन दोनों रूहानी अवस्थाओं पर विस्तार से लिखा। फ़ना से तात्पर्य है कि संसार की समस्त वस्तुएं क्षणिक या नश्वर हैं। उनके अनुसार फ़ना का अर्थ केवल अपनी पहचान मिटाना नहीं है, बल्कि साधक का अपने मानवीय दोषों, अज्ञानता, अहंकार और सांसारिक इच्छाओं से पूरी तरह 'विमुख (मिट)' हो जाना है। और बक़ा से तात्पर्य है कि परलोक और जो कुछ ईश्वर के पास है, वही शेष रहेगा। जब इंसान के भीतर से बुराइयां फ़ना (नष्ट) हो जाती हैं, तो वह अल्लाह के दिव्य गुणों, ज्ञान और उसकी मर्जी के साथ 'अमर (बक़ा)' हो जाता है। ख़र्राज़ी दर्शन कहता है कि सच्चा सूफ़ी वही है जो अल्लाह की जात में फ़ना होकर उसी के नूर से बक़ा हासिल करे।

इस पंथ ने “ख़ैरून-वअल-अबक़ा” का मत सामने लाया जिसका अर्थ होता है मनुष्य अपने क्षणिक जीवन को उद्देश्य न बनाए, यह तो नष्ट हो जाएगा। वह अपना समस्त ध्यान का केन्द्र परलोक को बनाए जो श्रेष्ठ है और शाश्वत रहेगा। हज़रत अबू सईद अल-ख़र्राज़ चूंकि स्वयं एक बड़े इस्लामी न्यायविद थे, इसलिए उनका संप्रदाय शरीयत (बाहरी धार्मिक कानून) का बहुत कड़ाई से पालन करता था। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी आंतरिक आध्यात्मिक अनुभव (तरीक़त) तब तक सच्चा नहीं हो सकता जब तक वह शरीयत की कसौटी पर खरा न उतरे। उनका एक बहुत प्रसिद्ध कथन है: "हर वह आंतरिक सत्य जिसे बाहरी शरीयत नकारती है, वह सरासर झूठ और नास्तिकता है।"

ख़र्राज़ी पंथ में ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम की साधना की जाती थी। इस पंथ का मानना था कि रूहानी ऊंचाइयों पर पहुँचकर साधक को 'ऐन अल-जमा' (परम एकात्म) की अवस्था प्राप्त होती है, जहाँ साधक का दिल हर पल केवल अल्लाह को देखता है और उसे अपने और ईश्वर के बीच का पर्दा पूरी तरह हटा हुआ महसूस होता है।

ख़र्राज़ी संप्रदाय का पूरा दर्शन हज़रत अबू सईद की कालजयी पुस्तक 'किताब अस-सिदक़' पर आधारित है। सूफ़ी साहित्य में इस किताब को 'सच्चाई (सिदक़)' के विषय पर लिखी गई पहली और सबसे प्रामाणिक मार्गदर्शिका माना जाता है। इसमें उन्होंने समझाया है कि एक साधक कैसे अपने इरादों, वचनों और कर्मों में पूर्ण रूप से सच्चा (सादिक़) बन सकता है और कैसे पाखंड से बच सकता है।

अपनी उच्च दार्शनिक शब्दावली और 'फ़ना व बक़ा' जैसे गूढ़ विचारों के कारण, हज़रत अल-ख़र्राज़ को भी अपने दौर के रूढ़िवादी उलेमाओं के विरोध का सामना करना पड़ा। उन पर कुफ्र (नास्तिकता) के आरोप भी लगाए गए, जिसके कारण उन्हें कुछ समय के लिए बगदाद छोड़कर मिस्र और हिजाज़ (मक्का/मदीना) जाना पड़ा। हालांकि, बाद के दौर में हज़रत इमाम अल-ग़ज़ाली रह. और हज़रत दाता गंज बख्श रह. जैसे महान विद्वानों ने उनके सिद्धांतों को पूरी तरह स्वीकार किया और सूफ़ीवाद को भटकाव से बचाने में ख़र्राज़ी सिद्धांतों को एक मजबूत ढाल माना। ख़र्राज़ी पंथ सूफ़ीवाद की वह संतुलित और विद्वतापूर्ण शाखा है जिसने 'फ़ना और बक़ा' के रूहानी रहस्यों को तार्किक रूप से सुलझाया और यह साबित किया कि पूर्ण सच्चाई (सिदक़) और शरीयत का पालन ही ईश्वर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है।

22.2.9 ख़फ़ीफ़ी पंथ - सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में ख़फ़ीफ़ी पंथ (ख़फ़ीफ़िया सिलसिला) 10वीं शताब्दी का एक अत्यंत प्रतिष्ठित, संयमित और विद्वतापूर्ण संप्रदाय है। इस पंथ की स्थापना फ़ारस (ईरान) के प्रसिद्ध शहर शिराज़ के महान सूफ़ी संत, धर्मशास्त्री और दार्शनिक हज़रत अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन ख़फ़ीफ़ अल-शिराज़ी रह. (882–982 ईस्वी) ने की थी, जिन्हें सूफ़ी इतिहास में 'शेखुल मशाएख' (गुरुओं के गुरु) के नाम से जाना जाता है। वह एक राजकीय परिवार से संबंध रखते थे। महान सूफ़ी विद्वान हज़रत अली हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में प्रारंभिक सूफ़ियों के जिन प्रमुख 10 स्वीकृत संप्रदायों का वर्णन किया है, उनमें 'ख़फ़ीफ़ी पंथ' को एक बहुत ही सम्मानित और प्रामाणिक स्थान दिया गया है।

उनका मानना था कि “तौहीद” (एकत्व) स्वभाव से मुंह मोड़ने का नाम है। यदि मनुष्य अपनी मनोभावना को अपने अधीन कर ले तो संसार की कोई शक्ति उसे तौहीद से अलग नहीं कर सकती। इस पंथ में काम भावना की पवित्रता पर बल दिया जाता है।

ख़फ़ीफ़ी पंथ की सबसे बड़ी दार्शनिक देन 'ग़ैबत' और 'हुज़ूर' के रहस्यों को स्पष्ट करना है। हज़रत दाता गंज बख्श रह. के अनुसार, इब्न ख़फ़ीफ़ ने इन दोनों अवस्थाओं को सूफ़ी साधना का आधार बताया। हज़रत इब्न ख़फ़ीफ़ ने फ़ना और बक़ा की जगह “ग़ैबत” (तिरोहण) और “हुज़ूर” (विद्यमान) के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत किए। ग़ैबत का अर्थ है साधक के दिल का इस नश्वर संसार, अपनी इच्छाओं और अल्लाह के अलावा हर दूसरी चीज़ से 'ग़ायब' या बेख़बर हो जाना। हुज़ूर मतलब जब दिल दुनिया से ग़ायब (विमुख) हो जाता है, तब वह पूरी तरह अल्लाह की बारगाह में 'हाज़िर' (हुज़ूर) हो जाता है। ख़फ़ीफ़ी दर्शन के अनुसार, इंसान जब तक अपनी हस्ती से ग़ायब नहीं होगा, तब तक उसे ईश्वर की उपस्थिति (हुज़ूर) का आनंद नहीं मिल सकता। उनका कहना था कि मनुष्य ईश्वर के अलावा हरेक वस्तु से यहां तक कि अपने व्यक्तित्व से भी तिरोहित हो जाए, मात्र ईश्वर के सामने विद्यमान रहे।

ख़फ़ीफ़ी संप्रदाय मूल रूप से हज़रत जुनैद बगदादी रह. के 'जुनैदी पंथ' (होश और आत्म-संयम) से गहराई से प्रभावित था। इब्न ख़फ़ीफ़ रूहानी मस्ती या मदहोशी (सुक्र) के बजाय 'सह्ब' (होश और संयम) को ज़्यादा महत्व देते थे। उनका मानना था कि एक सूफ़ी को अपने उच्चतम रूहानी अनुभवों के दौरान भी इस्लामी नियमों (शरीयत) और सामाजिक दायित्वों के प्रति पूरी तरह सचेत रहना चाहिए।

ख़फ़ीफ़ी पंथ के साधक बेहद कठिन आत्म-संयम और सादगी का जीवन जीते थे। खुद हज़रत इब्न ख़फ़ीफ़ शाही खानदान से ताल्लुक रखने के बावजूद सब कुछ छोड़कर फकीरी की राह पर चल पड़े थे। वे भूखे रहने (फ़ाक़ाकशी) और रातों को जागकर इबादत करने में बेमिसाल थे। उनके पंथ में 'तवक्कुल' (पूर्ण रूप से अल्लाह पर निर्भर होना) को इस कदर अपनाया गया था कि वे आने वाले कल के लिए भोजन या धन का संचय करने को भी आध्यात्मिक रूप से सही नहीं मानते थे।

हज़रत इब्न ख़फ़ीफ़ अपने समय के बहुत बड़े धर्मशास्त्री थे। इसलिए ख़फ़ीफ़ी पंथ ने इस बात पर बहुत ज़ोर दिया कि बिना धार्मिक ज्ञान (इल्म) के सूफ़ीवाद अधूरा और भटकाव भरा है। उन्होंने सूफ़ियों के लिए कुरान, हदीस और इस्लामी कानून (फ़िक़्ह) के अध्ययन को अनिवार्य बनाया।

ख़फ़ीफ़ी पंथ का शिराज़ और उसके आसपास के शासकों (विशेषकर बुवैहिद राजवंश) पर बहुत गहरा प्रभाव था। सुल्तान और अमीर उनके दरबार में हाज़िरी देते थे, लेकिन इब्न ख़फ़ीफ़ हमेशा उनसे दूरी बनाए रखते थे और उनके धन को सूफ़ियों के लिए हराम मानते थे। 100 वर्ष की लंबी आयु पाने वाले इस संत के जनाज़े में इतिहास के अनुसार लाखों लोग शामिल हुए थे, जिसमें राजा से लेकर रंक तक शामिल थे। ख़फ़ीफ़ी पंथ सूफ़ीवाद की वह उच्च और मर्यादित शाखा है जिसने 'संसार से विमुखता' (ग़ैबत) और 'ईश्वर में उपस्थिति' (हुज़ूर) के गूढ़ रहस्य को स्थापित किया और यह सिखाया कि कठोर तपस्या के साथ-साथ बौद्धिक व धार्मिक ज्ञान का होना ही रूहानियत का सही मार्ग है।

22.2.10 सय्यारी पंथ - सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में सय्यारी पंथ (सैय्यारिया सिलसिला) प्रारंभिक सूफ़ी इतिहास के उन 10 प्रमुख और स्वीकृत संप्रदायों में से एक है जिसका ज़िक्र हज़रत दाता गंज बख्श (अली हुजविरी) रह. ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'कश्फ़ुल महजूब' में किया है। इस पंथ की स्थापना 10वीं शताब्दी के मध्य में मर्व (ख़ुलासान, वर्तमान तुर्कमेनिस्तान का क्षेत्र) के एक महान सूफ़ी संत, धर्मशास्त्री और हदीस विद्वान हज़रत अबू अब्बास अहमद बिन मोहम्मद अस-सय्यारी रह. (मृत्यु 954 ईस्वी) ने की थी। हज़रत अबू अब्बास अस-सय्यारी अपने समय के मर्व क्षेत्र के सूफ़ियों के इमाम माने जाते थे।

उन्होंने जमा (योग) और तफ़रक़ा (विभाजन) के माध्यम से अपने सिद्धांत समाने रखे। व्यक्ति ईश्वर द्वारा स्वीकृत विशेषताओं और आचरण का धारक हो और प्रयोजन एवं उपयोग की स्वतंत्रता जो ईश्वर ने व्यक्ति को दी है यदि उससे भी अपना हाथ खींच ले, तो इसको जमा (योग) की स्थिति में होना कहते हैं। यदि उसके कार्यों और गुणों में भेद पाया जाता है तो उसे तफ़रक़ा की स्थिति कहते हैं। तफ़रक़ा का अर्थ है मानव का अपनी भौतिक इच्छाओं, कर्मों, और सांसारिक कर्तव्यों (जैसे आजीविका कमाना, शरीयत के नियमों का पालन करना) में व्यस्त रहना। यह इंसान की अपनी इंसानी अवस्था है। जमा तो ईश्वर प्रदत्त गुण है जिसे व्यक्ति बिना परिश्रम और साधना से प्राप्त कर लेता है। जमा (Union) वह उच्च आध्यात्मिक अवस्था है जहाँ साधक अपने अस्तित्व को भूलकर पूरी तरह अल्लाह की जात और उसकी मर्जी में विलीन (एकाकार) हो जाता है। हज़रत सय्यारी रह. का मानना था कि एक सच्चे सूफ़ी को इन दोनों अवस्थाओं के संतुलन को समझना चाहिए। उनका कहना था कि जब अल्लाह किसी बंदे को अपना करीबी बनाता है, तो वह उसे अपनी रूहानी हुज़ूरी (जमा) में रखता है, लेकिन दुनिया के फर्ज़ निभाने के लिए उसे वापस होश (तफ़रीक़ा) में भेजता है।

चूंकि हज़रत अबू अब्बास अस-सय्यारी स्वयं एक बहुत बड़े हदीस के ज्ञाता और इस्लामी विद्वान थे, इसलिए सय्यारी पंथ में शरीयत (धार्मिक नियमों) के कड़ाई से पालन को रूहानियत की पहली शर्त माना गया। वे किसी भी ऐसे आध्यात्मिक अनुभव या रहस्यमयी दावे को पूरी तरह खारिज करते थे जो पवित्र क़ुरान या पैगंबर साहब की सुन्नत (परंपरा) के खिलाफ हो।

सय्यारी संप्रदाय के अनुसार, इबादत का महत्व उसके बाहरी रूप से नहीं बल्कि दिल के भीतर छिपी नीयत (इरादे) की पाकीज़गी से तय होता है। हज़रत सय्यारी का एक प्रसिद्ध विचार है कि यदि मनुष्य का दिल पूरी तरह से अल्लाह के लिए समर्पित नहीं है, तो उसकी ज़ाहिरी तपस्या या भूखा रहना महज़ एक दिखावा है।

सय्यारी पंथ का मुख्य केंद्र मर्व और ख़ुरासान का इलाक़ा था। हज़रत अबू अब्बास की वफ़ात के बाद उनके शिष्यों ने ख़ुरासान में इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। 11वीं और 12वीं शताब्दी के बाद, जैसे-जैसे सूफ़ीवाद में बड़े संगठित सिलसिलों (जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरिया) का उदय हुआ, सय्यारी पंथ के उच्च विचार और सिद्धांत मुख्यधारा के सूफ़ी दर्शन (विशेष रूप से नक्शबंदी और जुनैदी सिद्धांतों) में समाहित हो गए। सय्यारी पंथ सूफ़ीवाद की वह संतुलित और ज्ञानी शाखा है जिसने ईश्वर के साथ रूहानी जुड़ाव (जमा) और दुनिया में इंसानी फ़र्ज़ (तफ़रीक़ा) के बीच के गहरे रिश्ते को सुलझाया और तसव्वुफ़ को बौद्धिक व व्यावहारिक धरातल प्रदान किया।

22.2.11 हुलूली पंथ - सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) के इतिहास में हुलूली पंथ (हुलूलिया सिलसिला) एक अत्यंत विवादास्पद, रहस्यमयी और गैर-रूढ़िवादी विचारधारा रही है। महान सूफ़ी विद्वान हज़रत अली हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में प्रारंभिक सूफ़ियों के जिन 12 संप्रदायों का ज़िक्र किया है, उनमें से 2 संप्रदायों को उन्होंने 'मर्दूद' (Rejected / खारिज किए गए संप्रदाय) घोषित किया था, हुलूली पंथ उन्हीं में से एक है।

'हुलूल' शब्द का अरबी में अर्थ होता है "प्रवेश करना, समा जाना या अवतार लेना (Incarnation/Inhabitation)"। हुलूली विचारधारा के अनुसार, ईश्वर (अल्लाह) इंसानी जिस्म में या इस भौतिक संसार की खूबसूरत चीज़ों में प्रवेश कर सकता है या समा सकता है। इस पंथ के साधकों का मानना था कि जब एक इंसान आध्यात्मिक शुद्धि के उच्चतम स्तर पर पहुँच जाता है, तो उसका मानवीय अस्तित्व मिट जाता है और खुदा की रूह (दिव्य आत्मा) उसके शरीर में निवास करने लगती है। इस विचार की समानता काफी हद तक हिंदू दर्शन के 'अवतारवाद' या ईसाई धर्म के 'ट्रिनिटी' (ईश्वर का यीशु मसीह के रूप में अवतरित होना) से की जा सकती है।

हुलूली पंथ की एक उप-शाखा सुंदर चेहरों और प्राकृतिक सुंदरता को देखने को इबादत मानती थी। उनका तर्क था कि चूंकि अल्लाह सुंदर है, इसलिए उसकी दिव्य झलक (नूर) सुंदर इंसानों या चीज़ों में 'हुलूल' (प्रकट) होती है। मुख्यधारा के सूफ़ियों और उलेमाओं ने इस विचार की सख़्त निंदा की और इसे वासना व भटकाव का रास्ता बताया।

इतिहास में प्रसिद्ध सूफ़ी संत हज़रत मंसूर हल्लाज रह. के "अनअल-हक़" (मैं ही सत्य/ईश्वर हूँ) के नारे को अक्सर रूढ़िवादी उलेमाओं द्वारा 'हुलूल' कहकर ही प्रचारित किया गया था, जिसके कारण उन्हें मृत्युदंड दिया गया। हालांकि, हज़रत दाता गंज बख्श रह. और इमाम अल-ग़ज़ाली रह. जैसे महान सूफ़ी विद्वानों ने मंसूर हल्लाज का बचाव किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंसूर हल्लाज 'हुलूली' नहीं थे; वे 'फ़ना' (ईश्वर के प्रेम में खुद को मिटाने) की चरम अवस्था में थे, जहाँ वे स्वयं को ईश्वर नहीं कह रहे थे, बल्कि उनका अपना वजूद मिट चुका था। इसके विपरीत, सच्चे हुलूली यह मानते थे कि इंसान का शरीर और ईश्वर दोनों अलग-अलग मौजूद हैं और ईश्वर इंसान के भीतर आकर ठहर गया है, जो कि एक गलत धारणा है।

हज़रत दाता गंज बख्श रह. ने 'कश्फ़ुल महजूब' में हुलूली पंथ को पूरी तरह गुमराह और इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ बताया है। मुख्यधारा के सूफ़ीवाद (जैसे चिश्ती, कादिरिया, नक्शबंदी, जुनैदी) के अनुसार अल्लाह की ज़ात (अस्तित्व) सर्वोच्च है, वह किसी भी भौतिक शरीर या स्थान में समाहित या सीमित नहीं हो सकती ("लौह-ए-महफ़ूज़" और पवित्र क़ुरान के अनुसार ईश्वर निराकार और सर्वोच्च है)। सूफ़ी का लक्ष्य ईश्वर में 'फ़ना' (विलीन) होना है, न कि ईश्वर को अपने शरीर में बुलाकर 'अवतार' बनाना। हुलूली पंथ सूफ़ीवाद के इतिहास की वह विवादास्पद और बहिष्कृत शाखा है जिसने दिव्य प्रेम की अति में 'अवतारवाद' (हुलूल) के सिद्धांत को अपना लिया, जिसे सूफ़ी संतों और इस्लामी विद्वानों दोनों ने मिलकर पूरी तरह खारिज कर दिया ताकि तसव्वुफ़ की पवित्रता बनी रहे।

22.2.12 हल्लाजिया पंथ - इस पंथ को भी विवादित पंथ माना जाता है। ये इत्तेहाद (सायुज्य)  में विश्वास रखते हैं। सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में हल्लाजिया पंथ सूफ़ी इतिहास के सबसे चर्चित, भावुक और क्रांतिकारी विचारधाराओं में से एक है। यह संप्रदाय 10वीं शताब्दी के महान, रहस्यमयी और विवादास्पद सूफ़ी संत हज़रत मंसूर हल्लाज रह. (858–922 ईस्वी) के विचारों, रूहानी अवस्थाओं और उनकी शहादत पर आधारित है। महान सूफ़ी विद्वान हज़रत अली हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में प्रारंभिक सूफ़ियों के जिन 12 संप्रदायों का विस्तृत वर्णन किया है, उनमें हल्लाजिया पंथ भी शामिल है। हज़रत दाता गंज बख्श ने इस पंथ के बारे में बहुत ही संतुलित और गहरा नज़रिया पेश किया है।

हल्लाजिया पंथ की पूरी विचारधारा का केंद्र बिंदु हज़रत मंसूर हल्लाज का प्रसिद्ध नारा "अनल-हक़" (मैं ही सत्य/ईश्वर हूँ) है। तत्कालीन रूढ़िवादी उलेमा (धर्मशास्त्रियों) ने इसे 'हुलूल' (Incarnation/ईश्वर का मानव शरीर में प्रवेश करना) या 'ईश्वर होने का दावा' माना और उन पर ईश-निंदा (Blasphemy) का आरोप लगाया। इस पंथ के अनुसार, यह घमंड या खुदा होने का दावा नहीं था, बल्कि यह 'फ़ना-फ़िल्लाह' (ईश्वर के प्रेम में खुद को पूरी तरह मिटा देना) की वह चरम अवस्था थी जहाँ साधक का अपना 'अहंकार' या 'मैं' पूरी तरह समाप्त हो जाता है। जब 'मैं' रहा ही नहीं, तो केवल 'अल्लाह' का वजूद बाकी बचा। इसलिए, हल्लाजिया संतों का मानना है कि वह आवाज़ मंसूर की नहीं, बल्कि उनके ज़रिए स्वयं अल्लाह की थी।

हल्लाजिया पंथ हज़रत बायज़ीद बस्तामी के तैफ़ूरी पंथ की तरह 'सुक्र' (Spiritual Intoxication / रूहानी मस्ती) को सर्वोपरि मानता है। वे होश (सह्ब) के मुकाबले ईश्वरीय प्रेम के उन्माद और दीवानगी को तरजीह देते थे। उनका मानना था कि जब दिव्य प्रेम का सैलाब दिल पर हावी होता है, तो साधक समाज के बनाए नियमों, सामाजिक प्रतिष्ठा और अपनी जान तक की परवाह नहीं करता।

इस पंथ का एक मुख्य सिद्धांत यह है कि ईश्वर की सच्ची मोहब्बत का रास्ता कष्टों, परीक्षणों और अंततः शहादत से होकर गुज़रता है। हज़रत मंसूर हल्लाज को जिस बेरहमी से सरेआम फांसी दी गई, उनके हाथ-पैर काटे गए और उनकी राख को दजला नदी में बहा दिया गया, उसे हल्लाजिया संतों ने प्रेम का सर्वोच्च शिखर माना। वे मौत को डरावनी चीज़ नहीं, बल्कि अपने महबूब (अल्लाह) से मिलने का एक उत्सव मानते थे।

हज़रत दाता गंज बख्श रह. ने 'कश्फ़ुल महजूब' में हल्लाजिया पंथ को लेकर सूफ़ियों के बीच की बारीक रेखा को बहुत अच्छे से स्पष्ट किया है। उन्होंने मंसूर हल्लाज को एक सच्चा, मक़बूल (स्वीकार्य) और महान सूफ़ी माना। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंसूर 'हुलूली' (गुमराह) नहीं थे, बल्कि वे प्रेम की तीव्र अवस्था (हाल) के शिकार थे।

लेकिन, दाता गंज बख्श ने 'हल्लाजिया पंथ के बाद के अनुयायियों' को दो हिस्सों में बांटा। उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ ढोंगी और अज्ञानी लोगों ने मंसूर के "अनल-हक़" के नारे को ढाल बनाकर शरीयत (धार्मिक कानूनों) का उल्लंघन करना और खुलेआम नास्तिकता फैलाना शुरू कर दिया था। इसलिए दाता गंज बख्श ने हल्लाज के मूल रूहानी विचारों का समर्थन किया, लेकिन इसकी आड़ में पाखंड करने वाले 'स्यूडो-हल्लाजियों' (Pseudo-Hallajis) को खारिज किया।

हल्लाजिया विचारधारा ने आने वाले समय के सूफ़ी साहित्य, विशेषकर फ़ारसी, उर्दू और सिंधी सूफ़ी शायरी को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। हज़रत फरीदुद्दीन अत्तार, जलालुद्दीन रूमी, हाफ़िज़ शिराज़ी और भारत-पाकिस्तान के उपमहाद्वीप में बाबा बुल्ले शाह व सच्चल सरमस्त जैसे महान कवियों ने अपनी कविताओं में 'मंसूर' और 'सूली' (फांसी) को सच्चे इश्क़ के प्रतीक के रूप में बार-बार इस्तेमाल किया। हल्लाजिया पंथ सूफ़ीवाद की वह जज्बाती, बेबाक और दीवानी शाखा है जो बुद्धि और तर्क को पीछे छोड़कर, अल्लाह की मोहब्बत में खुद को सूली पर चढ़ा देने और ईश्वर की जात में खुद को मुकम्मल तौर पर विलीन कर देने का संदेश देती है।

अंतिम दोनों पंथ मिलकर सायुज्य और अवतरण के सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। इत्तेहाद (सायुज्य) और हुलूल (अवतरण) अरबी शब्द से लिए गए हैं। इत्तेहाद का अर्थ है ख़ुदा और बंदे का सायुज्य हो जाना। हुलूल का अर्थ है ख़ुदा और इंसान दोनों मिलकर एक हो जाएं, जिससे कोई तीसरी वस्तु अस्तित्व में आ जाती है। सायुज्य में दोनों पक्षों की विशेषताएं सुरक्षित रहती हैं। सूफ़ी विद्वान इसे इस्लाम धर्म के खिलाफ़ बताते हैं।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

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