सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
22. सूफ़ी सिलसिला और भारत
में सूफ़ीवाद-7
22.14 चिश्ती
संप्रदाय (बारहवीं शताब्दी)
चिश्ती संप्रदाय (या चिश्ती सिलसिला) इस्लामी सूफीवाद का एक
प्रमुख और प्राचीन संप्रदाय है, जो प्रेम, सहिष्णुता, समानता और मानवता की सेवा पर विशेष जोर देता है।
सैय्यद मुहम्मद हाफ़िज के अनुसार चिश्ती भारत का सबसे प्राचीन सिलसिला है। ख़्वाजा
अबू ईसहाक़ सामी चिश्ती (मृ. 940 ई.) या उनके शिष्य ख़्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्त (874-965 ई.) का नाम इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप
में लिया जाता है। 10वीं शताब्दी में अफ़ग़ानिस्तान
के चिश्त नामक नगर (वर्तमान में चिश्त-ए-शरीफ) में
इस संप्रदाय की नींव पड़ी। यह हिरात के निकट हरी-रोद के घाट पर स्थित है। हरी-रोद
नदी अफगानिस्तान के मध्य में बाबा पर्वत श्रृंखला से निकलती है और पश्चिम की ओर
बहती है। इसी नदी के मार्ग में हिरात प्रांत का चिश्त-ए-शरीफ जिला स्थित है, जहाँ से होते हुए यह नदी आगे हिरात शहर की ओर
बढ़ती है। सलमा बाँध (अफगान-भारत दोस्ती बाँध) इसी नदी पर चिश्त-ए-शरीफ
जिले में भारत के सहयोग से प्रसिद्ध सलमा बाँध का निर्माण भी किया गया है।
हज़रत अबू इसहाक़ सीरिया (शाम) के रहने वाले थे। उनके नाम के अंत में लगने वाला 'शामी' शब्द इसी बात का प्रतीक है
कि वे 'अश-शाम' (सीरिया/दमिश्क) क्षेत्र से संबंध रखते थे।
उस दौर में सीरिया और उसके आस-पास के क्षेत्र को 'शाम' कहा जाता था। सद्गुरु (पीर-ओ-मुर्शद) की तलाश में वे बग़दाद पहुंचे। वहां वे ख्वाजा मुमशाद अलू
दीनवरी के शिष्य हुए। जब हज़रत अबू इसहाक़ शामी ने अपने गुरु से दीक्षा ली, तो गुरु ने उनसे कहा कि "आज से तुम्हारा नाम अबू इसहाक़ चिश्ती है" और
उन्हें अफगानिस्तान के चिश्त (हिरात के पास) जाकर सूफी मत का प्रचार करने का आदेश दिया। उन्होंने गुरु की
देख-रेख में साधना की पराकाष्ठा को छुआ और 873 ई. में चिश्त वापस आ गए। जिसके बाद से इस पूरे
सिलसिले (संप्रदाय) का नाम 'चिश्ती सिलसिला' पड़ा। अपने जीवन का एक लंबा समय चिश्त
(अफगानिस्तान) में बिताने और वहाँ सूफी परंपरा की नींव रखने के बाद वे वापस सीरिया
लौट गए। सन 940 ईस्वी में दमिश्क
(सीरिया) में ही उनका इंतकाल (मृत्यु) हुआ। उनकी मज़ार सीरिया की राजधानी
दमिश्क में स्थित माउंट कासियुन पर है, जहाँ बाद में प्रसिद्ध सूफी संत इब्न अरबी को भी
दफ़नाया गया था।
940 ई. में हज़रत अबू इसहाक़ शामी के स्वर्गवास के
बाद उनके प्रमुख शिष्य ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती जो चिश्त के अमीर के
बेटे थे, और उन्होंने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। उन्होंने गुरु की दरगाह को
सूफ़ी-साधना के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में
विकसित किया। बाद में ख़्वाजा अबू मुहम्मद, ख़्वाजा यूसुफ़, ख़्वाजा मौदूद चिश्ती (मृ. 1181 ई.), ख़्वाजा अहमद, ख़्वाजा
रुक्नउद्दीन, ख़्वाजा मुहम्मद संजानी और ख़्वाजा
हाजी शरीफ़ प्रसिद्ध सूफ़ी संत हुए। ख्वाजा मौदूद चिश्ती के समय तक चिश्त में
भव्य मदरसे, खानकाह (सूफी आश्रम) और
आध्यात्मिक केंद्र स्थापित हो चुके थे, जिनके ऐतिहासिक अवशेष आज भी चिश्त-ए-शरीफ में देखे जा सकते हैं। हालाकि इस परंपरा का
उनकी मातृभूमि चिश्त में अधिक विकास नहीं हुआ और
इन संतों के साथ ही यह आध्यात्मिक परंपरा चिश्त में समाप्त हो गई। 12वीं और 13वीं शताब्दी के दौरान मध्य एशिया में आए
राजनीतिक तूफानों के कारण चिश्त में इस सिलसिले का प्रभाव कम होने लगा। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में चंगेज खान के नेतृत्व
में मंगोलों ने पूरे खुरासान और हिरात क्षेत्र (जिसमें चिश्त भी शामिल था) पर
भयानक आक्रमण किए। इन हमलों में बड़े-बड़े ज्ञान और सूफी केंद्र नष्ट हो गए, जिससे सूफी संतों को सुरक्षित स्थानों की ओर
पलायन करना पड़ा। चिश्त पहाड़ों के बीच घिरा एक छोटा और दुर्गम इलाका था। एक समय
के बाद, इस आध्यात्मिक आंदोलन को
फैलने के लिए बड़े सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों की आवश्यकता थी।
चिश्त की ख़ानक़ाह के सूफ़ी फ़क़ीरों ने रमते दरवेश बनकर चिश्त को सदा के लिए त्याग
दिया। ख़्वाजा हाजी शरीफ़ रह. के शिष्य ख़्वाजा उस्मान हरवानी रह. ने
ईरान के नीशापुर में अपना आध्यात्मिक केन्द्र स्थापित किया। चिश्तिया परंपरा के
अधिकांश सूफ़ी ख़ानाबदोशों का जीवन व्यतीत करते थे। कुछ ही दिनों के बाद यह जगह
तुर्क क़बीलों के युद्ध और संघर्ष के कारण अशांत हो गया था। ग़यासुद्दीन मुहम्म्मद
के शासन काल (1163-1203) में यहां शांति लौटी। उनके भाई का नाम मुईज़उद्दीन साम था। उन्हें मुहम्मद
ग़ोरी के नाम से जाना जाता है। उसने ही भारत में संसबानी वंश के शासन की
स्थापना की थी। उसकी राजधानी फ़ीरोज़कोह थी। हालांकि यहां धर्म-चर्चा आदि होते थे,
लेकिन चिश्ती सूफ़ियों को यह जगह रास न आई और ख़्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती अजमेर आकर
बस गए। चिश्ती संप्रदाय को अपनी वैश्विक पहचान और अभूतपूर्व विस्तार भारतीय
उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) में मिला। जब ख्वाजा
उस्मान हारूनी के शिष्य ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती 12वीं शताब्दी के अंत में भारत आए, तो उन्हें यहाँ एक विशाल, विविधतापूर्ण और बड़ा समाज मिला। भारत के
सांस्कृतिक परिवेश, स्थानीय संगीत (जिससे
कव्वाली का जन्म हुआ) और चिश्ती संतों की 'मानवता की सेवा व सामाजिक समानता' की सीख ने इसे यहाँ जनता का आंदोलन बना दिया। चिश्त
ने जिस सिलसिले को 'जन्म और सिद्धांत' दिए थे, भारत ने उसे 'वैश्विक विस्तार और अमरता' प्रदान की।
सैय्यद मुहम्मद हाफ़िज के अनुसार भारत का सबसे
पुराना सूफ़ी सिलसिला चिश्ती सिलसिला है। यह संप्रदाय बा-शर सिलसिला की शखा था। बारहवीं
शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफ़ी समुदायों में यह भारत में सबसे अधिक
प्रसिद्ध और प्रभावशाली संप्रदाय है। इनके आध्यात्मिक केन्द्र भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश
में फैले हुए हैं। भारत में इनके प्रसिद्ध और प्रभावशाली होने का कारण यह है कि उन्होंने
न केवल अपने आपको स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला बल्कि भारतीय भक्ति परम्परा
की कई विशिष्टताओं को अपनाया भी।
इस संप्रदाय का मानना था कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग सच्चा प्रेम और मानवता
की सेवा है। ईश्वर की भक्ति में तल्लीन होने के लिए ये लोग संगीत और 'कव्वाली' का प्रयोग करते थे। चिश्ती संतों ने राजाओं, सुल्तानों और शाही दरबारों की संगत से हमेशा
दूरी बनाए रखी और सादा जीवन जिया। वे सभी धर्मों और जातियों के लोगों के प्रति
उदार और दयालु दृष्टिकोण रखते थे।
22.15 ख़्वाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती
चिश्ती संप्रदाय के माध्यम से सूफ़ीमत का प्रचार भारत में करने तथा “चिश्तिया परंपरा” की नींव भारत में रखने का श्रेय मध्य एशिया के खुरासान प्रांत के सज़र, सजिस्तान (सीसतान) में जन्मे हज़रत ख़्वाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती सिज्ज़ी (बाद में अजमेरी) (1143 ई. – 1236 ई.) को जाता है। ख्वाजा साहब का जन्म 1 फरवरी 1143 ईस्वी को फारस (आधुनिक ईरान) के सिस्तान
(सिजिस्तान) क्षेत्र में हुआ था। वे पैगंबर मोहम्मद के वंशज (सैयद) माने जाते
हैं। उनका पालन-पोषण ख़ुरासान में हुआ। उनके पिता ख़्वाजा ग़यासउद्दीन हसन भी एक
धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति थे। पंद्रह वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान
हो गया। विरासत में उन्हें एक पनचक्की और एक बाग़ मिला था। इसी से उनका गुजर-बसर
चलता था। वे ईरान से 1192 में शिहाबुद्दीन मुहम्मद
ग़ोरी की सेना के साथ मदीना से भारत आए थे।
बाल्य-काल से ही उनका ध्यान ईश्वर की उपासना की ओर आकृष्ट हुआ। एक दिन एक
दिव्य-पुरुष (देवविक्षिप्त सूफ़ी) से उनकी मुलाक़ात हुई। उनका नाम हज़रत इब्राहिम
कन्दोजी था। उन्होंने उनपर ऐसी कृपा दृष्टि डाली कि उन्हें भौतिकता से विरक्ति
हो गई। उन्होंने पनचक्की और बाग़ बेच डाला। इससे जो भी पैसा आया था उसे ग़रीबों में
बांट डाला। इसके बाद वे अपने अभीष्ट की खोज में निकल पड़े। किसी भी लक्ष्य की पहली
शर्त है ज्ञान। सूफ़ी सांसारिक ज्ञान को इल्म-ए-ज़ाहिर (प्रत्यक्ष ज्ञान)
कहते हैं। ख़्वाजा ने पहले प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। समरकंद में उन्होंने दो
वर्षों तक क़ुरआन का अध्ययन किया। फिर बुखारा चले गए। इस तरह वे अनेक वर्षों तक
समरक़न्द, बुख़ारा और अन्य स्थानों के धार्मिक केन्द्रों पर क़ुरआन, हदीस,
तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र का अध्ययन करते रहे।
सर्वप्रथम ये एक वृक्ष के नीचे समाधिस्थ
हुए, परन्तु राज कर्मचारियों द्वारा यह कहने पर कि यहाँ तो राजा की ऊँटनियाँ बैठती
हैं, ये वहाँ से नम्रतापूर्वक उठ गए। राजा के ऊँट-ऊँटनियाँ वहाँ से उठ ही न पाए
तो कर्मचारियों ने क्षमा-याचना की। इसके बाद इनका निवास एक तालाब के किनारे पर बना
दिया गया, जहाँ पर ख़्वाजा मुईनुद्दीन दिन-रात निरंतर साधना में निमग्र रहते थे। वे अक्सर
दुआ माँगते कि “ए अल्लाह त आला/परब्रह्म स्वामी जहाँ
कहीं भी दु:ख दर्द और मेहनत हो, वह मुझ नाचीज़ को फरमा दे।”
इसके बाद वे आध्यात्मिक ज्ञान की ओर उन्मुख हुए। इसके लिए वे नीशापुर के निकट
हरवान गए। वहां सौभाग्य से उन्हें हज़रत ख़्वाजा उस्मान हरौनी (हारूनी) रह.
की सेवा करने का मौक़ा मिला। हज़रत ख़्वाजा उस्मान ने उनके आंतरिक गुणों को झट
से पहचान लिया। शेख़ उस्मान इस युवा सूफ़ी से इतना प्रभावित हुए कि अपना ख़िर्क़ा
उन्हें दे दिया और ख़लीफ़ा बनाया। ख्वाजा ने उनसे 20 वर्षों तक कठिन आध्यात्मिक प्रशिक्षण लिया। वे
इन्हें साथ लेकर यात्रा पर निकल पड़े। काफ़ी दिनों तक गुरु और शिष्य साथ-साथ यात्रा
करते रहे। एक दिन गुरु ने शिष्य को आगे की यात्रा ख़ुद करने का हुक्म दिया।
हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने मध्य एशिया
के पवित्र स्थलों का भ्रमण किया। ख़्वाजा की यात्रा अपने भीतर की अंतर्यात्रा के लिए
थी। उन्होंने हर जगह, हर पड़ाव पर वहां के गुणी जनों और विद्वानों से लाभ अर्जित किया।
बगदाद की यात्रा में संजान में कुबरौविया परम्परा के प्रवर्तक शेख़ निज़ामउद्दीन कुबरा
से मुलाक़ात की। कुछ समय उनके साथ गुज़ारने के बाद जीलान आए और शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी
के साथ लगभग दो महीने रहे। वहां से बग़दाद की वापसी की यात्रा में सुहरवर्दी परम्परा
के प्रवर्तक शेख़ शहाबउद्दीन सुहरवर्दी, और कुछ और सूफ़ी संतों का सत्संग उन्हें
प्राप्त हुआ। हमदान में वे शेख़ युसूफ़ हमदानी से मिले। तबरेज़ में शैख़ अबू
सईद तबरेज़ी से मिले। इल्फाहान में ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से
उनकी भेंट हुई। काकी इनके शिष्य हो गए और भारत आकर उनके उत्तराधिकारी हुए।
किसी एक स्थान पर रहने के बदले वे हिरात और उसके आसपास घूमते रहे और अनेक सूफ़ी
संतों के मज़ारों के दर्शन भी करते रहे। ख़्वाजा की यात्रा के विवरण पर नज़र डालें तो
हम पाते हैं कि उन्होंने अपने समय के लगभग सभी प्रतिष्ठित सूफ़ियों से भेंटकर उनका सत्संग
प्राप्त किया। इस प्रकार आध्यात्मिक चिंतन के नए आयाम प्राप्त कर और अपनी आन्तरिक चेतना
जागृत कर बैतल्लाह की ज़ियारत के बाद वे मदीना पहुंचे। मदीना से वे लाहौर आए। हज़रत
साहब के मकबरे के पास ध्यान-चिंतन किया।
सन 1192 में शहाबुद्दीन गोरी की फौज के साथ दिल्ली आए। यह वह समय था जब तराइन
के द्वितीय युद्ध के बाद भारत में राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे। यह माना जाता है कि
ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ऐसे समय में भारत आए, जब मुहम्मद ग़ोरी की
फौज अजमेर के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस ग़ज़नी की ओर भाग रही
थी। भागती हुई सेना के सिपाहियों ने ख़्वाजा मुईनुद्दीन से कहा कि आप आगे न जाएँ। चूंकि
मुहम्मद ग़ोरी की पराजय हुई है इसलिए आगे जाने पर आपके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है।
किंतु ख़्वाजा मुईनुद्दीन नहीं माने। वह कहने लगे- “चूंकि तुम लोग तलवार
के सहारे दिल्ली गए थे, इसलिए वापस आ रहे हो। मगर मैं अल्लाह की ओर से मोहब्बत
का संदेश लेकर जा रहा हूँ।” थोड़ा समय दिल्ली में रुककर वह अजमेर चले गए और वहीं
रहने लगे। हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अपने चालीस साथियों के साथ अजमेर आए थे और
वहां जनसेवा के पुण्य काम में लग गए। ख्वाजा गरीब नवाज की शिक्षाओं ने धर्म और
जाति की सीमाओं को लांघकर पूरे भारतीय समाज को प्रभावित किया। "सबसे प्रेम, किसी से बैर नहीं" उनका सबसे प्रमुख जीवन मंत्र था। उनका मानना था कि अल्लाह की इबादत का सबसे
बेहतरीन तरीका भूखों को खाना खिलाना, दुखियों के दुख दूर करना और पीड़ितों की मदद करना है। उनके आश्रम में हर समय
गरीबों और बेसहारों के लिए भोजन (लंगर) तैयार रहता था, चाहे वे किसी भी मजहब के हों। उन्होंने ईश्वर से
जुड़ाव महसूस करने के लिए संगीत और कव्वाली को माध्यम बनाया, जिसने स्थानीय भारतीय आबादी को बहुत आकर्षित
किया।
16 मार्च 1235 ई. में अजमेर में उनकी मृत्यु हो गई। ख़्वाजा मुईनुद्दीन
चिश्ती जब 89 वर्ष के हुए तो उन्होंने ख़ुद को घर के अंदर बंद कर लिया। जो भी मिलने
आता, वह मिलने से इंकार कर देते। नमाज़ अता करते-करते वह एक दिन अल्लाह को प्यारे
हुए। उस स्थान पर उनके चाहने वालों ने उन्हें दफ़ना दिया और क़ब्र बना दी। बाद में
उस स्थान पर उनके प्रिय भक्तों ने एक भव्य मक़बरे का निर्माण कराया, जिसे आजकल “ख़्वाजा मुईनुद्दीन
चिश्ती का मक़बरा” कहा जाता है।
‘ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का मक़बरा’, जिसे ‘अजमेर शरीफ’ के नाम से भी जाना
जाता है, के प्रति हर धर्म के लोगों की अटूट श्रद्धा है। ख़्वाजा हुसैन नागौरी ने उनका
रौज़ा (मकबरा) बनवाया। प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मांडू के सुल्तान ग़यासुद्दीन
ख़िलजी ने सन 1465 में यहाँ बुलन्द दरवाज़ा और गुम्बद का निर्माण करवाया था। बाद के समय में बादशाह
अकबर के शासन काल में भी दरगाह का बहुत विकास हुआ। उसने यहाँ पर मस्जिद, बुलंद दरवाज़ा तथा महफ़िलख़ाने का निर्माण
करवाया था। कहा जाता है कि सम्राट अकबर साल में एक बार वहाँ जाया करता था। ऐसा कहा
जाता है कि मुग़ल बादशाह अकबर ने मन्नत मानी थी कि अगर उसने चित्तौरगढ़ पर विजय
प्राप्त कर ली तो वह आगरे से पैदल ख़्वाजा साहब के मकबरे तक जाएगा। 1568 में जब
उसने जब उसने चित्तौरगढ़ पर विजय हासिल की, तो अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए
आगरा से पैदल ही चलकर ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दर्शनों के लिए आया था।
आज भी, सत्य-प्राप्ति, मानव-प्रेम, श्रद्धा और स्नेह के सर्वोच्च आदर्श का
प्रतीक उनकी दरगाह पर लाखों लोग श्रद्धा से सिर झुकाने जाते हैं। अजमेर में इनके
नाम पर प्रसिद्ध “ख़्वाजा साहब” दरगाह है। प्रत्येक वर्ष अजमेर में उर्स लगता है जिसमें लाखों की संख्या में
हिंदू-मुसलमान शरीक़ होते हैं। बड़ी संख्या में हिंदू और मुसलमान ख़्वाजा मुईनुद्दीन
चिश्ती के अनुयायी हुए। उन्होंने अपने उपदेशों के द्वारा हिंदू और मुसलमानों में
एकता बनाने में अथक प्रयत्न किया।
ख़वाज़ा साहब का जीवन एक शिक्षा और आदर्श के रूप में है। उनकी आध्यात्मिक
प्रक्रिया यह थी कि वे अपने उच्च अध्यात्मिक व्यक्तित्व के द्वारा आने वाले के मन-मस्तिष्क
की गहराइयों में उतरते थे। उनकी ज़िन्दगी उनके चमत्कार में नहीं बल्कि उनके
आचरण में प्रतिबिंबित होती है। जब वे अजमेर के क़िले में रह रहे थे, तो शासकों
द्वारा बलपूर्वक मुसलमान बनाए गए लोग, उनके पवित्र आचरण से प्रभावित होकर सच्चे
मुसलमान हो गए।
ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने हमेशा राजशाही, लोभ और मोह आदि का विरोध किया। उन्होंने
कहा कि- “अपने आचरण को नदी की तरह पावन व पवित्र
बनाओ तथा इसे किसी भी तरह से इसे दूषित न होने देना चाहिए। सभी धर्मों को एक-दूसरे
का आदर करना चाहिए और धार्मिक सहिष्णुता रखनी चाहिए। ग़रीब पर हमेशा अपनी करुणा दिखानी
चाहिए तथा यथा संभव उसकी मदद करनी चाहिए। संसार में ऐसे लोग हमेशा पूजे जाते हैं और
मानवता की मिसाल क़ायम करते हैं।” उनका मानना था कि केवल धार्मिक पुस्तकों को पढ़ लेना या दर्शनशास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर लेना किसी को सूफी नहीं बनाता। सूफीवाद ईश्वर और उसकी बनाई सृष्टि के प्रति एक व्यावहारिक और जीवंत अनुभव है। केवल विशेष प्रकार
के वस्त्र पहनना, माला फेरना या बाहरी
अनुष्ठानों को बिना आंतरिक भाव के दोहराना चिश्ती दर्शन में बेमानी माना गया है। सूफी
मत में 'अखलाक़' का अर्थ है उत्कृष्ट मानवीय गुण—जैसे विनम्रता, क्षमा, उदारता और अहंकार का
पूरी तरह त्याग। ख्वाजा साहब के अनुसार, जब तक एक इंसान का नैतिक चरित्र सर्वोच्च नहीं होता, वह ईश्वर के करीब नहीं आ सकता।
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने एक सच्चे सूफी (धर्मानुयायी) के नैतिक अनुशासन
को परिभाषित करते हुए चार मुख्य बातें बताई थीं। पहला अभाव या दरिद्रता में भी इस
तरह दिखना जैसे वह पूरी तरह समृद्ध और संतुष्ट हो। दूसरा भूखे और जरूरतमंद लोगों
को उनके मन की तृप्ति तक भोजन कराना। तीसरा मन में ईश्वर के प्रति गहरा विरह (शोक)
रखना, लेकिन
बाहर शांत रहना। और चौथा अपने दुश्मनों को हमेशा माफ करना और उनके साथ भी अत्यंत
दया, करुणा
और स्नेह का व्यवहार करना। ख्वाजा गरीब नवाज का प्रसिद्ध कथन है कि ईश्वर का सबसे
प्रिय व्यक्ति वह है जिसके भीतर तीन गुण हों, दरिया जैसी सख़ावत (उदारता): जो बिना किसी भेदभाव के
सबके लिए बहे। सूरज जैसी शफ़क़त (कृपा/नेकी): जो बिना धर्म या जाति
देखे अपनी रोशनी सबको दे। और ज़मीन जैसी आज़ज़ी (विनम्रता): जो सबका बोझ उठाए और
सबके पैरों के नीचे रहकर भी शांत रहे। यही वह व्यावहारिक नैतिक अनुशासन (अखलाक़) है
जिसे ख्वाजा साहब ने किताबी ज्ञान और रस्मों से ऊपर स्थान दिया।
उन्होंने जीवन भर निचले तबके के लोगों और ग़रीबों के बीच काम किया और अपना जीवन
असहाय और निर्धन लोगों के लिए समर्पित कर दिया। हालांकि वे ख़ुद ग़रीब थे, लेकिन
उन्हें “सुल्तानुलहिंद” कहा जाता है। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती को “सुल्तान-उल-हिंद” (या सुल्तान-ए-हिंद) कहने का
अर्थ है “हिंदुस्तान का आध्यात्मिक
राजा (आध्यात्मिक सुल्तान)”। उन्हें यह उपाधि किसी सांसारिक साम्राज्य या राजनीतिक सत्ता के कारण नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के
लोगों के दिलों पर उनके गहरे आध्यात्मिक प्रभाव के कारण मिली थी। उनका मानना था कि
ईश्वर की सच्ची सेवा मानवता की सेवा है। उनके ग़रीब और दीन-दुखियों के प्रति इस
लगाव के कारण उन्हें “ग़रीब नवाज़” कहा जाता है। उन्होंने दीन, धर्म और दुनिया के भेद को समाप्त कर दिया।
उनके अनुसार सूफ़ीवाद न तो ज्ञान है और न ही एक रस्म; यह धर्मानुयायियों का एक विशेष नैतिक अनुशासन (अखलाक़)
है। इस अनुशासन का पहला चरण शरीयत का सख्त अनुपालन है, जो दूसरे चरण की ओर ले जाता है, जो रहस्यवादी पथ (तरीक़त) की ओर जाता है, जो बदले में तीसरे चरण की
ओर जाता है, जो कि मारिफ़त (दिव्यज्ञान) है, जो अंत में हक़ीक़त (सत्य) से उसका परिचय कराता है। शुरुआत से ही चिश्ती आदेश ने हदीस के महत्व पर ज़ोर दिया।
उनका मानना था कि संसार के समस्त धर्मों का मूल स्रोत एक है। ईश्वर एक है और
विभिन्न धर्म उसकी प्राप्ति के केवल साधन मात्र हैं। उनकी नज़र में ईश्वर द्वारा
बताए गए नियमों के अनुसार दुनिया में व्यवहार करना ही दीन है।
एक बार एक दरवेश उनकी सेवा में हाजिर हुआ। उसने प्रश्न किया, “शुद्ध और पुण्य जीवन की पहचान क्या है?”
ख़्वाजा ने जवाब दिया, “इस्लामी शरीअत के आधार पर “अम्र” (वांछित) तथा “नहि” (निषेध) का पालन करना।” अम्र या जिन बातों का ईश्वर ने आदेश दिया है, उनका पालन करें और नहि अर्थात
जिन बातों को ईश्वर ने मना किया है, उनका निषेध करें।
उन्होंने ईश्वर की आराधना और लोगों की सेवा के बीच कोई भेद नहीं किया। उनका
मानना था कि इंसान के दो फ़र्ज़ हैं। एक, इबादत (आराधना) और दूसरा इताअत
(आज्ञापालन)। इबादत से तात्पर्य है कि पूरे आदर और सम्मान के साथ ईश्वर के सम्मुख
स्वयं को समर्पित कर दिया जाए। इताअत से तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने प्राणी मात्र
के प्रति जो कर्तव्य निर्धारित किए हैं, उन्हें निष्ठा से पूरा करे। उसका समय
ईश्वर के बंदों की भलाई के लिए समर्पित रहे। ख़्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती ने सूफ़ीमत
के नौ सिद्धांत प्रतिपादित किए थे। एक सूफ़ी के लिए ये सिद्धांत है –
1.
धन नहीं अर्जित करना चाहिए।
2.
ऋण नहीं लेना चाहिए।
3.
किसी व्यक्ति के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहिए।
4.
भविष्य के लिए कोई भी चीज़ बचा कर नहीं रखना चाहिए। आवश्यकता से अधिक हो तो उसे
निर्धनों में बांट दिया जाना चाहिए।
5.
किसी व्यक्ति का अहित नहीं सोचना चाहिए। शत्रुओं के लिए भी प्रभु से उसकी
सद्बुद्धि की कामना करनी चाहिए।
6.
कोई पुण्य कार्य सम्पन्न हो, तो उसे अपने पीर की दुआ समझें या रब की कृपा।
7.
कोई पाप घटित हो जाए, तो उसके लिए ख़ुद को जवाबदेह समझना चाहिए। उससे बचना
चाहिए। ईश्वर से भय करना चाहिए।
8.
नियमित रूप से दिन में उपवास रखें तथा रात में इबादत करें।
9.
मौन रहना चाहिए। जब बोलना अनिवार्य हो तभी बोलें। इस्लामी शरीअत में अधिक
बोलना निषेध है। उन्हीं शब्दों का प्रयोग करें जिनसे ईश्वर प्रसन्न हों।
उनकी विचारधारा, सादा जीवन और साधु-प्रवृत्ति ने लोगों का दिल जीत लिया और
उन्हें काफ़ी ख्याति मिली। वे अकसर पैबंद लगे कपड़े पहनते थे। बहुत ही कम खाना खाते
थे। उनका पैग़ाम था कि कपड़े तन ढंकने के लिए होते हैं और खाना ज़िन्दा रहने के लिए।
खाना और कपड़ा जीवन का उद्देश्य नहीं है। यह तो मात्र आवश्यकता है। इंसान को जीवन
बड़े उद्देश्य के लिए मिला है। इस जीवन में पाशविक भावनाओं का समावेश नहीं होना
चाहिए। वे ख़ुद को फ़क़ीर कहते थे और अपने शिष्यों के फ़क़ीरी धारण करने की शिक्षा देते
थे। ‘फ़क़ीर’ शब्द में ‘फे’, ‘काफ’, ‘ये’ और ‘रे’ चार अक्षर हैं। इसमें ‘फे’ का मतलब ‘फाका’ (उपवास) है। ‘काफ’ का मतलब ‘कन्नत’ (संतुष्टि) है। ‘ये’ का मतलब ‘यादे इलाही’ (परमात्मा का स्मरण) है।
और ‘रे’ का मतलब ‘रियाज़त’ (प्रायश्चित) है। वे अपने मुरीदों से इन चारों
का अनुपालन पर बल देते थे।
*** *** ***
मनोज कुमार

