बुधवार, 2 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-12

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


10. सूफ़ी दर्शन-12

10.20 सृष्टि में मानव सर्वोपरि

सूफ़ियों के अनुसार सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव (इंसान) है तथा उसमें ईश्वर के रूप की पूर्ण अभिव्यक्ति हुई है। सूफ़ियों के अनुसार, ईश्वर (अल्लाह) ने संसार में अनगिनत जीवों की रचना की है, लेकिन मनुष्य को 'अशरफ़-उल-मख़लूक़ात' यानी समस्त सृष्टियों में सबसे उत्तम या सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है। मानव के पास बुद्धि, चेतना, विवेक और सबसे बढ़कर 'इश्क़' (प्रेम) की वह क्षमता है जो फ़रिश्तों (देवदूतों) के पास भी नहीं है। सूफ़ी संतों के अनुसार मनुष्य ईश्वर की रचना का शिखर है। मानवों में भी उच्चतम और अन्यतम ‘पूर्ण मानव (इंसान-उल-कामिल) है। पूर्णता प्राप्त मनुष्य को सूफ़ी शब्दावली में 'इंसान-ए-कामिल' कहा जाता है। सभी प्राणी जाने-अनजाने में पूर्ण-मानव स्तर तक पहुँचने के लिए सचेष्ट रहते हैं, क्योंकि यहीं पहुँचकर वह प्रथम ज्ञान को प्राप्त करता हैउसी अवस्था में आत्मा उस परम-ऐश्वर्य के अंतर में प्रवेश कर सकती है। सूफ़ी परमात्मा के एकत्व पर ज़ोर देते हैं।

परमात्मा को अल-हक्क़ (परमसत्य) कहते हैं। प्रतीयमान जो विभिन्न रूप दीख पड़ते हैं, वे उस सत्य की अभिव्यक्ति मात्र हैं। यह दृश्यमान जगत उसका वाह्य प्रकाश मात्र है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। भाषा द्वारा उसे समझाया नहीं जा सकता। इसीलिए उसे ‘एक या ‘पूर्ण कहकर संबोधित करते हैं। वास्तव में वह ‘एक या ‘पूर्ण से भी परे है। उसके संबंध में किसी सत्ता, किसी संबंध, किसी ज़ात, किसी गुण आदि की कल्पना नहीं की जा सकती। बस यह कहा जा सकता है कि वह विद्यमान है। नाम और गुण के अनेकत्व से वह परे है। उसे किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। उसके नाम और गुण उसी में निहित हैं। ‘वह, ‘वह है, ‘वे (नाम, गुण आदि), ‘वह नहीं हैं। विभिन्न नामों जैसे दयालु, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, आदि-अंतहीन कहकर पुकारने का मतलब यह है कि इन भिन्न-भिन्न गुणों के ज़रिए हम उसे याद करते हैं। ये सभी गुण और नाम उसके ‘एकत्व में निहित रहते हैं। वैसे वह इन नामों और गुणों से परे है। जब वह परम सत्ता, परमात्मा, अपनी अभिव्यक्ति में अवतरित होता है तब ये नाम और गुण प्रकट होते हैं। यह सृष्टि उस सत्य को प्रकट करने वाला वाह्य आकार है।

सूफ़ियों के अनुसार सृष्टि के विभिन्न पदार्थ परमात्मा के विभिन्न नामों, रूपों और गुणों (अस्मा व सिफ़ात) की ही अभिव्यक्ति या प्रकटीकरण हैं। ब्रह्मांड और उसके पदार्थ इन दिव्य गुणों को अलग-अलग रूपों में दर्शाते हैं। जिस प्रकार एक ही श्वेत प्रकाश प्रिज्म से गुजरकर अनेक रंग बनाता है, उसी प्रकार एक ईश्वरीय सत्ता विभिन्न पदार्थों और रूपों में अपने विभिन्न गुणों को प्रकट करती है। लेकिन सूफ़ी साधकों के अनुसार परमात्मा के सभी गुणों की अभिव्यक्ति मनुष्य द्वारा होती है। इस प्रकार मनुष्य उन सभी गुणों को जो ब्रह्माण्ड में अभिव्यक्त हो रहे हैंअपने में समाहित करता है और उन गुणों समाहार को अभिव्यक्त करता है। मनुष्य में नामों और गुणों का सम्मिलन हो जाता है। वह परमात्मा की विशिष्ट सृष्टि है। परमात्मा के सभी गुण मनुष्य के हृदय को जाननापरमात्मा को जानना है। इसलिए मनुष्य के ह्रदय को जानने से परमात्मा को जाना जा सकता है।

हज़रत इब्न-उल-अरबी ने सबसे पहले ‘इंसान-उल-कामिल’ शब्द का प्रयोग किया था। 15वीं सदी के महान सूफी संत और दार्शनिक हज़रत अब्दुल करीम इब्न इब्राहिम अल जीली ने ‘इंसान-उल-कामिल नामक पुस्तक की रचना की। उनके अनुसार सृष्टि में मनुष्य, परमात्मा की अन्यतम अभिव्यक्ति है। लेकिन मनुष्य का चरमोत्कर्ष ‘पूर्ण-मानव है। मानव शरीर में जड़ अंश भी है तथा आध्यात्मिक अंश भी। जिली ईश्वर और सृष्टि के संबंध को समझाने के लिए दर्पण का उदाहरण देते हैं। नफ़्स अर्थात् जड़ आत्मा मनुष्य को पाप की ओर ले जाती है और रूह आत्मा की ईश्वरीय शक्ति का दर्शन हृदय के स्वच्छ दर्पण में कराती है। वह प्रियतम के साथ मिलन कराती है। नफ़्स को मारना ही मानव का प्रमुख कर्त्तव्य है।

यद्यपि हर मनुष्य के भीतर परमात्मा के सभी गुणों को प्रकट करने की जन्मजात क्षमता होती है, लेकिन आम इंसान सांसारिक मोह-माया, अज्ञानता और अहंकार के कारण इन दिव्य गुणों को पहचान नहीं पाता। जब कोई मनुष्य कठोर आध्यात्मिक साधना, आत्म-शुद्धि (तसव्वुफ़) और अहंकार के पूर्ण विसर्जन द्वारा अपनी चेतना को उस स्तर पर ले जाता है जहाँ उसके और परमात्मा के बीच का पर्दा हट जाता है, तब वह मनुष्यता के चरमोत्कर्ष को प्राप्त करता है। इसी अवस्था को जिली 'पूर्ण-मानव' (इंसान-ए-कामिल) कहते हैं। पूर्ण-मानव वह है जो ईश्वर का साक्षात स्वरूप बन जाता है। जिली के शब्दों में, वह परमात्मा के लिए एक ऐसे साफ़ दर्पण की तरह है जिसमें परमात्मा स्वयं के पूर्ण रूप को देख सकता है। सूफी परंपरा और जिली के अनुसार, इस धरती पर पूर्ण-मानव का सबसे उत्कृष्ट और ऐतिहासिक उदाहरण हजरत मोहम्मद सल्ल. हैं, जिन्होंने ईश्वरीय चेतना को पूर्ण रूप से आत्मसात किया। पूर्ण-मानव में परमात्मा के सभी गुण प्रकाश पाए जाते हैं। वह मनुष्य तथा परमात्मा के बीच की कड़ी है। पूर्ण-मानव की साधना के द्वारा सूफ़ी मार्ग की सभी मंजिलों को पार कर हुआ उस अवस्था को प्राप्त करता है जिसमें परमात्मा से ‘एकत्व का बोध होता है। वह परमात्मा के साक्षात दर्शन का सामर्थ्य प्राप्त करता है। ईश्वर की एकमात्र पूर्ण अभिव्यक्ति पूर्ण मानव है। मनुष्य का चरमोत्कर्ष पूर्ण मानव है। परमात्मा उसी में अपने को दर्शाता है। हज़रत जिली के अनुसार साधारण मनुष्य ईश्वर की सृष्टि का केंद्र तो है, लेकिन उसकी यात्रा तब तक अधूरी है जब तक वह आध्यात्मिक चेतना के शिखर पर पहुँचकर 'पूर्ण-मानव' नहीं बन जाता, जो कि मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य और परम गौरव है।

हज़रत अरबी के अनुसार आदम से मुहम्मद तक होने वाले सभी पैग़म्बर, औलिया, संत सभी ‘पूर्ण-मानव की कोटि में आते हैं। संत और औलिया ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी आत्मा परमात्मा के आलोक में लय हो गया है। परमात्मा के नाम और गुण समग्र रूप से पूर्ण-मानव में प्रत्यक्ष होते हैं। वह मानव रूप में ईश्वर है। वह अपने निजत्व को छोड़कर और किसी प्रकार के अस्तित्व को नहीं जानता। वह परमात्मा के नाम रूपी दर्पण के सिवाय और कहीं अपने आपको नहीं देख पाता।

हज़रत जीली ने पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. को ही पूर्ण-मानव कहा है। सूफ़ियों का मानना है कि पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. ही परमात्मा की अंतिम और सम्पूर्ण अभिव्यक्ति हैं। उन्हीं के आलोक से सृष्टि का निर्माण हुआ। यही ‘हक़ीक़तुल मुहम्मदिया’ है। यह ‘नूरुल मुहम्मदिया’ भी कहा जाता है। हदीस में कहा गया है, पहली चीज़ जो परमात्मा ने बनाई है वह पैग़म्बर का आलोक है। एक दूसरी हदीस में कहा गया है, मैं परमात्मा की ज्योति हूँ, और मेरी ज्योति से अन्य सभी चीज़ें हुई हैं।हक़ीक़तुल मुहम्मदिया’ का वर्णन करते हुए हज़रत जीली ने कहा है, उसका नाम ‘अमरुल्लाह’ (परमात्मा का वचन) है और वह सबसे श्रेष्ठ और सबसे ऊंचा है। यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि यह पूर्ण-मानव ‘हक्क़ (सत्य) तो है लेकिन ‘अल-हक्क़ (परम-सत्य) नहीं है।

मोहसिन फ़ैज़ काशानी  (1598-1680) के अनुसार, पूर्ण-मानव वह है जिसने अपने भीतर दिव्य गुणों में से एक को प्रकट किया है और निरपेक्ष और सांसारिक के बीच की बाधा को दूर किया है। इसके अलावा, पूर्ण पुरुष मध्यस्थता और संबंध का केंद्र बिंदु है जिसके द्वारा निरपेक्ष के अज्ञेय पहलू जानने योग्य अस्तित्व के दायरे में आते हैं। ईश्वर के गुण अपने सार को बनाए रखते हुए मनुष्य में प्रवेश करते हैं और एक हो जाते हैं। उसी समय, मनुष्य और उसके बीच आवश्यक संबंध स्थापित होते हैं जो उसे परमात्मा के साथ भाग लेने की अनुमति देते हैं, लेकिन इससे अलग रहते हैं। जबकि पूर्ण मनुष्य इस संसार में जीवित रहता है, वह परमात्मा की आत्म-अभिव्यक्तियों को आकर्षित करता है और निरंतर संरक्षित करता है। क्योंकि पूर्ण मनुष्य भौतिक और परमात्मा के बीच एकता के रूप में मौजूद है, उसके भीतर दैवीय गुणों का प्रतिबिंब उस भौतिक दुनिया में परिवर्तन की अनुमति देता है जिसका वह हिस्सा है। फ़ैज़ के लिए अधिक महत्वपूर्ण यह स्थापित करना है कि पूर्ण-मानव (परफेक्ट मैन) में होने की यह जुड़ी हुई स्थिति इमाम के अभ्यास से कैसे जुड़ती है। ईश्वर और उनके गुण शाश्वत हैं। मनुष्य में अपने गुण प्रकट कर ईश्वर सृष्टि को परमात्मा से जोड़ रहा है। चूंकि पूर्ण मनुष्य सृष्टि के संबंध को परमेश्वर से प्रकट करता है, सृष्टि के अस्तित्व के लिए परमेश्वर पर उसकी निर्भरता भी पूर्ण मनुष्य से जुड़ी हुई है। इस अर्थ में, संपूर्ण मनुष्य के अस्तित्व के बिना दुनिया समाप्त हो जाएगी। इमाम एक आदर्श व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है। इसलिए, दुनिया की निरंतरता के लिए इमाम आवश्यक है।

10.21 सूफ़ी साधना के मार्ग

सूफ़ी साधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए पहले जो बाहर है, उसे समाप्त करना पड़ता है। अन्यथा साधक अंदर जाने में समर्थ नहीं हो पाएगा। और सत्य की समीपता की अनुभूति तभी होती है जब साधक अंदर होता है। सूफ़ी साधना के अनुसार परमात्मा की सत्ता सृष्टि के अणु-परमाणु में विराजमान है। मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण उसे देख नहीं पाता। सूफ़ियों के अनुसार, ईश्वर और सृष्टि दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। यह संसार ईश्वर से अलग कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखता। जैसे सूर्य से निकलने वाली किरणें सूर्य से अलग नहीं होतीं, वैसे ही इस ब्रह्मांड का कण-कण (अणु-परमाणु) परमात्मा के दिव्य प्रकाश की ही अभिव्यक्ति है।

जब परमात्मा हर जगह मौजूद है, तो साधारण मनुष्य उसे देख क्यों नहीं पाता? सूफ़ी साधना इसका कारण 'हिजाब' (पर्दा या अज्ञानता) को मानती है। मनुष्य अपने स्वार्थ और चिंताओं में डूबा रहता है। अन्य कुछ देखने की उसे फ़ुरसत ही नहीं होती। मनुष्य का सबसे बड़ा अज्ञान उसका 'अहंकार' (मैं और मेरा की भावना) है। जब तक मनुष्य खुद को ईश्वर से अलग एक स्वतंत्र सत्ता समझता है, तब तक वह अज्ञानता के अंधेरे में रहता है। मोह के वशीभूत उसका ह्रदय उसके और परमात्मा के बीच एक दीवार बन जाता है। आम इंसान ईश्वर को बाहरी आँखों या भौतिक इंद्रियों से ढूंढने की कोशिश करता है। सूफ़ियों का कहना है कि बाहरी आँखें केवल 'मजाज़' (नश्वर संसार) को देख सकती हैं, 'हक़ीक़त' (परम सत्य) को नहीं। अगर उसे खोजना है तो ह्रदय में उसे खोजना होगा। उसे बाहर नहीं खोजना है। वह परम-सौन्दर्य ह्रदय में वास करता है। सूफ़ीमत के अनुसार सत्य की समीपता के लिए किसी ऊंचे शिखर पर नहीं पहुंचना होता है, बल्कि यहां गहराइयों में उतरना होता है। सूफ़ी साधना में किसी चीज़ को प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा नहीं होती, बल्कि ख़ुद की कामनाओं को मिटाने की आकांक्षा होती है। कामना-शून्य होकर सूफ़ी समस्त दृश्य जगत को अनुभूति के माध्यम से देखते हैं। अज्ञानता को दूर करने और कण-कण में व्याप्त परमात्मा का दीदार करने के लिए सूफ़ी मत 'इश्क़' (प्रेम) और 'साधना' का मार्ग बताता है। सूफ़ी कहते हैं कि मनुष्य का हृदय (क़ल्ब) एक दर्पण की तरह है। सांसारिक इच्छाओं और अहंकार के कारण इस पर धूल जम गई है। साधना (ज़िक्र, ध्यान, और गुरु की सेवा) के द्वारा जब यह दिल साफ हो जाता है, तो उसमें हर कण में बसने वाले परमात्मा का प्रतिबिंब साफ दिखाई देने लगता है। जब साधक 'फ़ना' (अपने अस्तित्व को ईश्वर में मिटा देना) की अवस्था को प्राप्त करता है, तब उसकी अज्ञानता नष्ट हो जाती है। तब उसे बुल्ले शाह की तरह हर तरफ अपने 'रांझा' (परमात्मा) का ही जलवा दिखाई देता है।

सूफ़ी आत्मा के दो भेद करते हैं – नफ़्स और रूह। नफ्स निम्न कोटि का है। वह सारी बुराइयों का स्थान है। रूह अच्छी वृत्तियों का उद्गम स्थल है। नफ़्स भावावेग से संचालित होता है, रूह विवेक से। दोनों में निरंतर संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष आत्मा को विपरीत दिशा में खींचते रहते हैं। इस आत्मा के तीन विभाग होते हैं, क़ल्ब (ह्रदय), रूह (आत्मा) और सिर्र (अंत:करण) । सिर्र सबसे भीतर का हिस्सा है, जहां सूफ़ी साधक परमात्मा का दर्शन किया करता है। यह परमात्मा का वास स्थान है। यहाँ कोई कलुष नहीं होता। आत्मा इस संसार में आने के पहले परमात्मा से अभिन्न था। वह अपार्थिव है। यह जगत उसका निवास-स्थल नहीं है। कुछ कारणवश वह इस जगत में आता है। जगत के अनुरूप उसे शरीर धारण करना पड़ता है। उसका खिंचाव अपने मूल-स्थल की और ही रहता है। इस जड़-जगत के प्रलोभन उसे वास्तविक जगत की और जाने देने में रुकावटें डालते रहते हैं। नफ़्स के कारण ही आत्मा कलुषित होती है। उसमें बुराइयां आती हैं। नफ़्स आत्मा को नीचे की और ले जाती है। रूह आत्मा को ऊपर ले जाती है। रूह परमात्मा संबंधी विषयों का वास-स्थल है। साधक रूह के द्वारा नफ़्स पर नियंत्रण कर सकता है।

क़ल्ब (हृदयऔर रूह (आत्मारूपात्मक जगत के बीच का एक साधन रूप पदार्थ है। साधारणतः क़ल्ब पर पर्दा पडा रहता है और वह पापों से दूषित बना रहता है। वह तर्क और वासनाओं जैसी इन्द्रियों का शिकार बना रहता है। वह न इधर जा पाता न उधर, क़ल्ब  भौतिक जगत (आलमे ख़लक़) और आध्यात्मिक जगत (आलमे अम्न) के बीच फंसा रहता है। असल में वह नफ़्स और रूह के बीच रहता है। यह संधि-स्थल है। एक तरफ है परमात्मा का प्रकाश तो दूसरी तरफ है इन्द्रियों के माया-मोह का अन्धेरा। सद् वृत्तियों और कुवृत्तियों में संघर्ष होता रहता है।

सूफ़ी नफ़्स (जड़ आत्मा) को सभी बुराइयों की जड़ मानते हैं। यह बुरे मार्ग पर ले जाता है। नफ़्स को जानना और उस पर विजय प्राप्त करना सूफ़ी के लिए बहुत ज़रूरी है। साधना के द्वारा आत्मा में लगे कलुष को दूर किया जा सकता है। इसके लिए सूफ़ी साधक मौन, उपवास, एकांत वास का सहारा लेते हैं। उपवास से नफ़्स पवित्र और शुद्ध होता है। नफ़्स के कलुष का दूर किया जाना ज़िक्र (स्मरण) और मुराक़वत (ध्यान) के द्वारा संभव है। सूफ़ी-साधना के क्रम में मन के विषयों का धीरे-धीरे इस प्रकार नाश होता है, कि अंत में एक अवस्था ऐसी आती है, जब चेतना में कोई दूसरी वस्तु न रहकर वह अकेली रह जाती है। पहली अवस्था में विषयी, विषय और उन दोनों के आपस के संबंध मौजूद रहते हैं। दूसरी स्थिति में विषयी और विषय रह जाते हैं। यहां संबंध टूट जाते हैं। और तीसरी अवस्था में केवल विषयी ही रह जाता है। यहां विषयों का अंत हो जाता है। यह फ़ना (मोक्ष) प्राप्त करने की वे सीढ़ियां हैं जिन पर चढ़ कर आत्मा परमात्मा के पास पहुंच जाती है और उसकी यात्रा पूरी हो जाती है। यह यात्रा किसी खोए हुए को पाने की नहीं है, वह तो हमेशा मौज़ूद है। इसलिए यह यात्रा किसी भूल गए को याद करने की है, जिसे सूफ़ी ज़िक्र कहते हैं।

इस यात्रा को तरीक़ा (संयम) कहते हैं। इसके दो भाग हैं एक मुजाहिदा (अभ्यास) और दूसरा मराक़बा (ध्यान)। मुजाहिदा के द्वारा तजकिया-ए-नफ़्स (हृदय की शुद्धि) को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए शरीयत के नियमों को मानना ज़रूरी है। मराक़बा के द्वारा शारीरिक और मानसिक क्रियाएं की जाती हैं जिन्हें ज़िक्र (ध्यान) कहते हैं। ज़िक्र की कई किस्में हैं, इनमें जली और खफ़ी अधिक मशहूर हैं। इन क्रियाओं में खास आसन किया जाता है। साथ-साथ हब्से दम (प्राणायाम) भी किया जाता है इसमें ला इला इल-अल्लाह जपा जाता है।

यह क्रियाएं एक गूढ़ प्रभाव पैदा करती हैं। इसमें अनदेखे रंग और अनसुने शब्द दिखाई और सुनाई देते हैं। मौलाना रूमी कहते हैं,

दर अबल कुफ्लस्त व दर दिल पुर आवाज़एं

अर्थात होठों पर ताला लगा है, और दिल में एक नाद है, होंठ चुपचाप है लेकिन दिल नाद से भरा है। कबीर कहते हैं,

अनहद बाजत ढोल रे, तोहे पीव मिलेंगे

 

10.22 भावाविष्टावस्था (वज्द)

सूफी मत में भावाविष्टावस्था को 'वज्द' कहा जाता है। सरल शब्दों में, यह ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह डूब जाने, सुध-बुध खो देने और एक परम आनंद या परमानंद (Ecstasy) की स्थिति में पहुँच जाने का नाम है। 'वज्द' अरबी भाषा के शब्द 'वजदा' से बना है, जिसका अर्थ होता है — पा लेना, पा जाना या मिल जाना। सूफी साधना में इसका अर्थ है 'परमात्मा की उपस्थिति को पा लेना'। जब एक सूफी साधक (सालिक) आध्यात्मिक साधना के एक विशेष स्तर पर पहुँचता है, तो परमात्मा की कृपा (फ़ैज़) सीधे उसके हृदय पर अवतरित होती है, जिससे वह संसार से पूरी तरह कटकर ईश्वरमय हो जाता है।

वज्द कोई ऐसी स्थिति नहीं है जिसे मनुष्य अपनी मर्जी या चालाकी से पैदा कर सके। यह ईश्वर द्वारा साधक के दिल पर डाला गया एक आध्यात्मिक झोंका है, जो अचानक और अप्रत्याशित रूप से आता है। सूफ़ियों का परम लक्ष्य परमात्मा से एकत्व है। इस अवस्था का वर्णन करना असंभव है। पैग़म्बर या उच्च श्रेणी के संत जैसे कुछ ही हैं जिन्हें इस अवस्था की प्राप्ति होती है। जीवन में कुछ ही ऐसे पल आते हैं जब समस्त इन्द्रियगत विषयों से परे होकर साधक आध्यात्मिक जगत का अनुभव करते हैं। जब साधक पर वज्द का प्रभाव होता है, तो उसकी बाहरी और आंतरिक स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। वहाँ वे उस परम सत्य को प्रत्यक्ष कर पाते हैं। यह अनुभूति की चीज़ है, इसे भाषाओं के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। साधक को अपने शरीर, समय, स्थान या समाज का कोई होश नहीं रहता। वह अपनी व्यक्तिगत पहचान (अहंकार) को भूल जाता है। उसे समझाने के लिए संकेतों और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है। कुछ साधक हुए हैं जिन्होंने इस अवस्था को समझाने का प्रयत्न किया है या इस अवस्था में उनके मुंह से कुछ निकल गया। जैसे इसी भावाविष्टावस्था में रहते हुए हज़रत मंसूर बिन हल्लाज के मुंह से ‘अनलहक्क़ (मैं परमात्मा हूँ) निकल गया था। दृश्यमान जगत से जो निकल जाता है वह अपनी वास्तविक अवस्था में वास करता है। उसमें न मैं का स्थान है न हम लोगों का और न ही तू का। उसमें मैं, ‘हम और तू एक ही वस्तु है। मनुष्य परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है। सूफ़ियों का मानना है कि वज्द (भावाविष्टावस्था) ही एक ऐसा जरिया है जिससे आत्मा, परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। इस सिलसिले में सूफ़ियों ने फ़ना (लय प्राप्त होना), वज्द (भाव), समां, जौक (स्वाद), शर्ब (पीना), ग़ैबत (अहं से बेखबर होना), जज़्बात तथा हाल आदि शब्दों का प्रयोग किया है। साधक की चेष्टा की अंतिम स्थिति है अहं का विलुप्त होना। अक्सर सूफी कव्वाली, संगीत (समा) या अल्लाह के नाम के जप (ज़िक्र) के दौरान वज्द में आ जाते हैं। इस अवस्था में वे अनजाने में ही झूमने या नृत्य करने लगते हैं, जिसे सूफी परंपरा में 'रक्स' कहा जाता है (जैसे जलालुद्दीन रूमी के दरवेशों का घूम-घूम कर किया जाने वाला नृत्य)। इसके बाद साधक को करने के लिए कुछ  नहीं रह जाता। सभी मानवीय गुणों और व्यापारों का अंत हो जाता है। चूंकि यह परमात्मा और उसके ऊपर सच्चा ईमान लाने के बीच का रहस्य है, इसलिए इसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

सूफियों के अनुसार, वज्द केवल एक भावुक स्थिति नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक ज्ञान (मारिफ़त) का द्वार है। इस अवस्था में साधक को उन रहस्यों और सत्यों का साक्षात अनुभव (कश्फ़) होता है, जिन्हें बुद्धि या किताबों के माध्यम से कभी नहीं समझा जा सकता। तवाजुद वज्द की प्रारंभिक अवस्था है जहाँ साधक जानबूझकर या प्रयास करके (जैसे संगीत सुनकर या रोकर) ईश्वर के प्रेम की उस स्थिति को लाने की कोशिश करता है। वज्द सच्ची और स्वाभाविक अवस्था है। इसमें कोई प्रयास नहीं होता; ईश्वरीय प्रेम का सैलाब साधक के हृदय को अपनी चपेट में ले लेता है। जहां वज्द (भावावेश) की समाप्ति होती वहीं से वुजूद ((स्थिति) का आरंभ होता है। यह वज्द का सर्वोच्च स्तर है। यहाँ साधक का व्यक्तिगत अस्तित्व पूरी तरह मिट जाता है और वह केवल परमात्मा की सत्ता का अनुभव करता है (जिसे 'फ़ना' भी कहा जाता है)। वुजूद की अवस्था को सूफ़ी साधक परमात्मा की देन मानते हैं। वज्द का वुजूद साधक को अस्तित्व शून्य बना देता है। इसके बाद की अवस्था को मौजूद का वुजूद (परमात्मा की सता में स्थिति) कहते हैं। इसके बाद उसका अपना कोई वुजूद (अस्तित्व) नहीं रह जाता।  

10.23 निष्कर्ष

निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि सूफ़ीमत का आविर्भाव सातवीं शताब्दी से माना जा सकता है। हज़रत जामी का कहना है कि इस (सूफ़ी) शब्द का सबसे पहले प्रयोग सन् 800 से पूर्व हज़रत अबू हाशिम के लिए हुआ था। प्रमुख सूफ़ी साधकों में हज़रत इब्राहिम बिन अधम (सन् 777), हज़रत दाउद-अत-ताइ (सन् 781-782), हज़रत राबीया अल अदाविया (आठवीं से नौवीं शताब्दी) के काल को सूफ़ीमत के विकास की दूसरी अवस्था माना जा सकता है। इस काल में सूफ़ी साधकों ने दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन करना शुरू कर दिया था। हज़रत मारुफ अल करखी, हज़रत मंसूर अल ह्लल्लाज, हज़रत जून्नून अल मिस्त्री, हज़रत बायजीद अल बिस्तमी जैसे प्रसिद्ध सूफ़ी साधक इसी समय की देन हैं। सूफ़ीमत और सिद्धांतों का परिचय देने वाले अनेक ग्रन्थ लिखे गए, जिससे दसवीं शताब्दी तक सूफ़ीमत की एक निश्चित धारा बन गयी। रूढ़िवादी इस्लाम से विभेद के कारण हज़रत अल गज्जाली जैसे साधकों ने दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की। वास्तव में सूफ़ी दर्शन पर ईसाई मत, नास्तिक मत, बौद्ध दर्शन, भारतीय वेदान्त, नव–अफलातुनी दर्शन सभी का प्रभाव है।

सूफ़ी मानते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि का उद्गम एक है, और इसका लक्ष्य उस सृष्टि में लय हो जाना है। जब तक आत्मा और परमात्मा के बीच मैं’ और तू का भेद बना है, तब तक प्रेम सम्भव नहीं है। इसलिए हज़रत अलकुरेशी का कहना है कि सच्चे प्रेम का मतलब है कि तुम जिस परम प्रियतम से प्रेम करते हो, उसे सब कुछ जो तुम्हारे पास है, दे दो जिससे तुम्हारा अपना कहने को कुछ भी न रह जाए। इसके लिए साधकों को अनेक मंजिलों से गुजरना पड़ता है और अपने हृदय को पवित्र करना पड़ता है, तभी आत्मा और परमात्मा का मिलन संभव है। इसलिए, सूफ़ी दर्शन दृढ़ता से मानता है कि ईश्वर कहीं दूर आसमान में नहीं, बल्कि आपके भीतर और बाहर, सृष्टि के हर ज़र्रे (कण) में मौजूद है; बस उसे देखने के लिए अज्ञानता का पर्दा हटाकर 'बातिन' (आंतरिक आँख या अंतर्दृष्टि) को जगाने की आवश्यकता है।

 

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर