सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-3
11.6 प्रेम-पथ की यात्रा और सात घाटियां - साधना सोपान
बारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध
फारसी सूफी कवि फरीदुद्दीन अत्तार ने अपनी कालजयी रचना 'मंतक उत्-तैर' (पक्षियों का सम्मेलन / The Conference of the Birds) में सात रहस्यमय घाटियों (Seven Valleys) का रूपक
दिया है। उन्होंने
प्रेम-पथ की यात्रा के लिए सात घाटियों को पार करना आवश्यक माना है। इन घाटियों को
पार किए बिना कोई भी साधक ईश्वर (दिव्य प्रियतम) से एकाकार नहीं हो सकता। उस महान
आध्यात्मिक और दार्शनिक मसनवी (कविता) के अनुसार दुनिया भर के पक्षी इकट्ठा होते
हैं। वे फैसला करते हैं कि उनका कोई राजा नहीं है। वे अपने राजा 'सीमुर्ग'
(Simurgh) को खोजने के लिए निकलते हैं। एक समझदार
पक्षी हूदहूद (Hoopoe) उनका
रास्ता दिखाता है और उन्हें यात्रा के खतरों के बारे में बताता है। यात्रा के
दौरान पक्षियों को सात बेहद कठिन और खतरनाक घाटियों से गुजरना पड़ता है: 1. तल्बी
(खोज) - जहाँ इच्छा और जिज्ञासा पैदा होती है। 2. इश्क
(प्रेम) - जहाँ दिल प्रेम की आग में जलता है। 3. मारिफत
(ज्ञान) - जहाँ सच्चाई का अहसास होता है। 4. इस्तगना
(संतोष) - जहाँ दुनिया की चाहत खत्म हो जाती है। 5. तौहीद
(एकता) - जहाँ सब कुछ एक नजर आता है। 6. हैरत
(आश्चर्य) - जहाँ इंसान चकित रह जाता है। 7. फक्र ओ
फना (शून्यता/विस्मृति) - जहाँ अहंकार और खुद का वजूद मिट
जाता है। रास्ते की कठिनाइयों, थकान और डर के कारण कई पक्षी मर
जाते हैं या पीछे छूट जाते हैं। अंत में केवल तीस पक्षी ही सीमुर्ग के महल
तक पहुँच पाते हैं। जब वे महल पहुँचते हैं, तो उन्हें
एक आईना दिखाया जाता है। उस आईने में वे खुद को देखते हैं। फारसी में 'सी' का मतलब
तीस और 'मुर्ग' का मतलब
पक्षी होता है। यानी वे खुद ही 'सीमुर्ग' बन चुके
होते हैं। यह इंसानी आत्मा की भगवान तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है। इसका
संदेश है कि ईश्वर या सच्चाई बाहर नहीं, बल्कि
इंसान के अपने भीतर ही मौजूद है। अहंकार को मिटाकर ही उसे पाया जा सकता है। प्रेम-पथ
की यात्रा में सात घाटियां या साधना के सात सोपान पाए जाते हैं।
1. पहली घाटी खोज घाटी है। इसे अनुताप
(ईश्वरोन्मुख होना) भी कह सकते हैं। इसे फारसी
में 'वादी-ए-तलब' या Valley
of Search कहा जाता है। यह लंबी तथा श्रम-साध्य यात्रा है।
यहां साधक को सभी सांसारिक वस्तुओं (मोह-माया, पुरानी
रूढ़ियों और अपने अहंकार) का परित्याग कर देना होता है। इसमें साधक के मन में अपने
वास्तविक स्रोत (ईश्वर) से मिलने की तीव्र व्याकुलता और अटूट धैर्य होता है। साधक
दुनिया की झूठी तार्किक समझ को छोड़ देता है। सूफी साधना के प्रारंभिक चरणों (मकामात)
में सबसे पहला चरण 'तौबा' (अनुताप या
पश्चाताप) होता है। तौबा का वास्तविक अर्थ केवल पापों पर रोना
नहीं है, बल्कि सांसारिक विकर्षणों से मुंह मोड़कर
पूरी तरह से ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाना है। जब तक कोई साधक अपने अतीत की
गलतियों पर अनुताप (पश्चाताप) करके अपने हृदय को शुद्ध नहीं करता, तब तक उसके भीतर 'सच्ची खोज' की आग (तलब) पैदा नहीं हो सकती। इसलिए, अनुताप वह
पहली आंतरिक चेतना या प्रेरणा है जो साधक को 'खोज की
घाटी' में कदम रखने की शक्ति देती है।
इस घाटी में साधक को तब तक ठहरना चाहिए जब तक उसके मन को परम ज्योति अपनी रश्मियों
में लपेट न ले। यह प्रेम की घाटी (वादी-ए-इश्क) है जहाँ तर्क पूरी तरह समाप्त हो जाता है और केवल प्रेम की
आग बचती है।
2. दूसरी सीढ़ी है आत्म
संयम (जड़ आत्मा पर पूर्ण अधिकार कर लेने का प्रयत्न करना)।
सूफी अध्यात्म में इसे 'मुजाहदा' (आंतरिक
संघर्ष) या 'वरअ' (पवित्रता/परहेज) कहा जाता
है, जिसका मूल उद्देश्य 'नफ्स' (जड़ आत्मा
या निम्न अहंकार) पर पूर्ण नियंत्रण पाना है। यहाँ साधक अपनी इंद्रियों, वासनाओं और भौतिक इच्छाओं पर कड़ा पहरा बिठाता है ताकि
उसकी आत्मा पवित्र हो सके। साधक उपवास (रोजा), मौन, एकांतवास
और निरंतर ईश्वर के स्मरण (जिक्र) के जरिए इस जड़ आत्मा को बेड़ियों में
जकड़ता है। इसे इश्क की
घाटी (Valley of Love) कहते हैं। इस
दूसरी घाटी में प्रवेश करते ही साधक का तर्क और बुद्धि पूरी तरह जलकर राख हो जाते
हैं। यहाँ केवल शुद्ध और निश्छल प्रेम (इश्क) का राज होता है। प्रेमी अपने
प्रियतम (ईश्वर) के विरह और मिलन के दर्द में पूरी तरह डूब जाता है। सूफी रहस्यवाद
कहता है कि सच्चा प्रेम बिना आत्म संयम के जन्म ही नहीं ले सकता। जब साधक
आत्म संयम के जरिए अपनी जड़ आत्मा को भस्म कर देता है, तभी उसके
दिल में ईश्वर के लिए वास्तविक और निश्छल प्रेम की आग जलती है। जब तक इस पर अधिकार
नहीं होता, तब तक रूह आजाद होकर ईश्वर की तरफ आगे नहीं
बढ़ सकती। परम ज्योति का स्पर्श पाकर साधक प्रेम की अनंत घाटी में प्रवेश
करता है। प्रेमी को प्रेमास्पद से मिलने की अदम्य इच्छा प्रेम-पथिक बनने के लिए
विवश कर देती है। यहां से उसका रहस्यवादी साधक का जीवन शुरु होता है। प्रेमी इस पथ
पर चलने के लिए समय की परवाह नहीं करता। उसकी आंखों में प्रेमाश्रु मात्र का संबल
होता है।
प्रेम पंथ दिन घरी न देखा।
तब देखै जब होइ सरेखा॥
जेहि तन पेम कहां तेहि मांसू।
कया न रकत न नयन्हि आंसू॥ (जायसी)
मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित 'पद्मावत' की ये
पंक्तियाँ प्रेम के सर्वोच्च और निश्छल रूप को दर्शाती हैं। सूफी काव्य परंपरा के
अनुसार प्रेम का मार्ग कठिन है, जहाँ सच्चा अनुराग होने पर
प्रेमी का शरीर विरह की अग्नि में तपकर क्षीण हो जाता है और शरीर में रक्त तथा
आँखों में आँसू तक शेष नहीं बचते। यह स्थिति सूफी साधना में आत्म-उत्सर्ग और ईश्वर
के प्रति तीव्र अनुराग की चरम अवस्था को प्रकट करती है।
3. तीसरी सीढ़ी है वैराग्य (वासना का
परित्याग, सांसारिक सुखों के प्रति विरक्ति)। सूफी
शब्दावली में इसे 'ज़ुहद'
(Asceticism) कहा जाता है। इसका वास्तविक अर्थ है वासना
का परित्याग करना और सांसारिक सुखों व भौतिक आकर्षणों के प्रति पूरी तरह विरक्त
(उदासीन) हो जाना। जब साधक आत्म संयम में सफल हो जाता है, तब उसके
भीतर स्वाभाविक रूप से 'ज़ुहद' (वैराग्य)
का जन्म होता है। अब उसे सांसारिक सुख, धन-दौलत और
वासनाएँ आकर्षित नहीं करतीं। वह दुनिया में रहते हुए भी दुनिया का नहीं रहता। सूफी
संतों के अनुसार, वैराग्य का मतलब हाथ में कटोरा लेकर जंगल
भाग जाना नहीं है, बल्कि हृदय से संसार की इच्छा को निकाल
देना है। प्रसिद्ध सूफी कथन है: "वैराग्य यह
नहीं है कि आपके पास कुछ न हो, बल्कि
वैराग्य यह है कि कोई भी सांसारिक वस्तु आपको (आपके दिल को) अपना गुलाम न बना
सके।" इस सीढ़ी पर साधक का हृदय भौतिक सुखों और
वासनाओं से पूरी तरह खाली हो जाता है, ताकि उसमें
केवल और केवल ईश्वर (माशूक) के प्रेम के लिए जगह बचे। फरीदुद्दीन अत्तार ने
इसे 'वादी-ए-इस्तिगना' (वैराग्य या
स्वतंत्रता की घाटी) कहा था। सूफी सिद्धांतों में जिसे शुरुआत में एक 'साधना या
सीढ़ी' (ज़ुहद) के रूप में अपनाया जाता है, वही यात्रा
के आगे बढ़ने पर एक गहरे 'आध्यात्मिक अनुभव' (इस्तिगना) में बदल
जाता है, जहाँ साधक ईश्वर के अलावा ब्रह्मांड की हर
चीज से बेपरवाह हो जाता है। इस तीसरी अवस्था में वह मारिफ़त की घाटी में प्रवेश
करता है। इस ज्ञान की घाटी (वादी-ए-मारिफत) में ईश्वरीय रहस्यों का बोध होता
है। इस अवस्था में साधक के भीतर आत्मज्ञान और दिव्य ज्ञान का उदय होता है। यहाँ 'ज्ञान' का अर्थ
किताबी विद्या नहीं, बल्कि ईश्वर के नूर (प्रकाश) का
प्रत्यक्ष अनुभव है। साधक को हर सांसारिक वस्तु में ईश्वर की कारीगरी और उसकी
उपस्थिति दिखने लगती है। इस घाटी में यात्री को सत्य का रहस्य ज्ञात हो जाता है। यह
वह ज्ञान है जो ईश्वर की प्रकृति, गुण और
उसके कार्यकलापों पर ध्यान लगाने से प्राप्त होता है। यहाँ मानव ईश्वर की उपलब्धि
अनुभूति के द्वारा करता है। प्रेमी का लक्ष्य प्रेमोपलब्धि ही होता है। उसे पाकर
वह फिर से इस नश्वर संसार में नहीं आना चाहता।
पेम पंथ जौं पहुंचै पारां।
बहुरि न आइ मिलै एहि छारां॥
भलेहिं पेम है कठिन दुहेला।
दुइ जग तरा पेम जेईं खेला॥ (जायसी)
मलिक मोहम्मद जायसी की इन पंक्तियों में
प्रेम के आध्यात्मिक महत्व और उसकी कठिन राह का वर्णन किया गया है, जो उनकी
प्रसिद्ध रचना 'पद्मावत' से ली गई
हैं। जायसी के अनुसार, प्रेम का मार्ग भले ही अत्यंत कठिन और
दुखों से भरा है, लेकिन इस पर चलकर पार पाने वाला व्यक्ति
जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। सच्चे प्रेम का खेल खेलने वाला इस लोक और
परलोक दोनों में तर जाता है, क्योंकि लौकिक प्रेम ही अलौकिक
यानी ईश्वरीय प्रेम प्राप्ति का माध्यम है।
4. चौथी सीढ़ी है दारिद्र्य (लोक निन्दा, अपमान आदि
से विचलित न होना)। सूफी साधना (मकामात) की चौथी सीढ़ी 'फ़क़्र' (दारिद्र्य) है, लेकिन इसका
अर्थ समाज द्वारा किए गए अपमान को सहना नहीं है। यहाँ साधक यह मान लेता है कि उसका
अपना कोई वजूद, धन या ज्ञान नहीं है। वह ईश्वर के सामने
पूरी तरह 'भिखारी' या 'शून्य' बन जाता
है। प्रसिद्ध सूफी वचन है: "अल्फ़क़्रू
फ़ख़्री" (अर्थात् मेरी यह आध्यात्मिक
दरिद्रता ही मेरा गौरव है)। यह चौथी घाटी एकत्व की घाटी है। यह आनंद की
घाटी है। इसमें साधक को ईश्वरीय
सौंदर्य की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। यह सोपान प्रेम साधक को उन्माद की स्थिति
में ले जाता है जिसे समाधि कहते हैं। ऐसी स्थिति में प्रेमी को तीनों लोक चौदह
भुवन में प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी लावण्यमय नहीं दिखता है।
तीन लोक चौदह भुवन खण्ड सबै परै मोहिं सूझि।
पेम छाड़ि किछु और न लोना जौं देखौं मन बूझि॥ (जायसी)
यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ सूफ़ी
कवि मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य 'पद्मावत' से ली गई
हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से जायसी ने प्रेम की सर्वोच्चता और उसकी व्यापकता
को प्रतिपादित किया है। इन पंक्तियों का सरल अर्थ है
"यदि मैं अपने मन में भली-भाँति विचार करके (सोच-समझकर)
देखूँ, तो मुझे तीनों लोक (आकाश, पाताल, मृत्युलोक)
और चौदह भुवन (ब्रह्मांड के सभी चौदह खंड) दिखाई देते हैं। (परन्तु इस पूरी सृष्टि
में) प्रेम को छोड़कर और कुछ भी सुंदर, सलोना या
मूल्यवान नहीं है।" जायसी कहते
हैं कि ज्ञान या आध्यात्मिक साधना के बल पर कोई व्यक्ति तीनों लोकों और चौदह
भुवनों का रहस्य जान सकता है, लेकिन यदि उसके हृदय में प्रेम
नहीं है, तो वह सब व्यर्थ है। यहाँ 'लोना' शब्द का
अर्थ लावण्यमय, सुंदर, आकर्षक या
नमक (जो भोजन में स्वाद लाता है) से है। कवि का तात्पर्य है कि जैसे बिना नमक के
भोजन बेस्वाद है, वैसे ही प्रेम के बिना यह पूरी सृष्टि और
जीवन फीका है।
5. पांचवीं सीढ़ी है धैर्य (दरिद्रता की दशा में शान्त भाव से सहना)।
सूफी शब्दावली में इसे 'सब्र'
(Sabr - Patience) कहा जाता है। इसका अर्थ है 'फ़क़्र' (दारिद्र्य, शून्यता या
भौतिक अभाव) की कठिन दशा में बिना किसी शिकायत के, शांत और
अडिग भाव से सब कुछ सहना। जब साधक चौथी सीढ़ी 'फ़क़्र' (दारिद्र्य/शून्यता) को
स्वीकार करता है, तब उसका जीवन सांसारिक सुखों से पूरी तरह
खाली हो जाता है। इस कठिन परीक्षा की घड़ी में पाँचवीं सीढ़ी के रूप में 'धैर्य' (सब्र) का जन्म
होता है। जब भौतिक वस्तुएं पास न हों (दरिद्रता हो), या जब
साधना का मार्ग बहुत कठिन हो जाए, तब साधक के मन में कोई शिकायत (शिकवा)
नहीं आता। वह शांत भाव से ईश्वर के फैसले का इंतजार करता है। अपनी जड़ आत्मा की
इच्छाओं (नफ्स/वासनाओं) को काबू में रखते समय शांत रहता है। साधक ईश्वर के
स्मरण और कठिन आध्यात्मिक नियमों (इबादत/साधना) पर लगातार टिके रहता है। यह पांचवीं
घाटी अनासक्ति की घाटी है, इसमें
ईश्वरीय प्रेम से अभिभूत होना पड़ता है। यह अद्वैत की अवस्था है। यहाँ साधक को यह
आभास होता है कि संसार में अनेकता केवल एक भ्रम है और वास्तव में सब कुछ एक ही
सत्ता (ईश्वर) का रूप है। 'मैं' और 'तुम' का भेद
मिटने लगता है। इस इस्तित्ना
की घाटी में पहुँचकर साधक पूरी तरह से दुनिया से विरक्त हो जाता है।
उसे अब संसार की किसी भी सुख-सुविधा, प्रशंसा या
भय की परवाह नहीं रहती। वह केवल और केवल अपने दिव्य प्रियतम पर निर्भर हो जाता है।
इस दशा में पहुँच कर साधक अपने आपको भूल जाता है। दिव्य प्रेमोपलब्धि के बाद
प्रेमी कामना रहित हो जाता है, निष्काम हो जाता है।
न हैं सरग क चाहौं राजू।
ना मोहि नरक सेंति किछु काजू॥
चाहौं ओहि कर दरसन पावा।
जेइ मोहि आनि पेम पथ लावा॥ (जायसी)
मलिक
मुहम्मद जायसी द्वारा रचित इन पंक्तियों का मुख्य अर्थ ईश्वर
(प्रियतम) के प्रति निश्छल, अनन्य और निःस्वार्थ प्रेम को
प्रकट करना है। सूफ़ी काव्य परंपरा में मोक्ष या स्वर्ग की चाह के स्थान पर केवल
ईश्वर के दर्शन की लालसा को सर्वोपरि माना गया है। इसका अर्थ है, मुझे
स्वर्ग के सुखों या वहाँ के राज्य की कोई चाह (इच्छा) नहीं है। और न ही मुझे नरक
से कोई डर या उसके कष्टों से कोई सरोकार है। मैं तो केवल उस (ईश्वर/परमात्मा) के
दर्शन पाना चाहता हूँ। जिसने मुझे इस संसार में लाकर प्रेम के मार्ग (प्रेम पंथ)
पर अग्रसर किया है। सूफ़ी मत के अनुसार, सच्चा
प्रेमी (साधक) स्वर्ग के लोभ या नरक के भय से मुक्त होता है। वह ईश्वर की भक्ति
किसी लालच में नहीं, बल्कि केवल उसके प्रेम में डूबकर करता है। उन्हें
न तो स्वर्ग का राजा बनना है और न ही नरक की चिंता है; उनका
एकमात्र लक्ष्य उस परम सत्ता का साक्षात्कार करना है जिसने उनके हृदय में प्रेम की
ज्योति जगाई है।
6. छठी सीधी है ईश्वर में विश्वास। धैर्य (सब्र) की पांचवीं सीढ़ी
को पार करने के बाद ही साधक के भीतर छठी सीढ़ी 'तवक्कुल' (ईश्वर पर
पूर्ण विश्वास और आत्मसमर्पण) का उदय होता है। जो साधक शांत भाव से सहना
सीख जाता है, वह अंततः अपना सब कुछ ईश्वर के हाथों में
सौंपने के काबिल बन जाता है। इस अवस्था में साधक अपनी इच्छाओं, योजनाओं और
अपने पूरे अस्तित्व को परमात्मा की मर्जी के हवाले कर देता है। इस सीढ़ी पर
पहुँचकर साधक कल की चिंता पूरी तरह छोड़ देता है। उसे पक्का विश्वास होता है कि
जिसने उसे पैदा किया है, वही उसकी हर जरूरत को पूरा
करेगा। सूफी संत मानते हैं कि तवक्कुल का मतलब हाथ पर हाथ धरकर बैठना नहीं है।
इसका अर्थ है—अपने हिस्से का कर्म पूरी ईमानदारी से करना, लेकिन उसके परिणाम को
पूरी तरह ईश्वर पर छोड़ देना। सूफी ग्रंथों में तवक्कुल की चरम स्थिति को समझाने
के लिए एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया जाता है: "साधक को ईश्वर के हाथों में वैसा ही हो जाना चाहिए, जैसे नहलाने वाले (ग़स्साल) के हाथों में एक मृत शरीर (लाश) होता है।"
जैसे एक मृत शरीर खुद को नहलाने वाले की मर्जी पर छोड़
देता है (वह न खुद हिल सकता है, न
विरोध कर सकता है), वैसे ही तवक्कुल
की अवस्था में साधक का अपना कोई विरोध या मर्जी नहीं बचती। वह ईश्वर की इच्छा की
लहरों पर तैरता है। साधक ईश्वर पर वैसे ही भरोसा करता है जैसे कोई मुवक्किल अपने
वकील पर करता है। साधक ईश्वर पर इस तरह निर्भर हो जाता है जैसे एक छोटा बच्चा अपनी
माँ पर करता है। बच्चा नहीं जानता कि भोजन कहाँ से आएगा, लेकिन उसे पता है कि माँ है तो उसे भूखा नहीं रहना पड़ेगा। जब मान बच्चे को
हाथों में लेकर हवा में ऊपर उछालती है तो बच्चा डरता या रोता नहीं, हंसता है। उसे मालूम है कि जब वह नीचे आएगा तो वह मान के
सुरक्षित हाथों में होगा। साधक अपनी चेतना को इतना विलीन कर देता है कि उसे ईश्वर
के अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता। यहाँ उसकी व्यक्तिगत इच्छा पूरी तरह समाप्त
हो जाती है।
यह छठी घाटी कौतूहल तथा
चकाचौंध (हैरत की घाटी)
की घाटी है। इसे हैरत की घाटी कहते हैं। ईश्वर की असीम सुंदरता और उसकी महिमा को देखकर साधक पूरी तरह स्तब्ध और
विस्मित (हैरान) रह जाता है। वह सुध-बुध खो बैठता है और यह अंतर भी भूल जाता है कि
वह स्वयं क्या है और उसका प्रियतम क्या है। वह केवल असीम विस्मय में डूबा रहता है।
यहां सूफ़ी साधक की अंतर्दृष्टि
का पुनः लोप हो जाता है और वह अंधकार में फंसता अनुभव करता है। जिसने
प्रेम-मार्ग पर चलकर अपना सिर उतारकर ज़मीन पर
नहीं रखा, उसका पृथ्वी पर आना ही व्यर्थ हो गया।
प्रेम के बल पर ही मनुष्य बैकुण्ठ का जीव बन पाता है, अन्यथा
उसकी स्थिति एक मुट्ठी धूल के समान है।
मानुस पेम भएउ बैकुंठी।
नाहिं त काह छार एक मूंठी॥ (जायसी)
इस पंक्ति के माध्यम से जायसी
ने जीवन में प्रेम की महिमा और उसके सर्वोच्च मूल्य को रेखांकित
किया है। मनुष्य प्रेम के कारण ही बैकुंठ (स्वर्ग या मोक्ष/परम आनंद) का अधिकारी
बनता है, अर्थात् उसका जीवन धन्य और दिव्य हो जाता
है। अन्यथा (यदि जीवन में प्रेम न हो तो) यह मानव शरीर एक मुट्ठी राख (छार) के
समान निरर्थक और तुच्छ है। सूफी विचारधारा में ईश्वर को प्रेम के माध्यम से ही
प्राप्त किया जा सकता है। पंचतत्त्वों से बना यह क्षणभंगुर मानव शरीर तब तक सार्थक
नहीं है, जब तक इसमें प्रेम का संचार न हो। जब
मनुष्य के हृदय में सच्चा, निश्छल और
उदार प्रेम उत्पन्न होता है, तो वह
सांसारिक विकारों से ऊपर उठकर दिव्य (बैकुंठी) बन जाता है। प्रेम ही मनुष्य को
अमरत्व प्रदान करता है। यदि जीवन में प्रेम, करुणा और
सहानुभूति नहीं है, तो मनुष्य
चाहे जितना भी धन, ज्ञान या
शक्ति अर्जित कर ले, मृत्यु के
बाद उसका भौतिक अस्तित्व केवल एक मुट्ठी राख बनकर रह जाता है। प्रेम के बिना मानव
जीवन पूरी तरह से शून्य और मूल्यहीन है। संदेश यह है कि प्रेम ही इस नश्वर संसार में शाश्वत तत्व है। प्रेम के
बल पर ही आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव है और यही मानव जीवन का चरम उद्देश्य है।
7. सातवीं सीढ़ी है सन्तोष (आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की
योग्यता होना)। तवक्कुल (पूर्ण
ईश्वर-विश्वास) की इस छठी सीढ़ी को पार करने के बाद साधक सातवीं और अंतिम सीढ़ी 'रिदा' या 'रज़ा' (पूर्ण
संतुष्टि और आनंद) पर पहुँचता है, जहाँ उसे
ईश्वर की हर मर्जी में परम सुख मिलने लगता है। 'रिदा' या 'रज़ा' का अर्थ है—ईश्वरीय इच्छा में पूर्ण संतुष्टि और परम
आनंद की स्थिति। जब साधक छठी सीढ़ी यानी 'तवक्कुल' (पूर्ण
ईश्वर-विश्वास) को पूरी तरह आत्मसात कर लेता है, तब वह इस सर्वोच्च अवस्था में प्रवेश करता है। यहाँ साधक का अपना कोई दुख, सुख, इच्छा या शिकायत
नहीं बचती। ईश्वर उसे जिस हाल में रखता है—चाहे वह सुख हो या कठिन से कठिन
विपत्ति—वह हर परिस्थिति को परमात्मा का प्रसाद मानकर उसमें परम आनंद का अनुभव
करता है। 'रिदा' का वास्तविक अर्थ है शिकायत का पूर्ण अंत। इस अवस्था में साधक के दिल से 'क्यों' और 'काश्' (ऐसा क्यों हुआ या
ऐसा होना चाहिए था) जैसे शब्द हमेशा के लिए मिट जाते हैं। वह ईश्वर के हर फैसले पर
मुस्कुराता है। आम इंसान मुश्किलों में दुखी होता है, लेकिन 'रिदा' पर पहुँचा सूफी संत विपत्ति में भी उसी आनंद का अनुभव करता है जो उसे सुख
में मिलता है। उसे दुःख देने वाले में भी केवल अपने प्रियतम (ईश्वर) का हाथ दिखाई
देता है। यह सातवीं सीढ़ी साधक को अध्यात्म के उच्चतम अनुभवों से जोड़ती है। हाँ
साधक की व्यक्तिगत इच्छा ईश्वर की इच्छा में पूरी तरह विलीन (फ़ना/अहंकार
का विनाश) हो जाती है। जब
साधक खुद को मिटा देता है, तब वह
ईश्वर के शाश्वत अस्तित्व का हिस्सा (बका /परमात्मा में स्थायित्व) बन जाता है। अब
वह जो कुछ देखता है, सुनता है या करता
है, वह सब ईश्वर के
माध्यम से ही होता है।
इसे फ़ना और बक़ा की घाटी भी
कहते हैं। यह सूफी
यात्रा की अंतिम मंजिल है। 'फ़ना' का अर्थ है साधक के अहंकार, अस्तित्व और 'स्व' का पूरी तरह से नष्ट हो जाना। जब साधक का अहंकार मर
जाता है, तब वह 'बक़ा' (ईश्वर के शाश्वत अस्तित्व) को प्राप्त करता है। जैसे
नदी समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाती है, वैसे ही
आत्मा परमात्मा में लीन होकर एक हो जाती है।
यह सातवीं घाटी ‘हक़ीक़त’ की घाटी है। इसमें
आत्मा का प्रेम के महासागर में विलय हो जाता है। वस्ल (मिलन) में साधक ईश्वर को अपने सामने
देखता है और उसे पूर्ण संतोष की प्राप्ति होती है। प्रेम और समुद्र समान हैं।
दोनों ही अनंत और अगाध हैं। जिस व्यक्ति ने प्रेम-सागर के दर्शन कर लिये, उसे
साधारण समुद्र बूंद के समान प्रतीत होता है।
औ जेइं समुंद पेम कर देखा।
तेइं यह समुंद बुंद बरु लेखा॥ (जायसी)
यह पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य 'पद्मावत' के 'प्रेम खंड' (या कड़बक) से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने ईश्वर और सृष्टि में व्याप्त प्रेम की असीमता, व्यापकता
और उसकी महिमा का वर्णन
किया है। इसका अर्थ है, जिस किसी ने भी उस अलौकिक या
ईश्वरीय प्रेम रूपी समुद्र को देख लिया है (अर्थात उसके रहस्य और गहराई को समझ
लिया है), उसके सामने यह विशाल भौतिक (संसार का)
समुद्र महज़ एक छोटी सी बूँद के समान प्रतीत होता है। संसार में जिसे हम सबसे बड़ा
और असीम मानते हैं—जैसे कि समुद्र—वह भी ईश्वर के विराट प्रेम के सामने एक छोटी सी
पानी की बूँद जैसा तुच्छ है। सूफी काव्य परंपरा में ईश्वर को प्रेम का अनंत सागर
माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य को उस सच्चे, आध्यात्मिक
और परम प्रेम की अनुभूति हो जाती है, तो संसार
की बड़ी से बड़ी वस्तु या भौतिक विस्तार भी उसके सामने बहुत छोटा और नगण्य (बूँद
के समान) लगने लगता है।
प्रसिद्ध सूफी महिला संत हज़रत राबिया
अल-अदविया 'रिदा' और निश्छल
प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती हैं। एक बार उनसे पूछा गया:
"क्या आप शैतान से नफरत करती हैं?" हज़रत राबिया
ने बहुत सुंदर उत्तर दिया: "प्रियतम
(ईश्वर) के प्रेम ने मेरे हृदय को इस कदर भर दिया है कि वहाँ किसी और के लिए—यहाँ
तक कि शैतान से नफरत करने के लिए भी—कोई जगह नहीं बची है।"
यही
'रिदा' की स्थिति
है, जहाँ साधक द्वेष, नफरत और
सांसारिक द्वंद्वों से ऊपर उठकर केवल दिव्य प्रेम के सागर में तैरता है।
इस प्रकार, अनुताप
(तौबा) से शुरू हुई यह प्रेम-पथ की यात्रा आत्म संयम, वैराग्य, दरिद्रता, धैर्य और
तवक्कुल के कठिन रास्तों से गुजरती हुई अंततः 'रिदा' (पूर्ण
संतुष्टि) के शिखर पर पहुँचकर विश्राम पाती है। यहाँ साधक और
ईश्वर (आत्मा और परमात्मा) के बीच का पर्दा हमेशा के लिए हट जाता है।
*** *** ***
मनोज
कुमार