महात्मा
गांधी हत्या केस-24
15. जनवरी, 1948
15 जनवरी की सुबह गांधीजी रात 2.30 बजे उठे। बिस्तर पर
लेटे-लेटे ही लिखने का काम किया। 3.30 बजे दांत साफ किए और प्रार्थना के लिए तैयार
हुए। 4.30 बजे प्रार्थना की। 8 औंस सादा गर्म पानी पिया। प्यारेलालजी को नोट्स
लिखवाए जो मीरा बहन के लिए था, “मैं यह पत्र साढ़े तीन
बजे सुबह की प्रार्थना के फौरन बाद लिखवा रहा हूं जबकि मैं अपना वह भोजन कर रहा
हूं जो एक व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए निर्धारित है। भौंचक्के मत रहो। यह भोजन 8 औंस गर्म पानी का है
जो मुश्किल से गले के नीचे उतरता है। हम इसे ज़हर समझकर लेते हैं और जानते हैं कि
इसका प्रभाव अमृत जैसा है। मैं इसे जब भी लेता हूँ, स्फूर्ति देता है। यह आश्चर्य की बात है
कि इस बार मैंने 8 बार यह ज़हर लगने वाला मगर अमृतमय भोजन लिया है। फिर भी मैं व्रत रखने
का दावा करता हूँ और सहज विश्वासी लोग इसे मान भी लेते हैं! कितनी अजीब दुनिया है
यह!”
गांधीजी 6.30 बजे सो गए और 7.15 बजे जागे। 7.35 बजे तकिए के
सहारे बैठे और 7.42 बजे 8 औंस गर्म पानी पिया। उन्हें अखबार पढ़कर सुनाए गए। 7.55
से 8.5 बजे तक घनश्याम दास बिरला से उपवास के बारे में बातचीत की। 8.35 बजे बिस्तर
पर बैठे। बैठने के लिए सहारे की ज़रूरत पड़ती है। गांधीजी को उस दिन कमज़ोरी लग रही
थी। स्नानघर में उन्हें कुर्सी पर ले जाना पड़ा। स्नानघर में चक्कर जैसा महसूस हुआ।
गांधीजी के चिकित्सकों डॉ. बी.सी. राय, जिवाजी मेहता और एम.डी.डी. गिल्डर ने
मेडिकल बुलेटिन ज़ारी किया। गांधीजी का वजन लिया गया। पहले दो दिन तो दो पौंड के
हिसाब से उनका वजन घट रहा था लेकिन तीसरे दिन वजन का घटना बंद हो गया। जितना पानी
वे पीते थे, उस हिसाब से उत्सर्जन में उतना पानी भी नहीं निकल रहा था। वे 68 औंस पानी लेते थे, लेकिन निकलता सिर्फ़ 28 औंस था। इसका साफ
मतलब था कि किडनी पूरा काम नहीं कर रहा था। पेशाब में एसीटोन की मात्रा भी बढ़ गया
था। ये लक्षण अच्छे नहीं थे। शरीर के तंतुओं का बिखरना शुरू हो गया था।
रक्त-नलियों में ज़हरीले तत्त्व भरने लगे थे। डॉक्टर ने केथेटर लगाने की सलाह दी।
गांधीजी ने कहा, अब सब ईश्वराधीन है। उसे बचाना होगा तो बचूंगा, नहीं तो नहीं।
बाहर की मदद नहीं लूंगा। यह सबसे चिंताजनक पहलू था, क्योंकि शरीर का वज़न पानी से पूरा
हो रहा था। उपवास पहले ही ख़तरे के दायरे में पहुँच चुका था।
शाम को वे प्रार्थना सभा में जाने की स्थिति में नहीं थे।
अपने प्रवचन उन्होंने अपनी शय्या से ही माइक के द्वारा दी। उन्होंने एक बार फिर
सांप्रदायिक शांति की अपील की; उन्होंने उन अफ़वाहों का खंडन किया
कि पटेल के साथ उनका झगड़ा हुआ था, और घोषणा की कि सरकार ने आख़िरकार
पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये सौंपने का फ़ैसला कर लिया है, जो असल में उसी के थे।
सबसे बढ़कर, उन्होंने सुनने वालों
को याद दिलाया कि जब तक शांति बहाल नहीं हो जाती, तब तक वे उपवास नहीं तोड़ेंगे।
जब लोगों ने दर्शन के लिए शोर मचाना शुरू किया, तो उनकी
पलंग को दरवाज़े तक ले जाया गया, ताकि लोग दर्शन कर सकें। गांधीजी बिड़ला हाउस के
एक तरफ़ बने बंद बरामदे में एक खाट पर लेटे हुए थे। ज़्यादातर समय वे भ्रूण की तरह
सिकुड़कर लेटे रहते थे—घुटने पेट की तरफ़ मुड़े हुए और मुट्ठियाँ छाती के नीचे।
उनका शरीर और सिर सफ़ेद खादी के कपड़े से पूरी तरह ढका हुआ था, जिससे उनका चेहरा साफ़
दिख रहा था। उनकी आँखें बंद थीं और वे सोए हुए या अर्ध-चेतन अवस्था में लग रहे थे।
दस फ़ीट की दूरी से लोगों की एक कभी न खत्म होने वाली कतार गुज़र रही थी। कतार में
खड़े भारतीय और विदेशी उन्हें देखकर भावुक हो रहे थे; कई लोग रो पड़े, धीरे-धीरे प्रार्थना
करने लगे और हाथ जोड़कर अभिवादन किया, जिसे गांधीजी देख नहीं पा रहे थे।
उनके चेहरे पर गहरा दर्द साफ़ झलक रहा था। फिर भी, नींद या अर्ध-चेतन अवस्था में भी, वह पीड़ा कुछ शांत और
उदात्त लग रही थी। उनकी अंतरात्मा जानती थी कि वे शांति के लिए योगदान दे रहे हैं, और इसलिए वे स्वयं भी
शांति का अनुभव कर रहे थे।
गांधीजी के बिगड़ते स्वास्थ्य ने लोगों को जागृत कर दिया था।
दिल्ली और अन्य जगहों पर शांति रैलियां हुईं। सभी जगह शांति, सुलह, समझौता के
प्रयास शुरू हो गए थे। जगह-जगह जुलूस निकालकर क़ौमी भाईचारे का संदेश फैलाया जा रहा
था। नेहरू जी ने दस हज़ार की एक आम सभा में कहा, “अगर बापू जी नहीं रहे,
तो देश की आत्मा मर जाएगी। वे देश की अंतरात्मा के एकमात्र साकार प्रतीक हैं। अगर
यह ख़ून-ख़राबा चलता रहा, तो हम आज़ादी खो बैठेंगे।” उन्होंने देशवासियों
से सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने और गांधीजी की जान बचाने की अपील की। उन्होंने
घोषणा की कि राहत के अन्य उपायों के अलावा, सरकार अगले एक सप्ताह के भीतर
दिल्ली में हर शरणार्थी के रहने की व्यवस्था करेगी। पाकिस्तान के शरणार्थी मामलों
के मंत्री गज़नफ़र अली खान ने कहा कि गांधी का उपवास न केवल भारत, बल्कि पाकिस्तान के
लोगों की भी आँखें खोलने वाला होना चाहिए और उन्हें उस शर्मिंदगी का एहसास कराना
चाहिए जो उन्होंने खुद पर मोल ली है।
कुछ लोग उपवास का सारा दोष सरदार पटेल पर डाल रहे थे।
उन्होंने मुसलमानों से चेतावनी वाले लहजे में कहा था, “या तो देश को समर्पित
होकर रहें, या पाकिस्तान चले जाएं। दोनों घोड़ों पर सवार नहीं हो सकते।” गांधीजी ने इसका खंडन
किया। सरदार का काम था देश की रक्षा करें। वे अपना काम सुचारू रूप से करते रहे
हैं। सरदार पटेल ने कैबिनेट के 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देने के निर्णय का
समर्थन किया। अचानक पटेल ने यह कहते हुए अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया कि बढ़ती उम्र के
साथ उनकी सेहत गिर रही है और सरकार में उनकी लगातार मौजूदगी से कैबिनेट के अन्य
सदस्य परेशान हो रहे हैं।
भारत सरकार ने घोषणा की कि वो पाकिस्तान को तत्काल 55 करोड़ रुपए देगी। यह घोषणा गांधीजी की ह्त्या का तात्कालिक
कारण बनी। इस घोषणा से गांधीजी के ख़िलाफ़ एक गुट बहुत नाराज़ हो गया। महात्मा
गांधी ने प्रार्थना के बाद दिए भाषण में कहा, "मुसलमानों को उनके
घरों से बेदख़ल नहीं किया जाना चाहिए। हिन्दू शरणार्थियों को किसी भी तरह की हिंसा
में शामिल नहीं होना चाहिए जिसकी वजह से मुसलमान अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर
हों"। हालाँकि बापू की भूख
हड़ताल का मुख्य मक़सद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाना
नहीं था बल्कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकना और सांप्रदायिक सद्भावना क़ायम करना था।
ज़ाहिर है, बापू पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने की माँग भी कर रहे थे लेकिन लक्ष्य था कि
सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम हो। कैबिनेट का फ़ैसला था कि जब तक दोनों देशों के बीच
विभाजन का मसला सुलझ नहीं जाता है तब तक भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए नहीं देगा। हालाँकि विभाजन के बाद दोनों देशों
में संधि हुई थी कि भारत पाकिस्तान को बिना शर्त के 75 करोड़ रुपए देगा।
इनमें से पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपए मिल चुके
थे और 55 करोड़ बकाया था। पाकिस्तान ने ये पैसे माँगना शुरू कर दिया
था और भारत वादाख़िलाफ़ी नहीं कर सकता था। बापू ने कहा कि जो वादा किया है उससे
मुकरा नहीं जा सकता। अगर ऐसा होता तो द्विपक्षीय संधि का उल्लंघन होता। नेहरू और
पटेल 55 करोड़ रुपए देने पर सहमत नहीं थे क्योंकि उनके लिए जनभावना
मायने रखती थी। बापू सही क्या है और गलत क्या है इसी आधार पर फ़ैसला करते थे। उनके
लिए मानवता सबसे ऊपर थी। वो वादाख़िलाफ़ी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। जनभावना के
दबाव में वो ग़लत फ़ैसले का समर्थन नहीं कर सकते थे। बापू ने वही करने को कहा
जिसका वादा भारत ने किया था। नेहरू और पटेल चुनावी राजनीति में आ चुके थे लेकिन
बापू आज़ादी के बाद भी अपने सिद्धांतों पर ही चल रहे थे। बापू को न जनभावना से डर
लगता था और न ही मौत से। महात्मा गांधी जब भूख हड़ताल पर थे तो बिड़ला भवन में
उनके ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन भी कर रहे थे। लोग नाराज़ थे कि वो सरकार को 55 करोड़ रुपए देने पर मजबूर कर रहे हैं और दिल्ली में
मुसलमानों के घर हिन्दू शरणार्थियों को नहीं दे रहे हैं। दिल्ली में सांप्रदायिक
तनाव के कारण मुसलमान अपना घर-बार छोड़ बाहर निकल गए थे। उन्हें
पुराना क़िला और हुमायूं के क़िले में रखा गया था। हिन्दू शरणार्थी मुसलमानों के
घरों पर कब्ज़ा चाहते थे जबकि गांधीजी इसके ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर बैठ गए थे।
गांधीजी की इस भूख हड़ताल के ख़िलाफ़ हिन्दू शरणार्थी ग़ुस्से में नारे लगा रहे थे- 'गांधी मरता है, तो मरने दो'। महात्मा गांधी के आजीवन सचिव रहे प्यारेलाल ने अपनी किताब ‘महात्मा गांधी द लास्ट
फ़ेज’ में लिखा है, "इस भूख हड़ताल से
दिल्ली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच दुश्मनी कम करने में बहुत मदद मिली।”
हत्या की साज़िश
बंबई में मरीन ड्राइव पर स्थित 'सी ग्रीन होटल (साउथ)' में ठहर रहे आप्टे और
गोडसे 15 जनवरी को सुबह 7.20 बजे फोर्ट इलाके
में टाटा एयरलाइंस के दफ़्तर पहुंचे। वहाँ उन्होंने दो दिन बाद, यानी 17 जनवरी की दोपहर की फ्लाइट
से दिल्ली जाने के लिए टिकट खरीदे थे। उन्होंने ये टिकट फ़र्ज़ी नामों से बुक कराए
थे—आप्टे ने अपना नाम 'डी.एन. कर्मारकर ' और नाथूराम ने 'एस. मराठे' बताया था।
सुबह 8.30 बजे, जब मदनलाल की नींद
मुश्किल से ही खुली थी, आप्टे और नाथूराम,
दादर स्थित हिन्दू महासभा के कार्यालय में गए और बड़गे, शंकर और मदनलाल से मिले।
उन्होंने इन तीनों से साथ चलने के लिए कहा लेकिन मदनलाल तैयार नहीं हुआ, तो उसे
छोड़ कर वे चारों निकल गए। सड़क पर उन्होंने एक टैक्सी ली। टैक्सी ड्राइवर को
उन्होंने शिवाजी प्रिंटिंग प्रेस चलने के लिए कहा। यह प्रिंटिंग प्रेस जी.एम. जोशी
की थी जो करकरे का पारिवारिक मित्र था और जो दादर में ही, मुश्किल से एक मील दूर
था। शिवाजी प्रिंटिंग प्रेस के ऑफिस के बाहर गेट पर करकरे से उनकी मुलाक़ात हुई।
करकरे वहीं पिछली रात ठहरा था। बड़गे और शंकर किष्टैया को बाहर छोड़कर आप्टे, गोडसे
और करकरे जोशी के केबिन में मिलते हैं। जोशी से फंड प्राप्त करने के लिए उनकी क़रीब
आधे घंटे तक मीटिंग होती है। पांचों हिन्दू महासभा के कार्यालय में वापस आ जाते
हैं।
यहाँ मदनलाल उनका इंतज़ार कर रहा
था, उसका बिस्तर अच्छी तरह
से लपेटा हुआ था। करकरे पाहवा को भी तैयार हो जाने के लिए कहता है। बडगे ने शंकर
से टैक्सी से बाहर निकलने और ऊपर उसका इंतज़ार करने को कहा, और मदनलाल ने अपना
बिस्तर टैक्सी की छत पर लगे सामान रखने वाले कैरियर पर रखा और अंदर बैठ गया। उन्होंने
ड्राइवर से उन्हें भूलेश्वर मंदिर ले जाने को कहा, जहाँ दीक्षितजी महाराज रहता था।
शंकर को वहीं छोड़कर टैक्सी के
द्वारा वे दीक्षित महाराज के घर के लिए निकल पड़े। रास्ते में आप्टे ने बड़गे को बताया
था कि उसके समूह ने चालीस हज़ार रुपयों का गोला, बारूद और विस्फोटक खरीदे हैं और
कुछ लोग उसे लेकर एक महत्त्वपूर्ण मिशन पर कश्मीर जा रहे हैं। वे सब एक टैक्सी से दीक्षित महाराज के घर पहुंचे। मदनलाल
बाहर में इंतज़ार करता रहा, बाकी अंदर पहुंचे। बड़गे ने नौकर को बैग लाने के लिए कहा।
वे सब दीक्षित महाराज
से मिलने उसके कमरे में पहुंचे। दीक्षितजी बिस्तर पर था, उसे खुजली (स्केबीज़) की
गंभीर बीमारी थी। वह पहले कभी आप्टे, नाथूराम, बडगे और मदनलाल से मिल
चुका था, लेकिन उसे यह नहीं पता
था कि करकरे कौन है। जब दूसरों ने करकरे के बारे में भरोसा दिलाया, तब दीक्षितजी ने अपने
नौकर को बुलाया और उसे वह बैग लाने का आदेश दिया जो बडगे पिछली रात वहाँ छोड़ गया
था। दीक्षितजी इस बात से बहुत नाराज़ था कि बडगे ने उसकी जानकारी के बिना उसके घर
का इस्तेमाल आपत्तिजनक सामान रखने के लिए किया था। नौकर बारूदों से भरा वह बैग
लाया जिसे खोलकर बड़गे ने आप्टे को सारा
सामान दिखाया और उनके चलाने के तौर-तरीक़ों को बताया।
बडगे दूसरों को ‘हैंड
ग्रेनेड इस्तेमाल करने का तरीका’ समझा रहा था। दीक्षितजी को यह देखकर हैरानी हुई
कि उसे यह भी नहीं पता था कि ग्रेनेड फेंकने के पल तक स्ट्राइकर हैंडल को दबाकर
रखना ज़रूरी होता है। ऐसा नहीं था कि दीक्षितजी ने खुद कभी हैंड ग्रेनेड फेंका था, लेकिन उसने फ़िल्मों
में ऐसा होते देखा था और उसे कम से कम इतना तो पता ही था कि स्ट्राइकर हैंडल
छोड़ने के बाद भी ग्रेनेड को हाथ में पकड़े रहने का मतलब है भयानक मौत को दावत
देना। उसने उन्हें समझाया कि ‘स्प्रिंग को कसकर दबाए रखना ज़रूरी है’। फिर उसने
उन्हें बताया — जैसा कि उसने किसी फ़िल्मी हीरो को करते देखा होगा — कि ‘पिन को
दाँतों से खींचकर निकालना होता है’। हैरानी की बात तो यह थी कि मदनलाल तक को —
जिसने, बम बनाए और फेंके थे —
मिलिट्री-टाइप हैंड ग्रेनेड को सही तरीके से इस्तेमाल करने की कोई जानकारी नहीं
थी। अपनी बेहतर जानकारी का प्रदर्शन करके आने वालों को उनकी औकात दिखाने के बाद, वह दर्द से कराहते हुए
अपने औषधीय स्नान के लिए चला गया; लेकिन उसका गुस्सा अभी भी शांत
नहीं हुआ था।
बेडरूम में पाँचों
मेहमानों को अकेला छोड़ दिया गया। यहाँ करकरे ने मदनलाल को एक तरफ़ बुलाया और
बताया कि उन्होंने गांधीजी की हत्या करने का फ़ैसला किया है। मदनलाल, जो हमेशा तुरंत फ़ैसले
लेने और फ़ौरन काम करने वाला इंसान था, ने इसे 'बहुत बढ़िया विचार' बताया और बडगे का बैग
अपने पास ले लिया। बाद में उसने उस बैग को अपने बिस्तर के बंडल में छिपा दिया, जिसे उसने एंट्री हॉल
में रखा था। मदनलाल वैसे भी दिल्ली जा रहा था ताकि वहाँ उसके रिश्तेदारों द्वारा
चुनी गई कई लड़कियों से मिल सके और उनमें से किसी एक को अपनी दुल्हन के तौर पर चुन
सके; वह निकलने के लिए
बेताब था। उसे शायद यह ख्याल नहीं आया कि गांधीजी की हत्या की साज़िश में सक्रिय
रूप से शामिल होने के साथ-साथ वह अपनी शादी की योजना को भी पूरा करने की उम्मीद
नहीं कर सकता था। करकरे, जो मदनलाल का मददगार
और मार्गदर्शक था, तुरंत इस बात पर सहमत
हो गया कि उसे बॉम्बे से मिलने वाली पहली ट्रेन से निकल जाना चाहिए। यह तय हुआ कि
वे दिल्ली में हिंदू महासभा भवन में एक कमरा लेंगे, जहाँ आप्टे और नाथूराम 18 जनवरी की
सुबह उनसे मिलने आएंगे। बैग को बंद कर बड़गे ने आप्टे को दे दिया, आप्टे ने उसे करकरे को
थमा दिया। आप्टे ने करकरे को कहा कि वह मदनलाल के साथ फ़्रंटियर मेल या पंजाब मेल
से दिल्ली के लिए निकल जाए।
आपटे और नाथूराम, जो पिछले तीन दिनों से
अपनी साज़िश की हर बारीकी पर बार-बार चर्चा कर रहे थे, उन्हें लगने लगा था कि
कामयाबी पक्की करने के लिए उन्हें एक-दो और रिवॉल्वर की ज़रूरत होगी। उन्हें पता
था कि दीक्षितजी ने हैदराबाद रियासत में अपने साथियों को कई रिवॉल्वर और दूसरे
हथियार दिए थे; असल में, उन्होंने खुद बडगे से
कम से कम तीन रिवॉल्वर खरीदे थे। आपटे, जो अब दीक्षितजी से रिवॉल्वर देने
के बारे में बात करना चाहता था, उसने नाथूराम, करकरे और मदनलाल को
कमरे से बाहर जाने का इशारा किया और वह और बडगे दीक्षितजी के लौटने का इंतज़ार
करने लगे।
दीक्षितजी महाराज ने अपने
आगंतुकों के साथ मैत्रीपूर्ण बातचीत की। वह यह मान रहा था कि हैदराबाद के मुसलमानों
के खिलाफ हथगोले का इस्तेमाल किया जाना था, जहां सांप्रदायिक अशांति पैदा हो रही
थी। आप्टे ने दीक्षितजी महाराज
को कश्मीर जाने के एक काल्पनिक अभियान के बारे में कहानी सुनाई और कहा कि उसे एक
रिवॉल्वर की ज़रूरत है 'क्योंकि दिल्ली से आगे
का सफ़र खतरनाक हो गया था'। दीक्षित महाराज ने
कहा कि उसके पास कोई रिवाल्वर नहीं है, एक पिस्टल है, लेकिन वह उसे नहीं दे सकता। हो
सकता है कि उसे बड़े भाई, दादा महाराज से यह खबर
मिली हो कि आप्टे की योजनाओं के लिए अब और पैसे नहीं दिए जाएंगे। आप्टे ने महाराज पर दबाव डाला कि वह उसके लिए
रिवाल्वर का इंतजाम कर दे। दीक्षित महाराज ने कहा कि वह एक रिवाल्वर की व्यवस्था
करने की कोशिश करेगा। वे दीक्षित महाराज के घर से निकले। इन पांचों व्यक्तियों का
उसके घर आना दीक्षित जी की स्मृति में बनी रही क्योंकि एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की
थी कि उसे (दीक्षित) 17 जनवरी को शारीरिक नुकसान होगा। वास्तव में, 17 जनवरी को, वह नीचे गिर गया और उसे
चोट पहुंची। उसे बाद में याद आया
कि दुर्घटना के दो दिन पहले ही बड़गे और उसके साथी उससे मिलने आए थे। इस प्रकार जब
उसने गांधी ह्त्या केस के मुकदमे में गवाही दी तो दीक्षित पूरी घटना को याद करने
और सभी विवरणों को पूरा करने में सक्षम था।
दीक्षित के घर से बाहर
आकर जब वे उस तरफ़ जा रहे थे जहाँ बाकी लोग भूलेश्वर मंदिर के आँगन में उनका
इंतज़ार कर रहे थे, आप्टे ने बड़गे से पूछा
कि क्या वह और शंकर उसके साथ दिल्ली चल सकता है। बड़गे ने पूछा क्यों? उसने बताया कि हिन्दू
महासभा के नेता ‘तात्याराव’ (वी.डी. सावरकर)
ने निश्चय किया है कि गांधीजी, नेहरू और सुहरावर्दी को ख़त्म कर
दिया जाना है और यह काम उसे और गोडसे को सौंपा गया है। अगर वह उसके साथ जाता है, तो वह सारा ख़र्च वहन
करेगा। बड़गे तैयार हो गया। गैंग में अब एक शूटर भी शामिल हो गया था।
आप्टे हिन्दू महासभा का स्वयं सेवक था और
गोडसे इसका एक प्रमुख नेता था। जब भी महासभा का वार्षिक सम्मेलन होता था, वह बड़गे को भी ले जाता था। बड़गे महासभा के लिए चंदा इकट्ठा करता था। वह उनके साथ बंबई
से दिल्ली आने के लिए इसलिए राज़ी हुआ क्योंकि उनके बहुत से अहसान उस पर थे। एक तो
वह आप्टे और गोडसे को बहुत दिनों से जानता था। दूसरे वे सभी एक ही संगठन, हिन्दू
महासभा से जुड़े हुए थे। तीसरे वे दोनों बड़गे के शस्त्र भंडार को चलाए रखने के लिए वित्तीय सहायता भी
प्रदान किया करते जिससे वह उनका ऋणी था। इसके अलावा जैसा कि उसे बताया गया था इस
मिशन को पूरा करने के लिए तात्याराव (सावरकर) का आदेश था, और उनका आदेश पूरा करना
उनका धर्म था।
बड़गे ने आप्टे से कहा कि मैं सीधे बंबई से
दिल्ली नहीं जा सकता, मुझे पूना में घर-गृहस्थी का कुछ ज़रूरी काम हैं, उन्हें करके
मैं दिल्ली आ जाऊंगा। पता चला कि घर-गृहस्थी के कामों का मतलब था - अपने पास बचे
हुए हैंड ग्रेनेड और विस्फोटक रखने के लिए कोई सुरक्षित जगह ढूँढ़ना। ऐसा लगता है
कि उसने इस बात पर भी नहीं सोचा कि यह कितना नामुमकिन था कि वे गाँधीजी पर पिस्तौल
से गोली चलाएँ और फिर पूना लौटकर अपने काम-धंधे में ऐसे लग जाएँ जैसे कुछ हुआ ही न
हो। बडगे को जो चीज़ इस साजिश में शामिल होने के लिए उकसा रही थी, वह थी साज़िश रचने वालों को दिए गए सामान के
बदले मिलने वाला मोटा पैसा। उसे पैसों की बहुत ज़रूरत थी क्योंकि उसके कुछ दूसरे
ग्राहकों ने उसे समय पर भुगतान नहीं किया था, और वह आप्टे और नाथूराम की जीवनशैली से बहुत प्रभावित
था। मुंबई में, नाथूराम ने उसे यूं ही 50 रुपये दिए और कहा
कि यह उसके यात्रा-खर्च के लिए है, और उसके सामान का बिल बाद में चुकाया जाएगा। बॉम्बे की
यात्रा पर बडगे ने 10 रुपये भी खर्च नहीं किए थे, इसलिए वह इस उदारता से हैरान और खुश था। उसके लिए काम
करना अच्छा था। आप्टे ने उसे भरोसा दिलाया था कि दिल्ली की यात्रा का सारा खर्च भी
इसी तरह उठाया जाएगा और, हो सकता है आप्टे ने मिशन पूरा होने के बाद उसे अच्छे
इनाम का वादा भी ज़रूर किया होगा। यह मौका इतना आकर्षक था कि इसे छोड़ा नहीं जा
सकता था। इतना कम काम करके बहुत सारा पैसा कमाया जा सकता था; साथ ही होटलों में भरपेट खाना, रम की चुस्कियाँ, दूर-दराज़ की जगहों की यात्रा और अफ़सरों की
मेज़ पर बैठने का मौका मिलने पर सैनिक को जो गर्व महसूस होता है, उसका नशा भी था।
दिल्ली जाने के पहले अपने कुछ काम निपटाने के लिए बड़गे एक
बार पूना जाना चाहता था। गोडसे ने भी कहा कि उसे भी पूना जाना पड़ेगा। गोपाल को
उसने एक रिवाल्वर का इंतजाम करने के लिए कहा था। किसी को पक्का पता नहीं था कि
गोपाल सच में अपनी रिवॉल्वर के साथ दिल्ली आ पाएगा या नहीं, इसलिए नाथूराम ने सोचा
कि वह भी एक दिन के लिए पूना चला जाए और कम से कम गोपाल की रिवॉल्वर का पक्का
इंतज़ाम कर ले। उसके बाद वे सब एक टैक्सी में सवार हुए और पायधोनी स्थित कॉटन
एक्सचेंज बिल्डिंग पहुंचे। गोडसे और आप्टे भवन के अंदर गए और बीस-पच्चीस मिनट के बाद
आए। आप्टे ने बड़गे से कहा कि वह उससे 17 जनवरी की सुबह
विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन के पास मिले। उसके बाद बड़गे दादर स्थित हिन्दू महासभा
के कार्यालय चला गया।
वे कुल सात लोग थे; तीन जोड़ियाँ—आपटे/नाथूराम, करकरे/मदनलाल और बडगे/शंकर—और
एक अकेला व्यक्ति, गोपाल, जो ज़ाहिर है कि अभी भी पूना में
अपनी छुट्टी को लेकर परेशान था।
गोपाल
विनायक गोडसे
गोपाल विनायक गोडसे नाथूराम का छोटा भाई था।
अपने बड़े भाई नाथूराम के विपरीत, गोपाल, हिंदू कारणों के लिए
उनके समर्थन में इतने भावुक नहीं था। गांधीजी की हत्या के समय उसकी उम्र 27 साल
थी। वह शादीशुदा था। उसकी दो बेटियां थीं। बचपन से वह अपने भाई को अपना नायक मानता
था और उसके पदचिह्नों पर चलने की कोशिश करता था। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद
वह भी उस सिलाई कंपनी में शामिल हो गया जिसमें नाथूराम काम करता था। हिंदू महासभा
के लिए कुछ समय तक काम करने के बाद, वह नागरिक
कर्मियों के सदस्य के रूप में सेना में शामिल हो गया, और उसे पूना के
पास एक सैन्य स्टेशन किरकी में मोटर ट्रांसपोर्ट स्पेयर्स सब-डिपो का स्टोर-कीपर
नियुक्त किया गया। विश्व युद्ध के समय 1941 में उसकी तैनाती ईरान
और इराक़ में भी हुई थी। अप्रैल 1944 में वह भारत वापस आ गया। वह फिर से अपनी
पुरानी नौकरी करने लगा और पूने के निकट और्डनैन्स डीपो खड़की में असिस्टैंट
स्टोरकीपर के रूप में कार्यरत था। वह भारत को विभाजित करने के प्रस्ताव के खिलाफ सावरकर
के भाषणों से बहुत प्रभावित हुआ और हिंसा के पंथ में परिवर्तित हो गया। उसके भाई, नाथूराम ने उसे
सलाह दी और कहा: 'तुम जिम्मेदारियों और प्रतिबद्धताओं वाले एक विवाहित
व्यक्ति हो। इस खतरनाक रास्ते को शुरू करने से पहले दो
बार सोच लो।'
गोपाल शुरू में तो झिझका, इस मामले पर विचार किया, लेकिन अंत में नाथूराम के
साथ अपना बहुत कुछ दाँव पर लगाने का फैसला किया।
युद्ध-काल के
कमीशन से इस्तीफा देते समय उसके पास जो .38 वेब्ले स्कॉट
रिवल्वर थी, उसे उसने जमा नहीं कराया। इस अवैध शस्त्र को वह अपने पास नहीं रखना
चाह रहा था, इसलिए अपने पैतृक गांव उकसान जाकर एक अमरूद के वृक्ष ने नीचे यह सोचकर
गाड़ दिया कि भविष्य में अगर इसकी ज़रूरत पड़ी, तो खोदकर निकाल लूंगा। अपने खड़की को
दो कमरों के मकान में वह रहता था। अपने बड़े भाई के कहने पर वह एक दिन उकसान गया और
वह रिवाल्वर निकाल लाया।
***
बड़गे को महासभा के दफ़्तर में छोड़ और विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पर 17 जनवरी को
मिलने की हिदायत देकर आप्टे और गोडसे वहां से टैक्सी से चले गए। जब बड़गे और शंकर
अपना सामान पैक कर रहे थे तो उन्हें मदनलाल दिखा। मदनलाल ने बड़गे से कहा कि उसकी
ट्रेन पंजाब मेल छूट गई थी। वह दिल्ली नहीं जा सका। करकरे स्टेशन पर उसकी
प्रतीक्षा कर रहा है। वह अपना कुछ काम करके उससे मिलेगा। अब वह और करकरे रात को
पेशावर एक्सप्रेस से जाएंगे। पाहवा अपने रिश्तेदारों से दिल्ली में मिलना चाहता था
और उनसे अपनी शादी के सवाल पर चर्चा करना चाहता था। मदनलाल दादर में डॉ. जैन के घर
यह देखने के लिए भागकर गया कि कहीं उसके लिए शेवंती की कोई चिट्ठी तो नहीं आई है।
वहाँ कोई चिट्ठी नहीं थी।
शेवंती
शेवंती अहमदनगर की रहने वाली एक सेक्स वर्कर की बेटी थी। उसे पाकिस्तान से आए
20 साल के शरणार्थी मदनलाल पाहवा से प्यार हो गया। मदनलाल का एक दोस्त उसे 25
दिसंबर, 1947 को एक "गाने वाली लड़की" से मिलवाने ले गया था। उसका नाम
शेवंती था, जो एक सेक्स वर्कर की 19 साल की
बेटी थी। शेवंती ने सेक्स के धंधे में शामिल होने के अपनी माँ के आग्रह को ठुकरा
दिया था, क्योंकि उसे यकीन था कि एक दिन
उसकी "पसंद का आदमी" उसे सम्मानजनक ज़िंदगी जीने के लिए अपने साथ ले
जाएगा। 25 दिसंबर को शेवंती घर पर नहीं थी। अपने दोस्त से उसकी खूबसूरती के बारे
में सुनकर, पाहवा दो दिन बाद खुद शेवंती से
मिलने गया। उन्होंने बातें कीं। उन्हें प्यार हो गया। उसने उसे तोहफ़े दिए। उसने
उसे शहर की हिंसक गतिविधियों में अपनी भागीदारी के बारे में बताया। शेवंती को
करकरे पसंद नहीं था। शेवंती ने एक बार पाहवा से कहा था: "क्या तुम्हें यह
एहसास नहीं है कि लोग तुम्हारी इस इसलिए इज्ज़त करते हैं क्योंकि वे तुमसे डरते हैं?" पाहवा उसकी ओर देखकर मुस्कुराया। पाहवा उसे रिझाता रहा।
वे साथ में फ़िल्में देखने जाते थे। 4 जनवरी को उसने शेवंती के लिए रेशम की ओढ़नी
खरीदी और उसे 'चाबुकस्वर' फ़िल्म दिखाने के लिए सिनेमा हॉल ले गया। 5 जनवरी को पाहवा
ने एक राजनीतिक बैठक में हंगामा किया, जिसके बाद पुलिस ने करकरे और पहवा को 24 घंटे के भीतर
अहमदनगर छोड़ने के लिए कहा। दोनों ने पुणे जाने की तैयारी शुरू कर दी। तभी करकरे
ने पाहवा को महात्मा गांधी की हत्या की एक गुप्त योजना के बारे में बताया। लेकिन
करकरे ने पाहवा से यह बात छिपाई कि गांधीजी की हत्या में उसे क्या भूमिका निभानी
थी। तब तक, हत्या करने वाला दल हथियार इकट्ठा
करने में जुटा हुआ था। किस्मत ने शेवंती को पहवा के साथ एक और दिन बिताने का मौका
दिया, क्योंकि 6 जनवरी को ट्रेन में
चढ़ने से पहले पहवा एक झगड़े में फंस गया और उसके सिर पर मामूली चोट लग गई। करकरे
पुणे चला गया और पहवा से दो दिन बाद उनके पास आने को कहा। पहवा ने अपना ज़्यादातर
समय शेवंती के साथ बिताया। 8 जनवरी को पुणे के लिए निकलने से पहले, पाहवा ने शेवंती को प्रोफ़ेसर जैन का मुंबई वाला पता
दिया, जहाँ वह उसे चिट्ठियाँ भेज सकती थी।
***
रात 9:30 बजे ट्रेन के छूटने से
पहले कुछ घंटे खाली थे, इसलिए पाहवा प्रोफ़ेसर जैन के घर गया।
उसने उन्हें गांधीजी की हत्या करने की उस टीम की योजना के बारे में बताया।
प्रोफ़ेसर ने पाहवा को दिल्ली न जाने के लिए मनाने की कोशिश की और उसे गांधीजी की
हत्या की साज़िश के पीछे हिंदू दक्षिणपंथियों के मकसद के बारे में समझाया। चूंकि पाहवा
की ज़िंदगी में आगे बढ़ने का दारोमदार करकरे पर था, इसलिए उसने प्रोफ़ेसर जैन से कहा कि वह रिश्तेदारों
से मिलने दिल्ली जा रहा है, लेकिन उसने यह बात छिपाई कि टीम
वहाँ हथियार भी ले जा रही थी।
जहां एक तरफ़ विक्टोरिया टर्मिनस
स्टेशन से रात को 9.30 बजे पेशावर एक्सप्रेस गैंग के
पहले दो सदस्यों मदनलाल और करकरे को लेकर दिल्ली की तरफ़ जा रही थी वहीं दूसरी तरफ़ बड़गे
और शंकर मद्रास मेल से पूना के लिए रवाना हुए। हालाँकि, पेशावर अब पाकिस्तान में था, इसलिए 'पेशावर एक्सप्रेस' ट्रेन वहाँ नहीं जाती थी। दूसरी तरफ मद्रास मेल
ट्रेन पुणे जाने वाले यात्रियों को नहीं ले जाती थी और बडगे को यह बात पता थी।
लेकिन बडगे जैसे आदमी के लिए यह कोई बड़ी मुश्किल नहीं थी, क्योंकि वह बिना टिकट सफ़र करने का माहिर खिलाड़ी था।
उसने दो प्लेटफ़ॉर्म टिकट खरीदे और जैसे ही ट्रेन चलने लगी, वह और शंकर उसके एक डिब्बे में कूद गए। उसे भरोसा था
कि दूसरी तरफ़ पहुँचने पर टिकट कलेक्टर को थोड़ी-बहुत बख्शीश देकर वह आसानी से
निकल जाएगा। नाथूराम पहले ही पूना के लिए निकल चुका था।
मनोरमा साल्वी
मनोरमा सालवी मुंबई (तब बॉम्बे) के
'विल्सन कॉलेज' की एक छात्रा थी और उसके पिता पुलिस अस्पताल में
डॉक्टर थे। वह एक मराठी ईसाई परिवार से ताल्लुक रखती थी और चर्च में पाइप ऑर्गन
बजाती थी। नारायण आप्टे पहले से शादीशुदा था, लेकिन उसके मनोरमा सालवी के साथ गहरे प्रेम संबंध थे।
कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में बताया गया है कि आप्टे से उसका एक बच्चा भी था। हालांकि
मनोरमा यह जानती थी कि आप्टे और नाथूराम गोडसे गहरे दोस्त हैं, लेकिन उसे इस बात का बिल्कुल
अंदाजा नहीं था कि आप्टे गांधीजी की हत्या की इतनी बड़ी साजिश में शामिल है।
आप्टे ट्राउज़र और स्पोर्ट्स शर्ट
पहनना पसंद था। सर्दियों में वह ट्वीड जैकेट पहनता था। वह धूम्रपान करता था। उसे व्हिस्की पसंद थी और वह
महिलाओं के शौकीन के तौर पर जाना जाता था। 1913 में जन्मा आप्टे भारत के उस
पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग से था जो उस समय उभर रहा था। 1932 में पुणे के मशहूर
फर्ग्यूसन कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद, उसे अहमदनगर के अमेरिकन मिशन हाई
स्कूल में गणित पढ़ाने के लिए रखा गया। कुछ साल बाद, महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर
शेगांव में तैनात डॉक्टर की बेटी मनोरमा साल्वी उनकी छात्रा बनी। तब तक आप्टे की
शादी हो चुकी थी और उनका एक बेटा भी था। जुलाई 1944 में एक दिन, आप्टे मनोरमा के हॉस्टल पहुँचा। वह उसे और उसकी दो
सहेलियों को फ़िल्म दिखाने ले गया और फिर चौपाटी समुद्र तट पर टहलाने ले गया। एक
हफ़्ते बाद, आप्टे फिर आया। उसने पूछा क्या
मनोरमा देर शाम के शो और उसके बाद डिनर के लिए बाहर जाएगी? यह न्योता सिर्फ़ उसी के लिए था। बहकाने का खेल शुरू
हो चुका था। मनोरमा ने मना कर दिया, लेकिन वह उसके साथ लंच करने के लिए तैयार हो गई। वह
शाम को ही हॉस्टल लौटी और उसे इस बात से राहत मिली कि उसने उसके साथ कोई छेड़छाड़
नहीं की। लेकिन वह आप्टे की ओर आकर्षित भी थी, क्योंकि वह "सपनों की दुनिया" में खो गई
थी। जैसा कि कहा जाता है, प्यार कुछ हद तक भावनाओं और कुछ हद
तक कल्पना का मिश्रण होता है। अब उनकी मुलाकातों का एक तरीका बन गया था। आप्टे
कभी-कभी उसके साथ समय बिताने के लिए ट्रेन से मुंबई जाता था। अगली मुलाकात तक वे
एक-दूसरे को चिट्ठियाँ लिखते थे, जिससे हॉस्टल वार्डन को शक होने लगा। आप्टे ने उसे 'निर्मला' के नकली नाम से चिट्ठियाँ लिखना शुरू कर दिया। 1944
की पतझड़ की छुट्टियों के दौरान, आप्टे के लगातार पत्र आते रहे। साल्वी परिवार को ज़रा
भी शक नहीं हुआ कि मनोरमा किसी पुरुष के साथ रोमांस कर रही है, क्योंकि पत्र लिखने वाली व्यक्ति
निर्मला थी। उसने आप्टे से उसकी वैवाहिक स्थिति के बारे में कभी नहीं पूछा, शायद यह सोचकर कि कोई शादी-शुदा
पुरुष किसी किशोरी में दिलचस्पी नहीं लेगा। उनके बीच एक महीने की दूरी ने उसके
लगाव को और गहरा कर दिया। नवंबर में मुंबई लौटने पर, अपने जज़्बात में बहकर और यह यकीन होने पर कि उसका
प्रेमी उसके प्रति पूरी तरह समर्पित है, मनोरमा ने आप्टे के साथ गुजरात निवास में एक रात
बिताई। प्यार का एक नया सिलसिला शुरू हुआ। आप्टे अक्सर मनोरमा के साथ रातें बिताने
मुंबई आता था, और ज़्यादातर वे 'आर्यन पथिक आश्रम' में रुकता था। वहाँ के गेस्ट रजिस्टर में आप्टे उसे
अपनी पत्नी बताता था। वह मनोरमा के लिए 'अग्रणी' अखबार की एक कॉपी भी लाता था। अखबार में गांधीजी के
खिलाफ़ अपमानजनक बातें लिखी जाती थीं और धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ़ नफ़रत फैलाई जाती थी।
मनोरमा 'अग्रणी' में छपी बातों से सहमत नहीं थी, जो एक ईसाई होने के नाते स्वाभाविक भी था। फिर भी, उसकी इस असहमति के बावजूद आप्टे उसे 'अग्रणी' लाकर देता रहता था। इससे पता चलता है कि आप्टे को
मनोरमा पर अपनी पकड़ का कितना भरोसा था: वह आप्टे के प्यार में इतनी डूबी हुई थी
कि वैचारिक मतभेदों की वजह से रिश्ता तोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी।
1946 में, शेगाँव जाते समय मनोरमा ने पुणे
में दो दिन का ठहराव किया। जिस होटल में आप्टे और मनोरमा ठहरे थे, संयोग से सावरकर भी वहीं मेहमान के
तौर पर रुके हुए थे। वह मनोरमा को सावरकर से मिलवाने ले गया—और उसका परिचय अपनी
पत्नी के तौर पर कराया। मनोरमा को इसमें उसके प्रति आप्टे की अटूट प्रतिबद्धता
दिखाई दी। मनोरमा हिंदुत्व विचारक से मिलकर बहुत खुश नहीं थी। उसका मानना था कि इन्हीं की वजह
से आप्टे सांप्रदायिक सोच वाला बन गया था। एक बार मनोरमा ने आप्टे को लिखे एक पत्र
में सावरकर की आलोचना की थी, जिस पर आप्टे ने उसे कड़ी फटकार लगाई थी। इसके बाद उसने आप्टे के सामने कभी
सावरकर का ज़िक्र नहीं किया। मनोरमा ईसाई धर्म की यह बात मानती थीं कि वह आप्टे को
सुधार सकती है। जबकि 1947 के आखिर तक आप्टे मुंबई
में मुसलमानों के इलाकों को जलाने की बातें करने लगा था।
***
आप्टे बंबई में रुका हुआ था। आख़िर
उसे मनोरमा के साथ भी कुछ महत्त्वपूर्ण समय गुज़ारने थे। अगले दो दिनों तक आप्टे सी
ग्रीन होटल (साउथ) के अपने कमरे (नंबर 6) में ही रहा। बाद में आप्टे सी
ग्रीन होटल (नॉर्थ) में भी रुका था। ये दोनों होटल एक ही बिल्डिंग में थे, लेकिन इनका मैनेजमेंट अलग-अलग था; एक से दूसरे होटल में जाने के लिए पहले सड़क पर आना
पड़ता था। इन दो दिनों के दौरान ज़्यादातर समय मनोरमा साल्वी उनके साथ थी और वह
बहुत दुखी थी। कारण यह था कि आप्टे ने मनोरमा को बताया कि वह एक महत्त्वपूर्ण मिशन
पर जा रहा है, और शायद फिर कभी न लौटे। मनोरमा का तो दिल ही बैठ गया था। वह अभी
बीस साल की ही थी, और अगर उसे आप्टे से प्यार न हुआ
होता, तो वह तीन महीने बाद ही बी.ए. की
परीक्षा में बैठती। अब न तो ग्रेजुएशन हो पाता और न ही शादी। उसे ज़िंदगी भर
बदनामी के बोझ और नाजायज़ बच्चे की वजह से समाज से बहिष्कृत होने का दर्द सहना
पड़ता। अपनी ज़िंदगी में वह दोबारा कभी प्यार नहीं पा सकी।
***
पेशावर एक्सप्रेस ट्रेन में मदनलाल और करकरे के सामने वाली सीट पर शांताराम ए. आमचेकर नाम का एक शख्स बैठा हुआ
था। वह कराची का रहने वाला था और वहां सरकारी नौकरी में था। विभाजन के बाद वह बंबई
आ गया। वह दिल्ली जा रहा था, ताकि अपने नौकरी को ट्रांसफर करा सके। वह पहली बार दिल्ली जा रहा था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर