महात्मा गांधी हत्या केस-1
सत्तारूढ़ कांग्रेसी नेताओं का
मतभेद
1947
दिसंबर में गांधीजी के सचिव प्यारेलाल
दिल्ली आ गए और गांधीजी के साथ फिर से जुड गए। गांधीजी बार-बार कहते ‘बिड़ला भवन के
इस आलीशान भवन में हर सुख सुविधा से संपन्न हूं, पर भीतर से शांति नहीं है।’ सत्तारूढ़
कांग्रेसी नेताओं का मतभेद बढ़ता जा रहा था। आपसी खींचतान चरम पर पहुंच चुकी थी। पंडित
नेहरू और सरदार पटेल को एक दूसरे के काम करने के ढंग से शिकायतें रहती थीं। विभिन्न
प्रश्नों के ऊपर दोनों के दृष्टिकोण में अंतर तो रहता था ही था, अब तो वह व्यवहार में
भी दिखने लगा था। पटेल की कार्यशैली अधिक व्यावहारिक थी। जबकि प्रशासनिक मामलों को
लेकर नेहरू अधिक आदर्शवादी और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण रखते थे। इसके विपरीत, पटेल जमीन से जुड़े, व्यावहारिक और सख्त प्रशासनिक
फैसलों पर जोर देते थे।
आज़ादी के बाद इनके मतभेदों का व्यवहारिक
पक्ष उनके व्यक्तिगत संबंधों पर भी हावी होने लगा था। नेहरू आरएसएस की विचारधारा
के कटु आलोचक थे। वह
संघ को एक सांप्रदायिक, विभाजनकारी और फासीवादी संगठन
मानते थे। उनका
मानना था कि इस तरह की विचारधारा भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचे के
लिए बड़ा खतरा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में पटेल की राय थी कि ‘हालांकि
वे गुमराह हैं, पर वे देश भक्त हैं। क़ानून को वे हाथ में लेकर सरकार को कमज़ोर कर रहे
हैं। जबकि परिस्थिति की यह मांग है कि उन्हें सरकार के हाथ मज़बूत करने चाहिए।’ पटेल
का मानना था कि आरएसएस राष्ट्र की रक्षा में एक सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
इसलिए, उन्होंने
संघ के सदस्यों को मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होने या यहां तक कि कांग्रेस
में विलय करने का विकल्प भी दिया था। सरदार चाहते थे कि कांग्रेस जन अपने प्रेम से
उन्हें सही मार्ग पर लाएं। नेहरू के साथ अन्य कई कांग्रेसी यह मानते थे कि आरएसएस धर्मान्ध
सम्प्रदाय वादी हैं, जिन्होंने मुसलमानों के बारे में ईंट का जवाब पत्थर से देने का
मन्त्र अपना लिया है। क़ानून भंग करने वाले दूसरे लोगों की तरह उन्हें भी कठोर उपायों
से दबा देना चाहिए।
मंत्रालय के कामकाज के नीति संबंधी
निर्णयों पर दोनों महान नेताओं में काफी मतभेद थे। पर दोनों एक-दूसरे को निकालने के
बजाए एक-दूसरे के पक्ष में ख़ुद मंत्रिमंडल
से बाहर निकल जाने को तैयार थे, ताकि सरकार का काम बिना संघर्ष के चल सके। साल
ख़त्म होते-होते मतभेद इतने गहरे हो गए थे कि दिसंबर 1947 में दोनों ने एक-दूसरे के साथ काम
करने में असमर्थता जताते हुए महात्मा गांधी को इस्तीफे तक सौंप दिए थे! नेहरू
अक्सर प्रधानमंत्री के रूप में अपनी स्थिति का हवाला देते हुए गृह और राज्यों के
मामलों के मंत्रालय (पटेल के अधीन) में दखलंदाजी करते थे। इस पर नाराज होकर 23 दिसंबर 1947 को पटेल ने अपना इस्तीफा पत्र
नेहरू को भेज दिया था।
दोनों ऐसे लोगों घिरे थे जो मतभेदों
को उभाड़ते थे। अधिकारी अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे रहते थे। संवाददाताओं को इन मतभेदों
को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने में मज़ा आता। इसे मंत्रिमंडल की फूट बताते। अपने मनगढ़ंत परिणाम
निकालते। दोनों में चाहे आपस में कितना ही विरोध क्यों न हों, और दोनों का कई नीतियों
पर गांधीजी के दृष्टिकोण से भी कितना ही अंतर क्यों न हो, दोनों का गांधीजी के बिना
काम भी नहीं चलता। और गांधीजी का कहना था कि देश को सरकार में दोनों की ही सेवाओं की
ज़रूरत है। गांधीजी को भय था कि इन नेताओं के बीच की इस दूरी का पाकिस्तान दुरुपयोग
न करने लगे। किसी ने सलाह दी कि गवर्नर जनरल माउंटबेटन से इस स्थिति को सुलझाने के
लिए कहा जाए। गांधीजी ने कहा, आपस के झगड़े में किसी तीसरे बाहरी व्यक्ति का इसमें क्या
काम? गांधीजी इसे अपने ढ़ंग सुलझाने का प्रयत्न करने लगे। इन विवादों को सुलझाने के
लिए जनवरी 1948 में
गांधीजी ने दोनों के बीच समझौता कराया था। इन मतभेदों के बावजूद दोनों एक-दूसरे का
गहरा सम्मान करते थे और राष्ट्र निर्माण में एक-दूसरे के पूरक थे। पटेल ने कई मौकों पर नेहरू को अपना
इस्तीफा वापस लेने के लिए भी मनाया था। ऐतिहासिक सच यह है कि वे एक-दूसरे के पूरक
थे। उनके बीच कई मुद्दों पर वैचारिक मतभेद जरूर थे, लेकिन वे राष्ट्र निर्माण के लिए
एक-दूसरे का पूरा सम्मान करते थे।
गांधीजी की चिंता
सर्दियों के आ जाने से निराश्रितों
का कष्ट भी काफी बढ़ गया था। रचनात्मक कार्य करने वाली संस्थानों में भी कार्य सुचारू
रूप से नहीं चल रहा था। गांधीजी कहा करते, ‘कांग्रेस निस्तेज हो गई है’। एक
वाक्य उनके मुंह में सदा रहा, ‘देखते नहीं, मैं अपनी चिता पर बैठा हूं?’ और
भी उद्विग्न होते तो कहते, ‘तुम्हें मालूम होना चाहिए कि एक मुर्दा तुमसे यह कह
रहा है।’ दुखी हो वे कहते ‘जिस अच्छी नाव ने हमें बन्दरगाह तक पहुंचाया, उसे
हम अब छोड़ रहे हैं। भारत ने अहिंसा से स्वाधीनता प्राप्त किया। लेकिन जब स्वाधीनता
आ गई है, तब हम अहिंसा को तिलांजलि देते दिखाई दे रहे हैं।” फिर भी उन्होंने आशा कभी नहीं छोड़ी।
कहते थे, “यदि भारतीय
संघ अपने आदर्शों के प्रति सच्चा रहा, तो देश के राजनीतिक विभाजन के बावज़ूद भारत के
दोनों भागों की जीवंत एकता सिद्ध की जा सकती है।”
विभाजन के बाद की परिस्थिति
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और थी। भारत
में विभाजन के बाद चार करोड़ मुसलमान रह गए थे। ऊपर से सब कुछ भले शांत दिखता हो, भीतर
में संदेह बना हुआ था। सरदार पटेल ने साफ शब्दों में कह दिया था, “इस नाज़ुक अवसर पर आपका यह कर्तव्य है
कि आप हमारे साथ एक ही नाव में बैठकर साथ ही डूबें या साथ ही तैरें। आप दो घोड़ों की
सवारी नहीं कर सकते। जो भी घोड़ा आपको उत्तम लगे चुन लीजिए।” मुसलिम लीग के दल के नेता ख़लीकुज़्ज़मा
ने पाकिस्तान के अपने साथियों से कह दिया, “आप अपना काम करें, और भारतीय मुसलमानों
को उनके अपने हाल पर छोड़ दें।” दिसंबर में कराची में मुसलिम लीग का
अधिवेशन हुआ। लीग ने दो संगठन रखने का निर्णय किया, एक पाकिस्तान के लिए जिसमें गै़र
मुसलमान सदस्य नहीं होंगे। दूसरा भारत के लिए। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में मुसलिम लीग
का एक सम्मेलन मद्रास में और दूसरा राष्ट्रीय मुसलमानों का लखनऊ में हुआ। कुछ मुसलिम
सदस्यों ने गांधीजी से पूछा हम इस सम्मेलन में जाएं या न जाएं। गांधीजी ने उन्हें सलाह
दी कि आपको बुलाया गया है तो आप जाएं, लेकिन निडर होकर स्पष्ट शब्दों में अपने विचार
प्रकट करें। एक मित्र और मार्गदर्शक की तरह गांधीजी भारतीय मुसलमानों में उनका खोया
हुआ व्यक्तित्व फिर से पैदा करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते। जब कुछ लीगी नेता
गांधीजी से बोले कि भारतीय मुसलमान कांग्रेस में शरीक होने को उत्सुक हैं, तो गांधीजी
ने कहा, “मुसलमानों
को कांग्रेस में शरीक होने का अधिकार है।”
बंटवारे के बाद भी गांधीजी ने दोनों
देशों के बीच हुए बंटवारे को रोकने की कोशिश की। उनका कहना था कि वह बिना वीजा और पासपोर्ट
के पाकिस्तान जाएंगे, जिससे वह भारत पाक विभाजन की वैधानिकता
और राजनीतिक सीमा को तोड़ सकें। उनकी सोच थी कि दोनों देश अपनी-अपनी जगह रहें, लेकिन
दोनों देशों के लोग बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे के यहां आ-जा सकें। इस सिलसिले में
उन्होंने अपने दो विश्वसनीय सहयोगियों को जिन्ना से मिलने पाकिस्तान भेजा, लेकिन
इससे पहले कि वे दोनों लोग जिन्ना का संदेश लेकर लौट पाते, गांधीजी
की हत्या हो जाती है और गांधी की इच्छा अधूरी रह जाती है।
कांग्रेस के अध्यक्ष पद में बदलाव
जब से कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष
हुए थे, तभी से सरकार के अपने कांग्रेसी साथियों से उनकी बनी नहीं। जवाहरलाल नेहरू
और कार्यसमिति के साथ उनकी गंभीर सैद्धांतिक और प्रशासनिक मतभेद हो गए थे। उनके
अनुसार, स्वतंत्रता
के बाद सरकार की नीतियों और पार्टी संगठन के बीच समन्वय होना चाहिए, जबकि नेहरू का मानना था कि पार्टी
सरकार के दिन-प्रतिदिन के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कृपलानी का मत था कि
कांग्रेस पार्टी सर्वोच्च है और सरकार को पार्टी के सिद्धांतों के अनुसार चलना
चाहिए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विरोध किया। कृपलानी को लगने लगा था
कि कांग्रेस अध्यक्ष बने रहने से कांग्रेस की कार्यकारिणी और केन्द्रीय सरकार में मेल
का अभाव रहेगा। इसलिए नवंबर 1947 में अध्यक्ष पद से उन्होंने त्यागपत्र
दे दिया।
कांग्रेस महासमिति ने उनका त्यागपत्र
स्वीकार कर लिया। गांधीजी ने उनके निर्णय का स्वागत किया। अब अगला अध्यक्ष कौन हो?
यह प्रश्न सामने था। सभी प्रमुख नेता सरकार में थे। किसी ने गांधीजी के नाम का सुझाव
दिया। गांधीजी ने मना कर दिया। गांधीजी ने कहा, “मेरे तीव्र उपाय किसी को पसंद नहीं
आएंगे।” गांधीजी
ने नरेन्द्र देव का नाम सुझाया। परन्तु यह कांग्रेसी नेताओं को स्वीकार्य नहीं था।
अंत में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का सुझाव आया, जो सबको मान्य था। राजेन्द्र प्रसाद ने
केन्द्रीय मंत्री मंडल के अन्न और कृषि विभाग से त्यागपत्र दिया और कांग्रेस के अध्यक्ष
पद को सुशोभित किया।
कांग्रेस अधिवेशन
नवंबर, 1947 में चार
महीने के अंतराल के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का अधिवेशन दिल्ली में हुआ। 8 नवंबर
को आखिरी बार गांधीजी ने कांग्रेस मंच से अपना भाषण दिया। अत्यंत दुख और विषाद के साथ
उन्होंने कहा, “शायद कुछेक
को छोड़ कर सभी कांग्रेसी साम्प्रदायिकता के उन्माद और संकीर्णता के शिकार बन गए हैं।
अगर यह पागलपन दिलों से दूर नहीं हुआ तो हिंदू-मुसलमान को छोड़कर सौ दूसरी तरह के अलग
मुखौटों वाले साम्प्रदायिक प्रश्न खड़े हो जाएंगे और देश उसे संभाल नहीं पाएगा। ऐसे
विषाक्त वातावरण में विकास रौंदा जाता है। आज़ादी की लड़ाई में जितने संयम, त्याग की
आवश्यकता थी उससे सौ गुना ज़्यादा संयम, अनुशासन, त्याग, बलिदान और परिश्रम की आवश्यकता
आज़ादी के बाद थी। ऐसे संयम और मेहनत से ही राष्ट्र बनता है और तब उसका प्रत्येक नागरिक
अपना कर्त्तव्य पहचानकर प्रगति कर पाता है। ...
“इक्यावन प्रतिशत बहुमत की व्यवस्था
मुझे उचित नहीं लगती। ऐसे में उनचास प्रतिशत का या तो दमन होता है या उसके प्रति लापरवाही
बरती जाती है, जो अन्याय है। उस हालत में प्रजातंत्र पनप नहीं पाता। देश के आख़िरी तबके
के व्यक्ति को भी मौक़ा मिले और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो तभी सच्चा प्रजातंत्र
आएगा।”
गांधीजी और भारत के सेनापति
भारतीय सेना के प्रथम सेनापति (कमांडर-इन-चीफ) थे फील्ड
मार्शल के.एम.
करियप्पा। वे इंग्लैंड में एक भाषण दे रहे थे। इसमें उन्होंने कहा, “भारत की वर्तमान परिस्थितियों में अहिंसा
का कोई उपयोग नहीं है। बलशाली सेना ही भारत को संसार का एक महानतम राष्ट्र बना सकती
है।” गांधीजी ने 'हरिजन' में उनसे असहमति जताते हुए कहा: "जनरल
करियप्पा से भी बड़े जनरल इतने समझदार और विनम्र रहे हैं कि उन्होंने खुलकर यह
माना है कि उन्हें 'अहिंसा' की महान शक्ति की संभावनाओं के
बारे में बात करने का कोई अधिकार नहीं है। मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता
हूँ कि एटम बम के इस दौर में, शुद्ध अहिंसा ही वह एकमात्र शक्ति
है जो हिंसा की तमाम चालों को नाकाम कर सकती है। हम देख रहे हैं कि सैन्य विज्ञान
और उसके तौर-तरीके अपने ही गढ़ में बुरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। क्या कोई ऐसा
दिवालिया व्यक्ति, जो
शेयर बाज़ार के जुए में बर्बाद हो चुका हो, उसी जुए की तारीफ़ करेगा?"
जनरल ने कहा, सेना की भाषा में यह "एक
रॉकेट" (कड़ी फटकार) थी!
भारत लौटने पर पूर्वी सेना का कमान
अपने हाथ में लेने से पहले दिसम्बर के पहले सप्ताह में वह दिल्ली के हरिजन (भंगी) कॉलोनी में गांधीजी की
कुटिया में गांधीजी से मिलने आए। यह उनकी पहली मुलाक़ात थी। करियप्पा अपनी गहरी
अनुशासन-प्रियता के लिए जाने जाते थे और महात्मा गांधी से मिलने से पहले उन्होंने अपने
जूते बाहर ही उतार दिए थे। वह दिन गांधीजी के मौन का दिन था। गांधीजी
चरखा चला रहे थे। उन्होंने करियप्पा को बैठने के लिए कुर्सी दी, लेकिन उन्होंने मना
कर दिया और ज़मीन पर आदर भाव से बैठ गए। बोले, “मैं आपके आशीर्वाद लेने आया हूं।” गांधीजी ने परची पर लिख कर दिया, “आपने लंदन में अहिंसा पर जो वक्तव्य
दिया था, उस पर मैंने अपने पत्र में लिखा था, आपको कुछ पता है।” सेनापति
बोले, “हां, मैंने
उसे देखा था। मुझे गौरव हुआ कि मेरे जैसे व्यक्ति के विचारों की महात्माजी ने इतनी
विस्तृत आलोचना करने का कष्ट उठाया। ... हम सैनिकों का समुदाय बड़ा बदनाम है। आप भी
मानते हैं कि हम बड़े हिंसक लोग हैं। लेकिन हम ऐसे नहीं हैं। दुनिया में कोई समुदाय
यदि युद्ध को नापसंद करता है, तो वह सैनिक समुदाय है। युद्ध ने किसी भी अंतर्राष्ट्रीय
झगड़े के निपटारे में कोई सफल भूमिका नहीं निभाई है। हमारे ख़याल से युद्ध का परिणाम
दूसरा युद्ध होता है। ... किसी भी लोकतांत्रिक देश में युद्ध सैनिकों की तरफ़ से शुरू
नहीं होता। सरकारें युद्ध की घोषणा करती हैं। हम तो जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के
आदेश का पालन करते हैं। यदि जनता को युद्ध पसंद नहीं है, तो वह सरकार को दोष दे सकती
है, उन्हें बदल सकती है। ऐसी सरकार ला सकती है जो युद्ध का आश्रय न ले।” गांधीजी ने पुरजा पर लिखा, “जब हम दुबारा मिलेंगे, तो इस विषय पर
और चर्चा करेंगे।”
दो दिनों के बाद सेनापति फिर गांधीजी
से मिले। गांधीजी उनकी तरफ मुड़े और मुसकुराते हुए बोले: "मैंने देखा कि
आपने फिर से अपने जूते बाहर उतार दिए हैं। दो दिन पहले भी जब आप आए थे, तब भी आपने ऐसा ही किया था।" जनरल
ने गहरी श्रद्धा के साथ जवाब दिया: "यह बिल्कुल सही है कि जब मैं आप जैसे
धार्मिक व्यक्ति से मिलने आ रहा हूँ, तो मैं ऐसा ही करूँ।"
अहिंसा पर अपनी बातचीत को आगे
बढ़ाते हुए जनरल ने कहा, “मैं यह कहने आया हूं कि हम सैनिक लोग,
आप जिस विचारधारा का पालन करते हैं, उसके एक अंग का पालन करते हैं। जैसे मानव जाति
से प्रेम, अनुशासन, वफ़ादारी, देश कि निःस्वार्थ सेवा, श्रम गौरव और अहिंसा। मैं अपने
ढंग से सैनिकों को याद दिलाऊंगा कि अहिंसा कितनी ज़रूरी है। लेकिन यदि सैनिकों से केवल
अहिंसा की बात करता रहूंगा, तो देश के प्रति हमारे कर्तव्यों का सही निर्वाह नहीं हो
पाएगा। जब मेरा मुख्य कार्य सैनिकों को देश की रक्षा के लिए तैयार करना है, तो मैं अपने सैनिकों को अहिंसा की
भावना के बारे में कैसे समझाऊं? आप ही
बताइए कि अपने कर्तव्यों को खतरे में डाले बिना मैं सैनिकों में अहिंसा की प्रवृत्ति
कैसे पैदा कर सकता हूं?” जवाब में, अहिंसा के पुजारी गांधीजी ने मुसकुराते
हुए कहा था कि वह इस बारे में सोच रहे हैं और इसका उचित और ठोस जवाब उन्हें बाद
में देंगे।
सेनापति करियप्पा अंतिम बार गांधीजी
से 18 जनवरी, 1948 को मिले।
वे वेस्टर्न कमांड का कार्यभार संभालने के लिए दिल्ली आए थे, जिसे उस समय D.E.P.
(दिल्ली और पूर्वी पंजाब कमांड) के
नाम से जाना जाता था और जिस पर जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन चलाने की जिम्मेदारी थी।
उन्होंने कहा, “मैं कुछ ही दिनों में काश्मीर जा रहा
हूं।” गांधीजी
ने कहा, “आशा है,
आप काश्मीर की समस्या अहिंसक ढंग से हल करने में सफल होंगे। काश्मीर से लौटने के बाद
मुझसे मिलिए।” यह
एक बहुत दिलचस्प बात थी कि भारत की आज़ादी की अहिंसक लड़ाई के 'जनरल' (गांधीजी), भारतीय सेना के 'जनरल' (करियप्पा) को अहिंसक तरीकों के बारे में
सिखाते और दोनों मिलकर युद्ध का कोई असरदार विकल्प खोजने और आज़माने के लिए साथ
काम करते—क्योंकि वे मानते थे कि युद्ध से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलता।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर
था। जनरल 30 जनवरी, 1948
की दोपहर को कश्मीर से लौटे, ताकि
अगले दिन राजघाट पर उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन कर सकें।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या
केस
संदर्भ : यहाँ पर