सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-10
10.17 मनुष्य के विभाग
सूफ़ियों ने
मनुष्य के चार आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विभाग स्वीकार किए हैं :
1. नफ़्स (इंद्रिय),
2. रूह (आत्मा),
3. क़ल्ब (हृदय),
4. अक़्ल (बुद्धि या माया),
सूफ़ी दर्शन या सूफ़ी मनोविज्ञान में इन चारों तत्वों को
मानव अस्तित्व का मुख्य आधार माना गया है। सूफ़ी साधना के अनुसार, इन चारों
विभागों की अपनी विशिष्ट भूमिकाएँ और विशेषताएँ होती हैं। नफ़्स यानी विषयभोग
वृत्ति या इंद्रिय या जड़ तत्व। मनुष्य के शरीर में समाहित यह तत्व उसका जड़ अंश
बनाते हैं। यह सांसारिक इच्छाओं, वासनाओं और भौतिक सुखों की ओर
आकर्षित होता है। यह मनुष्य का निम्नतर स्वरूप या अहंकार है। अतः साधक का
प्रथम लक्ष्य नफ़्स के साथ युद्ध होना चाहिए। रूह यानी आत्मा
और क़ल्ब यानी हृदय
द्वारा ही साधक अपनी साधना करता है। अक़ल यानी बुद्धि या माया मनुष्य का
चौथा विभाग है। रूह
मनुष्य का उच्चतर और शुद्धतम आध्यात्मिक अंश है। रूह को ईश्वर की वह दिव्य चिंगारी
माना जाता है जो हर जीव के भीतर फूंकी गई है। यह हमेशा पवित्र रहती है और इसका
एकमात्र लक्ष्य ईश्वर (परम सत्ता) से पुनर्मिलन और परमात्मा में लीन होना होता है।
क़ल्ब
(आध्यात्मिक हृदय) भौतिक दिल नहीं, बल्कि मनुष्य का आध्यात्मिक केंद्र
है। क़ल्ब को एक 'दर्पण' की तरह माना
जाता है, जो नफ़्स (बुराइयों) और रूह
(अच्छाइयों) के बीच का मध्यस्थ है। यदि क़ल्ब सांसारिक विकारों से मुक्त
होकर निर्मल हो जाए, तो इसमें ईश्वर के नूर (दिव्य
प्रकाश) का प्रतिबिंब दिखाई देने लगता है। अक़्ल (बुद्धि या विवेक) यह मनुष्य की सोचने-समझने
और तर्क करने की क्षमता है। सूफ़ी मत में अक़्ल को नफ़्स से ऊँचा स्थान दिया गया है
क्योंकि यह सही और गलत में अंतर करने में मदद करती है। हालाँकि, सूफ़ियों का
मानना है कि केवल सांसारिक ज्ञान या अक़्ल के बल पर ईश्वर को नहीं पाया जा
सकता; ईश्वर की प्राप्ति तो केवल 'क़ल्ब' (हृदय) की
गहराइयों और प्रेम मार्ग से ही संभव है।
सूफ़ियों के अनुसार जीव भौतिक भी है और अभौतिक भी। सही
अर्थों में कहें तो वह दोनों में ही नहीं है। वह तो हृदय और आत्मा के बीच होता है।
यह स्थिति उच्चतम ज्ञान माध्यम है। सूफ़ी साधकों
के अनुसार आत्मा में दो गुण प्रधान होते हैं- नफ़्स तथा रुह। नफ़्स
सभी अवगुणों, गर्व, अज्ञानता, काम, क्रोध तथा मद
का स्रोत है। ईश्वर का निवास स्थान रूह है। इन दोनों में सदैव संघर्ष होता
रहता है। रूह अथवा नफ़्स की शक्ति के कारण मनुष्य अच्छे तथा बुरे
कर्मों की ओर अग्रसर होता है।
सूफ़ी साधना
नफ़्स और अक़ल को दबाकर क़ल्ब की साधना से रूह की प्राप्ति
पर बल देती है। नफ़्स या जड़ आत्मा कार्य में बाधा पहुंचाती है और उसे पाप की ओर ले जाने की चेष्टा
करती है। किन्तु रूह या अजड़ आत्मा की ईश्वरीय शक्ति उसके कल्ब या
हृदय के स्वच्छ दर्पण में परमेश्वर को प्रतिबिम्बित कर देती है और उसका अपने
प्रियतम के साथ मिलन हो जाता है।
हृदय-रूपी दर्पण में परम सत्ता का प्रतिबिंब आभासित होता है। यह दर्पण जितना ही निर्मल होगा, रूप उतना ही
स्पष्ट होगा, अर्थात् सूफ़ी साधना
भी हृदय की साधना है। इसी से वह भक्ति है। दूसरे शब्दों में
कहें तो सूफ़ी मत के अनुसार, साधक को अपने नफ़्स और अक़्ल को वश में करके, अपने क़ल्ब को शुद्ध करना होता है। जब क़ल्ब पूरी तरह
साफ हो जाता है, तब रूह जागृत होती है और साधक 'अनलहक' (मैं ही सत्य हूँ /
ब्रह्म हूँ) या ईश्वर के साथ एकाकार की स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
नफ़्स कई प्रकार के होते हैं.
1. नफ़्स ए अम्मारा - यह इंसान
को बुराई की प्रेरणा देता है।
2. नफ़्स ए लव्वामा - यह इंसान
को बुराई करने पर कचोटता है।
3. नफ़्स ए मुतमइन्ना - साधना के
बाद जब इंसान का नफ़्स मुतमइन हो जाता है। तब वह अपने रब के हरेक हुक्म पर मुतमइन
हो जाता है। अपने नफ़्स को इस कैफ़ियत में लाने के लिए ही सूफ़ी लोग साधना करते हैं।
रूहानी तरक्क़ी को वे अपने नफ़्स की कैफ़ियत से ही परखते हैं।
सूफ़ी
मत के अनुसार, नफ़्स-ए-अम्मारा मनुष्य के
अहंकार का सबसे निचला और अनियंत्रित स्तर है, जो उसे बुराई
और वासनाओं की ओर धकेलता है। नफ़्स ए अम्मारा इंसान की साधना में बाधा
पहुंचाता है। इसे 'आदेश देने वाला नफ़्स' भी कहा जाता
है, क्योंकि यह इंसान की बुद्धि पर हावी होकर
उसे सांसारिक इच्छाओं का गुलाम बना लेता है। सूफ़ी मनोविज्ञान में इसे मानव विकास
और आध्यात्मिक साधना की पहली और सबसे कठिन बाधा माना गया है। इस स्तर पर व्यक्ति
को सही और गलत का होश नहीं रहता। वह केवल अपनी शारीरिक और सांसारिक इच्छाओं की
पूर्ति चाहता है। यह मनुष्य के आध्यात्मिक हृदय (क़ल्ब) पर एक काला
पर्दा डाल देता है, जिससे इंसान को ईश्वर की उपस्थिति या दिव्य
सत्य का अहसास नहीं हो पाता। सूफ़ी संतों के अनुसार, जब तक साधक
अपने नफ़्स-ए-अम्मारा को नियंत्रित नहीं करता, तब तक वह
रूहानी रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सकता। सूफी साधना उसके कल्ब (हृदय) के
स्वच्छ दर्पण में परमेश्वर को प्रतिबिम्बित कर देती है। इस रूहानी तरक्क़ी से साधक
का अपने प्रियतम के साथ मिलन हो जाता है।
सूफ़ी
मत के अनुसार, नफ़्स-ए-लव्वामा मनुष्य के
अहंकार या अंतरात्मा का वह दूसरा स्तर है, जो व्यक्ति
को अपनी गलतियों पर टोकता है और पछतावे की भावना पैदा करता है। नफ़्स-ए-लव्वामा विवेक
जागृत होने की अवस्था है, जहाँ इंसान गलती करने पर पछतावा (तौबा)
करता है। वह बुराई से पूरी तरह मुक्त तो नहीं हो पाता, लेकिन जब भी
उससे कोई गलती या गुनाह होता है, तो उसकी अंतरात्मा उसे कचोटती है। गलती
होने के बाद व्यक्ति के मन में गहरा दुख और आत्मग्लानि होती है। वह ईश्वर से क्षमा
(तौबा) मांगता है और खुद को सुधारने का प्रयास करता है। इसे 'भर्त्सना
करने वाला नफ़्स' या 'विवेकशील
अंतरात्मा' कहा जाता है। जब कोई साधक सबसे निचले स्तर
(नफ़्स-ए-अम्मारा) की पाशविक और सांसारिक इच्छाओं पर
नियंत्रण पाना शुरू करता है, तब वह इस दूसरे चरण में प्रवेश करता
है। इस अवस्था में मनुष्य की रूहानी (आध्यात्मिक) ताकतें उसकी सांसारिक
इच्छाओं से लगातार लड़ती हैं। व्यक्ति कभी वासनाओं के आगे घुटने टेक देता है, तो कभी अपनी
इच्छाओं पर विजय पा लेता है। सूफ़ी संतों के अनुसार, नफ़्स-ए-लव्वामा का जागृत
होना आध्यात्मिक प्रगति का एक बहुत ही सकारात्मक संकेत है। इसका मतलब है कि साधक
का आध्यात्मिक हृदय (क़ल्ब) अब पूरी तरह मृत नहीं है; उसमें ईश्वर
का नूर और विवेक धीरे-धीरे लौट रहा है। साधना के इस पड़ाव पर सूफ़ी गुरु (मुर्शिद)
साधक को निरंतर ज़िक्र (ईश्वर का स्मरण), मुराक़बा (ध्यान) और इस्तिग़फ़ार (क्षमा
प्रार्थना) करने की सलाह देते हैं, ताकि वह इस भीतरी संघर्ष को जीतकर
अगले और सर्वोच्च स्तर नफ़्स-ए-मुतमइन्ना की ओर बढ़ सके, जहाँ मन पूरी
तरह शांत और ईश्वर में लीन हो जाता है।
सूफ़ी
मत के अनुसार, नफ़्स-ए-मुतमइन्ना मनुष्य के
अहंकार या आत्मा की वह सर्वोच्च और पूर्ण विकसित अवस्था है, जहाँ साधक को
परम शांति, संतोष और स्थिरता प्राप्त होती है। इसे 'शांत आत्मा' या 'संतुष्ट स्व' कहा जाता है।
यहाँ अहंकार पूरी तरह शांत हो जाता है और आत्मा को परम संतोष और ईश्वर की रज़ा
(इच्छा) प्राप्त हो जाती है। पवित्र क़ुरान (सूरा अल-फ़ज्र) में इस अवस्था का
विशेष उल्लेख है। जब साधक निचले स्तरों (नफ़्स-ए-अम्मारा की वासनाओं और नफ़्स-ए-लव्वामा
के भीतरी संघर्षों) को पूरी तरह पार कर लेता है, तब वह इस
दिव्य मुक़ाम पर पहुँचता है। इस अवस्था में मनुष्य के भीतर का सारा द्वंद्व, अशांति, डर और चिंता
हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। संसार का कोई भी सुख या दुख उसे विचलित नहीं कर
पाता। साधक पूरी तरह से ईश्वर की इच्छा (रज़ा) को स्वीकार कर लेता है।
ईश्वर उसके प्रति जो भी निर्णय लेता है, वह उसमें परम
संतुष्ट रहता है। उसे न तो भविष्य का कोई भय होता है और न ही अतीत का कोई पछतावा। यहाँ
आकर मनुष्य का 'मैं' (Ego) पूरी तरह मिट
जाता है। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता; वह केवल
ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव करता है। साधक का आध्यात्मिक हृदय (क़ल्ब) सांसारिक
बंधनों से मुक्त होकर पूरी तरह निर्मल हो जाता है, और उसकी रूह (आत्मा) सीधे
परमात्मा के नूर (प्रकाश) से जुड़ जाती है। सूफ़ी विचारधारा में नफ़्स-ए-मुतमइन्ना
को प्राप्त करना ही मानव जीवन और साधना की पूर्णता है। इस मुक़ाम पर पहुँचने के
बाद, आत्मा को ईश्वर की ओर से यह पुकार सुनाई
देती है: "हे संतोष पाई हुई आत्मा! अपने रब (ईश्वर)
की ओर लौट आ, इस हाल में कि तू उससे राज़ी (संतुष्ट) है
और वह तुझसे राज़ी है।" इस अवस्था को प्राप्त करने वाला साधक 'आरिफ़' (परम ज्ञानी) या 'वली' (ईश्वर का
मित्र / सूफी संत) बन जाता है।
हज़रत ज़ुन्नून मिस्री रह. ने कहा है, “सूफ़ी वो है कि वह जब बोले तो उसकी ज़बान से हक़
(सत्य, अल्लाह का ज़िक्र) ज़ारी हो और जब चुप रहे तो उसके शरीर का एक एक रोंगटा यह
शहादत दे कि उसके अंदर दुनिया की कोई हवस (लालच या सांसारिक इच्छा) मौजूद नहीं है।” इसका अर्थ है कि एक सच्चे सूफ़ी की ज़बान कभी भी निरर्थक बातों, झूठ,
निंदा या
सांसारिक चापलूसी में नहीं लगती। वह जब भी अपनी चुप्पी तोड़ता है, तो उसके मुख से केवल ईश्वरीय ज्ञान, सत्य और लोक-कल्याण की बातें ही निकलती हैं। सूफ़ी मत में केवल ज़बान से चुप हो जाना साधना
नहीं है। असली ख़ामोशी वह है जब मनुष्य का अहंकार और उसकी सांसारिक इच्छाएँ (नफ़्स)
पूरी तरह शांत हो जाएँ। जब एक सूफ़ी मौन होता है, तो उसका पूरा वजूद
(भौतिक शरीर और आत्मा) पवित्रता का ऐसा दर्पण बन जाता है जिससे यह साफ़ झलकता है
कि उसे दुनिया की किसी भी चीज़ (धन, पद, वासना)
की कोई चाह नहीं बची है। हज़रत ज़ुन्नून मिस्री (796–859 ईस्वी) को सूफ़ी मत में 'मआरिफ़त' (ईश्वरीय रहस्यवाद/ज्ञान) का पहला व्यवस्थित
वर्णन करने वाला आचार्य माना जाता है। उनके इस कथन को सूफ़ी साधना (तरीक़त) में
कथनी और करनी की एकता का सबसे बड़ा पैमाना माना गया है।
सूफ़ी इतिहास और तज़किरा
(संतों के जीवन चरित्र) के ग्रंथों में यह एक बेहद प्रसिद्ध रूहानी वाक़या (घटना)
दर्ज है। इसका प्रामाणिक उल्लेख प्रसिद्ध सूफ़ी लेखक शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार
की विख्यात पुस्तक 'तज़किरातुल औलिया' में
मिलता है।
एक बार हज़रत ख़्वाजा हसन
बसरी (रहमतुल्लाह अलैह) रात के समय पवित्र काबा के पास एकांत में इबादत और दुआ में
लीन थे। पूरी मस्जिद-अल-हरम में ख़ामोशी थी। तभी अचानक उन्हें काबा की कोठी (छत) के ऊपर से किसी के फूट-फूटकर रोने और कराहने की आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ किसी अत्यंत दुखी और व्याकुल व्यक्ति की थी। वह रोते
हुए अल्लाह की बारगाह में बड़े ही दर्द भरे शब्दों में गुहार लगा रहा था। हसन बसरी
उस दर्द भरी आवाज़ को सुनकर तड़प उठे। उन्होंने ऊपर की ओर मुख करके ज़ोर से पूछा, "ऐ रोने वाले! तू कौन है? और इस पवित्र स्थान पर आधी रात को इस तरह क्यों विलाप कर
रहा है?" काबा की छत से उस रोने वाले ने जवाब दिया: "ऐ
हसन! तुम मुझे नहीं जानते। मैं वही हूँ जो कभी अल्लाह का बहुत ही प्रिय और निकटतम
था, लेकिन एक छोटे से घमंड और नाफ़रमानी (आदेश उल्लंघन)
के कारण अल्लाह की बारगाह से हमेशा के लिए ठुकरा दिया गया। मैं इब्लीस
(शैतान) हूँ।" वह आगे रोते हुए बोला: "मैं आज रात इस काबा की छत पर बैठकर अपनी उस पुरानी
अज़मत (महानता) और इबादत के दिनों को याद करके रो रहा हूँ जो मुझसे छीन ली गई। मैं
तड़प रहा हूँ कि काश! मुझे फिर से वह मक़ाम मिल जाता, लेकिन अब मेरे लिए तौबा का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद
हो चुका है।"
सूफ़ी संतों ने इस घटना को
अपने शिष्यों को समझाने के लिए एक बड़े सबक़ (पाठ) के रूप में पेश किया है। यह घटना बताती है कि चाहे कोई कितना भी बड़ा
इबादतगुज़ार या ज्ञानी क्यों न हो जाए, यदि उसके भीतर ज़रा
सा भी अहंकार (नफ़्स का घमंड) आ जाए, तो उसका पतन निश्चित
है। इब्लीस का रोना इस बात का सुबूत था कि वह अपनी भूल पर आज भी तड़पता है, लेकिन उसका घमंड उसे झुकने नहीं देता। सच्चे सूफ़ी इस वाक़ये से हमेशा
अल्लाह के भय (ख़ौफ़) और आजिज़ी (विनम्रता) का पाठ सीखते हैं।
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मनोज
कुमार