सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
.
7.5 हज़रत अबू हाशिम रहमतुल्लाह अलैह
मध्ययुगीन सूफ़ी संत और प्रसिद्ध फारसी कवि हज़रत मौलाना जामी (रह.) ने अपनी
प्रसिद्ध पुस्तक ‘नफहात-उल-उन्स’ (Nafahat al-Uns) में इस बात का उल्लेख किया है कि सूफ़ी शब्द का सबसे पहला प्रयोग सन्
800 से पहले हज़रत अबू हाशिम रह. (निधन 767 ईस्वी) नामक रहस्यवादी संत के लिए हुआ था। ये कूफा (इराक) के रहने वाले थे। अबू हाशिम ही दुनिया
के पहले व्यक्ति थे जिन्हें आधिकारिक तौर पर 'सूफी' कहा गया। अबूबकर सिराजउद्दीन ने “दायरा-ए-मआरिफ़े-इस्लामिआ” में कहा है कि ‘अलसूफ़ी’ को उपाधि के रूप में इतिहास में पहली बार आठवीं
शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कूफ़ा (इराक़) के एक शिया रसायन शास्त्री ज़ाबिर-बिन-हय्यान
के साथ, जो धर्मनिष्ठा में एक विशेष पंथ के अनुयायी थे, प्रयोग किया गया, उनका नाम अहमद और उपाधि अबूहाशिम थी और अपने जीवन काल
में सूफ़ी के नाम से प्रसिद्ध थे। हज़रत अबू हाशिम कूफ़ी
से पहले आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों को 'ज़ाहिद' (तपस्वी) या 'आबिद' ('उपासक' या इबादत करने वाला) कहा जाता था। लेकिन उनके सादे जीवन, मोटे ऊनी कपड़े (सूफ़) पहनने और आत्म-शुद्धि पर
विशेष ज़ोर देने के कारण उन्हें और उनके साथियों को 'सूफ़ी' कहा जाने लगा। वह आठवीं
शताब्दी (दूसरी सदी हिजरी) के एक सांसारिक सुखों का त्याग करने वाले और सुप्रसिद्ध
तपस्वी (ज़ाहिद), संत और आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्होंने तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) की बुनियाद रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
वे इराक के ऐतिहासिक शहर कूफ़ा के रहने वाले थे, इसी कारण उनके नाम के साथ 'कूफ़ी' जोड़ा जाता है। वे दिखावे से दूर रहकर पूरी तरह अल्लाह की इबादत में लीन रहने
पर जोर देते थे। कूफ़ा में हज़रत अबू हाशिम रह. (मृ. 776 ई.) यह प्रतिपादित कर रहे थे कि साधना का
एकमात्र लक्ष्य आत्मा में परमात्मा का दर्शन करना होता है। उनका मानना था कि इंसान
को अपनी हर जरूरत के लिए केवल अल्लाह पर निर्भर रहना चाहिए। अल्लाह की मर्जी और उसके फैसलों में हमेशा खुश रहना
उनका मुख्य सिद्धांत था। हर समय अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगना उनकी आदत
थी। ज्ञान व्यक्ति की निजी संपत्ति होता है जबकि प्रेम को खुले हाथों लुटाया जा
सकता है। हज़रत अबूहाशिम रह. का
मानना था कि मनुष्य को उसका घमंड और तक़ब्बुर (अहंकार, घमंड या अभिमान) नष्ट कर देता है।
वो यह भी मानते थे कि दिल से तक़ब्बुर को निकालने की तुलना में सूई से पहाड़ खोदना
अधिक आसान है। वे मानते थे कि दिल की शुद्धता बाहरी दिखावे से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, दिल से घमंड और
दिखावे को निकालना इबादत की पहली सीढ़ी है। उन्होंने दुनिया की सुख-सुविधाओं और
धन-दौलत से दूरी बनाई। वे सादगी के प्रतीक के रूप में मोटे ऊन के कपड़े (सूफ) पहनते
थे।
उन्होंने व्यक्तिगत इबादत के साथ-साथ सूफियों को एक
साथ रहने और सीखने के लिए फिलिस्तीन के रमला नामक स्थान पर आध्यात्मिक
साधना और इबादत के लिए पहली खानकाह बनाई। इसके निर्माण के पीछे एक दिलचस्प
वाकया है। एक ईसाई राजा या रईस ने कुछ मुस्लिम संतों को खुले आसमान के नीचे धूप और
धूल में इबादत करते देखा। उनकी इस निष्ठा और सादगी से प्रभावित होकर उसने उनके
रहने और इबादत करने के लिए एक इमारत (मठ) बनवाई, जिसे 'ख़ानक़ाह' कहा गया। यह सूफ़ी
इतिहास का पहला मठ था जहां सूफ़ियों ने विचारों के आदान-प्रदान के लिए इकट्ठा होना शुरू
किया, और अपने रहस्यवादी अनुभवों के बारे में आपसी चर्चा किया
करते थे। इससे शीघ्र ही हजारों लोग शेख़ अबू हाशिम के
अनुयायी बन गये।
अबूबकर सिराजउद्दीन का मानना है कि इनके नाम के साथ भी अलसूफ़ी का प्रयोग
हुआ। इसके पचास वर्ष के अन्दर इराक में तथा दो सौ वर्ष में सभी मुस्लिम रहस्यवादियों के बीच इसका प्रयोग होने लगा। महान हदीस और
फिक़्ह के ज्ञाता सुफियान-अस-सौरी (मृत्यु 161 हिजरी) अबू
हाशिम कूफ़ी के ही शिष्य थे। उनके माध्यम से ही अबू हाशिम की शिक्षाएं और 'सूफी' शब्द ऐतिहासिक
दस्तावेजों में दर्ज हुआ। सूफियान अल-सौरी ने उनके बारे में एक बेहद मशहूर बात कही
थी: "अगर अबू हाशिम न होते, तो हम दिखावे (रियाकारी) की बारीकियाँ और
दिल की सूक्ष्म बुराइयों को कभी नहीं जान पाते।" अबू हाशिम कूफ़ी
ने इंसानी दिल की कमियों और इबादत में छुपे अहंकार को पहचानने की शिक्षा दी। अबू
हाशिम कूफ़ी की शिक्षाओं का मुख्य सार "दिल का आंतरिक
परिवर्तन" था। उन्होंने
ज़ोर दिया कि धर्म केवल बाहरी तौर-तरीकों का नाम नहीं है, बल्कि दिल की
आंतरिक सफाई और नीयत का साफ़ होना ही तसव्वुफ़ की असल रूह (आत्मा) है। उनके
समकालीन और बाद के सूफियों ने उनकी सादगी, दुनिया से
बेरुखी, और ईश्वर के साथ
सच्चे प्रेम के मार्ग को अपनाया। इस्लामी रहस्यवाद (तसव्वुफ़) के विकास को समझने
के लिए हज़रत अबू हाशिम कूफ़ी का जीवन एक शुरुआती मीनार की तरह है, जिसने आने वाली
सदियों के महान सूफ़ियों (जैसे राबिया बसरी, जुनैद बग़दादी) के लिए रास्ता साफ़ किया। इस काल के
प्रमुख सूफ़ी साधकों में इब्राहिम बिन अधम, (सन् 777), दाउद अत-ताइ (सन् 781-782), राबिया अल अदाविया (सन् 802), हसन बसरी (सन् 728), हैं। उनका विसाल
(निधन) लगभग 150 हिजरी / 160 हिजरी (लगभग 776 ईस्वी) के आसपास माना जाता है।
7.6 हज़रत इब्राहिम बिन अधम (मृ. सन् 777)
हज़रत इब्राहिम
बिन अधम (र.अ.) बल्ख (आधुनिक अफ़गानिस्तान) के एक धनी राजा थे। एक ईश्वरीय चेतावनी
के बाद, उन्होंने अपना राजपाट छोड़ दिया और सूफीवाद में फक्र (आध्यात्मिक
गरीबी) और जुहद (तपस्या) का जीवन अपनाने के लिए एक दरवेश
(भिक्षु) बन गए। जब इब्राहिम बिन अधम बल्ख के राजा थे, तब वे एक रात
अपने आलीशान महल में सो रहे थे। अचानक उन्हें छत पर भारी कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
उन्होंने ज़ोर से पूछा, "छत पर कौन है?" ऊपर से आवाज़ आई, "मैं एक चरवाहा
हूँ, मेरा ऊँट खो गया है और मैं उसे ढूंढ रहा हूँ।" राजा हैरान हुए और बोले, "मूर्ख! क्या महल
की छत पर भी कभी ऊँट मिलता है?" उस चरवाहे ने जवाब दिया, "और तुम उससे भी
बड़े मूर्ख हो, जो रेशमी गद्दों और शाही महल में रहकर ईश्वर को ढूंढ रहे हो!" यह बात
राजा के दिल में चुभ गई और उन्होंने उसी रात राजपाट छोड़ने का फैसला कर लिया। यह
कहानी अहंकार को छोड़ने, ईश्वर पर भरोसा रखने और सादगी से जीने की सीख देती
है। उन्होंने सूफीवाद में आध्यात्मिक गरीबी (फक्र) और वैराग्य (जुहद) के सिद्धांतों
को लोकप्रिय बनाया।
उनका जन्म आठवीं
सदी (लगभग 718-719 ईस्वी) में एक रईस अरब परिवार में हुआ था। सूफी परंपराओं (जैसे फरीदुद्दीन
अत्तार की तज़किरात अल-औलिया) के अनुसार, एक बार शिकार
करते समय उन्हें ईश्वरीय संकेत मिला। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल
दी। उन्होंने अपना आलीशान जीवन और सिंहासन त्याग दिया और ईश्वर की तलाश में निकल
पड़े। अपना राज्य छोड़ने के बाद, उन्होंने कई वर्षों तक जंगलों और रेगिस्तानों में
बिताए, जहाँ उन्होंने अत्यंत सादगी और कठिन तपस्या का जीवन जिया। उन्होंने अपनी
आजीविका का साधन केवल मजदूरी (जैसे बागवानी) को बनाया। उनकी शिक्षाएं ईश्वर पर
पूर्ण भरोसा (तवक्कुल) और सांसारिक मोह-माया से विरक्ति पर केंद्रित थीं।
उनके द्वारा लोकप्रिय बनाए गए तपस्या के आदर्शों ने सूफी विचारधारा की नींव रखने
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजपाट छोड़ने
के कई सालों बाद, इब्राहिम बिन अधम एक नदी (दरिया) के किनारे बैठे अपनी
फटी हुई फकीराना रजाई सिल रहे थे। उस समय बल्ख का एक मौजूदा वज़ीर (मंत्री) वहाँ
से गुज़रा। वज़ीर ने उन्हें पुरानी हालत में देखकर मन में सोचा, "इन्होंने कितना बड़ा राज्य छोड़ दिया और बदले में इन्हें क्या मिला? सिर्फ यह गरीबी!" इब्राहिम बिन अधम उसके मन
की बात जान गए। उन्होंने अपनी लोहे की सुई नदी में फेंक दी और पानी की तरफ देखकर
कहा, "मेरी सुई वापस लाओ।" तुरंत नदी से हज़ारों मछलियाँ
बाहर आईं और हर मछली के मुंह में एक सोने की सुई थी। इब्राहिम बिन अधम ने मुसकुराकर
कहा, "मुझे सोने की सुई नहीं, मेरी वही लोहे की सुई चाहिए।" तब एक छोटी मछली उनकी पुरानी सुई लेकर आई।
उन्होंने वज़ीर से कहा, "बल्ख का राज्य छोड़ने के
बदले मुझे दिल की यह बादशाहत और प्रकृति पर यह अधिकार मिला है।"
हज़रत इब्राहिम बिन
अधम र.अ., जिन्हें बगदाद के हज़रत जुनैद ने सूफ़ीवाद की कुंजी कहा, ने भी तप की
वकालत की, जिसमें उनके अनुसार, अन्य सांसारिकता, ब्रह्मचर्य और ग़रीबी
शामिल थी। उनके लिए एक सच्चा संत वह है जो इस दुनिया की किसी चीज़ की लालसा नहीं
करता है, और कुछ भी नहीं, और ख़ुद को विशेष रूप से भगवान के लिए समर्पित करता है। एक बार एक अजनबी
व्यक्ति राजा इब्राहिम बिन अधम के महल में बिना इजाज़त घुस आया। राजा के सिपाहियों
ने उसे रोका, तो उसने कहा कि वह इस "सराय" (मुसाफिरखाने) में ठहरना चाहता है। राजा ने गुस्से में कहा, "यह मेरा महल है, कोई सराय नहीं!" उस व्यक्ति ने शांत होकर पूछा, "आपसे पहले यहाँ कौन रहता था?" राजा ने कहा, "मेरे पिता।" व्यक्ति ने फिर पूछा, "उनसे पहले?" राजा ने कहा, "मेरे दादा।" व्यक्ति ने अंत में पूछा, "अब वे सब कहाँ हैं?" राजा ने जवाब दिया, "वे सब मर चुके हैं।" उस अजनबी ने कहा, "जिस जगह पर लोग
आते हैं, कुछ दिन ठहरते हैं और फिर चले जाते हैं, उसे महल नहीं, सराय ही कहते हैं।" यह कहकर वह चला गया। वह व्यक्ति असल में हज़रत
ख़िज़्र (एक ईश्वरीय दूत) थे, जिन्होंने राजा को संसार की नश्वरता का पाठ पढ़ाया।
उन्होंने
ब्रह्मचर्य और ग़रीबी को सच्चे सूफ़ी की सबसे अधिक ज़रूरी गुण के रूप में वकालत की। उनके
अनुसार, जो ग़रीबी को अपनाता है, वह विवाह के बारे में नहीं सोच सकता, क्योंकि उसके
लिए अपनी पत्नी की ज़रूरतों को पूरा करना असंभव हो जाता है। जब एक सूफ़ी शादी करता
है, तो वह एक नाव में प्रवेश करता है, कहने के लिए, एक नाव, लेकिन जब उसे एक
बच्चा मिलता है, तो उसकी नाव डूब जाती है और उसकी तपस्या ग़ायब हो जाती है।
एक व्यक्ति अपनी
ग़रीबी पर चिल्ला रहा था। इब्राहिम बिन अधम ने टिप्पणी की कि उसने कुछ भी भुगतान
नहीं किया था अपनी इस ग़रीबी के लिए। उस आदमी को आश्चर्य हुआ और उसने पूछा: क्या ग़रीबी
ख़रीदी जाने वाली चीज़ है? इब्राहिम ने कहा: हाँ, मैंने इसे अपनी मर्ज़ी
से चुना और इसे सांसारिक संप्रभुता की क़ीमत पर ख़रीदा और मैं इसके एक पल को सौ
दुनियाओं के साथ बदलने के लिए तैयार हूं। इब्राहिम बिन अधम के अनुसार, त्याग का मतलब यह नहीं है कि आपके पास कुछ न हो। बल्कि सच्चा वैराग्य यह है कि
दुनिया की कोई भी चीज़ आपके दिल पर कब्ज़ा न कर सके। जब तक इंसान के दिल में
दुनिया की दौलत, शोहरत या पद का लालच रहता है, तब तक वह अल्लाह के करीब नहीं आ सकता। उनका मानना था कि जब तक इंसान के पेट
में हलाल (ईमानदारी की) कमाई का एक भी दाना नहीं जाता, तब तक उसकी
इबादत और दुआएँ कुबूल नहीं होतीं। वे सिखाते थे कि इंसान को केवल अल्लाह से डरना
चाहिए, दुनिया के किसी इंसान या परिस्थिति से नहीं। वे अक्सर कहते थे कि जुबान को
काबू में रखना आध्यात्मिक उन्नति के लिए सबसे ज़रूरी है। फालतू बातें इंसान के दिल
को आध्यात्मिक रूप से मृत कर देती हैं। अल्लाह को गहराई से जानने के लिए कुछ समय
दुनिया के कोलाहल से दूर रहकर एकांत में बिताना बेहद ज़रूरी है।
एक बार इब्राहिम
बिन अधम से पूछा गया कि क्या वह अपने दिल की इच्छा को प्राप्त करके अपने जीवन में
कभी ख़ुश थे। उन्होंने उत्तर दिया: हाँ, दो बार। उन्होंने दो अलग-अलग घटनाओं का ज़िक्र
किया जब जानने वाले लोगों ने उनका मज़ाक़ उड़ाया और उनकी क़ीमत पर मज़ाक़ उड़ाया।
उन्होंने तवक्कुल (ईश्वर में विश्वास) के सिद्धांत का उल्लेख किया, लेकिन उनके
मामले में यह क़ुरआन में प्रतिपादित एक नैतिक सिद्धांत था, जो किसी के अपने
प्रयासों से अपनी आजीविका कमाने को बाहर नहीं करता है। यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह
से अल्लाह पर भरोसा करता है, तो अल्लाह उसकी ज़रूरतों को ऐसे रास्तों से पूरा करता
है जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होती।
इस समय तक सूफ़ीमत में अन्य दर्शनों के विचार भी प्रवेश करने लगे थे। वे ‘गुलुब’ (मनुष्य ईश्वरत्व तक पहुंच सकता है) और ‘तक़सीर’ (ईश्वर मनुष्य के धरातल पर उतर सकता है) में
विश्वास करने लगे थे। आगे चलकर उनका यह विश्वास ‘हुलूल’ (ईश्वर के मानव रूप में प्रकट होने, अवतरण), ‘तसबीह’ (शरीरधारी ब्रह्म) और ‘रज़ा’ (इमाम के पुनर्जन्म) तक पहुंच गया।
इस समय के सूफ़ियों
का कोई संगठित सम्प्रदाय नहीं था। ये आपस में मिल जुल कर विचार किया करते थे और परम्परागत
नियम क़ानून को मानते थे। हज़रत अबू अब्दुल्ला सूफ़ियान रहमतुल्लाह अलैह (715-777) के अलावा बल्ख़ के हज़रत इब्राहीम
रहमतुल्लाह अलैह और हज़रत शक़ीक़ इब्राहिम र.अ. (मृ. 810) सूफ़ी साधना का
प्रचार प्रसार कर रहे थे।
हज़रत इब्राहिम बिन
अधम ने अपना अंतिम समय सीरिया में बिताया। 790 ईस्वी में उनका
निधन हो गया और उनकी समाधि वर्तमान में सीरिया के जाबलेह शहर में स्थित है , जहाँ आज भी लोग जियारत के लिए जाते हैं। उनके आध्यात्मिक विचारों और
जीवनशैली ने आने वाले कई सूफी संतों को गहराई से प्रभावित किया। उनके आध्यात्मिक
विचार और त्याग की कहानी को महान सूफी कवियों जैसे रूमी और फरीदुद्दीन अत्तार ने
अपनी रचनाओं में विस्तार से जगह दी है।
7.7 हज़रत शक़ीक़ इब्राहिम र.अ. (मृ. 810)
हज़रत शक़ीक़ बल्ख़ी (रहमतुल्लाह अलैह) इस्लाम के शुरुआती दौर के एक बेहद
मशहूर और अज़ीम सूफ़ी संत (वली-अल्लाह) थे, जिनका पूरा नाम शक़ीक़ इब्न इब्राहिम
अल-बल्ख़ी था। वह प्रारंभिक सूफी संत और खोरासान स्कूल के प्रमुख प्रचारक थे।
हज़रत शक़ीक़ इब्राहिम र.अ. हज़रत इब्राहिम बिन अधम के शिष्य थे। तसव्वुफ़
(सूफ़ीवाद) के इतिहास में उन्हें 'तवक्कुल' (अल्लाह पर पूर्ण
भरोसा) की अवधारणा को गहराई से स्थापित करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने तवक्कुल
(आत्मसमर्पण, अल्लाह की दया या उसके रहम पर पूरा भरोसा रखना, धैर्य) के सिद्धांत को विकसित और सिद्ध किया। उनका
मानना था कि इंसान को अपनी आजीविका (रोज़ी) के लिए घबराना नहीं चाहिए, बल्कि पूरी तरह
अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। वह कहते थे कि मौत से पहले सच्चे दिल से तौबा (माफी)
मांगने वाले के लिए कभी देर नहीं होती। बड़े गुनाहों का सबसे अच्छा कफ़्फ़ारा
(प्रायश्चित) ज़रूरतमंदों और दबे-कुचले लोगों की मदद करना है।
वह प्रसिद्ध सूफी
हज़रत बायजीद बस्तामी (रह.) के भी उस्ताद माने जाते हैं। इसके अलावा, उन्होंने इमाम अबू
हनीफा (रह.) के अधीन इस्लामी ज्ञान प्राप्त किया था। उनका जन्म बल्ख़ (आधुनिक
अफ़गानिस्तान का खोरासान क्षेत्र) में हुआ था। वह बल्ख़ (वर्तमान अफगानिस्तान) के
एक बहुत ही समृद्ध और व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्हें ज़ाहिद
(सांसारिक मोह-माया से दूर रहने वाले) की उपाधि दी गई। वह हज़रत इब्राहिम इब्न अधम
(र.अ.) के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।
सूफ़ीवाद में उनके
रूपांतरण की कहानी बहुत ही रोचक है। हज़रत शक़ीक़ बल्ख़ी शुरुआत में एक बहुत अमीर
व्यापारी थे और व्यापार के सिलसिले में तुर्किस्तान (या अन्य देशों) जाया करते थे।
एक बार वो अपने व्यापार के दौरान तुर्केस्तान के एक मंदिर में गए और मूर्ति-पूजा
करने वालों के एक मंदिर का दौरा किया। उन्होंने एक मूर्तिपूजक से कहा, "तुम इस बेजान
मूर्ति की पूजा क्यों करते हो जिसने तुम्हें पैदा भी नहीं किया? उस अल्लाह की इबादत
करो जो ज़िंदा है और सबको रिज़्क़ (रोजी-रोटी) देता है।" मूर्तिपूजकों ने
उनसे कहा: यदि आपका निर्माता सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है, तो आप इस दूर देश
में आजीविका की तलाश में क्यों आए हैं? क्या वह आपको आपके ही नगर में उपलब्ध नहीं
करा सकता? इस बात ने उनके दिल पर गहरा असर किया। उन्होंने संसार त्याग दिया, खुरासान चले गए, अल्लाह
की राह चुन ली और तपस्वी बन गए।
एक बार बल्ख़ में
भीषण अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने को मोहताज़ थे और रो रहे थे। लेकिन शक़ीक़ बल्ख़ी ने
बाज़ार में एक गुलाम को देखा जो बेहद खुश था और हंस रहा था। शक़ीक़ ने पूछा, "लोग भूख से मर रहे
हैं और तुम हंस रहे हो?" गुलाम ने कहा, "मुझे किस बात की
चिंता? मेरे मालिक के पास बहुत बड़ा अनाज का गोदाम है, वह मुझे भूखा नहीं
सोने देगा।"
यह सुनकर
शक़ीक़ चौक गए और सोचा, "अगर एक मामूली इंसान के मालिक के पास इतना अनाज
है कि गुलाम बेफ़िक्र है, तो मेरा मालिक तो पूरी कायनात का रब
(अल्लाह) है, मुझे रिज़्क़ की चिंता क्यों करनी चाहिए?" इसके बाद उन्होंने
अपना सब कुछ अल्लाह पर छोड़ दिया (तवक्कुल)।
वे संसार को मिथ्या
मानते थे। उनका मानना था कि वही व्यक्ति सन्त हो सकता है जो संसार के विषय वासना पर
लुब्ध न हो और परमात्मा की उपासना में दिन रात लगा रहे। उनका कहना था, "अगर तुम किसी सच्चे
दोस्त की तलाश में हो, तो अल्लाह तुम्हारे लिए काफ़ी है।" उन्होंने तवक्कुल को अपनी
जीविका कमाने के निषेध के रूप में व्याख्यायित किया। उन्होंने एक बार टिप्पणी की
थी कि जीविका की तलाश में मनुष्य द्वारा किए गए प्रयास पुरुषों के साथ व्यवहार
करने के भगवान के तरीक़ों के बारे में उनकी अज्ञानता का परिणाम हैं और इसलिए, रोटी जीतने के लिए
कड़ी मेहनत करना ग़ैरक़ानूनी (हराम) है। उनका मानना था कि जरूरतमंदों और गरीबों की
मदद करना सबसे बड़े गुनाहों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) है। उन्होंने रूहानी तरक्की
के लिए चार चीज़ें ज़रूरी बताईं: कम खाना (भूख से कम खाना), कम सोना, कम बोलना और लोगों
से मेल-जोल कम करके अल्लाह की याद में वक्त बिताना।
एक बार अब्बासी खलीफा हारून अल-रशीद ने उनसे नसीहत मांगी। हज़रत शक़ीक़ ने उनसे पूछा कि यदि आप रेगिस्तान में
प्यास से मर रहे हों, तो आधी सल्तनत के बदले एक घूंट पानी लेंगे? राजा ने कहा, "हाँ"। फिर उन्होंने पूछा कि अगर वह पानी
शरीर से बाहर न निकले और आप मरने लगें, तो क्या बची हुई
आधी सल्तनत देकर इलाज कराएंगे? राजा ने फिर कहा, "हाँ"। इस पर हज़रत शक़ीक़ ने कहा: "फिर उस सल्तनत पर घमंड क्यों करना, जिसकी कीमत सिर्फ एक घूंट पानी के बराबर है?" यह सुनकर खलीफा रो पड़े।
हज़रत शक़ीक़ बल्ख़ी
एक महान शिक्षक भी थे। इस्लाम के एक और बेहद मशहूर सूफ़ी संत हज़रत हातिम अस्म (र.अ.) इनके सबसे चहेते और
प्रमुख शिष्यों में से थे। हातिम अस्म ने उनके सानिध्य में रहकर 30 से अधिक सालों तक रूहानी तालीम हासिल की थी। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे अल्लाह की राह में जिहाद
(धर्म-युद्ध) के लिए निकले थे और मध्य एशिया के कुलान क्षेत्र (Kulan) में एक जंग के दौरान वे शहीद हो गए। उनकी मृत्यु 810 ई. में हुई। उनकी मज़ार
और विरासत आज भी इस्लामी तसव्वुफ़ में श्रद्धा का केंद्र है।
7.8 हज़रत अबू अली फुज़ैल तलक़ानी रहमतुल्लाह अलैह
मर्व में हज़रत अबू अली फुज़ैल
तलक़ानी रहमतुल्लाह अलैह अपने तप और त्याग के कारण आम लोगों के बीच श्रद्धा के पात्र
बने। उन्हें इतिहास में आमतौर पर हज़रत फ़ुज़ैल बिन अयाज़ के नाम से जाना जाता
है। उन्होंने उपवास को पापों के प्रायश्चित का उत्तम साधन बताया। हज़रत अबू अली
फुज़ैल बिन अयाज़ (जिन्हें कुछ संदर्भों में उनके क्षेत्र के कारण तलक़ानी या खुरासानी
भी कहा जाता है) सूफीवाद (तसव्वुफ़) के इतिहास में शुरुआती दौर के एक महान सूफी
संत, तपस्वी (ज़ाहिद) और हदीस के विद्वान थे। उनका पूरा नाम
फुज़ैल बिन अयाज़ बिन मसूद अल-तमीमी था। उनका जन्म स्थान समरकंद या बुखारा
(ऐतिहासिक खुरासान क्षेत्र) है। उनका पैतृक संबंध कुफ़ा (इराक) से था। उनकी मृत्यु
सन् 803 ईस्वी में मक्का मुकर्रमा में हुई। आध्यात्मिक मार्ग पर आने से पहले, वे एक खूंखार डाकू थे, जो मर्व और सरख़्स
के बीच के इलाकों में काफिलों को लूटा करते थे। हालांकि, डाकू होने के
बावजूद वे अपने भीतर कुछ नैतिक नियम रखते थे, जैसे महिलाओं की
इज़्ज़त करना और नमाज़ न छोड़ना।
उनके जीवन में
बदलाव की घटना सूफी साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है। एक रात वे किसी घर की दीवार
लांघ रहे थे, तभी उन्होंने किसी को कुरान की यह आयत पढ़ते सुना: "क्या ईमान वालों के
लिए अभी वह समय नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की याद से पिघल जाएं?" (सूरह अल-हदीद: 16) यह सुनते ही उनके
दिल पर गहरा असर हुआ। उन्होंने तुरंत पुकारा, "ऐ मेरे रब! हाँ, वह समय आ गया है।" उन्होंने उसी
रात डकैती के रास्ते को हमेशा के लिए छोड़ दिया (तौबा कर ली) और अपना पूरा जीवन
अल्लाह की इबादत और ज्ञान हासिल करने में लगा दिया।
तौबा के बाद उन्होंने ज्ञान और अध्यात्म की खोज शुरू की। उन्होंने कूफ़ा और
मक्का की यात्रा की। उन्होंने हज़रत अब्दुल वाहिद बिन
ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह से आध्यात्मिक दीक्षा
(बायअत) और ख़िलाफ़त हासिल की। वे इमाम आज़म अबू हनीफ़ा के शागिर्द रहे और हदीस के
बड़े प्रामाणिक रावी (वर्णनकर्ता) बने। वे हज़रत ख़्वाजा अब्दुल वाहिद बिन
ज़ैद के मुरीद और ख़लीफ़ा थे। वे चिश्ती सिलसिले के महान बुज़ुर्गों के शजरे
(आध्यात्मिक श्रृंखला) में शामिल हैं। हज़रत इब्राहीम अदम रहमतुल्लाह अलैह जैसे
महान संतों से भी उनके गहरे वैचारिक संबंध थे। उनके प्रमुख शिष्यों में सुल्तान
इब्राहिम बिन अधम जैसे महान सूफी संत शामिल थे। वे मक्का शरीफ में 'हरम' के पास रहने लगे और अपनी कठोर तपस्या, रात-दिन की इबादत और रोने (अल्लाह के खौफ से) के लिए मशहूर हुए। उन्हें 'आलिम-ए-रब्बानी' और 'अल्लाह का दोस्त' कहा जाता था।
वह कहते थे, "यदि तुमसे कोई पूछे कि क्या तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो, तो चुप रहो। क्योंकि अगर तुम 'ना' कहोगे तो यह कुफ़्र होगा, और अगर 'हाँ' कहोगे तो तुम्हारे कर्म प्रेमियों जैसे नहीं
हैं और तुम झूठे ठहरोगे।" वह मानते थे, "दुनिया की सारी बुराई एक घर में बंद है और उसकी चाबी 'दुनिया की चाहत' (लोभ) है।"
हज़रत फ़ुज़ैल बिन अयाज़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) आरंभिक सूफी संतों में शामिल
हैं, जिन्होंने सूफी मत की आधारशिला रखने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सूफी विचार और
शिक्षाएं मुख्य रूप से जहद (वैराग्य), इखलास (निष्ठा), सिद्क (सच्चाई), और तौबा (पछतावा) पर आधारित थीं। हज़रत
फ़ुज़ैल का मानना था कि दुनिया को छोड़ देने (वैराग्य) से कहीं अधिक श्रेष्ठ ईश्वर
की इच्छा को स्वीकार करना है। वे कहते थे, "इस संसार में वैराग्य (ज़ुहद) अपनाने से कहीं बेहतर है अल्लाह के फैसले से संतुष्ट (रज़ा) रहना। क्योंकि जो व्यक्ति संतुष्ट है, वह अपने
आध्यात्मिक स्थान (मकाम) से आगे कभी किसी चीज़ की चाह नहीं रखता।" वे बाहरी
दिखावे के सख्त खिलाफ थे और दिल की गहराई में छिपी नीयत (इरादे) को ही इबादत का
आधार मानते थे। उनका एक प्रसिद्ध कथन है, "मनुष्य के बाहरी
रूप में उसके दिल से ज़्यादा विनम्रता दिखाई देना एक तरह का धोखा या अपराध है।"
कुरान की आयत की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा था कि ईश्वर केवल उन्हीं कर्मों
को स्वीकार करता है जो सच्चे (सद्भावपूर्ण) और सही (शरिया के अनुसार)
हों। यदि कर्म में निष्ठा है लेकिन वह सही तरीके से नहीं किया गया, तो वह स्वीकार्य
नहीं है। वे कहते थे, "इंसान के भीतर अल्लाह का भय उतना ही गहरा होता है, जितना उसके पास
अल्लाह का ज्ञान (मारिफत) होता है।" एक सूफी के रूप में, वे सत्ता के
गलियारों, राजाओं और प्रसिद्धि से कोसों दूर रहते थे। खलीफा हारून अल-रशीद खुद
उनसे मिलने आया करते थे, लेकिन फ़ुज़ैल हमेशा उन्हें सांसारिक मोह त्यागने
की नसीहत देते थे। "जो कोई भी नेतृत्व या प्रसिद्धि के पीछे भागेगा, वह अपमानित होगा।
हमेशा अदने (साधारण) बने रहो, और कभी भी इस तरह मत जियो जैसे कि तुम कोई बहुत
बड़े व्यक्ति हो।" उनका मानना था कि बहुत अधिक नमाज़ पढ़ना या उपवास रखना ही
इंसान को महान नहीं बनाता, बल्कि दिल की सफाई ही उसे अल्लाह के करीब लाती
है। जिसने भी आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छुआ है, उसने केवल बहुत
अधिक उपवास या नमाज़ के कारण नहीं, बल्कि आत्मा की उदारता, दिल की भलाई और
मानवता के प्रति सच्ची निष्ठा के बल पर ऐसा किया है। हज़रत फ़ुज़ैल बिन अयाज़ का इंतकाल 187 हिजरी
(लगभग 803 ईस्वी) में मक्का मुकर्रमा (सऊदी अरब) में हुआ। उन्हें वहीं जन्नतुल मुअल्ला में
दफनाया गया।
निष्कर्ष
इस तरह प्रारंभिक
सूफ़ी साधकों ने इस्लाम में भक्ति और माधुर्य का समावेश कर एक नए दर्शन की आधारशिला
रखी। आठवीं
सदी के अन्तिम वर्षों में सूफ़ी साधकों का मानसिक बल प्रबल हो गया तथा सभी सूफ़ी
साधकों ने परम सत्ता की सर्वव्यापकता तथा प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में परम सत्ता
के दर्शन करने के सिद्धान्त को अधिक अपनाया। आठवीं शताब्दी के अन्त तक के सूफ़ी संतों
ने एकान्तप्रियता, ईश्वरीय
चिन्तन तथा ध्यानमग्न रहकर आनन्द उठाने पर बल दिया। 14वीं शताब्दी में अरब इतिहासकार इब्न-ए-ख़लदुन
ने सूफ़ीवाद को कुछ इस तरह से परिभाषित किया है, "दौलत, शोहरत, तमाम तरह की दुनियावी लज्ज़तों से ख़ुद
को दूर करके अपने रब से लौ लगाना और उसकी इबादत करना ही सूफ़ीवाद है।"
सातवीं शताब्दी ज़िक्र और तापसी जीवन
का समय था।
यह समय क़ुरआनशरीफ़ एवं हदीसों पर भाष्य की रचना समय था। सूफ़ीमत इस्लाम
धर्म के सिद्धांतों पर आधारित था। विकास के इस चरण में सूफ़ीमत में दर्शन का समावेश
नहीं था। यह आत्मचिंतन और आत्म-शुद्धिकरण का समय था। धीरे-धीरे सूफ़ीमत पर ईसाईयत,
नवअफ़लातूनी, भारतीय वेदान्त और बौद्ध दर्शन का प्रभाव पड़ने लगा। नवअफ़लातूनी विचार
यह था कि जीव ब्रह्म से अलग होने के बाद उसके विरह में बेचैन है और उसे शान्ति तभी
मिलेगी जब वापस होकर वह ब्रह्म में लीन हो जाएगा। विरह की कल्पना बुद्धि से नहीं
समझी जा सकती।
सूफीवाद (तसव्वुफ़) में भी आत्मा और परमात्मा के मिलन (फना/विलीन होने) की यही
अवधारणा प्रमुख है। सूफी संतों की 'मारिफ़त' (ईश्वरीय ज्ञान) की अवधारणा अफ़लातूनी
दर्शन के प्रकाश और ज्ञान के विचारों से काफी मेल खाती है। प्लेटो के अनुसार, सांसारिक प्रेम के माध्यम से साधक 'परम सत्य' या 'सौंदर्य' तक पहुँचता है。 सूफियों ने इसी विचार को अपनाकर 'इश्क-मजाजी' (सांसारिक प्रेम) से 'इश्क-हकीकी' (ईश्वरीय प्रेम) की यात्रा का सिद्धांत
विकसित किया।
कुछ समय बाद हज़रत जुनद शिबली रह. और हज़रत मंसूर हल्लाज
रह. के लीक से हटकर व्यक्त किए गए विचारों के कारण सूफ़ीमत में एक नया मोड़ आया।
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मनोज
कुमार