महात्मा
गांधी हत्या केस-41
30 जनवरी,
1948
... और 30 जनवरी को जब वह काल की घड़ी आई
शुक्रवार 30 जनवरी, यह एक बहुत ही मनहूस दिन था। हमेशा की तरह, गांधीजी ने रात बरामदे में अपनी खाट पर बिताई थी। वह
सुबह तीन बजकर तीस मिनट पर उठे। अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने मनुबेन का कान
पकड़कर उसे जगाया, क्योंकि वह गहरी नींद में सो रही
थी। गांधीजी ने प्रार्थना की। प्रार्थना
में नियमित रूप से शामिल होने वाली महिलाओं में से एक उस दिन देर तक सोती रह गई, और उसकी अनुपस्थिति से उन्हें बहुत
दुख हुआ। दातुन से दांत साफ करते हुए, उन्होंने
मनुबेन से अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि प्रार्थना आत्मा को शुद्ध करने
वाली एक झाड़ू की तरह है, और उसका प्रार्थना में शामिल न
होना यह दिखाता है कि उन पर उनका प्रभाव कम होता जा रहा है। अगर उसे उनके साथ
प्रार्थना करने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती, तो
बेहतर होगा कि वह उनका साथ छोड़ दे; यह उन
दोनों के लिए ही अच्छा रहेगा। उन्हें अभी भी काफी खांसी आ रही थी, और वे अपने उपवास के असर से पूरी
तरह उबर नहीं पाए थे। उस महिला की अनुपस्थिति के बारे में सोचते हुए, उन्होंने कहा: "मुझे ये संकेत
अच्छे नहीं लग रहे हैं। ईश्वर करे कि मुझे ये सब देखने के लिए यहाँ और अधिक समय तक
न रहना पड़े।"
आखिरी सुबह की शुरुआत बेचैनी, अधीरता और मन में छाई एक गहरी निराशा के साथ हुई। कुछ अजीब संकेत और अपशकुन
दिखाई दिए: प्यारेलाल भी अपनी तय जगह पर मौजूद नहीं थे। उनके सामने एक लंबा और
भारी दिन था। कांग्रेस का संविधान पूरा करना था, दोपहर में पटेल के साथ एक अहम बैठक होनी थी, और इसके अलावा पूरे दिन कई लोगों को साक्षात्कार
(इंटरव्यू) भी देने थे। वे किसी अज्ञात डर से घिरे हुए लग रहे थे; और जब मनुबेन ने उनसे पूछा कि वह उनके लिए कौन सी
प्रार्थना करें, तो उन्होंने एक पुराना गुजराती भजन
गाने को कहा, जो उनकी अपनी बेचैनी और गहरी चिंता
को दर्शाता था:
चाहे थके हो या न थके हो, हे मानव, विश्राम न कर,
अकेले ही अपना संघर्ष जारी रख, उसे कभी न रोक।
वे जानते थे कि उनकी जान लेने की
कोई साजिश रची जा रही है, उन्हें यह बात दस दिन पहले हुए बम विस्फोट के समय से ही पता थी, और
उन्हें शायद पहले से ही आभास हो गया था कि उनकी
मृत्यु निकट है।
***
गांधीजी को खांसी आ रही थी। मनु ने कहा, "मैं आपके लिए
लौंग कूटती हूँ। रात को सोते वक्त लेने से आराम मिलेगा"। गांधीजी ने कहा, “किसे मालूम रात तक क्या होने वाला
है? मैं ज़िन्दा रहूंगा भी या नहीं? अगर रात को मैं ज़िन्दा रहा तो उस समय तुम लौंग
कूट लेना।” किसे पता था कि गांधीजी के मुंह से सुबह अनायास निकले ये शब्द सच हो जाएंगे।
गांधीजी ने भी उस दिन आराम नहीं
किया। पहले पत्रों का उत्तर लिखा। उपवास के बाद शरीर कमज़ोर हो चुका था। इसलिए
टहलने के लिए नहीं गए। कमरे में इधर-उधर टहले। बाहर अभी भी अंधेरा था और घास पर ओस
की बूंदें जमी थीं। चादर में लिपटे हुए और अपने पास दो इलेक्ट्रिक हीटर रखे, वे कांग्रेस के संविधान का मसौदा तैयार करने में लगे
थे।
गांधीजी को अभी भी उस मसविदे को
पूरा करना था। इसे उनके जीवनी-लेखकों ने उनकी अंतिम इच्छा या वसीयत कहा है। वह
कांग्रेस की भावी रूपरेखा के बारे में उनकी प्रस्तावित योजना थी और वे चाहते थे कि
कांग्रेस के नेता इस पर विचार करें। रात में तैयार किया हुआ कांग्रेस के संविधान
का प्रारूप को प्यारेलाल को देते हुए कहा, "इसमें
विचारों की जो भी कमी रह गई हो, उसे
पूरा कर देना। मैंने इसे बहुत मानसिक तनाव में लिखा था।" जिस कांग्रेस को उन्होंने समन्वित
करके भारत की स्वाधीनता को पाने के लिए एक शक्तिशाली साधन बनाया था, अब वे महसूस
करते थे कि वही कांग्रेस अपना उद्देश्य पा लेने के बाद अपनी उपयोगिता खो चुकी है।
उसे ख़ुद को भंग कर लेना चाहिए। वह चाहते थे कि जो कांग्रेसी गांवों की सामाजिक,
नैतिक और आर्थिक स्वतंत्रता में विश्वास रखते हों, वे मिलकर एक लोक सेवक संघ बनाएं और
पद और सत्ता की छीनाझपटी छोड़कर स्वेच्छा से गांवों के करोड़ों भूखों, बेसहारों की
सेवा करें।
पौने पांच बजे उन्हें हमेशा की तरह
गर्म पानी, शहद और नींबू के रस का पेय दिया
गया। इससे पहले कि दूसरे लोग उठ पाते, छह बजे फिर सोने चले गए। उनकी नींद
लगभग आधे घंटे में ही खुल गई। ‘लाइफ’ पत्रिका की फोटोग्राफर मार्गरेट बोर्क
व्हाइट गांधीजी पर फोटो फीचर शूट करना चाहती थीं। फांसीसी फोटोग्राफर हेनरी
कार्टियर ब्रेसन तो कैमरा लेकर पहले से ही उनके पीछे पड़ा हुआ था।
वो दोबारा सो कर
आठ बजे उठे। दिन के अख़बारों पर नज़र दौड़ाई और फिर ब्रजकृष्ण ने तेल से उनकी
मालिश की। नहाने के बाद उन्होंने 12 औंस बकरी का दूध, उबली सब्ज़ियाँ, टमाटर, मूली खाई और संतरे
का रस पिया। उन्होंने साढ़े दस बजे बंगाली का अभ्यास किया। प्यारेलाल वह विधान ठीक
करके ले आए। गांधीजी ने एक-एक करके उसमें किए गए बदलावों और नई बातों को ध्यान से
देखा, और पंचायत नेताओं की संख्या के हिसाब-किताब में रह गई एक
गलती को ठीक किया।
प्यारेलाल ने
नोआखाली के हालात पर बात की, जहाँ स्थिति अभी
भी खतरनाक थी, भले ही ऊपर से सब शांत लग रहा था। प्यारेलाल सोच रहे थे
कि क्या नोआखाली में चलाया गया अभियान आखिरकार विफल रहा? उस इलाके में बहुत
से बुरे इरादे वाले लोग थे, कई हत्यारे और गुंडे आम लोगों को डरा-धमका रहे थे। शायद
अब आबादी की अदला-बदली (exchange of populations) करना ही एकमात्र उपाय रह गया
था। गांधीजी ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि नोआखाली के लोगों
को वहीं रुकने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वे अपना
आत्म-सम्मान और मान-मर्यादा बचा सकें। उन्होंने प्यारेलाल से तुरंत नोआखाली के लिए
रवाना होने को कहा, लेकिन एक पल बाद ही उन्होंने अपना इरादा बदल लिया।
उन्होंने कहा कि बेहतर होगा कि प्यारेलाल तब नोआखाली जाएँ, जब वे खुद दिल्ली
से निकल चुके हों। गांधीजी की इस दुविधा को देखकर प्यारेलाल हैरान रह गए, क्योंकि अपनी
योजनाओं को बदलना या किसी व्यक्ति को उसके काम पर लौटने से रोकना गांधीजी की आदत
नहीं थी।
डरबन के उनके
पुराने साथी रुस्तम सोराबजी सपरिवार गांधीजी से मिलने आए। दोपहर में मौलाना लोग
आए। उन्होंने पूछा, आप वर्धा जा रहे हैं? गांधीजी ने कहा, मैं सेवाग्राम नहीं गया
तो बाक़ी के सभी काम गड़बड़ा जाएंगे। मुझे 14 फरवरी तक दिल्ली लौट आना चाहिए ताकि
पाकिस्तान जा सकूं। मौलाना ने कहा, आप जाइए। कहिए तो तार करके सेवाग्राम को सूचित
कर दें। गांधीजी ने कहा, क्यों पैसे ख़र्च करते हो? शाम को प्रार्थना सभा में ऐलान
कर दूंगा। अख़बारों के माध्यम से यह ख़बर सेवाग्राम पहुंच जाएगी।
हमेशा की तरह, लोग मिलने आ रहे
थे, बैठकें और प्रतिनिधिमंडल चल रहे थे, रिपोर्टें सुनी
जानी थीं और फैसले लिए जाने थे। डॉ. गोपीचंद भार्गव दिल्ली में नर्सिंग होम और
अनाथालय के लिए कोई इमारत मिलने की संभावना पर चर्चा करने आए थे; किसी ने सुझाव
दिया कि शायद कोई मुस्लिम अनाथालय मिल सकता है। गांधीजी ने कहा कि जब मौलाना उनसे
मिलने आएंगे, तब वे इस बारे में बात करेंगे। लेकिन जब मौलाना यह चर्चा
करने आए कि उन्हें दिल्ली में कब तक रुकना चाहिए, क्योंकि उनकी मौजूदगी मुसलमानों
के साथ शांति का एक भरोसा थी, तो वे अनाथालय वाली बात पूरी तरह भूल गए। ऐसा लग रहा
था कि वे किसी दुविधा में फंसे हुए हैं। जब मौलानाओं ने उनसे पूछा कि वे दिल्ली कब
लौटेंगे, तो उन्होंने कहा: "मैं 14 तारीख को लौटने की सोच
रहा हूं, लेकिन सब कुछ ईश्वर के हाथ में है। मुझे तो यह भी नहीं
पता कि मैं परसों यहां से जा पाऊंगा या नहीं।"
इस तरह थकान और
बेचैनी में लंबी सुबह बीत गई; न तो कोई खास
फैसले लिए गए, न ही पत्रों के जवाब दिए गए, और समय निकलता जा
रहा था। आधे दिन में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे उनका डर कम होता, बल्कि उन्हें
बार-बार यही याद आता रहा कि वह हालात बदलने में नाकाम रहे हैं। जब उनके अपने ही
अनुयायी आपस में झगड़ते रहते थे, तो वह दूसरों से
शांति के नियमों का पालन करने की उम्मीद कैसे कर सकते थे?
दोपहर में
उन्होंने पेट पर मिट्टी का लेप (मडपैक) लगवाया और कुछ पत्र लिखवाए। जब मिट्टी का
लेप हटाया गया, तो कुछ और लोग उनसे मिलने आए। सीलोन से डॉ. डी सिल्वा
अपनी बेटी के साथ आए; उन्होंने उनसे ऑटोग्राफ लिया, जो शायद उनके
द्वारा दिया गया आखिरी ऑटोग्राफ था। इसके बाद एक फ्रांसीसी फोटोग्राफर आए, जिन्होंने उन्हें
तस्वीरों का एक एल्बम भेंट किया। फिर अमेरिकी फोटोग्राफर मार्गरेट बर्क-व्हाइट आईं, जिन्होंने उनका
इंटरव्यू तो लिया, लेकिन कोई तस्वीर नहीं खींची। कुल मिलाकर, दिन भर में लगभग
तीस लोग उनसे मिलने आए थे, और अभी कुछ और लोगों का आना बाकी था।
***
दोपहर में गांधीजी
सदा की तरह एक छोटी सी नींद लिया करते थे। जब वे बिस्तर पर सोए थे, मनु को एक
अजनबी गांधीजी के पास दिखा। वह इधर-उधर देख रहा था और वहां कि परिस्थिति का जायज़ा
ले रहा था। मनु उसके पास गई और बोली, “भाई, बापू सो रहे
हैं। बाद में आना।” बिना कुछ बोले वह व्यक्ति चला
गया। लेकिन जाते वक़्त मनु को उसकी आंखों में जो भाव दिखे और उसके चेहरे पर जो अभिव्यक्ति
दिखी वह आसानी से नहीं भुलाने वाले थे।
***
दो बजे एक पत्रकार ने गांधीजी से पूछा, क्या यह सच है कि आप पहली फरवरी को
सेवाग्राम जा रहे हैं? गांधीजी ने पूछा, कौन कहता है? पत्रकार, अख़बारों में छपा
है। गांधीजी, हां अख़बारों में ख़बर तो है कि गांधी पहली को सेवाग्राम जाएगा, लेकिन
वह गांधी कौन है, यह मुझे मालूम नहीं।
सुधीर घोष और
गांधी जी के सचिव प्यारेलाल ने नेहरू और पटेल के बीच मतभेदों पर लंदन टाइम्स में
छपी एक टिप्पणी पर उनकी राय माँगी। इस पर गांधीजी ने कहा कि वह यह मामला पटेल के
सामने उठाएंगे जो चार बजे उनसे मिलने आ रहे हैं और फिर वह नेहरू से भी बात करेंगे
जिनसे शाम सात बजे उनकी मुलाकात तय थी। इसके बाद उन्होंने बिशन से कहा, “बिशन, मेरी
महत्त्वपूर्ण चिट्ठियां ले आ। मुझे उनके जवाब आज ही दे देने चाहिए। शायद मैं कल
रहूं ही नहीं।” इसके बाद कुछ सिंधी शरणार्थी
मिलने आए। उनकी दशा सुन बापू काफी व्यथित हुए।
दोपहर के लगभग चार बज चुके थे, और वे सुबह से ही काम में व्यस्त थे। दिन की सबसे
महत्वपूर्ण घटना—पटेल के साथ बैठक—अभी होनी बाकी थी, और गांधीजी ने इसके लिए पूरी सावधानी से तैयारी की। मामला पटेल और नेहरू के बीच
वैचारिक मतभेदों और आपसी प्रतिद्वंद्विता का था, और गांधीजी हर हाल में सरकार के इन दोनों नेताओं के
बीच सुलह कराना चाहते थे। चार बजे सरदार पटेल अपनी पुत्री
मनीबेन के साथ गांधीजी से मिलने आए। उनसे पूरे एक
घण्टा बात होती रही। वह उस दिन उनकी आख़िरी मुलाक़ाती थे। पटेल और नेहरू के बीच
टकराव की अफवाहें फैली हुई थीं, और यह सुझाव आया था कि इनमें से कोई एक, दूसरे को
पूरी आज़ादी देने के लिए मंत्रिमंडल छोड़ दे। पटेलजी बोले, “मैं सरकार से मुक्त होना चाहता
हूं।” गांधीजी ने कहा, “पहले मैं भी यह सोचता था तुम दोनों (नेहरू, पटेल) में
से एक को सरकार से निकल जाना चाहिए। लेकिन इस मौक़े पर अलग होने से अनर्थ होगा।
प्रार्थना सभा में भी यही बात करूंगा और शाम को नेहरू के साथ भी। अगर ज़रूरत पड़ी तो
सेवाग्राम जाना स्थगित कर दूंगा। यह विचार-भेद हमेशा के लिए स्थगित होना चाहिए।” उन्हें उम्मीद थी कि दिन खत्म
होने तक वे दोनों पूरी तरह से किसी समझौते पर पहुँच जाएंगे। वे उस पिता की तरह थे, जो अपने झगड़ते बेटों को एक साथ बिठाकर उनके बीच
शांति कायम करने के लिए दृढ़ संकल्पित हो। सरदार के लिए यह बापू की अंतिम
आज्ञा थी। उसके बाद विचार-भेद खड़े भी हुए तो उन्होंने नेहरूजी का साथ नहीं छोड़ा।
हत्या की साज़िश
पुरानी दिल्ली
रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में नाथूराम गोडसे जल्दी उठ गया। नारायण आप्टे भी आ
चुका था। विष्णु करकरे भी प्लेटफॉर्म पर अपनी नींद पूरी कर रूम में आ गया। करकरे
को अहसास हुआ कि नाथूराम रात भर अच्छी तरह सोया था। स्नान आदि करने के बाद तीनों नाश्ते
के लिए पहली मंजिल पर स्थित नॉन-वेज रेस्तरां में गए। जैसे ही वे ऑर्डर देने वाले
थे, वेटर ने नाथूराम और आप्टे को झुककर सलाम किया, मुसकुराया और
मराठी में बोला, "साहब, आप लोग तो घर से
बहुत दूर आ गए हैं, है ना?" वे घबराकर उसे
घूरने लगे। कुछ समय के लिए तो नाथूराम का दिल बैठ गया, फिर वह बोला, “तुम भी इतनी दूर
चले आए। पिछली बार मैंने तुम्हें पूना स्टेशन के रेस्तरां में देखा था।” "जी बिल्कुल, मैंने वहां आप
दोनों को कई बार खाना परोसा है। बस कुछ हफ्ते पहले ही मेरा यहाँ तबादला हुआ
है।" उन दिनों, यूरोपीय शैली के रेलवे रेस्तरां 'ब्रैंडन एंड कंपनी' नाम की एक फर्म को
कॉन्ट्रैक्ट पर दिए जाते थे, और वेटरों को
अक्सर एक रेलवे रेस्तरां से दूसरे रेस्तरां में भेज दिया जाता था। वेटर अपने
पुराने जान-पहचान वाले को देख कर काफी ख़ुश था। लेकिन ऐसे दिन पहचाने जाना चिंता की
बात थी। वेटर ने उनका ऑर्डर लिया, बटर टोस्ट, चाय और कॉफी। उसके
जाने के बाद, नाथूराम ने चुपचाप अपनी कलाइयों को एक साथ मिला लिया, मानो उन पर हथकड़ी
लगी हो, और इस संयोग पर अपना सिर हिलाया। नाश्ता खत्म करते ही नाथूराम
गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे अपने कमरे में वापस गए और
खुद को अंदर से बंद कर लिया।
***
नाथूराम लगातार
कुछ पत्र लिखता रहा। करकरे चुपचाप देखता रहा। उसे लगा कि वह और आप्टे उससे पहले ही
अलग हो चुके हैं, और उसे खुद पर शर्म आ रही थी कि वह उसके लिए और कुछ नहीं
कर सका। वह बस इतना कर सकता था कि अंत तक उसके साथ रहे, ताकि उसे लगे कि
वह अकेला नहीं है, कि वह और आप्टे उसके साथ हैं। अपने रूम में आकर नाथूराम ने तीन
पत्र लिखे। बंबई से मनोरमा साल्वी को जो टेलीग्राम भेजने के लिए कहा गया था, उसके साथ-साथ, उसे उम्मीद थी कि
इन पत्रों से आप्टे और करकरे के पास अपने बचाव के लिए ठोस सबूत (एलिबाई) होंगे। साथ
ही, 20 जनवरी की उनकी संयुक्त कोशिश को भी इन पत्रों के जरिए
'एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन' के रूप में पेश
किया जा सकता था, जो 'एक दोस्त की
जल्दबाजी भरी हरकत' की वजह से खराब हो गया। इन पत्रों पर उसी दिन की तारीख, शुक्रवार, 30 जनवरी, पड़ी
थी। इनमें से एक पत्र आप्टे के घर के पते पर, दूसरा उसके ऑफिस के पते पर और तीसरा
करकरे के अहमदनगर के पते पर था। ये पत्र मराठी में लिखे गए थे और तीनों का सार एक
ही था। पत्र में उसने अपना पिछले दिन खिंचवाए फोटो लगाते हुए लिखा था कि वह दिल्ली
में क्या कर रहा है। इस तरह वह यह साबित करना चाह रहा था कि घटना के वक़्त उसके वे
साथी उसके साथ नहीं थे। यानी वह उनके लिए एलिबी तैयार कर रहा था। सुबह से ही वह
किसी से ज़्यादा बात नहीं कर रहा था। दोपहर तक गोडसे ख़ुद में सिमट गया था। पत्र में
लिखा था कि नाथूराम ने जो कुछ किया है, उसे जानकर पाने
वाले को गहरा सदमा लगना तय है; लेकिन उसे ऐसा
करने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उसे समझ आ गया था कि दिल्ली में
प्रदर्शन करके विरोध जताना पूरी तरह से बेकार है। उसने आगे लिखा था: 'मेरा मन अत्यधिक
आक्रोश से भरा हुआ है, क्योंकि मुझे राजनीतिक अन्याय का कोई समाधान नहीं दिख
रहा है। इसलिए, मैंने अपनी मर्जी से एक आखिरी और कठोर कदम उठाने का
फैसला किया है, जिसके बारे में आप एक-दो दिन में सुन ही लेंगे। मुझे
पूरा यकीन है कि मौजूदा हालात में पंचगनी या दिल्ली जैसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का
कोई फायदा नहीं होने वाला है। इसलिए, मैंने किसी और पर
निर्भर हुए बिना, वह करने का फैसला किया है जो मैं करना चाहता हूँ। साथ
में भेजी गई तस्वीर को संभाल कर रखें।'
इसके बाद उन्होंने
इस बात पर चर्चा की कि नाथूराम किस तरह गांधीजी के इतने करीब पहुँच सकता है जहाँ
से वह पिस्तौल से उन पर निशाना साध सके। उन्हें मालूम था कि 20 तारीख की घटना के
बाद बिड़ला भवन में पुलिस की तादाद बढ़ा दी गई है और प्रार्थना सभा में आने वाले
लोगों के बीच सादे कपड़ों में कई आदमी तैनात किए गए हैं। दिल्ली और बॉम्बे पुलिस
प्रमुखों से एक कदम आगे सोचते हुए, उन्हें डर था कि
सादे कपड़ों में मौजूद इन लोगों में से कुछ पुणे के हो सकते हैं और शायद वे उन्हें
पहचान लें। आप्टे ने नाथूराम को एक ऐसा सुझाव दिया जो दर्शाता है कि उसकी सोच कितनी बचकानी थी - उसने कहा कि नाथूराम
को एक पुराने जमाने के फोटोग्राफर का भेष धर लेना चाहिए, और कैमरे व
ट्राइपॉड के साथ, सिर पर काला कपड़ा ओढ़कर प्रार्थना सभा के मैदान में घुस
जाना चाहिए। इस विचार को अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि उन्हें इस तरह से गांधीजी
के नज़दीक नहीं जाने दिया जाएगा। तो आप्टे ने एक और बेहद बेतुका सुझाव दिया: 'क्यों न बुर्का
पहन लिया जाए? कई औरतें बुर्का पहनकर प्रार्थना सभा में आती हैं।' बुर्का एक तरह का
चलता-फिरता तंबू होता है जिसमें आँखें देखने के लिए झिर्रियाँ होती हैं, और इसे दुनिया भर
में रूढ़िवादी मुस्लिम महिलाएँ पहनती हैं। करकरे ने बात जोड़ते हुए कहा, 'और उन्हें तो सबसे
आगे, पहली कतार में बैठने की इजाजत भी होती है।' यह बिल्कुल सच था
कि प्रार्थना सभा में आने वाली महिलाएँ गांधीजी के सबसे करीब, यानी आठ-दस फीट की
दूरी पर बैठती थीं। अगर नाथूराम वहाँ पहुँच जाता, तो वह गांधीजी के
इतने करीब होता कि उनकी हत्या करना उसके लिए आसान हो जाता।
तीनों को यह एक
बेहतरीन विचार लगा और यह मान लिया गया।
आप्टे तथा करकरे
एक बुर्का ढूँढ़ने के लिए निकल पड़े।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
