शनिवार, 3 जनवरी 2026

416. व्यक्तिगत सत्याग्रह

राष्ट्रीय आन्दोलन

416. व्यक्तिगत सत्याग्रह

1940

युद्ध में सहायता नहीं

1940 की गर्मी के अंतिम दिन थे। दूसरा महायुद्ध छिड़ चुका था। भारत को ब्रिटिश सरकार ने दूसरे महायुद्ध के समय युद्ध के समर्थक देश के रूप में घोषित कर दिया था। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि कांग्रेस उसके युद्ध-प्रयत्नों का पूरा समर्थन करे। कांग्रेस के भीतर ऐसे अनेक लोग थे जो संपूर्ण समर्थन देने को तैयार थे, बशर्ते कि ब्रिटिश सरकार भारत को सत्ता तथा जिम्मेदारी सौंप दे और शासन में पूरा हिस्सा दे। इस समय भी अधिकांश कांग्रेसी नेता युद्ध को अहिंसा की दृष्टि से नहीं, स्वराज्य-प्राप्ति की दृष्टि से देख रहे थे। देश इतना जाग गया था कि उससे कम पर राज़ी होने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। भारतीय राष्ट्रभक्त इस विरोधाभास की तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनका अपना देश गुलामी की जंजीरों में जकडा रहे और वे चेकोस्लावाकिया अथवा पोलैंड की आज़ादी और जनवाद की रक्षा के लिए हज़ारों मील दूर यूरोप की भूमि पर लडने के लिए जाएं।

गांधीजी ने यह बात कांग्रेस के समक्ष स्पष्ट कर दी कि वे हिंसात्मक युद्ध में भागीदार नहीं बनेंगे। उनका कहना था कि कांग्रेस इसे स्वीकार कर ले कि किसी भी हालत में जन-धन की सहायता नहीं दी जाएगी। सशस्त्र और हिंसात्मक युद्ध में सहायता देने के अलावा वे नैतिक या दूसरी हर तरह की सहायताएं देने के लिए वह तैयार थे। वे चाहते थे कि कांग्रेस यह घोषणा कर दे कि वह स्वतंत्र भारत के लिए भी अहिंसा के ही सिद्धांत का समर्थन करती है। उन्हें इस बात की आशंका थी कि रक्षात्मक प्रश्नों के उठने पर स्वतंत्र भारत की सरकार अहिंसा के सिद्धांत को त्याग दे और सैनिक, समुद्री तथा हवाई शक्ति की वृद्धि करे। गांधीजी तो भारत को अहिंसा का प्रतीक और दृष्टांत के रूप में देखा करते थे। वे तो दंगों को दबाने के लिए पुलिस का सशस्त्र प्रयोग पसंद नहीं करते थे। उन्हें आशा रहती थी कि उनके उपदेश लोगों के मन में जगह बना लेंगे। हालाकि 1934 से ही वे कांग्रेस की साधारण सदस्यता से हट गए थे, फिर भी कांग्रेस के सलाहकार और नेता बने रहे।

अहिंसा के प्रश्न पर कांग्रेस-कार्यसमिति की असहमति

दुर्भाग्य से राजनीति अवसरवादी होती है। गांधी जी कुछ सिद्धांतों पर चट्टान की तरह अटल रहते थे। यह कहना तो कठिन है कि एक अकेला आदमी जनसाधारण के सिद्धांतों और विचारधाराओं पर कहां तक प्रभाव डाल सकता है, पर यह तो साफ तौर पर देखा जा सकता है कि उस समय के युग में भारतीय विचारधारा पर गांधीजी का बड़ा गहरा प्रभाव था। उनका प्रभाव उन लोगों पर भी पड़ता जो उनसे असहमत होते थे और उनकी आलोचना करते थे। जब गांधीजी ने युद्ध और स्वतंत्र भारत के भविष्य के संबंध में अहिंसा का प्रश्न उठाया तो कांग्रेस-कार्यसमिति ने असहमति जताई। फलस्वरूप इस प्रश्न पर गांधीजी और कांग्रेस-कार्यसमिति में एक निश्चित और स्पष्ट फूट पड़ गई। गांधीजी कांग्रेस कार्यसमिति की चर्चाओं से अलग हो गए। इस तरह गांधीजी ने उन लोगों के लिए अपना कार्य आगे बढ़ाने की सुविधा कर दी, जिनका उनके साथ मतभेद था।

सुभाष चन्द्र बोस, आदि वामपंथी विचारधारा के लोगों का मानना था कि यह युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध है। यही वह मौक़ा है, जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ चौतरफ़ा युद्ध छेड़ कर आज़ादी हासिल कर ली जाए। जनता संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है। सिर्फ़ आह्वान का इंतज़ार कर रही है। इंतज़ार करो और देखो की नीति से काम नहीं चलने वाला है। संगठन पहले से तैयार नहीं होता, वह तो संघर्ष के दौरान बनता है। कांग्रेस अविलंब जनसंघर्ष शुरू करे।

गांधीजी आंदोलन तुरंत नहीं शुरू करने के पक्ष में थे। उन्हें लगता था कि मित्र राष्ट्रों का पक्ष न्याय का है। अतः युद्ध के समय उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए। इसके अलावे उस समय का साम्प्रदायिक माहौल भी तनावपूर्ण था। अगर सिविल नाफ़रमानी छेड़ा जाता तो साम्प्रदायिक दंगों की नौबत आ जाती। गांधीजी को यह भी लगता था कि न देश की जनता और न ही कांग्रेस तुरंत संघर्ष छेड़ने के लिए तैयार है। अभी तो इस बात की आवश्यकता है कि जनता को राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाए और उसे संघर्ष के लिए तैयार किया जाए। साथ ही कांग्रेस संगठन को मज़बूत किया जाए। उसकी कमज़ोरियां दूर की जाए। तबतक सरकार से बातचीत का सिलसिला चलता रहे। मार्च में रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इसमें प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि ‘पूर्ण स्वाधीनता से कम कुछ भी जनता को स्वीकार्य नहीं हो सकता। ... जैसे ही कांग्रेस संगठन संघर्ष के लिए योग्य हो जाता है वैसे ही सिविल नाफ़रमानी आंदोलन शुरू किया जाएगा।

पूना प्रस्ताव

1940 की गर्मियों में नाज़ी सेनाओं ने सारे पश्चिमी यूरोप को रौंद डाला। अकेला इंग्लैंड अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी डंटा हुआ था। उसकी इस वीरता ने भारतीयों में उसके प्रति प्रशंसा और सहानुभूति के भावों को जगा दिया। इसके अलावा एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यदि इंग्लैंड नाज़ी विजय-वाहिनियों को रोकने में असफल हो जाता, तो हिटलर को भू-मध्यसागर के रास्ते भारत में घुस आने से कोई नहीं रोक सकता था। इस आसन्न संकट के कारण कांग्रेस ने युद्ध में अपने सहयोगियों की शर्तों को थोड़ा और नर्म कर दिया था। जुलाई, 1940 में कांग्रेस महासमिति की पूना में बैठक हुई जिसमें काफ़ी विचार-विमर्श के बाद सर्व-सम्मति से एक युक्ति निकली थी। इसे पूना प्रस्ताव भी कहा जाता है। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव रखा कि अगर सरकार केन्द्र में भारतीयों को लेकर एक ऐसी सरकार बना दे जो विधानसभा के प्रति उत्तरदायी हो और सरकार युद्ध के बाद भारत को स्वाधीनता प्रदान करे, तो कांग्रेस सरकार को युद्ध में सहयोग देने के लिए तैयार है। किंतु ब्रिटिश सरकार कांग्रेस के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा, अटलांटिक चार्टर भारत पर लागू नहीं होता। मैं ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन की अध्यक्षता करने के लिए ब्रिटेन का प्रधानमंत्री नहीं बना हूं। किन्तु प्रधानमंत्री की इस घोषणा के बावज़ूद कांग्रेस में बहुतों को यह आशा बनी रही कि जब युद्ध तेज़ होगा तब ब्रिटिश सरकार ढीली पड़ेगी और कांग्रेस की शर्तों पर उसका सहयोग लेगी।

अगस्त-प्रस्ताव

सरकार की दुर्बल स्थिति देखते हुए वायसराय लिनलिथगो को संवैधानिक गतिरोध दूर करने का हुक्म मिला। कांग्रेस के नेता सरकार की ओर से सद्भावना की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने युद्ध में सहयोग की अपनी शर्तों को बहुत नर्म कर दिया था। लेकिन उन्हें निराश होना पड़ा
वायसराय ने
8 अगस्त, 1940 को औपनिवेशिक स्वराज की स्थापना के लिए जो प्रस्ताव दिया था, वह बहुत आशाप्रद नहीं था। । उस घोषणा में नया विधान बनाने के भारतीय अधिकारों को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन यह भी जोड़ दिया गया था कि युद्ध की समाप्ति के बाद ही सभी दलों के सहयोग से संवैधानिक समस्याओं का हल ढूंढा जाएगा। अल्पसंख्यकों की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं करेगी। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी का विस्तार कर भारतीयों को इसमें अधिक स्थान दिए जाने की इसमें व्यवस्था थी। एक युद्ध सलाहकार परिषद के गठन की बात भी थी इसमें। लीग ने प्रस्ताव का स्वागत किया लेकिन कांग्रेस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। सरकार का उद्देश्य मुस्लिम लीग को रिझाना, कांग्रेस-लीग समझौते को मुश्किल कर देना और ऐसा वातावरण तैयार कर देना था, जिससे सत्ता के हस्तांतरण की आवश्यक शर्त, भारत के सब दलों और जातियों का सर्वसम्मत समझौता, पूरी न हो सके। सरकार की इन चालबाज़ियों से कांग्रेस के जो नेता सरकार से आस लगाए बैठे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई।

सरकार की दृष्टि में अगस्त की घोषणा 'अधिकतम' थी, लेकिन कांग्रेस की न्यूनतम माँग से भी वह इतनी न्यून थी कि कांग्रेस उसे स्वीकार करने को राज़ी न हो सकी। देश और सरकार के सामने जो संकट मुंह बाए खडा था, उसके निवारण में अधिकांश कांग्रेसी नेता अपना सहयोग देने को बहुत उत्सुक थे, लेकिन सरकार सहयोग लेने को तैयार न थी। आज़ाद ने लॉर्ड लिनलिथगो का इस पर बात करने का निमंत्रण भी ठुकरा दिया। कांग्रेस अध्यक्ष का मानना ​​था कि आगे बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है। गांधीजी ने मौलाना आज़ाद को एक पात्र लिखकर उनके फैसले का पूरा समर्थन किया।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया अलग थी। लॉर्ड लिनलिथगो के बयान का मतलब यह निकाला गया कि "कोई भी भविष्य का संविधान, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम," लीग की सहमति के बिना नहीं अपनाया जाएगा। साथ ही, बयान में छिपे हुए एकजुट भारत के विचार को खारिज कर दिया गया। "भारत का विभाजन ही एकमात्र समाधान है।" युद्ध के संचालन में मुस्लिम लीग का सहयोग भी इसी "दो राष्ट्र" सिद्धांत पर आधारित होगा।

गांधीजी युद्ध-काल में सरकार को परेशान नहीं करना चाहते थे और कांग्रेसी नेता भी मित्र-राष्ट्रों की स्थिति के प्रति चिंतित थे, इसलिए किसी जन-आंदोलन का सवाल तो उस समय उठ भी नहीं सकता था। लेकिन वायसराय की अगस्त घोषणा ने कांग्रेसियों को इतना विक्षुब्ध कर दिया था कि नाराज़गी जाहिर करने के लिए किसी सशक्त कदम की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। पं. जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेसियोँ की उस समय की निराशा और विक्षोभ का वर्णनदो रास्ते’ नामक एक लेख में किया है—उस घोषणा ने हमारे दिलों को जोड रखने वाले रहे- सहे मुलायम धागों को भी तोड दिया।

बंबई कार्य-समिति की बैठक

संवैधानिक सुधार के कोई आसार नहीं नज़र आ रहे थे। उस पर अध्यादेशों द्वारा प्रेस की आज़ादी एवं सभा संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिए गए थे। नेताओं को परेशान किया जा रहा था और उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भरा जा रहा था। इस स्थिति में नेताओं को लगा कि अगर वे कुछ नहीं करते हैं, तो ब्रिटिश सरकार उनके धैर्य को कमज़ोरी मानकर चलती रहेगी। इस समय गांधीजी और कांग्रेस ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा था और उनमें आपसी गतिरोध दूर करने की इच्छा उत्पन्न हुई थी। 15 सितंबर, 1940 को बंबई में कार्य-समिति की बैठक हुई। उसमें सरकारी प्रस्तावों को नामंजूर कर दिया गया। जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था उसमें युद्ध का उल्लेख नहीं था, क्योंकि अब सरकार से इस सहयोग की ज़रूरत ही नहीं थी। कांग्रेस ने फिर से गांधीजी से नेतृत्व ग्रहण करने के लिए कहा। प्रस्ताव में कहा गया था, न केवल स्वराज के संघर्ष के लिए बल्कि जहां तक अमल में आ सकने की संभावना हो, स्वतंत्र भारत के लिए भी कांग्रेस-महासमिति अहिंसा की ही नीति और व्यवहार में दृढ़ विश्वास करती है। ... इस घोषणा में जहां एक ओर शांतिपूर्ण कार्य और निशस्त्रीकरण के लिए कांग्रेस की आकांक्षा का दृढ़तापूर्वक समर्थन किया गया था वहीं दूसरी तरफ़ बहुत सारी शर्तों पर भी ज़ोर डाला गया था। जो भी हो कांग्रेस का भीतरी संकट तो टला। कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में फिर से सरकार से असहयोग करने का निर्णय लिया।

11 अक्तूबर से व्यक्तिगत सत्याग्रह

गांधीजी ने सरकार विरोधी अभियान राजनैतिक आधार पर नहीं, शांतिवादी और युद्ध-विरोधी आधार पर संगठित किया। उनका कहना था, ब्रिटिश सरकार न स्वाधीनता दे सकती है, न देने का वादा कर सकती है, लेकिन उसे हमें भाषण की स्वतंत्रता और महायुद्ध में घसीटे जाने का विरोध और युद्ध मात्र का विरोध करने का अधिकार तो दे ही सकती है और देना भी चाहिए। ऐसे अवसर पर कांग्रेस का वाम पक्ष और कुछ सहयोगी जन-आंदोलन शुरू करने के पक्ष में नहीं था। लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी। गांधीजी ने चुने हुए लोगों द्वारा व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया। नियम यह था कि जनता को उत्तेजित नहीं करेंगे। अधिकारियों को परेशान नहीं करेंगे। चुने हुए व्यक्ति पूरे देश में जनता के बीच जाकर सार्वजनिक रूप से कहेंगे, जन या धन देकर ब्रिटिश युद्ध-प्रयासों में सहायता देना ग़लत है। अहिंसक अवज्ञा के द्वारा समस्त युद्ध का प्रतिरोध करना एकमात्र उचित कार्य है। सत्याग्रही ज़िला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचित कर देंगे कि किस स्थान पर और किसे समय युद्ध-विरोधी भाषण होना है। क्योंकि यह व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन होगा, इसलिए वे इसे इस तरह से करेंगे कि दूसरे लोग सीधे या परोक्ष रूप से इसमें शामिल न हों। हालांकि, जनता कुछ हद तक इसमें शामिल होगी, क्योंकि उनके पास यह विकल्प होगा कि वे सत्याग्रही को बोलते हुए सुनें या नहीं।

पहले सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे बने। उन्होंने 17 अक्तूबर, 1940 को वर्धा के समीप पवनार गांव में सरकार के साथ युद्ध में साथ न देने का आह्वान करते हुए सत्याग्रह का श्रीगणेश किया। सेलू नामक गांव में सत्याग्रह की पहली सभा हुई। दूसरी सभा सेवाग्राम में हुई। विनोबाजी बहुत ही अच्छे वक्ता थे। देहात के लोग समझ सकें ऐसे उदाहरण और कथाएं सुनाकर वे अपनी बात रखते थे। वे पैदल चलकर गांव-गांव गए और अगले तीन दिनों तक भाषण दिए। चार दिन बाद 21 अक्टूबर को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तीन महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई।

दूसरे सत्याग्रही के रूप में जवाहरलाल नेहरू को विनोबा भावे के बाद चुना गया था। लेकिन उन्हें 31 अक्टूबर को छेओकी रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह गांधी से मिलकर वर्धा से लौट रहे थे। उन पर गोरखपुर जेल में मुकदमा चलाया गया और अक्टूबर की शुरुआत में दिए गए भाषणों के लिए उन्हें चार साल की जेल की सज़ा सुनाई गई।

जिन सत्याग्रहियों को गिरफ़्तार नहीं किया जाता, वे गांवों की ओर चल देते और अपना संदेश फैलाते हुए दिल्ली की ओर बढ़ने की कोशिश करते। इससे इसका नाम ही ‘दिल्ली चलो आन्दोलन’ पड़ गया। धीरे-धीरे व्यक्तिगत सत्याग्रह ने बहुत व्यापक रूप धारण कर लिया। जगह-जगह लोग युद्ध-विरोधी प्रचार कर सरकारी प्रतिबंधों को तोड़ते और जेल जाते।

व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रमुख उद्देश्य था भारतीय जनता की उग्र राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति। साथ इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार को एक और अवसर देना कि वह भारत की मांगों को मान ले। इस सत्याग्रह के द्वारा गांधीजी लोगों को आने वाले संघर्ष के लिए तैयार भी कर रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो जनता को राजनीतिक रूप से जाग्रत और प्रशिक्षित भी किया जा रहा था। कांग्रेस संगठन को दुरुस्त किया जा रहा था। अवसरवादी लोगों को संगठन से बाहर किया जा रहा था। व्यक्तिगत सत्याग्रह के उद्देश्यों को गांधीजी ने वायसराय को लिखे एक पत्र में इस प्रकार समझाया: 'कांग्रेस नाज़ीवाद की जीत के उतनी ही खिलाफ है जितना कोई भी अंग्रेज हो सकता है। लेकिन उनका उद्देश्य युद्ध में उनकी भागीदारी तक नहीं ले जाया जा सकता। और चूंकि आपने और भारत के राज्य सचिव ने यह घोषणा की है कि पूरा भारत स्वेच्छा से युद्ध प्रयासों में मदद कर रहा है, इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि भारत के अधिकांश लोग इसमें रुचि नहीं रखते हैं। वे नाज़ीवाद और भारत पर शासन करने वाली दोहरी तानाशाही के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं।'

प्रतिनिधि सत्याग्रह

नवंबर के मध्य में आंदोलन का दूसरा चरण शुरू हुआ। गांधीजी ने इसका नाम प्रतिनिधि सत्याग्रह दिया। इसमें भाग लेने के लिए कांग्रेस कार्य-समिति, महासमिति, केन्द्रीय और प्रांतीय कॉसिलों के सदस्यों में से सत्याग्रहियों का चुनाव किया गया। कई कांग्रेसी, जिनमें ज़्यादातर पूर्व मंत्री शामिल थे, सड़कों पर उतरे, नारे लगाए और उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। साल खतम होते-होते चार सौ कांग्रेसी विधायक जेल में थे। अन्य कई कांग्रेसी नेता गिरफ़्तार हुए। 15 मई 1941 तक 25 हज़ार से ज़्यादा सत्याग्रहियों को दंडित किया जा चुका था। गांधीजी ने सारा आंदोलन इस ढंग से संचालित किया था कि देश में कहीं उत्तेजना की कोई घटना न घटी और न वातावरण ही तनावपूर्ण हुआ।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

415. पृथक राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव

राष्ट्रीय आन्दोलन

415. पृथक राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव

1940

जिन्ना की चालों से हिन्दू-मुसलमानों के बीच दूरियां बढती जा रही थीगाँधीजी ने इसको रोकने की काफी कोशिश कीउनके ही सुझाव पर कांग्रेस ने 1940 के लिए अबुल कलाम आज़ाद को अपना अध्यक्ष चुना था। (रामगढ़ सत्र में 19 मार्च को कांग्रेस ने मौलाना आज़ाद को एम. एन. रॉय के विरुद्ध 1,864 वोटों के मुकाबले 183 वोटों से चुना था।) गांधीजी ने जिन्ना को लिखी चिट्ठी में उसे प्रिय क़ायद--आज़म कहकर संबोधित किया। ‘हरिजन में उसेमेरे पुराने दोस्त कह कर संबोधित कियाउन्होंने लिखा कि आप सभी गैर कांग्रेसी ताकतों की अगुआई करें, जिसमें दलितों के नेता आम्बेडकर और कांग्रेस के ख़िलाफ़ तमिलों को एकजुट करने वाले रामास्वामी नायंकर के अनुयायी भी होंगेलेकिन जिन्ना इस प्रलोभन में पड़ने वाला नहीं थाउसने जवाब दिया, मुझे इस मसले में  कोई गलतफहमी नहीं है कि हिंदुस्तान तो एक राष्ट्र है, एक देश, यह अनेक राष्ट्रीयताओं वाला एक उपमहाद्वीप है। कांग्रेस मंत्रिमंडल के त्यागपत्र देने के बाद उसने ‘मुक्ति दिवस’ मनाने की घोषणा कर दी। गांधीजी ने जिन्ना से मुक्ति दिवस रद्द करने की अपील की। ​​जिन्ना ने तर्क दिया कि गांधीजी ने अभियोक्ता और न्यायाधीश दोनों होने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने जिन्ना द्वारा लगाए गए आरोपों को मनगढ़ंत और लापरवाह और सांप्रदायिक शांति को खतरे में डालने वाला बताया। शिमला में गांधीजी के बाद, जिन्ना ने वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो से मुलाकात की। उसने लॉर्ड लिनलिथगो से इस बात पर ज़ोर दिया कि मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यक किसी भी समझौते या बातचीत में अपनी स्थिति की सुरक्षा को बहुत ज़रूरी मानते हैं। वायसराय ने उसे भरोसा दिलाया कि महामहिम की सरकार अल्पसंख्यकों के जायज़ हितों की रक्षा की ज़रूरत को पूरी तरह समझती है।

यह मार्च 1940 की बात है, जब देश भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के अधिकार को साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए गांधीजी के एक शब्द का बेसब्री से इंतजार कर रहा था, तभी मुस्लिम अलगाववाद ने राजनीतिक मंच पर ज़ोरदार एंट्री की।  जिन्ना ने कांग्रेस सरकारों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय भाषा को अपनाने पर आपत्ति जताई, और घोषणा की: "मुसलमान उनसे किसी भी तरह के न्याय या निष्पक्षता की उम्मीद नहीं कर सकते।" कांग्रेस नेतृत्व ने इस बिगड़ती स्थिति को देखकर लीग को मनाने और सांप्रदायिक मुद्दे का समाधान निकालने के लिए हर संभव कोशिश की। गांधीजी, राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस ने बारी-बारी से जिन्ना के साथ लंबी बातचीत की, जो बातचीत और चिट्ठी-पत्री के ज़रिए लंबे समय तक चली। लेकिन जिन्ना ने कांग्रेस के साथ किसी भी समझौते या तालमेल से साफ इनकार कर दिया। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुस्लिम लीग के मंच और प्रेस से चलाया जा रहा नफरत का अभियान बढ़ता गया, जब तक कि वह चरम पर नहीं पहुंच गया और मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव में सामने आया।

22 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग का सेशन लाहौर में हुआ। यह भारत की एकता और अखंडता और एक राष्ट्र के रूप में उसकी पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण सत्र साबित हुआ। यहाँ लीग ने पाकिस्तान को अपना मकसद बनाया। जिन्ना के लिए, भारत की मौजूदा एकता "बनावटी" थी, जो सिर्फ़ ब्रिटिश काल से थी और ब्रिटिश संगीन के दम पर कायम थी। कांग्रेस के शासन का दोहराव गृह युद्ध की ओर ले जाएगा। उसने कहा कि लोकतंत्र भारत के लिए सही नहीं है और "मुसलमान एक राष्ट्र हैं, राष्ट्र की किसी भी परिभाषा के अनुसार और उनके पास अपनी मातृभूमि, अपना इलाका और अपना राज्य होना चाहिए।"

अपने अध्यक्षीय भाषण में, जिन्ना ने "दो राष्ट्र" के सिद्धांत पर ज़ोर दिया: "इस्लाम और हिंदू धर्म, शब्द के सही मायने में धर्म नहीं हैं, बल्कि, असल में, अलग-अलग सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं, और यह सिर्फ़ एक सपना है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक कॉमन राष्ट्रीयता बना सकते हैं।" मुस्लिम लीग ने घोषणा की कि मुसलमानों को भारत के संबंध में ऐसी कोई वैधानिक योजना स्वीकार न होगी जो उत्तर-पश्चिम और पूर्व के मुस्लिम बहुमत वाले प्रदेशों को स्वतंत्र राज्य मानकर तैयार न की गई हो।

जिन्ना के मार्गदर्शन में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया: "यह तय किया जाता है कि ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के इस सेशन का यह सोचा-समझा विचार है कि इस देश में कोई भी संवैधानिक योजना तब तक काम नहीं करेगी या मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं होगी, जब तक कि उसे निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर डिज़ाइन नहीं किया जाता, यानी, भौगोलिक रूप से सटे हुए हिस्सों को क्षेत्रों में बांटा जाए, जिन्हें ऐसे क्षेत्रीय फेरबदल के साथ बनाया जाना चाहिए, जो ज़रूरी हों, ताकि जिन इलाकों में मुसलमान संख्या में ज़्यादा हैं, जैसे कि भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में, उन्हें मिलाकर 'आज़ाद राज्य' बनाए जाएं, जिनमें शामिल इकाइयां स्वायत्त और संप्रभु होंगी।"

अब राजनीतिक भू दृश्य काफ़ी जटिल हो गया था :  अब यह संघर्ष भारतीय बनाम ब्रिटिश नहीं रह गया था। अब यह कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश शासन, तीन धूरियों के बीच का संघर्ष था। मई में ब्रिटेन में एक सर्वदलीय मिली-जुली सरकार सत्ता में थी जिसमें शामिल लेबर पार्टी के सदस्य भारतीय आकांक्षाओं के प्रति हमदर्दी का रवैया रखते थे लेकिन सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल कट्‌टर साम्राज्यवादी थे। उनका कहना था कि उन्हें सम्राट का सर्वोच्च मंत्री इसलिए नहीं नियुक्त किया गया है कि वह ब्रिटिश साम्राज्य को टुकड़े-टुकड़े कर दें।

जब गांधीजी को दो राष्ट्रों के सिद्धांत और लीग की एक पृथक राष्ट्र की स्थापना की मांग के बारे में पता चला तो वे चकित रह गए। उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। धर्म का प्रयोजन लोगों के दिलों को मिलाना है, या अलग करना? उन्होंने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को ‘असत्य’ कहा। इससे कड़ा शब्द उनके शब्दकोश में था ही नहीं। गांधीजी ने मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव पर अपने तरीके से प्रतिक्रिया दी। उन्हें लगा कि अगर मुसलमान सच में बंटवारे पर अड़े हैं, तो इसे रोका नहीं जा सकता। 6 अप्रैल के हरिजन में एक लेख में उन्होंने लिखा: मैं आठ करोड़ मुसलमानों को बाकी भारत की इच्छा मानने के लिए मजबूर करने का कोई अहिंसक तरीका नहीं जानता, भले ही बाकी लोग कितने भी बड़े बहुमत में हों। मुसलमानों को भी वही आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिए जो बाकी भारत को है। लेकिन मुझे विश्वास नहीं है कि जब असली फैसले की बात आएगी, तो मुसलमान कभी भी देश के बंटवारे चाहेंगे। उनकी समझदारी उन्हें ऐसा करने से रोकेगी। उनका अपना स्वार्थ उन्हें रोकेगा। उनका धर्म उस साफ आत्महत्या को रोकेगा जिसका मतलब बंटवारा होगा। "दो राष्ट्र" का सिद्धांत एक झूठ है। लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव पर गांधीजी ने "एक हैरान करने वाली स्थिति" नाम के एक लेख में टिप्पणी की थी: "मुझसे एक सवाल पूछा गया है: 'क्या आप आम सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का इरादा रखते हैं, जबकि कायदे-आज़म जिन्ना ने हिंदुओं के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है और मुस्लिम लीग से भारत को दो हिस्सों में बांटने के पक्ष में एक प्रस्ताव पास करवा लिया है? अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपके इस फॉर्मूले का क्या होगा कि सांप्रदायिक एकता के बिना स्वराज नहीं मिल सकता?"

गांधीजी ने लिखा: ''जिन्ना और लियाकत अली कहते हैं कि मैं सत्ता पाने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करना चाहता हूँ और मैं सिर्फ़ हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता हूँ। मुझसे पूछा जाता है कि अगर मुसलमान इस आंदोलन से दूर रहने का फैसला करें तो क्या मैं फिर भी आंदोलन शुरू करूँगा? अगर यह पक्का हो जाए कि सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होने पर हिंदू-मुस्लिम दंगे होंगे तो फिर क्या किया जाना चाहिए? खाकसार हर जगह बैन नहीं हैं। कई जगहों पर वे काम कर रहे हैं। बीदर (हैदराबाद रियासत) में दंगे हुए। हिंदू दुकानों में दस दिनों तक लूटपाट होती रही और पुलिस ने दखल नहीं दिया। 'ऑल इंडिया मुस्लिम लीग' से 'इंडिया' शब्द हटाने की भी मांग हो रही है। क्या ऐसी स्थितियों में सविनय अवज्ञा आंदोलन किया जा सकता है? क्या हमारे पास ज़रूरी अहिंसा है?"

पाकिस्तान की मांग का मूल महान उर्दू कवि और देशभक्त इकबाल, जो एक बेहतरीन पैन-इस्लामिक विचारक थे, के 1930 के भाषण में खोजा जाता है। तब उन्होंने लीग का सभापतित्व करते हुए एक पश्चिमोत्तर भारतीय "एक मज़बूत मुस्लिम राज्य के गठन" की ज़रूरत का उल्लेख किया था। उनका यह सपना देश को विभाजित करने का कदापि नहीं था। इक़बाल ने इसे पाकिस्तान नहीं कहा था वे तो पश्चिमोत्तर भारत के मुस्लिम-बहुल इलाक़े का पुनर्गठन करके उसे भारतीय संघ में एक स्वायत्त इकाई बनाना चाहते थे।

अलग राष्ट्र का नाम 1930 के दशक के शुरुआती दिनों में ही ख्वाजा अब्दुल रहीम नामक एक व्यक्ति नेपाकज़मीन दिया थाकैंब्रिज में पढ़ रहे चौधरी रहमत अली के पंजाबी मुसलमान विद्यार्थियों के गुट को इस विचार का प्रणेता होने का श्रेय अवश्य दिया जा सकता है। 1933 में रहमत अली ने पहली बार इस नाम को छपवायारहमत अली ने 1933 में 'नाउ ऑर नेवर' नाम का एक पैम्फलेट प्रकाशित किया। इसमें उसने एक नई अस्मिता के लिए एक अलग राष्ट्रीय दर्ज़े की मांग की थी। इसका उसने पाकिस्तान नाम दिया था। इसके अंतर्गत पंजाब, अफ़ग़ान प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान आते। उस समय इस बात को गंभीरता से किसी ने भी नहीं लिया था, मुस्लिम लीग ने भी नहीं। लंदन में मौजूद मुस्लिम नेताओं ने इस योजना को "बचकाना और काल्पनिक" कहकर खारिज कर दिया। गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने तो इसे एक लड़के की सनक कहकर इसे टाल दिया था। इस बात के काफी सबूत हैं कि इस विचार को चर्चिल के नेतृत्व वाले टोरी नेतृत्व के कट्टरपंथी गुट और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों द्वारा समर्थित किया गया था।

जो 1933-34 में एक कल्पना जैसा लग रहा था, वह 1938-39 में मुस्लिम लीग के एजेंडे का मुख्य मुद्दा बन गया। 1937 के बाद लीग को एक सकारात्मक मंच की बहुत आवश्यकता थी। लीग का मानना था कि 1935 के अधिनियम के तहत केन्द्र में मज़बूत और हिंदू-प्रधान सरकार ही बनती। 1937 में इक़बाल ने जिन्ना से आग्रह किया था कि वह लीग का लक्ष्य रहमत अली के विचारों जैसा घोषित करेइस शायर ने 1930 में ही अलग मुसलमान देश बनाने के मांग की थीइक़बाल ने इसेपाकिस्तान नहीं कहा थालाहौर प्रस्ताव में भी यह नाम नहीं थायह तो प्रेस था जिसने इस पृथक राष्ट्र के नाम की ज़रूरत महसूस के और इसेपाकिस्तान का नाम दिया जिन्ना और मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया, एकजुट राजनीतिक प्रयास की परंपरा को नकार दिया और यह घोषणा की कि मुसलमान कोई राष्ट्रीय अल्पसंख्यक नहीं हैं, बल्कि एक राष्ट्र हैं जिसे एक अलग संप्रभु राज्य का अधिकार है।

1939 में लीग ने विभिन्न योजनाओं की जांच के लिए एक उपसमिति की स्थापना की। इसमें ज़फ़रुल हसन और हुसैन क़ादरी थे। इन्होंने पाकिस्तान, बंगाल, हैदराबाद और हिन्दुस्तान बनाने की  बात की। ये योजनाएं विभाजन की स्थिति तक पहुंचती नहीं दिखती थीं। 13 फरवरी 1940 को जिन्ना ने टाइम एंड टाइड के लिए लिखे एक आर्टिकल में, यह मानते हुए कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, यह दावा किया कि पश्चिमी तरह की डेमोक्रेसी भारत के लिए सही नहीं है। 23 मार्च 1940 को सिकंदर हयात ख़ान ने एक प्रस्ताव बनाया और उसे फ़ज़लुल हक़ ने प्रस्तुत किया था। इसमें मांग की गई थी, भौगोलिक रूप से जुड़ी हुई इकाइयों को क्षेत्रों में विभाजित किया जाए जो ऐसे हों, और जिनका आवश्यकतानुसार ऐसा क्षेत्रीय पुनर्गठन किया जा सके कि, संख्यात्मक दृष्टि से मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों, जैसे कि भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों का समूह बनाकर उन्हें स्वतंत्र राज्य बनाया जा सके जिनकी घटक इकाइयां स्वायत्त और सार्वभौम हों।

आरंभ में मुस्लिम नेताओं ने पाकिस्तान की बात को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया था। जिन्ना के लिए भी यह सौदेबाज़ी के आधार से अधिक कुछ नहीं था। वह तो इसका उपयोग कांग्रेस की राह में रोड़ा अटकाने के लिए किया करता था। पाकिस्तान की अवधारणा अंग्रेज़ों के लिए बहुत उपयुक्त थी। इसके माध्यम से भारत में संवैधानिक गतिरोध बनाए रख सकता था। अगस्त प्रस्ताव इसी तरह का एक प्रयास था। लेकिन जिन्ना को एक सीमा तक प्रोत्साहन देते हुए भी उसकी सभी मांगों को स्वीकार करने का अंग्रेज़ों का कोई इरादा नहीं था। ग़ैर-सरकारी मुस्लिम सलाहकारों को रखने के बारे में लीग का दावा, विस्तृत एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल में अधिक सीटें दिया जाना और यदि कांग्रेस भविष्य में काउंसिल में आने का निर्णय करे तो उसके साथ समानता की मांग – ये सब ऐसे मुद्दे थे जिसे अंग्रेज़ों ने ठुकरा दिया था। फलस्वरूप जिन्ना ने अगस्त-प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। अगले वर्ष उसने सिकंदर हयात ख़ान और फ़जलुल हक़ को नई राष्ट्रीय प्रतिरक्षा परिषद की सदस्यता अस्वीकार करने के लिए बाध्य किया था।

कुछ समय बाद लीग ने इस नाम को स्वीकार कर लियालाहौर प्रस्ताव में इस देश की सीमाओं का उल्लेख नहीं हुआ थाजिस जिन्ना को शुरू में अलग राष्ट्र की मांग को लेकर हिचक थी, अज वह उसकी वकालत कर रहा थायह मांग उसकी अब तक की चलाई हिन्दू-मुस्लिम एकता की विचार-धारा के ख़िलाफ़ थीमुस्लिम कौम में बढ़ाते अलगाववाद के कारण वह आज मुस्लिम राष्ट्र की वक़ालत कर रहा थालाहौर में जिन्ना ने कहा था, हिन्दू और मुसलमान कभी भी साझा राष्ट्रीयता नहीं विकसित कर सकते और एक राज्य के अधीन इन जैसी दो राष्ट्रीयताओं को, जिनमें एक अल्पसंख्यक और दूसरी बहुसंख्यक, एक ही जुए में जोत देने का मतलब, ऐसे राज्य की सरकार के सारे उसूलों को बर्बाद कर देना होगा जिन्ना ने यहाँ तक कहा था, पृथक मुस्लिम राज्य हासिल करने के लिए मैं अपना जीवन क़ुर्बान कर दूंगा

यह सब सुन गांधीजी नेहरिजन में लिखा था, कांग्रेस हिन्दू संस्था नहीं हैइसके अध्यक्ष मुसलमान हैंइसकी 15 सदस्यीय कार्य समिति के 4 सदस्य मुसलमान हैं हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्रीयताएँ नहीं हैंवे हो नहीं सकतेभारत के मुसलमानों को इस्लाम अपना लेने से उनके राष्ट्रीयता नहीं बदली है

जिन्ना ने जवाब दिया, निश्चित रूप से आज भारत प्रकृति द्वारा विभाजित है ... मैं समझ नहीं पाता कि इतनी हाय तौबा क्यों मची है? वह देश ही कहाँ है जिसे विभाजित किया जा रहा है?

गांधीजी ने जवाब दिया, मैं अपने पूरे अंतर्मन से मानता हूँ कि क़ुरान का ख़ुदा ही गीता का ईश्वर है

जिन्ना ने कहा, मैं अपने मजहब का अदना और स्वाभिमानी अनुयायी हूँपाकिस्तान के लिए लड़ना इसलाम के सेवकों का पवित्र कर्त्तव्य है, क्योंकि हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग सभ्यताओं के हैं, जो परस्पर विरोधी विचारों और अवधारणाओं पर आधारित हैं

जिन्ना ने निर्णय कर रखा था कि अगर अंग्रेजी सरकार कांग्रेस के आगे नहीं झुकती, तो वह जंग में अंग्रेजों का समर्थन करेगा इसका अर्थ था उसने सरकार के साथ अपने सहयोग को इस शर्त पर रखा कि वह भविष्य के संविधान के निपटारे के लिए कांग्रेस की योजना से सहमत नहीं होगी। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया था, अगर कांग्रेस के सर पर ताज रखा गया, तो मुसलमान बगावत कर देंगे युद्धकालीन साम्राज्यवादी रणनीति का एक महत्वपूर्ण अंग था लीग के दावों को बढ़ावा देना। अगस्त प्रस्ताव ने तो स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेज़ किसी भी ऐसी सरकार को दायित्व नहीं सौंपेंगे जिस पर अल्पसंख्यकों की स्वीकृति की मुहर न लगी हो। यह जिन्ना की उस मांग को स्वीकार करना था जिसमें उसने कहा था कि लीग ही केवल भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रवक्ता है। और अब वायसराय ने यह कह ही दिया था कि युद्ध के बाद सभी दलों के सहयोग से संवैधानिक समस्याओं का हल ढूंढा जाएगा और अल्पसंख्यकों (लीग) की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं करेगी। जिन्ना और मुस्लिम लीग मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन से ही पाकिस्तान की अपनी मांग पर अड़ी रही।

जिन्ना ने अंत तक पाकिस्तान की सीमाएं नहीं निर्धारित की और न इस संबंध में अपनी ओर से कोई प्रस्ताव रखा। पाकिस्तान भारतीय मुसलमानों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता की पूर्ति का साधन था। मुस्लिम लीग एक उभरते हुए राष्ट्रवाद की संस्था का रूप ले रही थी। इसकी केन्द्रीय शक्ति सत्ता-लोलुप थी और उसके व्यावसायिक हित स्पष्ट थे। दूसरे महायुद्ध के छिड़ जाने से युद्धजन्य परिस्थितियों ने बंटवारे की विचारधारा के प्रसार-प्रचार में और सहायता पहुंचाई। कांग्रेसी मंत्रिमंडल के इस्तीफ़े ने मुस्लिम लीग को राजनैतिक मंच हथियाने का अवसर दे दिया। पाकिस्तान की मांग से ब्रिटिश सरकार को अचंभा हुआ। लेकिन यह उनके हित में ही था। वह एक बार फिर से वह दुनिया को यह दिखा सकती थी कि भारत की वैधानिक प्रगति अंग्रेज़ों से नहीं भारतीयों के आपसी मतभेदों की ही वजह से रुकी हुई है। इसलिए ब्रिटिश सरकार का प्रोत्साहन जिन्ना और उसके पाकिस्तान की मांग को मिलता रहा।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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