सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 19. सूफ़ी रहस्यवाद-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


19. सूफ़ी रहस्यवाद-1

“और सूर्य चन्द्रमा एवं नक्षत्र सब उसी के आदेशपालक हैं। प्रत्येक वस्तु अल्लाह की सिरजी हुई है तथा आदेश भी अल्लाह ही का है, वह वरदान देने वाला ईश्वर है जो अनेक जगतों का पालनहार है।” (क़ुरआन : 7/54)

यही ग़ैब की बातें हैं, जिन्हें (हे नबी!) हम आपकी ओर प्रकाशना (वह़्यी) कर रहे हैं। इससे पूर्व न तो आप इन्हें जानते थे और न आपकी जाति। अतः आप सहन करें। वास्तव में, अच्छा परिणाम आज्ञाकारियों के लिए है। (क़ुरआन : 11/49)

रहस्यवाद सभी धर्मों के मूल में निहित है। रहस्यवाद की अवधारणा अंतिम सत्य के साथ आत्मा के साक्षात्कार की चाहत से निकली है। इस विचार को अक्सर 'शाश्वत दर्शन' कहा जाता है, जिसके अनुसार दुनिया के सभी धर्म अलग-अलग रास्तों से होते हुए एक ही परम सत्य (ईश्वर, ब्रह्म या चेतना) तक पहुँचते हैं। रहस्यवादी पारंपरिक धार्मिक क्रिया-कलापों जैसे प्रार्थना, उपवास और तीर्थयात्रा से ही संतुष्ट नहीं होते। उनके लिए बिना रहस्यवादी अनुभूति के धर्म अर्थहीन है। उन्हें गहरी और विस्तृत अनुभूति की पिपासा होती है। रहस्यवाद मूल रूप से शब्दों, कर्मकांडों और ग्रंथों से परे जाकर उस परम सत्ता का सीधा, व्यक्तिगत और आंतरिक अनुभव करने का मार्ग है। धर्म जहाँ एक सामाजिक और बाहरी ढांचा प्रदान करता है, वहीं रहस्यवाद उसकी आंतरिक आत्मा है। जब कोई साधक अपने धर्म की बाहरी परतों (नाम, रूप, नियम) को छोड़ देता है, तो वह उसी गहरे आध्यात्मिक सत्य पर पहुँचता है जहाँ सभी धर्म आपस में मिल जाते हैं। इसलिए, रहस्यवाद को सभी धर्मों का साझा धागा माना जा सकता है। सूफी संत बाहरी नियमों (शरीयत) से आगे बढ़कर तरीकत (आंतरिक मार्ग) को अपनाते हैं। वे संगीत, नृत्य (जैसे दरवेशों का घूमना) और प्रेम के माध्यम से अल्लाह से सीधे मिलन (फना) की बात करते हैं।

माना जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में जन्मा। बसरा में दसवीं सदी में कुछ तेजस्वी लोगों का एक दल था, जिसे इख़्वानुस्सफ़ा (पवित्र बिरादरी) कहा जाता था। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य धर्म और दर्शन, तथा विज्ञान और आस्था के बीच समन्वय स्थापित करना था। इस बिरादरी का मानना था कि इंसानी आत्मा ज्ञान और दर्शन के माध्यम से ही पवित्र (शुद्ध) हो सकती है और मोक्ष प्राप्त कर सकती है। रूढ़िवादी धार्मिक विरोध से बचने के लिए इसके सदस्यों ने हमेशा अपनी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी। यद्यपि यह एक गैर-सांप्रदायिक बौद्धिक आंदोलन था, अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि इस संगठन का गहरा झुकाव रहस्यवादी सूफीमत की ओर था, जो धार्मिक ग्रंथों के बाहरी अर्थ के बजाय उनके आंतरिक या गुप्त (बातिन) अर्थ पर अधिक जोर देते हैं। इख़्वानुस्सफ़ा ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'रसाइल' में एक आदर्श मनुष्य की कल्पना एक वैश्विक और बहु-सांस्कृतिक दृष्टिकोण से की है। उनके अनुसार, एक परिपूर्ण या आदर्श मनुष्य किसी एक संस्कृति, देश या धर्म की सीमाओं में बंधा नहीं होता, बल्कि वह दुनिया की सभी सभ्यताओं और आध्यात्मिक परंपराओं के बेहतरीन गुणों का एक अद्भुत मिश्रण होता है।

एक आदर्श मनुष्य की चर्चा करते हुए इस बिरादरी ने लिखा है, 

“एक आदर्श आदमी वह है, जिसमें इस तरह की उत्तम बुद्धि और विवेक हो जैसे कि वह ईरानी मूल का हो, अरब आस्था का हो, धर्म में सीधी राह की ओर प्रेरित हनफ़ी (इस्लामी धर्मशास्त्र की सबसे तार्किक और उदार शाखा के मानने वाले) हो, शिष्टाचार में इराक़ी हो, परम्परा में यहूदी हो, सदाचार में ईसाई हो, समर्पण में सीरियाई हो, ज्ञान में यूनानी हो, दृष्टि में भारतीय हो, ज़िन्दगी जीने के ढंग में रहस्यवादी (सूफ़ी) हो।”

यह वक्तव्य इस्लामी संस्कृति को स्पष्ट करता है। उसके उदार प्रवृत्ति को उजागर करता है। विविधता में एकता की कल्पना को साकार करता है। दुनिया भर की अच्छी-अच्छी विचार-धाराओं को अपनाकर सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया। सूफ़ीमत जिसका उदय पैगम्बर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ माना जाता है, उसके विकास में इस उदार मानसिक माहौल का बहुत बड़ा योगदान था। प्रारंभिक सूफ़ी संन्यासी थे। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. के कई साथियों ने उनके जीवन काल में ही संसार का त्याग कर दिया और सीधा-सादा पवित्र जीवन जीने लगे थे। उन्होंने स्वेच्छा से दारिद्र्य को अपना लिया था। वैराग्य सूफ़ीमत में एक अनिवार्य तत्व के रूप में अपना लिया गया था। सूफ़ियों ने तौबा (पश्चाताप) और तवक्कुल (ईश्वर में आस्था) पर अधिक बल दिया। वे ईश्वर की उत्कृष्टता की धारणा से काफ़ी प्रभावित थे। ऐसे कई पुण्यात्मा थे जिन्हें सत्य से साक्षात्कार की लगन लगी। ब्रह्म से व्यक्तिगत और सीधे अनुभूति की उनकी आकांक्षा थी। आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे रहस्यवाद की तरफ़ मुड़े। निश्चित रूप से सूफ़ी मत का स्रोत पैगम्बर मुहम्मद स. हैं। उनकी प्रकाशना के दो स्तर हैं, एक क़ुरआन, जिसे इल्मे-ए-सकीना (किताबी ज्ञान) कहा गया है, और यह सबके लिए है। दूसरा इल्म-ए-सिना (गुह्य ज्ञान) जो सूफ़ियों के लिए है। यह वह ज्ञान है जो किताबों (सफीना) को पढ़ने से नहीं, बल्कि एक गुरु (मुर्शिद या पीर) के दिल से सीधे शिष्य के दिल (सीना-दर-सीना) में स्थानांतरित होता है। इख़्वानुस्सफ़ा का मानना था कि आत्मा को मुक्त करने के लिए केवल बाहरी विज्ञान ही काफी नहीं है। आदर्श मनुष्य वही है जो अपनी आत्मा को पवित्र करके इस आंतरिक 'गुह्य ज्ञान' (इल्म-ए-सीना) को जाग्रत कर ले। इस ज्ञान के अनुसार, ईश्वर या परम सत्य को बुद्धि के तर्कों से सिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे केवल हृदय की शुद्धता से महसूस किया जा सकता है। सूफी संत बुल्ले शाह का एक प्रसिद्ध दोहा इस अंतर को स्पष्ट करता है:

"पढ़ पढ़ इल्म हज़ार किताबें,

कदे अपने आप नूं पढ़िया ई नहीं।"

अर्थात—हजारों किताबी ज्ञान पढ़ लिए, पर अपने भीतर के गुह्य ज्ञान को कभी नहीं जाना। इल्मे सीना वह आध्यात्मिक रोशनी या अंतर्ज्ञान है जो मनुष्य के भीतर के अहंकार को मिटाकर उसे सीधे परम चेतना (ईश्वर) से जोड़ती है। यह ज्ञान 'जानने' का नहीं, बल्कि 'हो जाने' का नाम है।

19.1 ख़िज़्रवाद

आगे बढ़ने के पहले सूफ़ियों के ख़िज़्रवाद के सिद्धांत पर एक नज़र डाल लें। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमयी अवधारणा है, जो सीधे तौर पर 'इल्म-ए-लदुन्नी' (ईश्वर द्वारा सीधे दिया गया गुह्य ज्ञान) और आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन से जुड़ी है। यह सिद्धांत पूरी तरह से क़ुरान के सूरह अल-कहफ़ में वर्णित पैगंबर मूसा और हज़रत ख़िज़्र की यात्रा पर आधारित है। इस कथा में, पैगंबर मूसा (जो शरीयत या बाहरी नियमों के प्रतीक हैं) हज़रत ख़िज़्र (जो बातिन या छिपे हुए ईश्वरीय रहस्यों के प्रतीक हैं) के साथ यात्रा करते हैं। ख़िज़्र कुछ ऐसे काम करते हैं जो इंसानी बुद्धि और कानून (ज़ाहिर) के हिसाब से गलत लगते हैं (जैसे एक नाव को तोड़ना, एक बच्चे की जान लेना, एक ढहती हुई दीवार को मुफ्त में ठीक करना)। लेकिन अंत में वे साबित करते हैं कि उनके इन कार्यों के पीछे एक गहरा, अदृश्य ईश्वरीय न्याय (बातिन) छिपा था। सिद्धांत का निचोड़ यह है कि इंसानी तर्कशास्त्र या बाहरी नियम हमेशा परम सत्य को नहीं समझ सकते। सच्चा ज्ञान (इल्मे सीना/लदुन्नी) तर्कों से परे होता है।

यह सिद्धांत उनके बाह्य ज्ञान (इल्म) और आंतरिक ज्ञान (मारिफ़) का प्रतीक है। धर्मशास्त्री (उलमा) दोनों के बीच कोई अंतर नहीं मानते हैं, जबकि सूफ़ियों का मानना है कि एक को दूसरे को लेकर हमें भ्रमित नहीं होना चाहिए। इल्म साधारण ज्ञान है। परमात्मा विषयक सूफ़ियों के रहस्यमय ज्ञान जिसे मारिफ़ कहते हैं, आध्यात्मिक और सच्चा ज्ञान है। जो हम आँखों से देखते हैं, वह सांसारिक ज्ञान है, इल्म है। इल्म की प्राप्ति मनुष्य की चेष्टा और शिक्षक की सहायता से होती है। जो ह्रदय जान पाता है वह सच्चा ज्ञान है। आंतरिक ज्ञान ईश्वर के विशेष ज्ञान का एक अंग है और इसे ईश्वर अपने विशेष बंदों को देता है। परमात्मा का ज्ञान जिसे ‘इल्म-ए-मारिफ़त’ कहा जाता है, के द्वारा परमात्मा को उसके पैग़म्बर और संत जान पाते हैं। यह सम्पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छा और अनुग्रह पर निर्भर करता है। यह उसे ही मिलता है जो इसके योग्य होते है। इन्हें ‘आरिफ़’ (ज्ञानी) कहते है। जिन्हें आंतरिक ज्ञान प्राप्त होता है वे वली (उत्तराधिकारी) कहलाते हैं। इनके प्रतिनिधि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हैं। खिज्र शब्द का अर्थ समुद्री रंग का हरापन होता है। कहा जाता है कि वे जहां बैठते थे वहाँ का रंग हरा हो जाता था। हरापन सूफ़ियों के लिए आत्मा के पुनर्जीवन और आंतरिक ताज़गी का प्रतीक है। वाह्य ज्ञान के प्रतिनिधि हज़रत मूसा अलैहि. हैं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. में ये दोनों ज्ञान (बाह्य और आंतरिक) एकत्र हो गए।

जो वाह्य ज्ञान के धारक हैं उन्हें आंतरिक ज्ञान के लिए वली की ओर आकृष्ट होना पड़ता है। उन्हें अपने धर्मगुरु पर कभी कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए, उसे पैगम्बर मूसा की तरह पूर्ण धैर्य रखना चाहिए। भले ही गुरु की कोई बात या क्रिया उसकी बुद्धि को समझ न आए, ईश्वर तक पहुंचने के लिए धर्मगुरु का अनुपालन अनिवार्य है। उसे गुरु के आंतरिक ज्ञान पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकि गुरु की दृष्टि 'ज़ाहिर' (दिखने वाले) से आगे 'बातिन' (अदृश्य भविष्य) को देख रही होती है। कुछ सूफ़ी संप्रदाय का मानना है कि ईश्वर अपने विशेष बंदों को सभी आंतरिक और वाह्य ज्ञान प्रदान करता है। सूफ़ियों का ख़िज़्रवाद यह स्थापित करता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर एक ऐसा क्षण आता है जहाँ इंसानी बुद्धि और किताबें काम नहीं आतीं। वहाँ केवल वही ईश्वरीय अंतर्ज्ञान काम आता है जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है, और हज़रत ख़िज़्र इसी सार्वभौमिक, शाश्वत और अदृश्य ईश्वरीय मार्गदर्शन के जीवंत प्रतीक हैं।

हज़रत खिज्र एक बहुत बड़े संत थे। उन्हें परमात्मा विषयक ज्ञान का पता था। वे परमात्मा के गुप्त नाम को जानने वाले थे। हज़रत खिज्र में सूफ़ियों को बहुत विश्वास है। परमात्मा के अनुग्रह प्राप्त संतों को परमात्मा के गुप्त नाम से परिचय कराना उनका काम था। ख़िज़्रवाद में हज़रत ख़िज़्र को 'अमर' माना जाता है। सूफ़ियों के अनुसार, उन्होंने 'आबे हयात' (अमरता प्रदान करने वाले जल) का पान किया था। इसलिए ऐसा माना जाता है कि संसार के अंत होने तक वे जीवित रहेंगे। यहाँ 'आबे हयात' कोई भौतिक पानी नहीं है, बल्कि यह ईश्वरीय चेतना और अमर आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है।

उनका नाम हज़रत अबुल अब्बास मलकान था, वे हज़रत मल्क़ान अलैहि. के पुत्र थे। हज़रत ख़िज़्र नूह अलैहिस्सलाम की आने वाली पीढ़ियों (वंशजों) में से थे। बताया जाता है कि हज़रत नूह़ अलैहिस्सलाम प्रथम मनुष्य हज़रत आदम अलैहिस्स्लाम के दसवें वंश में थे। उनके कुछ पहले तक लोग इस्लाम पर चले आ रहे थे। फिर अपने धर्म से फिर गये और अपने पुनीत पूर्वजों की मुर्तियाँ बना कर पूजने लगे। तब अल्लाह ने हज़रत नूह़ अलैहि. को भेजा। किन्तु कुछ के सिवा किसी ने उन की बात नहीं मानी। अन्ततः सब डुबो दिये गये। फिर हज़रत नूह़ अलैहि. के तीन पुत्रों से मानव वंश चला। इसलिये उन को दूसरा आदम भी कहा जाता है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के इतिहास में प्रसिद्ध बेटों के नाम साम, हाम, याफ़िस और याम/कनआन (जो सैलाब में डूब गए थे) मिलते हैं।

आम तौर पर सूफ़ी मत में किसी भौतिक गुरु (पीर या मुर्शिद) का होना अनिवार्य माना जाता है। लेकिन ख़िज़्रवाद के तहत एक विशेष अपवाद है जिसे 'उवेसी' सिलसिला कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई साधक सच्चा है और उसे कोई भौतिक गुरु नहीं मिल पा रहा है, तो हज़रत ख़िज़्र स्वयं अदृश्य रूप से प्रकट होकर उसे दीक्षा देते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं। महान सूफ़ी दार्शनिक इब्न अरबी ने स्वयं दावा किया था कि उन्हें आध्यात्मिक वस्त्र (ख़िरक़ा) सीधे हज़रत ख़िज़्र से प्राप्त हुआ था।

परमात्मा को बिना परमात्मा की सहायता के नहीं जाना जा सकता। प्रसिद्ध सूफी विद्वान ज़ुन्नून मिस्री का एक बहुत विख्यात कथन है: "मैंने परमात्मा को परमात्मा के ही माध्यम से जाना, और यदि परमात्मा न होते, तो मैं परमात्मा को कभी न जान पाता।" इसलिए ‘मारिफ़’ परमात्मा के द्वारा ही मिलता है। सूफी मानते हैं कि साधक (मुरीद) चाहे जितनी भी कठिन साधना, उपवास, या ध्यान (ज़िक्र) कर ले, वह अपने बलबूते परम सत्य को नहीं पा सकता‌। इंसानी प्रयास केवल हृदय के दर्पण को साफ़ करने के लिए हैं‌। उस साफ़ दर्पण में परमात्मा का जो प्रकाश चमकेगा, वह पूरी तरह से ईश्वरीय कृपा (फ़ज़्ल) पर निर्भर करता है‌। जब तक परमात्मा स्वयं को प्रकट नहीं करता, मनुष्य उसे नहीं जान सकता‌। सूफ़ी मारिफ़ को प्रकाश मानते हैं। इसके द्वारा ह्रदय आलोकित हो उठता है। जिसने ज्योतिस्वरूप परमात्मा से प्रकाश पाया है वह परमात्मा के एकत्व को देखने में समर्थ होता है। यह ज्ञान परमात्मा की ज्योति से ही ज्योतिवाला है इसलिए अंत में यह परमात्मा की ज्योति में ही जाकर मिल जाता है। इसलिए सूफ़ी प्रार्थना करता है, “हे परमात्मा, मेरे ह्रदय में प्रकाश दो, और मेरी कब्र में प्रकाश दो। मेरे श्रवन, मेरी दृष्टि और मेरे शरीर में प्रकाश दो। मेरे अन्तर की ज्योति को तीव्र कर दो। मेरे अंतर को प्रकाशित कर दो।” अपनी बुद्धि के द्वारा जो उस परमात्मा को जानना चाहता है वह एक सीमा तक ही आगे बढ़ पाता है। उसके बाद उसे अपनी असहाय अवस्था का बोध होने लगता है। वह परमात्मा से दया की भीख मांगता है। परमात्मा की दया से ही साधक उसे जान पाता है। सूफी मत में परम ज्ञान को मारिफ़त कहा जाता है‌। यह कोई ऐसा ज्ञान नहीं है जिसे इंसान अपनी बुद्धि, तर्कों या किताबों को पढ़कर 'अर्जित' कर सके‌। इसे 'इल्मे लदुन्नी' (वह ज्ञान जो सीधे ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलता है) कहा जाता है‌। सूफी संत सहल अल-तुस्तरी ने लिखा है कि वास्तविक स्मरणकर्ता मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा है जो मनुष्य के हृदय में अपना स्मरण जगाता है‌।

परमात्मा की सहायता (आकर्षण या जज़्बा) साधक के झूठे 'मैं' को मिटा देती है, जिसे सूफी 'फ़ना' (अहंकार का विलय) कहते हैं‌। जब इंसान का अस्तित्व ही नहीं बचता, तब केवल परमात्मा ही बचता है, और इस प्रकार परमात्मा ही स्वयं को जानता है‌। सूफियों का मानना है कि इंसान के दिल में ईश्वर के प्रति प्रेम भी उसकी अपनी इच्छा से पैदा नहीं होता‌। परमात्मा स्वयं अपने आनंद के लिए मनुष्य के हृदय में प्रेम की चिंगारी उत्पन्न करता है‌। कुरान की एक आयत का सूफी रहस्यवादी इस तरह अनुवाद करते हैं: "तुम ईश्वर को याद करते हो, क्योंकि ईश्वर ने तुम्हें याद किया है"‌। सूफीवाद में मनुष्य की स्थिति एक प्यासे की तरह है, लेकिन वह कुआँ तक तभी पहुँच सकता है जब पानी स्वयं उसे अपनी ओर खींचे। इसलिए, सूफी साधना में स्वयं के प्रयासों से अधिक परमात्मा की दया, प्रेम और सहायता की प्रार्थना की जाती है‌।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-32

महात्मा गांधी हत्या केस-32

21 जनवरी, 1948

21 जनवरी को हमले से अविचलित गाँधी जी अपना काम करते रहे। गांधीजी को चेतावनी दी गई थी। लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार का हथियारबंद संरक्षण लेने से मना कर दिया था। लेडी माउंटबेटन ने गांधीजी को सलामत बच जाने पर और विस्फोट के समय उनकी शांतिपूर्ण नि:संगतता पर बधाई दी, तो उन्होंने बताया कि वे साहस के लिए किसी प्रशंसा के अधिकारी नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने समझा कि वह शोर सेना की रोज़मर्रा की चांदमारी के कारण हुआ था। कुछ लोगों ने जब उन्हें विस्फोट के समय जरा भी न घबराने के लिए बधाइयां दी तो उन्होंने कहा : “सच्ची बधाई के योग्य तो मैं तब होऊंगा जब विस्फोट का शिकार होकर भी मैं मुस्कराता रहूं और हमला करने वाले के प्रति मेरे मन में जरा भी विद्वेष न हो।” गांधीजी ने निवेदन किया कि बम फेंकने वाले के प्रति नफ़रत का रवैया अख़्तियार न किया जाए। उसे समझा-बुझाकर सही रास्ते पर लाया जाए। शायद वह मुझे हिंदू धर्म का दुश्मन मानता है। गांधीजी ने आगे कहा कि नौजवानों को यह समझना चाहिए कि 'जो लोग उनसे अलग राय रखते हैं, वे ज़रूरी नहीं कि बुरे ही हों'। उन्होंने ऐसे नौजवानों के समर्थकों से कहा कि वे अपनी ऐसी हरकतें बंद करें। 'हिंदू धर्म को बचाने का यह तरीका नहीं है। हिंदू धर्म को सिर्फ़ मेरे तरीके से ही बचाया जा सकता है।' सिखों ने गांधीजी से मुलाक़ात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि हमला करने वाला व्यक्ति सिख नहीं था। गांधीजी ने पूछा, "इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि वह सिख था, हिंदू था या मुसलमान? मैं तो सभी हमलावरों का भला ही चाहता हूँ।"

20 जनवरी, 1948 को बिड़ला हाउस में बम धमाके के बाद, बॉम्बे के रामनारायण रुइया कॉलेज के प्रोफ़ेसर जगदीश चंद्र जैन ने बॉम्बे के मुख्यमंत्री बी.जी. खेर से संपर्क किया और उन्हें बताया कि वह मदनलाल की, जो एक ज़रूरतमंद शरणार्थी था, कई तरह से मदद कर रहे थे। उन्हें मदनलाल से ही पता चला था कि गांधीजी की हत्या की साज़िश रची जा रही थी। उन्होंने बी.जी. खेर को कुछ साज़िशकर्ताओं के नाम और कुछ अन्य जानकारियाँ भी दीं। बॉम्बे सरकार ने यह जानकारी सरदार पटेल को दी, जो केंद्र सरकार में गृह मंत्री थे, और साथ ही गांधीजी को भी इसकी सूचना दी।

बॉम्बे से मिली जानकारी के आधार पर, सरदार पटेल सुरक्षा इंतज़ाम कड़े करना चाहते थे। उन्होंने गांधीजी से कहा कि वे चाहते हैं कि पुलिस उनकी प्रार्थना सभाओं में आने वाले हर व्यक्ति की तलाशी ले। लेकिन गांधीजी ने इसके लिए, या प्रार्थना सभाओं में पुलिस की मौजूदगी के लिए, बिल्कुल भी सहमति नहीं दी। उनका मानना ​​था कि जब उन्होंने खुद को पूरी तरह ईश्वर की शरण में सौंप दिया है, तो प्रार्थना के समय किसी भी तरह की इंसानी सुरक्षा लेना उनके विश्वास के खिलाफ़ होगा। अगर वे सरदार के बताए सुरक्षा प्रस्ताव को मान लेते, तो यह उनके विश्वास का मज़ाक उड़ाने जैसा होता। उन्हें अपनी बात पर अड़ा देखकर, सरदार ने जो कुछ भी किस्मत में लिखा था, उसे स्वीकार कर लिया।

हत्या की साज़िश

20 जनवरी को बम फेंकने की ख़बर अगले दिन अख़बारों में छपी। टाइम्स ऑफ इंडिया, द स्टेट्समैन, बॉम्बे क्रॉनिकल में यह ख़बर बैनर शीर्षक से छपी। तब टाइम्स ऑफ इंडिया से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा था, "बम शक्तिशाली था और इससे कई लोगों की जान जा सकती थी। हैंड ग्रेनेड महात्मा गांधी को मारने के लिए था"। बॉम्बे क्रॉनिकल में रिपोर्ट छपी कि मदनलाल पाहवा ने बम फेंकने का गुनाह क़बूल लिया है और कहा कि वह महात्मा गांधी के शांति अभियान से ख़फ़ा था इसलिए उसने हमला किया था। 20 जनवरी, 1948 की बम घटना को गोडसे-आप्टे की अख़बार हिंदू राष्ट्र में प्रमुख स्थान दिया गया और शीर्षक था: गांधीजी की तुष्टिकरण नीति के खिलाफ नाराज हिंदू शरणार्थियों द्वारा दिखाई गई प्रतिनिधि कार्रवाई।

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नाथूराम गोडसे का भाई गोपाल गोडसे पिछली रात दिल्ली के फ़्रंटियर हिन्दू होटल में रुका। 21 जनवरी की सुबह फ़्रंटियर मेल से बॉम्बे के लिए निकलने का उसने प्लान बनाया था।

सुबह में पुलिस मदनलाल को लेकर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन गई। सुबह के समय दो गाड़ियां बंबई के लिए छूटती थीं। आठ बजे फ्रंटियर मेल और नौ बजे पंजाब मेल। गोपाल गोडसे अपनी रिवाल्वर ग्रेनेड के साथ नौ बजे छूटने वाली पंजाब मेल में बंबई जाने के लिए बैठ चुका था। करकरे उसे विदा करने के लिए स्टेशन तक आया था। तृतीय श्रेणी के उस डिब्बे में अपना कपड़े का बैग - जिसमें दोनों रिवॉल्वर और इस्तेमाल न किया गया हैंड ग्रेनेड था - अपनी सीट के नीचे रख दिया था। गाड़ी छूटने में अभी देरी थी, तो वह करकरे के साथ रेलवे कैंटीन में नाश्ता करने चला गया। जब वे चाय पी रहे थे, तो उन्होंने देखा कि दो पुलिस वाले एक आदमी को लेकर आ रहे हैं, जिसने अपना चेहरा भूरे रंग के कंबल में छुपा रखा था, सिर्फ़ उसकी आंखें दिख रही थीं। कंबल हटाए जाने से पहले ही उन्हें पता चल गया था कि वह आदमी मदनलाल है। उन्हें पूरा यकीन था कि उसने उनके नाम बता दिए हैं और उसे उन्हें पहचानने के लिए स्टेशन लाया गया है। वे छिप गए। चाय का कमरा बड़ा था, शायद चालीस फ़ीट लंबा और तीस फ़ीट चौड़ा, और वहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मदनलाल को चारों ओर अच्छी तरह देखने के लिए कहा गया, जबकि दो पुलिसवाले उसकी आँखों में पहचान के संकेत ढूँढ़ रहे थे। पूरा चक्कर लगाने के बाद, उसने अपना सिर हिलाया। उसे साथ ले जाने वाले पुलिसवालों ने फिर से उसके सिर पर भूरा कंबल डाल दिया और उसे बाहर ले गए। गोपाल ने करकरे से कहा, "यह हमारी किस्मत ही थी कि उसने हमारी तरफ़ नहीं देखा।" लेकिन गोपाल गलत था। जैसे ही मदनलाल के सिर से कंबल हटाया गया, उसने गोपाल और उसके अच्छे दोस्त करकरा सेठ को देख लिया था, लेकिन उसने ऐसा दिखाया जैसे उसने उन्हें देखा ही न हो और वह सीधे देखता रहा। अपनी जाँच पूरी करने के बाद ही उसने सिर हिलाया। वे उसे बाहर ले गए और ट्रेन की बोगियों की तलाशी लेने लगे। पुलिस ने प्लेटफार्म का चक्कर लगाया और मदनलाल को लेकर चली गई। गोपाल ने चैन की सांस ली और ट्रेन में बैठ गया। गाड़ी चल पड़ी। ट्रेन में गोपाल गोडसे के पास सोचने के लिए काफ़ी समय था।

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करकरे होटल गया और वहां से चेक आउट कर गया। वह रेलवे के वेटिंग रूम में दोपहर बाद जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा। पुलिस को दिए बयान में करकरे ने कहा था कि वह 20 तारीख की शाम को ही गोपाल से अलग हो गया था। बिड़ला धर्मशाला के बाहर फुटपाथ पर उसने रात गुज़ारी। दूसरे दिन वह हिन्दू महासभा भवन गया और वहां के लोगों से मदनलाल के लिए मदद की गुहार की। पर कोई सामने नहीं आया। फिर वह मदनलाल के रिश्तेदारों के यहां भी गया। दो दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद भी वह कोई मदद नहीं प्राप्त कर सका।

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मदनलाल की गिरफ़्तारी से जो लोग बहुत परेशान हुए थे, उनमें बॉम्बे में उसके प्रोफ़ेसर दोस्त डॉ. जे.सी. जैन भी शामिल थे। रामनारायण रूइया कॉलेज के प्राध्यापक जगदीश चन्द्र जैन ने गांधीजी पर हुए बम हमले की ख़बर सुबह के अख़बार में पढ़ी। तब उन्हें महसूस हुआ कि कुछ दिनों पहले मदनलाल ने खुद को एक गैंग में शामिल होने की जो बात कही थी, जो गांधीजी को मारना चाहता है, वह सच थी। हुआ यूँ था कि 13 जनवरी को जब पाहवा मुंबई में ही था और कोई भी षड्यंत्रकारी दिल्ली के लिए नहीं निकला था, तब पाहवा ने डॉ. जैन के माध्यम से समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से मिलने का समय माँगा था। लेकिन आखिरी वक़्त में एक दुर्घटना के कारण डॉ. जैन पाहवा की मुलाक़ात जयप्रकाश नारायण से नहीं करा पाए। जैन के कई दोस्तों को पता था कि वे मदनलाल को जानते हैं, और कम से कम एक दोस्त, अंगद सिंह को यह भी पता था कि मदनलाल ने उनसे इशारा किया था कि वे गांधीजी की हत्या की साज़िश में शामिल हैं। जैन ने इस जानकारी के बारे में पुलिस को कोई सूचना नहीं दी थी, और उन्हें यह एहसास ज़रूर हुआ होगा कि अगर मदनलाल ने अपने बयान में इस बारे में कुछ भी कहा, तो उनकी अपनी चुप्पी उन्हें मुश्किल में डाल सकती है। जैन चालीस साल के थे। उनके पास हिंदी में Ph.D. की डिग्री थी और वे एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। इस तरह, वे पढ़े-लिखे और अच्छे सामाजिक बैकग्राउंड वाले व्यक्ति थे, जो एक नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते थे। शुरू में मदनलाल की बातों को किसी शरणार्थी की डींगें मानकर नज़रअंदाज़ कर देना पूरी तरह से समझ में आने वाली बात है। लेकिन अब, मदनलाल के पकड़े जाने के बाद, जैन जानते थे कि जो कुछ उन्होंने सुना था, उसके बारे में किसी ज़िम्मेदार अधिकारी को बताना उनका साफ़ फ़र्ज़ है। फिर उन्हें यह डर भी लगा कि शिवाजी पार्क हिन्दू महासभा का गढ़ है, बाद में उनकी जान को खतरा भी हो सकता है।

आमतौर पर उन्हें रिपोर्ट करने के लिए सबसे पास के पुलिस स्टेशन जाना चाहिए था, लेकिन डॉ. जैन एक से दूसरे सरकारी विभाग फोन कर रहे थे। सरदार पटेल भी उस दिन बम्बई में ही थे लेकिन वो भी व्यस्त थे। बम्बई कान्ग्रेस के अध्यक्ष एस के पाटिल के बम्बई में मौजूद नहीं होने से उनसे मिलना सम्भव नहीं था। उन्होंने बंबई के  मुख्यमंत्री बी.जी. खेर से संपर्क किया। मुख्यमंत्री कहीं बाहर जा रहे थे, इसलिए उन्होंने कहा कि वे उनके गृह मंत्री मोरारजी देसाई से संपर्क करें। जैन साहब शाम के 4.00 बजे मोरारजी देसाई के कार्यालय में गए और उनको मदनलाल से 11 और 14 जनवरी को हुई बातचीत के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि मदनलाल उनका परिचित था और वह गांधीजी की हत्या के षडयंत्र की बात करता था। उन्होंने मदनलाल के साथियों के नाम खासकर करकरे सेठ के बारे में भी बताया। यह भी कहा कि करकरे सेठ और मदनलाल की सावरकर से मीटिंग भी हुई थी। उसने अपना नाम गुप्त रखने का निवेदन भी किया। जो कहानी डॉ. जैन ने मोरारजी को सुनाई थी, वह इतनी अनपेक्षित थी कि मोरारजी उस पर यकीन ही नहीं कर पाए। उन्होंने सोचा कि भला मदनलाल पाहवा भाषा के एक प्राध्यापक को अपने षड्यंत्र के बारे में क्यों बताएगा, जो कि उसे संयोग से बम्बई की व्यस्त गलियों में मिल गए थे? दूसरी बात, डॉ. जैन ये बात उन्हें बताने के लिए इतने उतावले क्यों थे? हालाँकि डॉ. जैन ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की थी, जो उनसे पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद अँग्रेज सरकार में 11 साल मजिस्ट्रेट रह चुके मोरारजी देसाई  उनसे संतुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने ख़ुश्क स्वर में डॉ. जैन से पूछा कि फिर तो आपको भी उन षड्यंत्रकारियों में से एक होना चाहिए। एक क्षण को वो हिल गए पर संभलते हुए उन्होंने एक और कोशिश की कि उन्हें दिल्ली भेजा जाए, हो सकता है कि पाहवा उन्हें अपनी योजना के बारे में बता दे। मोरारजी ने ये सुझाव भी एक तरफ सरका दिया और कोई ध्यान नहीं दिया। मोरारजी के पास पुलिस विभाग भी था, और अपने विभाग के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए उन्हें जैन से अपनी बात पुलिस को बताने के लिए कहना चाहिए था; कम से कम उन्हें यह सावधानी तो बरतनी ही चाहिए थी कि जैन जो कह रहे थे, उसका कोई रिकॉर्ड बनवा लें। इसके बजाय, उन्होंने जैन की बात गुप्त रूप से सुनी और हैरानी की बात है कि वे जैन की इस बात पर भी सहमत हो गए कि जानकारी का स्रोत 'पुलिस को भी न बताया जाए'। इसका एक नतीजा यह हुआ कि बाद में जैन और मोरारजी दोनों को इस बातचीत में कही गई बातों को याद करने के लिए पूरी तरह से अपनी याददाश्त पर निर्भर रहना पड़ा।

फिर भी  शाम के करीब 5 बजे जैन के चले जाने के बाद गृह मंत्री मोरारजी देसाई ने बॉम्बे के इंटेलिजेंस ब्रांच के इंचार्ज डिप्टी कमिश्नर, जमशेद डोराबजी नागरवाला (जिम्मी) को गुजरात मेल में बॉम्बे सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर शाम 8.30 बजे गुजरात मेल में आकर मिलने के लिए कहा। वे अहमदाबाद जा रहे थे। जमशेद दोराब नागरवाला को उनके दोस्त 'जिमी' कहते थे। उनमें अपनी नौकरी से जुड़े अच्छे गुण भी थे और कमियाँ भी। वे 34 साल के थे, लंबे-चौड़े और मज़बूत शरीर वाले थे; गोल चेहरे पर बड़ी-बड़ी गोल आँखें थीं, जिससे उनका चेहरा ऐसा नहीं लगता था कि वे सख़्ती दिखा सकें या अपराधियों को डरा सकें। वे पूरी तरह से अपने काम के प्रति समर्पित थे और उससे मिलने वाली ताक़त का आनंद लेते थे। उनके नीचे काम करने वाले लोग उन्हें बहुत मानते थे और उनके ऊपर के अधिकारी उन पर भरोसा करते थे। वे मोरारजी देसाई के प्रति भी पूरी तरह वफ़ादार थे, जो उन्हें अपना खास चहेता मानते थे, या कम से कम उन्हें अपना सबसे बेहतरीन पुलिसवाला समझते थे।

बंबई सेंट्रल पर जिम्मी नागरवाला आए तो देसाई ने उन्हें जैन का बिना नाम लिए सारी बातें बताई और जांचकर करकरे को गिरफ़्तार करने का हुक्म दिया साथ ही सावरकर पर नज़र रखने के लिए कहा तथा साज़िश रचने वालों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी इकट्ठा करें। उन्होंने यह भी कहा कि अहमदाबाद में वे देश के गृहमंत्री सरदार पटेल से मिलेंगे और उन्हें सारी बातों की जानकारी देंगे।

नागरवाला ने उस इन्फोर्मेशन के स्रोत के बारे में जानने की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। बस उसने शिवाजी पार्क स्थित सावरकर सदन के बाहर दो सादी वर्दी वाले पुलिस तैनात कर दिए। उसने अगर एक नज़र अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र अख़बार पर डाल ली होती, या पूना पुलिस से जानकारी हासिल कर ली होती, तो उसे उसके संपादक और प्रकाशक का नाम मालूम हो गया होता। करकरे सेठ का नाम दो-दो स्रोतों से आ रहा था, लेकिन उसने उसके बारे में भी अधिक तहकीक़ात नहीं की। अहमदनगर पुलिस से संपर्क न करके नागरवाला ने अपने भाई से संपर्क किया, जो वहां का मानद मजिस्ट्रेट था। दूसरे दिन उसके भाई ने बताया कि करकरे अहमदनगर में नहीं था। पता नहीं क्यों षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की चिंता न मोरारजी देसाई को थी और न पुलिस को।  पुलिस महकमे ने आलस्य और ढिलाई का परिचय देते हुए इस मामले की तफ़्तीश का कोई लिखित विवरण भी नहीं रखा था। शायद कोई तफ़्तीश हुई ही न हो। गाँधीजी की हत्या के षड्यंत्र के मामले में उच्च पदस्थ लोग इतने उदासीन हो चुके थे कि जैसे उन्हें गाँधीजी से कोई मतलब ही न हो। अगर 21 जनवरी को बॉम्बे के गृह मंत्री मोरारजी देसाई को डॉ. जैन ने जो बातें बताई थीं, उन पर सही समय पर ध्यान दिया गया होता, तो शायद 30 जनवरी को होने वाली त्रासदी टाली जा सकती थी। 21 जनवरी को, जैन ने बॉम्बे के गृह मंत्री को बताया कि गांधीजी की हत्या की साज़िश रची जा रही थी और इसमें मदनलाल के अलावा, अहमदनगर में रहने वाला करकरे नाम का एक व्यक्ति भी शामिल था।

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मदनलाल पाहवा को 21 जनवरी को 15 दिन के रिमांड पर लिया गया। संसद मार्ग पुलिस थाना से पाहवा को सिविल लाइंस लाया गया और 24 जनवरी तक पूछताछ चली।

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सुबह में आप्टे और नाथूराम कानपुर स्टेशन पहुंचे और विश्रामालय में चेक इन किया। रजिस्टर में नाथूराम ने अपना असली नाम लिखा। उसने अख़बार पर नज़र दौड़ाई और राहत की सांस ली कि पुलिस को मदनलाल के किसी अन्य साथी नाम बम कांड में नहीं आया है। 11.30 बजे की लखनऊ-झांसी ट्रेन से वे झांसी आए और वहां से दिल्ली-बंबई पंजाब मेल पकड़ा।

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इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर और आई.जी. पुलिस टी.जी. संजीवी, जिन्हें जांच का प्रभार दिया गया था, ने दिल्ली पुलिस के दो अधिकारी जसवंत सिंह, डी.एस.पी. और बालकिशन, इंस्पेक्टर, को 21 तारीख की शाम में विमान से बंबई के लिए प्रस्थान के आदेश दिए। इन अधिकारियों को बंबई के डी.सी.पी. जे.डी. नागरवाला को मदनलाल के इकबालिया बयान से अवगत कराना था। उसके बाद उन्हें पूना जाकर डी.आई.जी. पुलिस, सी.आई.डी., रावसाहेब गुर्टू को मदनलाल के इकबालिया बयान की कॉपी सौंपनी थी।

 

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मनोज कुमार

 

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