सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-11
10.18 सूफ़ीमत के अनुसार जगत
सूफी
मत के अनुसार जगत (ब्रह्मांड) ईश्वर की ही अभिव्यक्ति या उसका प्रतिबिंब है, जिसे उसने
अपने प्रेम और खुद को पहचानने की इच्छा के कारण प्रकट किया है। एक प्रसिद्ध हदीस-ए-कुदसी
के अनुसार, ईश्वर एक 'छिपा हुआ
खजाना' था और वह चाहता था कि उसे पहचाना जाए, इसलिए उसने
इस सृष्टि (जगत) की रचना की। इस सृष्टि के निर्माण के पहले अव्यक्त परमात्मा अपने
आप में ही था और सभी तत्त्व उसी में वर्तमान थे। वह अल-अमा की अवस्था में
था और संबंध-विहीन था। सूफ़ीमत (विशेषकर इब्न अल-अरबी और अब्दुल करीम अल-जीली के
दर्शन) के अनुसार, 'अल-अमा' वह अवस्था है
जो ईश्वर (अल्लाह) की पूर्ण अप्रकटता, परम अंधकार
और सृजन से पूर्व की निराकार स्थिति ('अगाध रहस्य' या 'अव्यक्त
ब्रह्म') को दर्शाती है। अरबी भाषा
में 'अमा' का शाब्दिक
अर्थ 'गहरा बादल', 'धुंध' या 'अंधापन' होता है। इसे
सूफी रहस्यवाद में 'परम रहस्य' या 'छिपा हुआ
खजाना' कहा गया है। यह ईश्वर (अल्लाह) के अस्तित्व
की वह सर्वोच्च और प्रारंभिक अवस्था है, जहाँ वह
सृष्टि के सृजन से पहले पूरी तरह से अदृश्य, निराकार और
अपनी ही सत्ता में लीन था। सूफ़ी दर्शन में यह अवस्था उस समय को दर्शाती है जब न
तो समय का अस्तित्व था, न अंतरिक्ष का और न ही किसी सृष्टि
या जीव की रचना हुई थी। यह अल्लाह की जात की वह अवस्था है जो समय, स्थान, दिशा और किसी
भी भौतिक सीमा से परे है. यहाँ न तो कोई सृष्टि थी, न देवदूत और
न ही कोई नाम या गुण प्रकट हुआ था। सूफियों के अनुसार, अल-अमा 'अस्तित्व' (हक़) और 'सृजन' (खल्क) के बीच की वह
सीमा है, जहाँ संसार केवल एक संभावना के रूप में
ईश्वर के ज्ञान में निहित था, लेकिन प्रकट नहीं हुआ था।
प्रामाणिक
हदीस ग्रंथों के अनुसार, जब सहाबी (पैगंबर के साथी) अबू
रज़ीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने पैगंबर मुहम्मद सल्ल. से पूछा कि सृष्टि के निर्माण
से पहले ईश्वर कहाँ था, तो उन्होंने उत्तर दिया था, "वह अल-अमा
(धुंध या बादल) में था, जिसके न तो
ऊपर हवा थी और न ही नीचे , और फिर उसने पानी पर अपने अर्श (सिंहासन)
का निर्माण किया।" सहीह बुखारी की एक और सबसे प्रसिद्ध हदीस
इस विषय को और सरल करती है, जिसमें पैगंबर ने फरमाया: "अल्लाह था और
उसके अलावा कुछ भी मौजूद नहीं था, और उसका अर्श
(सिंहासन) पानी पर था।" — (सहीह बुखारी,
3191) यह दोनों हदीसें मिलकर यह स्थापित करती हैं कि
ब्रह्मांड, समय, और दिशाओं को
बनाने से पहले ईश्वर (अल्लाह) का अस्तित्व अकेले था और वह किसी भी सांसारिक स्थान का
मोहताज नहीं था।
महान
सूफी विचारक इब्न अल-अरबी के अनुसार, ईश्वर के
भीतर छिपे होने की स्थिति से बाहर आने और 'जाने जाने' की इच्छा
पैदा हुई। इस इच्छा के कारण ईश्वर ने एक श्वास छोड़ी जिसे 'नफ़स
अल-रहमान' (परम दयालु की श्वास) कहा जाता है। महान
सूफी विचारक इब्न अल-अरबी के दर्शन के अनुसार, सृष्टि के
निर्माण की पूरी प्रक्रिया इसी "गहरी
आध्यात्मिक इच्छा" और "ईश्वरीय
श्वास" पर आधारित है। इब्न अल-अरबी उस प्रसिद्ध दार्शनिक कथन
(जिसे पहले 'छिपा हुआ खजाना' या कंज-ए-मखफी
के रूप में चर्चा की गई थी) का हवाला देते हुए कहते हैं कि शुरुआत में ईश्वर अपनी 'अहदियत' (परम एकांत और
शून्यता) में अकेला था। उनके अनुसार, ईश्वर की सभी
विशेषताएं (जैसे दया, ज्ञान, सृजनशीलता)
ईश्वर के भीतर गुप्त थीं और वे प्रकट होने के लिए 'तड़प' या 'कष्ट' महसूस कर रही
थीं। ईश्वर के भीतर यह तीव्र इच्छा पैदा हुई कि वह स्वयं को अपनी ही रचना के आईने
में देखे और पहचाना जाए। जब कोई इंसान बहुत अधिक तनाव या बेचैनी में होता है, तो वह राहत
पाने के लिए एक गहरी ठंडी सांस छोड़ता है। इब्न अल-अरबी इसी रूपक का उपयोग
करते हुए कहते हैं कि ईश्वर ने अपने भीतर छुपी विशेषताओं को प्रकट करने और उस 'आध्यात्मिक
बेचैनी' से राहत पाने के लिए एक श्वास छोड़ी। चूँकि
ईश्वर का मूल स्वभाव दया है, इसलिए इस श्वास को 'नफ़स
अल-रहमान' (परम दयालु की श्वास) कहा गया। यह
ईश्वरीय श्वास कोई भौतिक हवा नहीं थी, बल्कि यह वह
परम पदार्थ था जिसने पूरी शून्यता को भर दिया।
यही
श्वास 'अल-अमा' के रूप में
प्रकट हुई, जो सभी संभावित रूपों (सृष्टि के बीजों) को
अपने भीतर समेटे हुए है। संक्षेप में कहें तो, 'अल-अमा' सूफ़ीमत में
वह मूल बिंदु है जहाँ से सब कुछ उत्पन्न होता है और अंततः सूफी साधना के
सर्वोच्च शिखर पर सब कुछ इसी शून्य या परम सत्य में विलीन हो जाता है।
यही ‘हक़ीक़तुल
मुहम्मदिया’ है और सभी संबंधों से परे है। सूफ़ीमत (तसव्वुफ़) के अनुसार ‘हक़ीक़तुल
मुहम्मदिया’ का अर्थ 'मुहम्मदीय
सत्य' या 'मुहम्मद की
वास्तविक सत्ता' है। यह
पैगंबर मुहम्मद के भौतिक या ऐतिहासिक शरीर की बात नहीं करता, बल्कि उनकी शाश्वत
आध्यात्मिक चेतना और ब्रह्मांडीय प्रकाश को दर्शाता है जो सृष्टि के निर्माण
से भी पहले मौजूद था। सूफ़ी कॉस्मोलॉजी (ब्रह्मांड विज्ञान) के अनुसार, जब ईश्वर
(अल्लाह) ने इस ब्रह्मांड को बनाने का विचार किया, तो सबसे पहले
जो अस्तित्व प्रकट हुआ, वह पैगंबर मुहम्मद का आध्यात्मिक
प्रकाश था, जिसे ‘नूर-ए-मुहम्मदी’ कहा जाता
है। इसके बाद इसी प्रकाश के माध्यम से सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, मनुष्य और
अन्य सभी चराचर जगत का निर्माण हुआ। इस विषय में सूफी साहित्य में एक अत्यंत
प्रसिद्ध रिवायत कोट की जाती है, जिसे 'हदीस-ए-जाबिर' कहा जाता है:
सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि.) ने पैगंबर सल्ल. से पूछा: "अल्लाह ने
सबसे पहले किस चीज़ को पैदा किया?" पैगंबर सल्ल.
ने उत्तर दिया: "ऐ जाबिर! बेशक अल्लाह तआला ने तमाम
चीज़ों से पहले तेरे पैगंबर के नूर को अपने नूर से पैदा किया।"
यह, ईश्वर
(जो कि निराकार और परम सत्य है) और भौतिक संसार (जो कि दृश्यमान है) के बीच एक
माध्यम या पुल (बरज़ख-ए-कुबरा) की तरह कार्य करता है। ईश्वर का सारा ज्ञान और
उसकी अभिव्यक्तियाँ इसी माध्यम से संसार में प्रवाहित होती हैं। सूफ़ी मानते हैं
कि आदम से लेकर ईसा (जीसस) तक जितने भी पैगंबर और ऋषि-संत इस धरती पर आए, उन सभी ने
ज्ञान का प्रकाश इसी 'हक़ीक़तुल
मुहम्मदिया' से प्राप्त किया था। हक़ीक़तुल
मुहम्मदिया सूफ़ी मत का वह रहस्यवादी सिद्धांत है जो यह स्थापित करता है कि
संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल आधार और ईश्वरीय प्रेम का पहला प्रकटीकरण ही पैगम्बर मुहम्मद
सल्ल. की आत्मिक वास्तविकता है। सूफी रहस्यवादी इब्न अल-अरबी और अब्द अल-करीम
अल-जीली के दर्शन के अनुसार, नूर-ए-मुहम्मदी केवल एक
ऐतिहासिक व्यक्ति का वजूद नहीं है, बल्कि यह एक ब्रह्मांडीय वास्तविकता (हक़ीक़तुल मुहम्मदिया) है। जैसे एक विशाल पेड़ के वजूद का मूल
आधार एक छोटा सा 'बीज' होता है, उसी तरह
नूर-ए-मुहम्मदी वह बीज है जिससे पूरी सृष्टि रूपी वृक्ष (सूरज, चाँद, सितारे, इंसान) निकलकर फैला है। मौलाना जलालुद्दीन रूमी समझाते
हैं कि पैगंबर मुहम्मद ﷺ
इतिहास में भले ही बाद में आए, लेकिन उनका नूर सबसे पहला था:
"ज़ाहिरन आँ शाख़ अज़ मिश्कात-ए-अस्ल,
बातिनान अस्ल-ए-शाख
बद-ओ-अस्ल-ए-फस्ल."
अर्थ: बाहरी तौर पर वे (पैगंबर) सृष्टि रूपी वृक्ष की एक शाखा की तरह बाद में
दिखाई देते हैं, लेकिन आध्यात्मिक
(आंतरिक) रूप से वे उस वृक्ष की जड़ (बीज) हैं जिससे पूरी कायनात फूटी है।
मौलाना रूमी अपनी एक गजल में लिखते हैं:
"मुहम्मद अहमद-ए-मुरसाले कि नूर-ए-ओ अस्त शम्स-ओ-क़मर..."
अर्थ: पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. वह
चुनिंदे रसूल हैं, जिनका नूर ही इस
संसार में सूर्य और चंद्रमा बनकर चमक रहा है। यदि उनका प्रकाश न होता, तो ब्रह्मांड अंधकार में डूबा रहता।
हज़रत अमीर खुसरो (चिश्ती सूफी परंपरा), जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के
सबसे प्रिय शिष्य थे, उन्होंने
फ़ारसी और हिंदवी (पुरानी हिंदी/उर्दू) दोनों में नूर-ए-मुहम्मदी की प्रशंसा की
है। उनकी नातिया शायरी (पैगंबर की प्रशंसा) में यह दर्शन साफ झलकता है। खुसरो अपने
एक मशहूर फ़ारसी शेर में कहते हैं:
"शुद अज़ नूर-ए-मुहम्मद जहान रौशन,
ज़े-मशरिक ता ब-मगरिब सर-ब-सर गुलशन।"
अर्थ: पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के नूर से यह पूरा जहान रौशन हो गया; पूर्व से लेकर पश्चिम तक (पूरी पृथ्वी) उनके ही प्रकाश से एक महकता हुआ
बगीचा बन गई है।
अमीर खुसरो की प्रसिद्ध रचनाओं
(जो आज भी सूफी कव्वालियों में गाई जाती हैं) में अप्रत्यक्ष रूप से इसी
आदि-प्रकाश के प्रति समर्पण की बात है। वे सूफी मुर्शिद (गुरु) को उसी
नूर-ए-मुहम्मदी का आईना मानते हैं:
"खुसरो नैनों की सुई करूँ, पलकन का करूँ तागा,
साधु संत के चरनन में, मोहे नूर-ए-मुहम्मद जागा।"
अर्थ: यहाँ खुसरो कहते हैं कि संतों की संगति और सेवा से उनके भीतर वही 'नूर-ए-मुहम्मदी' (आध्यात्मिक
जागृति) जाग उठी है, जिससे ईश्वर की
पहचान होती है।
सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर ने अपने गूढ़ रहस्य को
अभिव्यक्त करने के लिए ही जगत की रचना की। सूफियों के अनुसार, ब्रह्मांड की
रचना किसी ज़रूरत या कमी के कारण नहीं हुई, बल्कि यह "ईश्वरीय
प्रकटीकरण" की एक लीला है। महान सूफी
दार्शनिक इब्न अल-अरबी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक फुसूस अल-हिकम में लिखते हैं
कि ईश्वर अपनी मूल अवस्था (अहदियत) में एक ऐसा सुंदर अस्तित्व था, जो अकेला था।
जैसे एक बेहद खूबसूरत व्यक्ति अपनी सुंदरता को देखने के लिए एक आईने की
इच्छा करता है, ठीक उसी तरह ईश्वर ने अपनी सुंदर विशेषताओं
(जैसे दया, न्याय, रचनाशीलता, जीवन) को
देखने और दिखाने के लिए इस ब्रह्मांड रूपी आईने को बनाया। इस जगत का कण-कण उसी एक
ईश्वर के अलग-अलग रहस्यों और रूपों को प्रतिबिंबित कर रहा है। ऊपर वर्णित रहस्यमयी
वाक्य में "छिपा हुआ खजाना" ईश्वर के
उन्हीं गूढ़ और अव्यक्त रहस्यों को दर्शाता है। जगत का निर्माण उस खजाने को खोलने
और उसकी भव्यता को प्रकट करने की प्रक्रिया है। सूफी मानते हैं कि ईश्वर ने
ब्रह्मांड रूपी आईना तो बना दिया, लेकिन उस आईने को साफ़ करने और
उसमें छिपे ईश्वर के रहस्यों को पूरी तरह "पहचानने" के लिए मनुष्य
(इंसान) को पैदा किया। मनुष्य के भीतर ही वह बुद्धि और दिल (क़ल्ब) है, जो ईश्वर के
इन गूढ़ रहस्यों को देख और समझ सकता है।
हज़रत हल्लाज के अनुसार
ईश्वर अपने स्वरूप का निरीक्षण कर अपने आप भी मंत्र-मुग्ध हो गया तथा उसके उस
आत्मप्रेम का ही जगत रूप में आविर्भाव हुआ। ईश्वर के अनुपम आनन्द का मूर्त विकास
मात्र विश्व की सृष्टि है। उसका उद्देश्य किसी साधारण अभाव या वासना की पूर्ति
नहीं है। परमात्मा को जब सृष्टि की रचना की इच्छा हुई तो, सूफ़ी साधकों
का विश्वास है कि परमात्मा ने हक़ीक़तुल मुहम्मदिया पर अपनी निगाह डाली। तब
वह गलकर सूर्य, चन्द्र, बुद्ध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि तथा
नक्षत्रगण के रूप में उत्पन्न हुई। नूरुल मुहम्मदिया पर निगाह डालने से
अग्नि, हवा, जल तथा
पृथ्वी का निर्माण हुआ तथा विश्व में वृक्ष, पशु, पक्षी, जीव-जन्तु
तथा मनुष्य का निर्माण हुआ।
एक
हदीस में कहा गया है, “अठारह हज़ार
जगतों में से तुम्हारा जगत (भौतिक दुनिया) एक है।” हदीस विज्ञान और इस्लामी विद्वानों के
अनुसार, इस संख्या की प्रामाणिकता और इसके स्रोत को
लेकर कुछ महत्वपूर्ण बारीकियाँ हैं। यह वाक्य सीधे पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के शब्दों (यानी 'मरफू' हदीस) के रूप
में प्रामाणिक हदीस ग्रंथों (जैसे सहीह बुखारी या मुस्लिम) में प्रमाणित नहीं है।
बल्कि, यह शुरुआती दौर के प्रमुख इस्लामी
विद्वानों और सहाबा (पैगंबर के साथियों) के बयानों में मिलता है। शुरुआती दौर के
महान इतिहासकार और विद्वान वहाब इब्न मुनाब्बिह का यह कथन सबसे प्रसिद्ध है, जिसमें
उन्होंने कहा था: "बेशक अल्लाह तआला के अठारह हज़ार
आलम (जगत) हैं, और यह दुनिया उनमें से केवल एक आलम
है।" सूफी संतों और इस्लामी दार्शनिकों ने "अठारह हज़ार
जगत" की अवधारणा को बहुत गहराई से स्वीकार किया है। उनके अनुसार 'आलम' का अर्थ केवल
अंतरिक्ष के ग्रह नहीं हैं, बल्कि इसका आध्यात्मिक अर्थ अधिक है।
सूफीमत में इस विचार को मनुष्य के आंतरिक अस्तित्व से जोड़ा जाता है। सूफी संत
मानते हैं कि यदि कोई इंसान अपनी आत्मा को शुद्ध कर ले और ईश्वर को पहचान ले, तो वह अपने
दिल के भीतर ही इन सभी अठारह हज़ार जहानों के रहस्यों को महसूस कर सकता है। यह
अवधारणा हमें यह सिखाती है कि हम ईश्वर की अनंत और विशाल सृष्टि का एक बहुत ही
छोटा सा हिस्सा हैं।
सृष्टि
और आध्यात्मिक चेतना के विकास को समझने के लिए सूफी मत (तसव्वुफ़) और इस्लामिक
रहस्यवाद के ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार अस्तित्व के पाँच प्रमुख जगत (आलम या
मरातिब-ए-खम्सा) माने गए हैं, जो परम सत्य (ईश्वर) से लेकर भौतिक
संसार तक फैले हैं। आत्मा को इन पांच स्थितियों के बीच से जाना होता है – ये हैं -
1. आलमे नासूत – (भौतिक जगत) तसव्वुफ़
में इसे शरीयत अवस्था कहा गया है। भारतीय दर्शन में इसे भौतिक जगत, साधारण चेतना
की अवस्था या नरलोक कहते हैं, जिसे हम अपनी इंद्रियों से देख और
महसूस कर सकते हैं। इसमें मनुष्य, जीव-जंतु, और सारी
प्रकृति के भौतिक शरीर आते हैं। कहीं-कहीं नासूत को आकाश कहा गया है।
2. आलमे मलकूत – (आत्मिक या
देवलोक जगत) तसव्वुफ़ में इसे तरीकत अवस्था कहा गया है। भारतीय दर्शन में
इसे ओम्कार भी कह सकते हैं। इसे स्वप्न अवस्था या देवलोक भी कहा
गया है। इसमें जो चेतना होती है उसकी तुलना स्वप्न से की गई है। इसको सूक्ष्म जगत, चित्र जगत और
अमिट रूपों का जगत कह सकते हैं। इसमें फरिश्ते (देवदूत) और आत्माएं निवास करती
हैं। यह भौतिक जगत से ठीक ऊपर का स्तर है।
3. आलमे जबरूत – (महाशक्ति या
देवत्व का जगत) तसव्वुफ़ में इसे मारिफ़त अवस्था कहा गया है। भारतीय
दर्शन में यह शक्ति है। इस आनंदमय जगत में सुख-दुख आदि द्वन्द्व नहीं है।
यह अवस्था बेखुदी या तल्लीनता की है। इसकी तुलना सुषुप्ति से की जा सकती है। यह वह
गहरी नींद है जिसमें सपने दिखाई नहीं देते। यह ऐश्वर्यलोक है। यह ईश्वरीय शक्ति, प्रभाव और
आदेश (कुन फायाकुन -
"हो जा और वह हो गया") का क्षेत्र है। यहाँ दिव्य
गुणों और आंतरिक प्रेरणाओं की प्रधानता होती है।
4. आलमे लाहूत – (दिव्यता का
जगत) तसव्वुफ़ में इसे हक़ीक़त अवस्था कहा गया है। भारतीय दर्शन में इसे सत्य
या ब्रह्म कहा गया है। यह सबसे ऊंची अवस्था है, जिसे तुरीय अवस्था भी
कहा जाता है। यह माधुर्यलोक है, यह सत्य, तत्व और एकत्व
की अवस्था है। यह शुद्ध परमात्मा और ईश्वरीय स्वरूप का जगत है। यह वह स्तर है जहाँ
ईश्वर के गुणों का बोध होता है, और यह सृजन की शुरुआत का चरण माना
जाता है।
5. आलमे हाहूत – (परम अज्ञात
रहस्य का जगत) यह शांति जगत या रहस्यपूर्ण जगत है। यह सूफी दर्शन में सबसे सूक्ष्म
और सर्वोच्च अवस्था है। यह ईश्वर की वह निराकार और अज्ञेय मूल सत्ता है, जिसके बारे
में कोई भी विशेष परिभाषा या कल्पना नहीं की जा सकती।
सूफी साधना का मुख्य उद्देश्य साधक (सालिक) की
आत्मा को 'नासूत' (भौतिक संसार)
से ऊपर उठाकर 'हाहूत' (परम सत्य)
में लीन करना होता है।
10.19. ईश्वर और जगत का संबंध
अधिकांश
सूफ़ियों का मानना है कि ईश्वर जगत से परे रहकर भी उसमें लीन है। सूफी दर्शन में इस
विचार को बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सूफी संत के अनुसार ईश्वर सृष्टि के
कण-कण में मौजूद है। ईश्वर इस भौतिक संसार के बंधनों और सीमाओं से पूरी तरह परे
है। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी रचनाओं में दिखाया कि ईश्वर संपूर्ण जगत
में व्याप्त है, फिर भी वह सब माया से दूर है। सूफी साधना
में सांसारिक प्रेम (इश्क-ए-मजाजी) को माध्यम बनाकर ईश्वर (इश्क-ए-हकीकी) तक
पहुँचने का प्रयास किया जाता है।
कुछ सूफ़ियों
का मानना है कि ईश्वर और जगत भिन्न-भिन्न नहीं हैं तथा ईश्वर ही जगत का रूप है। हज़रत हुजवीरी के अनुसार
ईश्वर और जगत दोनों भिन्न-भिन्न हैं तथा ईश्वर जगत से बाहर है। बहुत से सूफ़ियों का
मत है कि ईश्वर न तो जगत में लीन है और न ही उसके बाहर है। वह जगत के बाहर भी है
और अन्दर भी। वास्तव में ईश्वर का रूप अकल्पनीय तथा अचिन्तनीय है। सूफियों के लिए
ईश्वर दुनिया से अलग भी है और इसके भीतर समाया हुआ भी है।
तसव्वुफ़
विचारधारा ने जीव और जगत को ब्रह्म मान लिया। सूफ़ियों को सृष्टि के कण-कण में
ईश्वर नज़र आने लगे। सूफ़ियों के मतानुसार उस ईश्वर की प्रकृति में वनस्पति, पशु, पक्षी, जीव आदि में
अंग-प्रत्यंग की छाया है। सूफ़ी सन्त उसी सौन्दर्य पर मुग्ध होकर मूल सौन्दर्य का
दर्शन करना चाहते हैं तथा उसी में लीन रहना अपना उद्देश्य समझते हैं।
डॉ. रामनाथ
शर्मा का कथन है कि सूफ़ियों के अनुसार सृष्टि की
रचना 'रूह' के कारण हुई
है। यही वह शक्ति है जो व्यक्ति को ईश्वर की झलक दिखाती है क्योंकि जीव, अल्लाह का
प्रतिबिम्ब है, अतः प्रकृति के साथ उसका गहरा संबंध है। प्रकृति द्वारा ईश्वर अपने
आत्म-दर्शन की कामना पूरी कर लेता है, परन्तु मानव जब प्रकृति में स्वयं को देखता
है, तब वह भ्रम में पड़ जाता है। परन्तु जब वह प्रकृति के सौन्दर्य को ईश्वर का
सौन्दर्य समझता है, तभी उसका मोह टूट जाता है और ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है।
परमात्मा और आत्मा का रागात्मक संबंध सूफ़ीमत की विशेषता है। जाने अनजाने सभी
जीवधारी इसके लिए सचेष्ट रहते हैं कि वे फिर अपने उद्गम-स्थल यानी परमात्मा को लौट
जाएं। इस प्रकार प्रकृति के सौन्दर्य में एकात्मक भाव की कल्पना करने पर साधक
ईश्वर की अनुभूति 'अन-अल-हक़' को प्राप्त
हो जाता है। परमात्मा को जाने के लिए अपने आपको जानना ज़रूरी है। परमात्मा में लौट
जाने के लिए जिस साधना की ज़रुरत है उसके लिए यह ज़रूरी है कि मनुष्य अपने आपको,
अपने शरीर को, अपनी आत्मा को जाने।
एक दिन हज़रत राबिया रह. अपनी कुटिया के अंदर बैठी हुई
थीं। सुबह का समय था। हज़रत हसन रह. उनसे मिलने पहुंचे। बहुत सुहावना मौसम था।
सूर्योदय हो रहा था, पक्षी बाहर अपनी मधुर ध्वनि में चहचहा रहे थे, पेड़-पौधे हवा
में मस्ती से झूम रहे थे। हज़रत हसन बाहर से पुकारते हुए कहते हैं, “हज़रत राबिया, आप अंदर बैठी क्या कर
रही हैं? बाहर तो आइए। अल्लाह ने आज कितनी सुंदर सुहानी सुबह को जन्म दिया है।”
हज़रत राबिया ने हंसते हुए कहा, “बाहर तो केवल अल्लाह की सृष्टि है
और यहां अंदर अल्लाह ख़ुद मौज़ूद हैं। आप ही अंदर क्यों नहीं आ जाते? यह ठीक है कि
सुबह बहुत ख़ुशनुमा है, लेकिन इसका उस सृजनहार से कोई मुक़ाबला नहीं जो सभी सुबहों
का सृजन करता है।”
जग चक्की है, जीव अन्न है, नाम प्रभु का कील।
ज्यों
इस जग से बाचा चाहो, जाओ कील में मील॥
*** *** ***
मनोज
कुमार