बुधवार, 24 जून 2026

490. दिल्ली में उपद्रवों का वहशियाना तांडव

राष्ट्रीय आन्दोलन

490. दिल्ली में उपद्रवों का वहशियाना तांडव

1947

कलकत्ता और बंगाल में वातावरण अब शांत था। अपने शांति-मिशन के काम को ज़ारी रखने के लिए वे पंजाब यात्रा के लिए निकल पड़े। पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत और सिंध में आग की भीषण लपटें उठ रही थीं। रावलपिंडी में हिन्दू क़त्लेआम के समाचार आ रहे थे। अमृतसर आदि शहरों में मुसलमानों के साथ मार काट शुरू हो गया और फिर लाहौर में यही सब होने लगा। पंजाब के दोनों तरफ मुख्य रूप से यह सिखों और मुसलमानों के बीच उन्माद का चरमोत्कर्ष था। लगभग एक करोड़ लोग अपना घर-बार छोड़ कर आसरा ढूँढने के लिए सरहद के इस पार आ रहे थे। भीषण आपाधापी थी। कैम्पबेल ने अपनी डायरी में लिखा था, मैं पतली सड़कों पर रेंगते हुए, शरणार्थियों की साठ मील से अधिक लंबी कतारों के ऊपर से उड़ा जिसमें परिवार अपना सब-कुछ गाड़ियों पर लादे चले जा रहे थे।

7 सितंबर, 1947 को गांधीजी रात को नौ बजे बेलूर स्टेशन से विदा हुए। उन्हें विदा करने मुख्यमंत्री प्रफुल्ल घोष और सुहरावर्दी आए थे। जब ट्रेन छूटी तो सुहरावर्दी की आंखों से अश्रु की धारा बह रही थी। जाना तो वे पंजाब चाह रहे थे लेकिन जा न पाए। उनकी इच्छा थी कि पंजाब में सांप्रदायिक घृणा की कौंधती लपटों पर ‘पानी की एक बाल्टी डाल सकें’। लेकिन जब 9 सितंबर को कलकत्ता मेल से गांधीजी दिल्ली पहुंचे तो उन्हें पता चला कि पंजाब को हिला देने वाले पागलपन का केन्द्र अब दिल्ली था। स्टेशन पर सरदार पटेल उन्हें लेने आए थे। सरदार ने रास्ते में गांधीजी को बताया, उच्छृंखल हिंसा और भीषण उपद्रवों का वहशियाना तांडव दिल्ली को अपनी जकड़ में लिया हुआ है और इसके कारण वहां का कामकाज ठप्प हो गया है। देश की राजधानी दिल्ली सुलग रही है। नेहरू के नेतृत्व में सरकार ने निष्पक्षता से और बड़ी फुर्ती से काम किया है। सेना के ज़ोर पर शहर में श्मशान सी निर्जीव शांति छाई हुई है।

बिरला भवन

4 सितम्बर से राजधानी में साम्प्रदायिक दंगे फूट पड़े थे। शहर में 24 घंटे का कर्फ़्यू लगा हुआ था। सेना बुला ली गई थी। सड़कों पर लाशें बिछी हुई थीं। इस बार गांधीजी को भंगी बस्ती की झोंपड़ी में नहीं लाया गया। भंगी कॉलोनी का उनका घर शरणार्थियों को दे दिया गया था, इसलिए कलकत्ते से लौटने के बाद गांधी जी को घनश्यामदास बिरला के नई दिल्ली के बिरला भवन ले जाया गया। सरकार की सारी सुख-सुविधाओं से लैस बिरला भवन में गांधीजी ख़ुद को कलकत्ते से अधिक असहाय महसूस कर रहे थे। दिल्ली पर पुलिस और सेना द्वारा थोपी गयी शांति से गांधीजी भला कैसे संतुष्ट हो सकते थे। वह हिन्दू और मुसलमानों के दिल से हिंसा को दूर करना चाहते थे। काम बड़ा ही दुसाध्य था। राजधानी में कई शरणार्थी कैम्प थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान से भाग कर आये हिन्दू और सिख शरणार्थी भरे थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान सीमा के पार जाने की प्रतीक्षा में पड़े थे।

मुसीबत की जो कहानियां गांधीजी ने सुनी, उनसे उनकी अन्तरात्मा को भारी आघात पहुंचा। अन्न की दुकानें लूट ली गई थीं। खाने-पीने का सामान मिलना मुश्किल हो गया था। डॉ. जोशी जैसे मशहूर सर्जन, जो एक मुसलमान पेशेण्ट देखने जा रहे थे, को एक मुसलमान घर से गोली चलाकर मार दिया गया था। समाज-विरोधी तत्वों का बोलबाला था। हिंसा अचानक शुरू हुई थी और कुछ ही दिनों में इसने इतना विकराल रूप धारण कर लिया था कि जब तक कुछ हो पाता तब तक मानवीयता के तमाम मूल्य ताक पर रख कर बर्बरता ने दोनों तरफ के कमजोर अल्पसंख्यकों के साथ नंगा नाच खेला था। पश्चिम पंजाब से आने वालों शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। वे भयंकर कहानियां लेकर आए थे। गांव के गांव बरबाद कर दिए गए थे। औरतों की बेइज़्ज़ती कर दी गई थी और उन्हें लूट के माल की तरह बांटा गया था। कभी-कभी तो खुले आम बेचा गया था। शिशुओं को भाले से गोद-गोद कर मार डाला गया था। ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन किया गया था। निराश्रितों के काफिले और ट्रेनों पर हमले किए गए थे। दिल्ली में जो कुछ हुआ, वह सीधे-सीधे इन्हीं कहानियों का परिणाम था। साम्प्रदायिक ज़हर पुलिस और सेना में भी घुस गया था। गांधीजी का दिल आर्तनाद कर उठा, क्या दिल्ली के नागरिक पागल हो गए हैं? क्या उनमें कुछ भी इंसानियत नहीं बची है?

संयुक्त रक्षा परिषद की सलाह पर पंजाब बाउंड्री फ़ोर्स को 31 अगस्त की रात से समाप्त कर दिया गया था। सीमा पर शांति बहाली के लिए अब दोनों देशों की कानून-व्यवस्था का उत्तरदायित्व था। माउंटबेटन की भी सारी जिम्मेदारियां समाप्त हो गई थीं, और वह शिमला में विश्राम करने चला गया था। दिल्ली की घटनाओं के कारण उसने अपनी छुट्टियां रद्द कर दी और 5 सितम्बर को दिल्ली आ गया। माउंटबेटन की अध्यक्षता में आपातकालीन समिति की बैठक हुई। दिल्ली को अशान्त क्षेत्र घोषित कर दिया गया। दंगाइयों को देखते ही गोली मार देने के आदेश दिए जा चुके थे। दिल्ली में हर चौथा आदमी शरणार्थी था। लिखित इतिहास में सबसे बड़ा पलायन हो रहा था। पंजाब की दोनों सीमाओं के पार कोई एक करोड़ लोग इधर से उधर आ-जा रहे थे। शरणार्थियों के आवागमन के लिए लगभग सभी प्रकार के यातायात संसाधनों का उपयोग किया जा रहा था। 27 अगस्त से 6 नवम्बर के बीच 673 ट्रेनें चलाई गईं, जिन्होंने 27,99,000 लोगों को अपने गन्तव्य तक पहुंचाया था। 4,27,000 से अधिक ग़ैर-मुसलमान और 2,17,000 से अधिक मुसलमानों को 1,200 मोटर वाहनों से ढोया गया था। 963 हवाई जहाजों द्वारा 27,000 लोगों को सीमा पार कराया गया। लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। इससे कहीं अधिक लोग सड़क के रास्ते पैदल आए। साफ-सफाई की पर्याप्त सुविधा न रहने के कारण महामारी का ख़तरा बना हुआ था। सामने आते और विपरीत दिशा में जाते शरणार्थियों के कारवां पर हिंसक वारदात होने की संभावना बनी रहती थी। सीमा के दोनों ही तरफ़ अल्पसंख्यकों के ऊपर भीषण अत्याचार हो रहे थे। सरकार और कांग्रेस के नेताओं के सामने सिर्फ़ एक आशा की किरण थीमहात्मा गांधी! क्या वो कलकत्ता वाला कोई चमत्कार कर दिखाएंगे?

दिल्ली को सांप्रदायिक आग की लपटों में जलता छोड पंजाब जाने का कोई तुक गांधीजी की समझ में न आई। सरकार ने स्थिति को संभालने में काफी मुस्तैदी दिखाई थी। लेकिन पुलिस और सेना के ज़ोर से थोपी हुई शांति से गांधीजी भला कैसे संतुष्ट हो सकते थे! लोगों के दिलों से ही हिंसा और घृणा को मिटाना होगा। काम बहुत ही कठिन था। राजधानी में कई शरणार्थी कैंप थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान से भागकर आए हुए हिन्दू और सिख शरणार्थी भरे हुए थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान सीमा के पार जाने के इंतज़ार में पडे थे। गांधीजी के लिए यहां जख्मों पर करुणा का मरहम लगाने के सिवा कुछ नहीं बचा था। दिल्ली में अपने पहले सार्वजनिक वक्तव्य में गांधीजी ने कहा, मुझे मुस्लिम, सिख या हिंदू नेताओं में कोई नज़र नहीं आता है जो मुझे अपने-अपने समुदाय के शरारती तत्त्वों पर नियंत्रण करने में सहायता दे सके। लेकिन उनका यह विश्वास अडिग बना रहा कि विद्वेष और हिंसा की उत्तरोत्तर वृद्धि का अन्त केवल प्रेम और अहिंसा से ही हो सकता है। उन्होंने कहा, जब तक दिल्ली में फिर से शांति बहाल नहीं हो जाती, तब तक मैं इस स्थान को नहीं छोड़ सकता।

10 सितम्बर से गांधीजी ने शहर के उपद्रव पीड़ित भागों का दौरा करना शुरू कर दिया। पहले ही दिन उन्होंने इकतालीस मील का दौरा किया। उस दिन का आरंभ उन्होंने हुमायूं मक़बरे के पास अरब की सराय से किया। वहां पर अलवर और भरतपुर से आए मुसलमान पाकिस्तान ले जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। मुसलमानों ने कहा, हममें से कोई भारत से जाना नहीं चाहता। गांधीजी ने उनकी सहायता करने का वचन दिया। फिर वे ओखला स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय गए। आसपास के गांवों के मुसलिम लोगों ने वहां शरण ले रखी थी। वहां के उपकुलपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन थे। कुछ दिनों पहले ही उनपर भी जालंधर में भीड़ का जानलेवा हमला हुआ था। गांधीजी ने कहा, यदि डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे पुरुष भी सुरक्षित नहीं हैं, तो भारत में जीकर क्या करना? यहां के बाद वे दीवान हॉल गए जहां हिन्दू निराश्रितों का शिविर था। लोगों ने गांधीजी को कठोर हृदय का व्यक्ति कहा और आरोप लगाया कि आपको हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों से अधिक सहानुभूति है। मुसलमान नंबर एक कह कर उन पर लांछन लगाया गया कि उनको पीड़ित हिन्दुओं की चिंता कम थी बनिस्बत उन लोगों की जिन्होंने जानबूझकर इस पीड़ा को जन्म दिया था। वे हिन्दू ‘पंचमांगी’ हैं, मोहनदास गाँधी नहीं बल्कि मुहम्मद गांधी हैं। कुछ दिनों पहले तक उनके देशवासी ने उनके ‘सनकीपन के बावजूद ख़ुशी से उनका अनुसरण किया था। अब आज़ादी मिल चुकी थी। अब इस बूढ़े को क्यों बर्दाश्त किया जाए? वह अपनी उपयोगिता खो चुका था।

गांधीजी ने कहा, आपको नाराज़ होने का हक़ है। लोग कितने भी नाराज़ हो जाएं, उन्हें मालूम था, यह बूढ़ा सबका दोस्त है, किसी का दुश्मन नहीं। फिर गांधीजी रेलवे स्टेशन के पास वेवेल कैन्टीन के शिविर में गए। यहां मुसलमान निराश्रित थे। अन्त में गांधीजी किंग्सवे के निराश्रित शिविर गए। किंग्सवे कैंप की प्रार्थना सभा में जब कुरान की आयतें पढी जाने लगी तो लोग उग्र हो गये क्योंकि कुरान और इस्लाम के नाम पर ही मुस्लिम गुंडों ने वहाँ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था। गांधीजी की कार पर पथराव भी हुआ था।

11 सितंबर को गांधीजी राजकुमारी अमृत कौर और सुशीला नायर के साथ इर्विन अस्पताल गए। दिन रात वहां मरीज़ों का तांता लगा हुआ था। डॉक्टर और कर्मचारी बुरी तरह थके हुए थे। गांधीजी ने हर बेड के पास खड़े होकर रोगी और उसके रिश्तेदारों को शांति और सांत्वना दी। गांधीजी के लौटते ही उस अस्पताल पर गोलियों से हमला हुआ। अस्पताल के चारों तरफ़ मुसलमानों की बस्तियां और दफ़्तर थे। दिल्ली की ज़्यादातर पुलिस मुसलिम थी। उनके बहुत से सिपाही हथियार लेकर भाग गए थे। बंगाल और मध्यप्रदेश से पुलिस बुलाई गई। मुसलमानों के घरों से छापे में बड़ी भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद मिले। ऐसे ही अस्त्र-शस्त्र हिन्दुओं के घरों से भी बरामद हुए। कट्टरपंथियों का खुला खेल चल रहा था, लोग बहकावे में आ रहे थे।

12 सितम्बर को शुक्रवार का दिन था। गांधीजी जामा मस्जिद देखने गए। वहां पर बहुत गंदगी थी। चप्पल उतारकर गांधीजी सीढ़ियों पर नंगे पैर चले। उस दिन जुम्मे की नमाज़ थी। बहुत से लोग जमा हुए थे। इसके अलावा उस मस्जिद में 5,000 निराश्रित भी थे। गांधीजी ने गंदगी की ओर उनका ध्यान दिलाया। शाम को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अधिकारी गांधीजी से मिलने आए। यह बात बहुत प्रचलित थी कि शहर के विभिन्न भागों में हुए हत्याकांडों में आर.एस.एस. का प्रमुख हाथ था। जो व्यक्ति गांधीजी से मिलने आया था, गांधीजी से बोला, हमारा संघ किसी का शत्रु नहीं है। वह हिन्दुओं की रक्षा के लिए है, मुसलमानों को मारने के लिए नहीं। हम शांति के समर्थक हैं। गांधीजी ने कहा, आपको एक सार्वजनिक वक्तव्य निकालना चाहिए और अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का खंडन करना चाहिए। साथ ही मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों की निन्दा करनी चाहिए। कुछ दिनों के बाद आर.एस.एस. का एक सम्मेलन भंगी बस्ती में हो रहा था। संघ की ओर गांधीजी को वहां जाने का निमंत्रण मिला। गांधीजी गए। गांधीजी का स्वागत करते हुए संघ के नेता ने कहा, गांधीजी हिन्दू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष हैं। जवाब में गांधीजी ने कहा, मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कार वादी है। हिन्दू धर्म की विशिष्टता यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। ... मुझे आपके आश्वासन से ख़ुशी है कि आपकी नीति इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं है।

गांधीजी ने साफ कहा कि हम यहाँ के मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं भेज सकते। हम वैसा नहीं करेंगे जैसे पाकिस्तान ने किया। गांधीजी की इच्छा थी कि यदि यहां के हालात सुधरे तो वे पाकिस्तान जाकर जिन्ना से पूछेंगे कि तुम्हारे उस वादे का क्या हुआ जिसमें तुमने पाकिस्तान में हिन्दुओं के समान अधिकार की बात कही थी। नित्य संध्या समय अपनी प्रार्थना-सभा में वह इस प्रश्न की चर्चा करते। वह इस बात पर जोर देते कि बदला लेने से समस्या हल नहीं होगी। लोगों को शिक्षित करने के प्रयास में उन्होंने अपने को थका डाला। वे रोज लोगों की शिकायतें सुनते, दुख दूर करने के उपाय सुझाते, रोज के अनगिनत मिलने वालों में किसी की पीठ ठोंकते, किसी को झिड़कते, शरणार्थी कैम्पों का चक्कर लगाते और स्थानीय अधिकारियों से भी मिलते रहते थे। भाग दौड़ और मानसिक पीड़ा के कारण गांधीजी बीमार पड़ गये थे। उन्होंने पैंसिलीन तो क्या देशी दवा भी नहीं ली और आराम भी नहीं किया। कहते थे- जब जनता कष्ट से है तब मैं कैसे आराम कर सकता हूं।

मुस्लिम शरणार्थी कैम्प में जाते और वहां की प्रार्थना सभाओं में गांधीजी कहते, जो हुआ सो हो गया, उसे भूल जाओ। अब दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। भारत में रहने वाले मुसलमान भी देश के उतने ही नागरिक हैं। उन लोगों को हथियार लौटा देने चाहिए और तिरंगे का सम्मान कर शांति से रहना चाहिए। पाकिस्तान भेजे जाने का इंतज़ार कर रहे मुसलमानों से मिलते, उन्हें भारी दुख झेल रहे दृश्यों का सामना करना पड़ता। लोगों की बदले की भावना का परिणाम देख कर उनका दिल आर्तनाद करता, क्या दिल्ली के नागरिक पागल हो गए हैं? क्या उनमें कुछ इंसानियत नहीं बची है? पाकिस्तान चाहे कुछ करे, दिल्ली को सभ्य व्यवहार का झंडा ऊपर ही रखना होगा। लेकिन लगता था उनकी वाणी में वह पहले वाला जादू नहीं रह गया था।

हिंदू शरणार्थी कैम्प में भी जाते। लेकिन राजधानी में ही शरणार्थियों की आपत्तियों के कारण उनकी सभाएँ अस्त-व्यस्त होने लगीं। बहुत सारे शरणार्थियों को उनकी सभाओं में कुरान की आयतों को पढ़ने की प्रथा पर आपत्ति थी। इन्हीं आयतों के साथ हिंदू महिलाओं पर बलात्कार हुआ था। हम आपको क़ुरान पढ़ने नहीं देंगे। आप मुसलमान नंबर एक हैं। आपको पीड़ित हिंदुओं की चिंता ही नहीं है। बल्कि आपको उनकी चिंता अधिक है जिन्होंने जानबूझकर इन पीड़ाओं को जन्म दिया है। आप मोहनदास गांधी नहीं, आप मुहम्मद गांधी हैं। गांधी मुर्दाबाद के नारे लगते। गांधीजी ने उन लोगों से कहा, कोई धर्म बुरा नहीं होता। उनके अनुयायिओं की दुर्मति के कारण धर्म का द्रोह करना ठीक नहीं है। आज़ादी मिल जाने के बाद क्या लोगों को यह लग रहा था कि गांधी अपनी उपयोगिता खो चुका?

साम्प्रदायिकता का ज़हर इतना फैला था कि उसको निरस्त करना कठिन था। कई लोग इस बात पर नारे लगाने लगते थे कि गाँधीजी उन हिंदुओं और सिखों की पीड़ा के बारे में बात क्यों नहीं करते जो अभी भी पाकिस्तान में फँसे हुए हैं। डी.जी. तेंदुलकर के शब्दों में, गाँधी जी पाकिस्तान में भी अल्पसंख्यक समुदाय के कष्टों के बारे में समान रूप से चिंतित थे। उन्हें राहत प्रदान करने के लिए वे वहाँ भी जाना चाहते थे। लेकिन वहाँ वे किस मुंह से जा सकते थे जबकि दिल्ली में ही वे मुसलमानों को पूरी सुरक्षा का आश्वासन नहीं दे पा रहे थे।

एक कैम्प के मुस्लिम शरणार्थी से जब गांधीजी मिलने गए तो वहां की भीड़ बिफर गई। लोग मरने-मारने पर उतारू हो गए। लेकिन निर्भय, करुणा की मूर्ति गांधीजी ने उन उत्तेजित लोगों को शांत किया, समझाया मैं तो इन मुसलमानों को बचाने या फिर यहीं मर जाने के लिए ही दिल्ली आया हूं। लोगों का रोष पिघला। लेकिन इन सब घटनाओं के बीच कई ऐसे भी वाकयात हुए जिनमें कई मुसलमानों ने हिंदू-सिखों को बचाया, वैसे ही अनेक हिंदुओं ने मुसलमान पड़ोसियों की रक्षा की। लेकिन अव्यवस्था अधिक फैली हुई थी। इस सारी अव्यवस्था में पुलिस की क्रूरता और अनुशासनहीनता और भी भयानक थी। वह आग में घी डालने का काम कर रही थी।

13 सितम्बर को साम्यवादी नेता पी.सी. जोशी गांधीजी से मिलने आए थे। साम्यवादी गांधीजी की लगातार निन्दा करते रहते थे। उन पर यह आरोप लगाते थे कि गांधीजी क्रांति को शुरू करके अपने मूल ‘पूंजीवादी दृष्टिकोण’ के कारण अहिंसा का सहारा लेकर क्रांति को उसके ‘तर्क-संगत’ अन्तिम परिणाम तक नहीं आने देते थे। साम्यवादियों का कहना था कि यदि  वे इसे अंतिम परिणाम तक आने देते तो पूंजीपतियों को हानि होती। इसलिए वे इसे बीच में ही रोक देते। ऐसी मान्यता रखने वाले समूह के नेता जोशी गांधीजी से बोले, लोकतांत्रिक शक्तियां साम्प्रदायवाद से लड़ने के लिए तैयार हैं। आप हमें कूच का हुक्म दीजिए। हम आपके आदेशों का पालन करेंगे। गांधीजी ने कहा, मैं तो अपने को बिना सेना का सेनापति मानता हूं। मैं किसे कूच का हुक्म दूं? जोशी बोले, यहां सौगुना अधिक ख़राब हालत वाले कलकत्ते में आपने चमत्कार कर दिखाया। वहां आपके साथ शांति सेना थी, हम यहां आपको होमगार्ड देंगे। आपने राष्ट्र को बनाया है, अब इसे आगे बढ़ाइए।  गांधीजी बोले, मैंने ही राष्ट्र को बनाया और मैंने ही इसे बिगाड़ा भी है। मैं आपकी सलाह से लाभ उठाने का प्रयत्न करूंगा। हमेशा गांधीजी की नीतियों की आलोचना करने वाले उनसे नेतृत्व का आग्रह क्यों कर रहे थे? ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय अंग्रेज़ों का साथ देकर साम्यवादियों ने अपनी लोकप्रियता खो दी थी। उसे फिर से प्राप्त करने के लिए वे गांधीजी के नाम का उपयोग करना चाहते थे। लेकिन मौक़ापरस्तों को गांधीजी ख़ूब पहचानते थे।

उस दिन गांधीजी पुराने क़िले का मुसलिम निराश्रित शिविर गए। वहां क़रीब 75,000 मुसलिम पाकिस्तान ले जाये जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां राशन की भारी कमी थी। लीगी नेता राशन का गुप्त व्यापार कर रहे थे। पुलिस वाले की इसमें मिली-भगत थी। गांधीजी के पहुंचते ही भीड़ ने गांधीजी को घेर लिया। उनके विरोध में नारे लगाए जाने लगे। लोगों ने गाड़ी पर आक्रमण कर दिया। गांधीजी गाड़ी से बाहर निकल आए। लोगों को दूब के मैदान में बैठ जाने के लिए कहा। गांधीजी ने पीड़ितों के प्रति सहानुभूति प्रकट की। अपना दुख जताया। लोगों ने अपने दुखों और कष्टों की कहानी गांधीजी को सुनाई। गांधीजी ने उनके प्रति अपना भरसक प्रयास करने का वचन दिया। जो ख़ून के प्यासे थे, अब मित्र बन चुके थे। गांधीजी ने हाथ जोड़कर लोगों से विदाई ली। इसके बाद गांधीजी दो और शिविर गए, एक मोतिया ख़ान और दूसरा ईदगाह। शाम होते-होते ख़बर आई कि एक राष्ट्रवादी मुसलिम नेता डॉ. अंसारी की बेटी और दामाद को उनके घर से ज़बरन निकाल दिया गया और मज़बूरी में उन्हें होटल में शरण लेनी पड़ी है। गांधीजी बहुत निराश हुए और शाम की प्रार्थना सभा में इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा, यह बड़े शर्म की बात है कि डॉ. अंसारी जैसे राष्ट्र-भक्त और हिन्दू-मुसलिम एकता के हिमायती के परिवार वालों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ है।

18 सितंबर को गांधीजी दरियागंज गए और वहां के मुसलमानों की व्यथा-कथा सुनी। वहां पर मुसलमानों की रक्षा करने के बजाए पुलिस ही उन्हें उत्पीड़ित कर रही थी। उन दिनों सरदार का भी अंदेशा था कि भारत के मुसलमानों का विशाल बहुमत भारतीय संघ के प्रति वफ़ादार नहीं है। ऐसे लोगों के लिए पाकिस्तान चले जाना बेहतर होगा। गांधीजी ने प्रश्न किया, मैं पूछता हूं कि भारत की सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद या पश्चिम पंजाब का गुरुद्वारा ननकाना साहब और पंजा साहब का क्या होगा, अगर कोई भी मुसलमान भारत में और कोई भी सिक्ख पाकिस्तान में नहीं रह सकता? क्या इन पवित्र स्थानों का और कोई उपयोग किया जाएगा? हरगिज़ नहीं।

कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि मुसलमानों द्वारा परित्यक्त घर में शरणार्थियों को बसाया जाए। गांधीजी को यह सुझाव उपयुक्त नहीं लगा। उन्होंने कहा कि अगर यह सिद्धान्त अपना लिया गया, तो इसका परिणाम बहुत घातक होगा। तब एक भी ग़ैरमुसलिम पाकिस्तान में और एक भी मुसलिम हिन्दुस्तान में नहीं बचेंगे। इसलिए बेहतर है कि सरकार इन घरों की तब तक देखभाल करे जब तक इसका मालिक वापस आकर इसे अपनाता नहीं।

जब वे पुल बंगश, बड़ा हिन्दू राव, खरी बाओली और चांदनी चौक जैसे मुसलिम बहुल क्षेत्रों की तंग गलियों से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने पूरा इलाक़ा वीरान पाया। बचे-खुचे मुसलमानों ने उनका दिल से स्वागत किया जबकि कुछ हिन्दू भाइयों ने उनकी कार पर हमला किया और वापस जाओ के नारे लगाए।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

सोमवार, 22 जून 2026

सूफ़ीमत... 6. सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था-1

 सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


6. सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था-1

हे पैग़म्बर, जो कुछ आप पर आपके पालनहार की ओर से उतारा गया है, आप इस आदेश को पहुंचा दें जो आपके ईश्वर की ओर से उतरा है और यदि आपने यह किया तो जैसे उसके संदेश को नहीं पहुंचाया और अल्लाह विरोधियों से आपकी रक्षा करेगा, निश्चय अल्लाह काफ़िरों को मार्गदर्शन नहीं देता। (क़ुरआन : 5/67)

सूफ़ीवाद अपने स्वभाव से ही एक ऐसा विषय था जो औसत लोगों के लिए नहीं बल्कि उनके लिए था जो हमेशा औसत से ऊपर की चीज़ के लिए महत्वाकांक्षी होते थे। मुस्लिम धर्माचार्यों के अनुसार परम सत्ता तक पहुंचने के दो मार्ग हैं। एक फ़रिश्ते द्वारा प्राप्त ईश्वरीय आदेश और नबियों की शिक्षा से गुज़रता है और दूसरा इल्हाम (आत्मज्ञान) और औलिया (सिद्ध पुरुषों) की परम सत्तात्मक मनःस्थिति (सिद्धि) का है। शरीअत बाहरी और व्यावहारिक मार्ग है। इसमें कुरान और हदीस के अनुसार बताए गए धार्मिक नियमों (जैसे नमाज, रोजा, जकात आदि) का पालन करना शामिल होता है। तरीक़त आंतरिक और आध्यात्मिक मार्ग है। इसे सूफी मार्ग भी कहा जाता है, जिसमें दिल की शुद्धि, अहंकार (नफ्स) को मिटाने और ईश्वर के सीधे प्रेम व ज्ञान (मारेफत) को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। धर्माचार्यों के अनुसार ये दोनों मार्ग एक-दूसरे के पूरक हैं। आंतरिक ज्ञान (तरीक़त) की प्राप्ति के लिए बाहरी नियमों (शरीअत) का पालन करना अनिवार्य माना गया है।

मुस्लिम धर्माचार्यों के एक वर्ग ने सूफ़ियों में ‘क़ुतुब’ की उपाधि से याद किए जाने वालों को हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि. का बदल सिद्ध करने का प्रयास किया है। अबूतालिब मक्की कहते हैं कि सिद्दीक़ और रसूल के बीच केवल नबूबत का अन्तर होता है। इस दृष्टि से क़ुतुब हज़रत अबूबक्र रज़ि. का बदल होता है। लेकिन यह मत अधिकांश सूफ़ियों में लोकप्रिय नहीं है। लगभग सभी प्रख्यात सूफ़ियों ने अपना सिलसिला हज़रत अली रज़ि. से स्वीकार किया है। इस्लामी रहस्यवाद (सूफीवाद) में 'क़ुतुब' का अर्थ 'धुरी' होता है। सूफी परंपरा के अनुसार, कुतुब उस सर्वोच्च आध्यात्मिक हस्ती को कहा जाता है, जिसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होता है और जो ब्रह्मांड का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। मुख्यधारा के रूढ़िवादी इस्लामी विद्वानों (जैसे सलफी और कुछ वहाबी विचारधारा के उलेमाओं) के एक वर्ग का मानना है कि 'क़ुतुब' या 'ग़ौस' जैसी उपाधियों का कोई आधार कुरान या प्रामाणिक हदीस में नहीं है। उनके अनुसार, ये शब्द बाद के दौर में कुछ अतिवादी सूफियों द्वारा गढ़े गए हैं।

सभी सूफ़ी संतों ने ज्ञान का स्रोत केवल अल्लाह को माना है और उस ज्ञान तक पहुंचने का वसीला पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. को तस्लीम किया है। (वसीला का अर्थ अल्लाह की आज्ञा का पालन करने और उस की अवज्ञा से बचने तथा ऐसे कर्मों के करने का, जिन से वह प्रसन्न हो। वसीला ह़दीस में स्वर्ग के उस सर्वोच्च स्थान (अल-वसीला) को भी कहा गया है, जो स्वर्ग में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मिलेगा, जिसका नाम मक़ामे मह़मूद है।) उनके सहाबा में हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के वास्ते से यह ज्ञान सूफ़ी सिलसिलों तक पहुंचा। नक्शबंदिया सिलसिला हज़रत अबूबक्र रज़ि. के वास्ते से पैग़म्बर साहब तक पहुंचता है, जबकि चिश्तिया, क़ादरिया, सुहरावर्दिया, मदारिया, शतारिया और किबरौविया सिलसिले हज़रत अली रज़ि. के वास्ते से पैग़म्बर साहब तक पहुंचते हैं। मौलाना जलालुद्दीन रूमी का मानना है कि मेराज (नबीश्री का उच्चतम आकाश पर अल्लाह की निशानियों के दर्शन के लिए बुलाया जाना) की रात हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने हज़रत अली रज़ि. को दस हज़ार ऐसे रहस्यों से परिचित कराया जिनका ज्ञान उन्हें अल्लाह ने दिया था। मेराज की रात नबीश्री हज़रत मुहम्मद सल्ल. को अल्लाह ने ख़िरका (वह वस्त्र जिसे सूफ़ी पीर अपने सुयोग्य मुरीद को प्रदान करते हैं) प्रदान किया ('खिरका-ए-फक्र' अध्यात्म का चोगा/वस्त्र) और ताक़ीद की कि इसे सुयोग्य पात्र को ही दें। नबीश्री ने कुछ सहाबियों की परीक्षा ली और अंत में हज़रत अली रज़ि. को सुयोग्य पाकर उन्हें वह पवित्र ख़िरका प्रदान किया।

25 मई 632 ई. को जब पैग़म्‍बर हज़रत मुहम्‍मद सल्ल. की मृत्‍यु हुई तो उनके सभी शिष्य और समर्थक उनकी पत्नी हज़रत आयशा बीबी रज़ियल्लाहु अन्हा के घर जुटे। वहीं उन्होंने अंतिम सांसें ली थीं। पार्थिव शरीर रखा था। लोग शोक-संतप्‍त थे। उनके ख़ास शिष्य हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु यह मानने को तैयार नहीं थे कि पैग़ंबर की भी मौत हो सकती है। उन्होंने कहा हज़रत मूसा की तरह मुहम्मद साहब भी ख़ुदा से मिलने गए हैं। कुछ देर बाद वापस आ जाएंगे। कुछ लोगों को इस बात पर यकीन नहीं हुआ। वे आपस में कानाफूसी करने लगे। इस बेइज़्ज़ती को भाँपकर, गुस्से में हज़रत उमर रज़ि. ने तलवार खींच ली और गरज कर बोले, झूठे और कपटी हैं वे लोग जो कहते हैं कि हुज़ूर का इंतक़ाल हो गया। हिम्मत है तो मेरे सामने बोलें। गर्दन उतार लूंगा’’। इसी बीच हज़रत अबू बक्र रज़ि. वहां पहुँचे। अंदर गए। बीबी आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की गोद में पड़े सर मुबारक को ग़ौर से देखा और इन्‍ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन कहते बाहर आ गए। उन्होंने हज़रत उमर से कहा तलवार म्यान में डाल दो।

हज़रत उमर रज़ि. ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। हज़रत अबूबकर रज़ि. भीड़ की ओर मुड़े और बोले- हम में से जो लोग पैग़म्बर मुहम्मद की उपासना करते हों, वे जान लें कि उनकी मृत्यु हो गयी। लेकिन जो ख़ुदा के उपासक हैं, उन्हें मालूम हो कि ख़ुदा कभी मरता नहीं।

इसके बाद वे क़ुरआन की यह आयत बोले मुहम्मद इसके सिवा और कुछ नहीं बस एक रसूल (धर्मदूत) हैं जिनके पहले भी और रसूल गुज़र चुके हैं। अगर उनकी मृत्यु हो जाए या उन्हें मार डाला जाए, तो क्या तुम अपने दीन (धर्म) से फिर जाओगे? याद रखो, जो पलटेगा, उससे अल्लाह का कुछ नुकसान न होगा। (सुर: 3 आ.144). अपने दीन (धर्म) से फिर जाओगे का अर्थ है इस्लाम से फिर जाओगे। भावार्थ यह है कि सत्धर्म इस्लाम स्थायी है, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के न रहने से समाप्त नहीं हो जायेगा। उह़ुद में जब किसी विरोधी ने यह बात उड़ाई कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शहादत हो गयी है तो यह सुन कर बहुत से मुसलमान हताश हो गये। कुछ ने कहा कि अब लड़ने से क्या लाभ? तथा कुछ तो यहाँ तक कहने लगे कि यदि मुहम्मद साहब वास्तव में अल्लाह के रसूल होते तो उन्हें मृत्युदंड न दिया जाता, और इसी कारण उन्होंने लोगों को अपने पैतृक धर्म में लौटने की सलाह दी। इस आयत में यह संकेत है कि दूसरे नबियों के समान नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को भी एक दिन संसार से जाना है। तो क्या तुम उन्हीं के लिये इस्लाम को मानते हो और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नहीं रहेंगे तो इस्लाम नहीं रहेगा?

6.1 हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रजि.अ.) (573 23 अगस्त 634)

हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. की मृत्यु के बाद  हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रजि.अ.) 632 ई. में इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा (पैगंबर के उत्तराधिकारी) हुए। उनका असली नाम अब्दुल्लाह इब्न अबू क़ुहाफ़ा था। 'अबू बक्र' उनकी कुनियत (उपनाम) थी। उनका जन्म मक्का में लगभग 573 ईस्वी में हुआ था। वे पैगंबर मुहम्मद के प्रारंभिक अनुयायियों में से थे (हज़रत खदीजा रज़ियल्लाहु अन्हा के बाद सबसे पहले इन्होंने इस्लाम क़बूल किया। वे पुरुषों में सबसे पहले इस्लाम कबूल करने वाले व्यक्ति थे) और इनकी पुत्री हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा पैगंबर की चहेती पत्नी थी। वे मक्का के सबसे धनवान लोगों में से थे। एक बार उन्होंने इस्लाम की सेवा के लिए अपना सारा धन पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के चरणों पर रख दिया। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने उनसे कहा, क्या कुछ अपने परिवार वालों के लिए भी छोड़ा? तो उन्होंने कहा, उनके लिए अल्लाह और उसका रसूल है।

इस तरह की बात एक सूफ़ी ही कह सकता है। इसी पर डॉ. अल्लामा ईक़बाल ने कहा है,

परवाने को चिराग़ तो बुलबुल को फूल बस।

सिद्दीक़  के  लिए  ख़ुदा  और रसूल  बस॥

यह शेर हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) की सच्ची मोहब्बत और उनके पक्के ईमान को दिखाता है। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ के लिए इस दुनिया की कोई भी चीज़ मायने नहीं रखती। उनके लिए सिर्फ अल्लाह (ख़ुदा) और उनके प्यारे नबी (रसूल) का साथ ही काफी है। हज़रत अबू बक्र रज़ि. की धर्मपत्नी का नाम हज़रत अस्मा-बिन्त-उमैस रज़ि. था। हज़रत अबू बक्र रज़ि. ज्ञान-विज्ञान, शौर्य और वीरता में श्रेष्ठ थे। हिजरत के समय वे पैग़म्बर के सहयोगी थे। उनके साथ 'सौर' नाम की गुफा में रहते हुए सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे पैग़म्बर में पूरी आस्था रखने वाले में थे, इसलिए उन्हें ‘अल-सिद्दीक़’ के नाम से पुकारा जाता था। जब पैगंबर साहब ने अपनी मेराज (आसमानों की पवित्र यात्रा) के बारे में बताया, तो लोगों ने इस पर संदेह किया. लेकिन हज़रत अबू बक्र ने बिना किसी झिझक के तुरंत उनकी बात पर विश्वास कर लिया। वे बहुत ही विनयी और दयालु थे। इस्लामी शासन के मुखिया होने के बावजूद भी वे सादा जीवन ही व्यतीत करते थे। कहा जाता है कि ख़लीफ़ा बनने के दूसरे ही दिन वे कंधे पर कपड़ों का थान लेकर बेचने के लिए वे बाज़ार में चले गए। किसी ने उन्हें टोका कि आप ये क्या करते हैं, तो उन्होंने कहा मेरे जीविकोपार्जन का यही साधन है और इसी  से मैं अपने बाल-बच्चों का पोषण करूंगा।

पैगंबर साहब की मृत्यु के बाद कई अरब जनजातियों ने विद्रोह कर दिया था। अबू बक्र ने 'रिद्दा युद्धों' के जरिए इन विद्रोहों को शांत किया और एकता बनाए रखी। वे सम्पूर्ण अरब को इस्लाम के झंडे के नीचे लाने के लिए अनवरत लगे रहे। उन्होंने मुस्लिम सेना को मजबूत किया और सीरिया और इराक की तरफ बड़े साम्राज्यों (बीजान्टिन और सासानियन) को चुनौती दी। उनकी ख़िलाफ़त के समय (25 मई 632-23 अगस्त 634 तक) सीरिया के सीमावर्ती क्षेत्र पर इस्लामी हुक़ूमत क़ायम हुई। उनकी ख़िलाफ़त के दौर में हज़रत उमर रज़ि. के मशविरे से पवित्र क़ुरआन को संकलित किया गया। इस काम के लिए हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि. को चुना गया। ख़लीफ़ा अबू बक्र रज़ि. बीमार रहते थे। वे मुश्किल से ढ़ाई साल ही अपने पद पर रहे। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ की मृत्यु 23 अगस्त 634 ईस्वी को बीमारी के कारण हुई। उन्हें मदीना की 'मस्जिद-ए-नबवी' में पैगंबर मुहम्मद साहब के पास ही दफनाया गया है। उनके निधन के बाद एक बार फिर ख़लीफ़ा के चुनाव के लिए विवाद उठ खड़ा हुआ। किसी तरह स्थिति को क़ाबू में रखा गया और हज़रत उमर रज़ि. मुसलमानों के दूसरे ख़लीफ़ा (634-43) इसलिए चुन लिए गए क्योंकि हज़रत अबूबकर रज़ि. ने उन्हें नामज़द किया था।

6.2 हज़रत उमर रज़ि. (586 – 644)

उनका असली नाम हज़रत अबू हफ्स उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) था वह पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सबसे करीबी सहाबियों में से एक थे मुहम्मद साहब ने हज़रत उमर को ‘फारूक’ नाम की उपाधि दी थी। जिसका अर्थ सत्य और असत्य में फर्क करने वाला है। उनका जन्म 583 ईस्वी में मक्का के एक सम्मानित कुरैश कबीले में हुआ थावह बचपन से ही बहुत बहादुर, बुद्धिमान और ताकतवर थे। उन्हें घुड़सवारी और कुश्ती का बहुत शौक था। वह काफी पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। शुरुआत में वे इस्लाम के कट्टर विरोधी थेएक दिन वह पैगंबर साहब को नुकसान पहुँचाने के इरादे से निकले थे। रास्ते में उन्हें पता चला कि उनकी बहन और बहनोई ने इस्लाम स्वीकार कर लिया है। जब वह अपनी बहन के घर गए, तो वहाँ कुरान की पवित्र आयतें सुनीं। उन आयतों का उनके दिल पर इतना गहरा असर हुआ और उनका गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने तुरंत इस्लाम कबूल कर लिया। उनके इस्लाम अपनाने से मुसलमानों को बहुत बल मिला।

हज़रत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) के बाद वे 634 ईस्वी में दूसरे खलीफा बने। वे बहुत ही सरल प्रवृत्ति के थे और बहुत ही कम खर्चे में अपना काम चला लेते थे अपने शासनकाल में हज़रत उमर रज़ि. विधि को सर्वोच्च स्थान देना चाहते थे। उन्होंने दीवान की प्रथा की शुरुआत की सैनिकों और अधिकारियों के लिए वेतन और पेंशन का रजिस्टर (दीवान) बनाया इसके अलावा देश विजय के द्वारा इस्लामी राज्य का विस्तार करना उनका प्रमुख लक्ष्य था। उनका एक और लक्ष्य था शरीअत में कुछ सुधार करना। जब वो ख़लीफ़ा बने तो इस्लाम सिर्फ़ अरब तक सीमित था, उन्होंने इस्लाम का दायरा दुनिया के चारों कोनों तक फैलाया उन्होंने न सिर्फ़ संपूर्ण सीरिया, बल्कि इराक़, मिस्र, लीबिया, ईरान, ख़ुरासान, आरमीनिया, अंतालिया, अफ़्गा़निस्तान तक इस्लामी हुक़ूमत का विस्तार किया। उनके शासनकाल में मुसलमानों ने बिना किसी खून-खराबे के यरूशलेम पर जीत हासिल की।

हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) को इस्लामी शासन प्रणाली का वास्तविक संस्थापक माना जाता हैउन्होंने एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस बल, न्याय प्रणाली, और सामाजिक कल्याण विभाग (बैत-उल-माल) की स्थापना की कानून की नज़र में उनके लिए अमीर-गरीब और राजा-प्रजा सब बराबर थे उन्होंने सरकारी खजाने (बैत-उल-माल) की व्यवस्था को मजबूत किया। इतिहास में उन्हें उनके सख्त न्याय, ईमानदारी और बेमिसाल सादगी के लिए याद किया जाता है। उन्होंने पूरी दुनिया पर इंसाफ़ के साथ हुकूमत करने का तरीक़ा सिखाया  विश्व भर में आज भी उमर-ए-फारूक का इंसाफ मिसाल है। फारूकी दौर में ही दुनिया भर के इंसानों के लिए अहम फैसले किए गए, जिससे इंसानियत का सिर बुलंद हुआ।

हज़रत उमर रज़ि. ने ख़लीफ़ा का पद ग्रहण करने के दूसरे ही साल बसरा नगर की नींव डाली। बाद में यह प्रमुख वाणिज्यिक-केन्द्र बना। उन्होंने ही इस्लामी हिजरी कैलेंडर की शुरुआत की, जो आज भी इस्तेमाल होता है। इतने बड़े साम्राज्य के शासक होने के बाद भी वे बहुत सादा जीवन जीते थे। वे फटे हुए कपड़ों में भी रह लेते थे और खुद मदीना की गलियों में घूमकर गरीबों और भूखों की मदद करते थे। उन्हें मुसलमानों का पहला ऐसा नेता कहा जाता है जिन्हें 'अमीर-उल-मोमिनीन' (मोमिनों का कमांडर) की उपाधि मिली।

हज़रत उमर रज़ि. की हत्या (8 सितम्बर, 644 ई.) कर दी गई थी। पर्शिया निवासी एक फारसी गुलाम अबू लू़लू़ फ़िरोज़ ने मस्जिद में नमाज़ पढ़ते समय ज़हर बुझाई कटार से उनकी ह्त्या कर दी  मुहर्रम के दिन ही हज़रत उमर फारूक शहीद हुए थे। उन्हें पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) और हज़रत अबू बक्र (र.अ.) के समीप दफनाया गया जब वे घायल हो गये और जीवन की आशा न रही और अपनी अंतिम सांसे ले रहे थे तो उन्होंने छः व्यक्तियों की एक  चुनावी मंडली मुक़र्रर की थी, ताकि वह आपस के परामर्श से शासन के लिये किसी एक को निर्वाचित कर लें। जिसने हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) को तीसरा ख़लीफ़ा नियुक्त किया। इस्लाम पहला धर्म है जिस ने परामर्शिक व्यवस्था की नींव डाली। किन्तु यह परामर्श केवल देश का शासन चलाने के विषयों तक सीमित था।

6.3 हज़रत उस्मान रज़ि.  (576-656) 

उनका असली नाम उसमान बिन अफ़्फ़ान था। ख़लीफ़ा बनने के समय हज़रत उस्मान रज़ि. की उम्र लगभग सत्तर साल थी। वह एक बहुत ही नेक, दयालु और अमीर इंसान थे। अपनी धन-दौलत को खुदा की राह में खर्च करने के कारण उन्हें 'गनी' (बहुत अमीर/दानी) कहा जाता है। उन्हें ज़ुन-नूरैन (अर्थात दो नूरों के स्वामी) के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी दो सम्मानित बेटियों (हज़रत रुकैया (रज़ि.) और उनके विसाल के बाद हज़रत उम्म कुलथुम (रज़ि.)) का विवाह एक के बाद एक आदरणीय उस्मान बिन अफ्फान (रज़ि अल्लाह अन्हु) से करवाया था।

तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रज़ि. के काल (643-55) में इस्लामी साम्राज्य बहुत आगे तक फैला। ईरान, उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया के कई नए इलाके इसमें शामिल हुए। उन्होंने पहली बार मुसलमानों की पानी के जहाजों वाली फौज (नौसेना) बनाई। इस फौज ने समंदर के रास्ते कई लड़ाइयां जीतीं। हज़रत उस्मान रज़ि. पैग़म्बर के विशिष्ट सहयोगियों में से थे। वो एक धनी व्यापारी हुआ करते थे लेकिन बाद में वह मुहम्मद साहब के प्रमुख साथी बने। उन्होंने रसूल की 186 हदीसें कही हैं। उन्हें विद्वानों द्वारा क़ुरआन का संग्रहकर्ता भी कहा जाता है। उस समय तक पैग़म्बर के विभिन्न सहयोगियों द्वारा संगृहीत क़ुरआन के कई संकलन मौजूद थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में क़ुरआन के सभी उपलब्ध संकलनों को परिशोधित करवाया। इसके बाद उन्होंने पाठ-संबंधित सारे मतभेद दूर करने के लिए क़ुरआन की सात प्रामाणिक प्रतियां तैयार करवाई और उन्हें विभिन्न देशों में भिजवा दिया। इसी वजह से उन्हें 'जामी-उल-कुरान' भी कहते हैं। बाक़ी सारे संकलन नष्ट कर दिये गए।

हज़रत उस्मान क़ुरैशों की उमैय्या शाखा के थे। हज़रत उस्मान इब्न अफ्फान का जन्म 576 ईस्वी में मक्का में कुरैश जनजाति के धनी और प्रभावशाली उमय्यद कबीले में हुआ था। उन्होंने अच्छी शिक्षा प्राप्त की और अरबी साहित्य और वाणिज्य में अच्छी जानकारी रखते थे। हज़रत उस्मान उन लोगों में से थे, जिसने शुरू में ही इस्लाम कुबूल कर लिया था। वे बहुत धर्मात्मा थे और बहुत ही अच्छे स्वभाव के थे। उन्हें साहिब उल हिजरतैन (दो बार हिजरत करने वाला) के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने पहले हबशाह (इथियोपिया) और फिर मदीना अल-मुनव्वरा में हिजरत की थी। उन्होंने उहुद की लड़ाई और खाई की लड़ाई जैसी प्रमुख लड़ाइयों में भाग लिया और वीरता एवं वफादारी का परिचय दिया।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के शासन का आखिरी समय और उनकी शहादत का वाकया बहुत ही दुखद था। उनके खिलाफत के आखिरी सालों में कुछ लोग उनके खिलाफ हो गए थे। कुछ दंगाइयों ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) पर गलत आरोप लगाए। वे लोग उनके खिलाफ बात फैलाने लगे। फिर बहुत से दंगाई मदीना शहर में घुस आए। दंगाइयों ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के घर को चारों तरफ से घेर लिया। उन्होंने घर में पानी और खाना ले जाने पर भी रोक लगा दी। यह घेराव लगभग 40 दिनों तक चला।  हज़रत उस्मान (रज़ि.) बहुत ही दयालु थे। वह नहीं चाहते थे कि उनकी वजह से मदीना के मुसलमानों के बीच खून-खराबा हो। इसलिए उन्होंने अपने साथियों को दंगाइयों से लड़ने की इजाज़त नहीं दी। 17 जून 655 ई. को दंगाई दीवार फांदकर उनके घर में घुस गए। उस समय हज़रत उस्मान (रज़ि.) पवित्र कुरान पढ़ रहे थे। दंगाइयों ने उसी हालत में उन पर हमला कर दिया और उन्हें शहीद कर दिया। उनका मजार मदीना के जन्नत-उल-बकी में है। हज़रत उस्मान गनी रज़ि अल्लाह अन्हु का जीवन और योगदान इस्लामी इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गया है। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा, विस्तार के एक महत्वपूर्ण दौर में उनका नेतृत्व और कुरान के संरक्षण में उनके प्रयासों ने उन्हें एक आदरणीय व्यक्तित्व बना दिया है। 

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

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