सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
14. पीर
ये (क़ुरआन) एक पुस्तक है, जिसे हमने आपकी ओर अवतरित किया है, ताकि आप लोगों को उनके पालनहार की
अनुमति से अंधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर लायें। (क़ुरआन : 14/1)
सातवां सिद्धांत
सूफ़ी दर्शन के अनुसार सातवां सिद्धांत यह है कि ईश्वर (अल्लाह) की प्राप्ति के
लिए मुर्शिद या पीर (गुरु) को धारण करना ईश्वर प्राप्ति के लिए अनिवार्य है। बिना
गुरु के गति असम्भव है।
सूफ़ी मत में यह दृढ़ विश्वास
है कि बिना गुरु के आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ना और मोक्ष या रूहानी प्रगति
(गति) पाना पूरी तरह असंभव है। सूफ़ी परंपरा में एक प्रसिद्ध कथन (हज़रत
बयाज़ीद बुस्तामी का) अक्सर दोहराया जाता है, “जिसका कोई पीर नहीं, उसका पीर शैतान है।” इसका अर्थ यह है कि बिना गुरु के इंसान
का अहंकार (नफ़्स) और भटकन उसे सही रास्ते से भटका देती है। ईश्वर तक
पहुँचने का रास्ता (तरीक़त) बहुत कठिन और भ्रमों से भरा है, जहाँ एक रूहानी मार्गदर्शक (मुर्शिद)
का हाथ थामना ज़रूरी है।
सूफ़ीपंथ के लोग उस्ताद की ज़रूरत को भी क़ुरान की रोशनी
में समझाते हैं।
क़ुरान की एक आयत में कहा गया है, "उन लोगों से पूछो जो तुम से बेहतर जानते हैं। और उसी रास्ते को अपनाओ जो मुझ तक पहुंचता है।" सूफ़ीमत
में गुरु अथवा पीर का बहुत अधिक महत्व है। उन्हें हज़रत, शेख़, मुर्शिद भी कहा जाता है। 'मुर्शीद' एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ 'रास्ता दिखाने वाला' या 'शिक्षक' होता है। सूफ़ियों का ज़ोर अक्सर इस बात पर रहता है कि
इस्लामी तालीम सिर्फ़ किताबें पढ़ कर हासिल नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे अपने उस्तादों से सीखना चाहिए ताकि
इस्लाम मज़हब की सही जानकारी और इबादत का सही तरीक़ा पता चल सके।
जागरण के लिए केवल ईश्वर का नाम लेना ही काफ़ी नहीं है बल्कि यह भी ज़रूरी है
कि जो बात उसकी शान के खि़लाफ़ है वह बात
उसके लिए न मानी जाए। शैख़ या पीर यहां रास्ता दिखाता है और बताता है कि कौन सी बात
उस मालिक की शान के मुनासिब है और कौन सी बात उसकी शान के खि़लाफ़ है?
साधना के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति
साधारण से मोमिन बनने का अभ्यास करता है। मोमिन बनने पर उसके अन्दर जब ईश-प्रेम का विकास होता
है तो वह सालिक की स्थिति में पहुंचता है। सालिक का अर्थ है यात्री। मानवीय प्रेम के मार्ग पर चलकर, ईश्वरीय प्रेम को उपलब्ध होना ही साधक का लक्ष्य होता है। जब ईश्वर को खोजने की तीव्र अभिलाषा जगती है, तो
एक सालिक पीर (गुरु) के शरण में जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में गुरु (पीर) सहायक होता है। पीर अथवा गुरु साधक को बुराइयों के शिकंजे से मुक्त
कर उसे सिद्धि की ओर अग्रसर करता है। पीर ही साधक को प्रेम-पथ दिखाता है। यह साधक (मुरीद) को
आत्म-शुद्धि (तज़किया) और अहंकार मिटाने का पाठ पढ़ाते हैं।
सूफ़ी विचारधारा में शेख़, पीर व मुर्शीद अर्थात् गुरु का महत्व
इतना अधिक है कि ऐसा समझा जाता है कि बिना पीर कोई सूफ़ी हो ही
नहीं सकता, बिना गुरु के कोई भी ईश्वर को नहीं पा सकता है। मुर्शीद अपने ज्ञान और प्रेम से शिष्य के दिल को जागृत करते
हैं ताकि वह अल्लाह के करीब पहुँच सके। जो लोग बिना किसी कामिल शैख़
के साधना करते हैं, वे सही के साथ ग़लत भी करते रहते
हैं और उनकी ग़लतियां उन्हें उनकी मंज़िल से दूर ही रखती हैं। मालिक का नाम सही तरीक़े से और सही शैख़ की निगरानी में
लिया जाए तो आत्मज्ञान सहज ही प्राप्त हो जाता है। साधक को ईश्वर तक पहुँचाने का कार्य पीर ही करता है और पीर में सूफ़ियों के अन्धविश्वास का यही कारण है। साधक अपने गुरु को ईश्वर की भाँति स्मरण करता है।
सूफ़ी साधना के सोपानों में
ईश्वर में लीन होने (फ़ना फ़ी अल्लाह) से पहले साधक (मुरीद) को अपने गुरु में लीन होना
पड़ता है, जिसे 'फ़ना फ़ी अल-शेख़' कहा जाता है। मुरीद अपने अहंकार को पूरी तरह मिटाकर खुद को गुरु के चरणों में
समर्पित कर देता है। जब कोई व्यक्ति किसी सूफ़ी सिलसिले (जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी या नक़्शबंदी) में
शामिल होता है, तो वह पीर का हाथ थामकर वफ़ादारी और समर्पण की शपथ लेता है, जिसे 'बैअत' कहा जाता है। इसके बिना कोई
भी व्यक्ति सूफ़ी मार्ग पर आध्यात्मिक यात्रा शुरू ही नहीं कर सकता। डॉ. ताराचन्द के
अनुसार पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने अल्लाह के समक्ष
समर्पण की शिक्षा दी तथा सूफ़ीवाद ने गुरु अथवा आध्यात्मिक गुरु के समक्ष आत्म-समर्पण
पर बल दिया। दिलचस्प बात यह है कि सूफ़ी दर्शन का यह 'पीर-मुरीद' सिद्धांत भारतीय उपमहाद्वीप
के भक्ति आंदोलन (जैसे कबीर, गुरु नानक और अन्य संत) के 'गुरु-शिष्य' परंपरा से पूरी तरह मेल खाता
है, जहाँ कहा गया है कि "गुरु बिन होये न ज्ञान"।
सूफ़ी मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए ज़रूरी है कि वह अपने आप को पूरी तरह से अपने मुर्शीद
के सुपुर्द कर दे। पीर या मुर्शीद में ऐसी ताक़त होती है कि वह मुरीद
यानी शरण में आए व्यक्ति को आध्यात्मिकता में सराबोर कर देता है। यह कहा जाता है कि
उसके बिना ईश्वर से मिलन भी मुमकिन नहीं। साधक के लिए कहा गया है कि वह जो कुछ भी करे, जो कुछ भी सोचे, अपने शेख़ या पीर
को बराबर सामने रखे।
सूफ़ियों के बीच पीर के संबंध में किसी प्रकार का
संदेह प्रकट करना धर्म-विरुद्ध माना जाता है। गुरु के मुंह से निकली बेहद आम
लगने वाली बात भी शिष्य के लिए महत्वपूर्ण है। उसका
पालन करना शिष्य के लिए जरूरी है। हज़रत
जुन्नून मिस्री रह. ने सच्चे शिष्य को गुरु भक्त बनने के लिए यह आदेश तक दिया कि वह प्रत्यक्ष में परमात्मा के आदेशों को
न समझने के कारण उनकी उपेक्षा तो कर सकता है, पर गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर करे। उनके आचार-विचार
के संबंध में मुरीद के मन में किसी प्रकार के प्रश्न नहीं उठने चाहिए। सूफ़ी मत में हज़रत ज़ुन्नून मिस्री (रह.) का स्थान बहुत ऊँचा है और उन्हें 'मारिफ़त' (ईश्वरीय ज्ञान) के सिद्धांतों’ को क्रमबद्ध करने वाला पहला प्रमुख सूफ़ी
संत माना जाता है। उनके द्वारा उल्लेखित कथन सूफ़ी साधना की चरम पराकाष्ठा यानी 'पीर के प्रति पूर्ण समर्पण' को दर्शाता
है। सूफ़ी दर्शन के अनुसार, एक आम साधक (मुरीद) ईश्वर के गुप्त रहस्यों और उसकी इच्छाओं (बातिन)
को अपनी सीमित बुद्धि से प्रत्यक्ष रूप से नहीं समझ सकता। कई बार ईश्वर की कोई
आज्ञा या परीक्षा ऊपरी तौर पर समझ में नहीं आती या विरोधाभासी लगती है। ऐसे में, गुरु (मुर्शिद) वह माध्यम होता है जिसे ईश्वर की इच्छा का गहरा और
रूहानी ज्ञान होता है।
हज़रत ज़ुन्नून मिस्री और बाद के सूफ़ी संतों (जैसे हज़रत जुनैद बगदादी) ने
मुरीद के लिए 'इताअत' (आज्ञाकारिता) को अनिवार्य बताया है। उनका
मानना था कि साधक अपनी नासमझी के कारण सीधे परमात्मा के किसी आदेश की व्याख्या में
भूल कर सकता है या उसकी उपेक्षा कर बैठता है, क्योंकि वह ईश्वरीय इच्छा को सीधे देखने की क्षमता नहीं रखता। लेकिन, गुरु उसके सामने साक्षात और प्रत्यक्ष मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित है। गुरु
की आज्ञा का उल्लंघन करने का सीधा अर्थ है—अपने अहंकार (नफ़्स) को गुरु की
रूहानी बुद्धिमत्ता से ऊपर रखना। यदि साधक गुरु की ही बात नहीं मानेगा, तो वह ईश्वर के मार्ग (तरीक़त) पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाएगा। सूफ़ी
साहित्य (जैसे फरीदुद्दीन अत्तार की तज़किरातुल औलिया) में इस बात
पर बल दिया गया है कि मुरीद को अपने पीर के सामने खुद को ऐसे सौंप देना चाहिए जैसे "एक मुर्दा, नहलाने वाले (ग़स्साल) के हाथों में होता है"। वह खुद कोई तर्क नहीं करता। इसलिए, यदि कोई शिष्य परमात्मा के किसी सूक्ष्म आदेश को न समझ पाने के कारण असमंजस
में हो, तो उसे अपने
मन की करने के बजाय अपने गुरु (मुर्शिद) के हुक्म का पालन आँख मूँदकर करना चाहिए, क्योंकि गुरु की प्रसन्नता और आज्ञा का पालन ही अंततः उसे ईश्वर की रज़ा
(प्रसन्नता) तक लेकर जाता है।
हज़रत बायजीद बुस्तामी रह. ने कहा कि जो व्यक्ति गुरु पर ईमान नहीं रखता, उसका ईमान (धर्म) पर दृढ़ विश्वास दरअसल शैतान का होता है। हज़रत बायज़ीद बुस्तामी (रह.) से जुड़ा यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है। उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग (तसव्वुफ़) में एक मार्गदर्शक या
गुरु (मुर्शिद/शेख़) के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था, "मन ला शैखा लहू फ शैखहुश शैतान" (जिसका कोई
शेख/मुर्शिद नहीं होता, उसका शेख शैतान होता है)। आत्म-सुधार (तज़किया) और ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग में इंसान के भीतर का अहंकार
(नफ़्स) और शैतान का बहकावा सबसे बड़ी बाधा होते हैं। यदि कोई साधक बिना
किसी अनुभवी गुरु के अकेले ही कठिन आध्यात्मिक साधनाएं शुरू कर देता है, तो उसे अपनी गलतियों या भ्रम का पता नहीं चलता। ऐसे में
शैतान उसे इस धोखे में डाल सकता है कि वह बहुत बड़ा धार्मिक या सिद्ध पुरुष बन
चुका है। गुरु के बिना व्यक्ति का अपने मन और धार्मिक ज्ञान पर जो "दृढ़
विश्वास" होता है, वह कई बार उसका अपना भ्रम या शैतानी घमंड हो सकता है।
कई पीर तो अद्भुत वेश धारण करते हैं और अद्भुत, अनोखा या रहस्यमयी ढंग का
व्यवहार करते हैं। कुछ लंबा
चोंगा धारण करते हैं। ये चोंगे
रंग-बिरंगे वस्त्रों के टुकड़ों से बने होते हैं। कुछ घास खाते हैं। कई अपने बेढंगेपन से लोगों का ध्यान खींचते हैं। मलामती सूफी जानबूझकर ऐसा व्यवहार
या वेशभूषा अपनाते हैं जिससे समाज उन्हें बुरा समझे या उनका सम्मान न करे। इनका
मुख्य मकसद अपने अहंकार
(नफ़्स) को खत्म करना होता है। वे नहीं चाहते कि लोग उनकी तारीफ करें या उन्हें
बड़ा संत मानकर उनकी पूजा करें। वे तारीफ से बचते हैं और खुद को ईश्वर की भक्ति
में पूरी तरह छुपाकर रखते हैं। मज्ज़ूब वे साधक होते हैं जो ईश्वर के प्रेम और
आध्यात्मिक आनंद में इस कदर डूब जाते हैं कि उनका अपनी सुध-बुध और सांसारिक होश खो
जाता है। ये अक्सर फटे-पुराने कपड़े पहनते हैं, सुध-बुध खोए रहते हैं, और कभी-कभी बच्चों जैसा या पागलों जैसा व्यवहार करते हैं। सूफी
परंपरा में माना जाता है कि इनका दिमाग दुनिया से कटकर पूरी तरह ईश्वर से जुड़
चुका है, इसलिए इन पर
दुनिया के नियम या सामान्य सामाजिक व्यवहार लागू नहीं होते। सूफ़ियों में मान्यता
है कि पीर जो कुछ भी करते हैं वह सांसारिक मनुष्यों की दृष्टि में अनुचित और खराब
लग सकता है, लेकिन उसके पीछे का रहस्य पीर को
ही मालूम रहता है। वह जो कुछ
भी करता है, परमात्मा की इच्छा से ही करता है।
जहाँ एक तरफ इन अद्भुत पीरों को लोक संस्कृति में बहुत
सम्मान दिया जाता है, वहीं हज़रत बायज़ीद बुस्तामी सहित मुख्यधारा के
बड़े सूफी संतों ने हमेशा शरिया (धार्मिक नियमों) और सादगी पर ज़ोर दिया है। विद्वानों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति का अद्भुत वेश
धारण करना या हवा में उड़ना उसकी असल महानता नहीं है। असली पीर या गुरु वही है जो
आम इंसान की तरह रहते हुए भी ईश्वर के आदेशों का पालन करे और दूसरों को सही रास्ता
दिखाए।
सूफ़ियों में विनम्रता एक आदरणीय गुण है। एक सद्गुरु सदा अपने
मुरीद को विनम्रता सिखाता है। सूफ़ी संत अमीर ख़ुसरो के पीर प्रसिद्ध सूफ़ी संत ख़्वाजा निजामुद्दीन औलिया रह. ने
उन्हें श्रद्धा और आध्यात्मिकता की शिक्षा
देते हुए कहते हैं कि जब अंत में सभी
को पांव तले की ख़ाक बन जाना है,
तब क्यों न हम पांवों तले की ख़ाक अर्थात् ख़ाकसार
(विनम्र) ही बनकर
रहें। हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया (रह.) का यह कथन सूफी
मत के सबसे बुनियादी सिद्धांत—'फ़ना' (अहंकार का अंत) और 'आजिज़ी' (परम विनम्रता)—को दर्शाता है। उन्होंने
इंसानी वजूद की हकीकत को बयां करने और इंसान के भीतर से घमंड को पूरी तरह खत्म
करने के लिए यह बात कही थी। सूफी संतों की नज़र में इंसान का शरीर मिट्टी (ख़ाक)
से बना है और मौत के बाद उसे वापस मिट्टी में ही मिल जाना है। ख़्वाजा साहब का
मानना था कि जब हमारा अंतिम ठिकाना और हमारी हकीकत यही ख़ाक (धूल) है,
तो
इस चार दिन की जिंदगी में धन, पद
या ज्ञान का घमंड करना सरासर नासमझी है। जब अंत में पैर तले की धूल ही बनना है,
तो
जीते जी खुद को धूल जैसा विनम्र क्यों न बना लिया जाए। तसव्वुफ़ (सूफीवाद)
में 'नफ़्स' यानी
इंसान के अहंकार को ईश्वर की राह में सबसे बड़ी रुकावट माना गया है। ख़्वाजा
निज़ामुद्दीन औलिया (रह.) अपने मुरीदों (शिष्यों) को सिखाते थे कि जब तक इंसान खुद
को दूसरों से श्रेष्ठ समझता रहेगा, तब
तक वह ईश्वर के करीब नहीं आ सकता। 'ख़ाकसार'
(धूल
के समान) बनने का मतलब है अपने अहंकार को इस कदर मिटा देना कि कोई आपके साथ बुरा
भी करे, तो आप पलटकर उससे बदला न लें। ख़्वाजा
निज़ामुद्दीन औलिया (रह.) सूफियों के 'चिश्तिया'
सिलसिले
के महान संत थे। इस सिलसिले की सबसे बड़ी खूबी ही जनसेवा (ख़ल्क़-ए-ख़ुदा की
ख़िदमत) और शांतिप्रियता थी। उनके दरबार (ख़ानक़ाह) में राजा से लेकर
रंक तक, हर धर्म और वर्ग का व्यक्ति आता
था। वे सभी को एक समान सम्मान देते थे। उनका मानना था कि एक सूफी को ज़मीन की तरह
होना चाहिए, जिसके ऊपर से हर कोई गुज़रता है
(चाहे वह अच्छा हो या बुरा), लेकिन
ज़मीन बदले में सभी को केवल फल, फूल
और आश्रय ही देती है।
पीर शिष्य को कभी भी अपने जैसा बनाना
नहीं चाहता। उसकी दिलचस्पी शिष्य जैसा भी है, शिष्य को जो बनना चाहिए
या जो वह बन सकता है, केवल उसी में होती है। वह इसके लिए शिष्य की मदद करता है। वह
शिष्य को न तो सुधारता है न उसमें कोई मौलिक परिवर्तन करता है, बस शिष्य को सहारा
देता है। एक सद्गुरु तो यह दावा भी नहीं करता कि वह शिष्य की सहायता करेगा। वह तो
ईश्वर से प्रार्थना करता है, ईश्वर उसे लक्ष्य तक पहुंचा दे। इसीलिए हज़रत
जलालुद्दीन रूमी (रह.) ने फरमाया था, "बिना पीर (गुरु) के
सफ़र मत करो, चाहे रास्ता कितना भी जाना-पहचाना क्यों न हो।"
इसके बाद हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि मुर्शिद (अध्यात्मिक गुरु) की ज़रूरत क्यों है?
पीर को हज़रत अली का प्रत्यक्ष वंशज माना जाता है। मुर्शिद-ए-कामिल (सच्चे
गुरु) की ज़रूरत का पता इस बात से चलता है कि क़ुरआन को क़ुरआन इसलिए मानते हैं
क्योंकि उसकी सारी आयतें बिना किसी शक़ के अल्लाह का बयान तस्लीम की जाती हैं। हज़रत मुहम्मद सल्ल. की हदीस को इसलिए मानते हैं
क्योंकि वह भरोसेमंद प्रमाणों के साथ मौजूद है। ठीक इसी तरह किसी रूहानी मुर्शिद
का क़ल्ब (हृदय) हज़रत मुहम्मद सल्ल. से मिला होता है। सूफ़ियों का दल ही वह
तीसरा दल है जो हज़रत मुहम्मद सल्ल. का सच्चा वारिस होता है। इस दल का सिलसिला
रूहानी कड़ियों की तरह मज़बूत है और इसका स्रोत हज़रत मुहम्मद सल्ल. का दिल है।
सूफ़ियों के सारे सिलसिले हज़रत मुहम्मद सल्ल. से शुरू होकर हज़रत अबूबकर, हज़रत उमर
फ़ारूक़, हज़रत उसमान गनी, हज़रत मौला अली, हज़रत हारिसा, हज़रत अबूजरगफ़ारी, हज़रत सलमान
फ़ारसी, हज़रत अबूउबैदा, हज़रत अबूदरदा, हज़रत मआज इब्नेजबल, हज़रत अबूहुरैह, हज़रत
अबूमूसा, हज़रत अश्अरी, हज़रत इमरान बिन हसीन आदि नामों से गुज़रते हैं। हदीसों और
क़ुरान की आयतों की रोशनी में गुरु अपने शागिर्दों को हज़रत मोहम्मद के किरदार की
खूबियां बताते हैं। अपने गुरुओं की मदद से वो भी हज़रत मोहम्मद की शख़्सियत की
खूबियों से रूबरू होते थे और उन्हें अपनाते हैं।
सच्चा मुर्शिद इस्लाम के बुनियादी नियमों (शरिया)
का पूरी तरह पालन करता है। वह कभी यह दावा नहीं करेगा कि वह आध्यात्मिक
ऊंचाइयों पर पहुंच गया है, इसलिए अब उसे नमाज़ या रोज़े की ज़रूरत नहीं है। उसका
उठना-बैठना, बोलना और व्यवहार पैगंबर मुहम्मद (स.) के अख़्लाक़ (उच्च
चरित्र) और सादगी के मुताबिक होता है। वह दीन (धर्म) को अपनी कमाई का
ज़रिया नहीं बनाता। वह मुरीदों से पैसे, नज़राने या ज़मीन-जायदाद की लालच नहीं
रखता। सच्चे मुर्शिद की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उनकी महफ़िल या संगत में
बैठते ही इंसान का ध्यान दुनिया से हटकर खुदा की तरफ लगने लगता है। दिल को एक
अजीब सा सुकून मिलता है और गुनाहों से नफ़रत होने लगती है। वह कभी अपनी महानता या
करामात (चमत्कारों) का ढोंग नहीं रचता। वह हमेशा खुद को आजिज़ (विनम्र) और दूसरों
से कमतर समझता है। उनकी रूहानी तवज्जो (आध्यात्मिक दृष्टि) ही शिष्य के दिल
की गंदगी (जैसे ईर्ष्या, लालच, गुस्सा) को साफ करने के लिए काफी होती है।
सच्चे मुर्शिद के पास उनके अपने गुरु से मिली हुई 'इजाज़त' (खिलाफ़त या
प्रामाणिक प्रमाण) होती है। उनका आध्यात्मिक सिलसिला अपने गुरुओं से होते हुए सीधे
पैगंबर मुहम्मद (स.) तक पहुँचता है। जिसका कोई प्रामाणिक सिलसिला नहीं होता, उसे सूफी मत में
स्वीकार नहीं किया जाता। महान सूफी संत हज़रत सुल्तान बाहू (रह.) फरमाते हैं कि "कामिल मुर्शिद वह
नहीं है जो तुम्हें हवा में उड़ाए या पानी पर चलाए, बल्कि कामिल
मुर्शिद वह है जो तुम्हारे मुर्दा दिल को अल्लाह के ज़िक्र से ज़िंदा कर दे।"
सूफ़ीमत में जिसे ज़िक्र कहते हैं, वह
ध्यान के कहीं बहुत पास है। यह सिर्फ़ किसी नाम का लगातार दुहराना
भर नहीं है। बल्कि यह शांत और मौन बैठ कर “उसे” अपने में जज़्ब
करना है। साधक कुछ भी सोचता नहीं। वह प्रत्यक्ष रूप से अपने गुरु के पास होता है।
जिसे भारतीय परंपरा में हम सत्संग कहते हैं, स्थिति बिल्कुल वैसी ही होती है। साधक
सद्गुरु की उपस्थिति में बना रहता है। वह अपने हृदय के कपाट खोले रहता है। ग्रहण
करने को तत्पर रहता है – बिना किसी आशा और अपेक्षा के। मुर्शिद-ए-कामिल
(सद्गुरु) से बर्क़ (अनुग्रह) हमेशा प्रवाहित होता रहता है। जो साधक तैयार
है और साथ ही जो इसका अधिकारी है, .. उसे वह प्राप्त हो जाता है। जब साधक शांत,
मौन बैठे हुए निर्विचार अवस्था में होता है, तो ऐसी स्थिति में उसके शून्याकाश में
मुर्शिद-ए-कामिल (सच्चे गुरु) प्रवेश कर सकता है। उसकी ऊर्जा तेजी से साधक
की ओर बढ़ती है, यही बर्क़ है, अनुग्रह है।
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मनोज
कुमार