राष्ट्रीय आन्दोलन
492. भारत के राजा वर्ग – देसी रियासतें
1947
ग़ुलाम भारत के दो हिस्से
थे – ब्रिटिश इंडिया और देसी रियासतें। ये रियासतें क़ानूनी तौर पर पूरी तरह स्वतंत्र
थीं। पर ये अंग्रेज़ी प्रभुसत्ता को स्वीकारती थीं। उपमहाद्वीप में 565 देशी रियासतें थीं, जो कुल क्षेत्रफल का 48% थीं। ये प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं थीं, बल्कि स्थानीय राजाओं (जैसे- राजा, नवाब, महाराजा) द्वारा शासित थीं, जिन पर ब्रिटिश
सर्वोच्चता (Paramountcy) का नियंत्रण था। 1857 की आज़ादी की लड़ाई में भारत के राजाओं ने कंपनी सरकार के ख़िलाफ़ बढ़-चढ़कर हिस्सा
लिया था। लेकिन उसके बाद ये लोग सल्तनत के हाथ की कठपुतली बन गए थे। एक तरफ़ ये लोग
वायसराय को सलामी ठोकते दूसरी तरफ़ प्रजा का शोषण करते।
राजाओं के शासन वाले
इलाकों में हैदराबाद, मैसूर और कश्मीर जैसी भारतीय रियासतें शामिल थीं, जो आकार में कई यूरोपीय देशों के बराबर थीं, और साथ ही कई छोटी
रियासतें भी थीं जिनकी आबादी हज़ारों में थी। इन सभी में एक बात समान थी कि चाहे
वे बड़ी रियासतें हों या छोटी, सभी ने ब्रिटिश सरकार
की सर्वोच्चता को स्वीकार किया था। इसके बदले में, अंग्रेज़ों ने राजाओं
को उनकी निरंकुश सत्ता पर आने वाले किसी भी अंदरूनी या बाहरी ख़तरे से सुरक्षा का
भरोसा दिया।
अधिकांश रियासतों में
राजाओं और नवाबों का निरंकुश शासन था। जनता को सरकार चुनने या अपने विचार रखने का
कोई अधिकार नहीं था। यहां की जनता की हालत बहुत ख़राब थी। जनता को सभा करने, संगठन बनाने या नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) जैसे बुनियादी अधिकार
प्राप्त नहीं थे। यह धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक शोषण का शिकार थीं। आज़ादी के समय ये राजा लोग सरकार
बहादुर के सहायक थे, ताकि इनका सामंतवाद टिका रहे। इन रियासतों में से कुछ जैसे हैदराबाद,
मैसूर, कश्मीर का आकार तो काफ़ी बड़ा था, लेकिन कई रियासतें ऐसी थीं जिनकी कुल आबादी
महज़ कुछ हज़ार रही होगी। इन रियासतों को अंग्रेज़ों का साथ मिलता था और यह उनकी सुरक्षा
की गारंटी थी। अधिकांश जगह निरंकुश शासक थे। सारी सत्ता राजाओं या उनके एजेंटों के
हाथ में केन्द्रीत थी। ब्रिटिश भारत की तुलना में रियासतों में किसानों का अधिक
शोषण होता था। यहां पर ज़मीन पर लगने वाला टैक्स (लगान) अक्सर ब्रिटिश भारत के
मुक़ाबले ज़्यादा होता था और वहाँ कानून का राज और नागरिक आज़ादी भी बहुत कम थी। अपनी
विलासिता के लिए राजा-महाराजा राजकोष का मनमाना इस्तेमाल करते थे। राज्य के खजाने
और राजस्व का एक बड़ा हिस्सा जनता के कल्याण के बजाय राजाओं के निजी शौक और
ऐशो-आराम पर खर्च किया जाता था। जनता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक दृष्टि
से काफी पिछड़ी थी। रियासतों में शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन और संचार की सुविधाएं ब्रिटिश प्रांतों की तुलना में बहुत कम थीं।
अधिकांश राज्य आधुनिकीकरण से अछूते रह गए। सामंती व्यवस्था (Feudal System) के कारण किसानों को बेगार (बिना मजदूरी के काम) और अन्य उत्पीड़न का सामना
करना पड़ता था।
बीसवीं सदी में भारतीय
रियासतों की जो हालत हुई, उसके लिए ब्रिटिश सरकार ही ज़िम्मेदार थी। अंग्रेज़ों ने इन राजाओं को राष्ट्रीय आंदोलन को कमज़ोर करने के हमेशा इस्तेमाल किया।
अंग्रेज़ों के दबाव में रियासतों में प्रायः कोई सुधार कार्यक्रम लागू ही नहीं किया
जाता। समय के साथ राष्ट्रीय चेतना ने देसी रियासतों की जनता को भी प्रभावित किया। 1920 में छिड़े असहयोग आंदोलन के प्रभाव के कारण मैसूर, हैदराबाद, बड़ौदा, काठियावाड़,
दक्कन, जामनगर, इंदौर आदि रियासतों में प्रजामंडल (स्टेट पीपुल्स कांफ़्रेस/रियासती जन सम्मेलन) का गठन हुआ। दिसंबर 1927 में इनका अखिल भारतीय सम्मेलन भी
हुआ, जिसमें रियासतों के 700 राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इस पहल के लिए
मुख्य रूप से बलवंतराय मेहता, मणिलाल कोठारी और
जी.आर. अभ्यंकर ज़िम्मेदार थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
ने भी 1920 सी. विजयराघवाचार्य की अध्यक्षता में हुए नागपुर सत्र में, प्रस्ताव पारित कर रियासतों के राजाओं से तुरंत उत्तरदायी सरकार के गठन की मांग
की। कांग्रेस ने रियासतों की जनता को कांग्रेस का सदस्य बनने की अनुमति दे दी। हां कांग्रेस के सदस्य के रूप में रियासत के अंदर उन्हें राजनीतिक गतिविधियां शुरू
करने की अनुमति नहीं थी। कांग्रेस चाहती थी कि रियासत की जनता ख़ुद संघर्ष के लिए संगठित
हों। इस तरह कांग्रेस और देसी रियासतों के बीच कोई संपर्क नहीं था। 1929 में लाहौर कांग्रेस में अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू ने घोषणा की, “देसी रियासतें शेष भारत
से अलग नहीं रह सकतीं। इन रियासतों की तकदीर का फैसला सिर्फ़ वहां की जनता ही कर सकती
हैं।” बाद के वर्षों में कांग्रेस ने राजाओं से रियासतों की जनता के मौलिक अधिकारों
की बहाली की मांग की।
1935 के भारत सरकार अधिनियम ने संविधानिक रूप से देसी रियासतों को शेष भारत (ब्रिटिश
इंडिया) से जोड़ा। विधानमंडल में रियासतों को प्रतिनिधित्व दिया गया। लेकिन रियासतों
से प्रतिनिधि चुनने का अधिकार केवल राजाओं, महाराजाओं को ही दिया गया। अंग्रेज़ राजाओं
के इन एजेंटों को राष्ट्रीय आंदोलन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करते थे। कांग्रेस ने मांग की
कि रियासतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जनता ख़ुद अपना प्रतिनिधि चुने। 1937 में अनेक प्रांतों में कांग्रेस की सरकार गठित होने से रियासतों की जनता में एक
नया आत्मविश्वास जगा, नई उम्मीदें जगीं और राजनीतिक गतिविधियां तेज़ हुईं। कांग्रेस
अब सिर्फ़ विपक्ष की पार्टी नहीं रह गई थी, बल्कि सत्ताधारी
पार्टी बन गई थी और उसमें आस-पास की भारतीय रियासतों में हो रही घटनाओं को
प्रभावित करने की क्षमता थी।
जयपुर, कश्मीर, राजकोट,
पटियाला, हैदराबाद, मैसूर, ट्रावणकोर, उड़ीसा आदि कई रियासतों में उत्तरदायी सरकार और
सुधारों की मांग को लेकर रियासतों में कई आंदोलन छिड़े। अब कांग्रेस भी रियासतों में
जनता से संघर्ष की अपील करने लगी थी। गांधीजी ने भी इसका समर्थन करते हुए 24 जनवरी, 1939 को 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “मेरी राय में रियासतों
में हस्तक्षेप न करने की कांग्रेस की नीति सही थी, क्योंकि तब जनता जागरूक नहीं हुई
थी। अब जबकि जनता राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुकी है और संघर्ष के लिए तैयार है, पुरानी
नीति पर चलना कायरता होगी।” इसके बाद, मार्च 1939 में त्रिपुरी में कांग्रेस ने अपनी नई नीति बताने वाला एक प्रस्ताव
पास किया: ‘रियासतों के लोगों में जो बड़ी जागृति आ रही है, उससे कांग्रेस द्वारा खुद पर लगाई गई पाबंदियों में ढील दी जा सकती है या
उन्हें पूरी तरह हटाया जा सकता है, जिससे कांग्रेस और
रियासतों के लोगों के बीच जुड़ाव और बढ़ेगा।’ साथ ही 1939 में, AISPC ने लुधियाना अधिवेशन के लिए जवाहरलाल नेहरू को अपना अध्यक्ष चुना, जिससे रियासती भारत और ब्रिटिश भारत के आंदोलनों के विलय पर मुहर लग गई। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से रियासतों में भी आंदोलन का शंखनाद हुआ। रियासतों को
भारतीय राष्ट्र का अभिन्न अंग मानने की मांग उठी।
जब देश स्वतंत्र हुआ, तो
उस समय देश की 25 प्रतिशत जनता यानी 10 करोड़ लोग इन देसी राज्यों के अधीन थे। वैधानिकता की आड़ में अंग्रेज़ इन देसी राज्यों
को पूर्ण आज़ादी देने की योजना बना रहे थे। यह नीति लागू हो जाती तो देश के दो नहीं
बीसियों टुकड़े हो जाते। त्रावणकोर के राजा ने अपने राज्य में भाषण देने और जुलूस निकालने
पर प्रतिबंध लगा रखा था। कश्मीर के महाराजा ने नेशनल कॉन्फ्रेन्स के नेताओं को जेल
में बन्द कर रखा था और सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दिया था। ऐसे कई राजा-महाराजा थे,
जिनकी मंशा थी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद ये लोग स्वतंत्र हो जाएंगे और तब ब्रिटिश
कॉमनवेल्थ के सदस्य बनेंगे। गांधीजी का स्पष्ट मानना था कि स्वतंत्र भारत में जागीरदारी
प्रथा का स्थान नहीं है। ये राजा चाहें तो लंदन, पेरिस में ऐश कर सकते हैं, लेकिन उनके
मातहत प्रजा को ग़ुलाम रखने का उन्हें हक़ नहीं है। प्रजा का सार्वभौमत्व स्वीकार करना
उन्हें अनिवार्य होगा।
देशी राज्यों की समस्या
भारतीय नेताओं के सामने बहुत गंभीर थीं। भारतीय स्वाधीनता एक्ट में यह कहा गया था कि
वे सारी संधियां और परंपराएं, जिनके द्वारा ब्रिटिश सरकार देशी राज्यों पर अपनी सार्वभौम
सत्ता भोगती थीं, इस एक्ट से रद्द हो जाएंगी। राजाओं के राजकीय परिषद नरेन्द्र-मंडल
का अध्यक्ष नवाब भोपाल सर हमीदुल्ला खान था। उसका इरादा था कि देश के विभाजन की अवस्था
में 450 देसी राज्य अपनी हस्ती
को प्रशस्त करेंगे। कुछ विचारशील राजाओं को भोपाल के नवाब का अभिभावक बनना बुरा लगा।
मार्च 1947 तक 16 में से 10 बड़े राजाओं ने, जिन्हें
यह लगा कि अलग-थलग रहकर स्वाधीन रहने में हमारा भविष्य उज्ज्वल बहीं है, संविधान सभा
में अपने प्रतिनिधि भेज दिए। कुछ महत्वाकांक्षी राजाओं ने देखा कि भारत के दो भाग हो
रहे हैं, तो उन्होंने सोचा कि अपने स्वेच्छाचारी शासन को बनाए रखने का एक और अवसर हमें
मिल रहा है। उन्होंने घोषणा की कि चूंकि ये भाग सांप्रदायिक आधार पर बन रहे हैं इसलिए
हम किसी में नहीं मिलेंगे। 11 जून को त्रावणकोर के दीवान
सर सी.पी. रामस्वामी अय्यर ने 15 अगस्त को त्रावणकोर के
स्वाधीन हो जाने के निर्णय की घोषणा की। 12 जून को हैदराबाद के निज़ाम ने घोषणा कर दी कि सार्वभौम सत्ता के अंत होते ही हैदराबाद
भी स्वतंत्र हो जाएगा। त्रावणकोर में लोकतांत्रिक वैधानिक अधिकार पाने के लिए जनांदोलन
चल रहा था। गांधीजी ने कहा, “ज्यों ही सत्ता भारतीय
हाथ में आई त्रावणकोर के दीवान चाहने लगे हैं कि वे भारतीय संघ में शरीक न हों। यह
स्थिति असहनीय है। समय बदल गया है। यदि राजा लोग न चेते तो मिट जाएंगे। स्वाधीनता आ
रही है। स्वतंत्र भारत में ये राजागण प्रभु या स्वामी बनकर नहीं, बल्कि अपनी प्रजा
के सेवक और संरक्षक बनकर ही रह सकते हैं। उन्हें भारतीय जनता की सार्वभौम सत्ता स्वीकार
करनी होगी।” रियासत अपने को स्वतंत्र घोषित कर सकें, सरदार पटेल की राजनीति और दूरदर्शिता
के कारण ऐसी नौबत नहीं आ पाई। लॉर्ड माउंटबेटन ने भी घोषणा कर दी, “कोई देशी राज्य अलग उपनिवेश
के रूप में ब्रिटिश राष्ट्र-मंडल में प्रवेश नहीं कर सकता।” इसका राजाओं पर अच्छा
असर हुआ। भोपाल के नवाब ने नरेन्द्र मंडल के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके
स्थान पर महाराजा पटियाला चुन लिए गए। उनके नेतृत्व में नरेन्द्र मंडल की स्थायी समिति
ने यह प्रस्ताव पास किया कि नरेन्द्र मंडल का अब कोई उपयोग नहीं रहा, इसलिए उसका अंत
कर देना चाहिए।
राजाओं को जुलाई, 1947 तक का समय दिया गया था, ताकि वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकें। नेहरू
ने घोषणा की कि जो रजवाड़े संविधान सभा में शामिल होने से इंकार करते हैं, उन्हें शत्रुतापूर्ण
माना जाएगा। पटेल ने राजनीतिक विभाग के स्थान पर रियासतों का नया विभाग संभाल लिया
था और वी.पी. मेनन उनके सचिव थे। भारतीय भूभाग के साथ रियासतों के एकीकरण का काम तेज़ी
से शुरू कर दिया गया। छोटी-छोटी रियासतें पास वाले प्रान्तों में विलीन कर दी गईं।
अलग से ये अपने प्रशासन के ख़र्च का बोझ नहीं उठा सकती थीं। राजाओं को अपनी पदवियां
और प्रतिष्ठा में अपने महल और निजी सम्पत्ति रखने की अनुमति दे दी गई। उनके ख़र्च की
रकम नियत कर दी गई। भारत में सम्मिलित होने वाले राजाओं ने संविधान समिति में अपने
प्रतिनिधि भी भेजे। जुलाई के अंतिम सप्ताह में त्रावणकोर के महाराजा ने भारतीय संघ
में मिल जाने का निर्णय सुना दिया।
यह राष्ट्रीय नेतृत्व, खासकर सरदार पटेल की
ही काबिलीयत थी कि ब्रिटिश सर्वोच्चता के खत्म होने से बनी बेहद जटिल स्थिति —
जिसने रियासतों को कानूनी रूप से स्वतंत्र बना दिया था — को इस तरह से संभाला गया
कि तनाव काफी हद तक कम हो गया। ज़्यादातर रियासतें कूटनीतिक दबाव, ज़बरदस्ती, जन-आंदोलनों और इस एहसास के कारण कि आज़ादी कोई
व्यावहारिक विकल्प नहीं है, विलय-पत्र (Instruments of
Accession) पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हो गईं। 14 अगस्त, 1947 तक लगभग सभी राजाओं ने
निर्णय कर लिया था कि वे किस देश में सम्मिलित होंगे। अधिकांश राजाओं ने ‘विलय दस्तावेज़’
'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर दस्तख़त कर दिए। तीन
राजा अपवाद थे। जूनागढ़ के नवाब, कश्मीर के महाराजा हरिसिंह और हैदराबाद के निजाम ने
किसी निर्णय का ऐलान नहीं किया था। वे एक वर्ष का समय चाहते थे।
हैदराबाद और राजकोट के
मामले इस बात के अच्छे उदाहरण हैं कि कैसे संघर्ष के तरीके ब्रिटिश भारत की
स्थितियों के हिसाब से विकसित हुए थे। साथ ही हम पाते हैं कि
देसी रियासतों में अहिंसक सामूहिक सविनय अवज्ञा या सत्याग्रह जैसे तरीकों की वैसी उपयोगिता
या प्रभावशीलता नहीं थी। नागरिक स्वतंत्रता और प्रतिनिधि संस्थाओं की कमी का मतलब
था कि राजनीतिक गतिविधियों के लिए बहुत कम जगह थी। ब्रिटिश सरकार से मिलने वाली सुरक्षा ने रियासतों के शासकों को काफी हद तक
जनता के दबाव का सामना करने में सक्षम बनाया। परिणाम यह हुआ कि इन रियासतों में
आंदोलनों द्वारा हिंसक विरोध के तरीकों को अपनाने की प्रवृत्ति बहुत अधिक थी। उदाहरण
के लिए, हैदराबाद में, अंततः राज्य कांग्रेस
ने भी हमले के हिंसक तरीकों का सहारा लिया, और आखिरकार, भारतीय सेना द्वारा ही निज़ाम को काबू में किया जा सका।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
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