गुरुवार, 9 जुलाई 2026

493. राजकोट सत्याग्रह (1938-1939)

राष्ट्रीय आन्दोलन

493. राजकोट सत्याग्रह (1938-1939)

राजकोट सत्याग्रह (1938-1939) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश भारत की रियासतों (प्रिंसली स्टेट) में लोकतांत्रिक सुधारों और नागरिक स्वतंत्रता के लिए चलाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अहिंसक आंदोलन था। यह आंदोलन इस मायने में अनोखा था कि इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गांधी को पहली बार किसी देशी रियासत के आंतरिक प्रशासन में सीधे हस्तक्षेप करने पर मजबूर किया। इसका कारण राजकोट के शासक (ठाकुर) धर्मेंद्रसिंहजी और उनके दीवान वीरवाला द्वारा लगाए गए भारी कर, तानाशाही रवैया और लोगों के नागरिक अधिकारों (भाषण और संगठन की स्वतंत्रता) पर प्रतिबंध था। यह ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि ब्रिटिश संरक्षण में चल रही एक रियासत (प्रिंसली स्टेट) के निरंकुश शासक और उसके दीवान के खिलाफ जनता का संघर्ष था।

राजकोट शहर

काठियावाड़ प्रायद्वीप में स्थित राजकोट की आबादी लगभग 75,000 थी। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान, राजकोट शहर 'वेस्टर्न इंडिया स्टेट एजेंसी' का प्रशासनिक मुख्यालय था। यहाँ ब्रिटिश रेजिडेंट का निवास स्थान था, और ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट यहाँ से उस इलाके के कई राज्यों पर अपनी निगरानी रखता था। भौगोलिक दृष्टि से यह आजी और न्ययारी नदियों के किनारे बसा हुआ है। यहाँ से प्रायद्वीप के अन्य सभी प्रमुख शहरों की दूरी लगभग समान है। इस शहर की स्थापना वर्ष 1612 में जाडेजा राजपूत वंश के ठाकुर साहब विभाजी अजोजी ने की थी। महात्मा गांधी ने अपने जीवन के शुरुआती वर्ष राजकोट में ही बिताए थे। उनके पिता करमचंद गांधी यहाँ के दीवान थे। गांधीजी की प्रारंभिक शिक्षा यहीं के 'अल्फ्रैड हाई स्कूल' (अब महात्मा गांधी म्यूजियम) में हुई थी। यहाँ के राष्ट्रीय शाला की स्थापना 1921 में महात्मा गांधी ने गैर-सहयोग आंदोलन के दौरान की थी, ताकि छात्रों को राष्ट्रीय और खादी आधारित शिक्षा दी जा सके। यह राजकोट सत्याग्रह का मुख्य केंद्र भी रहा था और गांधीजी ने यहीं आमरण अनशन किया था।

लखाजीराज का शासन काल

राजकोट पर 1930 तक (बीस साल तक) लखाजीराज ने शासन किया। उन्होंने अपने राज्य के औद्योगिक, शैक्षिक और राजनीतिक विकास को बढ़ावा देने के लिए बहुत प्रयास किए। लखाजीराज ने 1923 में 'राजकोट प्रजा प्रतिनिधि सभा' ​​की शुरुआत करके सरकार में लोगों की भागीदारी को बढ़ावा दिया। इस प्रतिनिधि सभा में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने गए 90 प्रतिनिधि शामिल थे। हालाँकि शासक, जिन्हें 'ठाकोर साहिब' कहा जाता था, के पास किसी भी सुझाव को वीटो करने (अस्वीकार करने) का पूरा अधिकार था, फिर भी लखाजीराज के शासनकाल में ऐसा बहुत कम ही होता था और उनके नेतृत्व में लोगों की भागीदारी को काफी मान्यता मिली।

लखाजीराज ने राष्ट्रवादी राजनीतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया। उन्होंने 1921 में राजकोट में पहली काठियावाड़ राजनीतिक कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के लिए मनसुखलाल मेहता और अमृतलाल सेठ को अनुमति दी, जिसकी अध्यक्षता विट्ठलभाई पटेल ने की थी। वे खुद कॉन्फ्रेंस के राजकोट और भावनगर (1925) सत्रों में शामिल हुए। राजकोट में एक राष्ट्रीय स्कूल शुरू करने के लिए उन्होंने ज़मीन दान की। यह स्कूल राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट या रेजिडेंट की परवाह किए बिना, उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीक के तौर पर खादी पहनी। उन्हें गांधीजी और उनकी उपलब्धियों पर बहुत गर्व था। वे अक्सर 'राजकोट के बेटे' को दरबार में बुलाते थे और गांधीजी को सिंहासन पर बिठाते थे, जबकि वे खुद दरबार में बैठते थे। उन्होंने राज्य की यात्रा के दौरान जवाहरलाल नेहरू का सार्वजनिक स्वागत किया।

ठाकुर धर्मेंद्र सिंह ने राज्य की बागडोर संभाली

1939 में लखाजीराज की मौत हो गई। उनके बेटे ठाकुर धर्मेंद्र सिंह ने राज्य की बागडोर संभाल ली। नए ठाकुर को सिर्फ़ ऐशो-आराम और मौज-मस्ती में दिलचस्पी थी। असली ताकत क्रूर दीवान वीरवाला के हाथों में आ गई। उन्होंने ठाकुर को राज्य की दौलत बर्बाद करने से रोकने के लिए कुछ नहीं किया। हालात इतने खराब हो गए कि राज्य को माचिस, कपड़े, चीनी, चावल और सिनेमा लाइसेंस बेचने के एकाधिकार (मोनोपॉली) अलग-अलग व्यापारियों को बेचने पड़े। इसका तुरंत असर कीमतों में बढ़ोतरी के तौर पर दिखा और लोगों में असंतोष और बढ़ गया।

पहला संघर्ष

रियासत की जनता के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने का अधिकार और बुनियादी शिक्षा सुविधाओं का घोर अभाव था। राजकोट और काठियावाड़ में राजनीतिक समूहों के कई सालों के राजनीतिक काम से संघर्ष की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। इस दमनकारी शासन के खिलाफ जनता को संगठित करने के लिए 'राजकोट प्रजा परिषद' की स्थापना की गई। पहले समूह का नेतृत्व मनसुखलाल मेहता और अमृतलाल सेठ ने किया और बाद में बलवंतराय मेहता ने। दूसरे का नेतृत्व फूलचंद शाह ने किया; तीसरे का व्रजलाल शुक्ला ने। चौथे समूह में गांधीवादी रचनात्मक कार्यकर्ता शामिल थे, जो 1936 के बाद यू.एन. ढेबर के नेतृत्व में राजकोट संघर्ष में मुख्य समूह के तौर पर उभरे। स्थानीय 'प्रजा मंडल' और जनता रियासत में एक लोकतांत्रिक और उत्तरदायी शासन (responsible government) की स्थापना चाहती थी।

पहला संघर्ष गांधीवादी कार्यकर्ता बेचरवाला वढेरा और जेठालाल जोशी के नेतृत्व में शुरू हुआ। उन्होंने दीवान वीरवाला के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन की थी। उन्होंने सरकारी कॉटन मिल के 800 मज़दूरों को एक यूनियन में संगठित किया और बेहतर काम की स्थितियों की मांग को लेकर 1936 में इक्कीस दिन की हड़ताल का नेतृत्व किया। दरबार को यूनियन की मांगें मानने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस जीत ने जोशी और वढेरा को मार्च 1937 में काठियावाड़ राजकीय परिषद की पहली बैठक बुलाने के लिए प्रोत्साहित किया। 15,000 लोगों की उपस्थिति वाली इस बैठक में जिम्मेदार सरकार, करों में कमी और राज्य के खर्च में कटौती की मांग की गई। दरबार की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।

सरदार पटेल का प्रवेश

15 अगस्त 1938 को परिषद के कार्यकर्ताओं ने गोकुलाष्टमी मेले में जुए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। पहले से तय योजना के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को पहले एजेंसी पुलिस और फिर राज्य पुलिस ने बुरी तरह लाठियों से पीटा। इसके परिणामस्वरूप राजकोट शहर में पूरी तरह से हड़ताल हो गई। मजदूरों और किसानों ने भी हड़तालें शुरू कर दीं। आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखकर और जनता के निमंत्रण पर सरदार वल्लभभाई पटेल ने आंदोलन की कमान संभाली। उन्होंने सूती कपड़ों और राज्य के एकाधिकार वाली वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया। 5 सितंबर को परिषद का एक सत्र आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता सरदार पटेल ने की। दीवान वीरावाला के साथ एक बैठक में, पटेल ने परिषद की ओर से जिम्मेदार सरकार के लिए प्रस्ताव तैयार करने वाली एक समिति, प्रतिनिधि सभा के लिए नए चुनाव, भूमि राजस्व में पंद्रह प्रतिशत की कमी, सभी एकाधिकार या 'इजारे' को रद्द करने और राज्य के खजाने पर शासक के दावे को सीमित करने की मांग की। दरबार ने मांगों को मानने के बजाय, रेजिडेंट से स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक ब्रिटिश अधिकारी को दीवान नियुक्त करने को कहा। कैडेल ने 12 सितंबर को कार्यभार संभाला। इस बीच, वीरावाला खुद ठाकुर के निजी सलाहकार बन गए, ताकि वे पर्दे के पीछे से काम करना जारी रख सकें।

सत्याग्रह अब बड़े पैमाने पर फैल गया। इसमें ज़मीन का लगान न देना, एकाधिकार वाले अधिकारों को न मानना, और राज्य में बनी सभी चीज़ों का बहिष्कार करना शामिल था। स्टेट बैंक में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी और राज्य की कॉटन मिल में हड़ताल हुई, साथ ही छात्रों ने भी हड़ताल की। ​​राज्य की आमदनी के सभी ज़रियों, जिनमें एक्साइज़ और कस्टम ड्यूटी भी शामिल थे, को रोकने की कोशिश की गई।

सरदार पटेल हर शाम टेलीफ़ोन के ज़रिए राजकोट के नेताओं के संपर्क में रहते थे। काठियावाड़ के दूसरे हिस्सों से स्वयंसेवक आने लगे। इस आंदोलन में ज़बरदस्त संगठन देखने को मिला। कमांड की एक गुप्त व्यवस्था यह पक्का करती थी कि अगर एक नेता गिरफ़्तार हो जाए, तो दूसरा नेता ज़िम्मेदारी संभाल ले। अख़बारों में छपने वाले कोड नंबरों से हर सत्याग्रही को राजकोट पहुँचने की तारीख़ और वहाँ की व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी मिल जाती थी।

नवंबर के आखिर तक, अंग्रेज़ राजकोट में कांग्रेस की संभावित जीत के नतीजों को लेकर साफ़ तौर पर परेशान थे। वायसराय लिनलिथगो ने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट को तार भेजा: ‘मुझे इसमें ज़रा भी शक नहीं है कि अगर कांग्रेस राजकोट मामले में जीत जाती है, तो यह आंदोलन पूरे काठियावाड़ में फैल जाएगा और वे अपनी गतिविधियाँ दूसरी दिशाओं में भी बढ़ा लेंगे...’

लेकिन दरबार ने पॉलिटिकल डिपार्टमेंट की सलाह को नज़रअंदाज़ करने और सरदार पटेल के साथ समझौता करने का फ़ैसला किया। 26 दिसंबर, 1938 को हुए समझौते में ठाकुर के 'प्रिवी पर्स' (शाही भत्ते) की सीमा तय करने और सुधारों की योजना बनाने के लिए राज्य के दस लोगों या अधिकारियों की एक समिति बनाने की बात कही गई थी, ताकि लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा अधिकार दिए जा सकें। ठाकुर की ओर से सरदार को लिखे एक अलग पत्र में यह अनौपचारिक सहमति शामिल थी कि 'समिति के सात सदस्यों की सिफ़ारिश सरदार वल्लभभाई पटेल करेंगे और उन्हें हम नामांकित करेंगे' सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया और सत्याग्रह वापस ले लिया गया।

समझौते का उल्लंघन

लेकिन ठाकुर की इस खुली बगावत का ब्रिटिश सरकार स्वागत नहीं कर सकती थी। ब्रिटिश रेजिडेंट और दीवान वीरवाला के दबाव में आकर ठाकुर ने सरदार पटेल द्वारा सुझाए गए नामों को खारिज कर दिया और समझौते को तोड़ दिया। तुरंत ही रेजिडेंट, पॉलिटिकल डिपार्टमेंट, वायसराय और सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट के बीच बातचीत हुई और ठाकुर को निर्देश दिया गया कि वे सरदार द्वारा भेजी गई कमेटी के सदस्यों की सूची को स्वीकार न करें, बल्कि रेजिडेंट की मदद से सदस्यों की एक नई सूची तैयार करें। इसके बाद, पटेल द्वारा भेजी गई नामों की सूची को खारिज कर दिया गया; इसका कारण यह बताया गया कि उस सूची में केवल ब्राह्मणों और बनियों के नाम थे और उसमें राजपूतों, मुसलमानों और दबे-कुचले वर्गों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। इसके विरोध में जनवरी 1939 में आंदोलन फिर से उग्र हो गया।  

कस्तूरबा गांधी की गिरफ्तारी

राज्य द्वारा समझौते का उल्लंघन किए जाने के कारण 26 जनवरी 1939 को सत्याग्रह फिर से शुरू हो गया। वीरावाला ने इसका जवाब कड़े दमन से दिया। पहले की तरह, इससे जल्द ही राजकोट के बाहर के राष्ट्रवादियों में चिंता और आक्रोश बढ़ने लगा। गांधीजी की पत्नी कस्तूरबा, जो राजकोट में ही पली-बढ़ी थीं, वहाँ के हालात से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने खराब सेहत और सबकी सलाह के बावजूद राजकोट जाने का फैसला किया। वहाँ पहुँचने पर, उन्हें और उनकी साथी मणिबेन पटेल (जो सरदार की बेटी थीं) को गिरफ्तार कर लिया गया और राजकोट से सोलह मील दूर एक गाँव में नज़रबंद कर दिया गया।

महात्मा गांधी का आमरण अनशन

राजकोट से गांधीजी का गहरा भावनात्मक लगाव था क्योंकि उनके पिता वहां के दीवान रहे थे और उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं हुई थी। जनता पर हो रहे अत्याचारों को देखकर महात्मा ने तय किया कि उन्हें भी राजकोट जाना चाहिए। गांधीजी 28 फरवरी 1939 को राजकोट पहुंचे। उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि ठाकुर साहब का किसी पक्के समझौते को तोड़ना एक गंभीर मामला है और हर सत्याग्रही का फ़र्ज़ है कि वह इसका विरोध करे। उन्हें यह भी लगता था कि राजकोट पर उनका मज़बूत दावा है, क्योंकि उनके परिवार के उस रियासत और ठाकुर के परिवार से करीबी संबंध थे; और इसी वजह से उनका व्यक्तिगत रूप से दखल देना सही और ज़रूरी था। उनकी इच्छा के अनुसार, बातचीत का रास्ता बनाने के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे सत्याग्रह को रोक दिया गया। लेकिन रेजिडेंट, ठाकुर और दीवान वीरावाला के साथ कई दौर की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। इसके बाद गांधीजी ने अल्टिमेटम दिया कि अगर 3 मार्च तक दरबार सरदार के साथ हुए समझौते को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो वे आमरण अनशन शुरू कर देंगे। ठाकुर, या यूँ कहें कि वीरावाला—जो असल में सत्ता की बागडोर संभाले हुए थे—अपनी पुरानी बात पर अड़े रहे, जिससे गांधीजी के पास अनशन शुरू करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा।

ठाकुर द्वारा अपना वादा निभाने से इनकार करने पर गांधीजी ने 3 मार्च 1939 को राजकोट की 'राष्ट्रीय शाला' में आमरण अनशन (Fast unto death) शुरू कर दिया। यह उपवास देशव्यापी विरोध का संकेत था। गांधीजी की सेहत पहले से ही खराब थी और लंबे समय तक उपवास करना खतरनाक हो सकता था। हड़तालें हुईं, विधानसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई और आखिर में यह धमकी भी दी गई कि कांग्रेस सरकारें इस्तीफा दे सकती हैं। वायसराय को दखल देने की मांग करते हुए बहुत सारे टेलीग्राम भेजे गए। गांधीजी ने खुद सर्वोच्च सत्ता से आग्रह किया कि वह ठाकुर को अपना वादा पूरा करने के लिए मनाकर राज्य की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए। गांधीजी के अनशन से पूरे देश में खलबली मच गई और गांधीजी के गिरते स्वास्थ्य को देखकर ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। 7 मार्च को, वायसराय ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर द्वारा मध्यस्थता का सुझाव दिया, ताकि यह तय किया जा सके कि क्या ठाकुर ने वास्तव में समझौते का उल्लंघन किया है। यह एक उचित प्रस्ताव लगा। मुख्य न्यायाधीश ने अपना फैसला सरदार पटेल और जनता के पक्ष में सुनाया, जिसके बाद 7 मार्च 1939 को गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा।

3 अप्रैल, 1939 को घोषित चीफ जस्टिस के फ़ैसले ने सरदार के इस दावे को सही ठहराया कि दरबार उनके सात नॉमिनी (नामित लोगों) को स्वीकार करने के लिए सहमत हो गया था। अब गेंद ठाकुर के पाले में थी। लेकिन राजकोट में कोई बदलाव नहीं आया। वीरावाला ने राजपूत, मुस्लिम और दबे-कुचले वर्गों के प्रतिनिधित्व के दावों को बढ़ावा देने की अपनी नीति जारी रखी और गांधीजी के उन प्रस्तावों को मानने से इनकार कर दिया, जिनमें सरदार और परिषद के नॉमिनी का बहुमत बनाए रखते हुए इन वर्गों के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की बात कही गई थी।

जल्द ही हालात बिगड़ने लगे। गांधीजी की प्रार्थना सभाओं के दौरान राजपूतों और मुसलमानों ने विरोध-प्रदर्शन किए। मोहम्मद अली जिन्ना व अंबेडकर ने मुसलमानों और दबे-कुचले वर्गों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की मांग की। दरबार ने इन सब बातों का इस्तेमाल समझौते को न तो अक्षरशः और न ही उसकी भावना के अनुरूप मानने से इनकार करने के लिए किया। सर्वोच्च सत्ता (ब्रिटिश सरकार) ने भी इसमें दखल नहीं दिया, क्योंकि कांग्रेस की पूरी जीत सुनिश्चित करने में उसे कोई फायदा नहीं था, बल्कि नुकसान ही होता। साथ ही, रियासतों में जिम्मेदार सरकार को बढ़ावा देने में भी उसे अपनी कोई भूमिका नहीं दिखी।

इस समय, अपनी असफलता के कारणों पर विचार करते हुए गांधीजी इस नतीजे पर पहुँचे कि इसका कारण 'सर्वोच्च सत्ता' (Paramount Power) के अधिकार का इस्तेमाल करके ठाकुर को समझौते के लिए मजबूर करने की उनकी कोशिश थी। उन्हें यह तरीका हिंसा जैसा लगा; अहिंसा का मतलब तो यह होना चाहिए था कि वे अपना अनशन सिर्फ़ ठाकुर और वीरावाला के ख़िलाफ़ करते और 'हृदय परिवर्तन' के लिए सिर्फ़ अपनी तकलीफ़ की ताकत पर भरोसा करते। इसलिए, उन्होंने ठाकुर को समझौते से मुक्त कर दिया, वायसराय और मुख्य न्यायाधीश से उनका समय बर्बाद करने के लिए माफ़ी माँगी, साथ ही अपने विरोधियों—मुसलमानों और राजपूतों—से भी माफ़ी माँगी और राजकोट छोड़कर ब्रिटिश भारत लौट आए।

राजकोट सत्याग्रह का ऐतिहासिक महत्व

यद्यपि राजकोट एक छोटी रियासत थी, लेकिन इस सत्याग्रह का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ा। राजकोट सत्याग्रह ने रियासतों की उस स्थिति को उजागर कर दिया, जिसने विरोध के काम को बहुत मुश्किल बना दिया था। रियासतों के शासकों को सुधार की किसी भी कोशिश के ख़िलाफ़ ब्रिटिश सरकार की ताक़त का संरक्षण हासिल था। सुधार के लिए ब्रिटिश सरकार पर जनता के दबाव का सामना हमेशा रियासतों की स्वायत्तता (autonomy) की क़ानूनी स्थिति का हवाला देकर किया जा सकता था। जब रियासतें कोई ऐसा रास्ता अपनाना चाहती थीं जो सर्वोच्च सत्ता (Paramount Power) को पसंद न हो, तो ब्रिटिश अक्सर इस क़ानूनी आज़ादी को भूल जाते थे। आख़िरकार, ब्रिटिश सरकार ने ही ठाकुर को सरदार के साथ हुए समझौते का पालन न करने के लिए उकसाया था। रियासतों में विरोध के आंदोलन ब्रिटिश भारत के आंदोलनों के हालात से बहुत अलग थे। कांग्रेस का यह कहना गलत नहीं था कि रियासती भारत और ब्रिटिश भारत के आंदोलनों को मिलाया नहीं जा सकता। भारतीय रियासतों से टकराने में कांग्रेस अब तक हिचकिचाहट दिखाती रही थी।

कुटिल राजनीतिक चालों के कारण यह सुधार समिति पूरी तरह सफल नहीं हो पाई। गांधीजी ने इसे अपनी "आध्यात्मिक हार" मानकर अपने अधिकार स्वेच्छा से छोड़ दिए। फिर भी इस सत्याग्रह का भारतीय इतिहास में बहुत बड़ा महत्व है: इसने देश की सभी रियासतों की जनता के भीतर चेतना जगाई कि वे भी आजादी की लड़ाई का हिस्सा हैं। इसने भारत की अन्य 500 से अधिक रियासतों (Princely States) की जनता को यह संदेश दिया कि वे भी अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। इसने 'अखिल भारतीय राज्य जन परिषद' (All India States Peoples' Conference) के आंदोलन को नई ऊर्जा दी।

इससे पहले तक कांग्रेस रियासतों के आंतरिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने से बचती थी (हरिपुरा अधिवेशन 1938 तक)। लेकिन राजकोट सत्याग्रह के बाद कांग्रेस ने अपनी नीति बदली और रियासतों की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का खुलकर समर्थन करना शुरू किया। इसने साबित कर दिया कि कांग्रेस केवल ब्रिटिश भारत ही नहीं, बल्कि रियासतों के नागरिकों की लड़ाई लड़ने में भी सक्षम है।  इसी जन-प्रतिरोध की नींव के कारण आजादी के बाद राजकोट और सौराष्ट्र की अन्य रियासतों का भारत में विलय बेहद सुगम हो सका।

राजकोट सत्याग्रह के साफ़ तौर पर नाकाम होने के बावजूद, इसने रियासतों के लोगों, खासकर पश्चिमी भारत के लोगों पर राजनीतिक रूप से बहुत असर डाला। इसने राजाओं को यह भी दिखा दिया कि वे सिर्फ़ इसलिए टिके हुए थे क्योंकि अंग्रेज़ उन्हें सहारा दे रहे थे। इस तरह, राजकोट के संघर्ष और उस समय के दूसरे संघर्षों ने आज़ादी के समय रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाया। जिन राजाओं ने खुद देखा था कि लोग विरोध करने में सक्षम हैं, वे 1947 में एकीकरण के दबाव का विरोध करने में हिचकिचाए। इस आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि सरदार पटेल केवल ब्रिटिश सरकार से ही नहीं, बल्कि चालाक देसी राजाओं और उनके दीवानों से भी लोहा लेने में माहिर हैं। यही अनुभव आगे चलकर आजादी के बाद भारत के राजनीतिक एकीकरण (रियासतों के विलय) में काम आया। अगर ये संघर्ष न हुए होते, तो एकीकरण की पूरी प्रक्रिया निश्चित रूप से बहुत मुश्किल और लंबी होती। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि 1947-48 में एकीकरण कराने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले व्यक्ति वही सरदार थे, जो राजाओं के ख़िलाफ़ कई संघर्षों में शामिल रहे थे।

राजकोट रियासत (काठियावाड़ एजेंसी) का भारत में विलय 15 फरवरी 1948 को हुआ, जब अंतिम शासक ठाकुर साहब प्रद्युमनसिंहजी ने भारतीय संघ में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद इसे नवगठित 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ काठियावाड़' में मिला दिया गया, जिसे बाद में सौराष्ट्र राज्य कहा गया। 1947 में स्वतंत्रता के बाद, भारत के एकीकरण में राजकोट के शासक ने अपनी प्रजा की बेहतरी और शांतिपूर्ण एकीकरण के लिए काठियावाड़ के लगभग 200 अन्य छोटे-बड़े राज्यों के साथ मिलकर 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ काठियावाड़' के निर्माण पर सहमति दी। 15 अप्रैल 1948 को सौराष्ट्र राज्य के अस्तित्व में आने के बाद राजकोट को इसकी प्रारंभिक राजधानी बनाया गया। 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत सौराष्ट्र राज्य बॉम्बे स्टेट का हिस्सा बन गया। अंततः, 1 मई 1960 को भाषाई विभाजन के बाद राजकोट नवगठित गुजरात राज्य का हिस्सा बना।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

बुधवार, 8 जुलाई 2026

सूफ़ीमत... 7. सूफ़ीमत का विकास प्रथम चरण -1

  सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

7. सूफ़ीमत का विकास प्रथम चरण-1

 

हे अली, मैं एक वृक्ष से उत्पन्न किया गया हूं और तुम भी उसी वृक्ष में उत्पन्न किए गए हो। मैं उस वृक्ष का मूल हूं और तुम उसका तना हो। हसन और हुसनैन उसकी शाखाएं हैं तथा हमारे मित्रगण उसके पत्ते हैं। अतः जो व्यक्ति इस पेड़ के किसी अंग से सम्बद्ध हो जाए, ईश्वर उसे जन्नत में प्रवेश प्रदान करेगा। (हदीस)

विद्वानों का मानना है कि सूफ़ी आन्दोलन का प्रारम्भ इस्लाम धर्म और समाज को अधिक उदार बनाने तथा उन्हें बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालने के उद्देश्य से ही हुआ था। आरंभिक इस्लाम में तेजी से फैलते भौतिकवाद और खिलाफत के कठोर राजनीतिक ढांचे के खिलाफ कुछ आध्यात्मिक संतों ने वैराग्य और रहस्यवाद की ओर कदम बढ़ाए। प्रो. निजामी के अनुसार इस्लाम धर्म और समाज को परिवर्तितपरिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए सूफ़ी आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ। उनका कहना है कि मंगोल नेता हलाकू द्वारा बगदाद पर आक्रमण के परिणामस्वरूप मुस्लिम सामाजिक जीवन का विनाश तथा नैतिकता का पतन होने लगा। ऐसी परिस्थितियों में सूफ़ीमत का विकास मानव संस्कृतिमुस्लिम समाजनैतिकता तथा आध्यात्मिक सिद्धान्तों की रक्षा करने के लिये हुआ। सूफियों ने रूढ़िवादी उलेमाओं के शुष्क और कर्मकांडीय दृष्टिकोण के विपरीत, ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग 'प्रेम और भक्ति' (इश्क) को माना। इस आन्दोलन ने जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर इस्लामिक भाईचारे और सामाजिक समता पर जोर दिया। इतिहासकार प्रो. हबीब के अनुसार, जब इस्लामी संस्कृति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, तब सूफी रहस्यवादी विचारों ने इस्लाम को शक्ति दी और मानव समाज व नैतिकता की रक्षा करते हुए इसे परिस्थितियों के अनुकूल बनाया।

उस समय मुसलमानों की राजनैतिक शक्ति कमज़ोर हो चुकी थीचारों ओर अव्यवस्थाअराजकता तथा आतंक का वातावरण थाऐसी परिस्थिति में मुस्लिम समाज में नवजीवन का उदय करने के लिए सूफ़ी सन्तों ने संगठित होकर प्रयास करने का निश्चय किया। सूफ़ी सन्तों के विचार से उनका मत उतना ही प्राचीन है जितना इस्लाम धर्म। सूफ़ी सन्तों के मतानुसार हज़रत मुहम्मद सल. ने ईश्वर से जो अलौकिक ज्ञान प्राप्त किया थाउसे दो रूपों में प्रकट किया, इल्म-ए-ज़हीर (किताबी ज्ञान) और इल्म-ए-बातिन (आध्यात्मिक या हृदय का ज्ञान)। प्रथम रूप में तो उसे क़ुरआन में संगृहीत किया तथा कुछ ऐसा ज्ञान जो जनसाधारण के लिये आवश्यक नहीं था तथा केवल ईश्वर के चुने हुए प्रतिनिधियों के ही योग्य समझाउसे गुप्त रखा गया तथा उसे एक रहस्यमय ढंग से मुहम्मद साहब ने अपने चुनिन्दा शिष्यों कुछ विशेष सहाबा, जैसे हजरत अबू बक्र (आरए) और हजरत अली (आरए) जैसे योगी को ही प्रदान किया।

7.1 सूफ़ीमत के विकास में ईरान का हाथ

इतना तो तय है कि सूफ़ीवाद इस्लाम धर्म से ही प्रस्फुटित हुआ। आरबेरी ने लिखा है कि सूफ़ीवाद का उद्भव इस्लाम की राजनैतिक सफलता का प्रत्यक्ष परिणाम था। यहाँ एक बात स्पष्ट है कि सूफ़ीमत के विकास में ईरान का बड़ा हाथ था। कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक मानना है कि इस्लाम का जो पौधा ईरान में लगा था, वास्तव में वही सूफ़ीमत के रूप में विकसित और फलित हुआ। ईरान सूफीवाद के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक रहा है, जहाँ से यह विचार पूरी दुनिया और विशेषकर दक्षिण एशिया (भारत) तक पहुँचा।

किंतु सच्चाई यह है कि इस्लाम का उदय अरब में हुआ। तथ्यों की छानबीन से यह पता चलता है कि सूफ़ीवाद के विकास का रास्ता विभिन्न पड़ावों से होकर गुज़रा है और समय-समय पर  विभिन्न आस्थाओं से प्रभावित भी होता रहा है। इस्लामी राज्यों की विस्तारवादी प्रवृत्ति के कारण समय के साथ इस्लामी देशों की भौगोलिक सीमाओं में अनेक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण  देश सम्मिलित कर लिए गए। इस क्रम में मुसलमानों का सम्पर्क, बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर यूनानी, ईरानी और भारतीय विद्वानों से हुआ। जब मुस्लिम अरब से बाहर निकले तो वे ईरान पहुंचे, जहां वे स्थानीय आर्य संस्कृति पर पूरी तरह से छा गए। इस्लामी सभ्यता और संस्कृति में ईरान का बहुत बड़ा महत्त्व है वहाँ के साहित्य, विचारधारा और परम्परा ने इस्लामी विचारधारा को बहुत अधिक प्रभावित किया ईरानी साम्राज्य विस्तृत था और उसकी संस्कृति विशाल सासानी वंश वालों के शासनकाल में इस्लाम धर्म का प्रवेश ईरान में हुआ ईरान पर विजय के साथ ही इस्लाम का वहां की स्थानीय संस्कृति से संपर्क हुआ। फारसी भाषा सूफी साहित्य की मुख्य भाषा बन गई। मौलाना जलालुद्दीन रूमी, शेख सादी, अत्तार, और हाफिज जैसे महान सूफी कवि और दार्शनिक ईरान से ही थे। इनकी रचनाओं (जैसे रूमी की मसनवी) ने सूफी विचारों, प्रेम और ईश्वर-भक्ति को दुनियाभर में फैलाया। सूफियों के कई प्रमुख मार्ग या सिलसिले ईरान में ही स्थापित हुए या फले-फूले। उदाहरण के लिए, सुहरावर्दी, नक्शबंदी, और कुब्राविया सिलसिले ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में ही शुरू होकर अन्य देशों में विस्तृत हुए। ईरान ने पूर्व-इस्लामी रहस्यवादी विचारों और इस्लामी शिक्षाओं का एक सुंदर मिश्रण तैयार किया। सूफीवाद में जो 'इश्क-ए-हकीकी' (ईश्वर से प्रेम) की अवधारणा है, उसे ईरानी विचारकों ने बहुत गहराई दी। भारत में सूफी मत का प्रसार करने वाले अधिकांश सूफी संत फारसी संस्कृति और साहित्य से गहरे जुड़े थे। भारत के प्रसिद्ध चिश्तिया सिलसिले के संत भी फारसी भाषा और ईरानी सूफी साहित्य से अत्यधिक प्रभावित थे।

एक मत के अनुसार राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में भले ही अरबों ने इस्लाम के प्रदेश (ईरान) पर विजय प्राप्त की, किन्तु सांस्कृतिक भूमि पर यह ईरानी संस्कृति की अरबी संस्कृति पर जीत थी। ईरान ने अरबी भाषा को अपना लिया ईरानी साहित्य, कला, दर्शन आदि इस्लामी दुनिया की अपनी वस्तु बन गए ज़रथुस्त्र वहाँ के धर्म-प्रधान थे और जेंदावेस्ता वहाँ का प्रमुख धर्म-ग्रन्थ इस्लाम के पहले ज़रस्थुस्त्रवाद (628-521 ई.पू.) ईरानी धार्मिक-आस्था के रूप में प्रचलित था। इससे पहले मज़दकवद (651-224 ई.पू.) और मानी (275-216 ई.पू.) ने भी धर्म और विश्वास को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। ईरान में लोगों ने इस्लाम धर्म-ग्रहण तो किया था, लेकिन साथ ही वे प्राचीन धार्मिक विश्वासों का भी संरक्षण करते रहे। इसलिए ईरान का तसव्वुफ़ अरबी तसव्वुफ़ से कुछ मामलों में भिन्न था। इस तरह वह सूफ़ीवाद जो सबसे पहले इराक़ और जज़ीरा में अस्तित्व में आया वह ईरान तथा भारत तक फैला और फिर मिस्र तथा उन्दूलुस तक पहुंचा।

7.2 फ़ि़क्ह और तसव्वुफ़

आर्य, अध्यात्मवाद एवं रहस्यवाद में विश्वास रखते थे। इसका प्रभाव इस्लाम पर पड़ा। वे लोग जो वास्तविक रूप से तो इस्लाम धर्म ग्रहण कर चुके थे, लेकिन अंतस में अपने मूल धर्म को बसाए हुए थे, धर्म के इन दोनों स्वरूपों का तुलनात्मक अध्ययन करते रहते थे। इन मुशक्कीन (द्विधावादी या संदेहवादियों) की आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान, सूफ़ियों ने सुझाया। मुशक्कीन वे विचारक थे जो ईश्वर के अस्तित्व, धर्म और सत्य के बारे में तर्क-वितर्क करते थे और किसी भी बात को आसानी से स्वीकार नहीं करते थे। सूफ़ियों ने माना कि सिर्फ बौद्धिक तर्क (Rationality) से ईश्वर और परम सत्य को नहीं समझा जा सकता। दिमाग में उठने वाले संदेह (Skepticism) को सिर्फ बड़े तर्कों से नहीं मिटाया जा सकता। सूफी परंपरा यह कहती है कि सत्य केवल किताबों या बहसों में नहीं है, बल्कि यह आंतरिक अनुभूति (धौक) और ईश्वर के साक्षात्कार (कश्फ़) का विषय है। सूफ़ियों ने सुझाया कि हृदय में उठने वाले संदेहों का कारण आत्मा पर पड़े पर्चे या सांसारिक बुराइयाँ हैं। ध्यान (ज़िक्र), प्रेम और प्रार्थना के माध्यम से हृदय को शुद्ध करके ही पूर्ण विश्वास (यकीन) प्राप्त किया जा सकता है। इमाम अल-ग़ज़ाली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'अल-मुनकिज़ मिन अल-दलाल' (Deliverance from Error) में लिखा है कि कैसे उन्होंने संदेहवाद (द्विधावाद) से निकलकर सूफीवाद के माध्यम से सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया।

कुछ समय बाद इस्लाम की दो शाखाएं हो गईं। एक फ़ि़क्ह और दूसरी तसव्वुफ़ इस्लाम का क़ानूनी पक्ष फ़िक़्ह में आता है, इन्हें शरीअतपंथी भी कहा जा सकता है। 'शरीअतपंथी' (Shariat-panthi) उन व्यक्तियों, समूहों या विचारधाराओं को कहा जाता है जो इस्लाम के धार्मिक और कानूनी नियमों, यानी 'शरीअत' (Shariah) का सख्ती से पालन करते हैं। इसका संबंध इस बात से है कि इबादत (जैसे नमाज, रोजा) और सांसारिक लेनदेन (जैसे निकाह, व्यापार) सही तरीके से कैसे किए जाएं। इसे प्राप्त करने के लिए कुरान, हदीस, इज्मा और क़ियास का उपयोग किया जाता है। क़ुरआन इस्लाम का सर्वोच्च और प्राथमिक स्रोत है। इसे ईश्वर (अल्लाह) की सीधी वाणी माना जाता है, जो पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) पर अवतरित हुई। इसमें जीवन के मूल सिद्धांत, आस्था, नैतिकता और कानून के बुनियादी नियम मौजूद हैं। हदीस शरीयत का दूसरा सबसे बड़ा आधार है। इसमें पैगंबर मुहम्मद के कथन, कार्य और उनके द्वारा किसी बात को देखकर चुप रहकर दी गई स्वीकृति दर्ज हैं। यह कुरआन के निर्देशों को विस्तार से समझाता है कि उन्हें व्यवहार में कैसे लागू करना है। इज्मा: जब कोई नया सामाजिक या धार्मिक मुद्दा उठता है जिस पर कुरआन या हदीस में कोई सीधा उल्लेख नहीं होता, तब उस काल के प्रमुख इस्लामी विद्वान मिलकर विचार-विमर्श करते हैं और सर्वसम्मति (consensus) से कोई निर्णय लेते हैं। विद्वानों की इसी आम सहमति को 'इज्मा' कहा जाता है। क़ियास शरीयत का चौथा स्रोत है। जब किसी स्थिति पर शुरुआती तीन स्रोतों से सीधे कोई हल न मिले, तो विद्वान तर्क और सादृश्य (analogy) का इस्तेमाल करते हैं। पुराने स्थापित सिद्धांतों (कुरआन या हदीस) से तुलना करके नए मुद्दे पर फैसला निकालना ही 'क़ियास' है।

तसव्वुफ़ का संबंध ईश प्रेम जैसे गुणों से है जो कि  फ़ि़क्ह की परिधि में नहीं आते। इसे आमतौर पर आध्यात्मिकता या सूफीवाद कहा जाता है। इसका संबंध आंतरिक शुद्धि, नीयत और अल्लाह के प्रेम से है। तसव्वुफ़ में साधक (सूफी) का अंतिम लक्ष्य अपनी आत्मा को सांसारिक मोह-माया से मुक्त करके सीधे अल्लाह (ईश्वर) से प्रेम करना और उनके साथ आध्यात्मिक मिलन (वस्ल) प्राप्त करना होता है। यह सिखाता है कि दिल से अहंकार, लालच और नफरत को कैसे मिटाया जाए और इखलास (सच्ची लगन) कैसे पैदा की जाए। इन गुणों पर ज़ोर देने वालों को ही तरीक़तपंथी कहा गया है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि ये दो भिन्न मार्ग हैं और न ही इसका अर्थ यह निकाला जाए कि फ़िक्ह पर ज़ोर देने वाले ईशप्रेम  से रिक्त थे या तरीक़तपंथी फ़िक्ह को नहीं मानते थे। सूफी परंपरा में शरीयत (कानून), तरीक़त (आध्यात्मिक मार्ग), और हक़ीक़त (परम सत्य) एक-दूसरे के पूरक हैं। सूफी विचारकों का मानना था कि शरीयत (जिसका आधार फ़िक्ह है) बाहरी आचरण को सुधारती है और तरीक़त आंतरिक शुद्धि का मार्ग है। महानतम सूफी संतों में से एक, जैसे हसन बसरी और जाफ़र सादिक, इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक्ह) के भी प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। सूफियों का एक बहुत प्रसिद्ध कथन है: "बिना शरीयत के तरीक़त (सूफीवाद) तक पहुँचना असंभव है।" यानी फ़िक्ह के नियमों (नमाज़, रोज़ा आदि) का पालन किए बिना आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। चूंकि एक सूफ़ी अक्सर औसत से काफी अलग व्यक्ति होते थे, इसलिए यह स्वाभाविक था कि सूफ़ियों में से कुछ अपने समाज और समुदायों के आम तौर पर स्वीकृत मानदंडों से इतने दूर चले गए कि उन्होंने वैधता के बारे में अपने अनुयायियों के मन में संदेह पैदा किया। कुछ सूफी समूह (जैसे कलंदरिया) ने बाहरी कर्मकांडों और फ़िक्ह को अनदेखा किया, लेकिन उन्हें मुख्यधारा के तरीक़तपंथियों (जैसे चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया आदि) ने कभी स्वीकार नहीं किया और उनकी निंदा की।

जाफ़र रज़ा ने इस्लामी आध्यात्म : सूफ़ीवाद में बताया है कि उस समय इस्लाम को अनेक सैद्धांतिक आंदोलनों का सामना करना पड़ा। विभिन्न विद्याओं (शास्त्रों) की पुस्तकों के अरबी अनुवादों के कारण उपजी परिस्थितियों ने अह्ले-कलाम (शास्त्रार्थवादी) को जन्म दिया। इन्हें मुतकाल्लिमून भी कहा जाता था। ये वे धर्मशास्त्री थे जो धार्मिक मुद्दों को समझने के लिए तर्क और दर्शन (Dialectical Reasoning) का इस्तेमाल करते थे। अनुवाद के लिए दारुल-हिकमत नामक संस्था सक्रिय थी। इन अनुवादों ने इस्लामी विश्वासों को पुनर्विवेचना के लिए प्रेरित किया जिससे वासिल-बिन-अता (मृ..748 ई.) और उमर-बिन-उबैद (मृ. 763 ई.) के नेतृत्व में  मुअतज़ला (मोतज़ेला) आंदोलन शुरू हुआ। ये सिद्धांतवादी ईश्वर के गुणों से अलग अस्तित्व से इंकार करते थे। वे मानते थे कि ईश्वर के गुण (जैसे ज्ञान, शक्ति, जीवन) ईश्वर के सार से अलग या बाहर कोई वास्तविक वस्तुएं नहीं हैं। वे ईश्वर के सार के साथ पूर्ण रूप से अभिन्न हैं। वे मानते थे कि सभी गुण ईश्वर से उत्पन्न हैं। मुअतज़िला का तर्क था कि यदि ईश्वर के गुण उसके सार से अलग और अनंत (eternal) मान लिए जाएं, तो इससे कई शाश्वत अस्तित्व (multiplicity of eternals) सिद्ध हो जाएंगे, जो एकेश्वरवाद के खिलाफ होगा। इसलिए, ईश्वर ज्ञान या शक्ति जैसे गुणों के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने सार से ही सब कुछ जानता और देखता है।

इब्न-अशरस और अलजाहिज़ के नेतृत्व में सिद्धांत वादियों का तीसरा वर्ग द्वन्द्वात्मक कार्य पद्धति पर आधारित था। इस वर्ग ने इस्लाम को ग्रहण तो कर लिया था, पर इस दुविधा में था कि कहीं उन्होंने भूल तो नहीं की है। इनका मानना था कि सभी प्रकार के सत्य को केवल तर्क (Reason) और बुद्धि के माध्यम से ही जाना जा सकता है। यह धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या में तर्क को सर्वोच्च स्थान देते थे। वे यह भी मानते थे कि ईश्वर पूर्णतः न्यायप्रिय है और मनुष्य को अपने कर्मों को चुनने की स्वतंत्रता (क़दर) प्राप्त है।

चौथा वर्ग अहिया--सनद उदारवादिता के सिद्धांत पर आधारित था। एक उदारवादी और सुधारवादी पंथ था। इस सिद्धांत के मानने वालों (विचारकों) का मुख्य झुकाव इस्लाम की मूल उदारवादी, तार्किक और रहस्यवादी व्याख्या की ओर था। ये कट्टरपंथी और रूढ़िवादी विचारों के विरोधी थे। क्योंकि यह पंथ काफ़ी उदार था, इसलिए उस समय के कट्टरपंथी धर्मशास्त्रियों ने इसका कड़ा विरोध भी किया था, जिसके फलस्वरूप आगे चलकर 'अशाअरा आंदोलन' की उत्पत्ति हुई। उदारवादियों के विरुद्ध अबुल हसन अलअशअरी (872-934 ई.) के नेतृत्व में अशाअरा आंदोलन शुरू हुआ। आशारिया दर्शनशास्त्र के विषय को क़ुरआन और हदीस के आधार पर व्याख्यायित करते थे। कट्टरवादियों को इनके विचार भाते थे। यह आंदोलन मुख्य रूप से दो विरोधी विचारधाराओं—अत्यधिक रूढ़िवादी पारंपरिक दृष्टिकोण (अथारी) और अत्यधिक बुद्धिवादी/तार्किक दृष्टिकोण (मुअतज़िला)—के बीच एक मध्यम मार्ग (Middle Path) स्थापित करने के लिए उपजा था अल-अशारी ने महसूस किया कि केवल बुद्धि पर निर्भर रहने से धर्मग्रंथों (कुरान और हदीस) की पवित्रता और ईश्वर की संप्रभुता कमजोर हो रही है इनका मानना था कि मानवीय बुद्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन वह सर्वोच्च नहीं है अंतिम सत्य केवल ईश्वरीय ज्ञान (कुरान और पैगंबर की शिक्षाओं) से ही प्राप्त हो सकता है बुद्धि का काम इस ज्ञान को समझना और उसका बचाव करना है, न कि उसे चुनौती देना अशअरा आंदोलन को मध्यकाल में महान मुस्लिम दार्शनिक इमाम अल-ग़ज़ाली ने बहुत बढ़ावा दिया।

रहस्यवाद और वैराग्य शायद रूढ़िवादी परमार्थविद्या (Theology) के दो विकल्प थे। सूफ़ीवाद मूलतः दार्शनिक व्यवस्था पर टिका था। हुक़ूमत और सल्तनत के विस्तार के साथ ही मुस्लिम समाज में कट्टरता भी सिर उठाने लगी थी। कट्टरता का सूफ़ियों में अभाव था। तरीक़त में भी कट्टरवाद का अभाव था। तरीक़तपंथियों और सूफ़ी मतावलंबिओं की उदारता आम लोगों को अपनी तरफ़  आकर्षित करती थी। लेकिन उनके चारों तरफ़  जमा भीड़ हुक्मरानों के कान भी खड़ा किये दे रही थी। उनकी आलंकारिक और रहस्यवादी भाषा की समझ न रखने वाले कुछ मुस्लिम विद्वान उन्हें संदेह की नज़र से भी देखते थे और उन्हें इस्लाम विरोधी क़रार देते थे।

सूफ़ी तरीक़त के समर्थक थे। वास्तव में, तरीक़त (आध्यात्मिक मार्ग) सूफीवाद की मूल आत्मा है। उन्होंने लोगों को कट्टरता और बुराई से मुक्त करने के लिए तरीक़त का सहारा लिया। आपसी प्यार-मुहब्बत और लोकसेवा पर उन्होंने बल दिया। उन्होंने इसे ख़ुदा तक पहुंचने का रास्ता क़रार दिया। सूफी संतों का मानना था कि ईश्वर (अल्लाह) तक पहुँचने के लिए एक आध्यात्मिक मार्ग (तरीक़त) पर चलना अनिवार्य है। यह मार्ग भौतिकवाद को त्यागकर आत्म-अनुशासन और आत्म-शुद्धि पर जोर देता है। अधिकांश सूफी (जिन्हें 'बा-शरा' कहा जाता है) इस बात के प्रबल समर्थक थे कि तरीक़ा (रहस्यवादी मार्ग) शरिया (इस्लामी कानून) का विरोधाभासी नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । जिस प्रकार धार्मिक विचारकों ने क़ुरआन, सुन्नत, इज्मा और इज्तेहाद के आधार पर इस्लाम की व्याख्या की है, उसी प्रकार सूफ़ियों ने भी अपना रास्ता क़ुरआन तथा सुन्नत के अन्दर से ही निकाला है। हालाँकि उनके कुछ आमाल (क्रियाकलाप) ऐसे भी हैं जिन्हें शरीअत के दायरे में समझना मुश्किल है और कुछ शरीअत से मेल भी नहीं खाते।

रहस्यवादी भावना आध्यात्मिकता को जानने के लिए इन्सान को सदा प्रेरित करती है। रहस्यवाद वस्तुतः वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार अव्यक्त अथवा अज्ञात को विषय बनाकर उसके प्रति प्रणय, विरह आदि के भाव व्यक्त किये जाते हैं। इसीलिए जिनकी समझ सिर्फ़ ज़ाहिरी उसूलों (बाहरी सिद्धांतों) तक ही सीमित थी, उन्होंने उन्हें विधर्मी कहना शुरु कर दिया। चूंकि समाज में ऐसे ही लोगों की बहुतायत है और इन्हीं का बोलबाला रहा  है, इसलिए सूफ़ी गोपनीय ढंग से ऐकांतिक जीवन व्यतीत करने लगे। उनके आध्यात्मिक अनुभवों की प्रकृति और तत्कालीन धार्मिक-राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम था! ईश्वर-प्रेम (इश्क-हकीकी) और रहस्यमयी अवस्थाओं को सीधे शब्दों में व्यक्त करना असंभव होता है, इसी कारण उनकी भाषा भी काफ़ी कूटपरक एवं अति रहस्यमयी होती गई ईश्वर-प्रेम (इश्क-हकीकी) और रहस्यमयी अवस्थाओं को सीधे शब्दों में व्यक्त करना असंभव होता है। अलौकिक ईश्वर और आत्मा के मिलन (फना) की अनुभूति शब्दों से परे होती है। अतः उस अनिर्वचनीय रहस्य (ineffable mystery) को केवल रूपकों और कूटभाषा के जरिए ही समझा जा सकता था। राजनीतिक और धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए भी कूटभाषा का सहारा लिया गया ताकि आम लोग समझ न सकें।

इस तरह सूफ़ी दर्शन अस्तित्व में आया तथा एक आंदोलन के रूप में उभरा। सूफ़ीमत के विकास के प्रथम चरण में सूफ़ी संतों में फ़क़ीर के रूप में जीवन व्यतीत करने की प्रवृत्ति मुख्य थी। सूफ़ी साधक सांसारिक भोग-विलास की वस्तुओं से अलग रहकर ग़रीबी में अपना जीवन व्यतीत करते थे। इस काल में सूफ़ी मत का आधार व्यक्तिगत था। सूफ़ी सन्त एकान्त में प्रायश्चित करते थे। उनमें प्रेम साधना की भावना का अभाव था।

वास्तव में सूफ़ी दार्शनिक अपने लक्ष्य के प्रति बेहद सजग थे। उन्हें भान था कि वे किसी नए धर्म को स्थापित नहीं कर रहे बल्कि एक नए आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। वे इस बात के प्रति बहुत सजग थे कि लोगों में मानवीय गुणों की अभिवृद्धि के लिए इस्लाम के दायरे में रहते हुए ही उन्हें सब कुछ करना है। उन्होंने अपने इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए क़ुरआन की नए ढंग से व्याख्या की और ऐसे अनेक आधारों को पाया जिनसे उनके रहस्यपरक विश्वास को बल मिलता था। वास्तव में रहस्यवाद के बीज क़ुरआन में पहले से ही मौज़ूद थे। क़ुरआन में दो तरह की आयतें पाई जाती हैं।

1. मोहकम आयतें (मुहकम = मोहकम = दृढ़, मज़बूत, पक्का, पुख्ता) ये कुरान की वे स्पष्ट और निर्णायक आयतें हैं जिनका अर्थ बिल्कुल सीधा और स्पष्ट होता है। इनके अर्थ में कोई संदेह या भ्रम नहीं होता। इन्हें कोई भी साधारण व्यक्ति आसानी से समझ सकता है। ये कुरान की मूल नींव हैं। इनमें अधिकतर शरीअत के नियम, आज्ञाएं (जैसे नमाज, रोज़ा), निषेध (हराम और हलाल की बातें) शामिल हैं।

2. मुतशाबह आयतें (मुतशाबेह = समान आकृतिवाला, मिलता-जुलता) ये वे प्रतीकात्मक या लाक्षणिक आयतें हैं जिनके एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं और जिनका वास्तविक ज्ञान केवल ईश्वर को ही है। ये छिपे हुए अर्थ (ग़ैब) या परलोक की बातों से संबंधित होती हैं। इनका उद्देश्य मनुष्य की बुद्धि का परीक्षण और आस्था को मज़बूत करना है।

इन आयतों का स्पष्ट उल्लेख कुरआन के सूरह आले-इमरान (3:7) में किया गया है। इस आयत के अनुसार, विद्वान और सच्चे आस्तिक मुतशाबेह आयतों पर बहस करने के बजाय उन पर ईमान लाते हैं। इसके विपरीत, गलत इरादे वाले लोग फसाद (अशांति) फैलाने के लिए मुतशाबेह आयतों को अपने मनमाने अर्थों में ढालने की कोशिश करते हैं। रूह से मुताल्लिक़ जितनी भी आयतें क़ुरआन में पाई जाती हैं, वे सब मुतशाबह आयतें हैं। ऐसी आयतों की व्याख्या में फ़िक्ह के जानकारों ने हमेशा ही खुद को बेबस पाया है जबकि तरीक़तपंथी सूफ़ियों ने इन पर खुलकर कलाम किया है। इस तरह क़ुरआन के एक ऐसे पक्ष को अच्छी तरह इन्होंने स्पष्ट कर दिया जो हमेशा से ही एक रहस्य रहा। यही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द पूरा सूफीवाद घूमता है।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि वे विरक्त होकर प्रायः गहन चिंतन में निमग्न हो जाया करते थे। सूफ़ीमत के इतिहास से हमें इस बात की जानकारी मिलती है कि इसके विकास काल से ही एकांतवास और पवित्र जीवन की भावना का इसमें समावेश हुआ। आरंभिक सूफ़ी ईश्वर-प्रेम में मग्न रहते थे। सूफ़ियों ने हमेशा ऐसे नमाज़-रोज़े को इंसान के कल्याण के लिए नाकाफ़ी बताया जिसके पीछे ईश-प्रेम न होकर दिखावा हो। इनकी बातों को आलिमों (विद्वानों) ने भी स्वीकार किया  क्योंकि इनकी धार्मिक व्याख्या हमेशा तर्क सम्मत होती थी और एक समय आया जब बसरा महत्वपूर्ण सूफ़ी केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ। ऐसे में दूर-दूर से सूफ़ी संत आकर यहां सत्संग करते  तथा अपने रहस्यों की चर्चा करते थे।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर