महात्मा गांधी हत्या केस-23
14 जनवरी को सारे देश में मकर संक्रांति का त्योहार
मनाया जा रहा था। प्रेमा कंटक ने गांधीजी के लिए तिल-गुड़ भेजा। बिड़ला भवन के लोगों
में इसे बांटा गया। गांधीजी सुबह जल्दी उठ गए। आठ बजे पत्रों के टेबुल पर बैठ कर
पत्रों का निपटारा किया। 'हरिजन' के लिए लेख लिखवाए। नौ बजे स्नान किया।
बिड़ला भवन के मैदान में, गांधीजी की
उपवास-शय्या के आसपास नेहरूजी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक हुई, जिसमें गांधीजी
के मुद्दों पर त्वरित कार्यवाही का निर्णय किया गया था। गांधीजी के इस व्रत का
पहला असर यह हुआ कि संघीय मंत्रिमंडल ने अपना फैसला उलट दिया और पाकिस्तान को पचपन
करोड़ रुपए देने का निर्णय लिया गया। हालांकि गांधीजी ने अपने उपवास को तोड़ने की
शर्तों में कभी भी इस बात का उल्लेख नहीं किया था, फिर भी इन सब घटनाक्रम से कुछ
हिंदू यही समझ रहे थे कि गांधीजी मुसलमानों के पक्षपाती हैं। वे सोच रहे थे कि
बुड्ढा निपट जाए तो आफत टले। गांधीजी ने गर्म पानी के कुछ घूँट लिए और आराम किया।
जब कुछ मौलाना उनसे मिलने आए, तो गांधीजी ने उनका स्वागत इन शब्दों के साथ
किया: "क्या अब आप संतुष्ट हैं?" फिर, उस व्यक्ति की ओर मुड़कर जिसने कुछ दिन पहले उनसे कहा था
कि उन्हें भारत सरकार से कहकर इंग्लैंड जाने का इंतज़ाम करवाना चाहिए, गांधीजी ने कहा: "तब मेरे पास आपको
देने के लिए कोई जवाब नहीं था। अब मैं आपका सामना कर सकता हूँ। क्या मैं सरकार से
आपके इंग्लैंड जाने का इंतज़ाम करने के लिए कहूँ? मैं उनसे कहूँगा: ये वे मुसलमान हैं जो वफ़ादार नहीं हैं
और भारत छोड़कर जाना चाहते हैं। उन्हें वह सुविधा दी जाए जो वे चाहते हैं।" मौलाना
ने कहा कि अगर उनकी बातों से उन्हें दुख पहुँचा है, तो उन्हें अफ़सोस है। गांधीजी ने जवाब दिया: "यह तो
बिल्कुल उस अंग्रेज़ की तरह है जो आपको लात भी मारता है और साथ ही कहता भी रहता है
कि 'मुझे माफ़ कीजिए'। क्या आपको इंग्लैंड भेजे जाने की मांग
करते हुए शर्म नहीं आती? और फिर आपने कहा कि ब्रिटिश राज की गुलामी, भारत संघ की आज़ादी से बेहतर थी। देशभक्त और
राष्ट्रवादी होने का दावा करने वाले आप लोग ऐसी बातें कहने की हिम्मत कैसे करते
हैं?"
शरणार्थियों का एक समूह रात के समय बिड़ला
भवन के समक्ष इकट्ठा हुआ और नारा लगाने लगा, ‘ख़ून का बदला ख़ून से’, ‘हम
बदला चाहते हैं’, ‘गांधी को मरने दो’। गाँधीजी अविचलित थे। वह रामनाम जपने लगे। उसी समय नेहरूजी वहां से जाने के लिए मोटर
से निकल रहे थे। गुस्से में वह अपनी गाड़ी से उतरे और बोले, “कौन कह रहा है कि गांधी को मरने दो? वह मेरे
सामने आए। गांधी के मरने के पहले मुझे मार डालना पड़ेगा।” उत्पाती वहां से भाग गए। गांधीजी की किडनी
में कुछ समस्या आ रही थी और उनके पेट में दर्द भी हो रहा था। उनका इलाज कर रहे
डॉक्टरों का कहना था की सेहत का ध्यान कर गांधीजी को उपवास तोड़ देना चाहिए।
गांधीजी ने कहा, केवल ईश्वर ही निर्णय ले सकता है की उपवास
कब समाप्त होगा।
इस उपवास के दौरान गांधीजी नहीं चाहते थे कि
डॉक्टर उनकी जांच करें। उन्होंने डॉक्टरों से कहा, "मैंने खुद को ईश्वर पर छोड़ दिया है।"
लेकिन बॉम्बे के हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. गिल्डर ने कहा कि डॉक्टर रोज़ाना हेल्थ
बुलेटिन जारी करना चाहते हैं और बिना जांच किए वे सही जानकारी नहीं दे पाएंगे। इस
बात ने महात्मा को मना लिया और वे मान गए।
डॉक्टर सुशीला नायर गांधीजी का ख्याल रख रही
थीं। उन्होंने कितना पानी पीया और कितना मूत्र का उत्सर्जन हुआ, यह रेकॉर्ड रखा जा रहा था। उनका वज़न 107
पाउंड और ब्लड प्रेशर 98/100 था। उस दिन उन्होंने 68 औंस पानी पिया और 28 औंस
पेशाब किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके शरीर में पानी
जमा हो रहा था। वह पानी नहीं पी पा रहे थे; इससे उन्हें मतली (जी मिचलाना) महसूस होती थी। मतली से
बचने के लिए पानी में नींबू या संतरे जैसे खट्टे फलों का रस या शहद की कुछ बूंदें
मिलाने से उन्होंने मना कर दिया। उनकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही थीं। उनकी
काफी ताकत खत्म हो गई थी; उनका वज़न हर दिन दो पाउंड कम हो रहा था। शाम
को डॉक्टरों ने मेडिकल बुलेटिन जारी किया: “उनका वज़न स्वाभाविक रूप से कम हो रहा है। कमज़ोरी बढ़
गई है। आवाज़ कमज़ोर है। पेशाब में एसीटोन बॉडीज़ पाई गई हैं।” उपवास ख़तरे के दायरे में पहुँच चुका था।
डॉक्टरों ने गांधीजी को प्रार्थना सभा में न
जाने की सलाह दी, इसलिए उन्होंने सभा में पढ़कर सुनाए जाने के
लिए एक संदेश लिखवाया। लेकिन बाद में उन्होंने सभा में शामिल होने का फ़ैसला किया
और भजन-कीर्तन व धार्मिक ग्रंथों के पाठ के बाद लोगों को संबोधित किया। उन्होंने
बताया कि उन्हें बहुत सारे संदेश मिल रहे थे। सबसे सुखद संदेश लाहौर, पाकिस्तान से मृदुला साराभाई का था। पाकिस्तान
से मृदुला साराभाई, जो वहां भगाई हुई स्त्रियों को बचाने और वापस लाने के पवित्र
काम में लगी थीं, तार भेजकर बताया कि उनके मुस्लिम दोस्त - जिनमें मुस्लिम लीग और
पाकिस्तान सरकार के कुछ लोग भी शामिल थे - उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे और
जानना चाहते थे कि उन्हें क्या करना चाहिए। गांधीजी का जवाब था: उपवास आत्म-शुद्धि
की एक प्रक्रिया है और इसका मकसद उन सभी लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल होने के
लिए आमंत्रित करना है जो उपवास के मकसद से सहमत हैं... मान लीजिए कि भारत के दोनों
हिस्सों में आत्म-शुद्धि की लहर दौड़ जाए। तो पाकिस्तान 'पाक' यानी पवित्र हो जाएगा... ऐसा पाकिस्तान कभी खत्म नहीं हो
सकता। तब, और केवल तभी, मुझे इस बात का पछतावा होगा कि मैंने कभी बंटवारे को पाप
कहा था—जैसा कि मुझे डर है कि आज भी मुझे यही मानना पड़ रहा है...
उपवास से पाकिस्तान में नई विचारधारा शुरू
हुई। पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब की विधान सभा में कहा गया, “संसार के किसी देश ने महात्मा गांधी से बड़ा
आदमी पैदा नहीं किया। भारत में कम से कम एक आदमी तो ऐसा है, जो हिन्दू-मुसलिम एकता
के लिए अपनी जान तक क़ुर्बान करने को तैयार है। ... मैं इस सदन के प्रांगण से
महात्मा गांधीजी को यह विश्वास दिलाता हूं कि अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए उनकी
जो भावनाएं हैं उनमें हम पूरी तरह उनके साथ हैं।” भारत के लोगों को भी इसने झकझोर दिया। जिस
समस्या के समाधान के लिए उन्होंने प्राणों की बाजी लगा दी थी, उस पर नये सिरे से सोचने के लिए लोग बाध्य
हुए। सारी दुनिया से संदेशों की, प्रार्थनाओं की और शुभकामनाओं की झड़ी-सी लग गई
थी।
माउंटबेटन का प्रेस अटैची दिल्ली में था। पत्रकार होने के
नाते उसने जनता की प्रतिक्रिया को बहुत ही क़रीब से देखा था। उसने अपनी डायरी में
लिखा था, “आपको गांधीजी के व्रत
की आकर्षण शक्ति को समझने के लिए उनके आसपास रहना होगा। गांधीजी का पूरा जीवन जनता
को प्रभावित करने की एक कला का एक रोमांचक अध्ययन है, और इस रहस्यमय
क्षेत्र में उन्होंने जो सफलता पाई है उसके आधार पर देखें तो वे नेतृत्व के
क्षेत्र में आज तक के महानतम कलाकारों में एक कहे जाएंगे। उनमें ऐसे प्रतीकों के
माध्यम से कर्म करने की प्रतिभा है, जिनको सभी समझ सकते हैं।”
नेतृत्व के क्षेत्र में महानतम कलाकारों में शामिल उस
कलाकार को आज तक के महानतम प्रतीक (आमरण अनशन) के माध्यम से अपना कर्म करना पडा कि
दिल्ली में व्याप्त पागलपन की आग को बुझाया जा सके जो पूरे देश को निगल लेने की
क्षमता रखती थी।
हत्या की साज़िश
पूना में नाथूराम ने 3,000 रुपए के अपने जीवन
बीमा की दूसरी पौलिसी को अपने छोटे भाई
गोपाल गोडसे की पत्नी सिन्धुताई के पक्ष में नामांकन बदला। आप्टे ने साक्षी के
नाते हस्ताक्षर किया। दोपहर बाद 4.30 बजे आप्टे और गोडसे
डेक्कन एक्सप्रेस से बंबई के लिए रवाना हुए। वे एक खाली सेकंड-क्लास डिब्बे में
सफर कर रहे थे। उन्हें आमने-सामने खिड़की वाली सीटें मिल गई थीं।
उसी ट्रेन से बड़गे साधु के वेश में अपने नौकर शंकर
किष्टैय्या के साथ भीड़-भाड़ वाले तृतीय श्रेणी में यात्रा कर रहा था। चालीसगांव के
अपने पैतृक निवास की बिक्री करने के बाद बड़गे पूना लौटा और 14 की शाम को शंकर के साथ
पलीते,
हथगोले, प्राइमर और फ़्यूज़ लेकर
बंबई के लिए निकला था। शंकर के पास खाकी कपड़े का एक कंधे पर लटकाने वाला बैग था, जिसमें पाँच हैंड
ग्रेनेड, गन-कॉटन की दो स्लैब, छह डेटोनेटर और काले
फ़्यूज़ की एक कुंडली थी। ये चीज़ें बडगे ने बॉम्बे में आप्टे
और गोडसे को पहुँचाने का वादा किया था। बडगे को अंदाज़ा था कि पुलिस उसकी
गतिविधियों पर बहुत ज़्यादा नज़र रख रही है, इसलिए वह बहुत सावधानी बरत रहा था।
उसने यह सुनिश्चित कर लिया था कि अगर तलाशी ली गई, तो सामान के साथ शंकर पकड़ा जाएगा।
उसने भेष भी बदल लिया था। पिछले कुछ हफ़्तों से उसने अपनी दाढ़ी बढ़ा रखी थी और उस
दिन उसने केसरिया धोती और घुटनों तक लंबा केसरिया चोगा पहन रखा था। उसने गले में
सूखे बेरों की मालाएँ पहनी थीं और माथे पर लकड़ी की राख का लेप लगाया था।
उसी ट्रेन के एक अन्य डब्बे में बैठा आप्टे ने ऊपर देखा और
पाया कि एक बहुत सुंदर महिला कॉरिडोर में आ-जा रही थी और साफ़ तौर पर खिड़की वाली
सीट ढूंढ रही थी। वह शांता भास्कर मोदक नाम की एक सिने तारिका थी। उसे बिम्बा भी
कहा जाता था। वह पूना में रहती थी और उस ट्रेन के द्वितीय श्रेणी से बंबई जा रही
थी। उसे खिड़की वाली सीट चाहिए थी। नाथूराम ने अपनी सीट छोड़ कर उसे दे दी। आप्टे
सामने वाली खिड़की वाली सीट पर बैठा था। नाथूराम आप्टे की बगल में आकर बैठ गया।
जैसे ही ट्रेन चली, आप्टे ने उस महिला से पूछा कि क्या
वह मशहूर फ़िल्मी एक्ट्रेस बिम्बा हैं। उसने कहा कि सच में उसका स्क्रीन नाम
यही था। रास्ते भर आप्टे उससे बात करता रहा। उसने बिम्बा को बताया कि वह दादर में
उतरेगा और वहां से शिवाजी पार्क जाएगा। उसने बिम्बा को उसके गंतव्य तक छोड़ देने की
पेशकश भी की। बिम्बा ने बताया कि उसे लेने उसका भाई दादर आएगा। उलटे उसी ने आप्टे
और गोडसे को लिफ़्ट देने की बात कही। जब बिम्बा को यह मालूम हुआ कि वे सावरकर सदन
जा रहे हैं, तो उसने कहा कि उसका घर तो वहीं पर है। आप्टे और गोडसे असल में हिंदू
महासभा के ऑफ़िस जा रहे थे, जो वीर सावरकर के घर
से लगभग आधा मील दूर था, लेकिन आप्टे ने बिम्बा
की पेशकश तुरंत मान ली।
शंकर किष्टैय्या, जो बड़े शहर की यात्रा को लेकर
बहुत उत्साहित था, तब बहुत निराश हुआ जब बडगे
ने उसे बताया कि वे दादर में उतर रहे हैं। उसने पूछा, 'क्यों?' बडगे बोला, 'क्योंकि यहीं पर हमें 'माल' पहुँचाना है।' ऐसा लगता है कि उन्हें
ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आप्टे और नाथूराम ने भी उसी ट्रेन से यात्रा की थी, और न ही दादर के
प्लेटफ़ॉर्म पर उनकी उनसे कोई मुलाक़ात हुई। एक साधु-संत की तरह, बडगे ने हिंदू महासभा
के ऑफ़िस तक पैदल जाने का फ़ैसला किया। दादर स्टेशन पर बड़गे और शंकर उतर कर सीधे
हिन्दू महासभा के दफ़्तर पहुंच गए।
आप्टे और गोडसे बिम्बा की कार से सावरकर सदन के लिए निकले। बिम्बा
ने उन्हें सावरकर के घर के सामने छोड़ दिया, लेकिन यह नहीं देखा कि वे अंदर गए
या नहीं। महिलाओं को लुभाने वाले अपने घमंड के कारण, आप्टे न केवल अपने ख़िलाफ़ सबूत
बना रहा था, बल्कि सावरकर के चारों
ओर भी शिकंजा कस रहा था, जिन्हें इस बात का कोई
अंदाज़ा नहीं था कि वे क्या करने की योजना बना रहे थे।
जब बड़गे और शंकर दादर स्थित सभा के दफ़्तर पहुंचे तो न तो
आप्टे था और न ही गोडसे। बिम्बा की कार में घूमने की वजह से आप्टे-गोडसे हिंदू
महासभा के उस ऑफ़िस से दूर चले गए थे जहाँ उन्होंने बडगे को मिलने के लिए कहा था, और वहाँ
पहुँचते-पहुँचते 8:30 से ज़्यादा समय हो चुका था। हिन्दू महासभा का ऑफ़िस तीन
मंज़िला इमारत में था। मुख्य हॉल पहली मंज़िल पर था, जहाँ सदस्य आकर बैठते थे, अख़बार पढ़ते थे और
बातचीत करते थे (और, जैसा कि आगे पता चलेगा, कभी-कभी फ़र्श पर
लेटकर रात भी बिताते थे)। वहाँ तक जाने के लिए एक सीढ़ी थी जो इमारत की सभी
मंज़िलों के लिए एक ही थी।
आप्टे अपनी आदत के मुताबिक, बडगे और शंकर के साथ जुड़ने के बाद
भी एक मशहूर फ़िल्म एक्ट्रेस से हुई अपनी अचानक मुलाक़ात के बारे में बातें करता रहा, जिसका नतीजा यह हुआ कि
बडगे को भी उस मुलाक़ात के बारे में पता चल गया। आप्टे ने बडगे से किसी सुरक्षित
जगह पर इन सामानों को रखने के लिए चलने को कहा। चारों शिवाजी पार्क स्थित सावरकर
के घर पहुंचे। आप्टे ने बड़गे से सामानों का बैग लिया और उन्हें बाहर प्रतीक्षा
करने के लिए कहा। बडगे और शंकर बाहर में प्रतीक्षा करते रहे और आप्टे गोडसे
अस्त्र-शस्त्र के थैले के साथ अंदर गए और दस मिनट में बाहर आ गए। आप्टे के हाथ में
अस्त्र-शस्त्र का बैग अभी भी था। वे फिर
हिन्दू महासभा के दफ़्तर वापस आ गए।
बैग को किसी सुरक्षित जगह पर रखने के लिए एक कार लिया गया।
वहां से वे भुलेश्वर स्थित दीक्षित महाराज के घर के घर के लिए चल पड़े। आप्टे और
गोडसे को आशा थी कि इस अंतिम काम के लिए उन्हें महाराज से पैसा मिलेगा। दीक्षित बड़गे को भी जानता था और
उसे बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने का ऑर्डर दे चुका था। रात के 10.30 बजे वे दीक्षित
महाराज के घर में प्रवेश किए। दीक्षित महाराज सो रहा था। उसके नौकर को सामानों का
बैग दिया गया और उससे कहा कि किसी सुरक्षित जगह उसे रख दिया जाए। सुबह में वे उसे
लेने आएंगे। वहां से फिर वे हिन्दू महासभा के दफ़्तर आ गए। गोडसे ने बड़गे को 50 रुपए दिया और वहीं ठहरने के लिए
कहा। यह भी कहा कि कल सुबह
फिर मिलेंगे, रात में यहीं कहीं सो जाना। आप्टे और गोडसे मरीन ड्राइव के सी
गार्डेन होटल में ठहरे।
जब बड़गे और शंकर मुख्य
हॉल में गए, जहाँ ज़्यादातर
बत्तियाँ बुझा दी गई थीं, तो उन्होंने देखा कि
तीन-चार और लोग फ़र्श पर सो रहे थे। उनमें से एक आदमी उठकर बैठा और बोला, "बडगे, कब आए?" बडगे का इतना बढ़िया
भेष बदलने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ। उसने पूछने वाले को गुस्से से देखा और अकड़कर
कहा कि उसे ग़लतफ़हमी हो रही है, लेकिन कुछ ही सेकंड बाद उसने उसे
मदनलाल पाहवा के तौर पर पहचान लिया, जिसे करकरे कुछ दिन पहले ही उसकी
दुकान पर लाया था। अपनी पहचान पक्की करने के बाद, उन्होंने दोस्ताना बातचीत की और
मदनलाल, जिसके पास काफ़ी
बिस्तर मौजूद था, ने बाकी दोनों को सोने
के लिए एक कंबल और एक चादर दे दी। बड़गे ने मदनलाल से करकरे के बारे में पूछा।
पाहवा ने बताया कि करकरे सेठ अपने एक रिश्तेदार से मिलने ठाने गया है, रात को या
कल सुबह लौटेगा। इस तरह मिशन को पूरा करने के लिए दिल्ली जाते समय, टीम के सभी सदस्य
बॉम्बे में इकट्ठा हुए, जहाँ हिंदू महासभा का
ऑफ़िस उनका आम मिलन-स्थल बना।
पाहवा इस बीच डॉ. जैन
से मिलने गया और उसे अपने और अपने दल की अहमदनगर की गतिविधियों की जानकारी दी।
उसने बताया कि करकरे सेठ के कहने पर कैसे उसने एक कांग्रेसी नेता रावसाहब पटवर्धन
की अहमदनगर की रैली को तहस-नहस कर दिया। पटवर्धन हिन्दू-मुस्लिम एकता पर भाषण दे
रहा था। पुलिस को भी हिन्दुओं से हमदर्दी थी, इसलिए उन्होंने उसका कुछ नहीं किया,
सिर्फ़ उसका खंजर ले लिया। मदनलाल ने यह भी बताया कि अहमदनगर में उन्होंने एक
हिन्दू कमांडो ग्रुप बनाया है। हम हिन्दुओं की रक्षा करते हैं। इसके लिए हम
अस्त्र-शस्त्र इकट्ठा करते हैं।
पाहवा जैन से पैसे माँगने लगा। जैन ने कहा, ‘अभी तो पैसे दिये थे। अब फिर पैसे किस लिए चाहिए?” पाहवा ने कहा, 'मुझे दिल्ली जाना है।' दिल्ली क्यों जाना है? इस प्रश्न का उत्तर वह टाल रहा था। उसकी टालमटोल देखकर जैन उसे शिवाजी पार्क के समुद्र-किनारे ले गये। आखिर उसने बताया कि एक नेता की हत्या करने जा रहा हूँ। वह नेता का नाम बताने से इनकार करता रहा। तब जैन कुछ नेताओं के नाम लेकर पूछते गये। पाहवा हर बार इनकार करता रहा। आखिर जैन
ने गांधीजी का नाम लिया। तब पाहवा ने कबूल किया कि गांधी-हत्या की योजना बनी है।
उसने बताया करकरे सेठ
मुझे सावरकर से मिलवाने ले गए थे। मेरी गतिविधियों को सुनकर सावरकर ने मेरी पीठ
थपथपाई और कहा ऐसे ही मन लगाकर काम करते रहो। अपनी हेंकड़ी दिखाते हुए पाहवा ने
बताया कि दिल्ली मिशन का वह एक अहम सदस्य है और दिल्ली जा रहा है। ज़ोर देकर पूछे
जाने पर पाहवा ने बताया कि एक बडे नेता की हत्या की योजना बनी है, और उसके लिए बम
और शस्त्र ख़रीद लिए गए हैं। उसने यह भी बताया कि करकरे सेठ ही इस योजना को फिनान्स
कर रहे हैं। और भी खुलते हुए उसने कहा कि गांधीजी की प्रार्थना सभा में बम फोड़ने
का काम उसे दिया गया है, ताकि इससे लोगों का ध्यान भटके। इस अफरा-तफरी में दल के
अन्य सदस्य गांधीजी का काम तमाम कर देंगे। डॉ. जैन ने सोचा कि युवक केवल आक्रोश से
उबल रहा था, और उन्हें विश्वास नहीं था कि उसकी बातों में
कोई सच्चाई है। डॉ. जैन ने इसको अधिक महत्व नहीं दिया, क्योंकि उन्हें मालूम था कि
पाहवा बड़ी-बड़ी फेंकने में माहिर था। डॉ. जैन ने दूसरे दिन अपने मित्र अंगद सिंह से
इस विषय पर चर्चा की, और दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पाहवा डिंग हांक रहा था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर