राष्ट्रीय आन्दोलन
416. व्यक्तिगत
सत्याग्रह
1940
युद्ध
में सहायता नहीं
1940 की गर्मी के अंतिम दिन थे। दूसरा महायुद्ध छिड़
चुका था। भारत को ब्रिटिश सरकार ने दूसरे महायुद्ध के समय युद्ध के समर्थक देश के
रूप में घोषित कर दिया था। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि कांग्रेस उसके
युद्ध-प्रयत्नों का पूरा समर्थन करे। कांग्रेस के भीतर ऐसे अनेक लोग थे जो संपूर्ण
समर्थन देने को तैयार थे, बशर्ते कि ब्रिटिश सरकार भारत को सत्ता तथा जिम्मेदारी
सौंप दे और शासन में पूरा हिस्सा दे। इस समय भी अधिकांश कांग्रेसी नेता युद्ध को अहिंसा की दृष्टि से
नहीं, स्वराज्य-प्राप्ति की दृष्टि से देख रहे थे। देश
इतना जाग गया था कि उससे कम
पर राज़ी होने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। भारतीय राष्ट्रभक्त इस विरोधाभास की तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनका अपना देश
गुलामी की जंजीरों में जकडा रहे और वे चेकोस्लावाकिया अथवा पोलैंड की आज़ादी और जनवाद की रक्षा के लिए
हज़ारों मील दूर यूरोप की
भूमि पर लडने के लिए जाएं।
गांधीजी ने यह बात कांग्रेस के समक्ष स्पष्ट कर
दी कि वे हिंसात्मक युद्ध में भागीदार नहीं बनेंगे। उनका कहना था कि कांग्रेस इसे
स्वीकार कर ले कि किसी भी हालत में जन-धन की सहायता नहीं दी जाएगी। सशस्त्र और
हिंसात्मक युद्ध में सहायता देने के अलावा वे नैतिक या दूसरी हर तरह की सहायताएं
देने के लिए वह तैयार थे। वे चाहते थे कि कांग्रेस यह घोषणा कर दे कि वह स्वतंत्र
भारत के लिए भी अहिंसा के ही सिद्धांत का समर्थन करती है। उन्हें इस बात की आशंका
थी कि रक्षात्मक प्रश्नों के उठने पर स्वतंत्र भारत की सरकार अहिंसा के सिद्धांत
को त्याग दे और सैनिक, समुद्री तथा हवाई शक्ति की वृद्धि करे। गांधीजी तो भारत को
अहिंसा का प्रतीक और दृष्टांत के रूप में देखा करते थे। वे तो दंगों को दबाने के
लिए पुलिस का सशस्त्र प्रयोग पसंद नहीं करते थे। उन्हें आशा रहती थी कि उनके उपदेश
लोगों के मन में जगह बना लेंगे। हालाकि 1934 से ही वे कांग्रेस की साधारण सदस्यता से हट गए थे, फिर भी कांग्रेस
के सलाहकार और नेता बने रहे।
अहिंसा
के प्रश्न पर कांग्रेस-कार्यसमिति की असहमति
दुर्भाग्य से राजनीति अवसरवादी होती है। गांधी
जी कुछ सिद्धांतों पर चट्टान की तरह अटल रहते थे। यह कहना तो कठिन है कि एक अकेला
आदमी जनसाधारण के सिद्धांतों और विचारधाराओं पर कहां तक प्रभाव डाल सकता है, पर यह
तो साफ तौर पर देखा जा सकता है कि उस समय के युग में भारतीय विचारधारा पर गांधीजी
का बड़ा गहरा प्रभाव था। उनका प्रभाव उन लोगों पर भी पड़ता जो उनसे असहमत होते थे और
उनकी आलोचना करते थे। जब गांधीजी ने युद्ध और स्वतंत्र भारत के भविष्य के संबंध
में अहिंसा का प्रश्न उठाया तो कांग्रेस-कार्यसमिति ने असहमति जताई। फलस्वरूप इस
प्रश्न पर गांधीजी और कांग्रेस-कार्यसमिति में एक निश्चित और स्पष्ट फूट पड़ गई।
गांधीजी कांग्रेस कार्यसमिति की चर्चाओं से अलग हो गए। इस तरह गांधीजी ने उन लोगों
के लिए अपना कार्य आगे बढ़ाने की सुविधा कर दी, जिनका उनके साथ मतभेद था।
सुभाष चन्द्र बोस, आदि वामपंथी विचारधारा के
लोगों का मानना था कि यह युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध है। यही वह मौक़ा है, जब
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ चौतरफ़ा युद्ध छेड़ कर आज़ादी हासिल कर ली जाए। जनता
संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है। सिर्फ़ आह्वान का इंतज़ार कर रही है। इंतज़ार करो
और देखो की नीति से काम नहीं चलने वाला है। संगठन पहले से तैयार नहीं होता, वह तो
संघर्ष के दौरान बनता है। कांग्रेस अविलंब जनसंघर्ष शुरू करे।
गांधीजी आंदोलन तुरंत नहीं शुरू करने के पक्ष
में थे। उन्हें लगता था कि मित्र राष्ट्रों का पक्ष न्याय का है। अतः युद्ध के समय
उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए। इसके अलावे उस समय का साम्प्रदायिक माहौल भी
तनावपूर्ण था। अगर सिविल नाफ़रमानी छेड़ा जाता तो साम्प्रदायिक दंगों की नौबत आ
जाती। गांधीजी को यह भी लगता था कि न देश की जनता और न ही कांग्रेस तुरंत संघर्ष
छेड़ने के लिए तैयार है। अभी तो इस बात की आवश्यकता है कि जनता को राजनीतिक
प्रशिक्षण दिया जाए और उसे संघर्ष के लिए तैयार किया जाए। साथ ही कांग्रेस संगठन
को मज़बूत किया जाए। उसकी कमज़ोरियां दूर की जाए। तबतक सरकार से बातचीत का सिलसिला
चलता रहे। मार्च में रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इसमें प्रस्ताव पारित कर
कहा गया कि ‘पूर्ण स्वाधीनता से कम कुछ भी जनता को स्वीकार्य नहीं हो सकता। ...
जैसे ही कांग्रेस संगठन संघर्ष के लिए योग्य हो जाता है वैसे ही सिविल नाफ़रमानी
आंदोलन शुरू किया जाएगा।
पूना प्रस्ताव
1940 की गर्मियों में नाज़ी
सेनाओं ने सारे पश्चिमी यूरोप को रौंद डाला। अकेला इंग्लैंड अत्यधिक प्रतिकूल
परिस्थितियों में भी डंटा हुआ था। उसकी इस वीरता ने भारतीयों में उसके प्रति
प्रशंसा और सहानुभूति के भावों को जगा दिया। इसके अलावा एक और महत्त्वपूर्ण बात यह
थी कि यदि इंग्लैंड नाज़ी विजय-वाहिनियों को रोकने में असफल हो जाता, तो हिटलर को
भू-मध्यसागर के रास्ते भारत में घुस आने से कोई नहीं रोक सकता था। इस आसन्न संकट
के कारण कांग्रेस ने युद्ध में अपने सहयोगियों की शर्तों को थोड़ा और नर्म कर दिया
था। जुलाई, 1940 में कांग्रेस
महासमिति की पूना में बैठक हुई जिसमें काफ़ी विचार-विमर्श के बाद सर्व-सम्मति से एक
युक्ति निकली थी। इसे पूना प्रस्ताव भी कहा जाता है। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव रखा
कि अगर सरकार केन्द्र में भारतीयों को लेकर एक ऐसी सरकार बना दे जो विधानसभा के
प्रति उत्तरदायी हो और सरकार युद्ध के बाद भारत को स्वाधीनता प्रदान करे, तो
कांग्रेस सरकार को युद्ध में सहयोग देने के लिए तैयार है। किंतु ब्रिटिश सरकार कांग्रेस के उस प्रस्ताव
को ठुकरा दिया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा, “अटलांटिक चार्टर भारत पर लागू नहीं होता। मैं
ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन की अध्यक्षता करने के लिए ब्रिटेन का प्रधानमंत्री
नहीं बना हूं।” किन्तु प्रधानमंत्री की इस घोषणा के बावज़ूद कांग्रेस में
बहुतों को यह आशा बनी रही कि जब युद्ध तेज़ होगा तब ब्रिटिश सरकार ढीली पड़ेगी और
कांग्रेस की शर्तों पर उसका सहयोग लेगी।
अगस्त-प्रस्ताव
सरकार की दुर्बल स्थिति देखते हुए वायसराय
लिनलिथगो को संवैधानिक गतिरोध दूर करने का हुक्म मिला। कांग्रेस के नेता सरकार की
ओर से सद्भावना की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने युद्ध में सहयोग की अपनी शर्तों
को बहुत नर्म कर दिया था। लेकिन उन्हें निराश होना पड़ा
वायसराय ने 8 अगस्त, 1940 को औपनिवेशिक स्वराज
की स्थापना के लिए जो प्रस्ताव दिया था, वह बहुत आशाप्रद नहीं था। । उस घोषणा में
नया विधान बनाने के भारतीय अधिकारों को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन यह भी जोड़
दिया गया था कि युद्ध की समाप्ति के बाद ही सभी दलों के सहयोग से संवैधानिक
समस्याओं का हल ढूंढा जाएगा। अल्पसंख्यकों की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी
संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं करेगी। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी का विस्तार कर
भारतीयों को इसमें अधिक स्थान दिए जाने की इसमें व्यवस्था थी। एक युद्ध सलाहकार
परिषद के गठन की बात भी थी इसमें। लीग ने प्रस्ताव का स्वागत किया लेकिन कांग्रेस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। सरकार का
उद्देश्य मुस्लिम लीग को रिझाना, कांग्रेस-लीग समझौते को मुश्किल कर देना और ऐसा
वातावरण तैयार कर देना था, जिससे सत्ता के हस्तांतरण की आवश्यक शर्त, भारत के सब
दलों और जातियों का सर्वसम्मत समझौता, पूरी न हो सके। सरकार की इन चालबाज़ियों से कांग्रेस के जो नेता
सरकार से आस लगाए बैठे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई।
सरकार की दृष्टि में अगस्त की घोषणा 'अधिकतम' थी, लेकिन कांग्रेस की न्यूनतम माँग से भी वह इतनी न्यून थी कि कांग्रेस उसे
स्वीकार करने को राज़ी न हो सकी। देश और सरकार के सामने जो संकट मुंह बाए खडा था, उसके निवारण में अधिकांश कांग्रेसी नेता अपना
सहयोग देने को बहुत उत्सुक थे, लेकिन सरकार सहयोग लेने को तैयार न थी। आज़ाद
ने लॉर्ड लिनलिथगो का इस पर बात करने का निमंत्रण भी ठुकरा दिया। कांग्रेस अध्यक्ष
का मानना था कि आगे बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है। गांधीजी ने मौलाना आज़ाद को
एक पात्र लिखकर उनके फैसले का पूरा समर्थन किया।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया अलग थी। लॉर्ड
लिनलिथगो के बयान का मतलब यह निकाला गया कि "कोई भी भविष्य का संविधान, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम," लीग की सहमति के बिना नहीं अपनाया जाएगा। साथ
ही, बयान में छिपे हुए एकजुट भारत के विचार को
खारिज कर दिया गया। "भारत का विभाजन ही एकमात्र समाधान है।" युद्ध के
संचालन में मुस्लिम लीग का सहयोग भी इसी "दो राष्ट्र" सिद्धांत पर
आधारित होगा।
गांधीजी युद्ध-काल में सरकार को परेशान नहीं
करना चाहते थे और कांग्रेसी नेता भी मित्र-राष्ट्रों की स्थिति के प्रति चिंतित थे, इसलिए किसी जन-आंदोलन का सवाल तो उस समय उठ भी नहीं सकता था। लेकिन वायसराय की अगस्त घोषणा
ने कांग्रेसियों को इतना विक्षुब्ध कर दिया था कि नाराज़गी जाहिर करने के लिए किसी सशक्त कदम की
आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। पं. जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेसियोँ की उस समय
की निराशा और विक्षोभ का वर्णन ‘दो रास्ते’ नामक एक लेख में किया है—“उस घोषणा ने हमारे दिलों को जोड रखने वाले रहे- सहे मुलायम धागों को भी तोड दिया।“
बंबई कार्य-समिति की बैठक
संवैधानिक सुधार के कोई आसार नहीं नज़र आ रहे
थे। उस पर अध्यादेशों द्वारा प्रेस की आज़ादी एवं सभा संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिए
गए थे। नेताओं को परेशान किया जा रहा था और उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भरा जा रहा था।
इस स्थिति में नेताओं को लगा कि अगर वे कुछ नहीं करते हैं, तो ब्रिटिश सरकार उनके
धैर्य को कमज़ोरी मानकर चलती रहेगी। इस समय गांधीजी और कांग्रेस ने एक-दूसरे की तरफ़
देखा था और उनमें आपसी गतिरोध दूर करने की इच्छा उत्पन्न हुई थी। 15 सितंबर, 1940 को बंबई में कार्य-समिति की बैठक हुई। उसमें
सरकारी प्रस्तावों को नामंजूर कर दिया गया। जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था उसमें
युद्ध का उल्लेख नहीं था, क्योंकि अब सरकार से इस सहयोग की ज़रूरत ही नहीं थी। कांग्रेस
ने फिर से गांधीजी से नेतृत्व ग्रहण करने के लिए कहा। प्रस्ताव में कहा गया था, “न केवल स्वराज के संघर्ष के लिए बल्कि जहां तक
अमल में आ सकने की संभावना हो, स्वतंत्र भारत के लिए भी कांग्रेस-महासमिति अहिंसा
की ही नीति और व्यवहार में दृढ़ विश्वास करती है। ...” इस घोषणा में जहां एक ओर शांतिपूर्ण कार्य और
निशस्त्रीकरण के लिए कांग्रेस की आकांक्षा का दृढ़तापूर्वक समर्थन किया गया था वहीं
दूसरी तरफ़ बहुत सारी शर्तों पर भी ज़ोर डाला गया था। जो भी हो कांग्रेस का भीतरी
संकट तो टला। कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में फिर से सरकार से असहयोग करने का
निर्णय लिया।
11 अक्तूबर से व्यक्तिगत
सत्याग्रह
गांधीजी ने सरकार विरोधी अभियान राजनैतिक आधार
पर नहीं, शांतिवादी और युद्ध-विरोधी आधार पर संगठित किया। उनका कहना था, ब्रिटिश
सरकार न स्वाधीनता दे सकती है, न देने का वादा कर सकती है, लेकिन उसे हमें भाषण की
स्वतंत्रता और महायुद्ध में घसीटे जाने का विरोध और युद्ध मात्र का विरोध करने का
अधिकार तो दे ही सकती है और देना भी चाहिए। ऐसे अवसर पर कांग्रेस का वाम पक्ष और
कुछ सहयोगी जन-आंदोलन शुरू करने के पक्ष में नहीं था। लेकिन उन्होंने किसी की नहीं
सुनी। गांधीजी ने चुने हुए लोगों द्वारा व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने
का निर्णय लिया। नियम यह था कि जनता को उत्तेजित नहीं करेंगे। अधिकारियों को
परेशान नहीं करेंगे। चुने हुए व्यक्ति पूरे देश में जनता के बीच जाकर सार्वजनिक
रूप से कहेंगे, “जन या धन देकर ब्रिटिश युद्ध-प्रयासों में सहायता देना ग़लत
है। अहिंसक अवज्ञा के द्वारा समस्त युद्ध का प्रतिरोध करना एकमात्र उचित कार्य है।” सत्याग्रही ज़िला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचित
कर देंगे कि किस स्थान पर और किसे समय युद्ध-विरोधी भाषण होना है। क्योंकि यह
व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन होगा, इसलिए
वे इसे इस तरह से करेंगे कि दूसरे लोग सीधे या परोक्ष रूप से इसमें शामिल न हों।
हालांकि, जनता कुछ हद तक इसमें शामिल होगी, क्योंकि उनके पास यह विकल्प होगा कि वे सत्याग्रही
को बोलते हुए सुनें या नहीं।
पहले सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे बने।
उन्होंने 17 अक्तूबर, 1940 को वर्धा के समीप
पवनार गांव में सरकार
के साथ युद्ध में साथ न देने का आह्वान करते हुए सत्याग्रह का श्रीगणेश किया। सेलू
नामक गांव में सत्याग्रह की पहली सभा हुई। दूसरी सभा सेवाग्राम में हुई। विनोबाजी
बहुत ही अच्छे वक्ता थे। देहात के लोग समझ सकें ऐसे उदाहरण और कथाएं सुनाकर वे
अपनी बात रखते थे। वे पैदल चलकर गांव-गांव गए और अगले तीन दिनों तक भाषण दिए। चार
दिन बाद 21 अक्टूबर को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तीन महीने की जेल की
सज़ा सुनाई गई।
दूसरे सत्याग्रही के रूप में जवाहरलाल नेहरू को
विनोबा भावे के बाद चुना गया था। लेकिन उन्हें 31 अक्टूबर को छेओकी रेलवे स्टेशन
पर गिरफ्तार कर लिया गया, जब
वह गांधी से मिलकर वर्धा से लौट रहे थे। उन पर गोरखपुर जेल में मुकदमा चलाया गया
और अक्टूबर की शुरुआत में दिए गए भाषणों के लिए उन्हें चार साल की जेल की सज़ा
सुनाई गई।
जिन सत्याग्रहियों को गिरफ़्तार नहीं किया जाता,
वे गांवों की ओर चल देते और अपना संदेश फैलाते हुए दिल्ली की ओर बढ़ने की कोशिश
करते। इससे इसका नाम ही ‘दिल्ली चलो आन्दोलन’ पड़ गया। धीरे-धीरे व्यक्तिगत
सत्याग्रह ने बहुत व्यापक रूप धारण कर लिया। जगह-जगह लोग युद्ध-विरोधी प्रचार कर
सरकारी प्रतिबंधों को तोड़ते और जेल जाते।
व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रमुख उद्देश्य था
भारतीय जनता की उग्र राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति। साथ इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार
को एक और अवसर देना कि वह भारत की मांगों को मान ले। इस सत्याग्रह के द्वारा
गांधीजी लोगों को आने वाले संघर्ष के लिए तैयार भी कर रहे थे। दूसरे शब्दों में
कहें तो जनता को राजनीतिक रूप से जाग्रत और प्रशिक्षित भी किया जा रहा था।
कांग्रेस संगठन को दुरुस्त किया जा रहा था। अवसरवादी लोगों को संगठन से बाहर किया
जा रहा था। व्यक्तिगत सत्याग्रह के उद्देश्यों को गांधीजी ने वायसराय को लिखे एक
पत्र में इस प्रकार समझाया: 'कांग्रेस
नाज़ीवाद की जीत के उतनी ही खिलाफ है जितना कोई भी अंग्रेज हो सकता है। लेकिन उनका
उद्देश्य युद्ध में उनकी भागीदारी तक नहीं ले जाया जा सकता। और चूंकि आपने और भारत
के राज्य सचिव ने यह घोषणा की है कि पूरा भारत स्वेच्छा से युद्ध प्रयासों में मदद
कर रहा है, इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि
भारत के अधिकांश लोग इसमें रुचि नहीं रखते हैं। वे नाज़ीवाद और भारत पर शासन करने
वाली दोहरी तानाशाही के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं।'
प्रतिनिधि
सत्याग्रह
नवंबर के मध्य में आंदोलन का दूसरा चरण शुरू
हुआ। गांधीजी ने इसका नाम प्रतिनिधि सत्याग्रह दिया। इसमें भाग लेने के लिए
कांग्रेस कार्य-समिति, महासमिति, केन्द्रीय और प्रांतीय कॉसिलों के सदस्यों में से
सत्याग्रहियों का चुनाव किया गया। कई कांग्रेसी, जिनमें
ज़्यादातर पूर्व मंत्री शामिल थे, सड़कों
पर उतरे, नारे लगाए और उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज
दिया गया। साल खतम होते-होते चार सौ कांग्रेसी विधायक जेल में थे। अन्य कई
कांग्रेसी नेता गिरफ़्तार हुए। 15 मई 1941 तक 25 हज़ार से ज़्यादा
सत्याग्रहियों को दंडित किया जा चुका था। गांधीजी ने सारा आंदोलन इस ढंग से संचालित
किया था कि देश में कहीं उत्तेजना
की कोई घटना न घटी और न वातावरण ही तनावपूर्ण हुआ।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर