राष्ट्रीय आन्दोलन
415. पृथक
राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव
1940
जिन्ना की चालों से हिन्दू-मुसलमानों के बीच दूरियां बढती जा रही थी। गाँधीजी ने इसको रोकने की काफी कोशिश की। उनके ही सुझाव पर कांग्रेस ने 1940 के लिए अबुल कलाम आज़ाद को अपना अध्यक्ष चुना था। (रामगढ़ सत्र में 19 मार्च को कांग्रेस
ने मौलाना आज़ाद को एम. एन. रॉय के विरुद्ध 1,864 वोटों के मुकाबले 183 वोटों से चुना था।) गांधीजी ने जिन्ना को लिखी चिट्ठी में उसे “प्रिय क़ायद-ए-आज़म” कहकर संबोधित किया। ‘हरिजन’ में उसे ‘मेरे पुराने दोस्त’ कह कर संबोधित किया। उन्होंने लिखा कि आप सभी गैर कांग्रेसी ताकतों की अगुआई करें, जिसमें दलितों के नेता आम्बेडकर और कांग्रेस के ख़िलाफ़ तमिलों को एकजुट करने वाले रामास्वामी नायंकर के अनुयायी भी होंगे। लेकिन जिन्ना इस प्रलोभन में पड़ने वाला नहीं था। उसने जवाब दिया, “मुझे इस मसले में कोई गलतफहमी नहीं है कि हिंदुस्तान न तो एक राष्ट्र है, न एक देश, यह अनेक राष्ट्रीयताओं वाला
एक उपमहाद्वीप है।” कांग्रेस मंत्रिमंडल के
त्यागपत्र देने के बाद उसने ‘मुक्ति दिवस’ मनाने की घोषणा कर दी। गांधीजी ने जिन्ना से मुक्ति दिवस रद्द करने की अपील की।
जिन्ना ने तर्क दिया कि गांधीजी ने अभियोक्ता और न्यायाधीश दोनों होने की बहुत
बड़ी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने जिन्ना द्वारा
लगाए गए आरोपों को मनगढ़ंत और लापरवाह और सांप्रदायिक शांति को खतरे में डालने
वाला बताया। शिमला में गांधीजी के बाद, जिन्ना ने वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो से मुलाकात की। उसने लॉर्ड लिनलिथगो से इस
बात पर ज़ोर दिया कि मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यक किसी भी समझौते या बातचीत में
अपनी स्थिति की सुरक्षा को बहुत ज़रूरी मानते हैं। वायसराय ने उसे भरोसा दिलाया कि
महामहिम की सरकार अल्पसंख्यकों के जायज़ हितों की रक्षा की ज़रूरत को पूरी तरह
समझती है।
यह मार्च 1940 की बात है, जब देश भारत के पूर्ण स्वतंत्रता के अधिकार को साबित करने
के लिए बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए गांधीजी के एक शब्द
का बेसब्री से इंतजार कर रहा था, तभी मुस्लिम
अलगाववाद ने राजनीतिक मंच पर ज़ोरदार एंट्री की। जिन्ना ने कांग्रेस सरकारों द्वारा राष्ट्रीय
ध्वज, राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय भाषा को अपनाने पर आपत्ति जताई, और घोषणा की: "मुसलमान उनसे किसी भी तरह के न्याय या
निष्पक्षता की उम्मीद नहीं कर सकते।" कांग्रेस नेतृत्व ने इस बिगड़ती स्थिति
को देखकर लीग को मनाने और सांप्रदायिक मुद्दे का समाधान निकालने के लिए हर संभव
कोशिश की। गांधीजी, राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस ने बारी-बारी से जिन्ना के साथ लंबी बातचीत की, जो बातचीत और चिट्ठी-पत्री के ज़रिए लंबे समय तक चली। लेकिन
जिन्ना ने कांग्रेस के साथ किसी भी समझौते या तालमेल से साफ इनकार कर दिया।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुस्लिम लीग के मंच और प्रेस से चलाया जा रहा नफरत का
अभियान बढ़ता गया, जब तक कि वह चरम पर नहीं पहुंच गया और मार्च 1940 के लाहौर
प्रस्ताव में सामने आया।
22 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग का
सेशन लाहौर में हुआ। यह भारत की एकता और अखंडता और एक राष्ट्र के रूप में उसकी
पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण सत्र साबित हुआ। यहाँ लीग ने पाकिस्तान को अपना मकसद
बनाया। जिन्ना के लिए, भारत की मौजूदा एकता "बनावटी" थी, जो सिर्फ़ ब्रिटिश काल से थी और ब्रिटिश संगीन के दम पर
कायम थी। कांग्रेस के शासन का दोहराव गृह युद्ध की ओर ले जाएगा। उसने कहा कि लोकतंत्र भारत के लिए सही नहीं है और
"मुसलमान एक राष्ट्र हैं, राष्ट्र की किसी
भी परिभाषा के अनुसार और उनके पास अपनी मातृभूमि, अपना इलाका और अपना राज्य होना चाहिए।"
अपने अध्यक्षीय भाषण में, जिन्ना ने
"दो राष्ट्र" के सिद्धांत पर ज़ोर दिया: "इस्लाम और हिंदू धर्म, शब्द के सही
मायने में धर्म नहीं हैं, बल्कि, असल में, अलग-अलग सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं, और यह सिर्फ़ एक
सपना है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक कॉमन राष्ट्रीयता बना सकते हैं।" मुस्लिम लीग ने घोषणा की
कि मुसलमानों को भारत के संबंध में ऐसी कोई वैधानिक योजना स्वीकार न होगी जो
उत्तर-पश्चिम और पूर्व के मुस्लिम बहुमत वाले प्रदेशों को स्वतंत्र राज्य मानकर
तैयार न की गई हो।
जिन्ना के मार्गदर्शन में मुस्लिम लीग
ने पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया: "यह तय किया जाता है कि ऑल इंडिया
मुस्लिम लीग के इस सेशन का यह सोचा-समझा विचार है कि इस देश में कोई भी संवैधानिक
योजना तब तक काम नहीं करेगी या मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं होगी, जब तक कि उसे
निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर डिज़ाइन नहीं किया जाता, यानी, भौगोलिक रूप से
सटे हुए हिस्सों को क्षेत्रों में बांटा जाए,
जिन्हें ऐसे क्षेत्रीय फेरबदल के साथ
बनाया जाना चाहिए, जो ज़रूरी हों,
ताकि जिन इलाकों में मुसलमान संख्या में
ज़्यादा हैं, जैसे कि भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में, उन्हें मिलाकर 'आज़ाद राज्य' बनाए जाएं, जिनमें शामिल
इकाइयां स्वायत्त और संप्रभु होंगी।"
अब
राजनीतिक भू दृश्य काफ़ी जटिल हो गया था :
अब यह संघर्ष भारतीय बनाम ब्रिटिश नहीं रह गया
था। अब यह कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश
शासन, तीन धूरियों के बीच का
संघर्ष था। मई में ब्रिटेन में एक सर्वदलीय मिली-जुली सरकार सत्ता में थी जिसमें
शामिल लेबर पार्टी के सदस्य भारतीय आकांक्षाओं के प्रति हमदर्दी का रवैया रखते थे
लेकिन सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल कट्टर साम्राज्यवादी थे। उनका
कहना था कि उन्हें सम्राट का सर्वोच्च मंत्री इसलिए नहीं नियुक्त किया गया है कि
वह ब्रिटिश साम्राज्य को टुकड़े-टुकड़े कर दें।
जब
गांधीजी को दो राष्ट्रों के सिद्धांत और लीग की एक पृथक राष्ट्र की स्थापना की
मांग के बारे में पता चला तो वे चकित रह गए। उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं हुआ।
धर्म का प्रयोजन लोगों के दिलों को मिलाना है, या अलग करना? उन्होंने दो राष्ट्रों
के सिद्धांत को ‘असत्य’ कहा। इससे कड़ा शब्द उनके शब्दकोश में था ही नहीं। गांधीजी ने मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव पर अपने तरीके से
प्रतिक्रिया दी। उन्हें लगा कि अगर मुसलमान सच में बंटवारे पर अड़े हैं, तो इसे रोका नहीं
जा सकता। 6 अप्रैल के हरिजन में एक लेख में उन्होंने लिखा: मैं आठ करोड़ मुसलमानों
को बाकी भारत की इच्छा मानने के लिए मजबूर करने का कोई अहिंसक तरीका नहीं जानता, भले ही बाकी लोग
कितने भी बड़े बहुमत में हों। मुसलमानों को भी वही आत्मनिर्णय का अधिकार होना
चाहिए जो बाकी भारत को है। लेकिन मुझे विश्वास नहीं है कि जब असली फैसले की बात
आएगी, तो मुसलमान कभी भी देश के बंटवारे चाहेंगे। उनकी समझदारी
उन्हें ऐसा करने से रोकेगी। उनका अपना स्वार्थ उन्हें रोकेगा। उनका धर्म उस साफ
आत्महत्या को रोकेगा जिसका मतलब बंटवारा होगा। "दो राष्ट्र" का सिद्धांत
एक झूठ है। लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव पर गांधीजी ने "एक हैरान करने वाली
स्थिति" नाम के एक लेख में टिप्पणी की थी: "मुझसे एक सवाल पूछा गया है: 'क्या आप आम सविनय
अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का इरादा रखते हैं,
जबकि कायदे-आज़म जिन्ना ने हिंदुओं के
खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है और मुस्लिम लीग से भारत को दो हिस्सों में बांटने
के पक्ष में एक प्रस्ताव पास करवा लिया है?
अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपके इस
फॉर्मूले का क्या होगा कि सांप्रदायिक एकता के बिना स्वराज नहीं मिल सकता?"
गांधीजी ने लिखा: ''जिन्ना और लियाकत
अली कहते हैं कि मैं सत्ता पाने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करना चाहता हूँ
और मैं सिर्फ़ हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता हूँ। मुझसे पूछा जाता है कि अगर
मुसलमान इस आंदोलन से दूर रहने का फैसला करें तो क्या मैं फिर भी आंदोलन शुरू
करूँगा? अगर यह पक्का हो जाए कि सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होने पर
हिंदू-मुस्लिम दंगे होंगे तो फिर क्या किया जाना चाहिए? खाकसार हर जगह
बैन नहीं हैं। कई जगहों पर वे काम कर रहे हैं। बीदर (हैदराबाद रियासत) में दंगे
हुए। हिंदू दुकानों में दस दिनों तक लूटपाट होती रही और पुलिस ने दखल नहीं दिया। 'ऑल इंडिया
मुस्लिम लीग' से 'इंडिया' शब्द हटाने की भी मांग हो रही है। क्या ऐसी स्थितियों में
सविनय अवज्ञा आंदोलन किया जा सकता है?
क्या हमारे पास ज़रूरी अहिंसा है?"
पाकिस्तान की मांग का मूल महान उर्दू
कवि और देशभक्त इकबाल, जो एक बेहतरीन पैन-इस्लामिक
विचारक थे, के 1930 के भाषण में खोजा जाता है। तब उन्होंने लीग
का सभापतित्व करते हुए एक पश्चिमोत्तर भारतीय "एक मज़बूत मुस्लिम राज्य के गठन" की ज़रूरत का उल्लेख किया था। उनका यह सपना देश को विभाजित करने का कदापि नहीं था। इक़बाल ने इसे पाकिस्तान नहीं कहा था। वे तो पश्चिमोत्तर भारत के मुस्लिम-बहुल इलाक़े का पुनर्गठन
करके उसे भारतीय संघ में एक स्वायत्त इकाई बनाना चाहते थे।
अलग राष्ट्र का नाम 1930 के दशक के शुरुआती दिनों में ही ख्वाजा अब्दुल रहीम नामक एक व्यक्ति ने ‘पाकज़मीन’ दिया था। कैंब्रिज में पढ़ रहे चौधरी रहमत अली
के पंजाबी मुसलमान विद्यार्थियों के गुट को इस विचार का प्रणेता होने का श्रेय
अवश्य दिया जा सकता है। 1933 में रहमत अली ने पहली बार इस नाम को छपवाया। रहमत अली ने 1933 में 'नाउ ऑर नेवर'
नाम का एक पैम्फलेट प्रकाशित किया। इसमें उसने एक नई अस्मिता के लिए एक अलग राष्ट्रीय दर्ज़े की
मांग की थी। इसका उसने
पाकिस्तान नाम दिया था। इसके अंतर्गत
पंजाब, अफ़ग़ान प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान आते। उस समय इस बात को गंभीरता से किसी ने भी नहीं लिया था,
मुस्लिम लीग ने भी नहीं। लंदन में मौजूद
मुस्लिम नेताओं ने इस योजना को "बचकाना और काल्पनिक" कहकर खारिज कर
दिया। गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने तो इसे एक लड़के की सनक कहकर इसे टाल दिया
था। इस बात के काफी सबूत हैं कि इस विचार को चर्चिल के नेतृत्व
वाले टोरी नेतृत्व के कट्टरपंथी गुट और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों द्वारा समर्थित
किया गया था।
जो 1933-34 में एक कल्पना जैसा लग रहा था, वह 1938-39
में मुस्लिम लीग के एजेंडे का मुख्य
मुद्दा बन गया। 1937 के बाद लीग को एक सकारात्मक मंच की बहुत आवश्यकता थी। लीग का मानना था कि 1935 के अधिनियम के तहत केन्द्र में मज़बूत और हिंदू-प्रधान
सरकार ही बनती। 1937 में इक़बाल ने जिन्ना से आग्रह किया था कि वह लीग का लक्ष्य रहमत अली के विचारों जैसा घोषित करे। इस शायर ने 1930 में ही अलग मुसलमान देश बनाने के मांग की थी। इक़बाल ने इसे ‘पाकिस्तान’ नहीं कहा था। लाहौर प्रस्ताव में भी यह नाम नहीं था। यह तो प्रेस था जिसने इस पृथक राष्ट्र के नाम की ज़रूरत महसूस के और इसे ‘पाकिस्तान’ का नाम दिया। जिन्ना और मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले
राष्ट्रीय आंदोलन से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया,
एकजुट राजनीतिक प्रयास की परंपरा को
नकार दिया और यह घोषणा की कि मुसलमान कोई राष्ट्रीय अल्पसंख्यक नहीं हैं, बल्कि एक राष्ट्र
हैं जिसे एक अलग संप्रभु राज्य का अधिकार है।
1939 में लीग ने विभिन्न योजनाओं की जांच के लिए एक उपसमिति की स्थापना की। इसमें
ज़फ़रुल हसन और हुसैन क़ादरी थे। इन्होंने पाकिस्तान, बंगाल, हैदराबाद और हिन्दुस्तान
बनाने की बात की। ये योजनाएं विभाजन की
स्थिति तक पहुंचती नहीं दिखती थीं। 13 फरवरी 1940 को जिन्ना ने टाइम एंड टाइड के
लिए लिखे एक आर्टिकल में, यह मानते हुए कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, यह दावा किया कि पश्चिमी तरह की डेमोक्रेसी भारत के लिए सही
नहीं है। 23 मार्च 1940 को सिकंदर हयात ख़ान ने एक प्रस्ताव बनाया और उसे फ़ज़लुल हक़ ने प्रस्तुत किया था।
इसमें मांग की गई थी, “भौगोलिक रूप से
जुड़ी हुई इकाइयों को क्षेत्रों में विभाजित किया जाए जो ऐसे हों, और जिनका
आवश्यकतानुसार ऐसा क्षेत्रीय पुनर्गठन किया जा सके कि, संख्यात्मक दृष्टि से
मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों, जैसे कि भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों का
समूह बनाकर उन्हें स्वतंत्र राज्य बनाया जा सके जिनकी घटक इकाइयां स्वायत्त और
सार्वभौम हों।”
आरंभ में मुस्लिम नेताओं ने पाकिस्तान
की बात को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया था। जिन्ना के लिए भी यह सौदेबाज़ी के आधार से
अधिक कुछ नहीं था। वह तो इसका उपयोग कांग्रेस की राह में रोड़ा अटकाने के लिए किया
करता था। पाकिस्तान की अवधारणा अंग्रेज़ों के लिए बहुत उपयुक्त थी। इसके माध्यम से
भारत में संवैधानिक गतिरोध बनाए रख सकता था। अगस्त प्रस्ताव इसी तरह का एक प्रयास
था। लेकिन जिन्ना को एक सीमा तक प्रोत्साहन देते हुए भी उसकी सभी मांगों को
स्वीकार करने का अंग्रेज़ों का कोई इरादा नहीं था। ग़ैर-सरकारी मुस्लिम सलाहकारों को
रखने के बारे में लीग का दावा, विस्तृत एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल में अधिक सीटें दिया
जाना और यदि कांग्रेस भविष्य में काउंसिल में आने का निर्णय करे तो उसके साथ
समानता की मांग – ये सब ऐसे मुद्दे थे जिसे अंग्रेज़ों ने ठुकरा दिया था। फलस्वरूप
जिन्ना ने अगस्त-प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। अगले वर्ष उसने सिकंदर हयात ख़ान और
फ़जलुल हक़ को नई राष्ट्रीय प्रतिरक्षा परिषद की सदस्यता अस्वीकार करने के लिए बाध्य
किया था।
कुछ समय बाद लीग ने इस नाम को स्वीकार कर लिया। लाहौर प्रस्ताव में इस देश की सीमाओं का उल्लेख नहीं हुआ था। जिस जिन्ना को शुरू में अलग राष्ट्र की मांग को लेकर हिचक थी, अज वह उसकी वकालत कर रहा था। यह मांग उसकी अब तक की चलाई हिन्दू-मुस्लिम एकता की विचार-धारा के ख़िलाफ़ थी। मुस्लिम कौम में बढ़ाते अलगाववाद के कारण वह आज मुस्लिम राष्ट्र की वक़ालत कर रहा था। लाहौर में जिन्ना ने कहा था, “हिन्दू और मुसलमान कभी भी साझा राष्ट्रीयता नहीं विकसित कर सकते और एक राज्य के अधीन इन जैसी दो राष्ट्रीयताओं को, जिनमें एक अल्पसंख्यक और दूसरी बहुसंख्यक, एक ही जुए में जोत देने का मतलब, ऐसे राज्य की सरकार के सारे उसूलों को बर्बाद कर देना होगा।” जिन्ना ने यहाँ तक कहा था, “पृथक मुस्लिम राज्य हासिल करने के लिए मैं अपना जीवन क़ुर्बान कर दूंगा।”
यह सब सुन गांधीजी ने ‘हरिजन’ में लिखा था, “कांग्रेस हिन्दू संस्था नहीं है। इसके अध्यक्ष मुसलमान हैं। इसकी 15 सदस्यीय कार्य समिति के 4 सदस्य मुसलमान हैं’ हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्रीयताएँ नहीं हैं। वे हो नहीं सकते। भारत के मुसलमानों को इस्लाम अपना लेने से उनके राष्ट्रीयता नहीं बदली है।”
जिन्ना ने जवाब दिया, “निश्चित रूप से आज भारत प्रकृति द्वारा विभाजित है ... मैं समझ नहीं पाता कि इतनी हाय तौबा क्यों मची है? वह देश ही कहाँ है जिसे विभाजित किया जा रहा है?”
गांधीजी ने जवाब दिया, “मैं अपने पूरे अंतर्मन से मानता हूँ कि क़ुरान का ख़ुदा ही गीता का ईश्वर है।”
जिन्ना ने कहा, “मैं अपने मजहब का अदना और स्वाभिमानी अनुयायी हूँ। पाकिस्तान के लिए लड़ना इसलाम के सेवकों का पवित्र कर्त्तव्य है, क्योंकि हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग सभ्यताओं के हैं, जो परस्पर विरोधी विचारों और अवधारणाओं पर आधारित हैं।”
जिन्ना ने निर्णय कर रखा था
कि अगर अंग्रेजी सरकार कांग्रेस के आगे नहीं झुकती, तो वह जंग में अंग्रेजों का समर्थन करेगा। इसका अर्थ था उसने सरकार के साथ अपने सहयोग को इस शर्त पर रखा कि वह
भविष्य के संविधान के निपटारे के लिए कांग्रेस की योजना से सहमत नहीं होगी। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट
कर दिया था, अगर
कांग्रेस के सर पर ताज रखा गया, तो मुसलमान बगावत कर देंगे। युद्धकालीन साम्राज्यवादी
रणनीति का एक महत्वपूर्ण अंग था लीग के दावों को बढ़ावा देना। अगस्त प्रस्ताव ने तो
स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेज़ किसी भी ऐसी सरकार को दायित्व नहीं सौंपेंगे जिस पर
अल्पसंख्यकों की स्वीकृति की मुहर न लगी हो। यह जिन्ना की उस मांग को स्वीकार करना
था जिसमें उसने कहा था कि लीग ही केवल भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रवक्ता है। और अब वायसराय ने यह कह ही दिया था कि युद्ध के बाद सभी दलों के सहयोग से संवैधानिक समस्याओं का हल
ढूंढा जाएगा और अल्पसंख्यकों (लीग) की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी संवैधानिक
परिवर्तन को लागू नहीं करेगी। जिन्ना और मुस्लिम लीग मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन से ही पाकिस्तान की अपनी मांग पर अड़ी
रही।
जिन्ना ने अंत तक पाकिस्तान की सीमाएं
नहीं निर्धारित की और न इस संबंध में अपनी ओर से कोई प्रस्ताव रखा। पाकिस्तान
भारतीय मुसलमानों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता की पूर्ति का साधन था। मुस्लिम लीग एक
उभरते हुए राष्ट्रवाद की संस्था का रूप ले रही थी। इसकी केन्द्रीय शक्ति
सत्ता-लोलुप थी और उसके व्यावसायिक हित स्पष्ट थे। दूसरे महायुद्ध के छिड़ जाने से
युद्धजन्य परिस्थितियों ने बंटवारे की विचारधारा के प्रसार-प्रचार में और सहायता
पहुंचाई। कांग्रेसी मंत्रिमंडल के इस्तीफ़े ने मुस्लिम लीग को राजनैतिक मंच हथियाने
का अवसर दे दिया। पाकिस्तान की मांग से ब्रिटिश सरकार को अचंभा हुआ। लेकिन यह उनके
हित में ही था। वह एक बार फिर से वह दुनिया को यह दिखा सकती थी कि भारत की वैधानिक
प्रगति अंग्रेज़ों से नहीं भारतीयों के आपसी मतभेदों की ही वजह से रुकी हुई है।
इसलिए ब्रिटिश सरकार का प्रोत्साहन जिन्ना और उसके पाकिस्तान की मांग को मिलता
रहा।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर
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