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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

फ़ुरसत में … जंतर मंतर से ..!

फ़ुरसत में … जंतर-मंतर से जन-मन तक ..!

फ़ुरसत में …

जंतर-मंतर से जन-मन तक

मित्रों इस बार फ़ुरसत में जितेन्द्र त्रिवेदी को आपके सामने पेश करता हूं। हमारे संगठन के ही हैं। रंगमंच से जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। आज उन्हें आपके सामने उनके इस आलेख के माध्यम से पेश करने में मुझे आंतरिक ख़ुशी हो रही है।  …. मनोज कुमार

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जितेन्द्र त्रिवेदी

image''समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।''

- रामधारी सिंह दिनकर

राष्ट्रपिता बनने से पहले महात्मा गांधी अक्सर कहा करते थे कि 'कहने की अपेक्षा करके दिखाना करोड़ गुना अच्छा है। मेरे मरने के बाद तुम लोग, मैंने जो कुछ भी कहा है, जो कुछ लिखा है, उसे बर्बाद कर देना और जला देना। क्योंकि टिकेगा वह नहीं जो मैंने कहा है और लिखा है, बल्कि टिकने वाली चीज तो वह होगी जो कुछ थोड़ा बहुत मैंने किया है।'

उपरोक्त कथन के तारतम्य में अण्णा हज़ारे का पांच दिनों का उपवास एवं आमरण अनशन कई सरोकारों को पैदा करता है। यह एक ऐसे आदमी की चिंता को उजागर करता है जो अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि, सुख-दु:ख, जीत-हार की परिधि से बाहर आकर समाज में फैले घटाटोप अंधेरे से बाहर निकलने के लिये किसी माकूल रास्ते को टटोलने और तलाशने की शुरुआत करता है।

आज के भारत में प्रत्येक आदमी, जो सोते-जागते यह जानता है कि भ्रष्टाचार के मगरमच्छ ने राष्ट्ररूपी जहाज को छतविक्षत कर दिया है और उसके मस्तूल और पतवार दोनों को यह मगरमच्छ निगल चुका है, सारे देश के लोग निरुपाय होकर मात्र दर्शक बने रहना ही अपनी नियति समझ बैठे थे साथ ही यह मानने लग गये थे कि वे महाभारत के निर्वीर्य धृतराष्ट्र की तरह घटनाओं के द्रष्टा भर हैं। जो कुछ होना है वह होकर रहेगा इसलिये केवल देखते जाने और सब कुछ सहते जाने में ही उनकी भलाई है। नाहक अपना खून जलाने से क्या फायदा?

इस तरह आम भारतीय की यह आदत बन गई कि ''होहहिं सोइ जो राम रचि राखा'' और इस मनोवृति को उसने विवश होकर अपना जीवन दर्शन मान लिया। इस प्रकार भारतीय समाज अपने कम्फर्ट जोन में खुश था। वह एक आरामदायक जिन्दगी जी रहा था जिसमें खाने-कमाने के अलावा शाम को बीवी-बच्चों के साथ टी.वी देखना और चैन से सोना उसकी सामान्य दिनचर्या बन चुकी थी। क्रिकेट के विश्वकप के उन्माद में सारा भारत मस्त था और आगे आने वाले आई.पी.एल. की चियर गर्ल्स के ठुमकों की आस लगाये बैठा था। किन्तु उसी समय न जाने कहाँ से एक पागल आदमी, जो पिछले 35 वर्षो से सामान्य भारतीय के कम्फर्ट जोन की मानसिकता को ठुकरा कर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर और स्वामी विवेकानन्द की एक छोटी सी किताब - ''नवयुवकों के नाम मेरा संदेश'' से अनुप्राणित होकर 1975 में सेना की नौकरी छोड़कर समाज की सेवा करने की भावना से उठ खड़ा हुआ। इस धुन में उसने विवाह भी नहीं किया और जन्म से मिले सगे सम्बन्धियों, नाते-रिश्तों की परवाह किये बिना सबसे दूर रहकर रचनात्मक कार्यों में संलग्न था।

यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे आज की शब्दावली में सनकी या झक्की कहा जाता है लेकिन वह अपनी ही मस्ती में जीता है। किन्तु वास्तव में ऐसे आदमी का ही जीना सार्थक है। सोना, जागना, खाना और फिर सो जाना, यह तो पशु भी करता है और इसी तरह एक दिन मर कर संसार से चले जाना मानव की भी नियति है। किन्तु जिस व्यक्ति की चर्चा यहाँ की जा रही है वह एक ऐसा व्यक्ति है जो जहाँ पैदा हुआ था, सार्वजनिक जीवन में तल्लीन रहने की वजह से उस स्थान पर पिछले 35 वर्षों से नही जा पाया। अपने भाई-भतीजों एवं बच्चों के नाम तक आज भी उसे नहीं मालूम। उसके द्वारा ऐसा उदाहरण समकालीन भारत में ऐसे समय प्रस्तुत किया गया है जब भारत के सत्तासीन व्यक्तियों द्वारा अपने परिवारों के सदस्यों के नाम पर सत्ता, पद और संस्थायें स्थापित की जा रही हैं।

दिनांक 05 अप्रैल से 09 अप्रैल-2011 तक भारत के लोगों में यह भावना फिर से उद्भूत हुयी है कि बड़ी बात दु:ख को देखने की नहीं है और ना ही उसके लिए शोर मचाने की है, अपितु बड़ी बात है दु:ख को दूर करने की प्राण-प्रण से कोशिश करने की, जो अण्णा हज़ारे ने हमें बखूबी समझा दी है। समकालीन भारत अण्णा हज़ारे का शुक्रगुजार रहेगा कि उन्होंने अलसाये भारत के लोगों को झिझोड़कर उठा दिया और एक मुहिम जगा दी। अब यह हम सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे न केवल नींद से जागें, अपितु चौकन्ने होकर ऐसे तत्वों की पहचान करने लगें जो इस मुहिम को कमजोर कर देना चाहते हैं। ऐसे समय में अत्यधिक सर्तक रहने की आवश्यकता है। कुछ राजनैतिक दल इस लड़ाई को मोड़कर छोटे मुद्दों तक ही सीमित रखना चाहेंगे और ऐसा करने में उनका उद्देश्य मूल विषय से जन मानस को भटकाना है। यह बात हम सभी को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये।

कुछ राजनेता अण्णा हजारे के बयान का जानबूझकर दुष्प्रचार कर रहे हैं ताकि वे अपने भ्रष्ट आचरण की कलई को छुपा सकें और इस आंदोलन को तितर-बितर कर सकें। अण्णा हजारे द्वारा किसी व्यक्ति की तारीफ करने से उनके पेट में दर्द होना उनकी मंशा को जाहिर करता है। यदि कोई व्यक्ति अतीत में कोई गलती कर चुका है और आज उन गलतियों को सुधार कर बड़े उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु प्रयासरत है तो इसमें उसके पीछे के अतीत में झाँकना वैसा ही होगा जैसा की पुराने घावों को कुरेदना। घावों को भरने के लिये उसे कुछ दिनों के लिये छोड़ दिया जाता है और वक्त उसे स्वत: भर देता है। यही समझ हम लोगों को इस समय भी रखनी चाहिये। इन पाँच दिनों के भीतर जो सरोकार जन्म लेने लगे हैं उनसे कई लोग घबरा से गये हैं। वे पुन: ब्रिटिश सरकार की पुरानी 'फूट डालो - राज करो' वाली नीति अपनाकर उसे अपने क्षुद्र लाभों के लिए इस्तेमाल करने में जुट गये हैं। उन्हें ऐसा लगता है जैसे कि भ्रष्टाचार खत्म करने की बात करना कोई जघन्य पाप है। क्योंकि उन्हें बचपन से यही संस्कार मिले हैं कि भ्रष्टाचार उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे वे प्राप्त करके ही रहेंगे।

सत्ता में बैठे लोग यह कभी नहीं चाहेंगे कि कोई आम व्यक्ति उनकी बगल में बैठकर कानून बनाने में भागीदारी निभाए। इसलिये वे कहने लगे हैं कि ''जन लोकपाल बिल'' से कुछ नहीं होगा। उनका यह कहना वैसा ही है जैसे कोई अंधा कहे कि सूरज होने से कोई फायदा नही है। अंधा व्यक्ति अपनी जगह ठीक है क्योंकि जिसे लगातार अंधेरे में रहने की आदत पड़ गई है और जिन्हें ऐसे पुश्तैनी संस्कार दिए गए हों कि बेटा बड़े होकर खूब ऊँचे पद हासिल करना और इस देश का जितना हो सके, धन लूटकर अपनी खानदानी तिजोरी भरते जाना और यदि यह तिजोरी छोटी पड़ जाए तो विदेशी बैंकों का पता मेरी डायरी से देख लेना, उनके लिये सूरज की रोशनी से कोई फायदा नहीं, किन्तु उन लोगों के लिये सूरज की रोशनी बड़ी फायदेमंद है, जो अपने कमरे में जबरदस्ती बंद कर दिये गये थे और सूरज की रोशनी से वंचित थे। ऐसे लोगों के लिये सूरज की रोशनी की एक किरण भी पुनर्जन्म के बराबर है। पंक्ति के आखिर में खडे़ व्यक्ति को बड़ी बेसब्री से उसका इन्तजार है जब वह सूचना के अधिकार की तरह इस देश के हुक्मरानों से जन लोकपाल के द्वारा सवाल-जवाब करना चाहेगा। ऐसे लोगों को मैं महात्मा गांधी के शब्दों में यह संदेश देना चाहता हूँ जो महात्मा गांधी ने 1908 में 'हिन्द स्वराज पुस्तिका' के माध्यम से ब्रिटिश शासन को दिया था -

“उनसे मैं विनय से कहूँगा कि आप हमारे राजा ज़रूर हैं। आप अपनी तलवार से हमारे राजा हैं या हमारी इच्छा से, इस सवाल की चर्चा मुझे करने की ज़रूरत नहीं। आप हमारे देश में रहें इसका भी मुझे द्वेष नहीं है। लेकिन राजा होते हुये भी आपको हमारा नौकर बनकर रहना होगा। आपका कहा हमें नहीं बल्कि हमारा कहा आपको करना होगा। आज तक आप इस देश से जो धन ले गये, वह भले आपने हजम कर लिया, लेकिन अब आगे आपका ऐसा करना हमें पसन्द नहीं होगा। पहले हम दब गये थे इसलिये बोल नहीं सके, लेकिन आप ऐसा न समझें कि आपके इस बर्ताव से हमारी भावनाओं को चोट नहीं पहुंची है। हम स्वार्थ या दूसरे भय से आज तक नहीं कह सके, लेकिन अब यह कहना हमारा फ़र्ज हो गया है। आपसे यह सब हम बेअदबी से नहीं कह रहे हैं। आपके पास हथियार-बल है। उसके खिलाफ़ वैसी ताकत से हम नहीं लड़ सकते। लेकिन आपको अगर ऊपर कही गयी बात मंजूर न हो तो आपसे हमारी नहीं बनेगी। आपकी मर्जी में आए तो और मुमकिन हो तो आप हमें तलवार से काट सकते हैं। मर्जी में आये तो हमें तोप से उड़ा भी सकते हैं। हमें जो पसन्द नहीं है, वह अगर आप करेंगे, तो हम आपकी मदद नहीं करेंगे बगैर हमारी मदद के आप एक क़दम भी नहीं चल सकेंगे ...........................। सम्भव है कि आप सत्ता के मद में हमारी बात को हंसी में उड़ा दें। आपका हंसना बेकार है। ऐसा आज शायद हम नहीं दिखा सकें, लेकिन हममें कुछ दम होगा, तो आप देखेंगे कि आपका हँसना विनाश काले विपरीत बुद्धि की निशानी है। मांगने से कुछ नहीं मिलेगा, वह तो हमें ख़ुद ही लेना होगा। हम निडर होकर जो मन में है, वही कहेंगे और इस तरह कहने का जो नतीजा आये उसे सहेंगे, तभी हम अपने कहने का असर दूसरों पर डाल सकेंगे ................। मेरा मन गवाही देता है कि ऐसा स्वराज पाने के लिये मेरा यह शरीर समर्पित है.''

उपरोक्त कथन को अण्णा हज़ारे के बयान, जिसमें उन्होंने कहा था, ''मंत्री कोई खुदा नहीं है, बल्कि जनता का नौकर है ........। इस देश में हमसे यही गलती हो गयी कि नौकर को मालिक मान लिया गया। पर अब यह ट्रेनिंग देना है कि देश की असली मालिक इस देश की जनता है और नेता उसका नौकर है, सेवक है'' के साथ मिला कर पढेंगे तो अण्णा हज़ारे का बयान कहीं अधिक कोमल लगेगा। अनुपम खेर का बयान तो नितांत जमीनी सच्चाई से जुड़ा है तथा कहीं से भी संविधान विरोधी या विवादास्पद नहीं है। यदि उनका यह बयान निष्पक्ष कहा जाये तो राष्ट्रहित में दिया गया बयान है। यदि गुलाम भारत में बापू अंग्रेजों के विरुद्ध ऐसा बयान जारी करने की हिमाकत कर सकते थे तो आज़ाद भारत में क्या कोई भारतीय अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए इतना मोहताज हो जायेगा कि उसके बयान देने के बाद छिछली राजनीति के द्वारा उसका जीना ही दूभर हो जाय। विक्टर ह्युगो ने कहा था – ''हो सकता है कि आपकी बात से मैं सहमत नहीं होऊँ, किन्तु आपके कहने के अधिकार की रक्षा के लिये सदैव लड़ता रहूँगा।'' क्या भारतीय संविधान की दुहाई देकर इस देश की जनता की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को विशेषाधिकार हनन के कानूनी पचड़ों में फंसा कर उसका गला घोटना वाज़िब है? कोई भी संविधान किसी भी देश के जन-गण के लिये होता है, न कि जन-गण उसके विशेषाधिकार हनन के कानूनों द्वारा कुचलने के लिए, दबाने के लिए या सताने के लिए।

यदि आजाद भारत में इस तरह के विचार व्यक्त करना गुनाह है तो ब्रिटिश काल में गुलाम देश में गाँधीजी के द्वारा 103 वर्ष पहले हिन्द स्वराज पुस्तिका में कठोर शब्दों में अग्रेजों को ललकारने वाले बयान पर गाँधीजी को मौत की सजा हो जानी चाहिए थी। महात्मा गॉधी की ललकार के सामने तो आज के भारतीयों के जंतर-मंतर के सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से किए जाने वाले आंदोलन और बयानों की कद्र करते हुए इस देश के नेताओं को अण्णा हज़ारे के सामने नतमस्तक होना चाहिए।

हम सबको इस समय इसलिए भी एकजुट और सावधान रहना है क्योंकि राजनैतिक नेता अपना उल्लू सीधा करने के लिए जंतर-मंतर के सत्याग्रहियों के बीच विभेद पैदा करना चाहेंगे और उस भेद की आँधी को बढ़ाकर आम आदमी को भी गुमराह करने की पुरजोर कोशिश करेंगे। जो घृणा किसी कारण से अतीत में पैदा हुई थी, उसे पाटने के बजाय बढ़ाने में उन्हें मजा आता है। ये तथाकथित निर्वाचित नेतागण स्वयं को जन प्रतिनिधि कहते हैं । ये नेतागण, जो अपने-अपने क्षेत्रों से निर्वाचित होकर आते हैं, वास्तव में श्रेत्र की कितने प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, यह जानकर आपको हंसी ही आएगी, लेकिन उन्हें इसी पर गर्व है। आँकड़े बताते हैं कि देश में औसतन मतदान 50-55 प्रतिशत के आसपास ही होता है। उसमें भी जीतने वाला प्रत्याशी पड़े मत का अधिकतम 20-25 प्रतिशत मत प्राप्त करके विजयी हो जाता है। अर्थात विजयी प्रत्याशी क्षेत्र के कुल मतों का मात्र 10-15 प्रतिशत मत ही पाता है और दावा इस प्रकार करता है जैसे उसकी आवाज सम्पूर्ण अवाम की आवाज हो। ये मत भी कितनी जागरूकता से पड़ते हैं यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो क्या है कि तथाकथित रूप से केवल छठवें हिस्से की नुमाइंदगी करने वाले लोग वह विधान तय करते हैं जो देश की समग्र जनता पर अधिरोपित होता है। इस तथ्य को हम सबको समझना चाहिए कि आज भी कुछ लोग बाबरी मस्जिद विध्वंस दिवस और राम मंदिर निर्माण दिवस मनाकर भर चुके घावों को फिर से ताजा करके घृणा फैलाना चाहते हैं। उसी तरह अण्णा हज़ारे या किसी अन्य व्यक्ति के बयान को तोड-मरोड़कर प्रस्तुत करके ये लोग जनता को भटकाना चाहते हैं और ये तत्व घृणा को बढा़ने वाले उपरि वर्णित तत्वों के समान ही घातक हैं।

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