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शनिवार, 26 जून 2010

गंगावतरण भाग-चार

--- --- मनोज कुमार

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गंगावतरण भाग –१

गंगावतरण भाग –२

गंगावतरण भाग –३

अब आगे … समापन किस्त

भगीरथ घर छोड़कर हिमालय के क्षेत्र में आए। इन्‍द्र की स्‍तुति की। इन्‍द्र को अपना उद्देश्‍य बताया। इन्‍द्र ने गंगा के अवतरण में अपनी असमर्थता प्रकट की। साथ ही उन्‍होंने सुझाया कि देवाधिदेव की स्‍तुति की जाए। भागीरथ ने देवाधिदेव को स्‍तुति से प्रसन्‍न किया। देवाधिदेव ने उन्‍हें सृष्टिकर्ता की आराधना का सुझाव दिया। क्योंकि गंगा तो उनके ही कमंडल में थी।

दिलीप के पुत्र भागीरथ ने गोकर्ण नामक तीर्थ में जाकर ब्रह्मा की कठिन तपस्या की। तपस्या करते करते कितने ही वर्ष बीत गये। ब्रह्माजी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी को पृथ्वी पर लेजाने का वरदान दिया।

प्रजापति ने विष्‍णु आराधना का सुझाव दिया। विष्‍णु को भी अपनी कठिन तपस्‍या से भागीरथ ने प्रसन्‍न किया। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों ही भगीरथ के प्रयत्‍न से संतुष्‍ट हुए। और अंत में भगीरथ ने गंगा को भी संतुष्‍ट कर मृत्‍युलोक में अवतरण की सम्‍मति मांग ली।

विष्‍णु ने अपना शंख भगीरथ को दिया और कहा कि शंखध्‍वनि ही गंगा को पथ निर्देश करेगी। गंगा शंखध्‍वनि का अनुसरण करेगी। इस प्रकार शंख लेकर आगे-आगे भगीरथ चले और उनके पीछे-पीछे पतितपावनी, त्रिपथगामिनी, शुद्ध सलिल गंगा।

ब्रह्म लोक से अवतरण के समय, गंगा सुमेरू पर्वत के बीच आवद्ध हो गयी। इस समय इन्‍द्र ने अपना हाथी ऐरावत भगीरथ को दिया। गजराज ऐरावत ने सुमेरू पर्वत को चार भागों में विभक्‍त कर दिया। जिसमें गंगा की चार धाराएं प्रवाहित हुई। ये चारों धाराएं वसु, भद्रा, श्‍वेता और मन्‍दाकिनी के नाम से जानी जाती है। वसु नाम की गंगा पूर्व सागर, भद्रा नाम की गंगा उत्तर सागर, श्‍वेता नाम की गंगा पश्चिम सागर और मंदाकिनी नाम की गंगा अलकनन्दा के नाम से मृत्‍युलोक में जानी जाती है।

DecentoftheGangaसुमेरू पर्वत से निकल कर गंगा कैलाश पर्वत होती हुई प्रबल वेग से पृथ्वी पर अवतरित होने लगी। वेग इतना तेज था कि वह सब कुछ बहा ले जाती। अब समस्या यह थी कि गंगाजी के वेग को पृथ्वी पर कौन संभालेगा? ब्रह्माजी ने बताया कि भूलोक में भगवान शंकर के अलावा और किसी में इस वेग को संभालने की शक्ति नही है। इसलिये गंगा का वेग संभालने के लिये भगवान शंकर से अनुग्रह किया जाये। महाराज भागीरथ ने एक अंगूठे पर खडे होकर भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकरजी अपनी जटाओं में गंगाजी को संभालने के लिये तैयार हो गये। गंगा के प्रबल वेग को रोकने के लिए महादेव ने अपनी जटा में गंगा को धारण किया। इस प्रकार गंगा अपने अहंभाव के चलते बारह वर्षों तक शंकर की जटा में जकड़ी रही।

DSCN0464भगीरथ ने अपनी साधना के बल पर शिव को प्रसन्‍न कर कर गंगा को मुक्‍त कराया। भगवान शंकर पृथ्वी पर गंगा की धारा को अपनी जटा को चीर कर बिन्‍ध सरोवर में उतारा। यहां सप्‍त ऋषियों ने शंखध्‍वनि की। उनके शंखनाद से गंगा सात भागों में विभक्‍त हो गई। मूलधारा भगीरथ के साथ चली। महाराज भागीरथ के द्वारा गंगाजी हिमालय की घाटियों से कल कल का विनोद स्वर करतीं हुई मैदान की तरफ़ बढीं। आगे आगे भागीरथ जी और पीछे पीछे गंगाजी। यह स्‍थान हरिद्वार के नाम से जाना जाता है।

IMG_5924हरिद्वार के बाद गंगा की मूलधारा भगीरथ का अनुसरण करते हुए त्रिवेणी, प्रयागराज, वाराणसी होते हुए जह्नु मुनि के आश्रम पहुँची। भगीरथ की बाधाओं का यहां भी अंत न था। संध्‍या के समय भगीरथ ने वहीं विश्राम करने की सोची। परन्‍तु भगीरथ को अभी और परीक्षा देनी थी। संध्‍या की आरती के समय जह्नु मुनि के आश्रम में शंखध्‍वनि हुई। शंखध्‍वनि का अनुसरण कर गंगा जह्नु मुनि का आश्रम बहा ले गई। ऋषि क्रोधित हुए। उन्‍होंने अपने चुल्‍लु में ही भर कर गंगा का पान कर लिया। भगीरथ अश्‍चर्य चकित होकर रह गए। उन्‍होंने ऋषि की प्रार्थना शुरू कर दी। प्रार्थना के फलस्‍वरूप गंगा मुनि के कर्ण-विवरों से अवतरित हुई। गंगा यहां जाह्नवी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

 

यह सब देख, कोतुहलवश जह्नुमुनि की कन्‍या पद्मा ने भी शंखध्‍वनि की। पद्मा वारिधारा में परिणत हो गंगा के साथ चली। मुर्शिदाबाद में घुमियान के पास भगीरथ दक्षिण मुखी हुई। गंगा की धारा पद्मा का संग छोड़ शंखध्‍वनि से दक्षिण मुखी हुई। पद्मा पूर्व की ओर बहते हुए वर्तमान बांग्लादेश को गई। दक्षिण गामिनी गंगा भगीरथ के साथ महामुनि कपिल के आश्रम तक पहुँची। ऋषि ने वारि को अपने मस्‍तक से लगाया और कहा, हे माता पतित28032010104पावनी कलि कलुष नाशिनी गंगे पतितों के उद्धार के लिए ही आपका पृथ्‍वी पर अवतरण हुआ है। अपने कर्मदोष के कारण ही सगर के साठ हजार पुत्र क्रोधग्नि के शिकार हुए। आप अपने पारसरूपी पवित्र जल से उन्‍हें मुक्ति प्रदान करें। मां वारिधारा आगे बढ़ी। भस्‍म प्‍लावित हुआ। सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार हुआ। भगीरथ का कर्मयज्ञ सम्‍पूर्ण हुआ। वारिधारा सागर में समाहित हुई। गंगा और सागर का यह पुण्‍य मिलन गंगासागर के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ।28032010110

कबीर जयन्‍ती … पर

कबीर जयन्‍ती … पर

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--- --- मनोज कुमार

हमारे देश के हिन्दू समाज में प्राचीन काल से ही वेदों पर आधारित परंपरा मान्य रही है। मध्यकाल तक आते-आते वर्णाश्रम व्यवस्था जटिल हो चुकी थी। जातियों में विभाजित समाज में हर तरह का भेद-भाव विद्यमान था। मनुष्यता स्त्री-पुरुष, ऊंच-नीच एवं अनेक धर्मों में बंटी हुई थी। छुआछूत के कठोर नियम थे। ईश्‍वर की उपासना एवं मोक्ष प्राप्ति में भी भेद-भाव था। वैदिक कर्मकांड तथा ॠढिवादिता से स्थिति बड़ी जटिल थी। समय-समय पर इस व्यवस्था के प्रति प्रतिक्रियाएँ जन्म लेती रहीं। ये प्रतिक्रियाएँ रूढिवादी समाज में परिवर्तन के लिए अल्प प्रयास ही साबित हुईं। किन्तु चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी में आस्था एवं भक्ति के मध्य से व्यापक आंदोलन की एक ऐसी बलवती धारा फूटी जिसने वर्ण-व्यवस्था पर आधारित समाज, कट्टरता एवं रूढिवादिता पर आधारित धर्मांधता को चुनौती दी।

समय-समय पर संत, विचारक और सुधारक भक्ति-मार्गी विचारधारा के द्वारा सुधारों का प्रयास करते रहे और यह एक आंदोलन का रूप लेता गया। इस आंदोलन से संतों का एक नया वर्ग आगे आया। जातिप्रथा, अस्पृश्यता और धार्मिक कर्मकांड का विरोध कर सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं में सुधार इनका लक्ष्य था। इस आंदोलन के संतों ने अनेक जातियों एवं सम्प्रदायों में विभक्त समाज, अनेक कुसंस्कारों से पीड़ित देश, सैंकड़ों देवताओं और आडंबरों एवं कट्टरता में उलझे धर्म, के भेद-भाव की दीवार को ढहाने का एक सार्थक प्रयास किया। संतों ने समाज में लोगों के बीच वर्तमान आपसी वैमनस्य को मिटाने और सामाजिक वर्ग विभेद को समाप्त कर सबको समान स्तर पर लाने का प्रयास किया।

इन्हीं संतों में से एक थे संत कबीर। महात्मा कबीर के जन्म के विषय में भिन्न- भिन्न मत हैं। "कबीर- चरित्र- बाँध'' में कहा गया हौ कि संवत् चौदह सौ पचपन (१४५५) विक्रमी ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवार के दिन, निर्गुणपंथी संत कबीर का जन्म हुआ। वे भक्त संत ही नहीं समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अंधविश्‍वास, कुरीतियों और रूढिवादिता का विरोध किया। विषमताग्रस्त समाज में जागृति पैदा कर लोगों को भक्ति का नया मार्ग दिखाना इनका उद्देश्य था। जिसमें वे काफ़ी हद तक सफल भी हुए। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयास किए। उन्होंने राम-रहीम के एकत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने दोनों दर्मों की कट्टरता पर समान रूप से फटकार लगाई।

पाहन पुजे तो हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।।

वे मूर्ति पूजा और कर्मकांड का विरोध करते थे। वे भेद-भाव रहित समाज की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने ब्रह्म के निराकार रूप में विश्‍वास प्रकट किया। एकेश्‍वरवाद के समर्थक कबीर का मानना था कि ईश्‍वर एक है। उन्होंने व्यंग्यात्मक दोहों और सीधे-सादे शब्दों में अपने विचार को व्यक्त किया। फलतः बड़ी संख्या में सभी धर्म एवं जाति के लोग उनके अनुयायी हुए। कबीर दास जी के अनुयाई कबीरपंथी कहलाए। उनके उपदेशों का संकलन बीजक में है।

संत कबीर का मानना था कि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। सिर्फ़ उनके कर्मकांड अलग-अलग होते हैं। पुजारी वर्ग कर्मकांड पर अधिक ज़ोर देकर भेद पैदा करते हैं।

माला फेरत जुग गया, मिटा न मनका फेर।

कर का मनका डारि कै, मन का मनका फेर।।

उनका यह भी मानना था कि जाति प्रथा उचित नहीं है और इसे समाप्त कर देना चाहिए। वे एक आलोचक थे। उनका मानना था कि समाज की रूढिवादिता एवं कट्टर्वादिता की निन्दा करके ही इसे समाप्त किया जा सकता है। कबीर को अपने समाज में जो मान्‍यतजा मिली वह प्रमाण है कि वे अपने परिवेश की ही उपज थे। वह समय भारतीय इतिहास में आधुनिकता के उदय का समय था। इस आधुनिकता का बीज यहां की परंपरा से ही अंकुरित हुआ था। वर्णव्यवस्‍था की परंपरा से जकड़ा समाज जाति-पाति से मुक्ति की आवाज उठा रहा था। सामाजिक अन्‍याय के प्रति रोष इस संत की रचनाओं में व्‍याप्‍त है। कबीर मूलतः कवि हैं। उनकी काव्‍य संवेदना में प्रेम, मृत्‍यु और समाज एक दूसरे में गुंथे हुए हैं। कबीर हिंदी के महान कवियों में से हैं।

संत कबीर दास महान चिन्‍तक, विचारक और युग द्रष्‍टा थे। वे ऐसे समय में संसार में आए जब देश में नफरत और हिंसा चारों तरफ फैले हुए थे। हिंदु-मुसलमानों, शासक-प्रजा, अमीर गरीब के देश-समाज बंटा हुआ था, गरीबी और शोषण से लोग त्रस्‍त थे। ऐसे समय में संत कबीर ने धर्म की नयी व्‍याख्‍या प्रस्‍तुत की। उन्‍होंने कहा कि अत्‍याचारियों से समझौता करना और जुल्‍म सहना गलत है। उन्‍होंने समाज में उपस्थित भेदभाव समाप्‍त करने पर बल दिया। दोनों समुदाय को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। उन्‍होंने कहा था,

वही महादेव वही मुहम्‍मद ब्रह्मा आदम कहिए।

कोई हिंदू कोई तुर्क कहावं एक जमीं पर रहिए।

कबीर की सामाजिक चेतना उनकी आध्‍यात्मिक खोज की परिणति है। उनकी रचनाओं का गहन अध्‍ययन करें तो हम पाते हैं कि वे धर्मेतर अध्‍यात्‍म का सपना देखने वाले थे। ऐसा अध्‍यात्‍म जो मनुष्‍य सत्ता को ब्रह्मांड सत्ता से जोड़ता है। उन्‍होंने धर्म की आलोचना की। वे जब हिंदू या मुसलमान की आलोचना करते हैं तो उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कोई नया धर्म प्रवर्तन करना चाहते थे।

धर्म के नाम पर व्‍याप्‍त आडम्‍बर का वे सदा विरोध करते रहे। धार्मिक कुरीतियों को उनहोनें जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रण लिया। साधक के साथ-साथ वे विचारक भी थे। उनका मानना था कि इस जग में कोई छोटा और बड़ा नहीं है। सब समान हैं। ये सामाजिक आर्थिक राजनीतिक परिस्थिति की देन है। हम सब एक ही ईश्‍वर की संतान है।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

आज भी इस संसार में हिंसा, आतंक, जातिवाद आदि के कारण निर्दोष लोगों पर अत्‍याचार हो रहे हैं। ऐसी भयावह परिस्थिति में कबीर ऐसे युगप्रवर्तक की आवश्‍यकता है जो समाज को सही राह दिखाए। कबीर तो सच्‍चे अर्थों में मानवतावादी थे। उन्‍होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच मानवता का सेतु बांधा। पर आज वह सेतु भग्नावस्‍था में है। इसके पुनः निर्माण की आवश्‍यकता है। कबीर के विचार समाज को नई दिशा दिखा सकता है।

शनिवार, 12 जून 2010

गंगावतरण भाग-३

गंगावतरण भाग-३

                – मनोज कुमार

गंगावतरण भाग-१

गंगावतरण भाग-२

राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को यज्ञ के घोड़े की खोज कर लाने का आदेश दिया। ये पुत्र यज्ञ के घोड़े की खोज में निकल पड़े। उन्‍होंने पूरी पृथ्वी छान मारी, किन्तु यज्ञ के घोड़ा का पता न लग सका। थक हार कर वे अयोध्‍या वापस लौट आए। उन्होंने राजा को पूरा वृतांत सुनाया। राजा सगर ने उन्‍हें पाताल लोक में खोजने का आदेश दिया। पुत्रों ने आज्ञा का पालन किया। पाताल लोक में खोजते-खोजते वे एक निविड़, शांत और पवित्र स्‍थल पर पहुंचे। उन्‍होंने देखा एक दिव्‍य साधु अपनी साधना में लीन है। उसी आश्रम में उन्हें यज्ञ का घोड़ा भी दिखा। उनके आश्‍चर्य का ठिकाना न रहा। सगर के पुत्रों को लगा कि इसी व्‍यक्ति ने घोड़े को चुरा कर यहां बांध रखा है। अब चोरी पकड़ी गई है तो युद्ध करने के भय से समाधि लगाने का ढोंग कर रहा है। सगर के पुत्रों को यह थोड़े ही पता था कि यह साधु साक्षात वासुदेव है। सगर के पुत्रों ने यह समझ कर कि घोड़े को महामुनि कपिल ही चुरा लाये हैं, कपिल मुनि को कटुवचन सुनाना आरम्भ कर दिया। राजा के पुत्रों ने कपिल मुनि को चोर चोर कहकर पुकारना शुरु कर दिया उन्‍होंने तरह-तरह के अत्‍याचार करना शुरू कर दिया। पर मुनि तो तपस्‍यारत थे। मुनि की तरफ से कोई उत्तर न पाकर वे क्रोधित हुए। सगर पुत्रों ने महामुनि की समाधि भंग कर दी। इससे महामुनि के क्रोध का पारावार न रहा। आग्‍नेय नेत्रों से उन्‍होंने सगर पुत्रों को देखा। अपने निरादर से कुपित हो चुके महामुनि की क्रोधाग्नि ने सगर के साठ हजार पुत्रों को जलाकर भस्‍म कर दिया!

45489इधर शोक में डूबे राजा सगर के व्‍याकुलता की सीमा न रही। न पुत्र लौटे, न ही यज्ञ का घोड़ा। उन्‍होंने असमंज के पुत्र अंशुमान को यज्ञ का घोड़ा और साठ हजार पुत्रों का पता लगाने को कहा। अंशुमान आज्ञा का पालन करने हेतु निकल पड़ा। अंशुमान ढूंढते-ढूंढते पाताललोक में महामुनि कपिल के आश्रम पहुंचा। वहां पर मुनि को साधनारत देख हाथ जोड खड़े रहे। जब महा‍मुनि का ध्‍यान टूटा तो अपना परिचय देकर अपने आने का कारण और उद्देश्‍य बताया। अंशुमान की विनयशीलता एवं मृदु व्यवहार ने महामुनि कपिल को प्रभावित किया। उन्‍होंने सारी घटना अंशुमान को बताया। यह सुनते ही अंशुमान का दिल बैठ गया। दुख, व्‍यथा और आंसू भरे नयनों से अंशुमान ने मुनि को प्रणाम किया और बोले कि मुने! कृपा करके हमारा अश्व लौटा दें और हमारे दादाओं के उद्धार का कोई उपाय बतायें।

ऋषि ने कहा भष्‍म में परिवर्तित हो चुके सगर के साठ हजार पुत्रों की आत्‍मा की मुक्ति के लिए त्रिलोक तारिणी, त्रिपथ गामिनी गंगा का पृथ्‍वी पर अवतरण जरूरी है। गंगा की पुण्‍य वारिधारा ही सगर के पुत्रों को मुक्ति दिला सकती है। तुम्हारे दादाओं का उद्धार केवल गंगा के जल से तर्पण करने पर ही हो सकता है।

राजा सगर की पत्‍नी सुमति या शैव्‍या गरूड़ की सगी बहन थी। पक्षिराज गरूड़ ने भी अपने भांजों के कल्‍याण के लिए पतितपावनी गंगा के अवतरण की बात ही कही। उन्होने अंशुमान को बताया कि अगर उनकी मुक्त चाहिये तो गंगाजी को पृथ्वी पर लाना पडेगा। इस समय यज्ञ के घोडे को ले जाकर पिता का यज्ञ पूरा करवाओ, इसके बाद गंगा को पृथ्वी पर लाने का कार्य करना।

यज्ञ के घोड़े को लेकर अंशुमान अयोध्‍या वापस आया। सारी बातों से उसने राजा सगर को अवगत कराया। राजा सगर ने अपने यज्ञ पूरा किया। यज्ञ पूर्ण होने पर राजा सगर अंशुमान को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये उत्तराखंड चले गये। इस प्रकार अपने जीवन का शेष समय उन्‍होंने गंगा के पृथ्‍वी पर अवतरण हेतु साधना में लगाया। पर सफल न हो सके।

राजा सगर के बाद उनके पौत्र अंशुमान सत्तासीन हुए। अंशुमान के पुत्र का नाम दिलीप था। दिलीप के बड़े होने पर अंशुमान भी दिलीप को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये चले गये किन्तु वे भी गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल न हो सके।

अंशुमान के बाद उनके पुत्र दिलीप भी अपनी सारी उर्जा गंगा को मृत्‍युलोक में अवतरण कराने के प्रयास में लगा दिया। पर सगर, अंशुमान और दिलीप के प्रयास गंगा को पृथ्‍वी पर लाने में सफलता नहीं दिला पाया।

राजा दिलीप निःसंतान थे। उनकी दो रानियां थी। वंश ही न खत्‍म हो जाए इस भय से दोनों रानियों ने ऋषि और्व के यहां शरण ले ली। ऋषि के आदेश से दोनों रानियों ने आपस में संयोग किया जिसके परिणामस्‍वरूप एक रानी गर्भवती हुई।

smalltiled_lizard_scalesप्रसव के बाद एक मांसपिण्‍ड का जन्म हुआ। इस मांसपिण्‍ड का कोई निश्चित आकार नहीं था। रानी ने ऋषि और्व को सारी बात बताई। ऋषि ने आदेश दिया कि मांसपिण्‍ड को राजपथ पर रख दिया जाए। ऐसा ही किया गया।

अष्टवक्र मुनि स्‍नान करके अपने आश्रम लौट रहे थे। राजपथ पर उन्‍होंने मांसपिण्‍ड को फड़कते देखा। उन्‍हें लगा कि यह मांसपिण्‍ड उन्‍हें चिढ़ा रहा है। उन्‍होंने शाप दिया, “यदि तुम्‍हारा आचारण, स्‍वाभाव सिद्ध हो, तो तुम सर्वांग सुन्‍दर होओ और यदि मेरा उपहास कर रहे हो तो मृत्‍यु को प्राप्त हो।”

ऋषि का वचन सुनते ही मांसपिण्‍ड सर्वांग सुन्‍दर युवक में बदल गया। वह युवक चूंकि दोनों रानियों के संयोग से जन्‍म लिया था इसलिए उसका नाम हुआ भागीरथ।

sunriseमाता ने भागीरथ के पूवर्जों की कथा सुनाई। भगीरथ चिंता में पड़ गए। किस तरह पूर्वजों का उद्वारा किया जाए? उनके सामने दुविधा थी, एक तरफ सांसरिक बंधन, तो दूसरी तरहफ पूर्वजों की मुक्ति का प्रश्‍न। उन्‍होंने पूर्वजों का उद्वारा को श्रेयस्‍कर समझा। इस हेतु प्राप्ति के लिए राज्य का भार मंत्रियों पर छोड़ वंश-उद्वार के लिए निकल पड़े।

शनिवार, 5 जून 2010

गंगावतरण :: भाग-२

गंगावतरण

::

भाग-२

मनोज कुमार

(गंगावतरण की कथा :: भाग-१)

श्रीमद भगवत में गंगावतरण की कथा है। प्राचीन काल की बात है। अयोध्‍या में इक्ष्‍वाकु वंश के राजा सगर राज करते थे। वे बड़े ही प्रतापी, दयालु, धर्मात्‍मा और प्रजा हितैषी थे।

सगर का शाब्दिक अर्थ है विष के साथ जल। हैहय वंश के कालजंघ ने सगर के पिता वाहु को एक संग्राम में पराजित कर दिया था। राज्‍य से हाथ धो चुके वाहु अग्नि और्व ऋषि के आश्रम चले गए।

इसी समय वाहु के किसी दुश्‍मन ने उनकी पत्‍नी को विष खिला दिया। जब उन्‍हें जहर दिया गया तो वो गर्भवती थी। ऋषि और्व को जब यह पता चला तो उन्‍होंने अपने प्रयास से वाहु की पत्‍नी को विषमुक्‍त कर जान बचा ली। इस प्रकार भ्रूण की रक्षा हुई और समय पर सगर का जन्‍म हुंआ। विष को गरल कहते हैं। चूकिं बालक का जन्म गरल के साथ हुआ था इस लिए वह स + गर = सगर कहलाया।

सगर के पिता वाहु का और्व ऋषि के आश्रम में ही निधन हुआ। सगर बड़े होकर काफी बलशाली और पराक्रमी हुए। उन्‍होंने अपने पिता का खोया हुआ राज्‍य वापस अपने बल और पराक्रम से जीता। इस प्रकार सगर ने हैहयों को जीत कर अपने पिता की हार का बदला लिया।

ऋषि अग्नि अर्व हैहयों के परंपरागत शत्रु थे। उन्‍होंने भी सगर को हैहयों के विरूद्ध संग्राम में हर प्रकार की सहायता प्रदान की। सगर की दो पत्‍नियां थी वैदर्भी और शैव्या। राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर भगवान शंकर की कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है। अतएव मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम्हारी एक रानी के साठ हजार पुत्र होंगे किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही सन्तान होगा।

वैदभी के गर्भ से मात्र एक पुत्र था उसका नाम था असमंज। वे बड़े दुष्‍ट और प्रजा को दुख पहुंचाने वाले थे। जबकि सगर अत्यंत ही धार्मिक सहिष्‍णु और उदार थे। सगर के लिए असमंज का व्‍यवहार बड़ा ही दुख देने वाला था। जब उसकी आदतें नहीं सुधरी तो सगर ने असमंज को त्‍याग दिया।

असमंज के औरस से अंशुमान का जन्‍म हुआ। वह बहुत ही पराक्रमी था। अंशुमान ने अश्‍वमेघ और राजसूय यज्ञ सम्‍पन्‍न कराया और राजर्षि की उपाधि प्राप्‍त की।

शैव्‍या के गर्भ से साठ हजार पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। सभी काफी वीर और पराक्रमी थे। उनके ही बल पर सगर ने मध्‍यभारत में एक विशाल साम्राज्‍य की स्‍थापना की।

सगर न सिर्फ बहुबली और पराक्रमी थे, बल्कि धार्मिक प्रकृति के व्‍यक्ति भी थे। वे ऋषियों महर्षियों का काफी आदर सत्‍कार और सम्‍मान किया करते थे। वशिष्‍ठ मुनि ने सगर को सलाह दी की अश्‍वमेघ यज्ञ का अनुष्‍ठान करें ताकि उनके साम्राज्‍य का विस्तार हो।

ऐसी मान्‍यता है कि प्राचीन काल में किए जाने वाले यज्ञानुष्‍ठानों में अश्‍वमेघ यज्ञ और राजसूय यज्ञ सर्वश्रेष्‍ठ थे। उन दिनों बड़े व प्रतापी और पराक्रमी सम्राट ही अश्‍वमेघ यज्ञ का आयोजन करते थे। इस यज्ञ में 99 यज्ञ सम्‍पन्‍न होने पर एक बहुत अच्‍छे गुणों वाले घोड़े पर जयपत्र बांध कर छोड़ दिया जाता था। उस पत्र पर लिखा होता था कि घोड़ा जिस जगह से गुजरेगा वह राज्‍य यज्ञ करने वाले राजा के अधीन माना जाएगा। जो राजा या जगह स्‍वामी अधीनता स्‍वीकार नहीं करते थे, वे उस घोड़े को रोक लेते थे और युद्ध करते थे।

घोड़े के साथ हजारों सैनिक साथ साथ चलते थे। एक वर्ष पूरा होने पर घोड़ा वापस लौट आता था। इसके बाद उसकी बलि देकर यज्ञ पूर्ण होता था। महाराजा सगर ने अपने यज्ञ के घोड़े श्यामकर्ण की सुरक्षा के लिए हजारो सैनिकों की व्‍यवस्‍था की थी। वीर बाहुबलि सैनिक घोडे़ के साथ निकले, और आगे बढ़ते रहे। सगर का प्रताप चतुर्दिक फैल रहा था। जगह जगह उनके बल-पराक्रम और शौर्य की चर्चा होने लगी।

इससे देवराज इन्‍द्र को शंका हुई। सगर के इस अश्वमेघ यज्ञ से भयभीत होकर इन्‍द्र यह सोचने लगे कि अगर यह अश्‍वमेघ यज्ञ सफल हो गया तो यज्ञ करने वाले को स्‍वर्गलोक का राजपाट मिल जाएगा। इन्‍द्र ने यज्ञ के घोड़े को अपने मायाजाल के बल पर चुरा लिया। इतना ही नहीं उन्‍होंने इस घोड़े को पाताललोक में तपस्‍यारत महामुनि कपिल के आश्रम में छिपा दिया। उस समय मुनि गहन साधना में लीन थे। फलतः उन्‍हें पता ही नहीं लगा कि क्‍या हो रहा है?

एक साल पूरा होने को जब आया तो घोड़ा न लौटा सगर चिन्‍तित हो उठे। राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को यज्ञ के घोड़े की खोज कर लाने का आदेश दिया। ये पुत्र यज्ञ के घोड़े की खोज में निकल पड़े।

रविवार, 30 मई 2010

गंगावतरण (भाग-१)

--- मनोज कुमार
सर्वत्र पावनी गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।
गंगा द्वारे, प्रयागे च गंगासागर संगमे॥

imageगंगासागर की यात्रा की चर्चा के क्रम में हमने आपका सागर द्वीप से परिचय कराया था। हमारे लिये गंगा मात्र एक नदी ही नहीं, हमारे देश की आत्मा है। हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। हम तो उसे अपने देश की अस्मिता के साथ जोड़कर देखते हैं। भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। ग्रंथों में गंगा का वर्णन अनेक रूपों में मिलता है। भगीरथनंदिनी, विष्णुपदसरोजजा और जाह्न्वी के रूप में गंगा नर-नागों, देवताओं और ऋषिओं मुनियों के लिए वंदनीय है। गंगा के उद्भव (विष्णुपद), वास (ब्रह्म कमण्डल), विकास (भगीरथ नंदिनी), प्रवाह(जाह्न्वी) एवं प्रभाव (कल्पथालिका) का वर्णन है।

गंगा नदी के महत्व को सभी स्वीकार करते हैं; क्योंकि गंगा किसी में कोई भेद नहीं करती है। सभी को एक सूत्र में पिरोती है और एक सूत्र में बाँधे रखने का संकल्प प्रदान करती है गंगा।

हम उसे मां कहते हैं – गंगा मैय्या! गंगा जीवन तत्त्व है, जीवन प्रदायिनी है, इसीलिए माँ है। तभी तो उसे पवित्रतम नदी की संज्ञा देते हैं। गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित् श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। आज उस नदी की जीवन्तता पर प्रदूषण से बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। हम उसके विनाश का कारण न बनें। कितनी मुश्किलों से हमारे पूर्वजों ने गंगा को पृथ्वी पर लाया।

imageगंगा का पृथ्वी पर अवतरण की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गंगा को लक्ष्मी और सरस्वती के साथ विष्णु की पत्नी मना गया है। ऐसा बताया गया है कि आपसी कलह और शत्रुता के कारण ये तीनों मृत्युलोक में नदी के रूप में चली आईं। ये तीन नदियां हैं – गंगा, पद्मा और सरस्वती।

एक अन्य कहानी के अनुसार गंगा के पृथ्वी पर अवतरण में नारद जी का हाथ है। कहा गया है कि महर्षि नारद को अपने संगीत के ज्ञान पर काफ़ी घमंड था। उनको लगता था कि उनके जैसा पहुंचा हुआ संगीतज्ञ कोई और नहीं है। घमंड में चूर वो संगीत का उलटा-पुलटा अभ्यास करते थे। न राग का ख़्याल था उन्हें न रागिनियों का। पूरा संगीत शास्त्र ही उन्होंने विकृत कर रखा था।

उनके इस व्यवहार से राग-रागिनियां अत्यंत दुखी हो गयीं। उन्होंने अपने विचार नारद मुनि को बताया। पर नारद तो घमंड में चूर थे। उन्हें लगता कि वे जो भी कर रहे हैं सब ठीक है। अपनी ग़लती वो पकड़ ही नहीं पा रहे थे। संगीत का समान्य ज्ञान था नारद के पास। पर उतने पर ही वे अहंकारी हो गये थे। अपने अल्प ज्ञान पर किसी को अहंकारी नहीं होना चाहिए। बल्कि उसे तो और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। संगीत साधना कोई छोटी-मोटी साधना नहीं है। इसे नादब्रह्म कहा गया है। संगीत साधना हो या अन्य कोई साधना – हमें सदैव अहंकार से दूर रहना चाहिए। सधना में जितनी विनम्रता होगी हम उतना ही अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। अहंकार से तो नाश ही होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं नारद, जिनके जैसे साधक को भी पतन का सामना करना पड़ा।

imageइधर राग-रागिनियां नारद के अहंकारी स्वभाव के चलते विकलांग होती गयी थीं। यह ख़बर देवताओं तक पहुंची। तब यह निश्चय हुआ कि यदि देवाधिदेव महादेव संगीताभ्यास करें तो राग-रागिनियां सामान्य हो सकेंगी। महादेव राज़ी हो गये। वो देवसभा में राग-रागिनियों के कल्याण हेतु गा रहे थे। पर उनके संगीत का स्तर काफ़ी शास्त्रीय था, उच्च था। उनके इस रस-गांभीर्य को समझने की क्षमता किसमें थी?! कुछ हद तक विष्णु की समझ में आ रहा था। पुराण में यह वर्णित है कि महादेव के गायन से जो संगीत-लहरी उठी उससे विष्णु भगवान के पैर का अंगुठा गल कर जल बन गया। और उस जल से पूरा देवलोक प्लावित हो गया। इस द्रव को ब्रह्मा जी ने अत्यंत सावधानी के साथ, अपने कमंडल में भरकर रख लिया। इसी जल को, जो ब्रह्मा के कमंडल में था, भगीरथ अपनी अथक तपस्या के बल पर पृथ्वी पर लाए ताकि सगर के पुत्रों का कल्याण हो सके। चूंकि यह जल विष्णु के पैर के विगलित होने से बना था, इसी कारण से गंगा का एक नाम विष्णुपदी भी है। विष्णुपदी गंगे सभी लोकों को पवित्र करने वाली, अघ ओघ की बेड़ियों को काटने वाली, पतितों का उद्धार करने वाली तथा दुःखों को विदीर्ण करने वाली है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

लोक आस्था का महापर्व छठ

--- मनोज कुमार
बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में महापर्व के नाम से प्रसिद्ध “छठ पर्व” श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि छठ से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। वैसे तो कहावत है कि लोग उगते सूर्य की पूजा करते हैं, किन्तु इस पर्व में अस्त एवं उदय होते हुए दोनों रूपों में भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना की जाती है। छठ का महापर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरु हो जाता है।
चतुर्थी को छठ पूजा करने वाले छठव्रती, नहाए-खाय करते हैं। फिर पंचमी को खरना, जिसमें शाम के समय छठव्रती इष्टदेव की पूजा कर भोग आदि लगाते हैं। षष्ठी को डूबते हुए सूर्य को तालाब, पोखर या नदी में खड़े होकर अर्घ्य देकर विशेष प्रकार के प्रसाद ठेकुआ, खजुर, फल, आदि जिसमें गन्ने, नारियल आदि का विशेष महत्व है, चढ़ाया जाता है। सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य, नैवेद्य से पूजा की जाती है जिसे स्थानीय भाषा में हाथ उठाना कहते हैं। हाथों में नैवेद्य, नयनो में प्रतीक्षा, "उगा हो सुरुज देव अरघ के'र बेर...." और मन में अनुनय "ले हो न अरघ हमार हे छट्ठी मैय्या...!" इस व्रत का समापन सप्तमी को होता है।
चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व के प्रति श्रद्धालुओं में श्रद्धा के साथ उमंग व्याप्त रहता है। इस पर्व की एक और विशेषता जो क़ाबिले तारीफ़ है, वह है साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना। कई जगह तो पूरा-का-पूरा शहर ही विशेष अभियान द्वारा साफ-सुथरा कर दिया जाता है। अन्यथा तालाब, पोखर या नदी के उन स्थलों की तो पूरी सफाई की ही जाती है जहां पर्व मनाने श्रद्धालु एकत्रित होते हैं।
छठ पर्व के अवसर पर मंगल गीत गाने का प्रचलन है। इन लोकगीतों की मिठास और संवेदना से इस पर्व की छटा और निखर जाती है। एक छठगीत आपके लिए प्रस्तुत
"केलबा के पात पर उगेलन सुरुजदेव झांके झुके ...


हे करेलू छठ बरतिया से झांके झुके... !


हम तोह से पूछीं बरतिया हे बरतिया से किनका लागी... ?


हम तोह से पूछीं बरतिया हे बरतिया से किनका लागी... ?


हे करेलू छठ बरतिया से किनका लागी .... ?


हमरो जे स्वामी तोहरे ऐसन स्वामी से हुनके लागी...


हे करेलू छठ बरतिया से हुनके लागी.... !!"


व्रती इस गीत में आगे बताती हैं कि वो छठ का महाव्रत अपने पति, पुत्र, घर एवं परिवार के लिए करती हैइस प्रकार यह मान्यता पुष्ट हो जाती है कि छठ महाव्रत के प्रसाद से धन, वैभव, संतान मान, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, जुए में सभ कुछ गंवा कर पांडव जब बनवास में थे, तभी दुर्योधन प्रेरित महर्षि दुर्वाषा पहुँच गए, पांडवों के पर्ण कुटीर। "अतिथिदेवो भवः !" परन्तु वनवासी याचक पांडव आतिथ्य धर्म का निर्वाह करें तो कैसे घर में अन्न का केवल के दाना और अठासी ब्रह्मन। धर्मसंकट। द्वार पर आये ब्रह्मन और असहाय पतियों को देख द्रौपदी ने भगवन कृष्ण को याद किया और भक्तवत्सल गोपाल के अनुग्रह से ब्रह्मणों का परितोष रखने में सफल रही। द्रौपदी की सेवा-निष्ठा से प्रसन्न महर्षि दुर्वाषा ने आशीष के साथ 'कार्तिक शुक्ल षष्ठी' को भगवान् भाष्कर का व्रत करने की सलाह दिया। द्रौपदी ने वन में ही उक्त तिथि को सूर्योपासना किया और छट्ठी मैय्या के प्रताप से एक वर्ष सफल अज्ञातवासोपरांत पांडवों को महाभारत युद्ध में विजय और खोया राज-पाट ऐश्वर्या व यश प्राप्त हुआ। तो ऐसी है भगवान् भुवन भाष्कर की महिमा और छठ महापर्व का महातम्य !!! बोलो छट्ठी मैय्या की जय !!!

रविवार, 27 सितंबर 2009

या देवी सर्वभूतेषु … … मनोज कुमार



या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:!!
हे देवी तुम शक्ति रूप हो। जो देवी सब प्राणियों में शक्तिरूप से स्थित हैं,
उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।


हम सभी जानते हैं कि कहीं न कहीं कोई शक्ति अवश्य है जो ब्रह्मांड का संचालन करती है। प्रत्येक वर्ष आश्‍विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक हम शारदीय नवरात्र मनाते हैं। यह पर्व है असत्य पर सत्य की, अधर्म पर धर्म की, अत्याचार पर सदाचार की विजय का।
एकबार देवताओं के राजा इन्द्र तथा राक्षसों के राजा महिषासुर में वर्षों तक घोर युद्ध हुआ। इस लड़ाई में इन्द्र की हार हुई। फलस्वरूप महिषासुर इन्द्रलोक का राजा बन बैठा।
हारे हुए देवतागण ब्रह्माजी के साथ भगवान शिव एवं विष्णु के पास गए। उन्होंने अपने दुख, अपनी हार एवं राक्षसों के अत्याचार की व्यथा सुनाई। साथ ही यह भी निवेदन किया कि उनका राज्य वापस लाने का उपाय किया जाए।

देवतागणों की व्यथा कथा सुन भगवान शिव एवं विष्णु को काफी क्रोध आया। भगवान विष्णु के मुख एवं ब्रह्मा, शिव और इन्द्र के शरीर से एक ज्योतिपुंज निकला। इस ज्योतिपुंज से सभी दिशाएं जलने लगी। अंत में यही तेज एक देवी के रूप में बदल गया। इस देवी ने सभी देवी-देवताओं से अयुध, शक्ति और आभूषण प्राप्त किया। सारे अस्त्र-शस्त्रों से लैस होकर देवी ने उच्चस्वर से अट्टहास किया। उनके इस अट्टहास से पृथ्वी आदि डोलने लगे। देवी की यह गर्जना महिषासुर तक पहुंची। सचेत होकर महिषासुर ने राक्षसों की सेना का व्यूह बनाया। फिर वह उस सिंहनाद की ओर दौड़ पड़ा। उसने अपनी सारी शक्ति, छल, बल, लगा दिया परन्तु वह देवी के ऊपर कोई प्रभाव नहीं जमा सका। अंत में देवी के साथ युद्ध में न सिर्फ उसकी पराजय हुई बल्कि देवी के हाथों उसकी मृत्यु भी हुई।

आगे चलकर शुम्भ तथा निशुम्भ नामक अत्याचारी असुरों का बध करने के लिए देवी माता गौरी के शरीर से उत्पन्न हुई। एक दिन देवी हिमालय पर विचर रहीं थीं। शुम्भ निशुम्भ के अनुचरों ने उनके परम मनोहर रूप को देखा तो काफी प्रभावित हुए। उन्होंने जाकर अपने राजा को बताया कि एक अद्भुत दिव्य कांति वाली देवी हिमालय पर हैं। इस देवी का वरण कीजिए। दैत्यराज शुम्भ ने देवी के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा। देवी ने इसे ठुकरा दिया और कहा कि जो युद्ध में मुझको पराजित करेगा वही मुझको वरण कर सकता है।

अनुचर के द्वारा यह वृतांत सुनकर शुम्भ काफी कुपित हुआ और उसने अपने सेनापति धुम्रलोचन से देवी को बलपूर्वक पकड़कर लाने को कहा। धुम्रलोचन जब देवी के सामने पहुंचा तो देवी ने अपने हुंकार से उसे भस्म कर डाला। उसके साथ आई सेना को उनके सिंह ने चीड़-फाड़ डाला।

यह देख कर शुम्भ ने देवी को पराजित कर पकड़ लाने के लिए चण्ड और मुण्ड को भेजा। चण्ड-मुण्ड ने विशाल सेना लेकर देवी से युद्ध किया। देवी विकराल रूप धारण कर उनकी सेना पर टूट पड़ीं। देवी के प्रहारों के समक्ष वे टिक न सके। देवी ने चण्ड-मुण्ड का वध कर डाला।

यह समाचार सुन शुम्भ के क्रोध की सीमा न रही। सेना लेकर वह स्वयं ही युद्ध हेतु प्रस्थान कर गया। शुम्भ की सेना को देख देवी ने धनुष की प्रत्यंचा से ऐसा टंकार निकाला कि पृथ्वी और आकाश गूंज उठा। राक्षसों के संहार और देवताओं की रक्षा के लिए देवी के शरीर से सभी देवी-देवताओं की शक्तियां अलग-अलग रूप में प्रकट हो गईं साथ ही देवी के शरीर से महादेव की कृपा और आदेश से बड़ी भयानक और उग्र चंडिका उत्पन्न हुई। शक्ति के मद में चूर दैत्य समूह ने देवी के रूप और शक्ति की परवाह नहीं की और युद्ध करने लगे। देवी के समक्ष असुर अधिक देर तक टिक नहीं सके।

बहुत से राक्षस देवी के प्रहार के सामने काल को ग्रसित हो गए। दैत्यें की पराजित होती अवस्था देख महादैत्य रक्तबीज सामने आया। रक्तबीज गदा लेकर इन्द्रशक्ति से युद्ध करने लगा। देवी के वारों से उस राक्षस के शरीर से जहां-जहां रक्त गिरता, वहां-वहां एक नया रक्तबीज पैदा हो जाता। यह देखकर देवताओं में खलबली मच गई। सभी देवता भयभीत हो गए। यह देख कर कि सभी देवता भयभीत हैं, चंडिका ने काली (चामुंडे) से कहा, “तुम अपना मुख फैलाकर युद्ध क्षेत्र में विचरण करो और मेरे शस्त्रों के प्रहार से गिरने वाले रक्त बूंदों को पी जाओ तथा उनसे उत्पन्न दैत्यों का भक्षण करती रहो। इस प्रकार दैत्यों का रक्त क्षीण हो जायेगा और राक्षस उत्पन्न नहीं हो पाएंगें”।

यह आदेश देकर चंडिका ने शूल से रक्तबीज पर प्रहार किया। उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को काली ने मुंह फैलाकर पी लिया। रक्तबीज देवी पर प्रहार तो करता पर उसका देवी पर कोई असर नहीं पड़ता। इस प्रकार देखते-देखते उसकी शक्ति क्षीण होती चली गई और रक्तबीज का अंत हो गया।

इस खबर से जहां एक ओर देवताओं में हर्ष का सैलाव उमड़ पड़ा वहीं दूसरी ओर शुम्भ-निशुम्भ के क्रोध की सीमा नहीं रही। वे दैत्यों की विशाल सेना लेकर देवी से युद्ध करने को चल पड़ा। पर देवी दे उन दोनों को भी युद्ध में पराजित कर उनका संहार कर दिया। सभी राक्षस मारे गए। सारे संसार में सुख शांति व्याप्त हो गई।

इसी विजय के उपलक्ष्य में हम विजयादशमी का पर्व मनाते हैं। साथ ही इस दिन भगवान रामचन्द्र जी चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर लंका पर विजय पताका फहराकर अयोध्या लौटे थे, इसलिए भी इस पर्व को विजयादशमी के रूप में मनाते हैं।