मंगलवार, 11 मई 2010

मन का पंछी उड़ना चाहे

आज फिर एक सूफी गीत -- करण समस्तीपुरी



मन का पंछी उड़ना चाहे,
लेकिन उड़ ना पाये !
हाय !
किसको दर्द सुनाये !!


कतरे गए पंख कोमल और
आँखें हैं धुंधलाई !
धुंधली आंखो में सतरंगी,
सपने बहुत छुपाये !!
हाय !
किसको दर्द सुनाये !!


कहाँ बसेरा, कहाँ ठिकाना,
किस पथ से किस नभ को जाना !!
काल जाल लेकर बैठा है,
खग का पग थर्राए !
हाय !
किसको दर्द सुनाये !!


14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी अभिव्यक्ति .आपका आभार.

    जवाब देंहटाएं
  2. अन्तर भाव को व्यक्त करती रचना अच्छी लगी.

    जवाब देंहटाएं
  3. हाय !किसको दर्द सुनाये !!

    सुन्दर ।

    जवाब देंहटाएं
  4. उत्तम भाव।
    जिस प्रकार रात्रि का अंधकार केवल सूर्य दूर कर सकता है, उसी प्रकार मनुष्य की विपत्ति को केवल ज्ञान दूर कर सकता है।

    जवाब देंहटाएं
  5. कहाँ बसेरा, कहाँ ठिकाना,
    किस पथ से किस नभ को जाना !!
    काल जाल लेकर बैठा है,
    खग का पग थर्राए


    अंतर्द्वंद को समेटे हुए एक अच्छी रचना...

    जवाब देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .....अछे ढंग से पेश की हुई ....पढ़कर अच्छा लगा

    जवाब देंहटाएं
  8. मनोज भाई, बहुत गजब का गीत पढ़वाया आपने। यकीन जानिए, दिल पुलकित हो उठा।
    --------
    कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
    पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

    जवाब देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।