देसिल बयना – 61
हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।
हरबरी का ब्याह, कनपट्टी में सिन्दूर !
-- करण समस्तीपुरी
पछिला साल नानीगाँव वाला बात याद करके हंसी दबाये नहीं दबता है..... हा.... हा... हा... हा.... ! जमुनी मौसी का सात साल का बेटा घपोचना बिजली मामी को देख कर सो ताली पीट के हंसा कि पूछिये मत। खी...खी...खी...खी..... ! ए खें....खें.....खें...खें....... ! आहि रे बा.... 'का हुआ रे घपोचना.... इन्ना खिखिया काहे रहा है.....?
"आले तोली ते...... बिजली मामी तो मलद के तलह केछ झाली हैं.... ही....ही.... ही.... ही.... देखो न कैछे जुल्फी के कात में मांग निकाली हुई है.... अदय देवगन के तलह.... हा...हा.... हा... हा.... ! मामी तो हिलो हो गयी ...... हें...हें...हें.... !
उ अबोध के ई मासूम जवाब सुन के सब जाने हँसते-हँसते पेट पकड़ लिहिस.... हा...हा... हा... हा... हा..... ! अरे बाप रे बाप...... हा.............. !
सच में गाँव-घर में तो सभी औरत बीच में ही मांग निकालती थी। बिजली मामी ही एगो अपवाद थी। सांचे... जुल्फों के बादल के बाएं भाग में लाल सिन्दूर बिजली मामी का नामे जैसा चमक रहा था। सकल सभा घपोचना के निर्मल हास में डूब गया था। लपकू मामू तो कह भी दीये थे, "हाँ... बिजली भौजी बगले से बिजली गिराती हैं... हा...हा...हा...हा..हा.... !"
बेचारी बिजली मामी झेंप कर बोली थी, "हाँ ! जरा अपने हरबरिया मामू से भी पूछ लो.... बिजली का बिजली गिराएगी... बिजलिये पर बिजली तो तोहरे हरबरिया मामू गिरा दिए... पता नहीं किन्ना धरफराए हुए थे कि बीच मांग के बदले..... !" आ... खी....खी....खी....खी...... ! बिजली मामी अंत में जौन अदा से मुँह चमकाई थी कि ठहक्का दोबारा बजर गया।
सच्चे... मामू भी कमाल हरबरिया थे। हमको अभियो यादे है उनकी बारात। सहबल्ला बन के तो हमही गए थे। यही अगहन मास था। गंगा-कमला के दियारा में तो कातिके से जाड़ा जोत देता है। नाना कहे थे कि फागुन पहिले पक्ख बारात दुआर लगायेंगे मगर मामी के घरवाले को भरोस नहीं था। हाँ भई ! बेटी का ब्याह हो जाए तो समझो कि हो गया... । उ तो ठहरे लड़की वाले इधर जोखन मामू और उनसे भी जादे हमरी नानी को बेटा ब्याह का बिगरता लगा हुआ था।
बैकुंठ एकादशी आते-आते सरदी को भी पंख लग रहा था। हमलोग तो स्वेटर के ऊपर से गांती बाँध-बाँध के मजा लेते थे। असल कसरत तो जोखने मामू का होता था। पांच रात तो कम से कम पसाहिन करना ही पड़ेगा। बाप रे बाप... वस्त्र के नाम पर बस डाँर में एगो पीरा धोती। ऊपर से पूरे देह पर उबटन की रगड़ाई। रह-रह कर बेचारे का हाड़ काँप जाता था। और फिर उ रतिया में कुइयां-स्नान। हर-हर गंगे.... ! बेचारे मामू एक लोटा पानी ढारे में पांच गो भगवान को सुमिरते थे।
पूर्णिमा रात का लगन था। झोंटा झा पंडीजी चेता दिए थे, "कल्हे से पूस चढ़ रहा है। देरी-विलम्ब किये तो हो गया त्र्यम्बकं यजामहे... सुगन्धिं पुष्टि वर्धनं..... !"
मैथिल के बरियात और सांझ से पहिले विदा हो जाए... हरि-हरि ! उ तो कहावतो है, "तीन तिरहुतिया तेरह पाक, ओहि में उठे भागम-भाग !' बैलगाड़ी के ऊपर ओहार (पर्दा - शीत से बचने के लिए) लगा कर लौडिस्पीकर बांधते-बांधते चंदा मामा भी चमक उठे। अशरफी राम का मशक बैंड एक मोडल बाजा के आराम कर रहा था। उ तो रामजी बाबा धरफराए तो जाकर अशरफिया पिपही पिपियाने लगा, "मेरा यार बना है दूल्हा और फूल खी हैं दिले के..... पें.... पें... पें...पें...पें...पें...पें.... पें... पें...पें...पें...पें...पें.... पें... पें...पें...पें...पें... !"
बारातो बूझिये महादेवे जैसा... ! अंतर यही कि उ बैल पर गए थे और ई बैलगाड़ी पर। सुखलाहा बलान नदी पार करते-करते चंद्रदेव माथा पर आ गए। उधर बराती के खोज में धम्मक गंज से भी आधा दर्जन साइकिल जोता गया था। खैर बलाने कात में भेंट हो गयी। फिर उहाँ से बराती-सराती जमे चले। हम तो जोखने मामो के पजारी में चिपके हुए थे।
पहर रात गए बारात दुआर लगी। लेकिन धम्मक गंज वाले को चाबश कहना पड़ेगा। नास्ता के साथे-साथ चाह भी परोसे थे। जादा तर बराती शीशा वाला गिलास को दुन्नु हाथ में पकर कर पंजा गरमाने की कोशिश भी कर रहे थे। दुग्ध-जल-शर्करा युक्त पर्वतीय बूटी के उष्ण मिश्रण का सेवन कर बारातियों में भी कुछ गर्मी आयी।
द्वारपूजा करा के जोखन मामू को ले गए मंडप पर। हम तो साथे-साथ थे। झोटा झा भी पछुआरा छोड़ने वाले नहीं थे। उधर लड़की पक्ष के पंडी जी 'एतानि गंगा जलानि..... ' कर रहे थे। शीत गिरे कि पला मिथिला में लगन है हास-परिहास कैसे रुकेगा। पंडीजी मामू को कहें, "हाथ में कुश लीजिये.... !" पीछे से जर-जनानी सब कहे, "डैस.... में ठूस लीजिये !" 'खी... खी.... खी...खी..... हम तो मंडप पर भी खिखिया दिए थे।
झोंटा झा उ दिश के पंडी जी को थर्ड गेयर धरा दिए थे। लेकिन उनका भी खूब स्वागत हुआ, "ई पंडित बुरबक को पोथी नहीं है.... !' हा...हा... हा..... हा.... ! हमें तो बड़ा मजा आ रहा था मगर लाल धोती और सिल्क के कुरता पहिने मामू का हाल देखने लायक था। देखने से ही लग रहा था कि बेचारे केतना हरबरी में हैं। पंडीजी जब तक 'तील-जौ' कहें तब तक मामू का हाथ 'सचंदन पुष्पं' तक पहुँच जाता था।
सब कुछ ग्यारह से दू के शो जैसा हुआ। शर्ट-कट में फटाफट मंडप के नीचे अग्नि सुलगाया गया। धान के लाबा छीटते हुए मामा-मामी सात फेरा लिए। उ तो शुकुर कहिये कनहू हजाम का कि आग सुलगा दिया। नहीं तो इहाँ भी साढ़े तीने फेरा में जय-जय श्री सीताराम हो जाता।
मामी तो भरा-पूरा कपड़ा-चादर से धनकी बैठी थी। मगर मामू आग तर से हटे सो ठंडी उनको और दुलकाने लगा। रह-रह कर दांत से झाल बज जाता था। इधर दुन्नु पंडी जी सिन्दूर दान कराने के लिए तैयार। बेचारे मामू भी दांत किटकिटाते-कंपकंपाते भर मुट्ठी सिन्दूर उठाए। पंडी जी का 'इरिंग-भिरिंग' चलिए रहा था कि आगे बैठी मामी के माथा में रगड़ दिए।
आह तोरी के.... मामू अपना विध कर के सीधा भी नहीं हुए थे कि महिला मंडल में उपहास गूंज गया, "गे मैय्या...... दूल्हा केहन हरबरिया छै गे..... देखो तो..... !" एक औरत बोली, "जा ब्याह हो गया और बिजली के मांग उदासे..... !" दूसरी बोली, "हाँ ए बहिन दाई ! जा सिन्दूर कहाँ रखि देलखिन दुल्हा.... ?' तभी तीसरी औरत ने कहा, "अरे ये देखो न.... ! मांग बीच में है और दूल्हा बाबू हरबरी में कनपट्टी में ही सिन्दूरदान कर दिए।" मामी की महतारी का तो कलेजा बैठ गया, "जा हो विधाता.... ! आब कि हेतैक.... (अब क्या होगा.....) ?
पंडीजी सारा नारी-विलाप सुन के बोले, "धत तोरी के... अरे होगा क्या... कुछ नहीं। सब ठीके है। हरबरी के ब्याह में कनपट्टी में सिन्दूर तो होगा ही। अब जो हो गया सो हो गया.... महादेव योगी थे तो पार्वती भी जोगन बनी। वनवासी राम के लिए सीता भी वन-वन भटकी। अब पाहून इसने हरबरिया मिले तो का होगा... सिंदूरदान कनपट्टी पे हुआ तो अपनी बिजली बचिया भी आज से कात में ही मांग निकालेगी.... !"
हा...हा...हा...हा.... ! ई को कहते हैं पंडित। सब समस्या का समाधान। हमको तो ई पूरा दिरिस एकदम ताजा-ताजी यादे है। प्रजेंट में भी हंसी आ गया। हँसते-हँसते ही कहे, "सच में उ रात ठंडियो ऐसन पड़ रहा था.... !"
हमरी बात खतम हो उ से पहिलही बिजली मामी चिहुक पड़ी, “हां-हां ... ठन्ढी का रहेगा ... ई न कहिये कि ठन्ढी से जादे हरबरी था। अरे थोड़ा निहुर के देख भी तो लेते ...! अगर इन्ना हरबराये हुए नहीं होते तो कनपट्टी में सिन्दूर नहीं न डालते ... और ना ही हमें ज़िन्दगी भर टेढा सीथ करना पड़ता।”
तब बड़का मौसा बोले, “हां, ई बात तो ठीक है। झट-अपट काम शैतान का होता है। हरबरी नें बड़ा गरबरी हो जाता है। अब देखिए, ‘हरबरी के ब्याह में कनपट्टी में सिन्दूर हो गया न ...। तो अब आप कोई भी काम इत्मिनान से कीजिएयेगा ... हरबरी में नहीं। समझे .... ?”