फ़ुरसत में ...
दीदी की दीदगिरी
मनोज कुमार
09831841741
नवीन भाई की नई कविता पढ़ रहा था। उसमें उन्होंने ‘बहना की दादागिरी’ का उल्लेख किया था। ‘दीदी की दादागिरी’ मुझे कुछ जमा नहीं। बत्ती हरी देख उन्हें चैट पर पकड़ा और कहा – ‘‘भाई जी हम तो बंगाल में हैं और यहां भैया को ‘दादा’ कहते हैं। तो ‘दादा’ की ‘दादागिरी’ तो ठीक है पर ‘दीदी की दादागिरी’ जमी नहीं। क्यूं न एक नया शब्द गढ़ दिया जाए – ‘दीदीगिरी’!’’ उन्होंने कहा – “आपने सही पकड़ा, आप ही लिख दीजिए।” जब मैं लिख रहा था तो टंकण करते वक़्त ‘ई’ की मात्रा छूट गई और ‘दीदगिरी’ लिख डाला।
आज फ़ुरसत में ... जब सोच रहा हूं तो लगता है कि वह दीदी की ‘दीदगिरी’ ही थी जिसने हमारे जीवन के कर्मपथ को सुगम बनाया। ‘दीद’ का अर्थ ‘नज़र’, ‘दृष्टि’ होता है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर फ़ुरसत के क्षण में उन्हें याद कर पोस्ट से आई उनकी बेपनाह दुवाओं के धागे को देख रहा हूं, जिसके विषय में उनकी हिदायत है कि एक बजे के बाद ही बांधूं। सुना है कि भद्रा नक्षत्र में कोई शुभ काम नहीं किया जाता और आज एक बजे तक भद्रा नक्षत्र है। इसलिए इस रक्षा-सूत्र को एक बजे के बाद ही बांधना उचित होगा। मान्यता है कि रावण ने अपनी बहन सूर्पनखा से भद्रा के दौरान राखी बंधवाई थी इसलिए एक साल के भीतर ही उसका अंत हो गया। इसलिए भद्रा में राखी नहीं बांधनी चाहिए।
क्या हुआ वे पास नहीं हैं, उनकी मंगल कामना तो इस रेशमी डोर के रेशे-रेशे में बंधी हुई है। सावन का महीना जहां एक ओर अपनी रिमझिम फुहारों से मन को हर्षाता है वहीं दूसरी ओर पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मज़बूत करने वाले इस त्योहार को लेकर भी आता है।
हम जब छोटे थे तो घर के पुरोहित आकर कलाई में रक्षा का धागा बांधते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करते थे -
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: |
तेन त्वांमनुबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल ||
इस मंत्र में कहा गया है कि जिस रक्षा-धागा से महान शक्तिशाली दानव-राज बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा-बंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं। यह घागा तुम्हारी रक्षा करेगा|
रक्षा बंधन के विषय में तमाम पौराणिक कथाएं आती हैं उसमें से एक है त्रेतायुग में बालि के बध के समय मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने सुग्रीव को रक्षा-सूत्र बांध कर लड़ने के लिए भेजा था। कहते हैं कि द्वापर युग में सावन के पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीकृष्ण और गोकुल के निवासी एक दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर संकट के समय एक दूसरे की रक्षा करने का प्रण लिया करते थे। एक और पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में असुरों ने देवलोक पर चढ़ाई कर दी। असुर देवराज इन्द्र पर भारी पड़ने लगे। इस संकट की घड़ी में पत्नी इन्द्राणी ने सावन की पूर्णिमा के दिन अपने पति देवराज इन्द्र की कलाई में रक्षा सूत्र बांधा था। इसके बाद देवराज युद्ध में उतरे और उनकी विजय हुई तथा असुरों की हार हुई।
एक और पौराणिक कथा के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगने से खून बहने लगा था। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनके हाथों पर पट्टी बांध दी। इस बंधन से बंधे श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की चीरहरण के समय रक्षा की।
इसी प्रकार ऐतिहासिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि विश्वविजय पर निकले यूनान के शासक सिकंदर की पत्नी रुखसाना ने सावन की पूर्णिमा के दिन सम्राट पुरु के लिए एक रक्षा सूत्र भेजा था। पुरु ने इसे अपनी कलाई पर बांध ली। युद्धभूमि में जब पुरु ने सिकंदर के ऊपर तलवार चलाने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया तो उनकी नज़र कलाई पर बंधे रक्षा सूत्र पर गई और उन्होंने तलवार नीची कर ली तथा सिकंदर के प्राण बच गए। एक और तथ्य है कि चित्तौड़ की महारानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी थी।
आज इस पावन पर्व के अवसर पर बधाई देता हूं और कामना करता हूं कि आपकी कलाई पर बंधा रक्षा सूत्र हर समय आपकी रक्षा करें।