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शनिवार, 2 अगस्त 2014

फ़ुरसत में ... नैना मिलाइके

फ़ुरसत में ... 119

नैना मिलाइकेOffice-Attendance--150x150

मनोज कुमार

किसी ने क्या ख़ूब कहा है - जिसकी प्यास एक सुराही से न बुझे वह लाख दरिया को चूमे प्यासा का प्यासा ही रह जाएगा। अब ये बात कहने वाले ने किस सन्दर्भ में कही उसे जाने दीजिये, हमारे सरकारी दफ़्तरों के मामले में तो यह बात कुछ ज़्यादा ही माक़ूल साबित होती है।

न्यू मार्केट में कुछ काम था। वरिष्ठ अधिकारी से कुछ देर की मोहलत मांगी कि वह काम घंटे-डेढ़ घंटे में करके आ जाऊं, तो साहब का फ़रमान ज़ारी हुआ कि आधे दिन की सी.एल. (आकस्मिक अवकाश) लेकर जाऊं। हद है! संवेदन-शून्य होते जा रहे हैं हमारे अधिकारीगण। अब ज़रा-ज़रा से काम के लिए अवकाश की अर्ज़ी देनी होगी। दफ़्तर में मशीनों का कब्ज़ा क्या हुआ, इनकी मानवता भी मशीनी हो गई। कार्यालय में काम तो वही है, उतना ही है, पर हमारे आने-जाने के समय की आज़ादी पर यांत्रिक पाबंदी!!??

lunapic_134388108529867_5पहले प्रवेश द्वार पर कोई खास पाबंदी नहीं रहती थी, तो कभी-भी आते-जाते और घुस जाते, निकल जाते। गेट का दरबान जान-पहचान का तो होता ही था। उसे भी किसी स्थायी कर्मचारी से पंगा लेना उचित न लगता। लेकिन जब से ये मुआ EARS लगा है, तब से ऑटोमैटिक बंद और खुलने वाला दरवाज़ा लग गया है, जो नैनों की भाषा यानि आंखों की पुतली की ज़बान ही समझता है। आंखें चार हुईं तो खुलेगा, खुल जा सिम सिम की तरह। दरबान भी अब कहाँ रहे, उनकी जगह प्राइवेट सिक्यूरिटी वाले आ गए हैं, जो शरीर के अंग-अंग का स्पर्श कर प्रवेश करने की अनुमति देते हैं। डटे रहते हैं किसी निर्मोही की तरह अपनी ड्यूटी पर। यूनियन वालों ने भी ज़्यादा प्रतिरोध नहीं किया। उन्हें बता दिया गया कि ऊपर से आदेश आए हैं। लगाना ही पड़ेगा। व्यवस्था में सुधार होगा, तभी तो अच्छे दिन आएंगे।

कब से आस लगाए बैठे थे कि अच्छे दिन आने वाले हैं। मगर आए क्या खाक, अच्छे दिन! हर तरह की आज़ादी पर पाबंदी लगा कर अच्छे दिन का मायाजाल किस काम का! इस यंत्र के प्रवेश से हृष्ट-पुष्ट कार्यालय की काया क्षीण हो जाएगी, यह शायद नीति निर्धारकों ने सोचा भी न होगा। ऊपर से जब फ़रमान जारी हुआ कि अनुशासन व्यवस्था में सुधार के लिए कठोरतम उपाय अपनाए जाने चाहिए, तो प्रशासनिक अधिकारियों की नज़र सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक अटेंडेंस सिस्टम (EARS) की तरफ़ ही क्यों गई? उनका तर्क था, इसके न रहने से लोग दफ़्तर आने-जाने में मनमानी करते हैं। जिसके जब जी में आया – आया, और जब मन किया – गया। अगर EARS लगा दिया तो ऐसे मनचलों की सारी चहलकदमी दूर हो जाएगी। लेकिन हुआ क्या? हुआ यह कि पहले से ही रुग्ण सरकारी दफ़्तर और बीमार हो गया। जो लोग अपने सरकारी समय में अपना निजी काम भी कर लिया करते थे, उनपर आधे दिन CL की पाबंदी लगी, तो लोग सारा-सारा दिन की ही छुट्टी लेने लगे। दफ़्तर में उपस्थिति की काया क्षीण होने लगी।

हमारे यहां भी सरकारी औपचारिकताओं के बाद आंखों की पुतली के वीक्षण/सर्वेक्षण के आधार पर प्रवेश की अनुमति देने वाला स्वचालित यंत्र स्थापित किया जाना सुनिश्चित हुआ। स्थापना के पूर्व बड़े साहब ने विधि एवम परम्पराओं द्वारा स्थापित नारियल फोड़ने की विधिवत रस्म-अदायगी भी पूरी की। जब पहले दिन पहली खेप में प्रवेश पाने/लेने वाले वाले कर्मचारियों के दिल हर्ष से बल्लियों उछल रहे थे, तभी मेहता जी ने घोषणा कर दी थी कि यह हर्ष क्षणभंगुर है। यह तो वैवाहिक हर्ष है, ज़रा हनीमून पीरियड ख़त्म होने दो, तब पता चलेगा कि यह कैसा गठबंधन है। यहाँ तक कि लिफ़्ट के सामने बैठे रहने वाले श्यामू की बीड़ी भी न जाने कहां गुम थी और बीड़ी की जगह उसकी उंगलियों में फंसी सिगरेट भी मानो उस दिन मेहता जी का मुंह चिढ़ाती हुए कह रही हो कि देखो इस यंत्र के आ जाने से मेरा भी स्टेटस हाई हो गया है। किंतु भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है यह वह क्षुद्र प्राणी क्या जाने। उसे तो यह भी अन्देशा न था कि आने वाले दिनों में उसका भी सामान्य रक्तचाप लो होने वाला था।

हुआ भी ऐसा ही। यह उत्साह दूध में आए उफान की तरह ज़्यादा दिनों तक टिका न रह सका। लोगों का वह हाई स्टेटस, जो समुद्र में आए ज्वार की तरह अचानक हाई हो गया था, पानी में मिट्टी की तरह बैठ गया। जिसे सभी गहना समझ बैठे थे, वो तो बेड़ियाँ निकलीं! लोगों के लिए यह तरक्की कम पाबंदी ज़्यादा साबित हुई। शाम में जाने के पहले और सुबह में आने के वक़्त उस मशीन से गलबहियां कर नैना मिलाना शादी के बाद बीवी द्वारा स्थापित की जाने वाली पाबंदियों की तरह साबित हुई। जो पद्धति चालू हुई थी उसमें न तो किसी मानवीय दखल की आवश्यकता थी और न ही अवसर। रिपोर्ट सीधे बड़े साहब के कम्प्यूटर तक पहुंच जाती थी। देरी से अंखिया मिलाने वालों की गुस्ताख़ी की वे आधे दिन के CL लेने के आदेश से भरपाई करते और जो इस उपहार से बचना चाहते वे ग़ैर-हाज़िर रहना ही बेहतर समझते। परिणाम यह हुआ कि घंटा या डेढ़-दो-घंटा में निपट जाने वाले काम को पूरा करने के फेर में दफ़्तर के कर्मचारी सारा दिन ही गायब रहने लगे और उसीका नतीजा था कि आज दफ़्तर की काया क्षीण हो चली थी।

जब कर्मचारी कम होते हैं तो दफ़्तर में काम भी कम ही होता है। और जब दफ़्तर में काम कम हो, तो ये पाबंदी तो हद से गुज़र जाती है। उस दिन भी ऐसा ही कुछ हो रहा था अपन के साथ। दफ़्तर में समय से घुसना मज़बूरी बन गई थी। और जाना भी छह से पहले होने वाला नहीं था। ऑफिस की फाइलें रजाई में मुंह घुसाए राजकुमारी की तरह अंगड़ाई ले रही थीं। ऑफिस सन्नाटे के गले में बांहें डाले सो रहा था। मन में आलस की नागिन बलखा रही थी। समय बिताने के लिए कितनी देर तक इंटरनेट पर सर्फ़िंग किया जाए! मन तो एक-डेढ़ घंटे में ऊबने लगता है। अभी तो चार-पांच घंटे और काटने होंगे।

इधर आलम यह था कि वक़्त कोर्स की किताबों की तरह ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। टाइम पास करने के लिए जब आप फ़ुरसत से भी फ़ुरसत में हों, तो बरसाती घास की तरह उग आए रचनाकार अपनी विद्वता सिद्ध करने का कोई अवसर नहीं चूकते। ऐसे में मिसिर जी ने अपनी नई रचना का स्वाद चखाते और हमारी मुफ़्त की वाह-वाही लूटते-लूटते अपनी रचनाओं की ऐसी झड़ी लगा दी कि हमारा मन कोसने लगा कि ऐसे दिमाग भक्षियों के लेखन का रसास्वाद करने से तो बेहतर था कि कुछ ऑफिस का ही काम कर लेते। तभी राजेश भाई ने बरसाती दिनों में गरमा-गरम पकौड़ों की प्लेट की तरह सामने प्रस्ताव रख दिया – ‘सामने जो मॉल है, उसमें चलकर ‘किक’ लगाया जाए। सस्ते में टाइम पास हो जाएगा।’ सुझाव ग़ौरतलब था, यानी इन पकौड़ों पर हाथ साफ किया जा सकता था। क्योंकि दोपहर में मल्टिप्लेक्स की फ़िल्मों की टिकट सस्ती हुआ करती हैं। हम चारों की निकल पड़ी और हम निकल पड़े!

लगभग ढाई घंटे की फ़िल्म और आधा घंटा इधर-उधर गुज़ार कर हम वापस कार्यालय पहुंचे। देखा, सब तरफ़ अमन-चैन है। हमें महसूस हुआ हमारी तलाश की ही नहीं गई, वरना रामलाल आते ही बोलता बड़े साहब खोज रहे थे। अब तो इस मशीनी दौर में हमें सुबह घुसते और शाम में निकलते वक़्त ही पूछा जाता है। पहले जो हमारे बॉस हमारे इस तरह के अनियमित व्यवहार पर हमें आंखें दिखाते थे, आज के इस बदले दौर में हमें ‘नैनामिलाइके’ जाने देते हैं।

उस दिन भी आख़िरकार हम समयानुसार नैना मिलाने के लिए नीचे आ ही गए थे। लगा कि सच में हमारी तरक्क़ी हुई है और अच्छे दिन आ ही गए हैं। ‘नैना मिलाने’ के बाद हम यह गुनगुनाते हुए घर की तरफ़ निकल पड़े –

“तरक्क़ी    पे तरक्क़ी हुई है,

ग़ुलामी और पक्की हुई है!”

***

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

फ़ुरसत में ... इशक़ वाले लव की तलाश

फ़ुरसत में ... 111

इशक़ वाले लव की तलाश

मनोज कुमार

‘दाग अच्छे हैं’ स्लोगन वाले दौर में कोयला अभी तक काला ही है! किसी ने एक चिंगारी जलाई और ऐसी आग लगी कि ‘शोले’ दहक उठे हैं। ‘शोले’ का फ़ेमस डायलोग तो आपको याद होगा ही, “अब तेरा क्या होगा कालिया?” आज का यह “कालिया” सिर्फ़ ‘सरदार’ का नमक खाने वाला वफ़ादार ही नहीं रह गया है, बल्कि ‘असरदार’ चरित्र-निर्माण, संस्कृति सेवा आदि करने वाले प्रतीकों के रूप में दिख रहा है। अब जब कोयले की आंच से शोले दहके हैं, तो दोनों पक्ष कह ही सकते हैं – “अब तेरा क्या होगा कालिया?”

कोयले का धुंआ प्रदूषण बढ़ाता है। इससे धुंध घनी हो जाती है। धुंध भरी सुबह को तेज़ क़दमों से चलते वक़्त किसी से टकरा जाना अच्छा लगता है। यह अच्छा लगना तब और भी खूबसूरत हो जाता है, जब टकराने वाला आपकी कार्बन कॉपी लगे। इस तरह के व्यक्तित्व से टकराने से जो तड़ित-सम प्रकाश फूटता है, उससे आस-पास छाए धुंध की गहनता विरलता में परिणत होती प्रतीत होने लगती है। मॉर्निन्ग वाक तो एक बहाना होता है, अपन को तो आज भी ट्रैक सूट पहने जॉगिंग कम, चहलक़दमी ज़्यादा करते हुए कुछ ख़ास शक्लों की तलाश रहती है, जो मेरे साहित्य सृजन की प्रेरणा बन सकें। पिछले दिनों इन चेहरों का ऐसा अकाल पड़ा था कि मेरी सृजन-सरिता सूख ही गई थी। आज जब अपने कार्बन कॉपी से टकराया तो बलबला कर सोता-सा फूट पड़ा।

मेरे दिल में सृजन के हज़ारों विषय उथल-पुथल मचाए रहते हैं और दिमाग़ मुझे बराबर ‘यस’ – ‘नो’ के द्वन्द्व में घेरे रहता है – जीवन प्रांगण में आज एक बार फिर से क्रांति की रणभेरी बजने लगी है। मेरी लेखनी का चक्का जाम करने वाले मज़दूर दिमाग के सामने सृजन की क्रांति का मशाल लिए दिल ने मैदान-ए-जंग में डटकर मुक़ाबला किया और अंततोगत्वा जीत मेरी ‘फ़ुरसत’ की ही हुई। विजय के उल्लास में दिल बल्लियों उछल रहा है।

जिससे टकराया था, उसने ‘फ़ुरसत में ..’ मुझे कहीं कुछ पढ़ लिया होगा, और शायद वह मेरी विलक्षण शैली, विनोदी स्वभाव और किस्सागोई का मुरीद भी बन गया हो। लेकिन जिस अंदाज़ में उसने मुझे महिमा-मंडित किया वह उसके मेधावी होने का प्रमाण दे रहा था। हम दोनों उस सैर-सपाटा पार्क के चक्कर लगाते रहे और एक-दूसरे को सुनते-सुनाते रहे। जब मैं अपने विनोदी स्वभाव के नमूने स्वरूप कोई लतीफ़ा सुनाता तो वह पूरी तन्मयता से सुनता और बड़ी ज़ोर से हंसता। फिर वह नहले पर दहला मारने के अंदाज में अपनी बातें रखता और इतने ज़ोर से मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए कहता, “बोल गुरु कैसी रही?

मेरा कार्बन कॉपी मुझे बातों ही बातों में उस जगह ले गया जहां मैं जाना नहीं चाहता था। कहने लगा, ‘यार ! बता – इस जीवन में तूने इकतरफ़ा प्यार कितनी बार किया है?’ मैं चौंका। आश्चर्य और प्रश्न मिश्रित भाव लिए जब मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा, तो कुछ ज़्यादा ही खुलते हुए उसने कहा, “अरे यार! ‘इशक़’ वाला ‘लव’ … अब भी नहीं समझा? … तूने तो किया, पर उसे पता भी नहीं चला!”

कार्बन कॉपी की बातों से मुझे मेरी ही लिखी हुई एक पंक्ति का स्मरण हो आया – ‘हमारे स्वभाव में ही था झट से किसी के प्रेमपाश में बंध जाना और नसीब में था फट से उस बंधन का टूट जाना।’ ये उन भूले-बिसरे दिनों की नादानियां हैं, जिसे आज मेरे कार्बन कॉपी ने याद दिला दी। पढ़ाई-लिखाई के बीच ‘इशक़’ तो होता था, ‘लव’ नहीं हो पाता था। ‘इशक़’ और ‘लव’ के बीच कैरियर का सांप कुंडली मारकर बैठ जाता और ‘कैरियर चौपट न हो जाए’ की फुंफकार में ‘लव’ की फुसफुसाहट गुम हो जाती थी। ‘स्टुडेंट ऑफ द इयर’ जीत जाता था, लेकिन ‘लवर ऑफ द डे’ भी हार जाता था। हम तो मध्यमवर्गीय बच्चे थे, - जो पालथी मारकर पढ़ते थे। इसलिए हम पढ़ाकू तो बने रहे, - लड़ाकू न बन सके।

आज कार्बन कॉपी ने मेरी इस नादानी को सुन कर मुझे ‘डरपोक’ करार दिया। सच ही तो कहा उसने। मैं क्रांतिकारी तो बन ही नहीं सका। मैंने न कभी क्लास बंक की, न कभी लाइब्रेरी या कैंटिन में बैठा, न कभी नुक्कड़ों पे गॉसिप की, न कभी नौटंकी, सिनेमा, क़व्वाली देखने के लिए रात-रात भर घर से बाहर रहा, न कभी देखी गई फ़िल्म के क़िस्से सुनाने के लिए पार्क में महफ़िल जमाई। कितनी ही चीज़ें छूट गईं या छोड़ता चला गया। शुभचिंतक टाइप के मित्र लानत भेजते। कहते – बड़का प्राइज जीत लेगा। छात्रों में कई उद्दंड किस्म के भी थे, जो पढ़ाकू छात्रों के विकेट उखाड़ने की ताक में लगे रहते थे। उनके बाउंसरों को झेलते हुए ‘पिच’ पर अपनी विकेट सही-सलामत रखना भी बड़े धैर्य और कौशल का काम था। विकेट पर टिके रहना तो आया पर तेज़ी से रन बनाने की कुशलता न आ पाई। लिहाजा छोर बदलने का सिलसिला थमा-सा ही रहा।

IMG_4383इस तरह से एक उदासीनता द्वारा सर्जित वातावरण में अपनी भावना दबा देने का जो अपराधबोध रहा, उससे मुक्ति के लिए क़लम का सहारा लिया, और गाहे-ब-गाहे फ़ुरसत में कुछ लिख-लिखा लिया। लेकिन उस पढ़ाकू पारिवारिक माहौल में जाने क्यों लिखना भी अपराध माना जाता था। फिर भी, चोरी-छिपे ही सही, लिखने का क्रम ज़ारी रहा। उन दिनों के बड़े-बड़े, नामी-गिरामी, प्रेरक लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन से दिल से यह आवाज़ उठी कि सतत लेखन के लिए प्रेरक-शक्ति चाहिए। अब यह शक्ति या प्रेरणा तो किसी के ‘इशक़’ में पड़ कर ही प्राप्त की जा सकती है। समस्या यह कि मुझ जैसे निठल्ले के लिए ऐसी प्रेरणा उपलब्ध होना एक टेढ़ी खीर थी। एक तरफ़ जहां लड़कियां मां-बाप, समाज से डरती थीं, वहीं दूसरी तरफ़ हमारे ‘लव गुरु’ ऐसे थे जिन्होंने अपनी किताब लिख कर कहा था, “इस उपन्यास का लिखना मेरे लिए वैसा ही रहा है जैसा पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना; और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन ही मन दोहरा रहा हूं।” जी हां, उन दिनों गुनाहों का देवता मध्यमवर्गीय जीवन की कहानी ही तो थी। आदर्श प्रेमिका की जो छवि उसमें गढ़ी गई थी उसे आज तक खोज रहा हूं। मिली नहीं। मुश्किल हमारी यह थी कि बिना इस प्रेरणा के लिख कैसे पाऊंगा? इसलिए झूठ-सच का झट से वाला ‘इशक़’ और फट से वाला ‘ब्रेकअप’ गढ़ता गया और रचता गया।

जो गुनाह कभी किया नहीं, उस गुनाह को बार-बार दुहराता रहा। लेकिन मेरा कार्बन कॉपी उसे मानने के लिए कत्तई तैयार नहीं है। किसी ने कहा है, ‘इंतज़ार करने वालों को उतना ही मिलता है, जितना कोशिश करने वालों से छूट जाता है।’ पता नहीं मैंने इंतज़ार नहीं किया या कोशिश नहीं की। लेकिन तलाश मेरी बदस्तूर ज़ारी है। इंशा अल्लाह, अगर कभी यह तलाश पूरी हुई तो ‘फ़ुरसत में...’ ज़रूर मिलेंगे। और अगर इस तलाश में आप मेरी मदद कर सकें, तो ज़रूर ख़बर कीजिएगा। त्त-उम्र एहसानमन्द रहूँगा!

शनिवार, 22 सितंबर 2012

फ़ुरसत में ... तीन टिक्कट महा विकट

फ़ुरसत में ... 110

तीन टिक्कट महा विकट

मेरा फोटोमनोज कुमार

हमारे प्रदेश में एक कहावत काफ़ी फ़ेमस है – तीन टिक्कट, महा विकट। इसका सामान्य अर्थ यह है कि अगर तीन लोग इकट्ठा हुए तो मुसीबत आनी ही आनी है। ऐसे ही कोई कहावत कहावत नहीं बनता है। कोई-न-कोई वाकया तो उसके पीछे रहता ही होगा। करण बाबू तो इसी पर एक श्रृंखला चला रहे थे .. आजकल उसे अल्पविराम दिए हैं। अब तीन टिकट महा विकट का भी ऐसा ही कोई न कोई वाकया ज़रूर होगा। जैसे तीन दोस्त ट्रेन से जाने के लिए निकले तीन टिकट लिया और गाड़ी किसी नदी पर से गुज़र रही थी, तो इंजन फेल हो गया; तीन टिकट लेकर तीन जने किसी बस से निकले, सुनसान जगह में जाकर उसका टायर बर्स्ट हो गया। तीन टिकट लेकर ट्राम में बैठे कि उसको चलाने वाली बिजली का तार टूट जाए। किस्सा मुख़्तसर ये कि तीन के साथ कोई न कोई बखेड़ा होना लिखा ही है।

जब घर से तीन जने निकलते, तो कोई न कोई टोक देता कि तीन मिलकर मत जाओ, तो दो आगे एक पीछे से आता, या एक आगे, दो पीछे से आते। एक मिनट-एक मिनट!!!! अरे हम इतना तीन तीन काहे किए हुए हैं, आप भी सोच में पड़ गए होंगे। अजी आज रात के बारह बजे हम भी तीन पूरे कर रहे हैं, पूरे तीन साल इस ब्लॉग जगत में। हो गया न हमारा भी तीन का फेरा। तो हमारे इस ‘मनोज’ ब्लॉग का भी तीसरा टिकट कट गया ना। अब तीन का टिकट आसानी से तो नहीं ही कटना था। विकट परिस्थिति को महा-विकट होना ही था ... देखिये हो ही गया। ‘फ़ुरसत में’ तो हैं हम, लेकिन कुछ लिखने का फ़ुरसत नहीं बन रहा, ‘आंच’ लगाते हैं, तो अलाव बन जाता है। स्मृति के शिखर पर आरोहण में बहुत कुछ विस्मृत और गुप्त-सा हो चला है। क्या बधाइयां, क्या शुभकामनाएं, सब व्यर्थ लगता है। तीन साल इस ब्लॉग-जगत में अपना सर्वश्रेष्ठ देते-देते हमारे लिए भी ‘तीन टिक्कट - महा-विकट’ वाली स्थिति हो गई है।

तीन पूरे हुए ! अब तो चौथ है !

तीन पूरे हुए,

अब तो चौथ है!

सोचता हूँ

कैसा ये एहसास है?

या कोई पूर्वाभास है?

 

आज फिर

फ़ुरसत में

फ़ुरसत से ही

लिखने बैठा हूं,

सीधा नहीं

पूरी तरह से ऐंठा हूं

इतने दिनों के बाद

फिर से ब्लॉग पर लिखना लिखाना

आने वाली चौथ का आभास है?

मैं सोचता हूँ

कैसा ये एहसास है?

या कोई पूर्वाभास है?

 

चींटियों को भी तो हो जाता है

अपनी मौत से पहले

ही अपनी मौत का आभास

मानो उम्र उनकी आ चुकी है

खत्म होने के ही शायद आस-पास।

 

उस समय जगती है उनकी प्रेरणा

कि ज़िन्दगी के दिन बचे हैं जब

बहुत ही कम

तो हो जाती हैं आमादा

वे करने को कोई भी काम भारी

और भी भारी

है ताज्जुब

चींटियां अपनी उमर के साथ

कैसे हैं बदलतीं काम अपने

और बदलतीं काम की रफ़्तार को भी!

 

चींटियाँ...

ये नाम तो सबने सुना ही होगा

पड़ा होगा भी इनसे वास्ता

चलते गली-कूचे, भटकते रास्ता.

लाल चींटी और कभी

काली सी चींटी

काट लेतीं और लहरातीं

खड़ी फसलें, कभी सब चाट जातीं

या घरों में बंद डिब्बों में भी घुसकर

सब मिठाई साफ़ कर जातीं हैं पल में

 

किन्तु हर तस्वीर का होता है

कोई रुख सुनहरा

चाटकर फसलों को ये

करती परागण हैं

जो फसलों को सहारा भी तो देता है.

 

यह ‘हिमेनोप्टेरा’

ना तेरा, न मेरा

सबका,

सामाजिक सा इक कीड़ा

इसे कह ले कोई भी

राम की सीता, किशन की मीरा

या जोड़ी कहे राधा किशन की

धुन की पक्की,

सर्वव्यापी स्वरूप उसका

गृष्म, शीतल, छांव, चाहे धूप

जंगल गाँव

पर्वत, खेत या खलिहान

भूरी, लाल, धूसर, काली

छोटी और बड़ी,

बे-पर की, पंखों वाली

दीवारों दरारों में

दिखाई देती है बारिश के पहले,

और वर्षा की फुहारों में

कभी मेवे पे, या मीठे फलों पर

दिख भी जाते हैं ज़मीं पर,

और पत्तों पर,

नहीं तो ढेर में भूसे के

डंठल में यहां पर

या वहां पर

बस अकेले ही ये चल देती हैं

और बनता है इनका कारवां.

बीज, पौधों के ये खाती हैं

कोई फंगस लगी सी चीज़ भी

खाती पराग उन फूल के भी

फिर मधु पीकर वहाँ से भाग जातीं

 

कितनी सोशल हैं,

कोलोनियल भी हैं

चाहे कुछ भी कह लें

किन्तु यह प्राणी ओरिजिनल हैं

ज़मीं के तल में

अपना घोंसला देखो बनाती

अलग हैं रूप इन कीटों के

इनके काम भी कैसे जुदा है

बांझ मादा को यहाँ कहते हैं ‘वर्कर’,

और बे-पर के सभी हैं ‘सोल्जर’

दुश्मन के जो छक्के छुड़ातीं

कोख जिनकी गर्भधारण को हैं सक्षम

‘रानी’ कहलातीं हैं

न्यूपिटल फ़्लाइट में

“प्रियतम” का अपने

मन लगाती, दिल भी बहलाती!

 

छिडककर फेरोमोन वातावरण में

वे प्रकृति की ताल पर

करती थिरककर नाच

अपने ‘नर’ साथी को जमकर लुभाती.

जो मिलन होता है न्यूपिटल फ़्लाइट में

बनता है कारण मौत का

उसके ही प्रियतम की

औ’ रानी त्यागकर पंखों को अपने

शोक देखो है मनाती

साथ ही वो देके अंडे

इक नयी दुनिया बसाती है

ऐसे में वर्कर भी आ जाती

मदद को

सोल्जर भी करतीं रखवाली

अजन्मे बच्चों की

कितने जतन से.

और उधर रानी को जो भी ‘धन’ मिला नर से

उसे करती है संचय इस जतन से

जिसके बल पर

देती रहती है वो

जीवन भर को अंडे

रूप लेते है जो फिर

चींटी का.

 

कैसे चीटियां

अपनी बची हुई आयु का कर अनुमान

करती हैं बचा सब काम

अंदाजा लगाकर मौत का

हो जाती हैं सक्रिय

 

निरन्तर अग्रसर होती हैं

अपने लक्ष्य के प्रति

और लड़ती है सभी बाधाओं से

टलती नहीं अपने इरादे से

नहीं है देखना उनको पलटकर

और न हटना है कभी पथ से

उन्हें दिखता है अपना लक्ष्य केवल!!

लक्ष्य केवल लक्ष्य, केवल लक्ष्य..!!

 

लक्ष्य भी कितना भला

कि ग्रीष्म ऋतु में ही

जमा भोजन को करना

शीत के दिन के लिए पहले से!

ताकि उस विकट से काल में

ना सामना विपदा से हो!

मालूम है उनको

समय अच्छा सदा रहता नहीं है

दुख व संकट का सभी को सामना

पड़ता है करना.

 

चींटियां

देतीं हैं नसीहत हैं

बुरा हो वक़्त फिर चाहे भला हो

हम भला व्यवहार अपना क्यों बिगाडें

सीख देती हैं

कि निष्ठा से, लगन से

काम की खातिर रहें तैयार

हर हालात से लड़कर

 

हमें देती हैं वे यह ज्ञान

जब संतोष धन आये

तो सब धन है ही धूरि समान

कैसे जब उन्हें शक्कर मिले तो

ढेर से वो बस उठातीं एक दाना

छोड़ देती हैं वो बाकी दूसरों के नाम.

समझातीं है हमको

उतना ही लो जितना तुमको चाहिए

क्षमता तो देखो अपनी तुम

संचय से पहले!

 

चींटियां

कहती हैं हमसे

जो कमी है, दूर उसको कर

जिसे पाना है उसको पा ही लेने की

करो कोशिश

सभी बाधाएं खुद ही ढेर हो जायेंगी

चूमेगी तुम्हारे पाँव खुद आकर

सफलता, कामयाबी!!!

***

शनिवार, 2 जून 2012

फ़ुरसत में … फ़ुरसत से मीठी यादें बांटते हुए!

फ़ुरसत में …

फ़ुरसत से मीठी यादें बांटते हुए!

salilसलिल वर्मा

घर का बरामदा, बरामदे में लगी एक आराम कुर्सी, आरामकुर्सी के बगल में एक तिपाई, तिपाई पर चाय का प्याला, प्याले के पास प्लेट में सजे बिस्किट, बिस्किट के साथ पानी का ग्लास... आराम कुर्सी पर अधलेटे, आँखें बंद किये, पेंडुलम की तरह झूलते हुए, कुछ सोचते हुए, कुछ याद करते हुए, मन ही मन मुस्कुराते हुए - इस नज़ारे को अगर कोई नाम देना हो, तो क्या नाम देंगे आप? बहुत ही आसान है, उसे हम कहेंगे – फ़ुरसत में! हमने भी सोचा कि आज थोड़ा सस्पेंस पैदा करते हैं और मनोज कुमार जी को फ़ुरसत में भेज देते हैं और खुद जम जाते हैं उनकी कुर्सी पर, जिसका नाम है – फ़ुरसत में!

सप्ताहांत में उनके कार्यालय की छुट्टी और वे अपने मनपसंद किसी भी हलके फुल्के विषय पर नितांत अपनी बात कहते हैं. अपने सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत जीवन की कोई घटना या कोई विषय लेकर उसके आस-पास एक ताना बाना शब्दों का, भावनाओं का, सन्देश का, शुद्ध हास्य का या किसी व्यंग्य का. उनके व्यंग्य का केंद्र भी प्रायः वे स्वयं ही रहे हैं. एक मर्यादा, एक सीमा, एक शिष्टाचार, संबंधों का मान... यह सब उनकी फ़ुरसत में की रचनाओं में देखे होंगे आप सभी ने.

दिल्ली में रहते हुए, उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. कारण मेरा कार्यालय ऐसी जगह पर था जहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है. उनसे मिलकर कभी प्रतीत ही नहीं हुआ कि मैं भारत सरकार के किसी उच्च-पदस्थ पदाधिकारी से मिल रहा हूँ. कम बोलना, किसी बात पर मुस्कुराना शायद उनकी सबसे विस्तार से की गयी प्रतिक्रया होती होगी. क्योंकि उससे अधिक विस्तृत प्रतिक्रया वे व्यक्त करते ही नहीं.

मैं उनसे उम्र में ज़रा सा ही बड़ा हूँ या समवय भी कह सकते हैं. इस नाते मैंने उन्हें एक बार अनुज कहा और वो दिन और आज का दिन उन्होंने मुझे बड़े भाई के रूप में सम्मान दिया. जब भी उनकी कोई रचना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुई, उन्होंने मुझे अवश्य सूचित किया और जब उन्हें साहित्यिक गोष्ठी में कविता पाठ करने का आमंत्रण प्राप्त हुआ तो घबराहट और खुशी के मिले-जुले भावों के साथ उन्होंने मुझे खबर दी. यही नहीं जब कार्यक्रम सफल रहा, तो मुझे फोन पर ऐसे कहा जैसे कोई बच्चा अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर भागा चला आया हो यह कहता हुआ कि भैया मैं क्लास में फर्स्ट आया हूँ!!

किसी पोस्ट को लेकर यदि उन्हें तनिक भी संदेह होता कि इस विषय पर, इस बिम्ब पर, इस शब्द पर, इस मुहावरे पर, इस घटना पर कोई भी विवाद हो सकता है या किसी की भावना आहत हो सकती है, तो मुझे वो आलेख भेजकर मेरी राय अवश्य माँगते और मेरे सुझाव को बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेते हैं. बौद्धिक स्तर पर, जब हम दोनों ही ब्लॉग लिख रहे हैं और अलग-अलग लिख रहे हैं, उन्होंने हमेशा स्वयं को लक्ष्मण सिद्ध किया है. हाँ, मैंने भी जिस विषय में मेरी जानकारी न हो, कभी कोई राय नहीं दी.

सरकारी विभाग और सरकारी प्रतिष्ठानों में राजभाषा के नाम पर हिन्दी का चलन सिर्फ हिन्दी में हस्ताक्षर करना, दो चार पत्रों में नाम-पता लिख देना और सालाना जलसा मनाना भर होता है. खासकर मैं तो यही समझता था. लेकिन मनोज जी की लगन और राजभाषा के कार्यान्वयन के प्रति समर्पण देखकर मैं दंग रह गया. हमारे प्रतिष्ठान में राजभाषा अधिकारी के लिए साहित्य (हिन्दी अथवा अंग्रेजी) का डिग्रीधारक होना अनिवार्य है. अतः लाख काम करने के बाद भी मेरी गिनती सामान्य पदाधिकारी की ही रहने वाली है. बस, गुब्बारे से हवा निकल गई और आवश्यकता से अधिक काम करने का जज्बा समाप्त. मनोज जी ने इस काम को अपने कार्यालय में बखूबी सम्भाला और नगर स्तर पर तथा क्षेत्रीय स्तर पर अपने विभाग के साथ-साथ स्वयं के लिए भी कई सम्मान व प्रमाणपत्र प्राप्त किये. उनकी इसी लगन के कारण आज तीन-तीन ब्लॉग हैं उनके और वे नियमित लिख रहे हैं, अनवरत, एक सेवा भावना के साथ.

अब जब दिल्ली से जा रहा हूँ, मनोज जी से मिलना नहीं हो पायेगा. मिलना नहीं से तात्पर्य जितनी आसानी से हम उनके दिल्ली दौरे के दौरान मिल लेते थे, उतनी आसानी से नहीं. ब्लॉग जगत की बातें, साहित्य चर्चाएं, पारिवारिक बातें और पटना की पुरानी यादें. कई बार उन्होंने यह मलाल भी जताया कि उनकी किसी बात को किसी ने गलत समझ लिया और उनके ब्लॉग पर आना बंद कर दिया. एक टिप्पणी के कम होने से अधिक दुःख उन्हें एक मित्र के कम होने का रहा है. उनमें से कुछ के साथ मेरे बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं, लेकिन लाचार पाता हूँ खुद को. मैं उन्हें समझता हूँ यही काफी है उनके लिए भी और मेरे लिए भी!

आप सोच रहे होंगे कि अचानक आज मुझे क्या हो गया है कि मैं मनोज जी के ब्लॉग पर आकर, उनकी बातें कर रहा हूँ वो भी फ़ुरसत में और फ़ुरसत से! तो अपना तो सीधा-सादा उसूल है – दुश्मन की पिटाई उसके घर में जाकर करो और दोस्त की मीठी यादें उसके घर में बैठकर बांटो!

Manoj-salil

शनिवार, 5 मई 2012

फ़ुरसत में ... 101 : कीड़े, कविता और कृपा

फ़ुरसत में ... 101

कीड़े, कविता और कृपा

15012010007_thumbमनोज कुमार

‘द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन कहते हैं,“मनुष्य मूलतः तार्किक प्राणी है। वह पहले संदेह करता है और बाद में विश्वास।” हम भी विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं। अपनी भी आदत रही है – संदेह करो। तर्क करो। तर्क पर खरा उतरता है – तो विश्वास करो, वरना ख़ारिज कर दो। लेकिन कभी-कभी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ हो जाता है कि न संदेह करते बनता है, न तर्क करते और न ही विश्वास।

एक वाकया सुनाता हूं। एक बार एक भाई की ससुराल गए थे। हम तीन जने थे। भाभी और सालियों के साथ खूब हंसी-मज़ाक़ और चुहलबाजियां की। कुछ वृद्ध महिलाओं को वह अच्छा नहीं लगा होगा। अब यह उनका प्रताप था या कीड़े-मकोड़ों का प्रकोप, जब वापस आ रहे थे, तो गले के पास कुछ फोड़े से दिखे। स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते उनका आकार बढ़ गया और जलन होने लगी। स्टेशन पर एक बेंच पर बैठे कुछ अधनंगे साधु दिखे। हममें से एक ने कहा, “चलो साधु बाबा से कहते हैं कुछ ईलाज करने के लिए।” बाबा से हमने कहा, “बाबा ये देखिए फोड़ा हो गया है। कुछ ईलाज कर दीजिए।” बाबा ने ऊपर से नीचे देखा और फिर अपनी कड़क आवाज़ में बोले, “ईलाज चाहिए। नीचे से भभूत उठा।“ उन दिनों प्लेटफॉर्म उतना आधुनिक नहीं हुआ था। फर्श मिट्टी के ही थे। हमने कहा, “भभूत? ये तो मिट्टी है।” बाबा गरजे, “मिट्टी बोलता है। चल उठा।” अबकी बार बिना किसी प्रतिवाद के हमने मिट्टी उठाई। वे बोले, “लगा इसे।” हम लोगों ने उसे फोड़ों के ऊपर लगा लिया। कुछ ही देर में जलन गायब! बाबा ने पूछा, कुछ असर हुआ?” हमने कहा, “बिल्कुल ठीक हो गया।” यह सिर्फ़ हमारे साथ ही नहीं बाक़ी के हमारे दोनों भाइयों के साथ भी बिलकुल वैसा ही हुआ था। बाबा बोले, “किसी ने अगिन बान चला दिया था। बच गए।

अब तो बाबा में हमारी आस्था बढ़ गई थी हममें से एक कुछ ज़्यादा ही उत्साहित होकर उनसे बोला, “बाबा प्रसाद खिलाइए।” बाबा मुस्कुराते हुए बोले – “प्रसाद खाएगा?” हमने ‘हां’ कहा। बाबा बोले, “चल उठा।” फिर से वही आदेश। अब तो कुछ बोलने की हिम्मत हममें से किसी की नहीं हुई। पर कुछ देर तक हमें बिना किसी प्रतिक्रिया के खड़े देखा तो बाबा फिर से गरजे, “चल उठ !!” इस बार फिर से हमने प्लेटफॉर्म की मिट्टी उठाई। हाथ में उसके आते ही हम बोले, “बाबा यह तो ...!” हमारा वाक्य पूरा हो बाबा फिर गरजे चल खा। जितनी तेजी से वे गरजे उतनी ही तेजी से वह मिट्टी हमारे मुंह में थी! मगर आश्चर्य! उसका स्वाद पेड़े जैसा था। हम तो चकित थे। बाबा मुस्कुरा रहे थे। बोले, “कैसा लगा?” हमने बताया – “बिल्कुल पेड़े जैसा।” फिर हम बोले, “बाबा कुछ आशीर्वाद दीजिए।” वे बोले, “जा ऊपर वाले की कृपा बनी रहे।”

ऊपर वाले की कृपा ...! यह बहुत बड़ी बात है। कई बार ऊपर वाले की कृपा हम पर हो जाती है और हम विश्वास करने को तैयार नहीं होते। अकसर मज़ाक़ में उड़ा देते हैं – उसकी कृपा को। भूल जाते हैं कि उसकी कृपा हो जाए तो एक पल में वह आसमां पर बिठा देता है, और कृपा से मुंह मोड़ा तो दूसरे ही पल खाक में भी मिला देता है। उसकी कृपा कमाल की होती है और बनी रहे तो ज़ीरो को हीरो बनते देर नहीं लगती।

हम तो सरकारी-मुलाजिम हैं। हमसे ज़्यादा कौन इस बात की गवाही दे सकता कि सरकार में “ऊपर वाले” की कृपा का कितना महत्व है!! उनकी कृपा रहे तो “च्वायस पोस्टिंग” मिलती है, स्थानान्तरण अपने मन के मुताबिक होता है, मालदार सीट मिलती है। और कमाल यह कि जिनपर ऊपर वाले की कृपा होती है, वे अपने नीचे तो नीचे ऊपर वाले की भी नहीं सुनते। उनपर रौब जमाते हैं, मनमानी करते हैं। और करें भी क्यों नहीं, जब ऊपर वाले से सीधा कनेक्शन बन गया हो तो है!

मूढ़ प्राणी यह नहीं समझ पाता कि यह सब श्रद्धा, विश्वास और आस्था का खेल है। भक्ति में बड़ी शक्ति है। और शक्ति की आराधना तो हमारे देश में युगों-युगों से प्रचलित है। सबसे बड़ी श्रद्धा और भक्ति पूर्ण समर्पण में है। पूर्ण समर्पण का मतलब ऊपरवाले के इच्छा के विरुद्ध कोई तर्क नहीं। अर्थात जो भी घट रहा है उसकी मरजी से, और भविष्य में जो होगा उसकी मरजी से ही होगा। कुछ मूढ़ प्राणी, भक्ति की इस विचारधारा को अवैज्ञानिक सोच कहते हैं। क्योंकि उनकी नज़र में जो तर्क नहीं करते वे अवैज्ञानिक होते हैं, वे विश्वास करते हैं। जिन्हें संदेह या तर्क-वितर्क करना नहीं आता वे अवैज्ञानिक होते हैं। भाग्यवादी होते हैं। वे नया कुछ सोच ही नहीं सकते। वैज्ञानिक सोच ही व्यक्ति को कुछ नया करने को प्रेरित करती है।

किंतु सरकार के दरबार में बड़े साहब (भगवान) से लेकर बाबू (भक्त) तक की कृपा न हो तो मनोरथ सिद्ध नहीं होता। यहां श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से ही काम नहीं चलता। इसके साथ-साथ मंदिर में चढ़ावा भी बहुत महत्वपूर्ण है। जो जितना बड़ा चढ़ावा चढाता है, उसे उतना ही बड़ा आशीष मिलता है। सरकारी बाबू से लेकर संन्यासी बाबा तक इससे अछूते नहीं है। पिछले दिनों एक बाबा भी ने अपनी कृपा के बल पर काफ़ी सुर्खियाँ बटोरी। इस प्रकरण पर काफ़ी बहस हुई। दो स्थितियां हैं – एक मिथ, अंधविश्वास, रूढियों, कर्मकाण्डों की, तो दूसरी बुद्धि, विवेक, तर्क, सोच-विचार और ज्ञान की। एक पक्ष ने कहा कहीं न कहीं आस्था तो टिकनी ही है, जब सब जगह से निराश हो जाएं, तो जहां कहीं से आशा की किरण जीवन में प्रवेश करती है, वहीं शरण ले लेते हैं और यहां आने पर विज्ञान और तर्क बौने पड़ जाते हैं। दूसरा पक्ष यह कहता है कि, यह अवैज्ञानिक सोच है। यह हमे गुलाम बनाती है, कमज़ोर बनाती है। जब हम तर्क नहीं करते, संदेह नहीं करते, जो कहा जाता है वह मान लेते हैं, तो हमारा जीवन कीड़े-मकोड़ों सा हो जाता है।

सब अपनी-अपनी श्रद्धा और विश्वास है। जब हम एम.एस-सी. में पहुंचे तो विशेष विषय (Special Paper) के लिए हमारे पास कोशिका विज्ञान (Cytology), मत्स्य विज्ञान (Ichthyology), अनुवांशिकी (Genetics) आदि के होते हुए भी हमने कीड़ों-मकोड़ों (Entomology) में अपनी आस्था प्रकट की। घर में जब यह समाचार पहुंचा तो परिवार के लोगों के बीच ऐसी-ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि लगा मैंने कोई अवैज्ञानिक काम कर दिया हो। सबके चेहरे से प्रकट था कि इस विषय को चुनकर मैंने उनके अरमानों को कीड़े लगा दिए हों। मगर उन दिनों कीड़े-मकोड़ों के पीछे मेरा जुनून इस कदर था कि मैं देर रात तक बल्ब के नीचे पानी का टब रख देता और उसमें गिरकर फंसने वाले कीटों को जमा करता। जंगल-झाड़ियों में जा-जाकर कीटों को पकड़ लाता और उनकी पहचान कर खुश होता। मुझे ऐसा करते देख सब बेहद निराश होते।

मगर हम भी लगन के सच्चे, धुन के पक्के थे. कीट-प्रेम के साथ-साथ अपनी कविताई का कीड़ा भी कुलबुलाता रहा। कीड़ों के जीवन में एक बड़ा महत्वपूर्ण स्टेज आता है जिसे कैटरपिलर कहते हैं। उस की चाल-ढ़ाल का अध्ययन कर हमने अपने कीट और कविता प्रेम को मिलाकर एक कविता लिख दी। आप ने भी इस ब्लॉग पर वह कविता पढ़ी होगी। मेरे उस प्रेम को साहित्यिक पत्रिका “वागर्थ” ने सम्मानित किया और इस महीने (मई) के अंक में वह प्रकाशित हुई है। मुझे खुशी हुई कि ऊपर वाले की कृपा से मेरा कीड़े-मकोड़ों के प्रति प्रेम और आस्था व्यर्थ नहीं गई।

कविता इस लिंक पर भी है।

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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

फ़ुरसत में ... इतनी जल्दी नहीं मरूंगा ...!

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इतनी जल्दी नहीं मरूंगा ...!

मनोज कुमार

आज फ़ुरसत में हूं। पिछले सप्ताह दिल्ली गया था। अरुण चंद्र राय से राधारमण जी के दफ़्तर में भेंट हुई। मुझे तो पहली बार ‘योजना आयोग’ के भवन में जाने का और राधारमण जी के सौजन्य से किसी सरकारी दफ़्तर के कैंटीन में ‘सितारा’ होटल के बराबर का लंच करने का अवसर प्राप्त हो रहा था और मैं इस सौभाग्य पर हर्षित था। ‘योजना आयोग’ के भवन में गुज़ारे गए उस दो-तीन घंटे के वक़्त साथ ही अरुण और राधारमण जी के साथ की गई चर्चा पर फिर कभी फ़ुरसत में बात करूँगा। आज तो मुझे जिस विषय में कहना है वह, जो शेष है

वहां से जब चलने लगा तो अरुण ने मुझे एक पुस्तक थमाई और कहा, “सर! इसे पढ़कर देखिएगा। आपको निश्चित पसंद आएगी।” आने के बाद सप्ताह इतनी तेज़ी से और व्यस्तता में बीता कि उस पुस्तक को पढ़ ही नहीं पाया। आज फ़ुरसत में था, तो उसे उलटने-पुलटने लगा। जैसे ही उसकी भूमिका पढ़ना शुरू की– कि पुस्तक ने ऐसा बांध लिया कि उसके अंतिम पृष्ठ तक पढ़ गया। आज उस पुस्तक की चर्चा यहां नहीं करूंगा। .... उस पुस्तक के बारे में तो आप “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग पर पढ़ ही सकते हैं। आज तो मैं बस इतना ही कहने आया हूँ कि – इतनी जल्दी नहीं मरूंगा मैं। घबराइए मत, वास्तव में उस पुस्तक को पढ़ने के क्रम में, जब यह इस शीर्षक पर मेरी नज़र ठहरी, तो मेरी इसमें जिज्ञासा जगी। इस कविता में जो दो-तीन दृष्टांत दिए गए हैं, वे मुझे बहुत-बहुत अपने-से लगे, मानो खुद पर घटित-से हुए हों।

एक तो रेलवे के क्वार्टर का ज़िक्र और दूसरे पिता जी के रेलवे की नौकरी करने का ज़िक्र .. इन्हीं साम्यों से अपनी बात शुरू करता हूं। इन्हें पढ़कर कुछ पुरानी बातें याद हो चली हैं। वाकया अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों का है। तब मैं स्नातक का छात्र हुआ करता था। मेरे पिता जी पूर्वोत्तर रेलवे के एक साधारण कर्मचारी थे और हम ब्रह्मपुरा रेलवे कॉलोनी मुज़फ़्फ़रपुर के टाईप-II क्वार्टर के क्वार्टर संख्या 168-A में रहा करते थे।

टाईप-II क्वार्टर में 10X12 के दो कमरे हुआ करते थे, इसके अलावा एक किचन, एक टॉयलेट और एक बाथरूम। वह संयुक्त-परिवार का युग था और घर में 10-12 जन तो हमेशा रहते ही थे, जिनमें पिछली पीढ़ी के दादा और नानी भी शामिल थे। हम भाई-बहन उच्च कक्षा के स्तर पर आ चुके थे –उन सभी लोगों के बीच ही हमें पढ़ने की आज़ादी हासिल थी। समय के साथ, पढ़ने-रहने के क्षेत्र के विस्तार की आवश्यकता महसूस हुई और हमने बाहर के बरामदे को घेर कर अपना आश्रय-स्थल (अध्ययन-स्थल) निर्मित किया। एक चौकी डाली और उससे सटाकर एक टेबुल, पढ़ने के लिए इससे अधिक और क्या सुविधा चाहिए!

उन दिनों मेरा रूटीन ग़ज़ब का था। सुबह नौ-दस बजे तक घर से निकल जाता था, यार दोस्तों के यहां। गप-शप, पढ़ाई-लिखाई, घुमाई-फिराई करते रात के दस बजे के बाद ही घर लौटने का मेरा क्रम था। घर के लोग नियम से नौ, साढ़े-नौ बजे तक खा-पीकर सो जाते थे। घर का दरवाजा बंद कर दिया जाता था। मेरा खाना-पीना बाहर के टेबुल पर ढंक कर रखा होता। बिजली तो प्रायः नहीं ही रहती थी, इसलिए किरासन तेल से जलने वाला एक लालटेन भी मेरे टेबुल पर कम रोशनी में जलता रखा रहता था।

जिस रोज का वाकया सुनाने जा रहा हूं, उस रात साढ़े दस बजे घर लौटा था। टेबुल पर रखा खाना चौकी पर बैठकर खाया और फिर उसी चौकी पर सोने का इंतजाम करने लगा। सबसे पहले मसहरी को बिछौने के नीचे दबाया, उसके बाद पैर की तरफ़ रखी भागलपुरी चादर, जो ओढ़ने के काम आती थी, को उठाया। उसके उठाते ही, क़रीब ढाई-तीन हाथ का एक सांप लहराता हुआ चादर के नीचे से निकला।

मेरी, काटो तो खून नहीं वाली, स्थिति हो गई। मसहरी को लिए-दिए मैं तो किसी अनजाने आवेग से कूद गया। मेरे गिरने की ‘धम्म’ की आवाज़ और उसके बाद मेरे मुंह से निकलते गूं-गूं और घिघियाने की आवाज़ से घर के अन्य सदस्यों की नींद टूटी। दरवाजा खोल वे बाहर आए और मुझे ज़मीन पर पड़ा देख पूछने लगे – क्या हुआ है? किसी तरह गूं-गां, घी-घी करते हुए मैंने उन्हें समझाया कि बिस्तर पर सांप है। टेबुल पर रखे लालटेन की रोशनी मध्यम थी, और उसमें सब कुछ स्पष्ट दिखने लायक पर्याप्त रोशनी भी नहीं थी। टॉर्च की रोशनी में उस सांप को ढूंढ़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। बिस्तर आदि को हटाया गया, चौकी को उसके स्थान से हिलाया गया, तब कहीं जाकर उस सरीसृप ने भागना शुरू किया और फ़र्श पर रेंगता हुआ पानी के निकास के लिए बनाए गए छिद्र से निकलकर घर से बाहर अंधेरे में गुम हो गया।

इस घटना के बाद मां बोली थी, “बइच गेले रे बऊआ! नई त आईए ...” (बच गए मेरे बच्चे, नहीं तो आज ही ...)! एक माँ अपने पुत्र के विषय में इस वाक्य को पूरा भी तो नहीं कर सकती!

तब तक मेरा भय कम हो चुका था। मैंने हंसते हुए कहा था, “एत्ते जल्दी नई न मरबऊ”। (इतनी जल्दी नहीं मरूंगा)

आज इस पंक्ति को एक कविता के शीर्षक के रूप में देख कर, मुझे वह वाकया याद आ गया। ये पंक्तियां उस काव्य-संग्रह वह, जो शेष है की है, जिसे मैं आज पढ़ रहा था और इसके रचयिता हैं श्री राजेश उत्साही जी।

मैं राजेश उत्साही जी से कभी मिला नहीं, मगर यह पढ़कर वह, जो उन्हें कहना था …” ऐसा लगा मुझे कि – खूब-खूब मिला हूं उनसे। रचनाकार उत्साही से परिचय तो रहा है मेरा, ब्लॉगर उत्साही से नहीं। “ब्लॉगर” तो पढ़ने लायक़ रचनाओं के सृजन के अलावा भी बहुत कुछ करता रहता है। लेकिन जो सृजन में मस्त रहता है, उसे और कुछ पढ़ने, गढ़ने और करने की फ़ुरसत कहां होती है!

मैंने ब्लॉगर राजेश से परिचय न होने की बात इस संदर्भ में की कि यहां (ब्लॉग जगत में) दोस्ती (या परिचय) आदान-प्रदान की होती है, चैट-चाट की होती है, लिंक-फिंक की होती है। राजेश जी से शायद ही इस तरह की मेरी कभी कोई बात हुई हो, कम से कम मुझे तो याद नहीं…! इसके बावज़ूद, उनमें कुछ ऐसी बातें थीं, जो मुझे उनके ब्लॉग तक खींच ही लाती थीं। उनमें से एक हैं उनके द्वारा की गई टिप्पणियां। उनकी कुछेक टिप्पणियां वार करती थीं, चोट पहुंचाती थीं, ऐसा लगता था मानों ‘सटाक’ से लगा हो। पर यह उनका खास अंदाज़ था, … है!

यह आदमी तो हिम्मती है। सबसे ज़्यादा राजेश जी को लेकर अगर मेरी किसी से बात हुई तो वह अरुण से हुई है। राजेश जी जम कर उसकी आलोचना करते थे। और मन-ही-मन मैं सोचता कि ये उत्साही जी उत्साहित कम हतोत्साहित ज़्यादा करते हैं। राजेश जी से क्षमा याचना सहित यह बातें कहना चाहूंगा कि ये मेरे तबके विचार थे, जब मेरी मुलाक़ात उनसे नहीं हुई थी। उनसे मेरी मुलाक़ात तो आज ही हुई है। और वह भी वह, जो शेष है ... के ज़रिए।

वह, जो शेष है ... राजेश जी का पहला काव्य-संग्रह है। इसमें उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपनी बातें रखी हैं, -- वह जो मुझे कहना है ...के माध्यम से – और इसमें एक संपादक के साथ हुए पत्र-व्यवहार का ज़िक्र करते हुए लिखा है, - यदि मुझे किसी की रचना पर प्रतिक्रिया देनी होगी, तो मैं उसके बारे में जो ईमानदारी से सोचता हूं वही कहूंगा।

राजेश जी ने इस ईमानदारी को संजोकर रखा है और दुआ है कि वह ईमानदारी उनकी पूँजी के रूप में सुरक्षित रहे। कम-से-कम इस ब्लॉग-जगत में ईमानदारी से कहने वाले बहुत कम हैं।

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

फ़ुरसत में ... गठबंधन की सरकार!

फ़ुरसत में ... 97

गठबंधन की सरकार!

IMG_3649मनोज कुमार

पिछले दिनों इसी स्तंभ के तहत मैंने फ़ुरसतियाया था – गइल भईंस पानी में ..! आज उसे ही थोड़ा और डुबाता हूं – (बढ़ाता हूं)  – आगे बढ़ने से पहले, उस पोस्ट पर की गई कुछ टिप्पणियों की एक पंक्ति आपकी ख़िदमत में पेश करता हूं – बस आप समझ जाएंगे उसे आगे बढ़ाने का कारण।

१. प्रतिभा सक्सेना : यह तो अधूरी बात हुई आगे क्या-क्या हुआ वह कहानी तो सुनाइये.

२. Arvind Mishra : मेरे मन की जिज्ञासा दूर करें....क्या शादी और कहीं हुयी?

३. आशा जोगळेकर : यहां तो भैंस पानी में चली गई फिर बात बनी कैसे और कहाँ।

४. कौशलेन्द्र : एक अदद "क्रमशः" नामक शब्द के कहीं दर्शन नहीं हुए. उस क्रमशः का क्या हुआ ?

५. ajit gupta : आखिर में विकेट कैसे गिरा यह भी तो बता दीजिए।

इतने लोगों की जिज्ञासा के बाद लगा कि अब आगे की कथा सुना ही डालूं। पहले उस पोस्ट की उन पंक्तियों को यहां दोहराना निहायत ज़रूरी है –

कोई रिश्ते की बात करता तो --- परिवार वालों की तरफ़ से ‘लड़का ज़रा सेटल हो जाए!’ यह कहना सुनते ही मेरे मन में टेप बज उठता गइल भईंस पानी में!

जब यह टेप बार-बार बजा तो मेरे मन में खतरे की घंटियां बजने लगीं। मैंने सोचा अब बंधन में बंधने के लिए मुझे ही कुछ करना होगा। बंधन तो बहुत तरह के होते हैं। मुझे तो “गठबंधन” में बंधना था!

इस एक मात्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सबसे पहले मैंने अपने इर्द-गिर्द निगाहें दौड़ाईं फिराई। और हालात का जायज़ा लिया। ऐसा नहीं कि मेरी पुंगी नहीं बजी थी। “पुंगी?” … अरे वही जो आजकल ‘एजेंट विनोद’ की बज रही है। खैर, यह आज का ज़माना है इसलिए गाना और बजाना भी आज का ही है, जिसमें प्यार के गाने पुंगी पर बजते हैं। हमारे ज़माने में तो ‘तन-मन’ डोलता था, अजब बजती थी बांसुरी और गज़ब बजती थी ‘बीन’

ऐसा नहीं कि बीन बजी ही नहीं। दो-चार दफ़े तो बजी ही होगी। पर अपन के लिए ढाई अक्षर तो बस काला अक्षर बन चुका था, और जैसी की कहावत मशहूर है, वो भैंस बराबर ही होता है, शायद इसलिए वह भईंस बार-बार पानी में ही जाती रही – मतलब अपनी बीन बजी भी तो वहाँ भी वही भैंस जो उस धुन पर भी “मन डोले-तन डोले” के बजाय इत्मिनान से पगुराती रही।

मैंने अपनी एक नई धुन उस बीन पर बजा भी ली होती, लेकिन एक विकट समस्या थी। अगर हमने संपेरा बनकर बीन पर एक नई धुन छेड़ भी दी और उस धुन पर किसी का मन-मयूर नाच भी उठा और तब भी यदि घर वाले ना माने तो? … इसलिए घरवालों को ही बात छेड़नी थी। मगर घर में बीन नहीं बज रही थी, बज रहा था टेप… लड़का ज़रा सेटल हो जाए!

‘गइल भईंस पानी में!’

हालाँकि अपन पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड में काम करते थे, पर निगाहें सिविल सर्विसेज पर थीं और इसी अर्जुन वाली निगाह के कारण हमें “सेटल नहीं” माने जाने का माहौल बन चुका था। इस विधेयक पर घर की सरकार में एकमत से समवेत स्वर में बहुमत था – सांसदों की वेतन वृद्धि के मुद्दे पर एक सुदृढ़ गठबंधन सरकार की तरह। ऐसे में अगर मत अपने पक्ष में करना था, तो मुझे उनकी गठबंधन में सेंध लगानी थी। और सच्चे प्रजातांत्रिक धर्म का निर्वाह करते हुए मैंने लगाई भी।

गठबंधन में सबसे अहम काम झगड़े को सुलझाना होता है। कोई एक मुद्दा बाक़ी के मन के विरुद्ध उछाल दो, सब उसे सुलझाने/उलझाने में लग जाएंगे। आप अल्पमत में रहकर भी बहुमत वालों के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं। तभी तो गठबंधन की महिमा बड़ी न्यारी है। कई बार... कई क्या, बार-बार देखा गया है कि बहुमत वाले दल को नाकामयाबी का कड़वा फल मिलता है और अल्पमत वाला दल कुर्सी को उपलब्ध होता है।

जब मैंने बार-बार अपने अरमानों की भईंस को पानी में जाता देखा – यानी लड़का अभी सेटल तो हो ले – तो मैंने भी अपना आख़िरी दांव खेल ही दिया। गठबंधन में चाहे कितने भी वैचारिक मतभेद हो जाएँ, गठबंधन टूटने का खतरा कौन उठाता है! शायद गठबंधन की यही सबसे बड़ी कमज़ोरी है, और यही ताकत भी है। इसीलिये जिस दल के पास दो-चार ही सही, समर्थन हो, उनके पौ-बारह और कभी-कभी तो निर्दलीय भी अपना भाव जता/बता ही देते हैं।

खैर, मुझे विगत के अपने अनुभव और भविष्य के रुझान के लिए कोई निश्चित दिशा तो निर्धारित करनी ही थी। मुझे लगा कि अपने भविष्य को ध्यान में रखकर – कोई प्रस्ताव न रखना मेरी बेवकूफ़ी होगी। मैने अपना प्रस्ताव उनकी संसद के पटल पर इस अभिभाषण के साथ पेश किया कि यह आपका आखिरी मौक़ा है, गठबंधन धर्म निभाने का। या तो आप तय कर दें या फरवरी के बाद मैं खुद अपनी सरकार बनाने का प्रस्ताव ले आऊंगा। दूसरे शब्दों में हमने तीन महीने का नोटिस दे डाला था।

इस नंबर-गेम में मेरी नज़र “सरकार” पाने पर टिकी हुई थी। मैंने चैलेन्ज तो दे ही दिया था, मगर मुझे अच्छी तरह मालूम था कि गठबंधन तोड़ना भी आसान नहीं होता। फिर भी अपनी अधिकारिक स्थिति बनाए रखने के लिए मुझे संयम रखना था। अपने निजी विचार मैं प्रकट कर नहीं सकता था। गठबंधन का यह एक अद्भुत नियम है कि यहां निजी विचार दल की स्थिति कमज़ोर करते हैं। अब तो मेरी स्थिति तभी सुधारने की संभावना थी, जब मुझे कोई बाहर से समर्थन देने वाला हो।

मेरा फरमान (एलान) सुनकर उन्हें कुछ खतरे का अंदेशा हुआ – लेकिन ऐसा भी नहीं कि सब कुछ आनन फानन में तय हो गया हो। कुछ ख़रीद-फ़रोख़्त का तो सवाल ही नहीं था, फिर भी समस्या थी। सत्ता पक्ष ने मेरे अभिमत पर मुहर लगाने की ठान ली थी। लगा गठबंधन मज़बूत है, बच गया। बाहर से वही गठबंधन … मज़बूत दिखाई देती है, जिसमें विभिन्न पक्ष एक-दूसरे की भावना का सम्मान करें, चाहे वह मज़बूरी में ही लिया गया निर्णय हो। गठबंधन में स्पष्ट समझ बहुत ही महत्वपूर्ण है। चाहे वह छोटी हो या बड़ी, सभी घटकों के लिए आवश्यक है।

यहां कल तक मेरे मन की बात कोई समझने को तैयार नहीं था और आज जब मैंने समझाया तो उनके पास गठबंधन बचाने की मज़बूरी स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। एक तरफ़ उन लोगों के पास कोई खुला विकल्प नहीं था। न जाने कितनी बार, न जाने कितनी जगह, न जाने कितने लोगों के सामने यह टेप - लड़का ज़रा सेटल हो जाए! – बज चुका था कि सारे सर-समाज में लोग यही कहने लगे थे, “शरण बाबू के यहां तो जाना ही व्यर्थ है। वहां जाने से कहेंगे ‘लड़का ज़रा सेटल हो जाए’!”

इस खेल के बड़े-बड़े खिलाड़ी कह गए हैं कि गठबंधन के लिए विकल्प खुले रखना चाहिए। मेरे पास भी वैकल्पिक गठबंधन के लिए पर्याप्त संख्या-बल नहीं था। साहस और हिम्मत तो संख्या से ही आती है। कहने का मतलब वह भी नही था मेरे पास। न तो पुंगी बजा पाया था और न बीन ही।

बिना किसी विकल्प के मेरी स्थिति तो गैर अस्तित्व वाले हाई कमान की तरह थी। अब तो हमारी सत्ता हमारे हाथ से फिसलती नज़र आ रही थी। आखिर उचित विकल्प के अभाव में जो होते हैं उन्हें ऐसे गठबंधन निबाहते रखने की मज़बूरी भी होती है। मेरी भी थी।

जैसे किसी गठबंधन में सिर्फ इक्का-दुक्का लोग अपना खेल दिखाते हैं – भले ही उनका महत्व हाशिए पड़े आधारविहीन निर्दलीय की तरह ही क्यों न हो, या जो सिर्फ अगले चुनाव तक किसी तरह अपनी साख बनाए रखना चाहते हों, वैसे ही मेरे पक्ष में कुछ ऐसे ही लोग आए। पर कोई निदान न निकला। मेरे घोषणा-पत्र के मेरे वायदे - फरवरी तक... मेरे सामने थे। मेरी स्थिति उस सरकार की तरह हो गई थी, जिसे अब कोई करिश्माई ताकत ही बचा सकती थी। करिश्मा हुआ भी।

एक दिन पटना लॉ कॉलेज के हॉस्टल से, मैं अपने लॉज की तरफ़ जा रहा था। सशक्त क्षेत्रीय दल की तरह एक दूर की रिश्तेदार रिक्शे पर कहीं जा रही थीं। उन्होंने मुझे देखा, तो रिक्शा रुकवा लिया। पहले तो उन्होंने हालचाल लिया फिर पूछ बैठीं कि कहां रहते हो?

मैंने बताया – यहीं पास में महेन्द्रू पड़ाव पर। आप कहां जा रही हैं?

बोलीं – यहीं बगल में रानी घाट, मेरे भाई रहते हैं।

फिर उनका न जाने क्या मन हुआ, पूछ बैठीं – आपकी शादी (गठबंधन) हो गई है?

मैंने कहा - नहीं।

बोलीं – करोगे?

मैंने कहा – हां।

उन्होंने अपने भाई से बात की, उनके भाई ने मेरे माता-पिता से और हमारे गठबंधन की बात पक्की हो गई।

विगत से सबक लेते हुए अब तो मैंने एक कुशल गठबंधन खिलाड़ी की तरह सोच लिया था कि प्रत्येक अवसर का इस्तेमाल भविष्य के लिए अपनी छवि बनाए रखने के लिए करूंगा। इसलिए जब सरकार के साथ गठबंधन की शपथ लेने की घड़ी आई तो हमने पूरे मन-प्राण से गठबंधन का धर्म निभाने का संकल्प लिया।

IMG_3650हर गठबंधन का अपना धर्म होता है। “उस” गठबंधन धर्म को निभाने के लिए सात-सात वचन निभाने होते हैं। मतलब यहां तो सात जनम के लिए सात वचन का प्रोग्राम था। जब सेटल होने के लिए लॉन्ग कट रास्ता अपनाया तो परिणाम तो आपने पिछले अंक में देखा ही था (गइल भईंस पानी में)। इसलिए अब हम हर काम शॉर्ट और शीघ्र करने के आदी हो गए थे। इस सात वचन के झमेले में कौन पड़ता। मैंने पंडित से कहा देख भाई तू अपना काम कर, मैं इसे एक वचन में निपटा देता हूं – और मैंने अपना मंत्र पढ़ दिया –

जो  तुमको  हो  पसंद  वही   बात   कहेंगे।

तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।

वहां उपस्थित हर महिला ने मेरे इस वचन का ज़ोरदार तालियों से स्वागत किया। इस तरह हमारा गठबंधन पक्का हुआ।

*** ***

पुनश्च :

IMG_3653चौबीस बरसों से हमारी ‘गठबंधन’ वाली सरकार चल रही है। ऐसा नहीं है कि विवाद न हुए हों। लेकिन एक सफल गठबंधन का प्रथम नियम है कि झगड़े सुलझाने के लिए मज़बूत नेतृत्व की ज़रूरत होती है। हमारी गठबंधन में भी ऐसा ही है। सत्ता हमारे ही हाथ में है ... और गठबंधन सफल है ... वह इसलिए कि न सिर्फ़ इस गठबंधन को मैं मज़बूत नेतृत्व दे रहा हूं बल्कि गठबंधन धर्म को पूरी निष्ठा से निभा भी रहा हूं यह कहते हुए कि

जो  तुमको  हो   पसंद वही   बात  कहेंगे।

तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।

शनिवार, 24 मार्च 2012

फ़ुरसत में ... मुझे मेरा दोस्त मिल गया!

फ़ुरसत में ... 96

मुझे मेरा दोस्त मिल गया!

IMG_0130_thumb[1]मनोज कुमार

 

फ़ुरसत में हूं।

कभी-कभी जब फ़ुरसत में होता हूं, तो चिन्तन-मनन की प्रक्रिया चल पड़ती है। आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। आस-पास हमें हर दूसरा आदमी यह कहता हुआ मिल जाता है कि दुनिया बड़ी स्वार्थी है। ... और साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि सच्चे दोस्त नहीं मिलते। भले ही अपने-आप में लाख कमी हो, दोस्तों में प्रायः दो गुण अवश्य ढूँढते हैं, एक मार्गदर्शक और दूसरा राज़दार! जब कभी भी हम मुसीबत में हों, किसी दोराहे पर अटक गए हों, तो वह हमें सही रास्ता सुझाए और जो व्यक्तिगत या विशेष योजना बने या जो बातें हम आपस में बांटें, उसे अपने तक ही सीमित रखे। कुल मिलाकर वह मेरी कमियों को भी दिखाए और हमारे साथ भी चले।

दुनिया की भीड़ में कौन सही दोस्त है, कौन नहीं, इसकी तलाश चलती रहती है। आज फुरसत में हम भी एक कोशिश करके देख ही लेते हैं। काफ़ी सोच-विचार के बाद, अब सही दोस्त की तलाश में निकलने को हम और हमारा मन उद्यत हैं। बस अभी निकलने को ही थे कि एक एस.एम.एस. आता है। ‘इनबॉक्स’ में जाकर उसे देखता हूं। लिखा है –

“दुनिया में कभी सही दोस्त की तलाश में बाहर मत निकलना ... चूँकि आजकल गर्मी प्रचंड है और मैं घर के अंदर ए.सी. चलाकर बैठा होता हूं।”

सोचता हूँ – “हुंह! कैसे-कैसे लोग! कैसी-कैसी बातें!!” मैं एस.एम.एस. डिलिट करके बाहर निकल पड़ता हूं। मेरे साथ मेरा मन भी चल पड़ता है और शुरू होती है हमारी तलाश भी। सही और सच्चे दोस्त की तलाश।

लोग मिलते हैं, बिछड़ जाते हैं। हम निर्णय करने में देर करते रहते हैं। दिल कहता है - यही सही है, मन कहता है - सही निर्णय पर पहुंचने के लिए समय चाहिए। इसी वाद-विवाद के बीच, हम मन की सुन लेते हैं। अब मन तो मनमौजी है - भटकता रहता है और जब अटकता है – देर हो चुकी होती है। तब तक सही निर्णय भी ग़लत हो जाता है। सही निर्णय, सही समय पर न लिया जाए, तो सही होते हुए भी ग़लत हो जाता है। ऐसे में देर से लिया गया सही निर्णय भी किसी काम का नहीं रहता।

कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में कहा है, “सर्वज्ञस्यप्येकाकिनो निर्णयाभ्युपगमो दोषाय” अर्थात्‌अकेला व्यक्ति यदि सर्वज्ञ भी हो तो भी उसके निर्णय में दोष हो ही जाता है। अकेले तो मैं भी हूं। अकेले होने पर निर्णायक भी खुद ही बनना पड़ता है।

आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने पुनर्नवा में कहा है, “निर्णायक को पांच दोषों से बचना चाहिए – राग, लोभ, भय, द्वेष और एकान्त में वादियों की बातें सुनना।” इनमें से सारे ही दोष हममें विराजमान हैं और एक हम हैं, सोचते हैं कि - हम जो चाहते हैं – मन जो चाहता है - वह नहीं होता। हां, यह सच है कि मेरा मनचाहा कभी भी नहीं होता। आखिर ऐसा क्यों होता है?

हम चाहते हैं कि सब कुछ परफेक्ट हो, हमारे मन मुताबिक। मगर ऐसा होता नहीं। होने को कुछ और हो जाता है - पर वो नहीं होता जो हम चाहते हैं। फलतः हम स्व-निर्धारित व्यवस्था और मनोनुसार जीवन जी नहीं पाते।

जीवन में ऊँच-नीच, तो लगी ही रहती है। दाएं-बाएं, और आगे-पीछे भी। मनोनुसार जीवन नहीं चलता। इसका चलना-न-चलना हमारे हाथ में होता भी नहीं। लेकिन हम अपने जीवन में कुछ परफेक्ट मोमेंट्स भर तो सकते ही हैं। कुछ पंक्तियां याद आती हैं -

कैनवास पर तस्वीरें बनाने चला था

भरा रंग उस पर, मुझे जो मिला था

पर हुआ वही, जो था नसीब में होना

रीता रहा मेरे जीवन का कोई कोना

चलो ढूंढ़ें एकांत अपने लिए

जहां बना सकें वह तस्वीर मनचाही।

दुर्भाग्य, ऐसा हुआ नहीं, हर-बार तस्वीर अधूरी रह गई। आज फिर ऐसी किसी जगह की तलाश आ गया हूं।

एकांत और मौन है मेरे पास।

चहुं ओर पसरा मौन

मुझे मेरे करीब लाता है

मेरा स्वर निकल कर नयन से

मेरे मन में प्रवेश पाता है

मौन मन को भाता है

जग – जीवन से प्यार गहराता है।

इस एकांत में एक दिव्य-ज्योति दिखती है। एक आकृति जो हज़ार रंग लिए है – कुछ कहती है – अस्पष्ट – धुंधले मन पर वह अंकित होता है --- “तू करता है वह – जो तू चाहता है और होता वह है – जो मैं चाहता हूं!”

--- हां – हां – हां ... ... पर क्या करूं ?

-- “तू वो कर जो मैं चाहता हूं, फिर वह होगा जो तू चाहता है।”

***

आकृति अब नहीं है। वह शून्य में विलीन हो गई है।

अहा! आज जो मेरी एटर्नल-जर्नी हुई .. वह बहुत ही अच्छी रही। इस जर्नी से एक मोरल ऑफ द स्टोरी तो मिली ही मुझे –

“दिन में एक बार अपने आप से बात कर ही लेनी चाहिए, नहीं तो हम दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त के मिलने का अवसर गंवा बैठते हैं।”

- फ़ुरसत में आज अपने से मिला – मुझे मेरा सही दोस्त मिल गया!

***

शनिवार, 17 मार्च 2012

फ़ुरसत में ... देखी ‘कहानी’, आप भी देखिए

फ़ुरसत में ...95

देखी ‘कहानी’, आप भी देखिए

SDC11128_editedमनोज कुमार

मेरे लिए, इस सप्ताह की शुरुआत एक शानदार फ़िल्म से हुई। बहुत दिनों बाद एक ऐसी फ़िल्म देखी जिसमें शुरू से अंत तक थ्रिल बना रहा। आजकल हिंदी में ऐसी फ़िल्में बहुत कम ही बनती हैं। आम तौर पर हिंदी फ़िल्मों का पुनरावलोकन (रिव्यू) करते वक़्त अंग्रेज़ी अखबारों के समीक्षक पश्चिम का चश्मा पहन कर नाहक ही उसकी आलोचना करने लगते हैं। इस फ़िल्म के साथ भी ऐसा ही देखने-पढ़ने को मिला।

 

फिल्म “कहानी” भारतीय सिने-जगत के इतिहास में फिल्माई गई एक ऐसी कहानी है, जो वर्षों में एकाध बार लिखी जाती है और इस कहानी को परदे पर सफल बनाने में विद्या बालन ने जो महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उसे सालों-साल तक याद किया जाता रहेगा। एक के बाद एक सशक्त किरदार निभाकर विद्या अपनी एक्टिंग का लोहा तो मनवा ही रही हैं, अब उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि वे सिर्फ़ अपने दम पर फ़िल्म को सफलता के शिखर तक ले जा सकती हैं, और उसे हिट करा सकती हैं।

डर्टी पिक्चर के बाद, उन्हें न जाने किन-किन खिताबों से नवाज़ा गया, किंतु फ़िल्म “कहानी” में बिना किसी अंग-प्रदर्शन और ग्लैमर के उन्होंने साबित कर दिया है कि किसी चरित्र में जीवंत अभिनय के द्वारा कैसे जान फूंकी जा सकती है। पूरी फ़िल्म में न कोई नाच-गाना है, न कोई “ऊ ला ला” ही। मुख्य किरदार भी ऐसा जिसमें ग्लैमर या डर्टी दिखने और दिखाने का कोई चांस नहीं। एक महिला जो आठ-नौ महीने की गर्भवती है और उसका पति अचानक ग़ायब हो गया है। ऐसी कठिन परिस्थिति में उस महिला के लिए जीवन न तो सिल्क सा कोमल है न उसमें इश्क़िया होने का ही कोई चांस है। विद्या बालन ने ऐसी ज़बरदस्त पटकथा वाली इस फ़िल्म में उस ताकतवर स्त्री के किरदार को जीकर यह बताया है कि वे अपने उत्कृष्ट अभिनय के बल पर फ़िल्म में जान फूंक सकती हैं।

ग़ौर करने वाली बात है कि इस फ़िल्म में न कोई खान है, न कपूर, न ही कोई कुमार और न कोई फ़िल्म को हिट कराने वाला नाच-गाना, न आइटम नम्बर। फिल्म में जो प्रमुख पुरुष अभिनेता हैं उनके नाम से भी हिंदी फ़िल्म के दर्शक अनजान ही होंगे - परमब्रत चट्टोपाध्याय, नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी और इंद्रनील सेनगुप्त। इन्होंने भी अपने जानदार अभिनय से फ़िल्म में जान डाल दी है। फिल्म की कहानी भी बड़ी साधारण सी है। विदेश (लंदन) में रहने वाली एक गर्भवती महिला अपने “मिसिंग हसबैंड” को ढ़ूंढ़ने कोलकाता आती है और एक होटल में ठहरती है। कोलकाता पुलिस की मदद से वह अपने पति की तलाश में कोलकाता के गली-मुहल्ले की ख़ाक छानती फिरती है।

चूंकि यह फ़िल्म एक सस्पेंस थ्रिलर है, इसलिए इससे ज़्यादा कहानी बताना उन पाठकों के प्रति अन्याय होगा जिन्होंने यह फ़िल्म नहीं देखी है, लेकिन इतना कह सकता हूं कि शुरू से आखिर तक सांस रोके देखने को आप बाध्य हो जाएंगे। फिल्म में न किसी तरह के अनावश्यक लाईट-साउंड इफ़ेक्ट के द्वारा लोगों में डर पैदा करने की कोशिश की गई है, न फालतू की कोई कार चेज़िंग या मारधाड के दृश्य के द्वारा जबरन रोमांच ही ठूंसा गया है। अगर कुछ इस फ़िल्म को अन्य फ़िल्मों से अलग करता है, तो वह है सारे कलाकारों का सशक्त अभिनय, और उससे भी बढकर फ़िल्म का चुस्त निर्देशन। और फिल्म की रफ़्तार को दर्शकों के दिल की धडकन से मुकाबला करने वाली एडिटिंग के बिना फिल्म का यह रोमांच कभी संभव नहीं होता। एक भी फ़ालतू दृश्य नहीं, एक भी अनावश्यक डायलॉग नहीं। चुस्त पटकथा के कारण यह फ़िल्म इतनी सशक्त बन पड़ी है कि रोमांच अपने चरम पर है।

“झंकार बीट्स” से अपनी पहचान बनाने वाले फ़िल्म के निर्देशक सुजॉय घोष ने कोलकाता के परिवेश को दिखाने के लिए अनावश्यक रूप से फुटेज़ खाने की ज़रूरत नहीं समझी है, फिर भी कोलकाता का शायद ही कोई रंग छूटा हो। फ़िल्म अपनी रफ़्तार में चलती रहती है और कोलकाता का परिवेश, उसके गुण और उसकी विशेषताएं खुद-ब-खुद सामने आती रहती है। कोलकाता के परिवेश का इससे बढ़िया चित्रांकन शायद ही किसी फ़िल्म में देखा होगा। यह कमाल एक कुशल व प्रभावशाली संपादन और निर्देशन से ही संभव हो सका है। विशाल शेखर ने फ़िल्म में संगीत दिया है और अमिताभ बच्चन की आवाज़ में कविगुरु रविन्द्र नाथ टैगोर के गीत “एकला चलो रे” की प्रस्तुति भाव-विभोर कर देती है। यह गीत दर्शकों के लिए एक ऐसा कलात्मक उपहार है, जिसे आप वर्षों तक नहीं भूल पायेंगे।

फ़िल्म विद्या बालन की है, जो विद्या (बिद्या का नहीं) का ही किरदार निभाती है। कभी परिस्थितियों के आगे विवश भारतीय नारी बनकर अपने गुस्से का इज़हार करती, तो कभी बच्चों के साथ खुशियाँ शेयर करती हुई और कभी अपनी जान जोखिम में डालकर रोमांचक कारनामे अंजाम देती हुई, फिर भी कमाल ये कि ये सब कहीं से बनावटी या ज़बरदस्ती थोपा हुआ नहीं लगता।

इस “मस्ट सी” फ़िल्म में विद्या बालन का अभिनय कम से कम उन आलोचकों का मुंह ज़रूर बंद कर देगा जो उनके श्रेष्ठ अभिनय के लिए मिले राष्ट्रीय पुरस्कार पर उंगली उठा रहे थे।

शनिवार, 10 मार्च 2012

फ़ुरसत में … गोद में बच्चा और कोना में ढिंढोरा

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गोद में बच्चा और कोना में ढिंढोरा

मनोज कुमार

साल 2009 में दुर्घटनाबस हमारा ब्लॉग बन गया। नया-नया नेट लिए थे घर में, ब्रौडबैंड! नया मुरगी थोड़ा कुकरू कूं ज़्यादा करता है, सो समय-बेसमय बइठ जाते थे कंप्य़ूटर पर और एन्ने-ओन्ने घूमते रहते थे। जी-मेल में एकाउंट था नहीं, सो किसी तरह टो-टा के जी-मेल का एकाउंट खोले ही थे, कि एक ठो विज्ञापन टाइप का कुछ देखाई दिया - “ओपेन योर ब्लॉग, इइट्स फ़्री।“ माले मुफ़्त दिले बेरहम! मंगनी का कुच्छो मिले, त हम त टूटिए पड़ते हैं। ई त हमरा जनमजात स्वभाव था अऊर अब तो अधिकारो बन गया है।

बस, जो सब पूछता गया; भरते गए अऊर अंत में बोलिस कि कान्ग्रेचुलेशन!! आप एक ठो ब्लोग के मालिक हो गए हैं। पोस्ट लगाइए। हम त खुसी से ओइसहीं चिल्लाए जैसे यूरेका-यूरेका करके आर्केमीडिज चिल्लाया होगा। लगा कि देस का बड़का साहित्तकार बनने का कुंजी हमरे हाथ लग गया है अउर कुच्छे दिन में हम साहित्त्कार सब के अगिलका लाइन में बइठे हुए पाए जाएंगे।

जब बोला एगो पोस्ट ठेलिए, त हम एगो छोटका कहानी, जो पहिले से लिखा हुआ था, ओही पोस्ट कर दिए। हाथ पीछे ले जाकर अपना पीठ ठोके अऊर कम्प्युटर का मॉनिटर के तरफ ताक के, मने मन बुदबुदाए – “मनोज - द ग्रेट साहित्यकार!” तब हमरो नहीं मालूम था कि इसको ब्लोगिंग अउर इसको लिखे वाला को ब्लोगर कहते हैं। जल्दबाजी में ब्लोग का नामो अपने ही नाम पर धरा गया था। ओ घड़ी का मालूम था कि जो सवाल पूछा जा रहा है (अंगरेज़ी में प्रश्न था), ओही हमरे ब्लोग का नाम हो जाएगा अउर तब का मालूम था कि नाम कुछ अलगे टाइप का रखना चाहिए था। जइसे – आलू बुखारा, चस्मे-चिराग़, नूरे-नज़र ... कास! ऐसने कोनो नाम रख लिए होते ...! अपना नाम तो आज तक कोनो करामात दिखाया नहीं था, इहां का दिखाता।

पोस्टवा ठेलने के बाद हम अपने को ओहाँ खड़ा महसूस कर रहे थे, जहाँ सिनमा में अमिताभ अऊर राजनीति में लालकिसन आडबानी जी थे। उसके पहिले ब्लोग का मतलब ओही लोग का लिखल हम जानते थे। अखबार में ई लोग का नाम आता था - आज इन्होंने अपने ब्लोग पर ई लिखा, आज इन्होंने अपने ब्लोग पर ऊ लिखा।

ई सब हो जाने के बाद अपने मित्र अउर रिस्तेदार सबको बताए कि भाई हमहूं बरका आदमी हो गए हैं, काहे कि हमरो एक ठो ब्लोग है। दू-तीन दिन बीत गया। एक्को कमेंट नहीं आया। करन, अपना भतीजा, उसको भी बताए कि ई बात है। ऊ आई.टी. सेक्टर में काम करता है अऊर पहिले से एगो ब्लोग में मैथिली में कुछ लिखा करता था। त चचा का लाज बनाने के लिए हमरे ब्लोग पर आ के एगो टिप्पनी मार गया।

दोसर दिन एगो कबिता लगा दिए ब्लोग पर। एक दिन बाद सोभना चौरे जी का एगो कमेंट आया तब खुसी का ठिकाना नहीं रहा, बुझाया कि हमरा लिखना सार्थक हुआ. ऐसहिंए ‘कर्सर’ घुमा रहे थे, त गलती से कुछ क्लिक हो गया अऊर हम उनके ब्लोग पर पहुंचे। क्लिक-फ्लिक करके हमरा ज्ञान का गगरी भरने लगा अऊर जाने कि और भी बहुत सा ब्लॉग है, ब्लोगर हैं, विजेट है, एग्रीगेटर है आदि-आदि। एक रोज घूमते-घामते “चिट्ठाजगत” पर पहुंचे। वहां रजिस्ट्रेसन करबाया और कोई दस-बारह हजार का नम्बर मिला। ओहीं से जाने कि इहाँ पर टॉप पचास ब्लोग का लिस्ट होता है। उसका नम्बर ‘बिनाका गीत-माला’ के पायदान की तरह ऊपर-नीचे होता रहता है। हमरो जूनून सबार हो गया, ऊ पचास में घुसने का। अंदर का खबर मालूम हुआ कि जो जितना टिपियाएगा, उतना बड़ा ब्लोगर कहलाएगा, तो बिस्वस्त सूत्र से ज्ञात हुआ कि जो जितना टिप्पनी पाएगा, ओतना बड़ा ब्लोगर कहलायेगा। त हमहूं रात-रात भर जग के जगह-जगह टिपियाये फिरते थे।

हमरे बड़े-भाई हमको समझाए कि तुम काहे एन्ने-ओन्ने बौराये फिरते हो (उनके कहने का मतलब था कि कटोरा ले-के काहे…) पागल हो गए हो, ई बात नोट कर लो कि भीख माँगने से भीख मिलता है, साम्राज्य नहीं, साम्राज्य अर्जित करना पड़ता है, सामर्थ्य से!!

सेयर मार्केट के तरह ब्लोग का रेटिंग बढ़ता-घटता रहता था। का-का करामात होता था. आगे पोस्ट, पाछे पोस्ट, पोस्ट के ऊपर पोस्ट, गाली पर पोस्ट, पोस्ट पर गाली, नामी पोस्ट, बेनामी पोस्ट, ईनामी पोस्ट … हम सब छोटका ब्लोगर लफंदरगिरी करते रहते थे, अऊर बडका ब्लोगर लोग - दादा गिरी। कोनो न कोनो बात-बेबात लेकर लड़ाई-झगड़ा। उसपर नामी-बेनामी का टिपियाना। कभी एन्ने कुछ बोल आये, त ओन्ने धरा गए कि ऐसा क्या लिखे, काहे लिखे। एन्ने कोनो गट्टा पकड़ता, ओन्ने कोनो कॉलर धरता... का बताएं!! एकदम टूअर के तरह एन्ने-ओन्ने बौआते रहते थे। कभी अन्ताक्छरी खेल आते, त कभी गाली-गलौज बाले पोस्ट पर अपना गियान बघार आते। ई सब करते-धरते चिट्ठाजगत का हमरा रेटिंग घटते-घटते (इहाँ नंबर घटने का माने ऊंचाई पर पहुँचना होता था) सौ के नीचे आ गया। मगर हमरा किस्मत भी हमारे ब्लॉग के तरह एक्सीडेंटली लिखाया था, जैसहीं हमरा रेटिंग पचास से साठ के बीच में था कि चिट्ठाजगत ही बंद हो गया अऊर हमरा आस धरा का धरा रह गया कि कभी हम भी टॉप फ़िफ़्टी में पहुंचें।

आज न ऊ देबी है, न कराह। केतना लोग जो ई सब खेला के सूत्रधार थे आज नेपथ्य में चले गए हैं अऊर हैं भी, त हमको पता नहीं। अब हमहुं तो नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे बौउआते नहीं हैं। बड़े भाई की सलाह पर अमल कर लिए हैं भीख माँगने से भीख मिलता है, साम्राज्य नहीं.. साम्राज्य अर्जित करना पड़ता है सामर्थ्य से!! अब तो जो हमरे इहां आते हैं, हम भी उनके इहां ही जाते हैं। अपना दायरा (सामर्थ्य) सीमित हो गया है। कुछ नया लोग से दोस्ती हो गया है, तs कुछ पुराना लोग.... …! अब जाने भी दीजिए!!

मौसम की तरह ब्लोगजगत का तापमान भी आजकल अस्थिर रहता है। ऊ टाइम भी था मगर कुछ ज़्यादा ही था। एही हफ्ता के सुरुआत में मुम्बई/दिल्ली/देहरादून जाना था। ऊहां के एगो ब्लोगर मित्र से पूछे कि उहां का तापमान कैसा है? त ऊ बताए, दिन में गरम है.. भोर और रात में हल्का ठंड लगता है. एगो स्वेटर रख लीजियेगा.. या खुला जैकेट.. । अब हमरे पास जैकेट त चंडीगढ़ के ठंड वाला था। सोचे स्वेटर ही लेते जायेंगे। पछिला साल फरवरी में गए थे। वहां शाम होते होते एगो स्विटर खरीदना पड़ा था। सो रिस्क लेना ठीक नहीं था। जैकेट से एगो फ़ायदा था कि उसको सामने से खोल सकते हैं .. स्वेटर में गरमी लगा तो लादना पडता। खैर यात्रा दो दिन भर का है, लेकिन वापसी का फ़्लाइट आठ बजे वाला हैं सो शाम के लिए कुछ त रखना पड़ेगा। मित्र बताए हां रख लीजिए.. काहे कि नेगलेक्ट भी नहीं कर सकते हैं.. ठंडा का मिजाज पत्नी से ज्यादा सख्त है यहाँ पर!!

खैर! ब्लोगिंग से अउर कोई फायदा हुआ या नहीं एतना तो जरूर हुआ है कि कुछ निमन दोस्त बन गए हैं जिनके साथ चैटिया लेते हैं, उनके सहर जाते हैं तो बतियाइयो लेते हैं। केतना बार त हम लोगों के साथ का चैट भी छाप देते हैं "फुर्सत में" कभी वह मनोरंजक बन जाता है .. कभी मन-भंजक।

दरअसल चैट से जो पोस्ट निकलता है वह बहुत करामाती होता है ... इसका कारन भी है .. अपना पोस्ट में एक दिमाग काम करता है .. चैट में दो दिमाग लगा होता है .. यहाँ दो शैलियों का मिश्रण होता है.. यह एक त्वरित प्रतिक्रया होती है, जो नेचुरल होता है। सोच कर लिखिए त कुछ न कुछ कृत्रिम तो हो ही जाता है

अपने ब्लोगर मित्र से चैट करते-करते हमरा पोस्ट पूरा होने को आ गया। तभी ऊ कहते हैं चलिए अब गुड़ नाईट.. लापता गंज और एफ.आई.आर. का टाइम हो गया.. हम उनको बताते हैं अरे ऊ त साथ में चल ही रहा है ... हमारा त बाएं तरफ़ लैप टोप होता है दाएं तरफ़ टीवी … गर्दन घुमा-घुमा कर दुन्नो काम करते रहते हैं। … कभी कभी त लैप टोप के स्क्रीन में ही टीवी का सीन देख लेते हैं। माने कि गोद में बच्चा (लैपटॉप) और कोना में ढिंढोरा (टीवी)!

हाहहहह

शनिवार, 3 मार्च 2012

फ़ुरसत में ... तेरे नाल लव हो गया

फ़ुरसत में ... 93

तेरे नाल लव हो गया

IMG_0168मनोज कुमार

IMG_9d90m2जो ग़लतियां हम कर चुके होते हैं, उन्हें बार-बार दुहराने का मज़ा ही कुछ और है! चौबीस साल पहले जिस सुनहरे दिन यह ग़लती हुई थी, वह बीते सप्ताह के अंतिम दिन (हम नौकरी पेशा लोगों का सप्ताह तो सोमवार से ही शुरू होता है), यानी रविवार को था। उसके दो दिन पहले हम दिल्ली और देहरादून की यात्रा पर थे। यह यात्रा इस अवसर के प्रति हमारी लापरवाही नहीं थी, बल्कि सरकारी नौकर होने की मज़बूरी थी। लेकिन जो हमारी “सरकार” हैं, उन्हें मेरी इस मज़बूरी से भला क्या लेना-देना?

अंगरेज़ों की बनाई रीतीयँ मानें, तो शुभघड़ी मिडनाइट यानी ‘ज़ीरो-ज़ीरो आवर से ही शुरू हो जाती हैं। लिहाजा मुझे शनिवार-रविवार की मिडनाइट को घर में होना चाहिए था, पर मैं वापस लौटा रविवार के मिड-डे हो जाने पर। वेलेंटाइन डे पर कोई गिफ़्ट न दे पाने और उससे जुड़े “प्रेम-प्रदर्शन” का किस्सा तो आपको सुना ही चुका हूं। ... और वह वाकयात मेरे जेहन में थे ही, सो देहरादून में ही सोच लिया था कि लौटते हुए कुछ न कुछ लेकर ही जाऊंगा। समस्या थी कि क्या लूं? इन सब बातों में इतना अनाड़ी निकलूंगा, यह मुझे मालूम ही न था।

बाज़ार पहुंचकर जब मेरे मन में गिफ़्ट को लेकर चिंतन-मनन की प्रक्रिया चल रही थी, तो दूसरी ओर मेरी जेब में पड़े बटुए का मुझसे द्वन्द्व चल रहा था। जब मैंने ज्वेलरी शॉप की ओर निगाहे घुमाईं तो बटुए की गर्म सांसें तेज़ रफ़्तार हो चुकी थी। किसी तरह अपने मन को मना, जैसे ही मैं मुड़ा, बटुए ने राहत की सांस ली। सामने लेदर के सामान की एक दुकान दिखी। उसमें प्रवेश करते ही बटुए की धड़कन फिर तेज़ हो गई। एक ओर सामान पर लगा प्राइस टैग मुझे चिढ़ा रहा था कि किधर मुंह मारने चले आए और दूसरी ओर बटुआ मुझे धमका रहा था कि अब चलो भी। इस बार मैंने ही ठंडी सांसों (पर लगाम लगाई) पर क़ाबू पाया और चुपचाप बाहर निकल गया।

बाहर निकलते ही वैलेट ने गुहार लगाई – “जो भी लेना, उसके पहले अपनी नहीं तो कम-से-कम मेरी हैसियत को ध्यान में रखना।” इस गुहार के बाद मेरी चिंतन-मनन की प्रक्रिया काफ़ी तेज़ हो गई और उसकी विचारों की सूई साड़ी पर आकर अटक गई। आज तक तो साड़ी नहीं ख़रीदी थी। लेकिन शांतिपूर्ण कल के लिए आज का खतरा तो उठाना ही होगा।

वैसे तो साड़ियों की दुकानें तो कई थीं, पर एक में अपेक्षाकृत अधिक भीड़ थी। हमने सोचा वहीं जाकर देखें। जब अन्दर की धक्का-मुक्की से दो-चार हुए तो बात समझ में आई कि यहां तो सेल लगा है। हमने भी सोचा कि जब ओखल में सर डाल ही चुके हैं, तो मूसल से क्या डरना?

खरीदने वालों में से अधिकांश महिलाएं थीं, जो साड़ियों का विभिन्न कोणों से निरीक्षण कर उन्हें बड़ी बेरहमी से नकार रही थीं। श्रीमती जी के साथ एकाध बार साड़ी की दुकान में जाना तो हुआ है, पर उनकी उबाऊ साड़ी-चयन पद्धति ने हमेशा मुझमें इस कला के प्रति अरुचि ही पैदा की। इसलिए साड़ी ख़रीदते वक़्त उसके किन-किन भागों का निरीक्षण-परीक्षण करना होता है, उससे अनजान हमने उसकी फेस-वैल्यू, यानी रंग से अपनी संतुष्टि कर ली, उस पर लगा क़ीमत का टैग देखकर मेरे बटुए ने भी ठंडी सांसें भरकर मुझे इज़ाज़त दे ही दी, बोला, “ले-लो! बचे पैसों से घर भी आराम से पहुंच जाओगे।”

आनन-फानन में साड़ी खरीद कर जब मैं दुकान के बाहर आ रहा था, तो शंकाओं के बादल ने मुझे घेर लिया था – पता नहीं पसंद आएगी भी या नहीं? चलो जो होगा देखा जाएगा। कोलकाता हवाई अड्डे पर विमान के उतरते ही, देहरादून और दिल्ली की ठंड से बचने के लिए पहना गया स्वेटर भी शरीर से उतर गया। फिर घर तक की एक घंटे की यात्रा रश-आवर में डेढ़ घंटे की हो गई, ... और हमने पसीने से भींगे तन और सहमे हुए मन के साथ गृह-प्रवेश किया तो गृह-स्वामिनी का चेहरा – ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर” टाइप का पाया।

images (1)“आ गए?”, (जैसे दिखा ही नहीं मैं), “कैसा रहा सम्मेलन?” (जैसे फोन पर बताया नहीं था), आदि-आदि, इस तरह के तटस्थ और औपचारिक प्रश्नों के आदान-प्रदान के बाद उनकी निर्विकार चेहेरे के साथ शांत उपस्थिति और बच्चों का हमारे आस-पास मंडराना, हमें उचित अवसर प्रदान ही नहीं कर रहा था कि मैं उन्हें हमारी मैरिज एनिवर्सरी विश कर सकूं। उचित अवसर की तलाश में जब मेरा धैर्य चुकने लगा, तो फाइनली बैग में पड़े साड़ी का पैकेट निकाल कर मैंने हौले से उन्हें प्रदान किया।

उनके चेहरे पर न हंसी थी, न ही रोष। एक अनमना-सा प्रश्न उछाला उन्होंने, “क्या है ये?”

“साड़ी!” (मेरी अवाज़ की तीव्रता की कल्पना आप कर सकने में सक्षम हों तो कर लीजिए)

“किसके लिए है?”

“आपके लिए ही।”

“क्यों?”

“एनिवर्सरी गिफ़्ट ...”

“अच्छा! बड़ा याद रहता है ना आपको ... (मेरे लिए गिफ़्ट लाना) ! सस्ते में मिल गया होगा, उठा लाए होंगे कहीं से!”

“अरे नहीं! कल मैंने .. खास इसी मौक़े के लिए ली है।”

(ऊपर से) अनमने ढंग से उन्होंने पैकेट खोला और उसके रंग को देखते ही बिफ़र पड़ीं, - “ये कैसा रंग हुआ? हरा-हरा! (छिः) ... मैं यह सब नहीं पहनती। ... (चौबीस साल हो गए, मेरी पसंद ना-पसंद की भी समझ नहीं है।)”

मैंने कहा, -- “कितना अच्छा तो है! ... पहनोगी तो हरी-भरी दिखोगी!! ... और तुम्हें देखकर हमारी तबियत भी हरी हो जाएगी ...।”

इसी बीच साड़ी पूरी फैलाई जा चुकी थी। “छिः ... ये क्या कंबीनेशन है?! ... आंचल पीला और ब्लाऊज पीस जामुनी रंग का!! ... पैसे ठग लिए उसने (तुम्हें उल्लू बना दिया) । मैं तो यह पहन ही नहीं सकती किसी भी हालत में। अरे भाई! लाने का मन रहे तब ना कोई ढंग की चीज़ लाया जाए। खाली दिखाने के लिए फुटपाथ से जो मिला ले आए उठाकर।”

आज पता चला कि उनके और मेरे सौंदर्य-बोध में कितना का फ़र्क़ है। गिफ़्ट से महिलाएं प्रसन्न होती होंगी, लेकिन उसके लिए गिफ़्ट का मन लायक़ होना भी एक इम्पौर्टेंट फ़ैक्टर है। यहां तो हमने अपनी सौंदर्य-दृष्टि से उसका (मेरा तात्पर्य साडी से है) चयन किया था। यह तो साबित हो ही चुका था कि उनकी दृष्टि कुछ और ही तलाश कर रही थी। कभी-कभार यह तुलना भी मन पर हावी रहती है कि उसकी साड़ी ऐसी है, तो मुझे भी वैसी ही चाहिए।

Kharch-Karo-Kaman-Khud-aa-Jayega-Funnyमुझे लगा मैं कठघरे में खड़ा कर दिया गया हूं और मुझे आई.पी.सी. (इन्डियन पत्नी कोड) की हर धाराओं के अंतर्गत दोषी करार दिया गया। अब तो सज़ा सुनाना भर बाक़ी था, अब इससे पहले ही मुझे ज़मानत का इंतज़ाम कर लेना चाहिए। मैंने तुरंत अरज़ी दी, “तुम नहा-धोकर तैयार हो जाओ,, मैं मिठाई लेकर आता हूं।” अन्य किसी प्रश्न का वार हो, उसके पहले ही मैं घर से बाहर निकल आया था।

रास्ते में मेरे मन में कुछ विचार घुमड़ रहे थे। दाम्पत्य जीवन को निभाते हुए भी हम यह विश्वास पाले रहते हैं कि हम एक-दूसरे को समझते हैं, समझा सकते हैं। समझाना आसान है, समझना मुश्किल। समझाना आत्म-मुग्धता है, समझना आत्म-मंथन। हम इतने आत्म-मुग्ध होते हैं कि हमें लगता है सबसे ज़्यादा गुणी और ज्ञानी तो हम ही हैं। अकसर ऐसी परिस्थितियों में हम एक-दूसरे को समझाने में ही लगे रहते हैं, समझने में नहीं। परिणाम ... ?! ... सम्पन्न किए गए काम में से निरंतर दूसरे पक्ष द्वारा ग़लतियां निकाल दी जाती हैं, और तब हमें लगता है कि हम भ्रम में ही थे कि हम एक-दूसरे को समझते हैं।

मिठाई लेकर घर वापस आया, तो देखा कि श्रीमती जी पूजाघर में रमी हुई थीं। आम गृहिणियाँ इस दिन क्या दुआ मांग सकती हैं भला! ... आपको लगता है, बताने की ज़रूरत है क्या? नहीं न। हां जो बताने की ज़रूरत है वह यह कि वही साड़ी पहनकर वो पूजा कर रही थीं। मेरी तो बांछे खिल गईं। आज इतना तो साबित हो ही गया कि स्त्रियाँ प्रेम से दिया कोई तोहफा खुशी-खुशी क़ुबूल कर लेती हैं!

पूजा के बाद जब हम डायनिंग टेबुल पर जमे थे, तो हमने प्रस्ताव रखा, -- “कहीं घूमने चलें?”

“कहां?”

“कहीं भी।”

“ ... ये कोई बात हुई? पागल की तरह कहीं भी चले जाएं। ...”

मुझे जो सबसे पहले जगह सूझी उसी का प्रस्ताव रखा, “मंदिर चलते हैं ... दक्षिणेश्वर!”

“हां, -- तुम्हरे लिए दोपहर में मंदिर के कपाट खोलकर रखे होंगे ना ...”

“तो, ... विक्टोरिया या मिल्लेनियम पार्क चलते हैं।”

“अब इस उमर में तुम्हें तो यही सूझेगा ही! ...”

“तो, यूं ही ... मार्केट आदि घूम आते हैं।”

“इतनी कड़ी धूप में मुझे कहीं नहीं जाना।” उन्होंने अपनी तरफ़ से पटाक्षेप कर दिया।

मैंने अंतिम मोहरा फेंका, -- “तो, फ़िल्म ही देख आते हैं।”

इस बार उनका स्वर असहमति वाला नहीं था, “कौन-सी?”

मैंने कहा, “दो फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं ... एक माधवन की और दूसरी रितेश देशमुख की। बोलो कौन-सी चलना है देखने?”

उनका स्वर थोड़ा और सहमति वाला हो गया था, -- “आप ही डिसाइड कर लीजिए।”

मैंने ठंडी सांस छोड़ी, और अपना निर्णय सुनाया, “जोड़ी ब्रेकर चलते हैं।”

सुनते ही वही बदला स्वर – “हां-हां, आज के दिन इससे बेहतर आपको और क्या सूझ सकता है? आप तो चाहते ही यही हैं कि किसी तरह छुटकारा मिले।”

images (61)आज तो मेरा हर दाँव ही उलटा पड़ रहा था। ये ... फ़िल्मवालों को क्या हो गया है? कैसी-कैसी फ़िल्में बनाते हैं? कम-से-कम नाम तो ढंग का हो। मैं दूसरी फ़िल्म का नाम लेता, उसके पहले अर्द्धागिनी खुद ही बोल पड़ीं, “आप तो तेरे नाल लव हो गया कहने से क्या देखने से भी रहे।”

मैंने कहा, “अब दो-दर्जन साल साथ तुम्हारे रहकर मुझे कहना पड़ेगा क्या – तेरे नाल लव हो गया?”

***

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

फ़ुरसत में … प्रेम-प्रदर्शन

फ़ुरसत में … 92

प्रेम-प्रदर्शन

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मनोज कुमार

एक वो ज़माना था जब वसंत के आगमन पर कवि कहते थे,

डाउनलोड करें (1)अपनेहि पेम तरुअर बाढ़ल

कारण किछु नहि भेला ।

साखा पल्लव कुसुमे बेआपल

सौरभ दह दिस गेला ॥ (विद्यापति)

आज तो न जाने कौन-कौन-सा दिन मनाते हैं और प्रेम के प्रदर्शन के लिए सड़क-बाज़ार में उतर आते हैं। इस दिखावे को प्रेम-प्रदर्शन कहते हैं। हमें तो रहीम का दोहा याद आता है,

रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांके तीन॥

खैर, खून, खांसी, खुशी, बैर, प्रीति, मद-पान।

रहिमन दाबे ना दबत जान सकल जहान॥

हम तो विद्यार्थी जीवन के बाद सीधे दाम्पत्य जीवन में बंध गए इसलिए प्रेमचंद के इस वाक्य को पूर्ण समर्थन देते हैं, “जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं, केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, वह तो रूप की आसक्ति मात्र है --- जिसका कोई टिकाव नहीं।”

उस दिन सुबह-सुबह नींद खुली, बिस्तर से उठने जा ही रहा था कि श्रीमती जी का मनुहार वाला स्वर सुनाई दिया, “कुछ देर और लेटे रहो ना।”

जब नींद खुल ही गई थी और मैं बिस्तर से उठने का मन बना ही चुका था, तो मैंने अपने इरादे को तर्क देते हुए कहा, “नहीं-नहीं, सुबह-सुबह उठना ही चाहिए।”

“क्यों? ऐसा कौन-सा तीर मार लोगे तुम?”

मैंने अपने तर्क को वजन दिया, “इससे शरीर दुरुस्त और दिमाग़ चुस्त रहता है।”

अब उनका स्वर अपनी मधुरता खो रहा था, “अगर सुबह-सुबह उठने से दिमाग़ चुस्त-दुरुस्त रहता है, तो सबसे ज़्यादा दिमाग का मालिक दूधवाले और पेपर वाले को होना चाहिए।”

“तुम्हारी इन दलीलों का मेरे पास जवाब नहीं है।” कहता हुआ मैं गुसलखाने में घुस गया। बाहर आया तो देखा श्रीमती जी चाय लेकर हाज़िर हैं। मैंने कप लिया और चुस्की लगाते ही बोला, “अरे इसमें मिठास कम है ..!”

श्रीमती जी मचलीं, “तो अपनी उंगली डुबा देती हूं .. हो जाएगी मीठी।”

मैंने कहा, “ये आज तुम्हें हो क्या गया है?”

“तुम तो कुछ समझते ही नहीं … कितने नीरस हो गए हो?” उनके मंतव्य को न समझते हुए मैं अखबार में डूब गया।

मैं आज जिधर जाता श्रीमती जी उधर हाज़िर .. मेरे नहाने का पानी गर्म, स्नान के बाद सारे कपड़े यथा स्थान, यहां तक कि जूते भी लेकर हाजिर। मेरे ऑफिस जाने के वक़्त तो मेरा सब काम यंत्रवत होता है। सो फटाफट तैयार होता गया और श्रीमती जी अपना प्रेम हर चीज़ में उड़ेलती गईं।

मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा था। अत्यधिक प्रेम अनिष्ट की आशंका व्यक्त करता है।

जब दफ़्तर जाने लगा, तो श्रीमती जी ने शिकायत की, “अभी तक आपने विश नहीं किया।”

मैंने पूछा, “किस बात की?”

बोलीं, “अरे वाह! आपको यह भी याद नहीं कि आज वेलेंटाइन डे है!”

ओह! मुझे तो ध्यान भी नहीं था कि आज यह दिन है। मैं टाल कर निकल जाने के इरादे से आगे बढ़ा, तो वो सामने आ गईं। मानों रास्ता ही छेक लिया हो। मैंने कहा, “यह क्या बचपना है?”

उन्होंने तो मानों ठान ही लिया था, “आज का दिन ही है, छेड़-छाड़ का ...”

मैंने कहा, “अरे तुमने सुना नहीं टामस हार्डी का यह कथन – Love is lame at fifty years! यह तो बच्चों के लिए है, हम तो अब बड़े-बूढ़े हुए। इस डे को सेलिब्रेट करने से अधिक कई ज़रूरी काम हैं, कई ज़रूरी समस्याओं को सुलझाना है। ये सब करने की हमारी उमर अब गई।”

“यह तो एक हक़ीक़त है। ज़िन्दगी की उलझनें शरारतों को कम कर देती हैं। ... और लोग समझते हैं ... कि हम बड़े-बूढ़े हो गए हैं।

“बहुत कुछ सीख गई हो तुम तो..।”

वो अपनी ही धुन में कहती चली गईं,

“न हम कुछ हंस के सीखे हैं,

न हम कुछ रो के सीखे है।

जो कुछ थोड़ा सा सीखे हैं,

तुम्हारे हो के सीखे हैं।”

images (1)मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिए विषय बदला, “पर तुम्हारी शरारतें तो अभी-भी उतनी ही अधिक हैं जितनी पहले हुआ करती थीं ...”

उनका जवाब तैयार था, “हमने अपने को उलझनों से दूर रखा है।”

उनकी वाचालता देख मैं श्रीमती जी के चेहरे की तरफ़ बस देखता रह गया। मेरी आंखों में छा रही नमी को वो पकड़ न लें, ... मैंने चेहरे को और भी सीरियस कर लिया। चेहरे को घुमाया और कहा, “तुम ये अपना बचपना, अपनी शरारतें बचाए रखना, ... ये बेशक़ीमती हैं!”

अपनी तमाम सकुचाहट को दूर करते हुए बोला, “लव यू!”

और झट से लपका लिफ़्ट की तरफ़।

शाम को जब दफ़्तर से वापस आया, तो वे अपनी खोज-बीन करती निगाहों से मेरा निरीक्षण सर से पांव तक करते हुए बोली, “लो, तुम तो खाली हाथ चले आए …”

“क्यों, कुछ लाना था क्या?”

बोलीं, “हम तो समझे कोई गिफ़्ट लेकर आओगे।”

मन ने उफ़्फ़ ... किया, मुंह से निकला, “गिफ़्ट की क्या ज़रूरत है? हम हैं, हमारा प्रेम है। जब जीवन में हर परिस्थिति का सामना करना ही है तो प्रेम से क्यों न करें?

लेकिन वो तो अटल थीं, गिफ़्ट पर। “अरे आज के दिन तो बिना गिफ़्ट के नहीं आना चाहिए था तुम्हें, इससे प्यार बढ़ता है।”

मैंने कहा, “गिफ़्ट में कौन-सा प्रेम रखा है? ...” अपनी जेब का ख्याल मन में था और ज़ुबान पर, “जो प्रेम किसी को क्षति पहुंचाए वह प्रेम है ही नहीं।” मैंने अपनी बात को और मज़बूती प्रदान करने के लिए जोड़ा, “टामस ए केम्पिस ने कहा है – A wise lover values not so much the gift of the lover as the love of the giver. और मैं समझता हूं कि तुम बुद्धिमान तो हो ही।”

उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आज ... यानी प्रेम दिवस पर उनके प्रेम कभी भी बरस पड़ेंगे। मेरा बार बार का एक ही राग अलापना शायद उनको पसंद नहीं आया। सच ही है, जीवन कोई म्यूज़िक प्लेयर थोड़े है कि आप अपना पसंदीदा गीत का कैसेट बजा लें और सुनें। दूसरों को सुनाएं। यह तो रेडियो की तरह है --- आपको प्रत्येक फ्रीक्वेंसी के अनुरूप स्वयं को एडजस्ट करना पड़ता है। तभी आप इसके मधुर बोलों को एन्ज्वाय कर पाएंगे।

मैंने सोचा मना लेने में हर्ज़ क्या है? अपने साहस को संचित करता हुआ रुष्टा की तरफ़ बढ़ा।

“हे प्रिये!”

“क्या है ..(नाथ) ..?”

“(हे रुष्टा!) क्रोध छोड़ दे।”

“गुस्सा कर के मैं कर ही क्या लूंगी?”

“मुझे अपसेट (खिन्न) तो किया ही ना ...”

“हां-हां सारा दोष तो मुझमें ही है।”

“चेहरे से से लग तो रहा है कि अब बस बरसने ही वाली हो।”

“तुम पर बरसने वाली मैं होती हूं ही कौन हूं?”

“मेरी प्रिया हो, मेरी .. (वेलेंटाइन) ...”

“वही तो नहीं हूं, इसी लिए ,,, (अपनी क़िस्मत को कोस रही हूं) ...”

"खबरदार! ऐसा कभी न कहना!!"

"क्यों कहूंगी भला! मुझे मेरा गिफ्ट मिल जो गया. सब कुछ खुदा से मांग लिया तुमको मांगकर!"

"........................"

***

हमारे जीवन में हमारा प्रेम-प्रदर्शन इसी तरह होता आया है।

इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांति भवन में टिक रहना

किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं

अथवा उस आनन्द भूमि में जिसकी सीमा कहीं नहीं। (जयशंकर प्रसाद)

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