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शनिवार, 24 मार्च 2012

फ़ुरसत में ... मुझे मेरा दोस्त मिल गया!

फ़ुरसत में ... 96

मुझे मेरा दोस्त मिल गया!

IMG_0130_thumb[1]मनोज कुमार

 

फ़ुरसत में हूं।

कभी-कभी जब फ़ुरसत में होता हूं, तो चिन्तन-मनन की प्रक्रिया चल पड़ती है। आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। आस-पास हमें हर दूसरा आदमी यह कहता हुआ मिल जाता है कि दुनिया बड़ी स्वार्थी है। ... और साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि सच्चे दोस्त नहीं मिलते। भले ही अपने-आप में लाख कमी हो, दोस्तों में प्रायः दो गुण अवश्य ढूँढते हैं, एक मार्गदर्शक और दूसरा राज़दार! जब कभी भी हम मुसीबत में हों, किसी दोराहे पर अटक गए हों, तो वह हमें सही रास्ता सुझाए और जो व्यक्तिगत या विशेष योजना बने या जो बातें हम आपस में बांटें, उसे अपने तक ही सीमित रखे। कुल मिलाकर वह मेरी कमियों को भी दिखाए और हमारे साथ भी चले।

दुनिया की भीड़ में कौन सही दोस्त है, कौन नहीं, इसकी तलाश चलती रहती है। आज फुरसत में हम भी एक कोशिश करके देख ही लेते हैं। काफ़ी सोच-विचार के बाद, अब सही दोस्त की तलाश में निकलने को हम और हमारा मन उद्यत हैं। बस अभी निकलने को ही थे कि एक एस.एम.एस. आता है। ‘इनबॉक्स’ में जाकर उसे देखता हूं। लिखा है –

“दुनिया में कभी सही दोस्त की तलाश में बाहर मत निकलना ... चूँकि आजकल गर्मी प्रचंड है और मैं घर के अंदर ए.सी. चलाकर बैठा होता हूं।”

सोचता हूँ – “हुंह! कैसे-कैसे लोग! कैसी-कैसी बातें!!” मैं एस.एम.एस. डिलिट करके बाहर निकल पड़ता हूं। मेरे साथ मेरा मन भी चल पड़ता है और शुरू होती है हमारी तलाश भी। सही और सच्चे दोस्त की तलाश।

लोग मिलते हैं, बिछड़ जाते हैं। हम निर्णय करने में देर करते रहते हैं। दिल कहता है - यही सही है, मन कहता है - सही निर्णय पर पहुंचने के लिए समय चाहिए। इसी वाद-विवाद के बीच, हम मन की सुन लेते हैं। अब मन तो मनमौजी है - भटकता रहता है और जब अटकता है – देर हो चुकी होती है। तब तक सही निर्णय भी ग़लत हो जाता है। सही निर्णय, सही समय पर न लिया जाए, तो सही होते हुए भी ग़लत हो जाता है। ऐसे में देर से लिया गया सही निर्णय भी किसी काम का नहीं रहता।

कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में कहा है, “सर्वज्ञस्यप्येकाकिनो निर्णयाभ्युपगमो दोषाय” अर्थात्‌अकेला व्यक्ति यदि सर्वज्ञ भी हो तो भी उसके निर्णय में दोष हो ही जाता है। अकेले तो मैं भी हूं। अकेले होने पर निर्णायक भी खुद ही बनना पड़ता है।

आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने पुनर्नवा में कहा है, “निर्णायक को पांच दोषों से बचना चाहिए – राग, लोभ, भय, द्वेष और एकान्त में वादियों की बातें सुनना।” इनमें से सारे ही दोष हममें विराजमान हैं और एक हम हैं, सोचते हैं कि - हम जो चाहते हैं – मन जो चाहता है - वह नहीं होता। हां, यह सच है कि मेरा मनचाहा कभी भी नहीं होता। आखिर ऐसा क्यों होता है?

हम चाहते हैं कि सब कुछ परफेक्ट हो, हमारे मन मुताबिक। मगर ऐसा होता नहीं। होने को कुछ और हो जाता है - पर वो नहीं होता जो हम चाहते हैं। फलतः हम स्व-निर्धारित व्यवस्था और मनोनुसार जीवन जी नहीं पाते।

जीवन में ऊँच-नीच, तो लगी ही रहती है। दाएं-बाएं, और आगे-पीछे भी। मनोनुसार जीवन नहीं चलता। इसका चलना-न-चलना हमारे हाथ में होता भी नहीं। लेकिन हम अपने जीवन में कुछ परफेक्ट मोमेंट्स भर तो सकते ही हैं। कुछ पंक्तियां याद आती हैं -

कैनवास पर तस्वीरें बनाने चला था

भरा रंग उस पर, मुझे जो मिला था

पर हुआ वही, जो था नसीब में होना

रीता रहा मेरे जीवन का कोई कोना

चलो ढूंढ़ें एकांत अपने लिए

जहां बना सकें वह तस्वीर मनचाही।

दुर्भाग्य, ऐसा हुआ नहीं, हर-बार तस्वीर अधूरी रह गई। आज फिर ऐसी किसी जगह की तलाश आ गया हूं।

एकांत और मौन है मेरे पास।

चहुं ओर पसरा मौन

मुझे मेरे करीब लाता है

मेरा स्वर निकल कर नयन से

मेरे मन में प्रवेश पाता है

मौन मन को भाता है

जग – जीवन से प्यार गहराता है।

इस एकांत में एक दिव्य-ज्योति दिखती है। एक आकृति जो हज़ार रंग लिए है – कुछ कहती है – अस्पष्ट – धुंधले मन पर वह अंकित होता है --- “तू करता है वह – जो तू चाहता है और होता वह है – जो मैं चाहता हूं!”

--- हां – हां – हां ... ... पर क्या करूं ?

-- “तू वो कर जो मैं चाहता हूं, फिर वह होगा जो तू चाहता है।”

***

आकृति अब नहीं है। वह शून्य में विलीन हो गई है।

अहा! आज जो मेरी एटर्नल-जर्नी हुई .. वह बहुत ही अच्छी रही। इस जर्नी से एक मोरल ऑफ द स्टोरी तो मिली ही मुझे –

“दिन में एक बार अपने आप से बात कर ही लेनी चाहिए, नहीं तो हम दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त के मिलने का अवसर गंवा बैठते हैं।”

- फ़ुरसत में आज अपने से मिला – मुझे मेरा सही दोस्त मिल गया!

***

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

फ़ुरसत में ... कुछ भी तरतीब से नहीं हो रहा!

फ़ुरसत में ...(अंक-86)

कुछ भी तरतीब से नहीं हो रहा!

मनोज कुमार

आज सुबह से मूड खराब है। कुछ अच्छा नहीं सूझ रहा। ऑफिस में जाते ही एक मेरा प्रिय स्टाफ़ रुआंसे स्वर में कहने लगा साहब आप नहीं आए .. मुझ पर इतनी बड़ी मुसीबत आ पड़ी थी। मैंने पूछा क्या बात हुई ..? बताया उसके छोटे बेटे ने, जो लगभग बीस साल का था पंखे से झूल कर खुदकुशी कर ली।

मैं सन्न! ऑफिस की छत की तरफ़ देखता हूं। सोचता हूं, इस सीलिंग फैन का ईज़ाद किसने किया? उसे गाली देता हूं।

उसने रोते-रोते जो बताया इसका सार यह था कि दिन भर नेट, चैटिंग फ़ेसबुक करता रहता था। किसी से ब्रेकअप हुआ था। फोन पर रात के ग्यारह बजे उससे बात कर रहा था और रो रहा था। मां ने डांट लगाई कि कल सेमेस्टर का एक्ज़ाम है। पढ़ाई करो। ये फ़ेसबुक और मोबाइल काम नहीं आएगा। मां से लड़ा। सुबह पंखे से झूलता पाया गया। जाने वाला तो गया। ऊपर से मां-बाप को पुलिस का चक्कर अलग। अब ऐसे मामलों में कुछ दे-दा कर मामला बन्द होता है, किया जाता है। उसने भी किया।

क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?

संसद में सुना है एक बिल आया है जिसके पास होने से ही भ्रष्टाचार बिला जाएगा।

मन ही मन सोचता हूं सरकार अच्छा ही कर रही है इन सोशल साइट को बन्द करने का प्रयास करके।

आज कुछ भी तरतीब से नहीं हो रहा। विचार भी बड़े बेतरतीब आ रहे हैं।

जब मैं डिस्टर्ब होता हूं, सलिल भाई को फोन लगाता हूं। उनसे बात कर सुकून मिलता है। आज भी फोन लगाया। इंगेज आ रहा था। बार-बार लगाया। बार-बार इंगेज। क्या बात है? कुछ गड़बड़ तो नहीं। इस बार री-डायल करते वक़्त नम्बर को ग़ौर से देखता हूं। अरे ... यह तो मेरा ही नम्बर है। तब से अपना ही नम्बर मिलाए जा रहा हूं। आपने कभी ख़ुद को फोन लगाके देखा है। मतलब औरों के नम्बर तो हम फटाफट डायल करते हैं, हा-ही करके घंटों बातें करते रहते हैं। कभी खुद का नम्बर डायल कीजिए और अपनी आवाज़ सुनिए।

किया डायल ... इंगेज टोन आया और यह मैसेज आया कि अभी यह लाइन व्यस्त है।

दुनिया से मिलने में सब मस्त हैं

पर ख़ुद से मिलने की सभी लाइने व्यस्त हैं।

ऐसी ही हालत संसद में दिखी। कोई दिखा रहा था कि उनका जन्म 1948 में हुआ। यानी उनके जहान में आने की ख़बर सुन 1947 में ही अंग्रेज़ भाग खड़े हुए देश छोड़कर। हमारे सारे चुने हुए प्रतिनिधि क़रीब तीन मिनट तक ठहाके लगाते हैं। इस वर्ष का सबसे बड़ा चुटकुला। वे भी खुद से मिलना नहीं चाहते ... हजार कड़ोर का चारा घोटाला अब किसे याद करने की ज़रूरत है? कोई क्यों याद रखे।

याद तो 1948 रहेगा। उस वर्ष उनका जन्म हुआ था। यह शायद ही कोई याद रखना चाहे कि उस वर्ष हमने हमारे राष्ट्रपिता को भी खोया था। अंग्रेज़ ने जाते-जाते जो बीज बोया उसका फल था उनका जाना? पता नहीं। किन्तु इन्हीं विद्वजन का कहना है, रोपे पेड़ बबूल का आम कहां से होए! फिर ठहाका। क्या यह भी चुटकुला ही है। पता नहीं कौन किस पर हंस रहा है।

जो 1948 में हमसे दूर गए उनकी तस्वीर देखता हूं। वे मुस्कुरा रहे हैं। उनकी तस्वीर के नीचे लिखा है – मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। उनके पदचिह्नों पर कोई चले, तो वह देश के कई लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाता है।

एक और आवाज़ संसद में गूंजती है --- देयर कैन बी ओनली वन फ़ादर ऑफ नेशन! मेजे थपथपा कर स्वागत किया जाता है। मानों कोई नई बात कह दी गई हो। अनोखी!

आज की सबसे बड़ी बुराई है कि आप भ्रष्ट नहीं हैं। उससे भी बुरा है कि आप भ्रष्टाचार हटाने की मांग रखते हैं। कौन अपने पैर में कुल्हाड़ी मारेगा। मैं अतीत में खो जाता हूं। रिसर्च करने के साथ राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद में नौकरी करता था। फ़ैक्टरी के सैम्पल लाता था और उसकी रिपोर्ट पेश करता। फ़ैक्टरी को मुसीबत। जब तक ईफ़्लुएंट सही नहीं आएगा उत्पादन बन्द। ऐसे ही एक फ़ैक्टरी के सैम्पल की जांच कर निबटा और नीचे पान की दुकान पर पान खाने जाता हूं। चार गुंडों ने घेर लिया। छाती पर पिस्तौल तान कर बोला सैम्प्ल बदल, रिपोर्ट ठीक कर और यह बैग रुपयों से भरा है ले जा, वरना .... ठोक देंगे। जवानी का जोश था, सीना तान कर चिल्लाया, है हिम्मत तो चला गोली। मेरे चिल्लाने से वे भाग खड़े हुए। ऑफिस के मेरे सारे मित्र मेरे दुश्मन हो गए – साला न खुद खाता है, न हमें खाने देता है।

सड़ चुकी व्यवस्था ... एक ऐसे बिल को आने देगी जो न खुद खाए न खाने दे। हुंह!

मेरे श्वसुर के डेथ सर्टिफ़िकेट निकलवाने में मुझे डेथ और बर्थ रजिस्ट्रार ऑफिस के बीसियों चक्कर लगाने पड़े। नहीं निकला। मेरा साला बोला आपसे कुछ नहीं होगा। आज मैं जाता हूं। वह बारह बजे तक वापस आया। हाथ में मृत्यु-प्रमाण पत्र था। उसने दौ सौ रुपए खर्चे।

मरने का प्रमाण पत्र पाने के लिए भी घूस देना पड़े जिस व्यवस्था में वहां यह बिल आ जाएगा, ... आने दिया जाएगा?

आह! आज कल कलकत्ते में सबसे ठंडा दिन था! दिल्ली में? दिल्ली वाले ही जाने। वहां कुछ ज़्यादा ही होगी। इसीलिए तो बहुत कुछ वहां ठंडे बस्ते में चला जाता है। महिला आरक्षण के नाम से एक बिल होता था। आजकल कोल्ड स्टोरेज में है। कल लोकपाल भी होगा। और नहीं तो क्या?

थोड़ी धूप निकली है। धूप ही सेंक लूं। पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है। टीवी बन्द कर देता हूं। श्रीमती जी चिल्लाती हैं क्यों बन्द किया ... कितना अच्छा बोल रहा था। मैं बोलता हूं --- अच्‍छा वक्‍ता तो कोई भी बन सकता है, परन्‍तु दूसरों के लिए अनुकरणीय श्रेष्‍ठ जीवन कितने लोग जीते हैं। चलो धूप में बैठें। इनको सुन कर क्या होगा?

क्या मैं निराशावादी होता जा रहा हूं?

शनिवार, 24 सितंबर 2011

फ़ुरसत में ... स्वयं की खोज

फ़ुरसत में ...

स्वयं की खोज

मनोज कुमार

किसी ने ठीक है कहा है अधिक सांसारिक ज्ञान अर्जित करने से आपमें अहंकार सकता है परन्तु आधात्मिक ज्ञान जितना अधिक अर्जित करते हैं उतनी ही नम्रता आती है मुझमें भी इन दिनों अहंकार तत्त्व प्रबल होने लगे। अहं भाव से घमंड सिर चढ़कर बोलने लगता है। शालीनता होने का लबादा ओढ़े रहने के बावज़ूद चाल-ढ़ाल, बोल-चाल, खान-पान, हाव-भाव सबों में तो वह घमंड झलकने लगता ही है। दोहरे चरित्र जीने का मोह छोड़ न पाने के कारण कभी कभार लोग मेरे आचरण से कुछ का कुछ अर्थ भी तो लगाने लगते हैं। जैसे अहंभाव से घमंड पैदा होता है वैसे ही विभ्रम मोह का परिणाम है

इस मनोदशा में डूबते-उतराते लगा कि मैं नास्तिक तो नहीं बनता जा रहा। जिन चीज़ों में पहले आस्था थी अब उन पर ही अनास्था होने लगी। जिन्हें अच्छे गुण कहे जा सकते थे, यदि वे बचे भी हैं मुझमें, तो लगता है कि एक-एक कर तिरोहित होते जा रहे हैं। दिव्य गुण मानव को ईश्वर के समीप ले आते हैं जबकि विकार उसे ईश्वर से दूर ले जाते हैं मेरा विकार मुझे पथ-विचलित कर रहा है। इन सब कारणों से शायद मैं अपने ही लोगों में अप्रिय तो नहीं हो रहा। अगर इस स्थिति के मूल में जाऊं तो मैं पाता हूं कि यह सब अहं भाव के उदित होने का ही तो परिणाम है। अहंभाव से मानव में वे सारे लक्षण जाते हैं, जिनसे वह अप्रिय बन जाता है

यौवनं धन संपत्तिही प्रभुत्वम्‌ अविवेकता,

एकैकमप्य अनर्थाय, किंयत्र चतुष्टम्‌। (हितोपदेश)

यौवन, धन-सम्पत्ति, प्रभुता और अविवेक एक-एक ही अनर्थ का कारण हैं और अगर जहां चारों हैं उसका कहना ही क्या?

लगता है नैतिक ,ऊल्य शब्दकोश में दुबक गया है। जीने के लिए, जीवित रहने के लिए कुछ नैतिक मूल्यों का सहारा तो चाहिए। पर जब यह लगने लगे कि मेरे मूल्य मुझे ही धता बता कर मुझसे दूर होते जा रहे हैं तो यह सोचने पर विवश हो जाता हूं कि यदि व्यक्ति अपने नैतिक मूल्य खो देता है तो मानो अपना सब कुछ खो देता है खोते ही जा रहा हूं, लोगों में अच्छाइयां देखना, लोगों के अच्छे गुणों को देखना, समय के उजले पक्ष को देखना। लगता है मैं बीमार होते जा रहा हूं, यदि शरीर से नहीं तो मन से , दिमाग से, तो अवश्य ही। एक अच्छा, स्वच्छ मन वाला व्यक्ति दूसरों की विशेषताएं देखता हैदूषित मन वाला व्यक्ति दूसरों में बुराई ही ढूँढता है मैं अब लोगों की बुराइयां खोज-खोज कर ढूंढ रहा हूं, या अनायास ही मुझे दिख जाता है, कह नहीं सकता। छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति का मुझमें विकसित होते जाना शुभसंकेत नहीं है। यह तो मेरे अस्तित्व को ही बेमानी बना रहा है। जितना मैं दूसरों में अवगुण देखता हूं, उतना ही मुझ पर अवगुणों का असर पड़ने लगा है समाधान तो यही है कि मुझे तो गुणग्राही बनना चाहिए।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोई।

जो जग देखा आपना, मुझसा बुरा न कोई॥

कहीं ये सारे गुण इसलिए तो नहीं समा गये मुझमें कि मैं चाहता होऊं कि लोग मेरी तारीफ़ करें, प्रशंसा करें। और यदि ऐसा न हो पा रहा हो तो मैं इन अवगुणों की खान बनता जा रहा हूं। सदा प्रसन्न रहने के लिए झूठी प्रशंसा की इच्छा का त्याग आवश्यक है मुझे यह त्याग करना ही चाहिए। मुझे फिर से खुद की खोज करनी होगी। यह काम क्या सरल है? सहज है? पर कहीं से शुरुआत तो करनी ही होगी। स्ययं की खोज के लिए स्वयं के प्रति सच्चा बनना पड़ेगा इस खोज की यात्रा गांगा तट तक मुझे खींच लाती है। वहां आने पर जो भाव मन में उठते हैं वह काव्य-रूप धारण करते हैं ..., देखें ...

आओ ना चैतन्य!

मटमैली गंगा,

विकृत विवेक-सी

पसरी हुई,

दम तोड़ती

गतिहीन-सी, निस्पंद

 

इधर

तट पर

कई ज़िंदगी

झोंपड़ों में सिमटी हुई

ठहर सी गई है।

 

घाट भी नष्ट हो गए

नदी तट सिकुड़ा

रेत ही रेत …

 

उसी तखत पर

बैठ कर

देख रहा

कभी जिनके सभी पाए थे दुरुस्त
आज उनका हो गया क्षरण
फिर भी संभाले तो हैं मुझे,
मेरी हस्ती को!

 

गंगा का तट और अस्ताचल सूर्य
होने वाला है गहन तिमिर का आगमन
व्याकुल, अशांत मन
प्रतिपल
बढती जा रही मन की हलचल|

आओ ना चैतन्य!
करो मेरी समस्याओं का समाधान
बैठो इसी टूटी चौकी पर
साथ मेरे|

जब तुम बैठे थे साथ
रत्नाकर के, तो उसे
वाल्मीकि बना दिया
बैठे जब गौतम के पास
तो वह हुआ बुद्ध
आज इस निशा के आगमन से
गंगा की धार है अवरुद्ध
करो निदान!

हे दिनमान!

शनिवार, 3 सितंबर 2011

फ़ुरसत में ... गुरुओं को नमन!

फ़ुरसत में ...

गुरुओं को नमन!

मनोज कुमार

09831841741

वर्षा थम नहीं रही। बादल ... उमड़-घुमड़ कर आ रहे हो। मदमस्त, अल्हड़, उन्माद से भरे ... बादल! कभी अपना रौद्र रूप दिखलाते हो, तो कभी रिम-झिम फुहार बरसाते हो। बादल .., ओ बादल! कभी तुमने सोचा कि जिस जल से तुम भरे हुए हो वह तुम्हारा नहीं है। समुद्र का जल पीकर ही पुष्ट हुए हो तुम! ज़रा समुद्र को देखो, अथाह जल राशि से भरा है, फिर भी धीर-गम्भीर है। मेरी बात न मानो, ... तो न मानो, जायसी ने जो लिख डाला है उस पर तो ग़ौर फ़रमाओ ...

मुहमद नीर गंभीर जो सो नै1 मिलै समुँद।     1 = झुककर

भरे ते भारी होइ रहे छूँछे बाजहिं दुंद2         2. नगाड़ा

देखो तुममें लोगों की प्यास बुझाने की अपार क्षमता है। तुम तो धाराधर हो। तुम्हें व्यवहार में गम्भीरता, वाणी में गंभीरता और भावों में गम्भीरता बरतनी चाहिए। ये क्या जहां मन किया लगे कड़कने। जहां मन किया लगे गरजने। जहाँ मन किया लगे बरसने। देखो, तुम तो यह मानते ही होगे कि चाहे जितनी बिजली तड़पाओ, पर आकाश में कभी खलबली नहीं मचती। इसीलिए कहता हूं कि समुद्र की ओर देखो, उसकी विविध लहरों में निश्चलता है, और यही समुद्र का सच्चा गांभीर्य है। गंगा को देखो, देखने से पता चलेगा कि भरी नदी शांत बहती है। जो अच्छे लोग होते हैं, जो सच्चे लोग होते हैं, उन्हें देवगण कह सकते हैं, और ये देवगण आत्मा के शोर को नहीं, उसकी गहराई को पसंद करते हैं।

पर तुम हो कि, कहीं अतिवृष्टि करते हो तो कहीं अना....। क्या तुमने सबको समान भाव से देखना नहीं सीखा। सब पर बराबर निगाह रखा करो। लोचन हो, पर समालोचन। दृष्टि डालो, मगर समदर्शी बनो। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसा गम्भीर समालोचक हिंदी तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी, या यूं कहें कि पूरे भारत में दूसरा नहीं हुआ। उनका कहना था हमें अपनी दृष्टि से दूसरे देशों के साहित्य को देखना होगा; दूसरे की दृष्टि से अपने साहित्य को नहीं। ... पर यह दृष्टिकोण तभी आ सकता है न, जब हमारी अंतर्दृष्टि को आच्छन्न करनेवाले पर्दे हटेंगे, आंखों पर छाये बादल छटेंगे और तब हमारे विचारों में बल आएगा।

आचार्य शुक्ल की ‘गम्भीरता’ सिर्फ़ चिन्तन की गहराई नहीं, बल्कि दायित्व की गम्भीरता है। वे समालोचना को केवल कृतियों को विश्लेषण और मूल्यांकन तक सीमित नहीं रखते थे। उनके सामने तो एक बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व था। वे ‘लोक-मंगल’, ‘लोक-रक्षा’ की कामना करते थे। आचार्य शुक्ल के ज़रिए हिंदी आलोचना का यह सौभाग्य है, जैसा कि डॉ. नामवर सिंह कहते हैं, उसकी प्रतिष्ठा साहित्य के व्यापक सामाजिक दायित्व की गहरी नींव पर हुई।

आचर्य शुक्ल की दृष्टि साहित्य के स्वधर्म पर बराबर टिकी रही। उन्होंने इस बात का ख्याल किया कि साहित्य की कोटि में क्या-क्या आता है, क्या नहीं आता। ओ बादल! मेरी नहीं मानते तो उनके ही मुख से सुन लो, कुछ हदबंदी मैं कर लेना चाहता हूं; यह स्थिर कर लेना चाहता हूं किशुद्ध साहित्य के भीतर क्या-क्या आता है।

जब मैंने यहां शुद्ध साहित्यिक कृति की बात की तो तुम गरजे थे, हे बादल याद है क्या कहा था तुमने, याद दिलाऊँ,

.... .... ने कहा

किसी भी विवरण का कोई साक्ष्य या तर्कसंगत आधार इस लेख में नहीं है. नाटकों का श्रेणी विभाजन किन समीक्षकों ने किया? शुद्ध साहित्यिक नाटक, ये कौन सी श्रेणि थी भाई? विडंबना है कि असिए अधकचरे लेख जो भ्रान्ति फैला रहे हैं कि सराहना और इंतज़ार हो रहा है.

शुद्ध साहित्य शब्द से न तो भ्रम होना चाहिए था, न ही गुरेज़। अब हम तो ठहरे निरे मूर्ख। हे बादल, तुम तो जानते होगे कि आचार्य शुक्ल तथाकथित शुद्ध साहित्य के हिमायती थे। आचार्य शुक्ल ने तो एक ग्रंथ ही रच डाला, हिंदी सहित्य का इतिहास। इस ग्रंथ में उन्होंने साहित्य कोटि में रचनाओं को सम्मिलित और तिरस्कृत किया है। अब देखो न उन्होंने क्या लिखा है, देवकीनंदन खत्री के उपन्यास साहित्य कोटि में नहीं आते, जबकि किशोरी लाल गोस्वामी की रचनाएँ साहित्य-कोटि में आती हैं।’’ इस कोटि या श्रेणी विभाजन में आचार्य शुक्ल की जीवन-दृष्टि समाविष्ट थी। अपनी दृष्टि का खुलासा करते हुए वे कहते हैं, सच्चा साहित्यकार वही है जिसे लोक-हृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच से मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को अलग करके देख सके।

‘कोटि’ से मतभेद हो सकता है, किन्तु साहित्य को जाँचने परखने के लिए आचार्य शुक्ल का निश्चित मानदंड था। वे उनके सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में हमें देखने को मिलते हैं। देखो बादल, तुम्हारे ही आचरण को देखकर कहा गया है जो गरजते हैं सो बरसते नहीं। वास्तविकता और सिद्धांत में तालमेल रखो, तभी तो यथार्थवादी कहलाओगे। आचार्य शुक्ल की सब पर समान दृष्टि रहती थी। वह लोक सामान्य या साधारण की प्रतिष्ठा और विशिष्ट या असाधरण का तिरस्कार में विश्वास रखते थे। सामान्य मनुष्य ही शुक्ल जी की लड़ाई का ‘हीरो’ है। उन्होंने विलक्षण के विरुद्ध संघर्ष किया। वे कहते थे, साधारण से साधारण वस्तु हमारे गम्भीर भाव का आलंबन हो सकती है। और, जहाँ तक सामान्य की प्रतिष्ठा की बात है, तो यह कहना प्रासंगिक होगा कि प्रकृति के निर्माण में यदि बड़ों का योगदान है तो छोटे से छोटे कीट तक का भी योगदान है। तो उसको उसके योगदान को सम्मान मिलना ही चाहिए। भले ही वह किसी अन्य प्रसंग में हानिकर हो। जहाँ हानिकर है, वहाँ उसका दोषदर्शन किया जाना चाहिए। यही तटस्थ समालोचना है। प्रसिद्ध होमियोपैथ डॉ ई. बी. नैश अपनी पुस्तक “Leaders in Homeopathic Therapeutics” में लिखते भी हैं – “ ..... even a bed bug should be given its due credit.”

पर तुम्हें क्या बादल? तुम तो हमे यहां पर कह ही चुके हो कि मेरी दृष्टि तुच्छ है ...

“... ... ने कहा

आप सभी पाठको से अनुरोध है कि इस लेख की सामग्री का कहीं भी उल्लेख ना करें. भयानक बचकानी भूलों से भरा पड़ा है यह. इससे अच्छा तो स्नातक के विद्यार्थी लिखते हैं. अब तीन लेख के बाद भी कोई सुधार नहीं है. और इसे उम्दा और जानकारीपूर्ण पता नहीं क्या क्या कहने वालो पे मुझे तरस आता है. अब मुझे चुंकि पता लग गया है कि यहां पे टिप्पणी करना उर्जा को गलत जगह पर खर्च करना है. मैं यह अंतिम टिप्प्णी कर रहा हूं.”

जिसके पास देने को बहुत कुछ होता है, जैसे तुम, अमित आकार के हो हे बादल, अपरिमित हो, असीम हो, पूरे व्योम को आच्छादित कर लेते हो, तो हो ही विशिष्ट लक्षण वाले। पर कभी साधारण और सामान्य के ऊपर भी तरस खा लिया करो। अब, मैं यह तो नहीं कहता कि किसी दूसरे व्‍यक्ति की आलेचना करने से पहले हमें अपने अन्‍दर झॉंक कर देख लेना चाहिए। पर इतना तो आग्रह रख सकता हूं कि समालोचना करके देखो। सरलता भी देखो, क्योंकि सरलता में महान सौंदर्य होता है। जो सरल है, वह सत्‍य के समीप है।

बादल, आपकी आप जानें ... मैं तो इतना जानता हूं कि यहाँ दो तरह के लोग हैं। एक वो जो काम करते हैं और दूसरे वो जो सिर्फ क्रेडिट लेने की सोचते हैं। मेरी कोशिश रहती है कि मैं पहले समूह में रहूँ क्योंकि वहाँ कम्पीटीशन कम है।

हो सकता है कि मैं ग़लत रहा होऊँगा, हो सकता है कि मैंने ग़लती की होगी। मैंने तो स्वीकार भी किया था,


“मनोज कुमार
ने कहा

भाई ... ... आपके प्रोफ़ाइल में लिखा है
“सलाह अच्छी देता हूँ,”
तो ज़रा मुझे भी दीजिए ना कि क्या ग़लत है और क्या बचकाना है, तो ठीक कर लूँ, कुछ सुधार कर लूँ इस आलेख में, और अपने आप में भी।”

पर आपने कुछ सिखाया ही नहीं। बताया भी नहीं। भाई, मैं तो यह मानता हूँ कि ग़लती करने का सीधा सा मतलब है कि आप तेजी से सीख रहे हैं। ग़लती करने का मतलब यह थोड़े है कि मैंने कोई ऐसा काम किया है जो मुझे नहीं करना चाहिए। ग़लती तो हर मनुष्य कर सकता है , पर केवल मूर्ख ही उस पर दृढ बने रहते हैं। मैं तो ग़लती सुधारना चाहता था। - अलेक्जेन्डर पोप ने कहा था - अपनी गलती स्वीकार कर लेने में लज्जा की कोई बात नहीं है। इससे दूसरे शब्दों में यही प्रमाणित होता है कि कल की अपेक्षा आज आप अधिक समझदार हैं।

अब अपनी बात एक अरबी कहावत के साथ समाप्त करता हूं,

जो जानता नहीं कि वह जानता नहीं, - वह मूर्ख है- उसे दूर भगाओ।

जो जानता है कि वह जानता नहीं, वह सीधा है - उसे सिखाओ।

जो जानता नहीं कि वह जानता है, वह सोया है - उसे जगाओ।

जो जानता है कि वह जानता है, वह सयाना है - उसे गुरू बनाओ।

हे बादल! मेरे गुरु बन जाओ।

एक दिन के बाद ही शिक्षक दिवस है … हे बादल! आपके समेत सभी गुरुओं को नमन!