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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

फ़ुरसत में ... कुछ भी तरतीब से नहीं हो रहा!

फ़ुरसत में ...(अंक-86)

कुछ भी तरतीब से नहीं हो रहा!

मनोज कुमार

आज सुबह से मूड खराब है। कुछ अच्छा नहीं सूझ रहा। ऑफिस में जाते ही एक मेरा प्रिय स्टाफ़ रुआंसे स्वर में कहने लगा साहब आप नहीं आए .. मुझ पर इतनी बड़ी मुसीबत आ पड़ी थी। मैंने पूछा क्या बात हुई ..? बताया उसके छोटे बेटे ने, जो लगभग बीस साल का था पंखे से झूल कर खुदकुशी कर ली।

मैं सन्न! ऑफिस की छत की तरफ़ देखता हूं। सोचता हूं, इस सीलिंग फैन का ईज़ाद किसने किया? उसे गाली देता हूं।

उसने रोते-रोते जो बताया इसका सार यह था कि दिन भर नेट, चैटिंग फ़ेसबुक करता रहता था। किसी से ब्रेकअप हुआ था। फोन पर रात के ग्यारह बजे उससे बात कर रहा था और रो रहा था। मां ने डांट लगाई कि कल सेमेस्टर का एक्ज़ाम है। पढ़ाई करो। ये फ़ेसबुक और मोबाइल काम नहीं आएगा। मां से लड़ा। सुबह पंखे से झूलता पाया गया। जाने वाला तो गया। ऊपर से मां-बाप को पुलिस का चक्कर अलग। अब ऐसे मामलों में कुछ दे-दा कर मामला बन्द होता है, किया जाता है। उसने भी किया।

क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?

संसद में सुना है एक बिल आया है जिसके पास होने से ही भ्रष्टाचार बिला जाएगा।

मन ही मन सोचता हूं सरकार अच्छा ही कर रही है इन सोशल साइट को बन्द करने का प्रयास करके।

आज कुछ भी तरतीब से नहीं हो रहा। विचार भी बड़े बेतरतीब आ रहे हैं।

जब मैं डिस्टर्ब होता हूं, सलिल भाई को फोन लगाता हूं। उनसे बात कर सुकून मिलता है। आज भी फोन लगाया। इंगेज आ रहा था। बार-बार लगाया। बार-बार इंगेज। क्या बात है? कुछ गड़बड़ तो नहीं। इस बार री-डायल करते वक़्त नम्बर को ग़ौर से देखता हूं। अरे ... यह तो मेरा ही नम्बर है। तब से अपना ही नम्बर मिलाए जा रहा हूं। आपने कभी ख़ुद को फोन लगाके देखा है। मतलब औरों के नम्बर तो हम फटाफट डायल करते हैं, हा-ही करके घंटों बातें करते रहते हैं। कभी खुद का नम्बर डायल कीजिए और अपनी आवाज़ सुनिए।

किया डायल ... इंगेज टोन आया और यह मैसेज आया कि अभी यह लाइन व्यस्त है।

दुनिया से मिलने में सब मस्त हैं

पर ख़ुद से मिलने की सभी लाइने व्यस्त हैं।

ऐसी ही हालत संसद में दिखी। कोई दिखा रहा था कि उनका जन्म 1948 में हुआ। यानी उनके जहान में आने की ख़बर सुन 1947 में ही अंग्रेज़ भाग खड़े हुए देश छोड़कर। हमारे सारे चुने हुए प्रतिनिधि क़रीब तीन मिनट तक ठहाके लगाते हैं। इस वर्ष का सबसे बड़ा चुटकुला। वे भी खुद से मिलना नहीं चाहते ... हजार कड़ोर का चारा घोटाला अब किसे याद करने की ज़रूरत है? कोई क्यों याद रखे।

याद तो 1948 रहेगा। उस वर्ष उनका जन्म हुआ था। यह शायद ही कोई याद रखना चाहे कि उस वर्ष हमने हमारे राष्ट्रपिता को भी खोया था। अंग्रेज़ ने जाते-जाते जो बीज बोया उसका फल था उनका जाना? पता नहीं। किन्तु इन्हीं विद्वजन का कहना है, रोपे पेड़ बबूल का आम कहां से होए! फिर ठहाका। क्या यह भी चुटकुला ही है। पता नहीं कौन किस पर हंस रहा है।

जो 1948 में हमसे दूर गए उनकी तस्वीर देखता हूं। वे मुस्कुरा रहे हैं। उनकी तस्वीर के नीचे लिखा है – मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। उनके पदचिह्नों पर कोई चले, तो वह देश के कई लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाता है।

एक और आवाज़ संसद में गूंजती है --- देयर कैन बी ओनली वन फ़ादर ऑफ नेशन! मेजे थपथपा कर स्वागत किया जाता है। मानों कोई नई बात कह दी गई हो। अनोखी!

आज की सबसे बड़ी बुराई है कि आप भ्रष्ट नहीं हैं। उससे भी बुरा है कि आप भ्रष्टाचार हटाने की मांग रखते हैं। कौन अपने पैर में कुल्हाड़ी मारेगा। मैं अतीत में खो जाता हूं। रिसर्च करने के साथ राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद में नौकरी करता था। फ़ैक्टरी के सैम्पल लाता था और उसकी रिपोर्ट पेश करता। फ़ैक्टरी को मुसीबत। जब तक ईफ़्लुएंट सही नहीं आएगा उत्पादन बन्द। ऐसे ही एक फ़ैक्टरी के सैम्पल की जांच कर निबटा और नीचे पान की दुकान पर पान खाने जाता हूं। चार गुंडों ने घेर लिया। छाती पर पिस्तौल तान कर बोला सैम्प्ल बदल, रिपोर्ट ठीक कर और यह बैग रुपयों से भरा है ले जा, वरना .... ठोक देंगे। जवानी का जोश था, सीना तान कर चिल्लाया, है हिम्मत तो चला गोली। मेरे चिल्लाने से वे भाग खड़े हुए। ऑफिस के मेरे सारे मित्र मेरे दुश्मन हो गए – साला न खुद खाता है, न हमें खाने देता है।

सड़ चुकी व्यवस्था ... एक ऐसे बिल को आने देगी जो न खुद खाए न खाने दे। हुंह!

मेरे श्वसुर के डेथ सर्टिफ़िकेट निकलवाने में मुझे डेथ और बर्थ रजिस्ट्रार ऑफिस के बीसियों चक्कर लगाने पड़े। नहीं निकला। मेरा साला बोला आपसे कुछ नहीं होगा। आज मैं जाता हूं। वह बारह बजे तक वापस आया। हाथ में मृत्यु-प्रमाण पत्र था। उसने दौ सौ रुपए खर्चे।

मरने का प्रमाण पत्र पाने के लिए भी घूस देना पड़े जिस व्यवस्था में वहां यह बिल आ जाएगा, ... आने दिया जाएगा?

आह! आज कल कलकत्ते में सबसे ठंडा दिन था! दिल्ली में? दिल्ली वाले ही जाने। वहां कुछ ज़्यादा ही होगी। इसीलिए तो बहुत कुछ वहां ठंडे बस्ते में चला जाता है। महिला आरक्षण के नाम से एक बिल होता था। आजकल कोल्ड स्टोरेज में है। कल लोकपाल भी होगा। और नहीं तो क्या?

थोड़ी धूप निकली है। धूप ही सेंक लूं। पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है। टीवी बन्द कर देता हूं। श्रीमती जी चिल्लाती हैं क्यों बन्द किया ... कितना अच्छा बोल रहा था। मैं बोलता हूं --- अच्‍छा वक्‍ता तो कोई भी बन सकता है, परन्‍तु दूसरों के लिए अनुकरणीय श्रेष्‍ठ जीवन कितने लोग जीते हैं। चलो धूप में बैठें। इनको सुन कर क्या होगा?

क्या मैं निराशावादी होता जा रहा हूं?

शनिवार, 18 जून 2011

फ़ुरसत में ..... कालाधन और भ्रष्टाचार की बात नहीं कर सकता?

फ़ुरसत में .....

कालाधन और भ्रष्टाचार की बात नहीं कर सकता?

मनोज कुमार

 

एक वे थे .. बैरिस्टर। पिता दीवान थे। फिर परिस्थिति ने उन्हें वकालत छोड़ कर मानव सेवा को हाथ में लेने के लिए प्रेरित किया।

आज उनको अपना आदर्श मान कर, कई लोग उनके विचारों के आधार पर लड़ाई लड़ रहे हैं। लड़ाई भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़, लड़ाई देश का धन जो बाहर है उसे देश वापस लाने के लिए।

उनमें से एक इन दिनों सुर्ख़ियों में है ..

उन पर इल्जाम है,

१. वह संन्यासी हैं। उन्हें राजनीति नहीं करनी चाहिए।

२. वह योग छोड़कर कालेधन की बात क्यों करते हैं?

३. वह संन्यासी हैं, उन्हें कुछ राजनीतिक पार्टी अपने मतलब साधने के लिए अपने साथ लिए हुए हैं।

४. वह महिलाओं का सहारा लेकर, वेश बदल कर (महिलाओं के कपड़े पहन कर) अपनी जान बचाने के लिए भगा जाते हैं।

आज फ़ुरसत में इसी पर उनके विचार से विचार करें जिनके आदर्शों पर चलने की बात करते हैं सभी। वे भी, जो इनकी आलोचना करते हैं।

विलायत से पढ़कर बैरिस्टर बने। अपनी उम्र के ३६वें साल में ब्रह्मचर्य व्रत अपनाने की घोषणा करते हैं। महात्मा कहलाते हैं, बापू कहलाते हैं। लोगों के कहने पर तब के कांग्रेस की राजनीति करते हैं। देश को ग़ुलामी की जंज़ीरों से आज़ाद कराते हैं। सबको ख़ुशी होती है कि वह हमारे दल का, हमारी लड़ाई का नेतृत्व करते हैं।

इन्होंने गुरुकुल में योग की पढ़ाई की, योग शिक्षक बनते हैं, संन्यास ग्रहण करते हैं, लोग उन्हें बाबा कहते हैं। स्वामी कहते हैं।

वह जिसे लोग महात्मा या बापू कहते हैं, देश से बाहर जा रहे धन (ड्रेन ऑफ वेल्थ) को रोकने के लिए लड़ाई लड़ते हैं, स्वदेशी अपनाते हैं। तब की कांग्रेस उन्हें अपनी लड़ाई का हिस्सा बनाती है। लड़ाई लड़ती है।

ये, जिन्हें लोग बाबा या स्वामी कहते हैं, जो धन देश से बाहर चला गया है (काला धन/ब्लैक मनी) को देश में वापस लाने की लड़ाई लड़ते हैं। उस धन को देश का धन घोषित किया जाए, मांग करते हैं।

उनके दिनों में जालियांवाला कांड होता है, निहत्थे प्राणियों की “दिन-दहाड़े” हत्या कर दी जाती है।

इनकी, जिन्हें लोग स्वामी कहते है, बाबा कहते हैं, की मांग के बदले “रातों-रात” गोलियां बरसाई जाती है।

उन्हें, जिन्होंने उम्र के ३६वें साल में ब्रह्मचर्य ग्रहण किया, कभी नहीं कहा कि आप राजनीति क्यों करते हैं, बल्कि जब भी ज़रूरत पड़ी उन्हें कहते कि आप हमारी पार्टी को राह दिखाइए हमारे आन्दोलन का नेतृत्व कीजिए।

इन्हें कहते हैं तुम संन्यासी हो, बेटर यू शुल्ड कन्सेन्ट्रेट ऑन योर योगा एण्ड साधुगिरी, नहीं तो अगर हमें राजनीति सिखाने आए तो तुम्हें तुम्हारी सारी गांधीगिरी भुला देंगे।

मतलब उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तब की कांग्रेस महात्मा का साथ ले तो कोई ग़लत नहीं, आज के स्वामी की कोई चर्चा करे तो वह साम्प्रदायिक हो गया?

तब यह राष्ट्रीयता कहलाता था, आज साम्प्रदायिकता, अराजकता!

अब देखें साधुओं की सांठ-गांठ किस पार्टी से किसकी रही। मैं क्या कहूंगा, खुशवन्त सिंह जी पूरा चिट्ठा सामने रख दिए हैं, हिन्दुस्तान में।

कहते हैं कि आज के बाबा, स्वामी, इस पार्टी से जुड़े हैं, उस पार्टी से जुड़े हैं। 12 जून के अखबार में खुशवंत सिंह का आलेख पढ़ा। आप खुद ही देख लिजीए कि स्वतंत्र भारत में नेताओं/पार्टियों से संतों के जुड़े रहने का इतिहास इस लिंक पर: - ¶FbSXF ¸FF³Fû ¹FF ·F»FF ¶FF¶FFAûÔ IYe Qbd³F¹FF AüSX ÀFSXIYFSX

इन्हें (बाबा/स्वामी) कुछ लोग कहते हैं कि महिलाओं का सहारा लेकर जान बचाते हैं …

मैं इस प्रसंग पर अपने ब्लॉग “विचार” पर लिखना चाहता था। पर “विचार” पर गांधी जी के जीवन से जुड़ी घटनाएं क्रम से चल रहीं हैं। और क्रम तोड़ कर वहां लिखना नहीं चाहता था इसलिए आज इस ब्लॉग पर फ़ुरसत में ज़रा विस्तृत से उस घटना का ज़िक्र कर लूं। लोगों को याद आए कि हमारे राष्ट्रपिता को भी जान बचाकर भागना पड़ा था, वह भी वेश बदल कर, महिलाओं के पीछे रह कर (छुपना शब्द का प्रयोग मैं नहीं कर रहा) जान बचाना पड़ा था। एक बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए इस तरह के काम करने पड़ते हैं। अगर उस दिन बापू वैसा न किए होते तो शायद हमें आज़ादी की लड़ाई के लिए नेतृत्व देने वाला उस दिन ज़िन्दा न बचता। मुझे तो कुछ वैसी ही परिस्थिति 4-5 जून की रात को रामलीला के मैदान में लगी। अब बिना किसी भूमिका के उस घटना पर आता हूं।

गांधी जी अपने परिवार के साथ भारत से नेटाल के लिए स्टीमर से चल चुके थे। उधर डरबन में एक अलग किस्म की लड़ाई चल रही थी। उसका केन्द्र बिन्दू गांधी जी थे। उनपर दो आरोप थे ..

१. उन्होंने भारत में नेटाल-वासी गोरों की अनुचित निन्दा की थी, (काले धन और भ्रष्टाचार के लिए सरकार की निन्दा – अनुचित?!)

२. वे नेटाल को भारतीयों से भर देना चाहते थे। (रामलीला में लोगों को बुलाना, लोगों के मन में भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ़ लड़ाई का जज़्बा भरना)

गांधी जी निर्दोष थे। उन्होंने भारत में कोई ऐसी नई बात नहीं कही थी जो उन्होंने इसके पहले नेटाल में न कही हो। और जो कुछ भी उन्होंने कहा था पक्के सबूत के बल पर कहा था। (भ्रष्टाचार पर, कालेधन पर, स्विस बैंक पर सारे तथ्य और आंकड़े लोगों के सामने है, उस दिन जो रामलीला मैदान में बात कही गई थी, वह कोई नई नहीं थी।)

गांधी जी से जहाज पर कप्तान ने पूछा, “गोरे जैसी धमकी दे रहे हैं, उसी के अनुसार वे आपको चोट पहुंचायें, तो आप अहिंसा के अपने सिद्धान्त पर किस प्रकार अमल करेंगे?”

गांधी जी ने जवाब दिया, “मुझे आशा है कि उन्हें माफ़ कर देने की और उन पर मुकदमा न चलाने की हिम्मत और बुद्धि ईश्वर मुझे देगा।”

कई दिन तक बन्दरगाह पर जहाज लगा रहा, उन्हें जहाज से उतरने की इज़ाज़त नहीं मिली। धमकी दी गई कि जान खतरे में है। आखिर 13 जनवरी 1897 को उतरने का आदेश मिला। गोरे उत्तेजित थे। गांधी जी के प्राण संकट में थे। पोर्ट सुपरिण्टेण्डेण्ट टेटम के साथ गांधी जी को चलने को कहा गया। अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि लाटन ने कप्तान से कहा कि स्टीमर एजेण्ट के वकील के नाते वे गांधी जी को अपने साथ ले जाएंगे।

लाटन ने गांधी जी को कहा कि बा और बच्चे गाड़ी में रुस्तम सेठ के घर जायें और वे दोनों पैदल चलें। वे नहीं चाहते थे कि अंधेरा हो जाने पर शहर में दाखिल हुआ जाए। चोरी-छुपे जाना कोई अच्छा काम नहीं है।

गांधी जी इस सलाह पर सहमत हुए। बा और बच्चे गाड़ी में बैठकर रुस्तमजी के घर सही सलामत पहुंच गए। गांधी जी लाटन के साथ मील भर की दूरी पर स्थित रुस्तम जी के घर के लिए पैदल चले। कुछ ही दूर चलने पर कुछ लड़कों ने उन्हें पहचान लिया। वे चिल्लाने लगे, “गांधी, गांधी”। काफ़ी लोग इकट्ठा हो गए। चिल्लाने का शोर बढ़ने लगा। भीड़ को बढ़ते देख लाटन ने रिक्शा मंगवाया। न चाहते हुए भी गांधी जी को उसमें बैठना पड़ा।

पर लड़कों ने रिक्शेवाले को धमकाया और वह उन्हें छोड़कर भाग खड़ा हुआ। वे आगे बढ़े। भीड़ बढ़ती ही गई। भीड़ ने लाटन को अलग कर दिया। फिर गांधी जी पर पत्थरों और अंडों की वर्षा शुरु हो गई। किसी ने उनकी पगड़ी उछाल कर फेंक दिया। फिर लातों से उनकी पिटाई की गई। किसी ने उनका कुर्ता खींचा तो कोई उन्हें पीटने लगा, धक्के देने लगा। गांधी जी को गश आ गया। चक्कर खाकर गिरते वक्त उन्होंने सामने के घर की रेलिंग को थामा। फिर भी उनकी पीटाई-कुटाई चलती रही। तमाचे भी पड़ने लगे।

इतने में एक पुलिस अधीक्षक की पत्नी, श्रीमती एलेक्जेंडर, जो गांधी जी को पहचानती थी, वहां से गुज़र रही थी। वह बहादुर महिला गांधीजी एवं भीड़ के बीच दीवार की तरह खड़ी हो गई। धूप के न रहते भी उसने अपनी छतरी खोल ली, जिससे पत्थरों और अंडों की बौछाड़ से गांधी जी बच सकें। इससे भीड़ कुछ नरम हुई। अब स्थिति यह थी की यदि बापू पर प्रहार करने हों तो मिसेज एलेक्ज़ेंडर को बचाकर ही किये जा सकते थे।  थाने में खबर पहुंची। पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट एलेक्ज़ेण्डर ने एक टुकड़ी गांधी जी को घेर कर बचा लेने के लिए भेजी। वह समय पर पहुंची। रुस्तमजी के घर तक जाने के  रास्ते के बीच में थाना पड़ता था। एलेक्ज़ेण्डर ने थाने में ही आश्रय लेने की सलाह दी। गांधी जी ने इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा, “जब लोगों को अपनी भूल मालूम हो जायेगी, तो वे शान्त होकर चले जाएंगे। मुझे उनकी न्याय बुद्धि पर विश्वास है।”

पुलिस दस्ते ने उन्हें सही सलामत रुस्तमजी के घर तक छोड़ दिया। गांधी जी की पीठ पर मार पड़ी थी। एक जगह से ख़ून निकल आया था। चिकित्सक को बुलाकर गांधीजी की चोटों का इलाज करवाया गया।

भीड़ ने यहां भी उनका पीछा न छोड़ा। रात घिर आई थी। वे गांधीजी की मांग कर रहे थे। गांधी को हमें सौंप दो। हम उसे जिन्दा जला देंगे। भीड़ चीख रही थी। इस सेव के पेड़ से उसे फांसी पर लटका देंगे

परिस्थिति का ख्याल करके एलेक्ज़ेंडर वहां पहुंच गये थे। भीड़ को वे धमकी से नहीं, बल्कि उनका मन बहला कर वश में कर रहे थे। पर स्थिति नियंत्रित नहीं हो रही थी। भीड़ धमकी दे रही थी कि यदि गांधी जी को उन्हें नहीं दे दिया गया तो घर में आग लगा देंगे। एलेक्ज़ेंडर ने गांधी जी को संदेश भिजवाया, “यदि आप अपने मित्र का मकान, अपना परिवार और माल-असबाब बचाना चाहते हों, तो आपको इस घर से छिपे तौर पर निकल जाना चाहिए।”

आगे बढ़ने के पहले इस विषय पर गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में जो लिखा है वह जानना ज़रूरी है,

“कौन कह सकता है कि मैं अपने प्राणों के संकट से डरा या मित्र के जान-माल की जोखिम से अथवा अपने परिवार जी प्राणहानि से या तीनों से? कौन निश्चय-पूर्वक कह सकता है कि संकट के प्रत्यक्ष सामने आने पर छिपकर भाग निकलना उचित था? पर घटित घटनाओं के बारे में इस तरह की चर्चा ही व्यर्थ है। उनका उपयोग यही है कि जो हो चुका है, उसे समझ लें और उससे जितना सीखने को मिले, सीख लें। अमुक प्रसंग में अमुक मनुष्य क्या करेगा, यह निश्चय-पूर्वक कहा ही नहीं जा सकता। इसी तरह हम यह भी देख सकते हैं कि मनुष्य के बाहरी आचरण से उसके गुणों की जो परीक्षा की जाती है, वह अधूरी और अनुमान-मात्र होती है।” (आज के सन्दर्भ में भी इसे देखें)

गांधीजी के पास चोरी-छुपे भागने के अलावा कोई चारा नहीं था। भागने के प्रयास में वे अपनी चोटों को भूल गए थे। उन्होंने भारतीय सिपाही की वर्दी पहनी। सिर पर लाठी आदि की चोट से बचने के लिए पीतल की एक तश्तरी रखी और ऊपर से मद्रासी तर्ज़ का बड़ा साफ़ा बांधा। साथ में खुफ़िया पुलिस के दो जवान थे। उनमे से एक ने भारतीय व्यापारी की पोशाक पहनी और अपना चेहरा भारतीय की तरह रंग लिया। दूसरे ने वाहन चालक का वेश धरा। वे सभी बगल की गली से होकर पड़ोस की एक दुकान में पहुंचे। गोदाम में लगी हुई बोरों की थप्पियों को लांघते हुए दुकान के दरवाज़े से भीड़ में घुसकर आगे निकल गये। गली के नुक्कड़ पर गाड़ी खड़ी थी उसमें बैठाकर उन्हें उसी थाने में ले जाया गया जहां आश्रय लेने की सलाह एलेक्ज़ेण्डर ने दी थी।

इधर उस घर के सामने पुलिस अधीक्षक भीड़ से गाना गवा रहे थे,

“चलो, हम गांधी को फांसी पर लटका दें,

इमली के उस पेड़ पेड़ पर फांसी लटका दें।”

जब एलेक्ज़ेंडर को यह खबर मिली कि गांधी जी सही-सलामत थाने पहुंच गए हैं तो उसने भीड़ से कहा, “आपका शिकार तो इस दुकान में से सही सलामत निकल भागा है।”

भीड़ को विश्वास न हुआ। उनके प्रतिनिधि ने अन्दर जाकर कर तलाशी ली। उन्हें निराशा हुई। धीरे-धीरे भीड़ बिखर गई।

जब आक्रमणकारियों पर मुकदमा चलाने की बात चली तो गांधी जी ने कहा, “मुझे किसी पर मुकदमा नहीं चलाना है। उन्हें सज़ा दिलाने से मेरा क्या लाभ होगा। मैं तो उन्हें दोषी ही नहीं मानता हूं। उन्हें तो भड़काया गया था। दोष तो बड़ों का है। वे सही रास्ता दिखा सकते थे। जब वस्तु-स्थिति प्रकट होगी और लोगों को पता चलेगा, तो वे खुद पछताएंगे।”

उस दिन के बारे में गांधी जी लिखते हैं, “जब भी मैं उस दिन को याद करता हूं तो मुझे लगता है कि ईश्वर मुझे सत्याग्रह का अभ्यास करवा रहा था!”

संदर्भ बदल जाते हैं, अर्थ बदल जाता है। समस्या से लोगों को भटका दिया जाता है। लोगों का सुर बदल जाता है। मीडिया का सुर बदल जाता है।

किसी बड़े काम के लिए एक तंत्र की ज़रूरत पड़ती है। गांधी जी के भी आश्रम थे। फीनिक्स आश्रम, टालस्टाय फ़ार्म, साबरमती आश्रम और वर्धा आश्रम। आज के बाबा का भी आश्रम है। क्या आश्रम में रहने वाला कालाधन और भ्रष्टाचार की बात नहीं कर सकता?

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

फ़ुरसत में … जंतर मंतर से ..!

फ़ुरसत में … जंतर-मंतर से जन-मन तक ..!

फ़ुरसत में …

जंतर-मंतर से जन-मन तक

मित्रों इस बार फ़ुरसत में जितेन्द्र त्रिवेदी को आपके सामने पेश करता हूं। हमारे संगठन के ही हैं। रंगमंच से जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। आज उन्हें आपके सामने उनके इस आलेख के माध्यम से पेश करने में मुझे आंतरिक ख़ुशी हो रही है।  …. मनोज कुमार

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जितेन्द्र त्रिवेदी

image''सम शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध''

- रामधारी सिंह दिनकर

राष्ट्रपिता बनने से पहले महात्मा गांधी अक्सर कहा करते थे कि 'कहने की अपेक्षा करके दिखाना करोड़ गुना अच्छा है। मेरे मरने के बाद तुम लोग, मैंने जो कुछ भी कहा है, जो कुछ लिखा है, उसे बर्बाद कर देना और जला देना। क्योंकि टिकेगा वह नहीं जो मैंने कहा है और लिखा है, बल्कि टिकने वाली चीज तो वह होगी जो कुछ थोड़ा बहुत मैंने किया है।'

उपरोक्त कथन के तारतम्य में अण्णा हज़ारे का पांच दिनों का उपवास एवं आमरण अनशन कई सरोकारों को पैदा करता है। यह एक ऐसे आदमी की चिंता को उजागर करता है जो अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि, सुख-दु:ख, जीत-हार की परिधि से बाहर आकर समाज में फैले घटाटोप अंधेरे से बाहर निकलने के लिये किसी माकूल रास्ते को टटोलने और तलाशने की शुरुआत करता है।

आज के भारत में प्रत्येक आदमी, जो सोते-जागते यह जानता है कि भ्रष्टाचार के मगरमच्छ ने राष्ट्ररूपी जहाज को छतविक्षत कर दिया है और उसके मस्तूल और पतवार दोनों को यह मगरमच्छ निगल चुका है, सारे देश के लोग निरुपाय होकर मात्र दर्शक बने रहना ही अपनी नियति समझ बैठे थे साथ ही यह मानने लग गये थे कि वे महाभारत के निर्वीर्य धृतराष्ट्र की तरह घटनाओं के द्रष्टा भर हैं। जो कुछ होना है वह होकर रहेगा इसलिये केवल देखते जाने और सब कुछ सहते जाने में ही उनकी भलाई है। नाहक अपना खून जलाने से क्या फायदा?

इस तरह आम भारतीय की यह आदत बन गई कि ''होहहिं सोइ जो राम रचि राखा'' और इस मनोवृति को उसने विवश होकर अपना जीवन दर्शन मान लिया। इस प्रकार भारतीय समाज अपने कम्फर्ट जोन में खुश था। वह एक आरामदायक जिन्दगी जी रहा था जिसमें खाने-कमाने के अलावा शाम को बीवी-बच्चों के साथ टी.वी देखना और चैन से सोना उसकी सामान्य दिनचर्या बन चुकी थी। क्रिकेट के विश्वकप के उन्माद में सारा भारत मस्त था और आगे आने वाले आई.पी.एल. की चियर गर्ल्स के ठुमकों की आस लगाये बैठा था। किन्तु उसी समय न जाने कहाँ से एक पागल आदमी, जो पिछले 35 वर्षो से सामान्य भारतीय के कम्फर्ट जोन की मानसिकता को ठुकरा कर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर और स्वामी विवेकानन्द की एक छोटी सी किताब - ''नवयुवकों के नाम मेरा संदेश'' से अनुप्राणित होकर 1975 में सेना की नौकरी छोड़कर समाज की सेवा करने की भावना से उठ खड़ा हुआ। इस धुन में उसने विवाह भी नहीं किया और जन्म से मिले सगे सम्बन्धियों, नाते-रिश्तों की परवाह किये बिना सबसे दूर रहकर रचनात्मक कार्यों में संलग्न था।

यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे आज की शब्दावली में सनकी या झक्की कहा जाता है लेकिन वह अपनी ही मस्ती में जीता है। किन्तु वास्तव में ऐसे आदमी का ही जीना सार्थक है। सोना, जागना, खाना और फिर सो जाना, यह तो पशु भी करता है और इसी तरह एक दिन मर कर संसार से चले जाना मानव की भी नियति है। किन्तु जिस व्यक्ति की चर्चा यहाँ की जा रही है वह एक ऐसा व्यक्ति है जो जहाँ पैदा हुआ था, सार्वजनिक जीवन में तल्लीन रहने की वजह से उस स्थान पर पिछले 35 वर्षों से नही जा पाया। अपने भाई-भतीजों एवं बच्चों के नाम तक आज भी उसे नहीं मालूम। उसके द्वारा ऐसा उदाहरण समकालीन भारत में ऐसे समय प्रस्तुत किया गया है जब भारत के सत्तासीन व्यक्तियों द्वारा अपने परिवारों के सदस्यों के नाम पर सत्ता, पद और संस्थायें स्थापित की जा रही हैं।

दिनांक 05 अप्रैल से 09 अप्रैल-2011 तक भारत के लोगों में यह भावना फिर से उद्भूत हुयी है कि बड़ी बात दु:ख को देखने की नहीं है और ना ही उसके लिए शोर मचाने की है, अपितु बड़ी बात है दु:ख को दूर करने की प्राण-प्रण से कोशिश करने की, जो अण्णा हज़ारे ने हमें बखूबी समझा दी है। समकालीन भारत अण्णा हज़ारे का शुक्रगुजार रहेगा कि उन्होंने अलसाये भारत के लोगों को झिझोड़कर उठा दिया और एक मुहिम जगा दी। अब यह हम सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे न केवल नींद से जागें, अपितु चौकन्ने होकर ऐसे तत्वों की पहचान करने लगें जो इस मुहिम को कमजोर कर देना चाहते हैं। ऐसे समय में अत्यधिक सर्तक रहने की आवश्यकता है। कुछ राजनैतिक दल इस लड़ाई को मोड़कर छोटे मुद्दों तक ही सीमित रखना चाहेंगे और ऐसा करने में उनका उद्देश्य मूल विषय से जन मानस को भटकाना है। यह बात हम सभी को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये।

कुछ राजनेता अण्णा हजारे के बयान का जानबूझकर दुष्प्रचार कर रहे हैं ताकि वे अपने भ्रष्ट आचरण की कलई को छुपा सकें और इस आंदोलन को तितर-बितर कर सकें। अण्णा हजारे द्वारा किसी व्यक्ति की तारीफ करने से उनके पेट में दर्द होना उनकी मंशा को जाहिर करता है। यदि कोई व्यक्ति अतीत में कोई गलती कर चुका है और आज उन गलतियों को सुधार कर बड़े उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु प्रयासरत है तो इसमें उसके पीछे के अतीत में झाँकना वैसा ही होगा जैसा की पुराने घावों को कुरेदना। घावों को भरने के लिये उसे कुछ दिनों के लिये छोड़ दिया जाता है और वक्त उसे स्वत: भर देता है। यही समझ हम लोगों को इस समय भी रखनी चाहिये। इन पाँच दिनों के भीतर जो सरोकार जन्म लेने लगे हैं उनसे कई लोग घबरा से गये हैं। वे पुन: ब्रिटिश सरकार की पुरानी 'फूट डालो - राज करो' वाली नीति अपनाकर उसे अपने क्षुद्र लाभों के लिए इस्तेमाल करने में जुट गये हैं। उन्हें ऐसा लगता है जैसे कि भ्रष्टाचार खत्म करने की बात करना कोई जघन्य पाप है। क्योंकि उन्हें बचपन से यही संस्कार मिले हैं कि भ्रष्टाचार उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे वे प्राप्त करके ही रहेंगे।

सत्ता में बैठे लोग यह कभी नहीं चाहेंगे कि कोई आम व्यक्ति उनकी बगल में बैठकर कानून बनाने में भागीदारी निभाए। इसलिये वे कहने लगे हैं कि ''जन लोकपाल बिल'' से कुछ नहीं होगा। उनका यह कहना वैसा ही है जैसे कोई अंधा कहे कि सूरज होने से कोई फायदा नही है। अंधा व्यक्ति अपनी जगह ठीक है क्योंकि जिसे लगातार अंधेरे में रहने की आदत पड़ गई है और जिन्हें ऐसे पुश्तैनी संस्कार दिए गए हों कि बेटा बड़े होकर खूब ऊँचे पद हासिल करना और इस देश का जितना हो सके, धन लूटकर अपनी खानदानी तिजोरी भरते जाना और यदि यह तिजोरी छोटी पड़ जाए तो विदेशी बैंकों का पता मेरी डायरी से देख लेना, उनके लिये सूरज की रोशनी से कोई फायदा नहीं, किन्तु उन लोगों के लिये सूरज की रोशनी बड़ी फायदेमंद है, जो अपने कमरे में जबरदस्ती बंद कर दिये गये थे और सूरज की रोशनी से वंचित थे। ऐसे लोगों के लिये सूरज की रोशनी की एक किरण भी पुनर्जन्म के बराबर है। पंक्ति के आखिर में खडे़ व्यक्ति को बड़ी बेसब्री से उसका इन्तजार है जब वह सूचना के अधिकार की तरह इस देश के हुक्मरानों से जन लोकपाल के द्वारा सवाल-जवाब करना चाहेगा। ऐसे लोगों को मैं महात्मा गांधी के शब्दों में यह संदेश देना चाहता हूँ जो महात्मा गांधी ने 1908 में 'हिन्द स्वराज पुस्तिका' के माध्यम से ब्रिटिश शासन को दिया था -

उनसे मैं विनय से कहूँगा कि आप हमारे राजा ज़रूर हैं। आप अपनी तलवार से हमारे राजा हैं या हमारी इच्छा से, इस सवाल की चर्चा मुझे करने की ज़रूरत नहीं। आप हमारे देश में रहें इसका भी मुझे द्वेष नहीं है। लेकिन राजा होते हुये भी आपको हमारा नौकर बनकर रहना होगा। आपका कहा हमें नहीं बल्कि हमारा कहा आपको करना होगा। आज तक आप इस देश से जो धन ले गये, वह भले आपने हजम कर लिया, लेकिन अब आगे आपका ऐसा करना हमें पसन्द नहीं होगा। पहले हम दब गये थे इसलिये बोल नहीं सके, लेकिन आप ऐसा न समझें कि आपके इस बर्ताव से हमारी भावनाओं को चोट नहीं पहुंची है। हम स्वार्थ या दूसरे भय से आज तक नहीं कह सके, लेकिन अब यह कहना हमारा फ़र्ज हो गया है। आपसे यह सब हम बेअदबी से नहीं कह रहे हैं। आपके पास हथियार-बल है। उसके खिलाफ़ वैसी ताकत से हम नहीं लड़ सकते। लेकिन आपको अगर ऊपर कही गयी बात मंजूर न हो तो आपसे हमारी नहीं बनेगी। आपकी मर्जी में आए तो और मुमकिन हो तो आप हमें तलवार से काट सकते हैं। मर्जी में आये तो हमें तोप से उड़ा भी सकते हैं। हमें जो पसन्द नहीं है, वह अगर आप करेंगे, तो हम आपकी मदद नहीं करेंगे बगैर हमारी मदद के आप एक क़दम भी नहीं चल सकेंगे ...........................। सम्भव है कि आप सत्ता के मद में हमारी बात को हंसी में उड़ा दें। आपका हंसना बेकार है। ऐसा आज शायद हम नहीं दिखा सकें, लेकिन हममें कुछ दम होगा, तो आप देखेंगे कि आपका हँसना विनाश काले विपरीत बुद्धि की निशानी है। मांगने से कुछ नहीं मिलेगा, वह तो हमें ख़ुद ही लेना होगा। हम निडर होकर जो मन में है, वही कहेंगे और इस तरह कहने का जो नतीजा आये उसे सहेंगे, तभी हम अपने कहने का असर दूसरों पर डाल सकेंगे ................। मेरा मन गवाही देता है कि ऐसा स्वराज पाने के लिये मेरा यह शरीर समर्पित है.''

उपरोक्त कथन को अण्णा हज़ारे के बयान, जिसमें उन्होंने कहा था, ''मंत्री कोई खुदा नहीं है, बल्कि जनता का नौकर है ........। इस देश में हमसे यही गलती हो गयी कि नौकर को मालिक मान लिया गया। पर अब यह ट्रेनिंग देना है कि देश की असली मालिक इस देश की जनता है और नेता उसका नौकर है, सेवक है'' के साथ मिला कर पढेंगे तो अण्णा हज़ारे का बयान कहीं अधिक कोमल लगेगा। अनुपम खेर का बयान तो नितांत जमीनी सच्चाई से जुड़ा है तथा कहीं से भी संविधान विरोधी या विवादास्पद नहीं है। यदि उनका यह बयान निष्पक्ष कहा जाये तो राष्ट्रहित में दिया गया बयान है। यदि गुलाम भारत में बापू अंग्रेजों के विरुद्ध ऐसा बयान जारी करने की हिमाकत कर सकते थे तो आज़ाद भारत में क्या कोई भारतीय अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए इतना मोहताज हो जायेगा कि उसके बयान देने के बाद छिछली राजनीति के द्वारा उसका जीना ही दूभर हो जाय। विक्टर ह्युगो ने कहा था – ''हो सकता है कि आपकी बात से मैं सहमत नहीं होऊँ, किन्तु आपके कहने के अधिकार की रक्षा के लिये सदैव लड़ता रहूँगा।'' क्या भारतीय संविधान की दुहाई देकर इस देश की जनता की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को विशेषाधिकार हनन के कानूनी पचड़ों में फंसा कर उसका गला घोटना वाज़िब है? कोई भी संविधान किसी भी देश के जन-गण के लिये होता है, न कि जन-गण उसके विशेषाधिकार हनन के कानूनों द्वारा कुचलने के लिए, दबाने के लिए या सताने के लिए।

यदि आजाद भारत में इस तरह के विचार व्यक्त करना गुनाह है तो ब्रिटिश काल में गुलाम देश में गाँधीजी के द्वारा 103 वर्ष पहले हिन्द स्वराज पुस्तिका में कठोर शब्दों में अग्रेजों को ललकारने वाले बयान पर गाँधीजी को मौत की सजा हो जानी चाहिए थी। महात्मा गॉधी की ललकार के सामने तो आज के भारतीयों के जंतर-मंतर के सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से किए जाने वाले आंदोलन और बयानों की कद्र करते हुए इस देश के नेताओं को अण्णा हज़ारे के सामने नतमस्तक होना चाहिए।

हम सबको इस समय इसलिए भी एकजुट और सावधान रहना है क्योंकि राजनैतिक नेता अपना उल्लू सीधा करने के लिए जंतर-मंतर के सत्याग्रहियों के बीच विभेद पैदा करना चाहेंगे और उस भेद की आँधी को बढ़ाकर आम आदमी को भी गुमराह करने की पुरजोर कोशिश करेंगे। जो घृणा किसी कारण से अतीत में पैदा हुई थी, उसे पाटने के बजाय बढ़ाने में उन्हें मजा आता है। ये तथाकथित निर्वाचित नेतागण स्वयं को जन प्रतिनिधि कहते हैं । ये नेतागण, जो अपने-अपने क्षेत्रों से निर्वाचित होकर आते हैं, वास्तव में श्रेत्र की कितने प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, यह जानकर आपको हंसी ही आएगी, लेकिन उन्हें इसी पर गर्व है। आँकड़े बताते हैं कि देश में औसतन मतदान 50-55 प्रतिशत के आसपास ही होता है। उसमें भी जीतने वाला प्रत्याशी पड़े मत का अधिकतम 20-25 प्रतिशत मत प्राप्त करके विजयी हो जाता है। अर्थात विजयी प्रत्याशी क्षेत्र के कुल मतों का मात्र 10-15 प्रतिशत मत ही पाता है और दावा इस प्रकार करता है जैसे उसकी आवाज सम्पूर्ण अवाम की आवाज हो। ये मत भी कितनी जागरूकता से पड़ते हैं यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो क्या है कि तथाकथित रूप से केवल छठवें हिस्से की नुमाइंदगी करने वाले लोग वह विधान तय करते हैं जो देश की समग्र जनता पर अधिरोपित होता है। इस तथ्य को हम सबको समझना चाहिए कि आज भी कुछ लोग बाबरी मस्जिद विध्वंस दिवस और राम मंदिर निर्माण दिवस मनाकर भर चुके घावों को फिर से ताजा करके घृणा फैलाना चाहते हैं। उसी तरह अण्णा हज़ारे या किसी अन्य व्यक्ति के बयान को तोड-मरोड़कर प्रस्तुत करके ये लोग जनता को भटकाना चाहते हैं और ये तत्व घृणा को बढा़ने वाले उपरि वर्णित तत्वों के समान ही घातक हैं।

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