महात्मा गांधी हत्या केस-4
गांधी हत्या साज़िश को
समझने के लिए आज़ादी के पहले की स्थिति को भी समझना ज़रूरी है। 19 जुलाई, 1947 को
ब्रिटिश संसद ने भारत की स्वतंत्रता से संबद्ध अधिनियम पास कर दिया। इसे सम्राट की
स्वीकृति मिल गई। इसे भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 कहा जाता है। अंग्रेज़ों ने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता
दे दी जाएगी लेकिन उसका विभाजन भी होगा। ब्रिटिश मानस ने भारत के विभाजन के पीछे
के दर्द को समझने की कोशिश ही नहीं की। 16 जुलाई 1947 को हाउस
ऑफ लॉर्ड्स, लंदन (ब्रिटिश संसद) में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act 1947)
पर चर्चा के दौरान लॉर्ड पेथिक लॉरेन्स
ने अपने भाषण में हलकापन दिखाते हुए कहा था, “भारत-माता को बहुत लम्बे समय से प्रसव पीड़ा हो रही थी और
सबको आश्चर्य हो रहा था कि जिस शिशु का जन्म होगा उसका स्वरूप कैसा होगा। लेकिन
देखिए, भारत-माता के गर्भ से एक राज्य निकलने के बजाय दो जुड़वां राज्य निकल रहे
हैं, जैसा कि इस बिल में वर्णन किया गया है।” लॉर्ड हर्बर्ट सेम्युअल ने ज़्यादा समझदारी दिखाते हुए बहस
के दौरान कहा था, “यह स्वाधीनता बिल तमाम भावी पीढ़ियों के लिए एक आदर्श उदाहरण
है ... युद्ध के बिना शांति-संधि। पिछले 50 वर्षों से भी अधिक समय में भारतीय जनता ने खुले
विद्रोह के सिवा अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए लोकमत की अभिव्यक्ति के सारे साधनों
का उपयोग किया है। भारत में इस संघर्ष की सारी मंजिलों में कोई खुला विद्रोह नहीं
हुआ। इसका बहुत हद तक श्रेय श्री गांधी का प्रभाव और अहिंसा के उनके सिद्धान्त को
जाता है।”
औपचारिक
सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त का दिन नियत किया गया। गांधीजी ने कहा, “15 अगस्त का मेरी दृष्टि में कोई मूल्य
नहीं है। यहां किसी के चेहरे पर उत्साह नहीं है।”
वायसराय ने अन्तरिम सरकार की पुनर्रचना कर दी। दो कामचलाऊ
प्रशासन बनाए गए। एक भारतीय संघ के लिए दूसरा पाकिस्तान के लिए। यह निर्णय लिया
गया कि कोई समान प्रतिरक्षा सेना नहीं होगी। सेना का बंटवारा होगा। विभाजन परिषद
ने सेना के बंटवारे के सिद्धान्त निश्चित किए। सेना को हिन्दुओं और मुसलमानों में
बांटा जा रहा था, जिसमें मुख्य रूप से हिंदू और सिख सैनिक भारत के हिस्से में आए
और मुस्लिम सैनिक पाकिस्तान की सेना का हिस्सा बने। गांधीजी दुखी हुए, बोले, “अब बहुत ऊंचे स्तर पर सैनिक ख़र्च रखा जाएगा। सारा ख़र्च तो
परस्पर लड़ने के लिए होगा। और हमारे सामने दो नवजात राज्यों के बीच केवल पारस्परिक
हत्याकांड के लिए शस्त्रास्त्र की वृद्धि की हास्यास्पद स्पर्धा का दृश्य होगा।
चूंकि पिछले तीस वर्षों से मैं आज़ादी की लड़ाई के रंगमंच का मुख्य पात्र रहा हूं,
इसलिए मेरा मन भी हृदय को टटोलने वाले प्रश्नों से भरा है। क्या भारत की स्वाधीनता
उन सब बातों को तिलांजलि देने की तैयारी है, जिन्हें हमने प्रिय मानना सीखा था?
मेरे ख़्याल से आत्म-गौरव के बजाय हमारे लिए यह समय आत्म-निरीक्षण का, आत्म-परीक्षण
का और आत्म-शुद्धि का है। जो संग्राम इतना उदात्त माना गया उसका अन्त इतना अशोभनीय
होगा? गहरी पीड़ा के साथ मैं वैदिक ऋषियों की भांति प्रार्थना करता हूं – हे प्रभो!
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’”
भारत को स्वाधीनता मिलने वाली थी। परन्तु अपनी एकता व
अखंडता की बलि देकर! यह वह स्वतंत्रता नहीं थी जिसे गांधीजी या कांग्रेस ने सिद्ध
करने का बीड़ा उठाया था। लेकिन गांधीजी को इसमें निराशा का कोई कारण नहीं दिखाई
दिया। गांधीजी ने कहा भी, “मैं कभी निराश
नहीं होता। मैं जीवन भर विद्रोही और योद्धा रहा हूं।” असफल उनकी अहिंसा नहीं रही। बल्कि अहिंसा का पालन करने में
भारत की जनता असफल रही। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अपनी कल्पना की अहिंसा
जनता में उत्पन्न करने में गांधीजी की कार्य-पद्धति असफल रही। गांधीजी को इस दोष
को दूर करने के लिए प्रयत्न करना अनिवार्य लगा। इसलिए कितने दिनों तक गांधीजी अपने
को अलग-थलग रखते। अटल निश्चय के साथ वे जनता को यह बताने लगे कि विभाजन के बावज़ूद
एकता की लड़ाई कैसे जीती जा सकती है। उन्होंने कहा कि दोनों क़ौमों के बीच हार्दिक
एकता स्थापित करके विभाजन के दुष्परिणामों को मिटाया जा सकता है। उन्होंने
देशवासियों को आज़ादी मिलने पर क्या करना है, उनका क्या कर्त्तव्य होगा यह सब
समझाना शुरू कर दिया। “देश में
प्रजातंत्र आने वाला है। अब देश के नागरिक ही देश के असली मालिक होंगे। इसलिए
मालिक की जिम्मेदारी और गरिमा से देश की जनता को पेश आना चाहिए। सुचारु शासन के
लिए जनता को जागृत रहना चाहिए।” उन्होंने
कांग्रेस को भी समझाया कि “रचनात्मक कार्य
को प्राथमिकता देनी चाहिए। जेल गए हुए लोगों को मंत्री न बनाकर बाहर के सुयोग्य
कुशल व्यक्ति को शासन की जिम्मेदारी देनी चाहिए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को
सरकार से बाहर रहकर शासन का मार्गदर्शन करना चाहिए ताकि कांग्रेस जनता के संपर्क
में रहे और प्रजा से विमुख न हो जाए।” 1935 में इस तरह
का प्रयोग काफी सफल रहा था। लेकिन 1947 की अंतरिम सरकार में सभी वरिष्ठ नेता सत्ता
की कुर्सी पर आसीन थे। कांग्रेस का संस्थागत काम दूसरों पर छोड़ दिया गया था। इसलिए
सत्ता और सरकार में हमेशा अनबन बनी रही। गांधीजी जैसे सत्याग्रही के लिए यह पराभव
का ही काल माना जा सकता है। लेकिन सत्याग्रही की पराजय में भी ग्लानि का कारण नहीं
होता। उसका सत्य सदा उज्ज्वल होता है। इसलिए हार में भी सत्याग्रही निस्तेज नहीं
होता। इसलिए उन निराशा के दिनों में भी गांधीजी आशा, उत्साह, विश्वास और ओजस्विता
से भरे थे।
जैसे-जैसे 15 अगस्त नज़दीक आ
रहा था, गांधीजी का दिल दिल्ली से घबरा रहा था। वे नोआखाली या बिहार के लोगों के बीच काम करना चाहते थे। दिल्ली के सत्ताधारी
कांग्रेसियों को उनकी सलाह की ज़रूरत भी नहीं रह गई थी। कुछ लोगों ने तो उन्हें
उत्साह भंग करने वाला बताया। गांधीजी से तरह-तरह के प्रश्न पूछे जा रहे थे। आपने
बंटवारे के प्रश्न पर हार क्यों स्वीकार की। राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए
हिंसा बढ़ती जा रही है, इसका कारण क्या है? 30 वर्षों से जिस अहिंसा के सिद्धान्त
पर आप चल रहे थे, उसका यह अंतिम फल है क्या? गांधीजी अहिंसा को धर्म मानते थे,
जबकि कांग्रेस के लिए यह एक नीति थी। नीति तो ज़रूरत पड़ने पर बदली भी जा सकती है।
जिस अहिंसा का 30 वर्षों से पालन किया गया वह निष्क्रिय प्रतिकार था। पाकिस्तान
संबंधी निर्णय निश्चय ही ग़लत था, पर गांधीजी अब किससे लड़ते। सब तो अपने ही थे। 20
वर्षों तक उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में गोरों की प्रभु सत्ता के विरुद्ध लड़ाई की। 30
वर्षों से भारत में अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ रहे थे। किन्तु अपने ही देशवासियों
विरुद्ध लड़ने की कल्पना मात्र से ही वे कांप उठते थे। और असहयोग सिर्फ़ इसलिए कि
उनका निर्णय गांधीजी के निर्णय से भिन्न था, इसकी तो गांधीजी सोच भी नहीं सकते थे।
भूतकाल में भी कई ऐसे अवसर थे जब गांधीजी ने कांग्रेस के द्वारा उनसे अलग लिए गए
निर्णय की न तो आलोचना की न ही उसमें बाधा पहुंचाने की कोशिश की।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
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