सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-7
10.11 सूफ़ीमत पर भारतीय अध्यात्मवाद का प्रभाव
भिन्न-भिन्न देशों में विकसित होता हुआ 10वीं से 11वीं शताब्दी के दौरान सूफ़ीमत भारत में
प्रवेश करता है। सूफ़ीमत पर भारतीय विचारधाराओं की गहरी छाप पायी जाती है ,
विशेष तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में
विकसित होने के बाद। यद्यपि सूफीवाद की मूल जड़ें इस्लामिक रहस्यवाद में थीं, लेकिन भारत में आकर इसने यहाँ के वेदांत, योग और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के साथ
गहरा संवाद स्थापित किया।
सूफ़ियों ने अपने भीतर परमात्मा के प्रति प्रेम की पीड़ा (इश्क़-ए-हक़ीक़ी)
जगाई, उसमें भारतीय दर्शन या भारतीय
अध्यात्म-चिंतन भी सम्मिलित था। सूफ़ियों ने भारतीय दर्शन – अद्वैत वेदांत,
शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद आदि के मूल तत्व, शांतिपूर्ण एवं अहिंसामय वैष्णव धर्म और
प्रेम को पूरे आदर के साथ ग्रहण किया। उनकी विचारधारा अद्वैतवाद और
विशिष्टाद्वैतवाद के काफ़ी निकट है। इस साधना में भारतीय दर्शन के योग साधना और
भक्ति आंदोलन के प्रेम-तत्व का गहरा प्रभाव और समावेश था। भारतीय संतों की तरह
सूफियों ने भी परमात्मा को प्रियतम माना और आत्मा को उसकी प्रेमिका मानकर 'विरह' या प्रेम की पीड़ा को साधना का मुख्य मार्ग बनाया। कई शुरुआती सूफी
संतों ने भारतीय योगियों से प्राणयाम, ध्यान और
सांसों पर नियंत्रण के तरीके सीखे ताकि मन को वश में किया जा सके।
सूफी संत इब्न अल-अरबी द्वारा प्रचारित 'वह्दत-उल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत भारतीय अद्वैत वेदांत के बहुत निकट है।
मंसूर हलाज का "अन-अल-हक़" (मैं ही सत्य हूँ) का विचार उपनिषद के
"अहं ब्रह्मास्मि" जैसा प्रतीत होता है। दोनों ही विचारधाराएं
मानती हैं कि ईश्वर हर कण में मौजूद है और इंसान के भीतर ही वास करता है। भारत में
चिश्ती और सत्तारी जैसे प्रमुख सूफी सिलसिलों ने भारतीय योग साधना, नाथपंथ, वेदांत दर्शन, प्राणायाम और ध्यान
की विधियों को अपनी आंतरिक यात्रा में अपनाया। इनमें से कई संतों ने न केवल योगिक
क्रियाओं को अपनी साधना का हिस्सा बनाया, बल्कि हिंदू
दर्शन के ग्रंथों का अनुवाद और अध्ययन भी किया। उदाहरण के लिए, फारसी ग्रंथ 'बहर-उल-हयात' में योगियों की प्राण-साधना का सूफी परिप्रेक्ष्य में उल्लेख मिलता
है। मोहम्मद गौस ग्वालियर
(सत्तारी सिलसिला) ने प्रसिद्ध
संस्कृत योग ग्रंथ 'अमृतकुंड' का फारसी में 'बहर-उल-हयात' (जीवन का महासागर) नाम से अनुवाद किया।
सूफी साधना में प्राणायाम को 'हब्ज-ए-दम' कहा गया, जिसका उपयोग ध्यान केंद्रित करने के लिए
किया जाता था। हब्ज-ए-दम का शाब्दिक अर्थ 'सांस को रोकना या वश में करना' है। इस प्रक्रिया में साधक एक निश्चित ध्यान की स्थिति में बैठकर अपनी
सांस को लंबे समय तक रोककर रखता है,
ताकि मन को भटकाव से बचाया जा सके
और ईश्वर के स्मरण (जिक्र) में पूरी तरह एकाग्र हुआ जा सके। इसमें योगी या
प्राणयाम की तरह सांस को भीतर खींचकर (पूरक) एक खास केंद्र पर ध्यान केंद्रित करते
हुए रोका जाता है। सांस रुकी होने की इस अवस्था में दिल या दिमाग में ईश्वर के नाम
का निरंतर स्मरण किया जाता है,
जिससे आंतरिक शांति और आध्यात्मिक
ऊर्जा प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि भारतीय भारत और ईरान के संतों के मेल
तथा नाथ योगियों के संपर्क से यह प्राण-नियंत्रण की तकनीक सूफी साधना (विशेषकर
नक्शबंदी और चिश्ती सिलसिले) में आई। इसका मुख्य उद्देश्य सांस और नफ्स (अहंकार/वासना)
पर विजय पाना और रूहानी (आध्यात्मिक) गहराइयों को अनुभव करना है।
दिल्ली के प्रसिद्ध संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया प्राणायाम और श्वास
नियंत्रण (हठयोग की क्रियाओं) में इतने निपुण थे कि स्थानीय योगी उन्हें 'सिद्ध' या 'योगी सिद्ध' कहकर पुकारते थे। उनके आश्रम (खानकाह) में अक्सर नाथपंथी और
कनफटा योगियों का आना-जाना रहता था,
जिनके साथ वे मानव शरीर में स्थित
आध्यात्मिक केंद्रों (चक्रों) पर चर्चा करते थे। मोहम्मद गौस ने योग के 'कुंडलिनी चक्रों' की तुलना सूफी धर्म के 'लतइफ' (आध्यात्मिक केंद्रों) से की। उन्होंने
योगिक आसनों को सूफी ध्यान (मुरकबा) का हिस्सा बनाया। पंजाब के महान चिश्ती
संत बाबा फरीदुद्दीन गंजशकर (बाबा फरीद) ने हठयोगियों की तरह 'चिल्ला-ए-माकूस' (कुएं में 40
दिनों तक उलटा लटककर तपस्या करना)
जैसी कठिन शारीरिक साधनाएं की थीं।
सूफी संतों और भारतीय भारत के भक्ति आंदोलन के संतों ने प्रेम, समर्पण और व्यक्तिगत ईश्वर-आराधना पर बल
दिया। दोनों ने जातिगत व बाहरी कर्मकांडी आडंबरों को दरकिनार किया। बाबा
फरीदुद्दीन गंजशकर (बाबा फरीद) की शिक्षाओं और विचारों में भारतीय अध्यात्म की
इतनी गहरी झलक थी कि उनकी वाणी को सिखों के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी स्थान दिया गया। मुग़ल राजकुमार और सूफी साधक दारा शिकोह
वेदांत दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने माना कि उपनिषद और सूफी तसव्वुफ का
मूल एक ही है। दारा शिकोह ने 50
से अधिक उपनिषदों का संस्कृत से
फारसी में 'सिर्र-ए-अकबर' (सबसे बड़ा रहस्य) नाम से अनुवाद किया और भगवद्गीता का भी फारसी अनुवाद
करवाया। पंजाब के प्रसिद्ध सूफी कवि बाबा बुल्ले शाह की कविताओं में अद्वैत वेदांत
(Non-duality) का स्पष्ट प्रभाव दिखता है, जहाँ वे आत्मा और परमात्मा के बीच के हर
अंतर को मिटाकर 'अनलहक' (मैं ही सत्य हूँ / अहं ब्रह्मास्मि) की गूंज करते हैं। उनकी रचनाओं
में वाह्य धार्मिक भेद-भाव मिटाकर संपूर्ण सृष्टि में एक ही परम सत्य (ईश्वर या
ब्रह्म) के वास का वर्णन मिलता है। उनकी प्रसिद्ध काफिया जैसे "बुल्ला की
जाणा मैं कौण" में वे हिंदू,
मुस्लिम, मस्जिद या वेद जैसी सभी सीमाओं और भेदों को नकारते हैं। वे स्पष्ट रूप
से कहते हैं कि द्वैत (दोपन) को मिटा दो और सारे झगड़े खत्म करो, क्योंकि हिंदू और तुर्क (मुसलमान) अलग नहीं
बल्कि उसी एक परमात्मा का रूप हैं। अद्वैत वेदांत की तरह वे आत्म-साक्षात्कार (अवल
आखिर आप नू जाणा) पर जोर देते हैं,
जहां व्यक्तिगत अहंकार (फना) गल
जाता है और केवल एक ही अद्वैत चेतना शेष रहती है।
सूफियों के निवास स्थल 'खानकाह' की कार्यप्रणाली और एकांत साधना (खिलवत)
पर प्राचीन भारतीय श्रमण एवं बौद्ध मठों/विहारों का प्रभाव माना जाता है। खलवत (या खलवा) एक आध्यात्मिक एकांतवास है, जो आमतौर पर चालीस दिनों का होता है। इस
दौरान साधक बाहरी दुनिया से कटकर किसी गुरु (शेख) के मार्गदर्शन में लगातार
ध्यान, प्रार्थना और आंतरिक शुद्धि का अभ्यास करता
है ताकि उसका मन सांसारिक मोह से हटकर ईश्वर से जुड़ सके। एकांतवास में सांसारिक
शोर और मेल-मिलाप से दूर विशेष कमरे या स्थान पर समय बिताया जाता है। इसका
उद्देश्य मन और इंद्रियों (नफ्स) को नियंत्रित कर हृदय (कल्ब) को ईश्वर के स्मरण
(जिक्र) में लीन करना।
सूफियों की संगीतमय आध्यात्मिक सभाओं ('समां') ने भारतीय संगीत परंपराओं (जैसे कव्वाली और शास्त्रीय रागों) को
आत्मसात किया, जो रूढ़िवादी इस्लामिक परंपरा से हटकर
भारतीय परिवेश की देन थी। सूफी संतों का सांसारिक सुखों को त्यागकर सादा जीवन जीना
(तसव्वुफ़) भारतीय सन्यास और वैराग्य की परंपरा से प्रेरित दिखता है। बौद्ध
और जैन धर्म के अहिंसा और आत्म-शुद्धि के विचारों ने भी सूफी आचरण को प्रभावित
किया। सूफी संतों ने स्थानीय भारतीय भाषाओं (जैसे हिंदवी, पंजाबी, सिंधी) में अपनी बात कही, जिससे भारतीय लोक-कहानियां और प्रतीक सूफी
साहित्य का हिस्सा बन गए।
क़ुरआन में “साबई” का उल्लेख मिलता है, जो एकेश्वरवाद को मानने वाले थे और जीवन
में पवित्रता पर अधिक बल देते थे। ये लोग आर्यवंश के बतलाए जाते थे, जो प्राचीन ईरान और भारतवर्ष में मंद (मीडियन) जाति के नाम से प्रसिद्ध थे। पवित्र क़ुरआन
में "साबई" का उल्लेख तीन स्थानों पर (सुरह अल-बक़रह 2:62, सुरह अल-माइदाह 5:69 और सुरह अल-हज 22:17) यहूदियों और ईसाइयों के साथ किया गया है। क़ुरआन
में इन्हें उन धार्मिक समूहों में गिना गया है जो यदि अल्लाह और अंतिम दिन (आख़िरत)
पर ईमान रखें और अच्छे कर्म करें,
तो उनके लिए उनके रब के पास प्रतिफल
का वादा किया गया है। इन्हें एक स्वतंत्र धार्मिक समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया
गया है। अधिकांश पारंपरिक और शास्त्रीय विद्वानों (जैसे इब्ने कसीर, ताबरी आदि) का मानना है कि शुरुआती दौर में
साबई ऐसे लोग थे जो किसी स्पष्ट मूर्तिपूजा या बहुदेववाद से हटकर एक ईश्वर
(एकेश्वरवाद) या शुरुआती पैगंबरों की शिक्षाओं का पालन करते थे। कुछ शुरुआती और
बाद के टीकाकारों ने यह भी उल्लेख किया है कि कुछ क्षेत्रों (जैसे हारान) के साबई
सितारों या ग्रहों की पूजा करते थे,
जबकि इराक के मैडियन (Mandaeans) समुदाय को भी साबई माना गया है जो बपतिस्मा
और जल अनुष्ठानों के साथ एक सर्वोच्च ईश्वर को मानते हैं। क़ुरआन में साबिई / 'शेबी' वर्ग की चर्चा की गई है। संभव है कि वे भारत के शैव रहे हों और बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया
हो।
तैत्तिरियोपनिषद मृणुवल्ली का प्रथम अंश देखें : “यता
वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्य संविशन्ति। तद्वि जिज्ञास्व, तदब्रह्मेति”। अर्थात् ये सब प्रत्यक्ष दिखने वाले
प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं,
उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित
रहते हैं तथा प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसके तत्व से जानने की इच्छा कर, वही ब्रह्म है।
एक और मंत्र देखें : “एष
योनिः सर्वस्य प्रभ वाप्ययौ हि भूतानाम्”। अर्थात् वही उद्गम स्थल है जिससे सब
उत्पन्न होते हैं और उसी में सब लौट जाते हैं। वेदों में स्पष्ट रूप से घोषणा की गई है –“एको
ब्रह्म द्वितीयो नास्ति” – ईश्वर
एक है, उसकी सत्ता में कोई दूसरा सम्मिलित नहीं
है। “न
तस्य प्रतिमा अस्ति” – उसका
कोई रूप या आकार नहीं है।
पवित्र क़ुरआन में प्रभु के लिए “अल्लाह” शब्द का प्रयोग हुआ है। क़ुरआन के हिन्दी
अनुवादक मुहम्मद फ़ारूक़ ख़ां के अनुसार अल्लाह शब्द वास्तव में ‘‘अल्-इलाह” था, जो
साधारण परिवर्तन के बाद “अल्लाह” हो गया। अल्-इलाह (अल्लाह) में ‘अल्’ शब्द उसी प्रकार प्रयुक्त हुआ है जैसे
अंग्रेज़ी में किसी शब्द से पहले ‘दि’ लगाकर
उसे जातिवाचक से व्यक्तिवाचक बना देते हैं। इस प्रकार ‘अल-इलाह’ य ‘अल्लाह’ से अभिप्रेत एक विशिष्ट सत्ता ही हो सकती
है। इसलिए अल्लाह का अर्थ हुआ एक प्रमुख और विशिष्ट इलाह (“ईश्वर”
या “पूज्य”)। ऋग्वेद में ईश्वर के लिए “इल्य” शब्द का प्रयोग हुआ है, अर्थ है “स्तुतियोग्य”।
यजुर्वेद में ईश्वर के “इला” शब्द का प्रयोग किया गया है, “नमस्ते इलाम्अस्तु”।
इसी तरह “नास्तिक” उन लोगों को कहा गया है जो वेदों में
वर्णित सत्यों को मानने से इंकार करते हैं या वेदों की निन्दा करते हैं। उधर क़ुरआन
में उन लोगों को “काफ़िर” कहा गया है, जो
उन सच्चाइयों को मानने और स्वीकार करने से इनकार करें जिनकी शिक्षा इस्लाम में दी
गई है।
जीवात्मा और परमात्मा के मिलन से ही मोक्ष संभव है। यह मिलन परमात्मा
के प्रति पूर्ण समर्पण से प्राप्त होता है। मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर चलने के
लिए पथ प्रदर्शक की आवश्यकता पड़ती है। पथ प्रदर्शक को उन्होंने पीर (शिक्षक) कहा। सूफ़ियों की परंपरा में गुरु अथवा पीर को ईश्वर की प्राप्ति का माध्यम माना गया।
अतः उन्होंने गुरु भक्ति पर बल दिया। उलेमा को ये विचार रास नहीं आए। उनके अनुसार
मनुष्य और ईश्वर दोनों अलग हैं। क़ुरआन ईश्वर के द्वारा दिया गया आदेश है एवं यह
मनुष्य का फ़र्ज़ है कि वह ईश्वर के आदेश को माने। पर अधिकांश सूफ़ी-साधक जगत को
ब्रह्म से अलग नहीं मानते –
जब
चीन्हा तब और न कोई।
तन, मन, जिउ, जीवन सब सोई।
हौं
हौं कहत धोख इतराही।
जब
भा सिद्ध कहां परछाही।
(जायसी)
अहमद सरहिंदी जैसे कुछ सूफ़ियों ने वहदत-अल-वुजुद की आलोचना की है। अहमद
सरहिंदी ने लिखा है कि ब्रह्मांड का अपना कोई अस्तित्व नहीं है और यह आवश्यक होने के
अस्तित्व की छाया है। उन्होंने यह भी लिखा कि किसी को ब्रह्मांड के अस्तित्व को निरपेक्ष
से समझना चाहिए और निरपेक्ष अस्तित्व के कारण नहीं बल्कि उसके सार के कारण मौजूद है।
10.12 वाजिबुल वुजूद
वाजिब-उल-वुजूद इस्लामी
दर्शन और सूफी अध्यात्म की एक बुनियादी अवधारणा है, जिसे
प्रसिद्ध दार्शनिक इब्न सीना ने विकसित किया और बाद में महान सूफी संत इब्न अरबी
ने अपने सिद्धांतों में शामिल किया। जिसका अस्तित्व दूसरे के सहारे न हो, अर्थात
ईश्वर, अल्लाह को अस्तित्व में आने के लिए किसी अन्य कारण, वस्तु या
कर्ता की आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं-भू है, वाजिब-उल-वुजूद ("अनिवार्य
अस्तित्व" या "परम अस्तित्व") कहलाता है। यह शब्द केवल और केवल अल्लाह
(ईश्वर) के लिए उपयोग होता है। यह वह परम सत्ता यानी ईश्वर है जिसका होना अपने
आप में जरूरी है। यह किसी और पर निर्भर नहीं है, बल्कि पूरी
कायनात और बाकी सभी चीजें इसी के अस्तित्व पर टिकी हुई हैं। अल्लाह अजन्मा और
अनश्वर है। उसका न कोई आरंभ है और न कोई अंत। वह हमेशा से था और हमेशा रहेगा। उसके
अलावा जो कुछ है सब परिवर्तनशील और नश्वर है। वह रचयिता है और सभी जीव उसी की एक
रचना है। उसके अलावा वास्तविक अस्तित्व किसी और का नहीं है। उसने उसे रूप देकर इस
सृष्टि में पैदा किया। ईश्वर एक विशाल महासागर की तरह है। यही 'वाजिबुल
वुजूद' है। हम सब उस सागर में उठने वाली लहरों
की तरह हैं। लहर का सागर से अलग कोई अस्तित्व नहीं होता। लहर पानी ही है, बस उसका रूप
अलग दिखता है। इसी तरह, पूरी कायनात ईश्वर का ही एक रूप या
प्रतिबिंब है।
जीव
का शरीर और आत्मा है। जिसके कारण भेद पैदा हो गया है। तमाम स्रोतों का मूल वाजिबुल
वुजूद (जिसका अस्तित्व किसी दूसरे अस्तित्व का
मुहताज न हो) से संबद्ध है। बिलकुल ऐसे ही जैसे सूर्य और उसका प्रकाश एक है लेकिन
शरीरों पर पड़ कर उसके अनेकता का आभास होने लगता है। ‘हक़ीक़ते-नूर’ (प्रकाशवाद) को सूफ़ीमत में
काफ़ी महत्व दिया गया है। इसे ‘फ़लसफ़ा-अलइशराक़’ कहा गया। अरबी
शब्द ‘इशराक़’ का अर्थ होता
है प्रकाश।
क़ुरआन
में कहा गया है –
‘अल्लाह आकाशों तथा धरती का प्रकाश है। (मोमिन के
दिल में) उसके प्रकाश की मिसाल ऐसी है जैसे एक ताक़ है, जिसमें एक
चिराग़ है - वह चिराग़ एक फ़ानूस में है। वह फ़ानूस ऐसा है मानो चमकता हुआ कोई
तारा है। - वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकतवाले वृक्ष के तेल से जलाया जाता है, जो न पूर्वी
है न पश्चिमी। उसका तेल आप ही आप भड़का पड़ता है, यद्यपि आग
उसे न भी छुए। प्रकाश पर प्रकाश! - अल्लाह जिसे चाहता है अपने प्रकाश के प्राप्त
होने का मार्ग दिखा देता है। अल्लाह लोगों के लिए मिसालें प्रस्तुत करता है।
अल्लाह तो हर चीज़ जानता है। (क़ुरआन 24/35)”
इस
आधार पर यह कहा जा सकता है कि परम तत्व प्रकाश है और पदार्थ अप्रकाश है। यह नूर
प्रकाश के ऊपर है, और मनुष्य को सत्य मार्ग की ओर निर्देशित करता है। यदि वह
(ईश्वर) प्रकाश न करे तो किसी और माध्यम से उसे नहीं पाया जा सकता। ब्रह्मांड का
हर कण उसके ही प्रकाश से रौशन है। अर्थात ईश्वर आकाशों तथा
धरती की व्यवस्था करता और उन के वासियों को संमार्ग दर्शाता है। अल्लाह की पुस्तक
और उस का मार्ग दर्शन उस का प्रकाश है। यदि उस का प्रकाश न होता तो यह विश्व
अन्धेरा होता। उस की ज्योति ईमान वालों के दिलों में ऐसे है जैसे किसी ताखा में
अति प्रकाशमान दीप रखा हो। मूल की दृष्टि से “सूरतों” में अनेकता नहीं है, लेकिन शरीरों
की भारी संख्या की दृष्टि से वे अनेक दिखाई देती हैं। साथ ही सूर्य
का प्रकाश एक होने के बावज़ूद वह अनेक शरीरों पर पड़ता है, तो उनकी
क्षमताओं की दृष्टि से उसके प्रतिबिम्बित होने की विभिन्न श्रेणियां हो जाती हैं।
सूक्ष्म शरीर जैसे वायु, इसमें सूर्य
की किरणें बिलकुल प्रतिबिम्बित नहीं होतीं, किन्तु
कलईदार शरीर जैसे दर्पण में किरणें अधिक प्रतिबिम्बित होती हैं।
यही
हाल आत्मा का है। आत्मा पर अल्लाह का “फ़ैज़ान” (कृपा, दया) होता
है। जिस आत्मा में जितनी क्षमता होती है, वह उसी हिसाब
से परमात्मा की ज्योति से ज्योतिर्मय होती है। इंसान का मुख्य उद्देश्य अपने
अहंकार को मिटाकर यानी फना की स्थिति पाकर उस मूल 'वाजिबुल
वुजूद' में खुद को विलीन करना है। सूफी संतों के
अनुसार, ईश्वर एक छिपा हुआ खजाना था और वह
प्रकट होना चाहता था। उसने इस दुनिया को एक आईने (Mirror) की तरह
बनाया। इस आईने में जो रूप दिखाई देता है, वह ईश्वर की
ही सुंदर कला और गुण हैं। इंसान इस आईने का सबसे साफ हिस्सा है, जिसमें ईश्वर
का अक्स सबसे बेहतर दिखता है। एक साधक तीन आध्यात्मिक चरण (मरातिब-ए-वुजूद) से
गुज़रता है। अहदियत ईश्वर का वह रूप है जो सब चीज़ों से परे है, जिसे कोई देख
या समझ नहीं सकता। वाहिदियत वह चरण है जहाँ ईश्वर अपने गुणों (जैसे दया, ज्ञान, न्याय) के
साथ प्रकट होता है। नासुत हमारा भौतिक संसार है, जहाँ ईश्वर
के गुण इंसानों और प्रकृति के रूप में दिखाई देते हैं। जब एक सूफी साधक इस
सिद्धांत को गहराई से जान लेता है, तो वह दो चरणों से गुजरता है, फना
साधक का यह मान लेना है कि उसका अपना कोई वजूद नहीं है। उसका अहंकार पूरी तरह
मिट जाता है। बका अपने अस्तित्व को मिटाकर ईश्वर के अनिवार्य अस्तित्व
(वाजिबुल वुजूद) में हमेशा के लिए जी उठना।
सूफीमत
के वाजिबुल वुजूद और विशेष रूप से इससे जुड़े वहदत-उल-वुजूद (अस्तित्व की
एकता) सिद्धांत का इस्लामी इतिहास में कड़ा विरोध और आलोचना हुई। रूढ़िवादी
विद्वानों (उलेमा) ने इसे इस्लाम की मूल मान्यताओं के खिलाफ
माना। मूल इस्लाम की मान्यता है कि अल्लाह और उसकी बनाई हुई सृष्टि (इंसान, दुनिया) दो
अलग-अलग चीजें हैं। अल्लाह रचयिता (खालिक़) है और दुनिया
उसकी रचना (मख़लूक़) है। आलोचकों का मानना था कि यदि सब कुछ
ईश्वर का ही रूप है, तो इंसान और पत्थरों में भी ईश्वर का अंश
मानना पड़ेगा। रूढ़िवादी विद्वानों ने इसे सर्वेश्वरवाद या 'शिरक' माना, जो इस्लाम
में सबसे बड़ा पाप है। आलोचकों का तर्क था कि यह दुनिया नश्वर, अशुद्ध और
पापों से भरी है। यदि इस सृष्टि को ईश्वर का ही प्रतिबिंब या हिस्सा मान लिया जाए, तो इसका मतलब
होगा कि संसार की अशुद्धता और कमियाँ ईश्वर से भी जुड़ रही हैं। यह अल्लाह की
पवित्रता और उसकी सर्वोच्चता के खिलाफ माना गया। शरिया कानून इस बात पर टिका है कि
इंसान को अच्छे कर्मों के लिए पुरस्कार (जन्नत) और बुरे कर्मों के लिए सजा
(जहन्नुम) मिलेगी। आलोचकों को डर था कि अगर इंसान यह मान लेगा कि उसका अपना कोई
स्वतंत्र वजूद नहीं है और वह ईश्वर का ही हिस्सा है, तो वह अपने
कर्मों की जिम्मेदारी लेना छोड़ देगा। इससे धार्मिक नियम, नमाज़ और
रोज़े जैसे कर्तव्य कमजोर पड़ जाएंगे। प्रसिद्ध सूफी संत मंसूर हल्लाज ने
आध्यात्मिक चरम पर पहुँचकर "अनल-हक"
(मैं ही सत्य/ईश्वर हूँ) का नारा दिया था। रूढ़िवादी विद्वानों ने
इसे घोर अपमान और अहंकार माना, जिसके कारण 10वीं शताब्दी
में मंसूर हल्लाज को मृत्युदंड दे दिया गया। इस तरह के बयानों ने इस सिद्धांत के
प्रति विरोध को और उग्र बना दिया।
इब्न
अरबी के इस सिद्धांत के विरोध में आगे चलकर शेख अहमद
सरहिंदी (जिन्हें मुजद्दिद अलिफ सानी भी कहा जाता
है) ने एक नया सिद्धांत दिया, जिसे 'वहदत-उश-शुहूद' कहा गया। उन्होंने कहा कि दुनिया ईश्वर का
रूप नहीं है, बल्कि ईश्वर की कारीगरी का केवल एक गवाह या
सबूत (Witness) है। रचयिता और रचना कभी एक नहीं हो सकते।
*** *** ***
मनोज
कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।