सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-9
10.15 सूफ़ी दर्शन
का दूसरा सिद्धांत
सूफ़ी
दर्शन का दूसरा सिद्धांत यह है कि धार्मिक क्रिया-कर्म को विशेष महत्व देना व्यर्थ
है। नजात (मोक्ष) पाने का मार्ग तो यह है कि अपना हृदय पवित्र रखें क्योंकि ईश्वर शुद्ध
हृदय में निवास करता है।
सूफी
संत मानते हैं कि ईश्वर (अल्लाह) किसी भौतिक स्थान पर नहीं, बल्कि मनुष्य
के शुद्ध और पवित्र हृदय में निवास करता है। सूफ़ी, मज़हबी दस्तूर
को भी अपनी व्यापक मानवीय दृष्टि के साथ ही स्वीकारते हैं। वे विधि मार्ग विरोधी न
थे। क़ुरआन के साथ साथ उन्हें वेद वचन में भी
सार नज़र आया:
राघव पूज
जाखिनी, दुइज देखाएसि सांझ।
वेदपंथ जे
नहिं चलहिं, ते भुलहि बन मांझ।
झूठ बोल थिर
रहै न रांचा।
पंडित सोइ
वेदमत सांचा।
सूफी
विचारधारा में तज़किया-ए-नफ़्स (आत्मा की शुद्धि) की बात की गई है। उनके
अनुसार लालच, क्रोध और घमंड को दिल से निकालना जरूरी है।
ईश्वर से निस्वार्थ और सच्चा प्रेम करना ही मुक्ति का आधार है। सूफ़ी मानते हैं कि इंसान का दिल एक आईने
(दर्पण) की तरह है। जब दिल से दुनियावी इच्छाओं का मैल साफ होता है, तभी उसमें
ईश्वर का नूर (प्रकाश) चमकता है। हर जीव में ईश्वर का अंश देखना और सबसे प्रेम
करना उनका लक्ष्य होना चाहिए। बिना किसी भेदभाव के मानवता की सेवा करना ही सच्ची
इबादत है।
हज़रत अबुल हसन एक
विख्यात सूफ़ी संत थे। एक दिन एक भक्त उनके पास आया और बोला, “मैं सत्संग और उपासना करते-करते थक गया हूं। मुझे
कोई लाभ नहीं हो रहा। मैं इस उलझन में हूं कि मुझे क्या करना चाहिए?”
हज़रत अबुल हसन ने उस व्यक्ति से पूछा, “तुम्हारी समस्या क्या है?”
उस व्यक्ति ने कहा, “मुझे गुस्सा बहुत आता है। लालच के मारे मेरा बुरा
हाल है। दुनिया की मोह-माया मुझे बहुत सताती है। इन सब कारणों से मैं बहुत दुखी
हूं। अब आप ही मुझे कोई रास्ता दिखाइए।”
हज़रत अबुल हसन ने उसकी बातें बड़े ध्यान से सुनीं,
फिर बोले, “ज़िंदगी की एक बहुत बड़ी सच्चाई है, इसे याद रख।”
उस व्यक्ति ने पूछा, “वह सच्चाई क्या है?”
हज़रत अबुल हसन ने उससे पूछा, “गंदे बर्तन में कोई चीज़ डालो, तो वह कैसी हो जाती
है?”
उस व्यक्ति ने कहा, “गंदी।”
हज़रत अबुल
हसन ने उसे समझाया, “याद रख, दिल
तेरा बर्तन के समान है। जब तक वह साफ़ नहीं होगा, तब तक तू जो कुछ भी उसमें डालेगा,
वह भी गंदा हो जाएगा। पहले दिल साफ़ कर।”
सत्संग
और उपासना का फ़ायदा तभी मिलता है, जब दिल साफ़ होगा। मन में तरह-तरह की वासनाएं और
दूसरे विकार भरे होते हैं, उन्हें साफ़ करके ही इंसान कुछ पा सकता है। मौलाना
जलालुद्दीन रूमी कहते हैं कि ईश्वर को खोजने के लिए मस्जिद, मंदिर या
काबा जाने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने लिखा है, "मैंने
ईसाइयों के क्रूस को देखा, वह वहाँ नहीं
था। मैं मंदिरों में गया, वहाँ भी उसका
कोई निशान नहीं था। अंत में, मैंने अपने
दिल के भीतर देखा; वह वहीं रहता
था, वह कहीं और नहीं था।" मौलाना रूमी
के अनुसार, आपका दिल एक दर्पण है। अगर इस पर
अहंकार और इच्छाओं की धूल जमी रहेगी, तो इसमें
ईश्वर का अक्स (चेहरा) दिखाई नहीं देगा।
पंजाब
के महान सूफी संत बुल्ले शाह बाहरी दिखावे और कर्मकांड के सख्त खिलाफ थे।
उनका एक प्रसिद्ध कलाम है:
मक्का गयां, गल्ल मुकदी
नाहीं,
जचरों दिलों ना आप मुकाइए।
अर्थात: केवल
मक्का जाने से बात नहीं बनती, जब तक इंसान अपने दिल से 'मैं' यानी अहंकार
को खत्म नहीं करता। बुल्ले शाह मानते थे कि दिल को साफ किए बिना की गई कोई भी
इबादत बेकार है।
10.16 सूफ़ी दर्शन
का तीसरा सिद्धांत
सूफ़ी दर्शन
का तीसरा सिद्धांत यह है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए अहंकार (नफ़्स) का नाश आवश्यक
है। जब तक मनुष्य में “मैं” की भावना रहती
है तब तक वह ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकेगा।
इसे
सूफ़ी मत में 'फ़ना' (अहंकार का
मिट जाना) कहा जाता है, जिसके बाद ही 'बक़ा' (ईश्वर में
शाश्वत जीवन) प्राप्त होता है। नफ़्स (अहंकार) सांसारिक इच्छाओं और बुरे
विचारों का केंद्र है। ईश्वर तक पहुँचने के लिए नफ़्स को पवित्र करना (तज़किया-ए-नफ़्स)
पहली शर्त है। जब तक व्यक्ति 'मैं' (अहंकार) से
मुक्त नहीं होता, तब तक वह 'तू' (ईश्वर) से
सच्चा प्रेम नहीं कर सकता। जैसे नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है, वैसे ही
आत्मा अहंकार मिटाकर परमात्मा में लीन हो जाती है।
अहंकार
बहुत सूक्ष्म चीज़ है। यह रहस्यमय भी है। मनुष्य की जो मूलभूत समस्याएं हैं, उनमें
से यह प्रमुख समस्या है। यह सत्य और साधक के बीच बाधा उत्पन्न करता है। यह कोई
तथ्य नहीं है। यह एक विचार है। जब कोई कहता है कि इस पूरे ब्रह्मांड के केन्द्र
में ‘मैं ही हूं’, तो उस
व्यक्ति का अहंकार एक विचार के रूप में उसके इस कथन में झलकता है। यहाँ व्यक्ति
खुद को दूसरों से श्रेष्ठ या ब्रह्मांड का स्वामी समझता है। यह अज्ञानता और भ्रम
से पैदा होता है। लेकिन यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिनके अंदर अहंकार है, उनके
अंदर अंधकार है। जब अहंकार टूटता है तो आंखें खुल जाती हैं, व्यक्ति होश में आ
जाता है। उसकी मूर्च्छा ख़त्म हो जाती है। अहंकार छोड़ते ही उसकी सारी कामनाएं गिर
जाती हैं। इसलिए साधना के पथ पर आगे बढ़ने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। व्यक्ति
खुद को ब्रह्मांड से अलग नहीं देखता; वह अनुभव
करता है कि जो चेतना (ईश्वर) पूरे ब्रह्मांड को चला रही है, वही उसके
भीतर भी है। जैसे पानी की एक बूँद समुद्र में मिलकर कहे कि "मैं ही समुद्र
हूँ", वैसे ही यह कथन अहंकार का नहीं बल्कि परम
सत्य का अनुभव है।
एक कथा है। एक शिष्य अपने एकान्तप्रिय गुरु से मिलने गया।
गुरु की कुटिया का दरवाज़ा अंदर से बंद था। शिष्य ने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़
आई, “कौन है?”
शिष्य ने अहंकार से जवाब दिया, “मैं।”
दरवाज़ा नहीं खोला गया।
शिष्य ने काफ़ी समय तक सोच-विचार किया। फिर उसने अहंकार
रहित होकर कुटिया का दरवाज़ा खटखटाया। फिर अंदर से गुरु की आवाज़ आई, “कौन है?”
शिष्य ने विनम्र स्वर में जवाब दिया, “तू।”
यह सुनकर गुरु ने दरवाज़ा खोल दिया। शिष्य गदगद हो गया।
वह इस साधना के रहस्य को समझ गया था।
कहा गया
है,
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं
नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, ता मैं दो न समाहिं॥
जिसके भीतर अहंकार नहीं होता, उसके भीतर डर भी नहीं
होता। उसे कोई चीज़ डरा नहीं सकती।
जब हज़रत मंसूर हल्लाज को फांसी दी जा रही थी, तो उन्हें
देखने के लिए लाखों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। मंसूर हल्लाज उस अंतिम घड़ी में भी हंसे
जा रहे थे। किसी ने पूछा, “मंसूर तुम
पागल तो नहीं हो गए हो? ये लोग तुम्हारी जान लेने जा रहे हैं, और एक तुम हो कि
हंसे जा रहे हो।”
हज़रत मंसूर हल्लाज ने कहा, “मैं तो उनकी नादानी पर हंस रहा हूं,
वे एक ऐसे व्यक्ति को मारने जा रहे हैं, जो है ही नहीं।”
उस
वक़्त भी मंसूर हंस रहे थे। वे पागल नहीं थे। वे पूरे होश में थे। अहंकार को गिराने
के लिए बहुत होश, निरंतर जागरूकता और साक्षी भाव की ज़रूरत होती है। बिना होश के
अहंकार को पहचानना और उसे मिटाना पूरी तरह असंभव है। साधक को सजग रहना पड़ता है।
सजग इसलिए रहना पड़ता है क्योंकि एक
आध्यात्मिक मनुष्य जिसने अहंकार का त्याग कर दिया है, उसके नज़दीक बहुत से चमत्कार
होते हैं। वह उन चमत्कारों को करता नहीं, बस ये चमत्कार घटित होते हैं। इन चमत्कारों
को अपनी शक्ति मान लेने की वे भूल न कर बैठें इसलिए उन्हें सजग रहना पड़ता है। अहंकार
कोई स्थूल वस्तु नहीं है जिसे पकड़कर फेंका जा सके। यह एक विचार प्रक्रिया और आदत है।
यह बहुत चालाक है; जब आप इसे 'त्याग' के माध्यम से
गिराने की कोशिश करते हैं, तो यह "मैं बहुत बड़ा त्यागी
हूँ" का नया 'धार्मिक अहंकार' ओढ़ लेता है।
इसे केवल गहरे होश (साक्षी भाव) से ही पकड़ा जा सकता है, बलपूर्वक
दबाकर नहीं।
सूफ़ी
साधक निरंतर अपने दिल और विचारों पर पहरा देता है। वह होश रखता है कि कहीं कोई
सांसारिक इच्छा या अहंकार (नफ़्स) चुपके से उसके भीतर न प्रवेश कर जाए।
साधकों का कहना है कि अपने विचारों, भावनाओं और
अहंकार को केवल एक होशपूर्ण दर्शक की तरह देखें। जैसे ही आप अहंकार के प्रति पूरी
तरह होश में आते हैं, वह पिघलने लगता है। अहंकार अंधकार की तरह
है। आप अंधकार से लड़कर उसे हरा नहीं सकते; आपको केवल प्रकाश
(होश) जलाना होता है। जब आप होश पूर्वक देखते हैं कि कैसे आपका 'मैं'
(Ego) हर बात में अपनी प्रशंसा, सुरक्षा या
श्रेष्ठता ढूंढ रहा है, तो देखते ही देखते उसकी शक्ति कम
होने लगती है। होश में आते ही तादात्म्य टूट जाता है। आप समझ जाते हैं कि
"मैं यह अहंकार नहीं हूँ, मैं तो इसे देखने वाली चेतना
हूँ।"
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मनोज
कुमार
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