महात्मा गांधी हत्या केस-6
भारत का विभाजन
विभाजन हिंदू-मुस्लिम
वैमनस्य का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम था। भारत के विभाजन के लिए सामान्यतः अंग्रेज़ी
सरकार, गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मुहम्मद अली जिन्ना को
दोषी ठहराया जाता है। किंतु यह भी सत्य है कि भारत की एकता बनाए रखने के लिए
यथासंभव प्रयास किए गए। वे विफल हो गए। इसके लिए किसी एक पक्ष या किसी एक व्यक्ति
को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भारत का विभाजन एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम था।
इसके लिए न तो अंग्रेज़ी राज, न जिन्ना, न कांग्रेस, और न ही गांधी, नेहरू, पटेल या
सांप्रदायिकता की भावना अकेले उत्तरदायी थी। इस सभी ने चाहे-अनचाहे विभाजन की
प्रक्रिया में सहयोग दिया। जिन्ना की नए राष्ट्र की लालसा और नेहरू पटेल द्वारा
भारत को शीघ्र अंग्रेज़ी राज से मुक्त कराने की प्रबल उत्कंठा ने अंततः 14-15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और भारत का निर्माण कर दिया। भारत
दो हिस्सों में बंट गया।
1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुस्लिम साथ मिल कर लड़े थे। तब हिन्दू-मुस्लिम में फूट डालकर अपने साम्राज्य की नींव
पक्की करने की नीति अंग्रेजों ने अपनायी और लॉर्ड करजन ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया। लेकिन उस समय ‘फूट डालो और राज करो' नीति कारगर न हो पायी। हिन्दू-मुस्लिम हाथ में हाथ डाल कन्धे से कन्धा मिलाकर अंग्रेजों के विरोध में खड़े हुए और विभाजन रद्द करवाया। यह देखकर अंग्रेजों ने सोचा कि साम्राज्य बचाये रखने के
लिए दोनों में फूट डालने की नीति आगे बढ़ाना
आवश्यक है।
कांग्रेस के जिम्मे यह
काम था कि वह विभिन्न वर्गों, समुदायों, समूहों और अंचलों को एक राष्ट्र के ढांचे में लाये। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस इस
राष्ट्र-निर्माण के काम को पूरा नहीं कर सकी। खासकर मुसलमानों को राष्ट्र के साथ नहीं जोड़ सकी। दूसरी तरफ़
ब्रिटिश शासक हिटलर के ख़िलाफ़ तो युद्ध जीत गए लेकिन भारतीय मोरचे पर हार गए थे। भारत
में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र काफी बड़ा हो चुका था। आज़ाद हिंद
फौज के मुकदमों के कारण राष्ट्रीय चेतना का विस्तार आन्दोलन की मुख्यधारा के बाहर
के लोगों तक हो चुका था। यहां तक कि सेना और नौसेना के ने भी ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़
विद्रोह का तेवर दिखाया दिया था। इन सब से ब्रिटिश अधिकारियों का मनोबल गिरता जा
रहा था। राष्ट्रीय आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के असर का ख़ात्मा कर दिया था।
औपनिवेशिक शासन का सामाजिक आधार सिमट रहा था। सरकार परस्त अधिकारी ब्रिटिश राज से
बाहर निकल रहे थे। भारतीय सिविल सेवा में ब्रिटिश वर्चस्व समाप्त हो चुका था।
सामूहिक अहिंसक कार्रवाइयों के द्वारा सत्ता का भय ख़त्म हो चुका था। कांग्रेस की
सरकारों ने लोगों में आत्मविश्वास का संचार भी किया था। यह बात जब ब्रिटिश सत्ता
को समझ में आ गई तो उन्होंने यह मान लिया कि अब सत्ता का हस्तांतरण तथा भारत की
स्वतंत्रता का समय आ गया है। हां यह निर्णय ज़रूर उन्होंने लिया कि ब्रिटेन के साथ
रिश्ता क्या होगा, इस बारे में समझौता कर सम्मानपूर्वक भारत छोड़ दिया जाए।
समझौते के लिए कांग्रेस भी उत्सुक
थी। बड़े आन्दोलन की तैयारी का प्रदर्शन कर वह सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहती थी।
इधर सितम्बर 1946 के बाद से ब्रिटिश सरकार ने ‘अल्पमत को बहुमत की प्रगति रोकने की
छूट नहीं देने’ की नीति अपना ली थी। लीग की इस मांग को परे कर दिया गया कि लीग की
मंज़ूरी के बिना कोई भी समझौता नहीं होगा। ब्रिटिश सरकार ने भारत को आज़ादी देने का
निर्णय कर लिया था और ब्रिटिश सरकार का हित इसी में था कि भारत अखंड रहे। लेकिन
जिस जिन्ना को और उसके मुसलिम लीग को इतने वर्षों से संरक्षण दे कर खड़ा किया था,
वह अखंड भारत कहां स्वीकार करने वाला था। वह पूरी ताकत के साथ विभाजन के लिए अड़
गया। कांग्रेस यह कहती रही कि अगर विभाजन होना भी है तो वह आज़ादी के बाद होना
चाहिए। जिन्ना ने सीधी कार्रवाई घोषित कर दी। लीग अंतरिम सरकार में शामिल हो कर भी
सरकार की गतिविधियों में अड़ंगे डालती रही। जिन्ना को सिर्फ़ ताक़त चाहिए थी, वह भी
सरकार को तोड़ने के लिए। उसका मानना था कि अगर पाकिस्तान चाहिए तो सरकार में
हिस्सेदारी ज़रूरी है। लीग ने संविधान सभा में शामिल होने से इंकार कर दिया। नेहरू
ने वायसराय से कहा कि लीग या तो कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार करे या सरकार से
बाहर हो जाए।
उधर एटली ने घोषणा कर
दी कि जून 1948 तक ब्रिटिश सरकार भारत को आज़ाद कर देगी। माउंटबेटन ने यह
पता लगाना शुरू कर दिया कि कांग्रेस और लीग किन बातों पर एक हो सकती है। माउंटबेटन
ने जो योजना तैयार की वह यह थी कि भारत को दोहरी डोमिनियन हैसियत प्रदान करना
और 15 अगस्त 1947 तक सत्ता का हस्तांतरण। यह स्थिति लॉर्ड माउंटबेटन की उत्पन्न की
हुई थी। उस समय की परिस्थिति में सरकार को
कामकाज करने देने का एकमात्र वैकल्पिक हल गांधीजी की योजना को स्वीकार करना था।
परन्तु अंग्रेज़, लीग और कांग्रेस तीनों ने इसे नहीं माना। माउंटबेटन को लगा कि
मौजूदा परिस्थिति में सबसे अच्छा काम वह यही कर सकता कि भारतीय दलों को किसी न
किसी तरह सहमत करके ख़ुद को मिले हुए आदेश के अनुसार सत्ता को जल्दी हस्तांतरित कर
दे। इसमें उसे सफलता भी मिली। कुछ लोग इसे माउंटबेटन की कूटनीति की विजय
मानते हैं। लेकिन क्या यह उसके मिशन की भी जीत थी?
ब्रिटिश सरकार अपने ही
बनाए जाल में फंस गई थी। जिन्ना की बात को उसे मंज़ूर करना पड़ा। नेहरू और पटेल ने
कांग्रेस कार्य समिति में 3 जून की योजना की वकालत की। सभा में प्रस्ताव पारित हो
गया और कांग्रेस ने भी विभाजन मंज़ूर कर लिया। कांग्रेस ने गांधीजी की सलाह की
उपेक्षा कर दी। गांधीजी के लिए यह असह्य था। नेहरू, पटेल और गांधीजी के सामने
विभाजन स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। कांग्रेस मुस्लिम जनसमूह को
राष्ट्रीय आन्दोलन में नहीं खींच सकी थी। मुस्लिम साम्प्रदायिकता को रोकने
में वे सफल सिद्ध नहीं हुए थे। कलकत्ता, रावलपिंडी, नोआखाली और बिहार के
साम्प्रदायिक दंगों के फूट पड़ने से स्थिति और भी हाथ से बाहर चली गई थी। कांग्रेस
के नेताओं को लग रहा था कि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए तो शायद इस पर काबू पाया जा
सके। अंतरिम सरकार अपंग हो चुकी थी। बंगाल और पंजाब में तो ऐसा लग रहा था जैसे
पाकिस्तान की सरकार काम कर रही हो। प्रांतीय सरकारों की निष्क्रियता और लीगी
मंत्रियों की अड़ंगेबाज़ी से त्रस्त नेहरू को लगने लगा था कि सत्ता में बने रहने का
औचित्य क्या है? यदि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए तो शायद परिस्थितियों पर नियंत्रण
आसान हो जाए।
दो डोमिनियन राज्यों
की योजना स्वीकार कर ली गई। इससे एक फायदा तो यह निश्चय ही हुआ था
कि विखंडीकरण पर अंकुश लगा और रियायतों को इस या उस देश में शामिल होना पड़ा।
प्रांतों का समूहीकरण किया जाने वाला प्रस्ताव भी कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया।
अधिकारिक तौर पर विभाजन की बात भी कांग्रेस ने मान ली। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत
को पाकिस्तान का अंग मान लिया गया। घटनाएं तेज़ी से घटित हो रही थीं। अंग्रेज़ों ने
जो दो ब्रह्मास्त्र अंत तक अपने हाथ में रखा हुआ था, उसका उन्होंने बहुत ही सफलता
से उपयोग किया और भारतीय नेताओं को शीघ्र सत्ता हस्तांतरण के लिए एकता का बलिदान
भी क़ुबूल हुआ। एक अस्त्र था सुरक्षित अधिकारों और नौकरशाहों पर नियंत्रण का और
दूसरा अस्त्र था देशी राज्यों के संबंध में उनकी सार्वभौम सत्ता। कांग्रेसियों ने
अंतिम उपाय के रूप में विभाजन को स्वीकार किया। उस समय वे ऐसी हालत में पहुंच गए
थे कि उसे स्वीकार न करते, तो सब कुछ उनके हाथ से निकल
जाता।
कुछ लोग इस विवाद को
तूल देते हैं कि यदि 1937-39 के दौरान जिन्ना के साथ समझौता कर लिया जाता और 1937 में
युक्तप्रांत में कांग्रेस और लीग का मंत्रिमंडल बन जाता, तो सांप्रदायिकता की
समस्या ख़त्म हो जाती। ऐसे लोगों को मानना है कि जिन्ना की कुंठित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं
ने ही उसे अलगाववाद की ओर मोड़ दिया। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि
कुंठित किए जाने के पहले ही जिन्ना संप्रदायवादी हो चुका था। 1937 से 39 तक कांग्रेस के नेताओं ने उससे बातचीत और समझौता करने की
बहुत कोशिश की। लेकिन जिन्ना के पास ऐसी कोई मांग ही नहीं थी जिसपर तर्कपूर्ण
विचार किया जा सके। जिन्ना ने ऐसा कोई प्रस्ताव भी नहीं रखा कि कांग्रेस उसकी
कौन-कौन सी बात मान ले, ताकि वह कांग्रेस के साम्राज्यवादी विरोध के संघर्ष में
शामिल हो जाए। वह तो सिर्फ़ यह कहता रहा कि कांग्रेस अपना धर्मनिरपेक्षवादी चरित्र
छोड़ दे और ख़ुद को हिंदू संगठन घोषित कर दे और लीग को मुसलमानों का एकमात्र
प्रतिनिधि मान ले। इस शर्त को स्वीकार करना कांग्रेस के लिए असंभव था। राजेन्द्र प्रसाद
के शब्दों में कांग्रेस द्वारा इसे मान लेना कांग्रेस के लिए अपने अतीत को
अस्वीकार करने और अपने भविष्य के साथ विश्वासघात करने के बराबर होता। दरअसल जिन्ना
ऐसे शर्त रख रहा था जो सांप्रदायिक राजनीति से परिचालित हो रहे थे, जैसे पाकिस्तान
की मांग। सांप्रदायिक राजनीति का परित्याग उसे मंज़ूर नहीं था।
ब्रिटिश सत्ता भारत
में न ख़ुद शासन करती थी, न दूसरों को करने देती थी। मुसलिम लीग के नामजद
प्रतिनिधियों के अन्तरिम सरकार में बने रहने के सवाल का कभी ईमानदारी से सामना
नहीं किया गया। लीग को मंत्रिमंडल में शामिल करने के पहले ही जिन्ना मुसलमानों को
ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस से अलग तीसरा पक्ष घोषित कर चुका था। लीग को सरकार में
शामिल करने का मतलब होता कि कांग्रेस सभी भारतीयों की ओर से बोलने का अधिकार खो
देती। यह तो राष्ट्रवादी मुसलमानों के साथ विश्वासघात होता। उसपर से लीग
युक्तप्रांत विधानसभा के उपचुनाव में
‘इसलाम ख़तरे में है’ का नारा लगा चुकी थी। जिन्ना ने ख़ुद अल्लाह और क़ुरान
के नाम पर वोट देने की अपील की थी। सिर्फ़ दो सीट उसे एक प्रांतीय मंत्रिमंडल में
नहीं मिली थी, और वह सांप्रदायिक घृणा फैला रहा था। ऐसे नेता को कब तक संतुष्ट रखा
जा सकता था। सांप्रदायिक विचारधारा को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इसका
मुक़ाबला किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया जा सका। 1942 से 1946 तक इस उम्मीद में
कि उसके बेहतर लोग साथ आ जाएं, मुसलिम लीग को संतुष्ट करने की कोशिश की गई। लेकिन
हुआ उलटा। इस दौरान सांप्रदायिकता से राष्ट्रवादी हिन्दू और मुसलमान दोनों संघर्ष
कर रहे थे। नरमपंथी संप्रदायवादी कट्टर और घृणावादी सम्प्रदायियों का विरोध नहीं
कर सके।
कुछ लोग कहते हैं कि
कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार करके ग़लती की। सांप्रदायिकता के मामले में यह उसकी
असफलता थी। लेकिन उस वक़्त शायद इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। उस समय
तक सांप्रदायिकता ने काफी दूरी तय कर ली थी। लंदन की रॉयल एम्पायर सोसायटी के भाषण
में लॉर्ड इस्मे ने स्वीकार किया कि भारत आने के पहले उसका यह ख़्याल था कि
अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने की क्रिया पूरी करने के लिए जून 1948 की अन्तिम तिथि
‘अत्यधिक जल्दी’ रख दी गई है, परन्तु भारत पहुंचने पर उसका यह विचार होने लगा कि
वह तारीख़ ‘अत्यधिक विलम्बशाली’ है। दिल्ली और प्रांतों की राजधानियों में
साम्प्रदायिक कटुता इतनी अधिक तीव्र हो गई थी जिसकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता
था। अगर विभाजन स्वीकार न किया जाता तो शायद देश गृहयुद्ध में चला जाता। ऐसी
परिस्थिति में पुलिस और सेना की सहायता लेनी होती, और उन पर उस समय विदेशी शासकों
का नियंत्रण था। इसलिए विभाजन को रोकने का उस समय कोई तात्कालिक समाधान उपलब्ध था
भी नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि सांप्रदायिकता का कोई तात्कालिक समाधान होता ही
नहीं। अनेक दशकों तक समाधान की दिशा में काम करना होता है। राष्ट्रीय आंदोलन ने इस
दिशा में काम नहीं किया। उन्हें राष्ट्रवाद की सामाजिक-आर्थिक जड़ों में जाना चाहिए
थी। सभी तरह की सांप्रदायिकता के विरुद्ध और उसके वैचारिक आधार पर
विचारधारात्मक-राजनीतिक संघर्ष चलाना चाहिए था। कांग्रेस ने सांप्रदायिक नेताओं से
बातचीत पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा किया। सांप्रदायिकता का मुक़ाबला करने के लिए
विचारधारात्मक और सांस्कृतिक स्तरों पर कोई दीर्घकालिक रणनीति विकसित नहीं हो पाई।
ख़ैर, स्थिति ऐसी हो गई
थी कि जिसमें दोनों पक्ष ऐसी योजना मानने के लिए तैयार हो गए, जिसे वे नापसंद करते
थे, जिन्ना को ‘कीड़ों का खाया हुआ, विकलांग पाकिस्तान’ मिला, तो कांग्रेस को विभाजित
भारत। फिर भी दोनों ही पक्ष इसका प्रतिकार करने की स्थिति में नहीं थे। भारत
का विभाजन उन लोगों की अनुमति, सहमति से हुआ, जिन्होंने यह कहकर विभाजन की निन्दा
की थी कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हित में भारत को बंटा हुआ और कमज़ोर रखने की
एक चाल है।
ऐसा नहीं है कि अगर
गांधीजी नहीं होते तो ब्रिटिश राज सदा सदा के लिए टिका रहता। राष्ट्रीय स्वतंत्रता
की लड़ाई गांधीजी के 1915 से भारत में सक्रिय
होने के आधी शताब्दी पहले से चल रही थी। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधीजी ने
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को तीन विशिष्ट गुणों से अनोखा बनाया था। पहला- गांधीजी
ने स्वराज को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की तार्किक परिणीति के रूप में न सिर्फ
प्रचारित किया बल्कि कठिन मौकों पर अलोकप्रिय निर्णय लेकर अहिंसा और सत्याग्रह के
मूल को गांव-गांव तक स्थापित किया। इससे जनसाधारण का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
करना सहज हो गया। दूसरा- गांधीजी ने स्वराज की राजनीतिक और सामाजिक परिभाषा के बीच
के पुराने द्वंद्व को लगभग ख़त्म किया। आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक
स्वराज को एक ही भवन के चार स्तंभ के रूप में प्रचारित किया। रचनात्मक कार्यक्रमों
के ज़रिए आम लोगों के बीच में एक जीवनशैली के रूप में और सांस्कृतिक क्रांति के रूप
में स्थापित किया। तीसरा- गांधीजी ने अपनी कथनी और करनी में एकता, निजी और सार्वजनिक
जीवन की एकरूपता के जरिए आश्रमों से शुरू करके जनआंदोलन तक हिंदू-मुस्लिम दूरी, छुआछूत की बीमारी और
औरतों को सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रखने की मर्दवादी परंपरा का विमूलन किया। अब
अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी का नेतृत्व
एक प्रकार से अहिंसक और नैतिक आधारों पर भारतीय समाज और राष्ट्रीयता के
नवनिर्माण की कोशिश थी।
भारत में ब्रिटिश
सत्ता का चरित्र अर्द्ध-लोकतांत्रिक था। वह न्याय, आधुनिकता, यूरोपीय सभ्यता की
श्रेष्ठता आदि कुछ ख़ास विचारों के आधार पर अपना नैतिक औचित्य स्थापित करती थी।
लेकिन उसका टिकाव तो मुख्यतः पाशविक बल पर ही था। राष्ट्रीय आंदोलन ने लोकतांत्रिक
स्वाधीनताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाया। उसने ब्रिटिश सता के मानवीय दावों का
पर्दाफ़ाश भी किया। अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अहिंसक संघर्ष का सहारा लिया।
औपनिवेशिक विधायिकाओं का इस्तेमाल किया गया। संघर्ष-तैयारी-संघर्ष की अनोखी
रणनीति का सहारा लिया गया। राष्ट्रवादी रणनीति ब्रिटिश शासन की खास प्रकृति के
अनुसार विकसित हुई। उनकी सत्ता संरक्षण और निरंकुशतावाद के मिश्रण से तैयार स्तंभ
पर टिकी हुई थी। इस सत्ता की स्थापना शक्ति द्वारा हुई थी। इसका विकास और
स्थायित्व भी शक्ति द्वारा ही हुआ। यहां तक शांतिपूर्ण आंदोलनों का दमन करने के
लिए भी शक्ति का ही सहारा लिया जाता था। कुछ नागरिक संस्थानों, जैसे स्कूल, कॉलेज,
न्यायालय, विधायिकाओं की भी उसने रचना की। जब आंदोलन स्थगित रहता तो लोगों को कुछ
नागरिक अधिकार भी दे दिए जाते। दमन के समय भी कुछ नागरिक संहिताओं का पालन किया
जाता। इस तरह ब्रिटिश शासन का निरंकुशतावादी और लोकतांत्रिक चरित्र साथ-साथ चलता
रहा। भय और प्रलोभन दोनों का उसने सहारा लिया। उसने यह धारणा फैला रखी थी कि वे
भारत का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास कर उसे आधुनिक बना रहे हैं। साथ ही यह
भी ज़ाहिर कर रखा था कि वे अपराजेय हैं और उनका विरोध करना बेकार है।
उपरोक्त वर्णित सारे पहलुओं का ध्यान में रख
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति तैयार की गई। इसी के आधार पर वर्चस्व के
दीर्घकालीन संघर्ष की योजना तैयार की गई। इस संघर्ष में आम जनता के दिलों को जीतने
का प्रयत्न किया गया। इसका प्रभाव हर संघर्ष के बाद बढ़ता गया। अधिकांश समय क़ानून
सम्मत तरीक़ों से संघर्ष किया गया, ज़रूरत पड़ने पर जनसंघर्ष के लिए क़ानून तोड़ा भी
गया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन और मज़बूत हुआ। सक्रिय संघर्ष का लक्ष्य औपनिवेशिक
शासकों के हाथ से सत्ता छीन लेना था। गांधीजी ने जनसाधारण को सक्रिय राजनीति में
लाने का काम किया, जिन्हें अंग्रेज़ों ने बख़ूबी रणनीति बना कर जनता को सुषुप्ति की
अवस्था में रखा था। इसके अलावा गांधीजी ने इन धारणाओं का खंडन भी करने का
महत्वपूर्ण काम किया कि ब्रिटिश सत्ता भारत की शुभचिंतक है और वह अपराजेय भी है। सिविल
नाफ़रमानी आंदोलन ने लोगों को निर्भीक और साहसी बनाया। उसमें संघर्ष और त्याग
करने की क्षमता पैदा हुई। लोगों में यह विश्वास आया कि उनकी सहमति के बिना यहां
शासन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने अगला लक्ष्य निर्धारित किया कि प्रशासनिक
वर्ग पर ब्रिटिश शासन की पकड़ कमज़ोर हो। इसकी पूर्ति के लिए नौकरशाहों और फौज के
लोगों को राष्ट्रवाद की मुख्य धारा में लाया गया। 1945 के बाद पुलिस, सेना और नौकरशाहों में
ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफ़ादारी लगभग ख़त्म हो चुकी थी। जनता के बीच भारत का पक्ष
रखकर औपनिवेशिक विचारधारा के वर्चस्व को कमज़ोर करने का लगातार प्रयास किया जाता
रहा। इसके अलावा अर्द्ध-लोकतांत्रिक स्वाधीनताओं के नाम पर जो भी रियायतें मिली,
उसके विस्तार के लिए लगातार कोशिश की गई। इसमें जनमत का भी भरपूर सहयोग मिला।
राष्ट्रवादियों द्वारा ब्रिटिश वर्चस्व को
समाप्त करने के लिए दीर्घकालीन संघर्ष की रणनीति अपनाई गई। इस रणनीति को
अंजाम देने के लिए संघर्ष-तैयारी-संघर्ष के मार्ग पर चला गया। पहले संवैधानिक
तरीक़ों से सशक्त आंदोलन चलाए जाते, फिर खुली मुठभेड़ का रास्ता छोड़ दिया जाता। फिर
दी गई रियायतों को अपर्याप्त बता कर कुछ और रियायतें हासिल की जातीं। शांति के दौर
में उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करते हुए गहन राजनीतिक-वैचारिक काम किया जाता। पहले
ज़्यादा प्रभावशाली आंदोलन छेड़ने के लिए ताकत संजोयी जाती। इस रणनीति की पराकाष्ठा
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप में हुई, जब सत्ता हस्तांतरण का समझौता हुआ। इस तरह हर
दौर का इस्तेमाल औपनिवेशिक वर्चस्व को ख़त्म करने, राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की फौज
खड़ी करने और उन्हें राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने एवं लोगों में संघर्ष की
क्षमता पैदा करने के लिए किया गया। इस रणनीति से स्वतंत्रता आंदोलन लगातार ऊपर की
ओर उठता रहा। आंदोलन को सुधारों तक ही सीमित नहीं रखा गया। संवैधानिक सुधारों को
भी औपनिवेशिक व्यवस्था का ही अंग मानकर देखा गया। जब तक आज़ादी पूरी नहीं मिली तबतक
यह मानकर चला गया कि वह मिली ही नहीं है। जब जनआंदोलन नहीं होते तब भी उपनिवेशवाद
विरोधी राजनीतिक संघर्ष ज़ारी रहता। सिर्फ़ संघर्ष का रूप बदल जाता। जनजागरण और
रचनात्मक काम ज़ारी रहता। गांधीजी ने कहा था, “सिविल नाफ़रमानी रोकने का मतलब यह नहीं है कि
युद्ध थम गया है। युद्ध तो तभी थमेगा, जब भारत में उसका अपना बनाया हुआ संविधान
लागू होगा।”
एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्त होने तक लगातार नहीं चल सकता था?
क्या अगर ऐसा होता, तो स्वतंत्रता जल्द नहीं प्राप्त कर ली जाती? गांधीजी के
नेतृत्व के दौर में यह मानकर चला जा रहा था कि जनांदोलन का चरित्र ही ऐसा
होता है कि उसे अनिश्चित काल तक लगातार नहीं चलाया जा सकता। दो आंदोलनों के बीच
विश्राम और तैयारी का समय होना ही चाहिए। आंदोलन जनता से चलते थे। कुछ समय के बाद
जनता थक जाती थी। जनता में दमन को सहने की क्षमता असीमित नहीं थी। कष्ट सहने के
बाद लोग विश्रांति चाहते हैं, ताकि नए जोश के साथ फिर आगे बढ़ सकें। इसलिए नेतृत्व
ने ज़रूरत से ज़्यादा उन पर दबाव नहीं डाला। औपनिवेशिक सत्ता के पास आंदोलनों को
नष्ट करने की प्रचंड क्षमता थी। उस पर आघात करने की क्षमता तो जनता के बीच से ही
आनी थी। इसलिए राजनीतिक कौशल इसी में थी कि औपनिवेशिक राज्य से टकराने के बाद
अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण संघर्ष का दौर चलाया जाए। इस प्रकार गांधीजी ने अपनी रणनीति
में जनता और सरकार दोनों की सीमाओं को समझा और उसी के अनुसार संघर्ष का कार्यक्रम
बनाया। 1938 में गांधीजी ने लिखा था, “चतुर सेनापति अपने पांव उखड़ने तक इंतज़ार नहीं करता, जब
वह समझ जाता है कि किसी खास मोरचे पर वह और अधिक देर तक नहीं टिक सकता, तो वह वहां
से सामान्य तरीक़े से हट जाता है।” आंदोलन कब शुरू करना है और कब उसे वापस लेना है, इस अतिमहत्वपूर्ण
मुद्दे पर निर्णय गांधीजी और कुछ प्रमुख नेता इस विषय पर मूल्यांकन करने के बाद
लेते थे कि आंदोलन की ताक़त और कमज़ोरी क्या-क्या है। लोग कितनी देर तक साथ देंगे।
सरकार की तैयारी कैसी है। इसी तरह वे यह देखते थे कि सरकार से बातचीत करने का उचित
समय है या नहीं। अतः गांधीजी और कांग्रेस की नीति रही कि जब संभव हो, तब बातचीत और
समझौता और जब ज़रूरी हो, तब असहयोग और सीधी कार्रवाई। इन सबके बीच रचनात्मक कार्यों
की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खादी, कताई, ग्रामोद्योग का प्रसार, राष्ट्रीय शिक्षा,
हिन्दू-मुसलिम एकता, अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ संघर्ष, हरिजनों की सामाजिक स्थिति में
सुधार, विदेशी वस्त्र और शराब का बहिष्कार, आदि महत्वपूर्ण कार्य थे। इन कामों के
सुचारू रूप से चलाने के लिए आश्रम मुख्यतः गांवों में बनाए जाते थे। आंदोलन की
वापसी के बाद जो शून्य पैदा होता था, उसे भरने में इन रचनात्मक कार्यों ने
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सक्रिय जन-आंदोलन के दौर में जो सक्रिय और उत्साहित
कार्यकर्ता होते थे, उन्हें ये रचनात्मक कार्य हतोत्साहित और अवसादग्रस्त होने से
बचाते थे। रचनात्मक कार्य में लाखों लोगों को समाहित किया जा सकता था। जो रचनात्मक
कार्य से जुड़ जाते, वे ही आगे चलकर सिविल नाफ़रमानी के आंदोलन में शरीक होते।
राष्ट्रीय आंदोलन की
चुनौती का सामना करने के लिए औपनिवेशिक सत्ता ने संवैधानिक सुधार और विधायिकाओं
का सहारा लिया। उन्हें आशा थी कि संसदीय प्रक्रिया राष्ट्रीय आंदोलन के
कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा करेगी। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने इसका लाभ भी
उठाया और इसका विरोध भी किया। संवैधानिक सुधारों को भारत की कसौटी पर कसा जाता। जब
भी उपनिवेशवाद थोड़ी-सी भी राजनीतिक ज़मीन छोड़ने के लिए बाध्य होता था, तो
राष्ट्रवादी उस पर तुरंत क़ब्ज़ा जमा लेते, ताकि उनके विरोध के संघर्ष को और तेज़
किया जा सके। सुधारों को इस तरह लागू किया जाता कि उपनिवेशवादियों के मंसूबे पूरे
न हो पाएं। चुनी गई सरकारों का उपयोग इस तरह किया जाता कि कठिनाइयों से घिरी जनता
को राहत पहुंचे। लोगों में स्वशासन की क्षमता पर विश्वास पैदा हुआ। राष्ट्रीय
आंदोलन की प्रतिष्ठा बढ़ी। जो लोग विधायिकाओं और नगरपालिकाओं के माध्यम से काम कर
रहे थे, उन लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता का अंग होने से इंकार कर दिया था। अंग्रेज़ी
हुक़ूमत की चालों को उन्होंने उजागर किया। जब भी जनांदोलन में उभार आता वे
विधायिकाओं का परित्याग भी कर देते और औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध संघर्ष करते।
गांधीजी ने अहिंसा
का सिद्धांत अपनाया। इस समय के अधिकांश नेताओं ने इस नीति का अनुपालन किया।
अहिंसा कांग्रेस की समग्र रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग थी। राष्ट्रीय आंदोलन को
अहिंसा सूट भी बहुत हुई। अहिंसक संघर्षों के कारण अधिक-से-अधिक जनता इसमें शामिल
हुई। स्त्रियों का इसमें शामिल होना बहुत बड़ी मिसाल थी। अहिंसा संघर्ष को एक नैतिक
आधार देती थी। जब अंग्रेज़ शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हिंसक हथियारों का प्रयोग
किया जाता तो ब्रिटिश सत्ता की वास्तविकता सामने आ जाती। यह शासकों के लिए समस्या
का कारण बनती। और अगर शासक कोई कार्रवाई न करता तो इससे यह साबित होता कि ब्रिटिश
सरकार में शासन चलाने की क्षमता ही नहीं है। अतः औपनिवेशिक शासकों के लिए एक तरफ
कुंआ तो दूसरी तरफ़ खाई वाली स्थिति बनी रहती। दो विकल्पों के बीच वे दमन का सहारा
लेते और इसमें उनकी नैतिक हार होती। प्रतिष्ठा के इस युद्ध में अहिंसा ने भारतीयों
को राजनीतिक शक्ति दी, जिससे वे सशस्त्र औपनिवेशिक सत्ता का मुक़ाबला कर सके। इस
तरह इस अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम ने विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण जगह दर्ज़ कर
लिया। यह राजनीतिक लड़ाई लंबी, ज़रूर थी, पर थी अनोखी।
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ़ ब्रिटेन की
राजनीतिक ग़ुलामी से छुटकारा पाने का संघर्ष नहीं था, इसके पीछे सामाजिक और
आर्थिक परिवर्तन की आकांक्षाएं भी थीं। ब्रिटिश सत्ता भारत पर अपने राजनीतिक
प्रभुत्व का प्रयोग ब्रिटिश समाज और अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों के मुताबिक भारतीय
समाज और अर्थव्यवस्था का शोषण करने के लिए कर रही थी। आर्थिक दृष्टि से देश पिछड़
रहा था। औपनिवेशिक शोषण प्रणालियों की राष्ट्रीय नेताओं को समझ थी। वे इस बात की
आलोचना करने लगे कि भारत का सारा धन विदेश जा रहा है। इस बात की सच्चाई को
उन्होंने जान लिया था कि भारत का उपनिवेश बनना न तो इतिहास की कोई दुर्घटना है और
न ही ब्रिटिश सत्ता की राजनीति का नतीजा। यह तो ब्रिटिश समाज के चरित्र और भारत की
ग़ुलामी का स्वाभाविक फल है। जब यह समझ विकसित हुई तो उपनिवेश विरोधी आंदोलन शुरू
हो गए। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता उपनिवेशवाद का विश्लेषण कर लोगों के सामने रखते।
गांधीजी ने जन-राजनीति के द्वारा इस दृष्टिकोण को गांव-गांव तक फैलाया। इस बात पर
ख़ूब ज़ोर दी कि भारत की संपदा को लूटा जा रहा है। भारत को ब्रिटेन के तैयार माल का
बाज़ार बनाया जा रहा है। इससे औपनिवेशिक शासन की बुनियाद कमज़ोर हुई। ब्रिटेन
भारतवासियों के हित के लिए काम कर रहा, यह मिथक को टूटा। इससे सुदृढ़ और लगातार
चलने वाले आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
राष्ट्रीय आंदोलन की लोकतंत्र
के लिए प्रतिबद्धता थी। लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया गया। गांधीजी ने व्यस्क
मताधिकार पद्धति की मांग की। कांग्रेस के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती
थी। विषयों पर बहस होती और अंत में मतदान
होता। ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय ‘करो या मरो’ वाले भाषण की शुरुआत में
ही गांधीजी ने कहा था, “मैं उन 13 मित्रों को
बधाई देता हूं, जिन्होंने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। ऐसा कर उन्होंने कोई
ऐसा काम नहीं किया है, जिसके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना पड़े।” राष्ट्रीय आंदोलन
नागरिक अधिकारों का पक्षधर रहा। प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए इसने संघर्ष
किया। गांधीजी भी नागरिक अधिकारों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध थे। गांधीजी ने यंग
इंडिया में जनवरी 1922 में लिखा था, “सरकार ने देश के सामने
जो मुद्दा पैदा कर दिया है, उसकी तुलना में स्वराज, ख़िलाफ़त और पंजाब सवाल गौण सवाल
हैं। हम अपने लक्ष्य की तरफ़ एक कदम भी बढ़ा सकें, इसके पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति और
संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना ही होगा ... हमें इन अधिकारों की रक्षा जान
देकर भी करनी चाहिए।” नेहरू भी इसके सबसे
बड़े हिमायती थे। धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रवादी विचारधारा का बुनियादी तत्व माना
गया। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया गया।
भारतीय राष्ट्रीय
आंदोलन ने आधुनिक उद्योगों और कृषि विकास के आधार पर समाज के पूर्ण आर्थिक रूपांतरण
का लक्ष्य स्वीकार किया। गांधीजी सिर्फ़ उन मशीनों के विरोधी थे जो बेरोज़गार
फैलाती या बहुसंख्यक लोगों को ग़रीब कर कुछ लोगों को अमीर बनाती थीं। देश आर्थिक
विकास के मामले में आत्मनिर्भर बने इसके प्रति वे प्रतिबद्ध थे। विदेशी पूंजी के
विनियोग का वे विरोध करते थे। उनका कहना था कि विदेशी पूंजी देश का विकास नहीं
करेगी, बल्कि पिछड़ापन लाएगी। राष्ट्रीय आंदोलन शुरू से ही ग़रीबों का पक्षधर रहा।
इससे आंदोलन को समाजवादी आधार मिला। 1919 के बाद गांधीजी ने
किसानों और दस्तकारों पर आधारित आर्थिक दृष्टि विकसित की और उसका प्रचार किया।
गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की सामाजिक दृष्टि भी विकसित की। वे ग़रीबों के हितों
की रक्षा के लिए भी हिंसा के प्रयोग के विरुद्ध थे। लेकिन उनकी बुनियादी दृष्टि
समाज के परिवर्तन की थी। वे क्रांतिकारी परिवर्तन की दिशा में भी आगे बढ़ते हैं,
खासकर 1930 और 40 के दशकों में, जब वे कहते हैं, “निहित स्वार्थों में
ठोस तबदीली लाये बिना जनसाधारण की स्थिति में सुधार नहीं लाया जा सकता”। वे निजी संपत्ति का
विरोध करने लगते हैं। वे बार-बार
उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण की वकालत करते हैं। उन्होंने पूंजीवाद और ज़मींदारी
प्रथा की भर्त्सना की। जाति के आधार पर विषमता और जुल्म का विरोध करते थे। इन सब
चीज़ों ने राष्ट्रीय आंदोलन को क्रांतिकारी बनाने में मदद पहुंचाई।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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