सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-4
10.6 आत्मा के संबंध में विचार
सूफि़यों ने ईश्वर के साथ ही आत्मा के
संबंध में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनका अदबी शऊर (साहित्यिक चिंतन) ‘मकुन’ से ‘कुन’ तक का सफ़र है।
‘मकुन’ का अर्थ होता है ‘ना होना’। यह ‘नास्ति-भाव’ है, यानी
अस्तित्वहीनता/अज्ञान की अवस्था है। यह वह अवस्था है जहाँ आत्मा सांसारिक मोह-माया, अहंकार (नफ़्स)
और भौतिकता में जकड़ी होती है। यह उस अंधकार या मौन की तरह है जहाँ उसका वास्तविक
रूहानी वजूद छिपा या सोया रहता है। यहां शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध का अभाव होता
है। कुरान का शब्द ‘कुन’ (हो जाना) ईश्वर की सृजन शक्ति का प्रतीक
है। इस अवस्था के बाद शब्द (बोलना), स्पर्श (छूना), रूप (देखना), रस (चखना)
और गंध (सूंघना) को धारण करना होता है, यानी अस्तित्व का आरंभ होता है। सूफी
साहित्य में यह वह जागृति है जब साधक की आत्मा ईश्वर के आदेश और उसकी रज़ा में
पूरी तरह फना (लीन) होकर वास्तविक जीवन को प्राप्त करती है। अतः सूफियों का
काव्य और गद्य अज्ञान, द्वैत और अहंकार (‘मकुन’) को मिटाकर प्रेम, मआरिफ़त (दिव्य ज्ञान)
और परमात्मा के साथ एकाकार (‘कुन’) होने का ही संपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज
है।
जिस समय ‘कुन’ स्वरूप को कोई
भी धारण कर लेता है, ‘मकुन’ स्वरूप उसी
समय छिन्न-भिन्न हो जाता है। इस्लामी सृष्टि-प्रक्रिया के अनुसार-अल्लाह ने अपनी
इच्छा से ही सृष्टि का निर्माण किया। उसके मुख से ‘कुन’ (हो जा) शब्द
निकलने से सृष्टि निर्मित हो गई। सूफी विचारधाराओं के अनुसार सबसे पहले उसने ‘मुहम्मदीय आलोक’ (नूर-ए-मुहम्मदी) का निर्माण
किया। इस मान्यता का आधार वह रिवायत है जिसमें कहा गया है कि "अल्लाह ने सबसे
पहले मेरे नूर (या मेरी रूह) को पैदा किया"। इस विचारधारा के तहत पूरी सृष्टि
और अन्य चीज़ों को इसी नूर का विस्तार माना जाता है। इसी से चार तत्व (अग्नि, हवा, जल और पृथ्वी), स्वर्ग, आकाश, तारे आदि का
निर्माण हुआ। इसी से आदम, पैग़म्बर तथा सभी जीव बने। क़ुरआन में कहा गया है, “जब फ़रिश्तों ने
कहा, हे मर्यम! अल्लाह तुझे अपने एक शब्द (अर्थात वह अल्लाह के शब्द "कुन"
से पैदा होगा, जिस का अर्थ है "हो जा") की शुभ सूचना दे
रहा है, जिसका नाम मसीह़, ईसा, पुत्र मर्यम होगा। वह लोक-परलोक में प्रमुख तथा मेरे समीपवर्तियों में
होगा।” (3:45)। एक और आयत में कहा गया है, “वस्तुतः अल्लाह
के पास ईसा की मिसाल ऐसी ही है, जैसे आदम की।
उसे (अर्थात, आदम को) मिट्टी से
उत्पन्न किया, फिर उससे कहाः "हो जा" तो वह हो गया।” (3:59)। अर्थात जैसे प्रथम पुरुष आदम (अलैहिस्सलाम) को बिना
माता-पिता के उत्पन्न किया, उसी प्रकार ईसा (अलैहिस्सलाम) को बिना पिता के
उत्पन्न कर दिया, अतः वह भी मानव पुरुष हैं। ईसा और आदम दोनों का वजूद
में आना प्राकृतिक नियमों से हटकर अल्लाह के सीधे आदेश "कुन" (हो जा) से
हुआ।
आत्मा को सूफ़ी साधकों ने ईश्वर का अंश
स्वीकार किया है। सूफ़ी दर्शन में यह मुख्य विचार है कि इंसान की आत्मा और परमात्मा
एक ही मूल स्रोत से जुड़े हैं। वह सत्य प्रकाश का अभिन्न अंग है। शरीर में आने के
बाद भी वह अपनी मूल पहचान नहीं गंवाती है, बल्कि वह इस
दुनिया में अपने मूल स्रोत (परमात्मा) से अलग होने की पीड़ा महसूस करती है। सूफ़ियों के अनुसार आत्मा, परमात्मा में लौटने के लिए अनजाने ही उत्सुक रहती है, क्योंकि वही
उसका मूल उद्गम है। आत्मा के पाँच बाहरी अंग (हवास-ए-जाहेरी) तथा पाँच आंतरिक
संकाय या सूक्ष्म तत्व (हवास-ए-बातिनी या लताइफ) हैं, जिनका संबंध
शाश्वत ज्योति (नूर) से है। पाँच
बाहरी तत्व (इंद्रियाँ) हैं आँख (दृष्टि के लिए), कान (श्रवण के लिए), नाक
(घ्राण के लिए), जीभ (स्वादन के लिए) और त्वचा (स्पर्श के लिए)। पाँच आंतरिक तत्व (लताइफ) हैं
कल्ब (हृदय): यह रूहानी प्रेम और ईश्वरीय ज्ञान का केंद्र है, रूह
(आत्मा): यह जीवन और दिव्य श्वास का स्रोत है, सिर्फ़
(रहस्य): यह वह गुप्त स्थल है जहाँ ईश्वर का सीधा साक्षात्कार
होता है, खफी (सुप्त/छिपा हुआ): यह अत्यंत
सूक्ष्म चेतना है जो दिव्य सौंदर्य का अनुभव करती है और अख्फा (परम गुप्त): यह सबसे गहराई का बिंदु है जो पूर्ण विलीनता (फना) और शाश्वत ज्योति से
जुड़ता है।
मनुष्य के अन्दर जो ईश्वरीय अंश है, वह विशुद्ध
सत्ता की एक चिनगारी की शान्ति है, उसका सतत प्रयास अपने उद्गम स्थल में मिल जाना है।
आत्मा की सत्ता जो पूर्व में इस शरीर में थी, वह शरीर में
क़ैद है। अतः सूफ़ी साधक मृत्यु का स्वागत करते हैं। सूफ़ी मत में भौतिक शरीर की
मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा (अल्लाह) के साथ पुनर्मिलन
माना जाता है। सूफ़ी परंपरा में मृत्यु को 'विसाल' कहा जाता है, जिसका अर्थ है
प्रेमी (आत्मा) और प्रियतम (परमात्मा) का मिलन। महान सूफ़ी कवि मौलाना रूमी ने
भौतिक मृत्यु को 'शब-ए-अरूस' (विवाह की रात) कहा है, क्योंकि इस रात
आत्मा अपने असली महबूब (ईश्वर) से हमेशा के लिए एक हो जाती है। सूफ़ी संतों के
मृत्यु दिवस को शोक के रूप में नहीं, बल्कि 'उर्स' (आनंद और मिलन
के उत्सव) के रूप में मनाया जाता है। सूफ़ी साधकों का विश्वास है कि मृत्यु के
द्वारा वे फिर परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु सूफ़ी
साधक यह भी मानते हैं कि परमात्मा की कृपा के बिना परमात्मा से मिलना संभव नहीं
है।
सूफ़ी आत्मा के दो भेद बताते हैं - नफ़्स
और रूह। इन्हें अक्सर आत्मा के दो विरोधी या परस्पर जुड़े रूपों/भेदों के
रूप में देखा जाता है जो मनुष्य के भीतर निरंतर संघर्षरत रहते हैं। ‘नफ़्स’ निम्न कोटि का
माना जाता है जो कुप्रवृतियों का स्थल होता है। यह मनुष्य का निचला स्व, अहंकार या
शारीरिक इच्छाओं और वासनाओं का केंद्र है। ‘रूह’ सद्प्रवृतियों
का उद्गम स्थल है और विवेक द्वारा परिचालित होता है। यह मनुष्य के भीतर मौजूद वह
पवित्र और शाश्वत 'दिव्य चिंगारी' है जो सीधे
परमात्मा से जुड़ी होती है। सूफ़ी नफ़्स पर नियंत्रण करके रूह को परमात्मा की ओर
उन्मुख करने का प्रयास करते हैं।
हज़रत इब्ने-अरबी ने तसव्वुफ़ को शास्त्रीय और प्रतीकात्मक (रहस्यात्मक) भाषा प्रदान की। हज़रत सद्रउद्दीन मुहम्मद
इस्हाक़ क़ुवैनवी (मृ.
1247 ई.) और उनके सहकर्मी मौलाना जलाल
उद्दीन रूमी (मृ. 1273
ई.) ने हज़रत इब्न-अरबी की विचारधाराओं को विस्तार दिया। इस तरह वहदतुलवजूद
दर्शनशास्त्र का रूप धारण करता गया। हज़रत इब्ने-अरबी और उनके सहयोगियों और
अनुयायियों ने ईश्वर के गुण और ‘तौहीद’
(एकेश्वरवाद) के दर्शन को बारीकी से समझाने का प्रयास किया।
“ईश्वर केवल एक है” की जगह हज़रत इब्न-उल-अरबी रह. का यह विचार कि “केवल ईश्वर है और कुछ नहीं” – वेदान्त के “सर्वं खलु इदं ब्रह्म” के समीप है। दोनों ही दर्शन
इस बात पर जोर देते हैं कि वास्तविक सत्य एक ही है। दोनों यह मानते हैं कि
ब्रह्मांड में जो कुछ भी दिखता है, वह उस एक परम सत्य (अल्लाह या ब्रह्म) से अलग नहीं है। उनका
यह विचार भारत में काफ़ी लोकप्रिय हुआ। हिंदी के सूफ़ी कवि मंझन ने उन्हीं
विचारों को ध्यान में रखकर “मधुमालती” की रचना की। किंतु यहां यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि वहदतुलवजूद का
सिद्धांत पूरी तरह से हिंदू धर्मशास्त्र पर आधारित नहीं है। हां उसके कुछ पक्षों
में वेदांत से समानता पाई जाती है। इब्न-उल-अरबी कहते हैं कि सब कुछ उसी का
रूप या उसकी प्रकट अभिव्यक्ति है, लेकिन सृष्ट और सृष्टिकर्ता (मखलूक और खालिक)
का अंतर फिर भी बना रहता है—यानी सब कुछ 'उसका' हिस्सा है, पर हर कोई 'वह' खुद नहीं है।
10.7 हज़रत महमूद शबिस्तरी (1288–1340 ई.)
प्रसिद्ध फ़ारसी सूफी कवि और
आध्यात्मिक संत हज़रत साद उद्दीन महमूद शबिस्तरी का जन्म अज़रबैजान के तबरीज़ के पास
एक गाँव शबिस्तर में तेरहवीं शताब्दी के मध्य में हुआ था। यह काल मंगोल आक्रमण और
राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। ज्ञान की खोज में उन्होंने मिस्र, तुर्की, और अरब देशों की लंबी
यात्राएँ कीं, लेकिन उन्होंने अपना अधिकांश जीवन तब्रीज़ में बिताया। मात्र 52 वर्ष की आयु में तबरीज़ में
उनका इंतकाल (निधन) हो गया और वहीं शबिस्तर में उनका मज़ार (दरगाह) आज भी मौजूद
है।
वे सूफी मत के
गूढ़ रहस्यों और दर्शन (Mysticism)
को सरल और काव्यात्मक रूप में समझाने के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। उन्हें
उनकी महान सूफी रचना 'गुलशन-ए
राज़' (रहस्यों का उद्यान) के लिए जाना
जाता है। गुलशन-ए-राज़ (द गार्डन ऑफ़ मिस्ट्री) अस्तित्व की एकता के सिद्धांत
लगभग 1,000 पंक्तियों की मसनवी काव्यात्मक प्रस्तुति है। इस मसनवी (काव्य रूप) की रचना उन्होंने साल 1311-1317 के आसपास की थी। खुरासान के एक विद्वान अमीर सैय्यद हुसैनी हेरावी ने तबरीज़
के सूफियों से तसव्वुफ (सूफीवाद) और दर्शन को लेकर 15 से 17 जटिल सवाल पूछे थे। उन सभी
सवालों के जवाब महमूद शबिस्तरी ने कविता के रूप में दिए, जो 'गुलशन-ए-राज़' पुस्तक बनी। इसे सूफी
रहस्यवाद और तत्वज्ञान का एक उत्कृष्ट और बुनियादी दस्तावेज माना जाता है। इसमें
आत्मा, परमात्मा, ब्रह्मांड, ईश्वर प्रेम और सूफी साधना के कठिन सिद्धांतों को प्रतीकों (जैसे- ज़ुल्फ़, जाम, शमा, परवाना) के माध्यम से समझाया
गया है। उनकी कविताएँ आत्म-बोध, ईश्वर के अस्तित्व और रूहानी प्रेम के रहस्यों को बहुत सरल
और गहरे तरीके से समझाती हैं। इस पुस्तक में पहले के प्रख्यात विद्वान हज़रत इब्न
अरबी द्वारा अस्तित्व की एकता पर पहले कही गई बातों से अलग कुछ भी नया नहीं है। सआदत-नामा ज्ञान और आध्यात्मिकता से
जुड़ी उनकी एक अन्य प्रसिद्ध कृति है। यह 'खुशी की किताब' (Book of Felicity) के नाम से जानी जाती है, जिसमें उन्होंने ज्ञान और
सूफी संतों का उल्लेख किया है। मिरात-उल-मुहक्किकीन सत्य और ईश्वर की पहचान
पर आधारित एक गद्य ग्रंथ है जो इस्लामी रहस्यवाद, ईश्वरीय एकता (वहदत
अल-वुजूद) और आध्यात्मिक एहसास पर केंद्रित है। हक़-उल-यक़ीन परमात्मा और परम
सत्य के ज्ञान पर आधारित उनकी एक महत्वपूर्ण गद्य रचना है
वे प्रसिद्ध सूफी विचारक इब्न
अरबी के 'वहदत-अल-वुजूद' (अद्वैतवाद या सब ईश्वर का ही रूप हैं) के सिद्धांत से काफी प्रभावित थे। उनका
कहना है एक के अलावा अस्तित्व में कुछ भी नहीं है। आकस्मिक और आवश्यक कभी अलग
नहीं थे; वे अनंत काल से एक के रूप में अस्तित्व में थे। एक के एक पक्ष को देखें तो वह
एक है, और यदि आप दूसरे पक्ष को देखते हैं, तो वह अनेक हो जाता है - अंतर केवल इतना है कि एकता का पहलू
वास्तविक है, जबकि बहुलता का पहलू भ्रामक है। वास्तविकता एक है लेकिन उसके नाम अनेक हैं और
यही बहुलता है जो अनेकता का कारण बनती है। मूल तत्व (सत्य) हमारे ज्ञान या समझ से परे है। लेकिन, शबिस्तरी के अनुसार, ईश्वर के मूल तत्व को जानने
में हमारी ओर से यह अक्षमता उनकी अत्यधिक निकटता और उनके परम प्रकाश के अतिरेक
होने के कारण उत्पन्न होती है। शबिस्तरी की प्रसिद्ध मसनवी गुल्शने राज़ के अनुसार, ईश्वर का मूल सार या तत्व 'परम प्रकाश' (Absolute Light) है। निरपेक्ष प्रकाश के रूप
में मूल तत्त्व आंख के लिए उतना ही अदृश्य है जितना कि ग़ैर-अस्तित्व जो पूर्ण
अंधकार है। कोई भी सीधे सूर्य को नहीं देख सकता। लेकिन इसे पानी में परिलक्षित के
रूप में देखा जा सकता है। उसी प्रकार मनुष्य की सीमित बुद्धि और आँखें उस असीम
दिव्य प्रकाश को सीधे सहन नहीं कर सकतीं। सापेक्ष ग़ैर-अस्तित्व पानी की तरह है। यह
निरपेक्ष प्रकाश के दर्पण के रूप में कार्य करता है जिसमें हक्क़ (सत्य) की रोशनी
परिलक्षित होती है। अत्यधिक प्रकाश और पूर्ण अंधकार दोनों ही स्थिति में देखना
असंभव हो जाता है। ईश्वर की अत्यधिक निकटता और उसका तेज ही वह कारण है जो हमारी
दृष्टि को चौंधिया देता है।
उनका मानना था कि इंसान के भीतर ही खुदा का नूर
छिपा है और आत्मा का अंतिम लक्ष्य दुनिया के मोह से मुक्त होकर परमात्मा में लीन
(फ़ना) हो जाना है। शेख महमूद शबिस्तरी की सुप्रसिद्ध रचना ‘गुलशन-ए राज़’ में वर्णित तत्त्वमीमांसा (Ontology) के अनुसार, परम
सत्य (अल्लाह या परम
अस्तित्व) की पहली अभिव्यक्ति या प्रकटीकरण अक़्ल-ए कुल्ली (सार्वभौमिक बुद्धि / Universal
Intellect) और अहदियत (एकत्व / Unity) के रूप में ही माना जाता है। अहदियत परम
सत्य (दिव्य सार) की वह आरंभिक और अद्वैत अवस्था है जहाँ वह पूर्णतः एकाकार
(एकत्व) है, और जहाँ किसी भी प्रकार के बहुविध गुणों या भेदों
का विभाजन नहीं हुआ है। अक़्ल-ए कुल्ली इस परम एकत्व (अहदियत) से होने वाली
पहली प्रगट अभिव्यक्ति या प्रथम प्रस्फूटन ‘सार्वभौमिक बुद्धि’ (जिसे प्रथम बुद्धि
या रूह-ए-मुहम्मदी भी कहा जाता है) है।
इस अक़्ल-ए कुल्ली के बाद दूसरी अभिव्यक्ति है नफ़्स-अल-कुल्ली (सार्वभौमिक
आत्मा) है। सार्वभौमिक
बुद्धि से सार्वभौमिक आत्मा का जन्म होता है। बुद्धि जहाँ विचार है, वहीं आत्मा उस विचार को कर्म और गति में बदलने वाली ऊर्जा है। यह प्रकृति की चेतना है। आलम-ए मिसाल (Imaginal World) भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत के बीच का एक पुल है।
यहाँ चीज़ों के रूप (Forms) तो होते हैं, लेकिन
वे भौतिक तत्वों (मिट्टी,
पानी) से मुक्त होते हैं। इसे सूफी 'सपनों और प्रतीकों का संसार' भी कहते हैं। श्रृंखला
के अंतिम पायदान पर व्यक्ति है, जो सृष्टि का चरम है, जो आलम-ए अजासाम (Physical World) है। यह अवतरण का सबसे अंतिम और सबसे निचला चरण है। यहाँ आकर आत्मा भौतिक
तत्वों (मिट्टी, हवा,
पानी, आग)
का चोला ओढ़ लेती है और हमारा दृश्य ब्रह्मांड अस्तित्व में आता है। शबिस्तरी के
दर्शन में भौतिक जगत के अंतिम छोर पर मनुष्यों का जन्म होता है. लेकिन
मनुष्य केवल एक जीव नहीं है;
वह इस पूरी सृष्टि का सार (Summary) है। मनुष्य के भीतर भौतिक तत्व भी हैं (शरीर) और
दिव्य प्रकाश भी (आत्मा)। शबिस्तरी कहते हैं कि मनुष्य ब्रह्मांड का एक छोटा रूप (Microcosm) है,
जिसके भीतर पूरा ब्रह्मांड (Macrocosm) समाया हुआ है। जब मनुष्य अपनी साधना से अपने भीतर
के दिव्य अंश को पहचान लेता है,
तो वह 'इंसान-ए-कामिल' (पूर्ण मानव) बन जाता है।
मानव की सृष्टि ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति के
अवतार के रूप में हुई है। उसके पास कुछ
आधारभूत तत्व हैं जो उसकी नैतिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं। चूंकि मनुष्य सृष्टि का अंतिम कारण है, इसलिए सब कुछ उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए बनाया गया है। वह प्रभु की सबसे अद्भुत रचना है। तर्क बुद्धि बिल्कुल बेकार है। अस्तित्व सृष्टि की
प्रक्रिया का मूल कारण है। सबसे अच्छा तरीक़ा है तार्किक कारण को छोड़ कर आत्मिक
ज्ञान की घाटी में प्रवेश करना। विवेक पूर्ण कारण से प्राप्त ज्ञान व्यक्ति को
नींद की ओर ले जाता है,
जबकि आत्मिक ज्ञान नींद से जगाती है। तर्क से परे एक "रास्ता" है जिसके द्वारा
मनुष्य वास्तविकता के रहस्य को जान सकता है। मनुष्य की यह सहज शक्ति उसके भीतर
छिपी है जैसे पत्थर में अग्नि निहित है। जब यह अग्नि प्रज्ज्वलित होती है, तो सारा संसार प्रकाशमय और आलोकित हो जाता है।
ज्ञान से उनका तात्पर्य उस युक्ति से नहीं है जिसके
द्वारा लोग सांसारिक शक्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं; क्योंकि
यह एक सच्चे फ़क़ीर के स्वभाव के विपरीत है। ज्ञान
तभी उपयोगी होता है जब वह व्यक्ति को सही कर्म की ओर ले जाता है, वह कर्म जो हृदय से उद्भूत होता है। शबिस्तरी क़ुरआन में वर्णित ज्ञान के दोनों
स्रोतों-बाहरी दुनिया (अफाक)
और आत्म-चेतना (अंजूस)
की आंतरिक दुनिया के अध्ययन का भी सुझाव देते है। लेकिन व्यवहार में रहस्यवादियों
का आंतरिक दुनिया का अध्ययन ने हमेशा उन्हें बाहरी दुनिया के भ्रामक चरित्र पर ज़ोर
देने के लिए प्रेरित किया है। बुद्धि (हिक्मा), नैतिक शुद्धता (इफला), बहादुरी (अदाला)
और न्याय (शजाह)
मुख्य नैतिक गुण हैं। जब नैतिक शुद्धि
प्राप्त हो जाती है, तो मनुष्य को दिव्य प्रकाश (तजल्ली) प्राप्त होता
है जो उसकी आत्मा को प्रकाशित करता है और उसे उच्चतम स्तर तक ले जाता है। संत और पैगंबर वे व्यक्ति हैं जो प्रबुद्ध आत्माओं
की श्रेणी में आते हैं। जैसे ईश्वर ही
एकमात्र सत्ता है और हर चीज़ का एकमात्र कारण है, इसलिए
सभी चीज़ें बिना किसी भेद के उसके प्रकाश को प्रकट करती हैं। उनका मानना है कि ईश्वर से अलग एक इकाई के रूप
में स्वतंत्रता की तथाकथित भावना स्वयं की चेतना के कारण है। मनुष्य स्वभाव से अस्तित्वहीन है और इसलिए, उसे स्वतंत्रता का श्रेय देना व्यर्थ है। शबिस्तरी के अनुसार मनुष्य को नैतिक उत्तरदायित्व
निभाने के लिए नहीं, बल्कि किसी अन्य उद्देश्य के लिए बनाया गया है। यह उद्देश्य ईश्वर के मूल तत्त्व, गुणों और नामों की अभिव्यक्ति के लिए एक चमकदार दर्पण के रूप में कार्य
करना है।
सवाल यह है कि वे कौन से चरण हैं जिनके द्वारा
व्यक्ति पूर्णता की अवस्था तक पहुँचता है? उनके
अनुसार, मनुष्य का जन्म सृष्टि के अमृत के रूप में हुआ है, जो शुद्धतम में से सबसे शुद्ध, और उच्चतम के उच्चतम
हैं। लेकिन इस दुनिया में उतरने के कारण वह सबसे निचले स्तर पर आ जाता है। इस
अवस्था में उसकी अवस्था एकता की अवस्था के ठीक विपरीत होती है। लेकिन अपनी सहज
शक्तियों या अपनी तर्कसंगत क्षमता के माध्यम से प्राप्त होने वाली रोशनी के कारण, मनुष्य अपनी कमज़ोरी का एहसास करता है और फिर पीछे की यात्रा पर निकल जाता
है। यह आकस्मिकता से आवश्यकता की ओर, बहुलता से एकता की ओर, बुराई से अच्छाई की ओर यात्रा कर रहा है। इस यात्रा में तीन चरण होते हैं। पहले को अवशोषण कहा जाता है।
यहां ईश्वर का प्रकाश अपने कार्यों से चमकता है ताकि रहस्यवादी हर चीज़ के कार्यों
को मिथ्या समझे। दूसरे चरण में ईश्वर के गुणों के माध्यम से दिव्य प्रकाश चमकता है
और इसलिए सूफ़ी हर चीज़ के गुणों को ईश्वर में विलीन मानते हैं। अंतिम चरण तब आता है
जब रहस्यवादी को मूल तत्त्व से रोशनी मिलती है और वास्तविक स्थिति को देखता है।
उसके लिए उसके अलावा कुछ भी मौजूद नहीं है और सभी चीज़ों का अस्तित्व पूरी तरह से
उसी से निकला है। जब वह इस अवस्था में पहुँचता है, तो
वह पूर्ण हो जाता है और अपने ईश्वर के साथ एकता की स्थिति प्राप्त कर लेता है।
सूफी दर्शन केवल यह नहीं बताता कि हम कहाँ से आए
हैं, बल्कि यह भी बताता है कि हमें वापस कहाँ जाना है।
अवतरण के बाद आत्मा की वापसी की यात्रा शुरू होती है, जिसे 'उरूज' या आरोहण कहते हैं। इसके मुख्य तीन पड़ाव हैं: धार्मिक
क़ानून (शरीयत) और नैतिक आचरण, जो आत्मा को शुद्ध
करने की शुरुआत हैं, रहस्यवादी मार्ग (तरीक़त), आंतरिक आध्यात्मिक यात्रा,
जहाँ साधक एक मुर्शिद (गुरु) के मार्गदर्शन
में अपने अहंकार (नफ़्स)
को नष्ट करता है, और सत्य (हक़ीक़त) - यह
वह अवस्था है जहाँ साधक का भ्रम मिट जाता है. उसे समझ आता है कि वह ईश्वर से अलग
था ही नहीं. इसे सूफी मत में 'फ़ना' (अहंकार का मिटना) और 'बक़ा' (ईश्वर में अमर हो
जाना) कहा जाता है।
सभी एक सिद्ध व्यक्ति (इन्सानुल कामिल) का
निर्माण करते हैं। शरीयत,
शेख़ के अनुसार, बादाम
की रक्षा कवच की तरह है। यह एक निश्चित चरण के लिए उपयोगी है। जब पूर्णता की
अवस्था पहुँच जाती है, तो खोल बेकार हो जाता है और बेहतर तरीके से फेंक
दिया जाता है। फिर भी, एक सिद्ध सूफ़ी को धर्म की जरूरत होती है, अपने लिए
नहीं बल्कि दूसरों के लिए। शबिस्तरी का यह पूरा दर्शन एक वृत्त (Circle) की तरह है, जो
ईश्वर से शुरू होकर मनुष्य पर आता है, और
मनुष्य के भीतर से होता हुआ वापस ईश्वर में विलीन हो जाता है।
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मनोज
कुमार
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