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शनिवार, 17 मार्च 2012

फ़ुरसत में ... देखी ‘कहानी’, आप भी देखिए

फ़ुरसत में ...95

देखी ‘कहानी’, आप भी देखिए

SDC11128_editedमनोज कुमार

मेरे लिए, इस सप्ताह की शुरुआत एक शानदार फ़िल्म से हुई। बहुत दिनों बाद एक ऐसी फ़िल्म देखी जिसमें शुरू से अंत तक थ्रिल बना रहा। आजकल हिंदी में ऐसी फ़िल्में बहुत कम ही बनती हैं। आम तौर पर हिंदी फ़िल्मों का पुनरावलोकन (रिव्यू) करते वक़्त अंग्रेज़ी अखबारों के समीक्षक पश्चिम का चश्मा पहन कर नाहक ही उसकी आलोचना करने लगते हैं। इस फ़िल्म के साथ भी ऐसा ही देखने-पढ़ने को मिला।

 

फिल्म “कहानी” भारतीय सिने-जगत के इतिहास में फिल्माई गई एक ऐसी कहानी है, जो वर्षों में एकाध बार लिखी जाती है और इस कहानी को परदे पर सफल बनाने में विद्या बालन ने जो महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उसे सालों-साल तक याद किया जाता रहेगा। एक के बाद एक सशक्त किरदार निभाकर विद्या अपनी एक्टिंग का लोहा तो मनवा ही रही हैं, अब उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि वे सिर्फ़ अपने दम पर फ़िल्म को सफलता के शिखर तक ले जा सकती हैं, और उसे हिट करा सकती हैं।

डर्टी पिक्चर के बाद, उन्हें न जाने किन-किन खिताबों से नवाज़ा गया, किंतु फ़िल्म “कहानी” में बिना किसी अंग-प्रदर्शन और ग्लैमर के उन्होंने साबित कर दिया है कि किसी चरित्र में जीवंत अभिनय के द्वारा कैसे जान फूंकी जा सकती है। पूरी फ़िल्म में न कोई नाच-गाना है, न कोई “ऊ ला ला” ही। मुख्य किरदार भी ऐसा जिसमें ग्लैमर या डर्टी दिखने और दिखाने का कोई चांस नहीं। एक महिला जो आठ-नौ महीने की गर्भवती है और उसका पति अचानक ग़ायब हो गया है। ऐसी कठिन परिस्थिति में उस महिला के लिए जीवन न तो सिल्क सा कोमल है न उसमें इश्क़िया होने का ही कोई चांस है। विद्या बालन ने ऐसी ज़बरदस्त पटकथा वाली इस फ़िल्म में उस ताकतवर स्त्री के किरदार को जीकर यह बताया है कि वे अपने उत्कृष्ट अभिनय के बल पर फ़िल्म में जान फूंक सकती हैं।

ग़ौर करने वाली बात है कि इस फ़िल्म में न कोई खान है, न कपूर, न ही कोई कुमार और न कोई फ़िल्म को हिट कराने वाला नाच-गाना, न आइटम नम्बर। फिल्म में जो प्रमुख पुरुष अभिनेता हैं उनके नाम से भी हिंदी फ़िल्म के दर्शक अनजान ही होंगे - परमब्रत चट्टोपाध्याय, नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी और इंद्रनील सेनगुप्त। इन्होंने भी अपने जानदार अभिनय से फ़िल्म में जान डाल दी है। फिल्म की कहानी भी बड़ी साधारण सी है। विदेश (लंदन) में रहने वाली एक गर्भवती महिला अपने “मिसिंग हसबैंड” को ढ़ूंढ़ने कोलकाता आती है और एक होटल में ठहरती है। कोलकाता पुलिस की मदद से वह अपने पति की तलाश में कोलकाता के गली-मुहल्ले की ख़ाक छानती फिरती है।

चूंकि यह फ़िल्म एक सस्पेंस थ्रिलर है, इसलिए इससे ज़्यादा कहानी बताना उन पाठकों के प्रति अन्याय होगा जिन्होंने यह फ़िल्म नहीं देखी है, लेकिन इतना कह सकता हूं कि शुरू से आखिर तक सांस रोके देखने को आप बाध्य हो जाएंगे। फिल्म में न किसी तरह के अनावश्यक लाईट-साउंड इफ़ेक्ट के द्वारा लोगों में डर पैदा करने की कोशिश की गई है, न फालतू की कोई कार चेज़िंग या मारधाड के दृश्य के द्वारा जबरन रोमांच ही ठूंसा गया है। अगर कुछ इस फ़िल्म को अन्य फ़िल्मों से अलग करता है, तो वह है सारे कलाकारों का सशक्त अभिनय, और उससे भी बढकर फ़िल्म का चुस्त निर्देशन। और फिल्म की रफ़्तार को दर्शकों के दिल की धडकन से मुकाबला करने वाली एडिटिंग के बिना फिल्म का यह रोमांच कभी संभव नहीं होता। एक भी फ़ालतू दृश्य नहीं, एक भी अनावश्यक डायलॉग नहीं। चुस्त पटकथा के कारण यह फ़िल्म इतनी सशक्त बन पड़ी है कि रोमांच अपने चरम पर है।

“झंकार बीट्स” से अपनी पहचान बनाने वाले फ़िल्म के निर्देशक सुजॉय घोष ने कोलकाता के परिवेश को दिखाने के लिए अनावश्यक रूप से फुटेज़ खाने की ज़रूरत नहीं समझी है, फिर भी कोलकाता का शायद ही कोई रंग छूटा हो। फ़िल्म अपनी रफ़्तार में चलती रहती है और कोलकाता का परिवेश, उसके गुण और उसकी विशेषताएं खुद-ब-खुद सामने आती रहती है। कोलकाता के परिवेश का इससे बढ़िया चित्रांकन शायद ही किसी फ़िल्म में देखा होगा। यह कमाल एक कुशल व प्रभावशाली संपादन और निर्देशन से ही संभव हो सका है। विशाल शेखर ने फ़िल्म में संगीत दिया है और अमिताभ बच्चन की आवाज़ में कविगुरु रविन्द्र नाथ टैगोर के गीत “एकला चलो रे” की प्रस्तुति भाव-विभोर कर देती है। यह गीत दर्शकों के लिए एक ऐसा कलात्मक उपहार है, जिसे आप वर्षों तक नहीं भूल पायेंगे।

फ़िल्म विद्या बालन की है, जो विद्या (बिद्या का नहीं) का ही किरदार निभाती है। कभी परिस्थितियों के आगे विवश भारतीय नारी बनकर अपने गुस्से का इज़हार करती, तो कभी बच्चों के साथ खुशियाँ शेयर करती हुई और कभी अपनी जान जोखिम में डालकर रोमांचक कारनामे अंजाम देती हुई, फिर भी कमाल ये कि ये सब कहीं से बनावटी या ज़बरदस्ती थोपा हुआ नहीं लगता।

इस “मस्ट सी” फ़िल्म में विद्या बालन का अभिनय कम से कम उन आलोचकों का मुंह ज़रूर बंद कर देगा जो उनके श्रेष्ठ अभिनय के लिए मिले राष्ट्रीय पुरस्कार पर उंगली उठा रहे थे।