गांधी और गांधीवाद
465. गांधीजी
बिहार में-2
1947
रामायण
की धरती बिहार पर खून-खराबा
बिहार रामायण की धरती रही है। एक प्रांत के रूप
में अधिक शांत रहा था। बिहार वासी जानते थे कि पाप क्या होता है और पुण्य क्या
होता है। फिर आखिर हुआ क्या था? ऐसी कौन-सी बात थी जिसने उस "शांत स्वभाव
वाले बिहारी" को इतना हिंसक बना दिया कि वह औरतों और बच्चों का इतनी बेरहमी
से कत्लेआम करने पर उतर आया? इस सामूहिक पागलपन
की वजह क्या थी? 1946 के बिहार के उपद्रवों की एक लंबी और जटिल पृष्ठभूमि थी।
1937
के चुनावों में हार से मुस्लिम लीग में हताशा
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे बिहार के कई नेता हिन्दू
और मुसलमानों का समान आदर करते थे। ख़िलाफ़त आन्दोलन के समय वहां के साम्प्रदायिक संबंध
काफी सुधरे थे। 1937 के चुनावों में विभिन्न प्रांतों में हुई हार से मुस्लिम लीग बहुत
आग-बबूला हो गई थी। लीग द्वारा एक रिपोर्ट तैयार की गई और उसे मुस्लिम अल्पमत पर सारे
भारत में कांग्रेस के अत्याचारों का झूठा क़िस्सा गढ़कर एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित
कराया गया। एक और रिपोर्ट पटना के एक बैरिस्टर शेरिफ ने दो वॉल्यूम में पब्लिश की
थी। इसका 75 परसेंट हिस्सा लेजिस्लेटिव असेंबली में झूठा माना गया और बाकी 25
परसेंट झूठा साबित हो गया!
कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से राजेन्द्रबाबू
ने प्रस्ताव रखा कि लीग की शिकायतों की न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर
द्वारा निष्पक्ष जांच करायी जाए, तो जिन्ना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। लोकतंत्र
की बढ़ती लहर के विरुद्ध संघर्ष में प्रतिक्रियावादी ताकतों ने सांप्रदायिकता के
उभार को अपने कब्ज़े में ले लिया। 1937 के चुनावों में करारी हार के बाद, मुस्लिम लीग ने
अपनी हताशा में संयम की सारी सीमाएँ तोड़ दीं। अपनी सफलता से उत्साहित होकर, दूसरा पक्ष लीग की दादागिरी के प्रति पूरी तरह
असहिष्णु हो गया।
लीगी नेता का पाकिस्तान लेने की धमकी
1939 में जब ब्रिटिश सत्ता ने भारत की स्वीकृति के बिना ही उसे युद्ध में लड़ने
वाला देश घोषित कर दिया, तो इसे भारतीय स्वाभिमान का अपमान समझकर इसके विरोध में कांग्रेसी मंत्री-मंडल ने त्यागपत्र दे दिया। मुस्लिम लीग ने
इस घटना को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया। इस तरह धीरे-धीरे तनाव बढ़ता गया। हिन्दुओं
में क्षोभ की भावना तेज़ होती गई। लीगी नेता बलपूर्वक पाकिस्तान लेने की धमकी दिया करते
थे। मुस्लिम लीग के अखबारों में हिन्दू धर्म और उसकी रीति-रिवाज़ों पर हमले किए जाते
थे। हिन्दुओं को और "हिंदू कांग्रेस" को दुश्मन कहा जाता था। इस सब बातों
से बिहार के हिन्दू मानस पर बुरी प्रतिक्रिया हुई। 1942 के ‘भारत छोड़ो” अन्दोलन का लीग ने विरोध किया था।
इससे बिहार में दोनों क़ौमों के बीच की खाई और भी चौड़ी हो गई। मुस्लिम लीग का
ज़्यादातर नेतृत्व सामाजिक रूप से रूढ़िवादी था, बिहार की हिंदू जनता
के मन में यह भावना पैदा कर दी कि मुस्लिम लीग न सिर्फ़ देश की स्वतंत्रता में बाधक
है बल्कि हमारी अपनी सामाजिक मांगों की पूर्ति में भी बाधक है।
नोआखाली की ख़बरों ने आग में घी का काम किया
1946 की कलकत्ते की ‘सीधी कार्रवाई’ की लहर एक तरफ़ तो नोआखाली
की ओर गई दूसरी तरफ़ बिहार की ओर। 1911-12 तक, बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी का ही एक हिस्सा था, इसी वजह से, कलकत्ते में रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दस लाख से अधिक बिहारी रहते थे। 16 अगस्त और उसके बाद की घटना में बहुत से बिहारी मारे गए। बहुत से लोग, जो बच गए
थे, शरणार्थी बनकर बिहार वापस आ गए और विभिन्न गांवों में फैल गए। अपने साथ वे दंगों
की भयंकर कहानियां भी साथ लेते गए, जिनमें से कई बढ़ा-चढ़ाकर भी पेश किए गए होते थे।
आग तो जल ही रही थी, नोआखाली की ख़बरों ने आग में घी का काम किया।
ज़बरन धर्म-परिवर्तन और स्त्रियों के साथ बलात्कार की ख़बरों ने लोगों की भावनाओं को
भड़का दिया। बिहार के लोग उत्तेजित हो गए। कलकत्ता में हुई अशांति के बाद कई
रहस्यमयी पर्चे बांटे जाने लगे। इनमें से कुछ पर्चे साफ़ तौर पर नकली नामों से
जारी किए गए थे। लोगों में इश्तिहार बांटे गए कि पाकिस्तान की स्थापना के लिए हिन्दुओं
और उसके नेताओं को मार डाला जाए। यह ख़बर आई कि मुसलमान हथियार चलाने की गुप्त रूप से
ट्रेनिंग ले रहे हैं। हिंदुओं पर एक ज़ोरदार हमला करने की योजना बनाई रही है। लोगों
को यकीन हो गया कि मुस्लिम लीग अपनी 'सीधी कार्रवाई' (Direct Action) की नीति को आगे बढ़ाने के लिए सबसे जघन्य अपराध करने पर आमादा है।
बारूद में आग लगाने का काम
बारूद में आग लगाने का
काम किया सितम्बर 1946 में मुज़फ़्फ़रपुर के बेनीबाद
में इस ख़बर ने कि एक स्थानीय मुसलमान ने कलकत्ते से एक लड़की भगा लाया है। उस लड़की को
पेश करने की मांग की गई, तो लोगों ने दो तीन दिन का समय मांगा। नियत दिन जब हिन्दू
उस लड़की को लेने पहुंचे तो उन्हें मालूम पड़ा कि न सिर्फ़ लड़की को दूसरी किसी जगह भेज
दिया गया है बल्कि वह मुसलमान लड़का भी फरार हो गया है। इस पर भीड़ बेकाबू हो गई। कई
मुसलमान मारे गए। उनके घर जला दिए गए। ऐसे अवसर पर हिन्दू सभा ने ‘'बिहार के हिंदुओं की वर्तमान दुर्दशा'’ नाम से पुस्तिका निकालकर लोगों की भावनाओं को और भी उत्तेजित करने का काम किया
जिसमें बेनीबाद जैसी घटनाओं का ज़िक्र था और यह बताया गया था कि मुसलमान हिन्दुओं पर
संगठित हमले की योजना बना रहे हैं। मुस्लिम हिंसा के फैलाव को रोकने में सरकार समर्थ
नहीं हुई। एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के खिलाफ़ आगज़नी, हत्या और बलात्कार का जो सुनियोजित कार्यक्रम एक राजनीतिक हथियार के तौर पर
चलाया गया था, उसे बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार की अघोषित मदद मिली हुई थी। उसने आम
लोगों के मन को इतना झकझोर दिया था कि हर तरह की मनगढ़ंत कहानियों पर भी लोग आसानी
से यकीन करने लगे थे। ज़िम्मेदार नेताओं ने
भी ऐसे बयान दे दिए जो बाद में बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए साबित हुए।
साम्प्रदायवाद के साथ सहानुभूति
कांग्रेस में भी एक ऐसा
वर्ग उत्पन्न हो गया जो साम्प्रदायवाद के साथ सहानुभूति रखता था। ‘सर्चलाइट’ जैसे अखबार
भी भड़काऊ लेख लिख रहे थे। सरकार इसके ख़िलाफ़ कोई कदम इस लिए नहीं उठा रही थी कि ‘डॉन’
और ‘मॉर्निन्ग न्यूज़’ जैसे पत्र भी उत्तेजित करने वाले लेख प्रकाशित करते थे, और यदि
‘सर्चलाइट’ के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की जाती तो ‘डॉन’ और ‘मॉर्निन्ग न्यूज़’ जैसे मुस्लिम
पत्रों के खिलाफ़ भी कार्रवाई करनी पड़ती। सरकार की इस अनिश्चय की स्थिति ने लोगों में
यह भावना फैलाने में मदद पहुंचाई कि हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए अन्तरिम सरकार से कोई
आशा नहीं रखी जा सकती। यह सरकार मुसलमानों के आक्रमण को रोकने की इच्छा ही नहीं रखती।
परिणाम यह हुआ कि लोग क़ानून अपने हाथ में लेने लगे।
किसान आंदोलन से अशांति
1930 के दशक में किसान
आंदोलन से जो किसान अशांति पैदा हुई, उसने एक बड़े आंदोलन
को और हवा दी; इसने मुस्लिम ज़मींदारों के हिंदू काश्तकारों को अपने
ज़मींदारों पर हमला करने का एक बहाना दे दिया। कुछ मुस्लिम ज़मींदारों ने भी—बिना
यह समझे कि वे जो कर रहे हैं उसके क्या परिणाम होंगे—किसानों का ध्यान कृषि संबंधी
मुद्दों से हटाने की कोशिश की, और उसे सांप्रदायिक
नफ़रत की ओर मोड़ दिया। कालाबाज़ारी करने वालों के ख़िलाफ़ भी लोगों में ज़बरदस्त
रोष था। इन लोगों ने मुसलमानों के प्रति फैली नफ़रत का फ़ायदा उठाकर, खुद को समुदाय के नेता के तौर पर फिर से स्थापित करने की कोशिश की। किसी भी
तरह की अशांति या दंगे के दौरान, मुस्लिम गुंडे हमेशा
इन्हीं लोगों की दुकानों पर हमला करते थे। ब्रिटिश अधिकारियों को बिहार सरकार से
शिकायत थी। उन्हें आज़ादी का आना पसंद नहीं था, क्योंकि इससे उनकी
लंबे समय से चली आ रही खास हैसियत खत्म हो जाती। वे लोकप्रिय सरकार को बदनाम करने
के लिए बेताब थे। जब बिहार इतने बड़े संकट का सामना कर रहा था, उस समय 28 अक्टूबर से 5 नवंबर, 1946 के बीच बिहार का गवर्नर
प्रांत से रहस्यमय ढंग से गायब हो गया था। अख़बारों के संपादकीय लेखों का आम सुर
यही था कि लीग के सदस्य खतरनाक उकसावे वाली हरकतें कर रहे हैं। प्रेस इस मौके पर
अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा और लोगों को सही दिशा नहीं दिखा पाया। क़ानून-व्यवस्था
के प्रभारी भारतीय अधिकारियों ने उस समय फैली सांप्रदायिक भावना को खुद पर हावी
होने दिया। सरकारी सेवाओं और पुलिस में सांप्रदायिकता की इस घुसपैठ ने, उस भारी तबाही में एक बहुत बड़ा हिस्सा निभाया।
काली दिवाली
24 अक्तूबर को दिवाली थी। अधिकांश लोगों ने इसे ‘काली दिवाली’ के रूप में
मनाने का फैसला किया। सारण ज़िले के छपरा शहर में कुछ पथभ्रष्ट लोगों ने इसका अनुचित
लाभ उठा कर लोगों की भावना भड़काते हुए कहा कि जो लोग इस हमारी दिवाली को ‘काली’
बनाने के लिए जिम्मेदार हैं, उनसे बदला लेने के दिन के रूप में इसे मनाया जाएगा।
उधर एक मस्जिद में लीग के नेताओं ने भाषण देते हुए कहा, “आज हिन्दुओं के घर में
मातम हो रहा है। हम लोगों को आज जश्न मनाना चाहिए।”
दंगा-फसाद ने उग्र रूप धारण किया
25 अक्तूबर को बंगाल में हुए दंगों के विरोध में सभाएं आयोजित की गईं। इन बैठकों
पर रोक नहीं लगाई गई, क्योंकि यह महसूस किया गया कि अगर भावनाओं को व्यक्त
करने का कोई वैध ज़रिया नहीं दिया गया, तो वे एक ज़बरदस्त
विस्फोट के रूप में फूट पड़ेंगी। इसके तुरंत बाद छपरा में अलग-अलग स्थानों पर मार-काट
मची। 26 अक्तूबर को दंगा-फसाद
ने और उग्र रूप धारण कर लिया। मामला देहाती इलाक़ों में भी फैलने लगा। यह सब 31 अक्तूबर
तक चलता रहा। फिर यह प्रांत के अन्य भागों में भी फैलने लगा। लाखों मुसलमान बिहार से
पलायन कर गए। गांवों में कुएं लाशों से भरी पड़ी होती थीं। जहाँ कहीं आस-पास कोई
नदी थी, वहाँ लाशों को नदी में फेंक दिया गया। छोटे-छोटे
बच्चों को उनकी माँ की गोद में ही मार डाला गया। अनियंत्रित भीड़ लूटपाट करती, घरों
को जलाती। छपरा शहर में लगभग सौ घर जला दिए गए थे। लगभग छह हज़ार लोगों ने ज़िला
स्कूल में शरण ले रखी थी और उनकी हालत बहुत खराब थी। पैगंबरपुर एक बड़ा गाँव था।
यहाँ लगभग 50 घर जला दिए गए थे। इन्हीं घरों में लगभग उतनी ही संख्या में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की हत्या कर दी गई थी और उन्हें जला दिया गया था। वहाँ
पुलिस मौजूद थी। 31 अक्टूबर को पटना ज़िले में भी अशांति की खबरें आने लगी थीं। बड़ी
संख्या में घायल लोग—जिनमें बुज़ुर्ग, औरतें और बच्चे भी
शामिल थे—पटना और तारेगना स्टेशनों पर पहुँच गए। तारेगना स्टेशन पर लगभग 50 शव
पड़े हुए थे। छपरा (सारण ज़िला) से अशांति मुंगेर, भागलपुर, संथाल परगना, पटना और गया ज़िलों तक फैल गई। प्रभावित छह ज़िलों के
कुल 18,869 गाँवों में से 750 गाँव इन घटनाओं में शामिल थे। लेकिन
अधिकारियों द्वारा की गई व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के कारण कोई बड़ी अशांति नहीं
फैली। 29 और 30 अक्टूबर को फुलवारी शरीफ और पुनपुन, और मसौढ़ी में पहला भयानक
नरसंहार हुआ। क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए घरों की कुल संख्या 9,869 थी। पुलिस और सेना द्वारा कुल 2,186 गोलियाँ चलाई गईं, जिसमें 393 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 100 लोग घायल हुए। मारे गए मुसलमानों
के संबंध में सरकार का अंतिम आँकड़ा लगभग 5,400 था। 'फ्रेंड्स सर्विस यूनिट' का अनुमान था कि मारे गए लोगों की संख्या 10,000 से अधिक नहीं हो सकती। शायद सच्चाई इन दोनों आँकड़ों के बीच कहीं स्थित
है। अपहरण, बलात्कार और ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन के मामले भी
सामने आए थे। इनकी संख्या अज्ञात थी।
3 नवंबर को नेहरू और सरदार
पटेल पटना पहुंचे। उन्होंने बिहार के
नेताओं के साथ पीड़ित क्षेत्रों का दौरा किया। अराजकता पर नियंत्रण पाने के लिए कठोर
उपाय किए गए थे। वांछित परिणाम भी मिला था। मगर पीड़ितों को फिर से बसाने और उनमें विश्वास
पैदा करने की समस्या का समाधान अभी बाक़ी था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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